10 जून 2026

150. भंडारा : इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ

एक दिन बीच वाले कमरे की खिड़की से बाहर झाँका तो देखा शरद का चाँद खुले आसमान में अपनी मसें भीगने की उम्र तक आ चुका है और ओस में नहाती हुई चाँदनी को छुप छुप कर देख रहा है । मैंने मेले से लाये अपने कागज़ के साँप से कहा ‘जा, चाँदनी की देह से लिपट जा, चंदन की खुशबू तो उसकी देह से भी आ रही है ।‘ साँप ने कहा ‘ना, वह तो मस्तमगन के फूल की खुशबू है, जो बाबूजी कल किसी के घर से लाए हैं ।‘

मेरे यथार्थ के धरातल पर पहुँचते ही  मेले से लाए खिलौनों के साथ लाई गई भुलोबा और भुलाबाई की मिट्टी की मूरत बोल उठी “ओ सांप वाले बाबू ..हमें कब बिठाओगे ?” “ओह, मैं तो भूल ही गया था ।“ मैंने मन ही मन कहा और फटाफट तैयारी करने लगा ।पहले  टेबल पर एक कपड़ा बिछाया, माँ और छोटी बहन सीमा मेरी मदद के लिए आ गई और हमने उस पर भुलाबाई और भुलोबा की स्थापना कर दी ।

आप सोच रहे होंगे कौन है यह भुलाबाई और भुलोबा ? अरे, यह कोई और नहीं अपने शंकर पार्वती हैं। जैसे कि हर साल बेटियाँ अपने मायके आती हैं वैसे ही लोक परम्पराओं की हमारी यह भुलाबाई अर्थात गौरी भी अनंत चतुर्दशी से अपने मायके आई हुई है और भुलोबा यानि अपने शंकर जी दशहरे के दिन उसे लेने आये हैं। अब वे ठाठ से अगले पाँच दिन यानी शरद पूर्णिमा तक अपनी ससुराल में रहेंगे और फिर अपनी पार्वती को लेकर वापस चले जाएंगे । 

पुराणों में वर्णित गौरी के अपने पीहर आने का यह मिथक महाराष्ट्र में एक पर्व के रूप में मनाया जाता है जिसमें लड़कियां दशहरे के दिन अपने घर में भुलाबाई की स्थापना करती हैं । पांच दिनों तक हर शाम दिया बाती के बाद लड़कियों की टोली निकलती है, वे बारी बारी से अपनी सखियों के घर जाती हैं और उनके घर बिठाई गई भुलाबाई की पूजा कर बहुत सुन्दर गीत गाती हैं, फिर प्रसाद खाती हैं और घर लौट आती हैं ।  

मुझे बचपन से ही हम बच्चों की टीम लीडर लीलाताई की टीम में शामिल होकर सखियों के घर जाने और भुलाबाई के गाने गाने का मौका मिल गया था । हर साल गाते रहने के कारण पांच छह साल की उम्र तक तो पूरे गाने याद हो गए थे  जो आज भी याद हैं । जनपदीय मराठी भाषा में गाए जाने वाले भुलाबाई के यह गीत वस्तुतः हमारे लोक जीवन में  गाये जाने वाले लोकगीत ही हैं जिनके शब्दों में तत्कालीन संस्कृति की झलक दिखाई देती है । एक बानगी देखिए ..

भाद्रपदे च महिना आला आम्हा मुलींना आनंद झाला 

पार्वती म्हणे शंकराला चला हो माझ्या माहेराला 

गेल्या बरोबर पाट बसायला विनंती करू यशोदेला 

सर्व मुली गोळा झाल्या टिपर्‍या मध्ये गुंग झाल्या 

गाणे गायिले खेळ केला  प्रसाद घेऊनि घरी गेल्या ।

इसका आशय कुछ इस प्रकार है  कि भाद्रपद का महीना आ गया है और पार्वती शंकर से कह रही हैं “ए, चलो न मेरे पीहर, वहां तुम्हे पाटे पर बैठाया जायेगा और खेलते हुए , तालियों से स्वागत किया जायेगा। मेरी सखियाँ तुम्हारी राह देख रही हैं, वे तुम्हारे स्वागत में गीत गायेंगी और प्रसाद खाकर घर जायेंगी ।

विशेष बात यह है कि इन गीतों में शिव पार्वती कोई देवता नहीं हैं । यहाँ  वे सामान्य लोगों की भांति ही आचरण करते हैं, कहीं कहीं उन्हें भील भीलनी भी माना जाता है । यद्यपि इसके पीछे भी एक कथा है कि एक बार द्यूतक्रीड़ा में पार्वती से सब कुछ हार जाने के पश्चात शिवजी जंगल की ओर निकल गए और अपना देवत्व भूल कर भुलोबा नामक भील बन गए ।  तब पार्वती उन्हें मनाने के लिए भीलनी का रूप धारण कर उन्हें मनाने गईं।  इसलिए उनके स्वागत में गाये इन गीतों में भी भजन या आरती जैसा कोई भाव नहीं है ।

विशेष बात यह कि यह भक्ति गीत नहीं हैं, इन लोकगीतों में स्त्री की व्यथा है , परदेस में ब्याही गई बेटी के सुख दुःख के समाचार हैं । वह इन गीतों के माध्यम से अपने उन दुखों का बखान  करती है जो उसे ससुराल में मिले होते हैं । प्रसव पीड़ा के समय उसे क्या महसूस होता है , पति,सास,ससुर द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर वह कैसा महसूस करती है इन बातों का सूक्ष्म चित्रण इन गीतों में है । 

इन गीतों को सुनते हुए इस बात का अनुभव होता है कि अपने दुखों को अभिव्यक्त करने के लिए मनुष्य सदा गीतों का सहारा लेता रहा है । स्त्रियों के पास भी अपने शोषण और उत्पीडन को दर्ज करने के लिए इसी लोक का आलम्बन है । दुःख तो दुःख है, एक दिन फूट पड़ेगा, चाहे आंसुओं में ,चाहे गीतों या कविताओं में और जब दुःख की इन्तहा हो जाएगी वह आक्रोश बन जायेगा, प्रतिरोध के लिए ताकत बन जायेगा ।

एक गीत है जिसमे भुलाबाई गर्भवती है, वह मायके जाना चाहती है और सास से कहती है “सासूबाई सासूबाई मला मूळ आल आता तरी धाडाना धाडाना “ लेकिन उसकी सास उसे जाने नहीं दे रही है । वह बहाना बनाते हुए उससे कहती है “ऐसा करो पहले बाड़ी में करेले के बीज बो दो तब चले जाना।“ बहू बीज बो देती है । फिर सास कहती है “ऐसा करो उसकी बेल उग जाने दो फिर अपने मायके चले जाना । “ जब बेल बढ़ जाती है तो कहती है अब उसमे फूल आने दो, फिर कहती है बेल में करेले लग जाने दो। अंततः जब तक बहू करेले की सब्जी बनाकर सास को खिला नहीं देती और जूठन समेट  नहीं लेती, उसे मायके जाने की अनुमति नहीं प्राप्त होती । 

फिर कुछ गीतों में मायके में उसके सहेलियों के साथ खेले गए खेल और शरारतों का वर्णन है । भुलाबाई यहाँ प्रसव के लिए आई है । अभी अभी उसे संतान प्राप्ति हुई है । यह संतान बेटा भी हो सकता है और बेटी भी, समस्या तो यह है कि उसका नाम क्या रखा जाए । लड़कियाँ गाती हैं ..

इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ खिड़कित होता बत्ता 

भुलोजी ला मुलगा झाला नाव ठेवा दत्ता 

मतलब हमारे सामने नाम रखने की समस्या थी तो यूँही सोचते सोचते हम खिड़की के पास चले  गए, वहां एक बत्ता रखा था, वही खलबत्ते वाला बत्ता, तो बस बत्ता की तुकबंदी में हमें नाम मिल गया ‘दत्ता’ । अब मान लो अगर लड़की हुई हो तो उसके लिए फिर गाना है 

इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ  खिड़कित होती वांगी 

भुलोजी ला मुलगी झाली नाव ठेवा हिमांगी  

यानी इस बार जब हम खिड़की के निकट गए  तो वहां वांगी यानी बैंगन रखे थे बस वांगी की तुक में हमें नाम मिल गया हिमांगी । लड़कियां ऐसे ही ‘इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ’ गाती जातीं और गागर की तुक में सागर, धोती की तुक में मोती, डोरी की तुक में गौरी, झाकन की तुक में माखन जैसे नाम रखती जातीं । ( आप भी सोचिये कि अगर आप का नाम भी ऐसे ही रखा जाता तो खिड़की में क्या रखा मिलता ?)

सबसे ज़्यादा मुश्किल तो तब होती है जब मायके आई हुई ससुराल वालों द्वारा सताई हुई भुलाबाई अपनी ससुराल जाने से मना कर देती है । अब बड़ी मुश्किल है, उसे वापस ससुराल जाने के लिए मनाये कैसे ? ससुराल के लोग एक के बाद उसे मनाने के लिए उसके पीहर  जाते हैं और उसे भांति भांति के प्रलोभन देते हैं । सबसे पहले सास जाती है अपनी सून यानी बहू को समझाने .. 

सासू गेली समजावयाला 

चला चला सुनबाई अपुल्या घराला 

पाटल्याचा च जोड़ देते तुम्हाला 

यानी, ओ बहूरानी अपने घर चलो न, तुम्हे चाँदी की एक जोड़ पायल दूंगी । लेकिन बहू साफ मना कर देती है “पाटल्या च जोड़ नको आम्हाला, मी नाही यायची तुमच्या घरा ला “ .. ना ना सासू माँ, अपनी पायलें अपने पास रखो, मैं नहीं आनेवाली तुम्हारे घर ।

फिर तो ननद आती है, जेठ आते हैं, देवर आते हैं और जरी की साड़ी, चांदी के  कमरबंद से लेकर घर की चाबियों तक का प्रलोभन देते है लेकिन बहू जाने को तैयार नहीं है । अंत में जब पति आते  हैं और कहते हैं तुझे खूब सारा प्यार दूंगा और अपना प्रिय लाल चाबुक भी दूंगा । तब वह झट जाने को तैयार हो जाती है । ध्यातव्य है कि लाल चाबुक यहाँ सम्पूर्ण अधिकार का प्रतीक है ।

अब इधर भुलाबाई मायके आई है तो वहां उसकी भाभी भी है और भाई के बच्चे भी । इन गीतों में ननद भौजी की चुहल भी है, जैसे एक गीत में भौजाई सींके पर रखा हुआ मक्खन चुराकर खा जाती है  तब ननद कहती है .. “तुम अपने आप को भैया के इतना करीब मत समझो, अभी मेरे भैया आयेंगे तो उनकी गोद में बैठकर तुम्हारी चुगली करूंगी .. कहूंगी “दादा तुमची बायको चोट्टी चोट्टी”   दादा यानी भाई और बायको यानी पत्नी । भाभी कहती है “नहीं नहीं, ऐसा मत कहना ।“ फिर धीरे से भाभी उसे प्यार से मना भी लेती है ।

भुलाबाई के सारे गीत सुनने के बाद आप महसूस करेंगे कि इन गीतों में केवल घर परिवार की  ही नहीं तत्कालीन ग्रामीण संस्कृति की झलक भी है, जैसे कृषि के कार्यों और पशुपालन में एक स्त्री की भूमिका, महाजन द्वारा सताए जाने पर उपजी मानसिक स्थिति, पति के पास काम न होने पर अभावों का जीवन , अन्य तीज त्यौहार और पर्वों का आनंद, सब कुछ । 

महाराष्ट्र में सावित्रीबाई फुले जैसी शिक्षिका रही हैं जिन्होंने सन अठारह सौ बावन में देश के सर्वप्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना की थी । उसीका परिणाम है कि महाराष्ट्र की स्त्रियाँ स्त्री स्वातंत्र्य, स्वावलंबन और अध्ययन में बहुत आगे हैं । भुलाबाई उत्सव पर गाए गीत उनके संस्कारों में हैं जो उनके भीतर अपने शोषण के प्रतिकार की ताकत पैदा करते हैं ।

लड़कियों के साथ घर घर जाकर भुलाबाई के गीत गाने और प्रसाद खाने का बचपन का वह दौर बीत गया लेकिन आज भी मेरी स्मृतियों में सब कुछ जस का तस है, ताली बजाकर झूम झूम कर गाना और गाने का हमारा टाइम श्येडूल समाप्त के बाद घोषणा करना ..

बाना बाई बाणा सुरेख बाणा 

गाने संपले खिरापत आणा 

मतलब अब गाने ख़त्म हो गए जल्दी से प्रसाद लाओ , अगले घर भी जाना है । इतना सुनते ही उस घर की बिटिया एक बंद डिब्बे में प्रसाद लेकर आती और डिब्बे को हिलाकर सब सखियों से पूछती “ ओळखा काय ?” यानी बूझो क्या ? फिर सब बच्चे उस ध्वनि को सुनकर अपनी अक्ल भिड़ाते और प्रसाद का नाम बताते , चना मुर्रा, फल्ली दाना, चिरौंजी दाना, गुड़ पट्टी ऐसा ही कुछ , फिर उसे खाते हुए अगले घर के लिए रवाना हो जाते । इस तरह यह सिलसिला कोजागरी यानी शरद पूर्णिमा तक चलता रहता । शरद पूर्णिमा के दिन भुलाबाई भुलोजी अपने घर, हम अपने घर। 

आप लोग देख क्या रहे हैं ? भुलाबाई के गाने की कहानी समाप्त हो गई है । अब आपको  अगली पोस्ट पर भी तो जाना होगा ना ? हाँ यह पोस्ट आपको कैसी लगी और खिड़की में आपके नाम के तुक वाली कौनसी वस्तु होना चाहिए यह बताना मत भूलियेगा, आपके कमेन्ट की प्रतीक्षा रहेगी ।

शरद कोकास 

149. भंडारा : चार आने में इतना सारा सोना


उन दिनों दादियाँ और नानियाँ ही हमारे ऑडियो चैनल थे, जिनसे हम रोज़ ही नए नए एपिसोड की तरह नए नए किस्से, महाभारत रामायण की कहानियाँ, पुराण कथाएँ आदि सुना करते । पड़ोस में दादा नाना की उम्र के भी कुछ लोग थे जिनके धारावाहिकों में वीरों की गाथाएँ, मुहावरे और कहावतें हुआ करतीं थीं । कुछ दादा नाना चैनल ऐसे भी थे जिनके पास फूहड़ और अश्लील प्रोग्रामों के अलावा कुछ नहीं होता था । घर में हमें उनसे बचकर रहने की सलाह दी जाती ।

इन कथाओं के पेशेनज़र हमें बचपन में ही बता दिया गया था कि हमारा लक्ष्य उसी तरह स्पष्ट होना चाहिए जैसे अर्जुन के सामने उसका लक्ष्य चिड़िया की आँख था । हालाँकि मैं इससे कभी सहमत  नहीं हुआ और आँख के अलावा भी सब कुछ देखता रहा , चिड़िया देखी तो उसका दुःख भी देखा,पेड़ देखा तो उसका बूढ़ा होना देखा,आसमान देखा तो उसका रहस्य जानने की कोशिश की । इसी तरह अपनी ज़िंदगी के साथ चलते हुए आसपास के लोगों की ज़िन्दगी भी देखता रहा और उनके दुःख दूर करने को ही अपना लक्ष्य मान लिया ।

महाभारत की अनेक कथाओं में से एक कथा हमें दशहरे के दिन ज़रूर सुनाई जाती कि पांडवों ने  अज्ञातवास पर जाने से पूर्व अपने अस्त्र शस्त्र शमी वृक्ष की टहनियों में छुपा दिए थे । अज्ञात वास समाप्त होने के पश्चात अपने अस्त्रों के साथ वे कुछ शमी पत्र भी लेते आए ,वनवास समाप्त होने की सूचना के साथ जिन्हें उन्होंने नगर वासियों को प्रतीक के रूप में प्रदान किया ।

मैंने बाबूजी से पूछा “लेकिन इसे सोना क्यों कहते हैं ?” उन्होंने बताया कि महाभारत के इस प्रसंग के अलावा दशहरे से जुड़ा एक प्रसंग और है । राम द्वारा लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद जब उनकी सेना वापस अयोध्या आने लगी तब विजय के प्रतीक स्वरूप सैनिक अपने साथ लंका से सोना भी ले आये जिसे अयोध्यावासियों को देते हुए उन्होंने विजय की बधाई दी । इसी घटना की स्मृति में आज के दिन इन शमी पत्रों को एक दूसरे को देते हैं और कहते हैं हैप्पी विजयादशमी ।

बच्चों को उनके बचपन में जैसा बताया जाता है वे उसे उसी रूप सच मान लेते हैं । यह प्रश्न तो बहुत बाद में मन में आया कि पाँच हजार साल पहले तो लोहे की खोज भी नहीं हुई थी तब पांडवों के हथियार किस चीज के बनते थे ? और अगर लोहे के थे तो इतने दिनों तक पेड़ पर रखे रहने के बावजूद  उनमे ज़ंग क्यों नहीं लगा और रही लंका की बात तो जब उस समय लंका में इतना सोना था तो बाद में वह सोना गया कहाँ ?और यह भी कि युद्ध समाप्त हो जाने के पश्चात पराजित के शहर को इस तरह लूटना क्या उचित है ? बचपन में तो इन सवालों के जवाब नहीं मिले लेकिन बड़े होकर मैंने जवाब ढूंढ लिए ।

बहरहाल,  दशहरे का दिन हम लोगों के लिये बहुत उत्साह का दिन होता था । शुरुआत सुबह साइकिल धोने से होती थी । महाराष्ट्र में यह परम्परा है कि दशहरे के दिन अपने वाहन धोये जाते हैं और उन्हे फूलों से सजाया जाता है । इसी दिन कामगार अपने औजारों की पूजा भी करते हैं । बाबूजी भी घर के औजार जैसे हथौड़ी, बसूला, आरी, कुदाल, फावड़ा, पेंचिस, जैसी वस्तुएँ निकाल लेते थे और उन्हें धो पोछकर पूजास्थल पर रख देते । उसके बाद हम बच्चे शाम की प्रतीक्षा करते लगते  । शाम को कचहरी के उस पार यानि भंडारा शहर की सीमा के बाहर दशहरे का मेला लगता था । 


साइकल के डंडे पर मुझे बिठाकर मेला ले जाते हुए बाबूजी बताते कि जिस तरह राम अपने राष्ट्र की सीमा पार कर लंका गए थे उसी के प्रतीक के रूप में हम लोग शहर की सीमा से बाहर जाते हैं । उस समय प्रतीक मुझे अधिक समझ में नहीं आते थे, मुझे तो बस मेले में बिकने वाले खिलौने दिखाई देते थे । मिट्टी के शेर,भालू,सिपाही,रंगीन कागज़ की बनी हुई चकरी, काले धागे वाली प्लास्टिक की नाचने वाली गुड़िया,लट्टू, पिटपिट करने वाली टीन की पिटपिटी,मुँह से फूँककर बजाने वाली पुंगी,टीन की खँजरी और मिटटी की रबर बैंड लगी चकरी पर धागा लपेटे हुए रेंगने वाला कागज़ का सांप । 

फिर एक दिन मैंने प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ पढ़ी । हामिद की तरह मुझे भी ख्याल आया कि यह सब फालतू के खिलौने खरीदने की बजाय क्यों न माँ के लिए एक लोहे का चिमटा खरीद लूँ । मैंने माँ से कहा तो माँ हँसने लगी “ चिमटा तो मेरे पास है और फुंकनी भी , तुम अपने लिए खिलौने ही खरीदा करो । “ हामिद बनने का मेरा स्वप्न वही चूर चूर हो गया । 

मेले से लौटते हुए साइकल के डंडे पर बैठकर मैं चकरी थाम लेता था जो हवा के साथ गोल गोल घूमती थी । बाद में जब मैं बड़ा हो गया तब डंडे पर बैठने की सुविधा सीमा को प्राप्त हुई और मेरी नियुक्ति  पीछे कैरियर पर कर दी गई  । यह प्रमोशन था या डिमोशन पता नहीं । उसके बाद जब बबलू की उम्र मेला जाने लायक हुई तो मुझसे वह कैरियर भी छिन गया और मैं मोहल्ले के अन्य बच्चों के साथ ठाकरे काका की टोली में शामिल होकर  पैदल ही मेला देखने जाने लगा ।   

मेले में खिलौनों और खाने पीने की वस्तुओं के अलावा सोना पत्ती या शमीपत्र भी बिकते थे । “चार आने  का सोना दो” कहने के बाद जब सोना बेचनेवाली महिला ढेर सारा सोना थमा देती तो मज़ा आ जाता । घर लौटकर मैं माँ से कहता “माँ देखो, चार आने में इत्ता सारा सोना लाया हूँ ।“ माँ हँसती और कहती “असली सोना भी अगर इतना ही सस्ता मिलता तो कुछ बात होती ।“ माँ इस देश की एक समझदार नागरिक थी, उन्हें इस तरह के प्रतीकों से नहीं भरमाया जा सकता था । 

सीमोलंघन से लौटकर सबसे पहला काम होता था हाथ मुँह धोकर आरती करना । आरती के बाद बाबूजी मेले से लाये हुए शमी पत्र दादाजी की तस्वीर पर चढ़ाते । हम लोग बाबूजी व माँ को सोना देकर उनके चरण स्पर्श करते और फिर मोहल्ले में निकल जाते । सामने वाले भोजराम दादाजी,शिवराम ठाकरे काका , पांडुरंग काका, बोपचे काका, हलमारे काका, डाकरे बाई , भेदरे काका, लीलाताई फिर शंगर्पवार वकील और बस । हमारा दायरा इतना ही था इसलिए कि सोने के ऐवज में आशीर्वाद के साथ मिलने वाली बिस्किट चॉकलेट   से हमारा पेट भर जाता था ।   

शरद कोकास 


148. भंडारा : इस बार ‘वान’ में क्या देंगे ?

मकर संक्रांति के आगमन से एक सप्ताह पूर्व यह प्रश्न हमारे घर की संसद में उठाया जाने लगता “ इस बार ‘वान’ में क्या देंगे या क्या देना है ? आप लोगों के लिए ‘वान’ यह शब्द नया होगा इस शब्द तक पहुँचने के लिए इसकी पृष्ठभूमि बताना आवश्यक होगा ।

मकर संक्रांति पर्व के विषय में हम सब जानते हैं । यही एकमात्र ऐसा पर्व है जिसे सौर कैलेण्डर के आधार पर मनाया जाता है बाकी सारे तीज त्यौहार होली, दिवाली, ईद आदि मनाने का क्रेडिट तो चाँद के हिस्से में आ जाता है ।

सूर्य एक अच्छा बॉस है समय पर अपने दफ्तर में आता है और समय से जाता है, पूरे तीन सौ पैंसठ दिनों तक एक जैसा क्रम । हाँ यह जरुर होता है कि सर्दी के दिनों में वह थोड़ा शॉर्टकट वाले रास्ते से आता है और गर्मी के दिनों में थोड़ा लम्बा रास्ता अख्तियार करता है यानि सर्दियों में दक्षिण की ओर वाला रास्ता और गर्मियों में उत्तर की ओर वाला रास्ता । मकर संक्रांति का दिन उसके रास्ता बदलने वाला दिन होता है , पंडितों की भाषा में कहें तो दक्षिणायन से उत्तरायण में आने का दिन ।

सूर्य के आने जाने का रूपक सदियों से चला आ रहा है लेकिन हम सब जानते हैं कि सूर्य न कहीं आता है न जाता है, पृथ्वी ही दीवानी की तरह उसके इर्द गिर्द घूमती रहती है और अंडाकार या दीर्घ वृत्ताकार पथ में होने के कारण कभी दूर चली जाती है तो कभी पास आ जाती है गोया कि  छह माह उत्तर की ओर झुकते हुए चलती है और छह माह दक्षिण की ओर । इस तरह सूरज के राह बदलने के रूपक में कहें तो यहाँ रास्ता ही अपना रास्ता बदल लेता है ।

प्रकृति के हर परिवर्तन को उत्सव के रूप में संपन्न करने वाले हमारे देश में यह दिन मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है । ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार प्रत्येक वर्ष की चौदह जनवरी को आनेवाली यह तिथि  अपने धर्म के कैलेण्डर के अनुसार नववर्ष का उद्घोष करने वालों के प्रकोप से अब तक बची हुई है । यद्यपि चाँद की भांति सूर्य भी विश्व की अनेक सभ्यताओं में एक देवता है और यह दिन उसके धनु राशि से मकर राशि में आने का दिन माना गया है इसलिए इसे मकर संक्रांति कहते हैं ।

चूँकि सूर्य तो देश के सभी प्रान्तों में निकलता है इसलिए देश के अलग अलग प्रान्तों में इस दिन को  अलग अलग नाम से जाना जाता है । सामान्यतः इसे संक्रांति या मकर संक्रांति कहते हैं, तमिलनाडु में यह पोंगल कहलाता है । हमारी दादी माँ दो ऋतुओं के इस मिलन पर्व को उत्तर प्रदेश की शब्दावली में खिचड़ाई कहती थी  । इस दिन घर में खिचड़ी पकना अनिवार्य था । 

माँ झांसी से आई थी और उन्हें पता नहीं था कि महाराष्ट्र में इस दिन हल्दी कुंकुम की परम्परा है । पहले दूसरे साल तो उन्हें समझ में नहीं आया कि पड़ोस की औरतें उनसे क्यों कहतीं हैं “कोकास बाई, आज आमच्या घरी हल्दी कुंकु साठी या ।“ अर्थात कोकास बाई हमारे घर हल्दी कुमकुम के लिए आइये । माँ यू पी की थीं, जब उन्होंने अपने नाम के साथ बाई सुना तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ । बाद में पता चला कि महाराष्ट्र में बाई शब्द बहुत सम्मान सूचक है । हमारे पड़ोस में बाद में एक स्कूल भी खुला उसका नाम था ‘इंदिरा बाई गांधी प्राथमिक शाला ।‘ हल्दी कुमकुम के लिए पहली बार जब वे पड़ोस में गईं तो उनके यहाँ से उपहार में बेर, तिल्ली के लड्डू जैसी ,कच्चे चावल के साथ स्टील का एक चम्मच लेकर आई, उन्हीने बताया कि यह ‘वान’ है ।

ऐसा कहते हैं कि वान की परम्परा महाराष्ट्र में पेशवाओं के समय से चली आ रही है ।उन दिनों जब घर के पुरुष युद्ध के लिए निकलते तो महीनों घर नहीं लौटते थे । राज्य की ओर से प्राप्त सहायता से उनका घर खर्च तो चल जाता था लेकिन वे अपना अकेलापन कैसे दूर करें, अतः उन्होंने हल्दी कुमकुम के बहाने मेल मिलाप का यह तरीका ढूंढ निकाला । महिलाएँ एक दूसरे के घर जातीं, आपस में हल्दी कुमकुम लगातीं और एक दूसरे के  सुहाग की कामना करतीं । हल्दी कुमकुम के अलावा दिन के तिल तिल बढ़ते जाने के प्रतीक के रूप में वे तिल, मौसम के बेर,फल,फल्लियाँ और अनाज भी एक दूसरे को देतीं थीं , साथ ही उपहार के रूप में घर में काम आनेवाली कोई वस्तु,या वस्त्र भी प्रदान करतीं । यही उपहार ‘वान’ कहलाया ।

जैसे जैसे समय बदलता गया वान की वस्तुएँ भी बदलती गईं पहले वान में सुहाग से जुडी चीज़ें जैसे काजल कुमकुम की डिब्बी, चूड़ियाँ आदि दी जाती थीं फिर स्टील के चम्मच, कटोरियाँ , प्लास्टिक के डिब्बे डिब्बियाँ दी जाने लगीं । 

माह भर चलने वाला हल्दी कुमकुम यह कार्यक्रम इस तरह आयोजित किया जाता कि प्रतिदिन तीन या चार महिलाओं के घर में यह कार्यक्रम होता । बुलौव्वा देने की ज़िम्मेदारी बच्चों पर सौंप दी जाती “आज हमारे घर सायं चार बजे से हल्दी कुमकुम का कार्यक्रम है आप सादर  आमंत्रित हैं इस आशय का एक  सूचना पत्र अर्थात एक कागज़ लेकर हम बच्चे निकलते और कागज़ में दी गई लिस्ट के अनुसार घर घर जाकर आंटियों से साइन करवाकर लाते और माँ को सौंप देते । 

इस तरह महिलाओं की संख्या के अनुसार आयोजन की व्यवस्था की जाती । हम बच्चे हरकारे का यह काम ख़ुशी ख़ुशी करते थे । घर से मिलने वाले पारिश्रमिक के अलावा आंटियों के घर से मिलने वाले टॉफ़ी बिस्किट का मोह तो होता ही था । जिस आंटी के घर से कुछ नहीं मिलता उन्हें हम ब्लैक लिस्ट में डाल देते और अगली बार उनके घर जाने से कन्नी काट लेते ।

घर के पुरुष अक्सर इस आयोजन के समय अपना टाइम पास मोहल्ले के नुक्कड़ पर या बाज़ार में करते । बाबूजी कार्यक्रम शुरू होने से पूर्व तक इस काम में माँ का बराबर सहयोग करते थे , जैसे बाज़ार से वान की वस्तु लाना, बेर, पोपट की फल्ली , अनाज , तिल आदि लाना । बाबूजी हर बार कुछ इनोवेटिव वस्तुएँ वान के लिए लाते जैसे एक बार वे सबको देने के लिए पंद्रह पैसे वाला पोस्टकार्ड लेकर आये थे । 

जाने कितने वर्ष बीत चुके लेकिन महाराष्ट्र में वान की यह परम्परा जारी है बल्कि अब गोवा, गुजरात, मध्यप्रदेश राजस्थान में भी यह पर्व प्रारंभ हो चुका है । बच्चों का हरकारे वाला काम अब व्हाट्स एप कर देता है वान की वस्तुएँ भी बदलती जा रही हैं उसमे पौधों के गमले , चाबी के गुच्छे , परफ्यूम,लिपिस्टिक  जैसी चीजें शामिल हो गई हैं । यू ट्यूब पर बाकायदा विडिओ अपलोड किये जाते हैं कि इस साल और क्या क्या नई वस्तुएँ दे सकते हैं । संभवतः अमेजोन फ्लिप्कार्ट जैसे ऑनलाइन शॉपिंग वालों ने भी अब इस तरह की योजनाएँ शुरू कर दी हैं । बाज़ार हर भावना को एनकैश करना जानता है । 

यदि आपके घर में हल्दी कुमकुम का आयोजन हो तो ‘वान’ में आप क्या देना पसंद करेंगे ?



147. भंडारा : पिज्जा बर्गर खाने वाली अगले जन्म में क्या बनेगी

सायास किये जाने वाले उपवास में भूख मनुष्य को आध्यात्मिक बना देती है । वह आत्मा परमात्मा के गहन चिंतन में डूब जाता है । उसकी वैज्ञानिक सोच की लाश पर पाप - पुण्य, मोक्ष,लोक-परलोक आदि की अवधारणाएं चीलों की तरह मंडराने लगती हैं ।

माँ आर्यसमाजी परिवार से आई थीं, न कभी कोई व्रत उन्होंने किया था न कभी वे मंदिर गई थीं । विवाह से पूर्व ईश्वर की किसी साकार प्रतिमा की भी वे उपासक नहीं थी, लेकिन उन्हें ज्ञात था कि भारतीय स्त्री के समाज में विवाह अपने आप में एक धर्म परिवर्तन होता है और अनिच्छापूर्वक ही सही ससुराल का धर्म उसे स्वीकारना पड़ता है । फिर संयुक्त परिवार में पति परमेश्वर के अलावा श्वसुर परमेश्वर, जेठ परमेश्वर, देवर परमेश्वर के साथ साथ छोटे मोटे फूफा ससुर, मामा ससुर जैसे आधे-पूरे ईश्वर भी होते हैं अतः वे जो कहें वही उसका धर्मं, वही उनका ईश्वर।

बाबूजी शिव पार्वती के उपासक थे सो माँ को उपहार में यही देवता मिले, साथ में उनके मंदिर, उनके सावन सोमवार के व्रत और हरतालिका जैसे पर्व भी मिले । हरतालिका अर्थात तीज का पर्व,बैलों के त्यौहार पोले के तीसरे दिन आता था । एक दिन बाबूजी से पूछा मैंने कि “बैल तो शिवजी का वाहन है फिर बैलों का त्यौहार पहले और शिवजी का बाद में ऐसा क्यों ?” तो उन्होंने कहा  “ शिवजी को बाहर जाना है तो अपना वाहन तैयार करना होगा ना हम कैसे बाहर जाने से पहले अपनी साइकिल की साफ सफाई करते हैं ।“

हरतालिका के दिन बाबूजी छपरी के एक कोने में एक टेबल पर शिव पार्वती की प्रतिमा रखते और उस पर एक लाइट लगाते थे । वह लाइट भी कुछ स्पेशल थी । टिन के एक गोल डिब्बे में ढक्कन की जगह एक लाल रंग का काँच लगा था । यह वह काँच था जिसे रेल्वे में सिग्नल के लिए इस्तेमाल किया जाता था  यह उन्हे कहीं कबाड़ में मिल गया था । ड़िब्बे की तली में एक छेद कर उसमें होल्डर व बल्ब लगाने की व्यवस्था थी । उस लैम्प से गाढ़े रंग की लाल रोशनी निकलती थी और मूर्ति से होती हुई पूरे कमरे में फैल जाती थी । 

विभिन्न प्रकार के पौधों की पत्तियों और फूलों से सजावट के अलावा नीचे वाली टेबल पर गेहूँ के जवारे रखे जाते थे जिन्हे माँ भुजलिया कहा करती थी । पूजा के लिये हम बच्चे बेल पत्ती, दुर्वा, और फूल बटोरकर लाते थे । माँ दिन और रात का निर्जला उपवास करती थी । दो तीन घंटे के अंतराल पर पूजा करती थी । पूजा के लिये आसपास की महिलायें भी आती थीं और सजावट की प्रशंसा करती थीं । रात के समय पंडित लक्षमण प्रसाद शुक्ला आते थे और कथा कहते थे ।  

यह कथा सुनना हम लोगों के लिये किसी मनोरंजन कार्यक्रम से कम नहीं होता था । इस कथा के द्वारा ही मैने जाना कि ब्राह्मणों द्वारा किस तरह पाप-पुण्य आदि का भय दिखाकर सामान्य जनता पर अपना वर्चस्व कायम किया गया। पंडित जी बताते थे कि जो स्त्री इस व्रत को ठीक ढंग से नहीं करेगी वह अगले जन्म में पशु योनि में पैदा होगी उदाहरणार्थ जो स्त्री व्रत के दौरान जल ग्रहण करेगी वह अगले जन्म में मछली या मगरमच्छ बनेगी, फल खाने वाली स्त्री बंदरिया बनेगी, मीठा खाने वाली चींटी या मक्खी बनेगी या माँस भक्षण करने वाली स्त्री लोमड़ी या लकड़बग्घा बनेगी आदि आदि । इसके अलावा रात में सो जाने वाली और पति से संसर्ग करने वाली स्त्रियों के लिये भी बहुत सी भयावह बातें वे बताते थे ।

बाबूजी पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं में विश्वास नहीं रखते थे लेकिन इन सब बातों का बहुत आनंद लिया करते थे । जब मुझे अक्ल आई तो एक दिन मैंने भी पंडित जी से सवाल किया कि “यह तो कहीं नहीं लिखा है कि समोसा, कचोड़ी, जलेबी आदि खाने वाली स्त्री क्या बनेगी, तो यह सब उपवास में खाया जा सकता है क्या ?” पहले तो वे हंसकर टाल देते फिर उसी तरह डाँटकर चुप करा देते थे जिस तरह पूर्व में ईश्वर और धर्म का भय दिखाकर सामान्य मनुष्य को चुप करा दिया जाता था । 

बाबूजी, माँ के निर्जला उपवास पर चिन्ता प्रकट करते और कहते “तुम चाय पी लिया करो इसलिये कि कथा में इस बात का कहीं उल्लेख नहीं है कि चाय पीने वाली स्त्री क्या बनेगी ।“ माँ इस बात का प्रतिवाद करती कि चाय मे चीनी होती है सो चींटी तो बनना पड़ेगा । तब बाबूजी कहते  “तो बिना शक्कर की पिया करो ।“ तब वे कहतीं  “चाय में दूध तो फिर भी रहेगा और मुझे भैंस या गाय बनना पसन्द नहीं ।“ फिर बात पानी पर आ जाती और माँ को मछली बनना भी गवारा नहीं होता । वैसे बाद में माँ ने चाय पीनी शुरू कर दी थी और अंत में मधुमेह हो जाने के बाद डॉक्टर की सलाह मानकर व्रत रखना भी बन्द कर दिया । उन्हें उसी दिन समझ में आ गया कि डॉक्टर पंडित से बड़ा होता है । पूजा वे फिर भी करती थीं और घर में शिव की स्थापना का कार्यक्रम बन्द हो जाने के बाद पड़ोस में जाकर पूजा कर लिया करती थीं ।

पूजा पाठ, व्रत उपवास की निरर्थकता को भलीभांति समझ जाने के बावजूद भी बचपन के उन दृश्यों की स्मृतियाँ मुझे बहुत आकर्षित करती  हैं । जेहन में अब भी तैरते हैं, हरतालिका के अगले दिन सर पर सुनहली भुजलियों से भरी टोकरी रखे खाम तलाव स्थित बहिरंगेश्वर मंदिर की ओर जाती स्त्रियों के झुण्ड , तालाब के जल की सतह  पर तैरते हुए अनगिनत दीपक, और वैनगंगा की रेत पर गीली रेत से बने शिवलिंग । मेरे मन को बहुत सुकून देते हैं यह दृश्य । 

दृश्य बदलते जाते हैं, मेरे जैसे बच्चे बड़े हो जाते हैं लेकिन मेरी ही तरह के अनेक बच्चे अभी भी परिदृश्य में उपस्थित हैं जो पूछते हैं “पंडित जी, तो फिर पिज्जा बर्गर खाने वाली स्त्री अगले जन्म में क्या बनेगी ?” पंडितों के पास आज भी उनके सवालों का जवाब नहीं है वे अब उन्हें धर्म और ईश्वर  का ही नहीं राजनीति का भय दिखाकर भी चुप करा देते हैं । 

अफ़सोस यही है कि दुनिया में ऐसे पंडितों की जमात बढ़ती जा रही है और उनका क्षेत्र धर्म के अलावा राजनीति भी हो गया है, उनकी उँगलियों से लटके धागों में बंधे जाने कितने बच्चे कितने युवा आज भी बिना कोई सवाल पूछे उनके इशारों पर नफ़रत फैला रहे हैं, विध्वंस कर रहे हैं, हत्याएँ कर रहे हैं । फिर भी मुझे बच्चों की आनेवाली पीढी पर भरोसा है कि वे अपनी वैज्ञानिक सोच मजबूत करेंगे और इनसे धर्म के ही नहीं राजनीति के अंकुश भी छीन कर उन्हें नष्ट कर देंगे ।







146 भूखे भजन न होय गोपाला


व्रत,उपवास,फास्ट, रोजा सब कुछ मेरे लिए अपने बचपन में नित्य प्रति के भोजन में सुखद परिवर्तन हेतु घटित होने वाले एक उपक्रम से अधिक कुछ नहीं था । अपनी मासूमियत में एक दिन मैंने बाबूजी से सवाल किया था “क्या उपवास रखने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं ?” मेरे हर अगले सवाल को भांप लेने की क्षमता रखने वाले बाबूजी ने अपने डिफेंस में मुस्कुराते हुए कहा था “भगवान प्रसन्न होते हैं या नहीं यह तो पता नहीं लेकिन आमाशय अवश्य प्रसन्न हो जाता है इसलिए कि उसे एक दिन का विश्राम मिल जाता है ।“

इस सवालीराम के तरकश में भी सवालों के तीर कम नहीं थे “कैसे प्रसन्न हो जाता होगा ? उसे तो हम सिंघाड़े के आटे का मीठा हलवा, साबूदाने की खिचड़ी और बड़े, दूध और शकरकंद की खीर, भुनी मूंगफल्ली और गुड़ की पपड़ी जैसी सुस्वादु किन्तु गरिष्ठ चीज़ों से भर देते हैं, थोडा ज्यादा खा लेने से उस पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता होगा ?” बाबूजी मुस्कुराते और कहते “ बिलकुल ठीक, उपवास खाने-पीने के लिए थोड़े ही होता है, ठीक है खाना चाहिए लेकिन कम मात्रा में खाना चाहिए ।“ बाबूजी जानते थे कि उनके जवाब से मेरी संतुष्टि नहीं हुई थी ।

उपवास के दिन बनने वाली इन विविध वस्तुओं के ‘जैभिक मोह’ में मैंने बचपन में  ही सीधे सीधे यह तय कर लिया था कि व्रत तो रखेंगे लेकिन किसी भक्ति भावना से नहीं बल्कि विविध सुस्वादु भोजन के आस्वादन के लिए । नवरात्र का व्रत रखने की कोई परंपरा हमारे यहाँ नहीं थी लेकिन माँ बाबूजी, सावन के छह सोमवार, महाशिवरात्रि, रामनवमी और जन्माष्टमी के व्रत अनिवार्य रूप से रखते थे ।

इन त्योहारों के आने से कुछ दिन पूर्व ही मुझे इस लज्ज़तदार फलाहार के स्वप्न आने लगते । सपने में मुझे दूध की नदियाँ और साबूदाने के पहाड़ दिखाई देते । दूध में मसलकर मिलाये गए मीठे मीठे शकरकंद मुझे बुलाने लगते । मेवे के लड्डुओं के साथ मैं फ़ुटबाल खेलता और पेड़ पर लगी छेने की मिठाईयां, रसगुल्ले और चमचम तोड़ तोड़कर खाता । त्यौहार के दिन मैं सुबह से ही सजग हो जाता और इन पकवानों को बनाने में माँ की मदद भी करता जैसे सिंघाड़े के आटे से बनी बर्फी को छोटे छोटे टुकड़ों में काटना, भुनी मूंगफल्ली को खलबत्ते में कूटना आदि आदि । 

महाराष्ट्र में फलाहार को ‘फराळ’ या ‘फरार’ कहते हैं जो फलाहार का ही अपभ्रंश है बाजारों में इस अवसर पर विशेष रूप से बना ‘फराळी चिवडा’ मिलता है । अब यह शब्द व्रत में खाए जाने वाले हर तरह के भोजन के लिए लागू होता है । इस ‘फराळ’ में क्या क्या होना चाहिए इस पर विभिन्न व्रत विशेषज्ञों के अलग अलग मत है । उपवास में अनाज निषिद्ध है लेकिन कुट्टू या बकव्हीट चलता है । धान वाला चावल बिलकुल मना है लेकिन सामो चावल या पसई के चावल चलते हैं । कहीं हरी मिर्च अलाउड है तो कहीं उसकी जगह काली मिर्च चलती है । दूध और दूध से बनी चीज़ें सर्वमान्य हैं लेकिन हरछठ के व्रत में भैंस के दूध के प्रयोग की अनुमति नहीं है । 

मेरा कन्फ्यूज़न तब दूर हुआ जब मैंने अमृता प्रीतम की एक किताब मे पढ़ा कि गुरूद्वारे में बनने वाला हलुआ यूँ तो साधारण हलुआ ही होता है लेकिन जब उस पर कृपाण या तलवार घुमाई जाती है तो वह कढ़ाह प्रसाद बन जाता है । व्रत में खाई जाने वाली वस्तुओं,प्रसाद आदि को भी हम इसी तरह स्थान और परम्परा के अनुसार तय करते हैं । वैसे भी स्थान विशेष के अनुसार ढेर वृत कथाएँ हैं । कहानियों में तो आस्था विष को भी प्रभावहीन कर देती है । 

हमारे घर में किसी भी  त्योहार पर बहुत ज़्यादा धूमधाम नहीं होती थी । महाशिवरात्रि पर माँ बाबूजी उपवास रखते थे और हम लोगों को साबूदाने की खिचड़ी, उबले हुए शकरकन्द और दूध, सिंघाड़े के आटे का हलुवा और बर्फी,मखाने की खीर, नारियल की बर्फ़ी तथा आलू के या केले के चिप्स खाने को मिलते थे । उस दिन नित्य प्रति वाला भोजन नहीं बनता था । हम लोगों को उन  त्योहारों की प्रतीक्षा रहती थी जिनमे उपवास किया जाता था । 

सावन के महीने में भी माँ और बाबूजी दोनों उपवास रखते  थे । महाराष्ट्र के पंचांग के अनुसार सावन का महीना , हिन्दी पंचांग के सावन के महीने के पन्द्रह दिन बाद प्रारम्भ होता था । माँ हिन्दी पंचांग के अनुसार अपने व्रत रखना प्रारम्भ कर देती थी और मराठी पंचांग तक करती थी इसलिये वे डेढ़ माह तक सावन मनाती थीं और छह सावन सोमवार व्रत करती थीं । हम लोग जब उन्हे ऐसा करने के लिये मना करते तो वे कहती ..हँ... ठीक है इसी बहाने ज़्यादा पुण्य मिल जायेगा । “सावन सोमवार का व्रत एक समय का ही होता था इसलिये उस दिन शाम का भोजन नियत समय से पूर्व ही तैयार हो जाता था । दिन में विविध व्यंजनों की कोई गुंजाईश नहीं होती थी । सावन सोमवार को वे खामतलाव स्थित बहिरंगेश्वर शिव मन्दिर अवश्य जाती थीं । उस दिन वहाँ बहुत भीड़ रहती थी । उपवास के बावजूद माँ सबके लिए खाना बनाती और सबको खाना खिलाकर अंत में आराम करती थी 

व्रत और सुस्वादु पकवानों के अंतर्संबंध को लेकर एक बार जब मैंने अपने मित्र ख़ालिद से बात की तो उसने बताया कि हम लोग दिन भर जो रोज़ा रखते हैं उसमे पानी तो क्या अपना थूक तक नहीं गुटकते । इस बात से मैं बहुत प्रभावित हुआ । नईम को तो मैं बचपन से देखता आ रहा था वह भी इसी तरह का रोजा रखता था । मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य होता था । लेकिन शाम को जब वे रोजा खोलते थे तो तरह तरह के सुस्वादु भोजन उनकी प्रतीक्षा करते रहते थे । नईम के घर कई बार इफ्तारी की इस दावत में शरीक होने का अवसर मुझे मिला उसके बाद से रोजा भी मुझे उपवास की तरह लगने लगा ।  यद्यपि बीच बीच में कुछ न खाकर एकबार में ही खा लेने का तरीका मुझे ज़्यादा अच्छा लगा । खैर धर्म कोई भी हो इस तरह की परम्पराएँ भोजन और व्रत के मेरे समीकरण में कोई विशेष परिवर्तन नहीं कर पाई । 

आज ग्लूकोज़ टालरेंसी अर्थात शरीर में मीठा जज़्ब करने की क्षमता देखते हुए डॉक्टर ने लम्बे समय तक भूखे रहने या व्रत रखने के लिए मना कर दिया है लेकिन व्रत में इस्तेमाल होने वाली सुस्वादु वस्तुएँ खाने के लिए मना नहीं किया है ।  

आप लोगों के लिए पुनः ऐसी ही कुछ सुस्वादु व्यंजनों के नाम लिख रहा हूँ आप चाहें  खाने के लिए व्रत रखें या भूखे रहने के लिए आप इनके नाम तो  पढ़ ही सकते हैं यथा सिंघाड़े के आटे का मीठा हलवा, सिंघाड़े के आटे की या नारियल की बर्फी, साबूदाने की खिचड़ी और साबूदाने के बड़े , साबूदाने का पुलाव सिंघाड़े के पकौड़े , कुट्टू की रोटी, पराठे या चीला या बड़े ,कच्चे केले या आलू की डीप फ्राय टिकिया, अरबी के फलाहारी कबाब,साबूदाना ककड़ी की थालीपीठ,खीरे आलू और मूंगफल्ली का सलाद, फलों का सलाद, फ्रूट कस्टर्ड,श्रीखंड, फलाहारी भेल, फलाहारी चटनी, भुने हुए आलू की कालीमिर्च और सेंधा नमक वाली भेलचाट ,लौकी या कद्दू का मीठा हलवा, लौकी का मसालेदार शरबत, दूध के विभिन्न आइटम , बादाम वाला दूध, मिल्क शेक, केसरिया लस्सी , सामो चावल की मीठी खीर, मीठा दही , खोये की बर्फी, कलाकंद, शकरकंद की खीर , बादाम शेक, मेवे के लड्डू , गुलाब और बादाम की खीर, गुलकंद की आइसक्रीम आदि आदि ।

इनके अलावा भी आपको यदि कुछ नाम याद आते हैं तो अवश्य बताएँ  सोच रहा हूँ इस बार व्रत रख ही लूं ।    


शरद कोकास 

145. भंडारा : जय जय शिव शंकर कांटा लगे न कंकर


पहली बार जब मैंने उन्हें देखा तो वे एक फ्रेम में कैद घर की दीवार पर लटके हुए थे ৷ गोरे और साँवले इंसानों की दुनिया में उनके नीले होने का सबब मुझे यही बताया गया कि वे भगवान हैं ৷  धीरे धीरे मुझे पता चला कि भगवानों को यह हक़ होता है कि वे मनचाहे रंग के हो सकते हैं,उनके चाहे जितने सर या हाथ भी हो सकते हैं ৷ 

रावण के चित्र से परिचय होने के उपरांत ब्रह्माजी के तीन सरों के तारतम्य में जब मैंने उन्हें भी भगवान कहा तो मुझे बताया गया कि यह भगवान नहीं राक्षस है ৷ मैंने पूछा कि फिर इनके दस सर क्यों हैं ? मुझे उसी तरह बहला दिया गया जिस तरह ईश्वर के स्वरूप को लेकर बच्चों को बहला दिया जाता है ৷ 

आज इस परम्परा का विस्तार धर्म के अलावा राजनीति के क्षेत्र में भी हो गया है और भक्तों के लिए उनके नेता चाहे जैसे हों वे ही उनके ईश्वर हैं ৷

शाम अँधेरा घिरने से पहले खेलकर आने के उपरांत हाथ मुँह धोकर आरती में शामिल होने की परंपरा में माँ बाबूजी के साथ मैं उस तस्वीर के सामने खड़ा हो जाता और अपने भोलेपन में भोले की तस्वीर को निहारता रहता ৷ रघुवीर मूलगाँवकर की बनाई हुई उस तस्वीर में मुझे नीले रंग में बना शिवजी का चेहरा अपने नाक नक्श में एक स्त्री के चेहरे की भांति दिखाई देता था ৷ मैंने स्त्रियों को कभी नीले चेहरे में नहीं देखा था इसलिए मैं उन्हें भगवान ही समझता था ৷  

फिर कुछ दिनों बाबूजी ने किसी कैलेण्डर से काटकर शिव पार्वती और गणेश की एक तस्वीर निकाली और उसे टीन के एक ड्रम पर चिपका दिया ৷ ऐसे ही शिव पार्वती की एक तस्वीर उन्होंने एक लैम्प शेड पर लगाईं । उस लैम्प में रेल्वे के सिग्नल वाला लाल काँच लगा था और उसे हरतालिका के समय शिव पार्वती की प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की प्रतिमा के ऊपर लटकाया जाता था ৷ 

एक दिन माँ ने कहा “देखो इस चित्र में जो शिवजी हैं ना वो बाबूजी हैं और यह पार्वती माता जैसे हम, और तुम जैसे नन्हे गणेश ৷” मैंने कहा “लेकिन इसमें तो पार्वती जी ब्लाउज़ नहीं पहने हैं, तुम तो पहनती हो ৷” माँ हँसने लगी “अरे वो कैलाश पर्वत पर रहती थी ना शंकर जी  के साथ, वहाँ कपड़े नहीं मिलते होंगे ৷ या उस समय चलन नहीं रहा होगा ৷ ” 

मैं पूछना चाहता था.. “फिर पार्वती जी साड़ी क्यों पहने हुए है ? शिवजी तो व्याघ्र की खाल में ही प्रसन्न हैं  और नन्हे गणेश को नंगू नंगू क्यों रखा उसे भी तो कुछ पहनाना चाहिए था ना?” लेकिन मैंने उनसे नहीं पूछा ৷ उन दिनों भी आज की तरह बच्चों का मुँह यह कह कर बंद करवा दिया जाता था कि भगवान के बारे में ज़्यादा सवाल नहीं पूछा करते ৷

माइथोलॉजी के अध्ययन के अंतर्गत आदिम परम्पराओं में देवी देवताओं की उत्पत्ति पर शोध करते हुए और देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की ‘लोकायत’ पढ़ते हुए यद्यपि मुझे अपने प्रश्नों के उत्तर मिल गए लेकिन माँ की बात उस समय मेरे अवचेतन में इस तरह अवस्थित हुई कि मैं दोनों को शिव पार्वती के रूप में ही देखने लगा ৷ हालाँकि वे दोनों मुझे कैलेण्डर वाले शिव पार्वती से भी अधिक बहुत सुन्दर लगते थे ৷

बड़े होने के बाद  कालिदास की ‘कुमार संभव’ में मुझे वे फिर मिले और मैंने उन दृश्यों में फिर उन्हें देखा लेकिन जिस सहजता से माँ ने मुझसे कह दिया था मैं उनसे कभी नहीं कह पाया ৷ बाबूजी से तो कहने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता था, उनका भी तीसरा नेत्र दिखाई नहीं देता था ৷ 


144 मेरे बचपन की फ़ाइल में कश्मीर


हर शाम आरती के समय शिवजी की तस्वीर के सामने खड़ा होकर मैं उसे एकटक देखा करता ৷ वह रघुवीर मूलगाँवकर की बनाई हुई एक खूबसूरत पेंटिंग थी जिसमे पीछे की ओर बर्फ से ढंके पहाड़ दिखाई देते थे । बाबूजी ने एक दिन बताया कि यह कैलाश पर्वत है । मैंने पूछा “यह कहाँ है ?” बाबूजी का जवाब था “कश्मीर में ।“ इस तरह कश्मीर शब्द से मेरा पहला परिचय शिवजी की कॉलोनी के रूप में हुआ ।

फिर एक दिन एक तस्वीर देखी । उसमे खूबसूरत से पहाड़ थे और ढेर सारे चीड़ के दरख्त । वह तस्वीर कश्मीर की थी जिसमे नीचे एक कैप्शन लिखा था “अगर फ़िरदौस बर रुए ज़मी अस्त हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त “ अर्थात धरती पर अगर स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है । बाबूजी ने बताया कश्मीर को सही मायने में "धरती का स्वर्ग" कहा जाता है。 हिमालय की गोद में बसी यह घाटी अपनी बर्फ से ढकी चोटियों ,शांत शांत साफ झीलों और घने जंगलों  के लिए जानी जाती है ।  यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य किसी भी यात्री को मंत्रमुग्ध कर देता है

कुछ बड़ा हुआ और फ़िल्मी गानों को सुन कर समझने की सुघड़ता पैदा हुई तो गाना सुना “हर चेहरा यहाँ चाँद है हर ज़र्रा सितारा, ये वादी ए कश्मीर है जन्नत का नज़ारा ।“ उर्दू का कुछ ज्ञान हुआ तो पता चला कि जन्नत का मतलब स्वर्ग होता है । 

दीपक कुमार और विम्मी (आबरू 1968)

स्वर्ग नर्क सम्बन्धी पौराणिक ज्ञान प्राप्त होने के बाद मैंने मन ही मन यह समीकरण बना लिया कि कश्मीर में जन्नत है अर्थात स्वर्ग है और लोग मरने के बाद स्वर्ग जाते हैं इसलिए लोग मरने के बाद पक्का कश्मीर ही जाते होंगे

फिर एक फिल्म आई ‘कश्मीर की कली’ । उन दिनों फिल्म निर्देशक बहुत इमानदार हुआ करते थे । तय था कि अगर फिल्म में कश्मीर के दृश्य हैं तो शूटिंग कश्मीर में ही होगी । आज की तरह स्टूडियो में बैठकर और कंप्यूटर ग्राफिक्स से कश्मीर के दृश्य नहीं डाले जाते थे । दर्शकों को पता रहता था कि कहानी पूरी तरह काल्पनिक है,पात्र नकली हैं लेकिन स्थान के दृश्य कम से कम वास्तविक है । आज के दर्शकों की अपेक्षा वे दर्शक अधिक समझदार थे जो फिल्म की काल्पनिक कथा और यथार्थ में अंतर करना जानते थे ।

‘कश्मीर की कली’ नामक फिल्म में पहली बार शिकारा और हाउस बोट देखा यानी नाव पर बसा एक घर देखा । मैंने कहा “वाओ.. नाव में ही सब, ड्राइंग रूम भी, बेड रूम भी, किचन भी ।“ एक सवाल मन में आया “लेकिन यह लोग टॉयलेट के लिए कहाँ जाते होंगे ?” हालाँकि आज तक यह सवाल किसी से पूछ नहीं पाया । सोच रहा था क्या पता ‘कश्मीर फाइल’ में इसका उत्तर मुझे मिल जाए । 

हालाँकि फिर कश्मीर के मुताल्लिक यह जानने की इच्छा भी होगी कि वहाँ के लोग पढाई लिखाई, चिकित्सा आदि के लिए कहाँ जाते होंगे ? क्या पर्याप्त स्कूल, कॉलेजेस और अस्पताल वहाँ होंगे ? ‘टॉयलेट’ की बात तो अब पुरानी हो गई ना ।

फिर कुछ बड़ा होने पर फिल्म ‘आपकी कसम’ में एक गाना देखा ‘जय जय शिवशंकर काँटा लगे न कंकरजो प्याला तेरे नाम का पिया ’ पता चला कि यह गाना गुलमर्ग में किसी मंदिर की सीढ़ियों पर फिल्माया गया है और आज भी लोग जब वहाँ जाते हैं तो गाइड बताता है , “साहेबान यह वही सीढियाँ हैं जहाँ राजेश खन्ना और मुमताज भंग पीकर टुन्न हो गए थे ।“ क्या करूँ ..कभी कभी सत्ता की सीढ़ियों में मुझे वैसी ही सीढियाँ दिखाई देती हैं ।


फिर थोड़ा और बड़ा हुआ तो नवें दशक की फिल्म ‘बेताब’ देखी सनी देओल अमृता सिंह वाली जिसे कश्मीर की घाटियों में फिल्माया गया था । कहते हैं फिल्म के बाद उस घाटी का नाम ही ‘बेताब घाटी’ पड़ गया । फिल्म की शूटिंग से पहले इस जगह को 'हगन वैली' (Hagan Valley) या 'हागून' (Hagoon) के नाम से जाना जाता था। यह दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में पहलगाम से कुछ ही दूरी पर स्थित है। यह हरी-भरी वादियों, ऊंचे बर्फीले पहाड़ों और लिद्दर नदी के लिए दुनिया भर में मशहूर है। 
बेताब घाटी 
अब इस नामकरण वाली बात मे पता नहीं इसमें कितना सच है कितना झूठ ..साहब की जुबान की तरह ।

जो भी हो, मेरे बचपनकी फाइलों में मेरा कश्मीर आज भी वैसा ही है । आज भी बचपन के उन गीतों को सुनता हूँ तो याद आता है मुझे रूमानी होना कश्मीर ने ही सिखाया था । जब पहली बार अपनी टीन एज के पूर्वार्ध में देशबंधु वार्ड  वाले मकान मे, बीच का कमरे मे बिछे पलंग पर रखे बिस्तर के ढेर पर पीठ टिकाकर  रेडियों पर बजता सुना था फिल्म ‘वासना’ का वह गीत ...

“ये पर्वतों के दायरे ये शाम का धुआँ... ऐसे में क्यों न छेड़ दें दिलों की दास्ताँ”


अब यह गाना भले ही कश्मीर में ना फ़िल्माया गया हो लेकिन जब भी इसे सुनता हूँ तो हल्की हल्की सी ठंड,सिहरन  जिस्म में महसूस होती है एक अलग ही रूमानियत पैदा हो जाती है। ऐसा ही कुछ महसूस किया था उस समय जब 2014 मे मैं ऊटी गया था । 

 अब कमलेश्वर जी की बात करें उन्होंने तो कश्मीर के लिए जो प्रेम जगाया कि पूछो मत । याद कीजिए उनके उपन्यास ‘डाक बंगला’ की वो पंक्तियाँ....

” पहलगाम से आडू का रास्ता.. बाएँ लिद्दर बह रही है और दाएँ पहला पठार घास फूलों से ढंका है, उसी की कमर पर से पतला रास्ता जा रहा है ... "

जब मैं इस प्रेरणा से अभिभूत होकर लिखना शुरू करता हूँ तो कश्मीर का अनंत सौन्दर्य मुझ पर हावी हो जाता है ।“


मित्रों , मेरे बचपन की कश्मीर फाइल में कश्मीर कुछ ऐसा ही है, खूबसूरत दृश्यों से भरा हुआ । उसमे ज़ाफ़रान की खुशबू के बीच ‘एक था गुल और एक था बुलबुल’ की कहानी का पन्ना लगा हुआ है । डर लगता है ‘इस चमन में कोई सैयाद न आ जाये’ और उस पन्ने को नोचकर फेंक दे । इस फ़ाइल में आज भी सच्चाई, सुन्दरता, प्रेम, मोहब्बत, सौहार्द्र, भाईचारा,ज़िंदगी आदि के ढेर सारे पन्ने लगे हैं । डर है कोई उन पन्नों को वैमनस्यता, झूठ,नफ़रत, दरिन्दगी,मौत के पन्नों में ना बदल दे ।



143. भंडारा : भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना

उन दिनों प्रत्येक पर्व के आगमन से पूर्व अखबार एवं पत्रिकाएँ कवर स्टोरी के रूप में उस पर्व से जुड़ी पौराणिक कहानियाँ अवश्य प्रस्तुत करते थे ৷ फलां फलां अभिनेत्री ने दिवाली कैसे मनाई या होली कैसे मनाई यह छापने का चलन भी प्रारंभ हो चुका था ৷ यद्यपि किसी अभिनेता या अभिनेत्री ने राखी कैसे मनाई यह कभी नहीं बताया जाता था ৷ शायद फ़िल्मी दुनिया में भाई बहन के सम्बन्ध बताना व्यावसायिक दृष्टि से उचित नहीं होता होगा ৷ अतः राखी का महत्त्व जानने हेतु हम लोग केवल पौराणिक कहानियों पर ही निर्भर रहते थे ৷

मेवाड़ की रानी कर्णावती द्वारा मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजने और भाई बनाने की प्रसिद्ध कथा है । 


इस कथा के अलावा पहली पौराणिक कथा जो मैंने रक्षाबंधन के महत्व पर सुनी वह इंद्र और शची की कथा थी ৷  इस  कथा के अनुसार एक बार जब राजा इंद्र व्रतासुर का वध करने जा रहे थे तो उनकी पत्नी देवी शची ने अपने पति की रक्षा हेतु उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधे थे ৷ इस ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंग से जुड़े मुख्य विवरण इस प्रकार हैं । देवराज इंद्र और असुर वृत्रासुर के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था, जिसमें असुरों की शक्ति लगातार बढ़ रही थी और देवता हार की कगार पर थे । हताश होकर इंद्र जब अपने गुरु बृहस्पति के पास गए, तो उन्होंने विजय प्राप्त करने और प्राणों की रक्षा के लिए श्रावण पूर्णिमा पर कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधने का सुझाव दिया। गुरु के निर्देश पर, इंद्र की पत्नी देवी शची (इंद्राणी) ने अपने तपोबल और वैदिक मंत्रों से एक पवित्र रक्षासूत्र (राखी) अभिमंत्रित किया और उसे देवराज इंद्र की दाहिनी कलाई पर बांधा । इस रक्षा-सूत्र के प्रभाव और शची की प्रार्थना से इंद्र में अद्भुत साहस और बल का संचार हुआ। वे युद्ध के मैदान में उतरे और वृत्रासुर का वध करके स्वर्ग पर पुनः अपना अधिकार प्राप्त कर लिया । 

यह कथा जानने के पश्चात अपना यह कांसेप्ट समाप्त हो गया कि केवल बहन ही भाई को राखी बांध सकती है ৷

दूसरी कथा में मैंने पढ़ा कि तीन पग में धरती नापने के पश्चात


जब राजा बलि अतिथि के रूप में विष्णु को अपने साथ पाताल ले गए और बहुत दिनों तक उन्हें आने नहीं दिया तो लक्ष्मीजी उनके अपहरण की आशंका से चिंतित हो उठीं ৷ फिर उन्होंने नारद मुनि की सलाह पर राजा बलि को राखी बांधी और उपहार में अपने पति को मांग लिया ৷ यहाँ दूसरा कांसेप्ट यह बना कि  राखी बांधने वाला अपनी मनचाही वस्तु उपहार में मांग सकता है ৷

तीसरी कथा जो मैंने पढी थी वह सबसे इंटरेस्टिंग थी ৷ इस कथा में शिशुपाल वध के समय कृष्ण का हाथ ज़ख्मी हो जाता है तब द्रौपदी अपनी साड़ी से एक टुकड़ा फाड़कर उनके हाथ पर बांध देती है ৷ इस टुकड़े को राखी का प्रतीक माना जाता है ৷ इसके प्रतिदान स्वरूप श्रीकृष्ण चीरहरण के समय द्रौपदी की रक्षा करते हैं ৷ वैसे महाभारत के पूरे आख्यान में मुझे द्रौपदी और कृष्ण भाई बहन की तरह नहीं अपितु मित्र की तरह लगते हैं ৷ यहाँ मेरा कांसेप्ट यह बना कि रिश्ते में भले कोई भाई बहन हों और उनकी उम्र में चाहे जितना अंतर हो उन्हें हमेशा मित्रवत ही व्यवहार करना चाहिए ৷ 

कृष्ण और द्रौपदी 

अपने युवा मित्रों से बात करते हुए जब मैं विभिन्न सभ्यताओं की पौराणिक कहानियाँ उन्हें बताता हूँ  तो वे कहते हैं यह सब झूठ है, ऐसा कभी हुआ ही नहीं, न कहीं कोई स्वर्ग है न पाताल है ৷ मैं उनके इतिहास बोध पर किसी प्रकार का संदेह न करते हुए उनसे केवल इतना कहता हूँ कि बावजूद इसके हमें विश्व की विभिन्न सभ्यताओं की माइथोलॉजी जानना आवश्यक है ৷ केवल भारत की ही नहीं अपितु ग्रीस, रोम , मेसोपोटामिया, चाइना इत्यादि सभ्यताओं  की माइथोलॉजी भी हमें ज्ञात होनी चाहिए ৷ इसके अलावा बुद्धिस्ट, इस्लामिक,ख्रिश्चेनिटी,इत्यादि की माइथोलॉजी जानना भी आवश्यक है ৷ अगर हमें माइथोलॉजी नहीं पता है तो हम बहुत सारी कविताओं, कहानियों और उपन्यासों का आनंद नहीं ले पाएंगे ৷ अगर कहीं  ‘एकीलिस की एड़ी’ या ‘ट्रॉय का घोड़ा’ जैसा शब्द आ गया तो हम कहेंगे “ यह क्या बला है ?” 

‘बैरो डनहैम’ अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मिथक बनाम मनुष्य’ में कहते हैं कि पौराणिक मिथकों के अलावा हमारा सामना अनेक सामाजिक मिथकों से भी होता है जैसे ‘मनुष्य जन्म से स्वार्थी होता है ‘ और ‘मनुष्य के स्वभाव को बदला नहीं जा सकता ‘ आदि ৷ ऐसे और जाने कितने मिथक हैं जिनसे दिन-प्रतिदिन के जीवन में हमारा साक्षात्कार होता है ৷ 

खैर, मिथक बनाम मनुष्य की यह बहस तो चलती रहेगी और हम स्वविवेक से मिथकों के अस्तित्व पर विमर्श न करते हुए धार्मिक सत्ताधीशों द्वारा बनाये नियमों के आधार पर अपने पर्व मनाते रहेंगे ৷ हालाँकि यह तय है कि हमारे जीवन में अनेक तीज त्यौहार इन्ही मिथकों के कारण अस्तित्व में आये हैं ৷ 

हम रक्षाबंधन पर्व की बात कर रहे थे ৷ मैं अपने अवचेतन के स्मृति कक्ष के द्वार खटखटाता हूँ और जीवन के प्रथम रक्षाबंधन पर्व का स्मरण करता हूँ ৷ उन दिनों एकल संतान का चलन नहीं था और इस पर्व की पूर्णता हेतु घर में एक भाई एक बहन का होना अनिवार्य था ৷ बहन की अनुपस्थिति में रिश्ते की किसी बहन से या पड़ोस की किसी लड़की से राखी बंधवाने का कार्य स्वाभाविक रूप से संपन्न किया जाता था ৷

मेरी बहन सीमा मुझसे बाद में पैदा हुई थी इसलिए प्रारंभिक दो तीन वर्षों तक  राखी बंधवाने का यह पारंपरिक कार्य मैंने बाबूजी के मित्र राम हेडाऊ की बेटी भारती के माध्यम से पूर्ण किया ৷ उसके बाद जब तक बहन राखी बांधने लायक नहीं हुई तब तक माँ ही इस कार्य को संपन्न करती रही ৷ शुची की परम्परा में वे बाबूजी को राखी बांधती ही थीं ৷ 

रक्षाबंधन का पर्व एक तरह से परिवारों के मिलने जुलने का पर्व भी होता था ৷ मिलने का सिलसिला अगले दिन अर्थात भुजलिया या कजलिया के दिन तक जारी रहता ৷ भुजलिया के लिए राखी से एक सप्ताह पूर्व बाँस की टोकरियों में गेहूं बोकर जवारे उगाए जाते थे ৷ हमारे घर के आसपास जिस समाज के लोग रहते थे उनके यहाँ यह परम्परा थी कि राखी के अगले दिन यानि पाड़वा के दिन महिलायें यह जवारे की टोकरी लेकर भुजलिया ठंडी करने खामतलाव जाती थीं । वह दृश्य बहुत अद्भुत होता था जब सामने सामने बैंड बाजे वाले चलते थे और पीछे पीछे सर पर टोकरी लिए मोहल्ले की महिलायें ৷ 

हमारे घर में भुजलिया उगाने की प्रथा तो थी लेकिन तालाब तक जाकर उन्हें ठंडा करने जैसा कार्य नहीं होता था ৷ हम लोग यह कार्य घर की टंकी में ही कर लिया करते ৷ फिर सबकी देखा सेखी माँ ने यह काम करने की ठानी लेकिन मध्यवर्गीय अवगुंठन में स्वयं न जाकर यह कार्य उन्होंने  सामने रहने वाले ठाकरे काका की पत्नी सुमन को सौंप दिया ৷ वैसे कुछ बड़ा हो जाने के बाद भुजलिया की टोकनी ले जाने का काम मैं भी करने लगा । तालाब के घाट पर पहुंचकर  मिट्टी तालाब में बहा दी जाती थी और जवारे यानि भुजलिया लेकर हम घर आ जाते थे । मुझे तालाब के पानी तक जाने की मनाही थी इसलिए ठंडा करने का यह काम सुमन काकी ही किया करती थीं । 

घर लौटकर यह गेहूं के जवारे अर्थात भुजलिया  सबसे पहले भगवान की फोटो पर चढ़ाई जाती । फिर बाबूजी उसे अपने माता पिता यानि अम्मा और बापू की तस्वीर पर चढाते । फिर यह भुजलिया लेकर हम लोग पास पड़ोस के सभी घरों में जाते और बड़ों को देकर उनके चरण स्पर्श किया करते थे । इस तरह मोहल्ले के और लोग और बच्चे भी हमारे घर आते थे । यही प्रक्रिया शमीपत्र को लेकर दशहरे के दिन भी की जाती थी । 

हमारे घर में भुजलिया का यह पर्व दुगुने उत्साह के साथ मनाया जाता था इसलिए कि इस दिन बहन सीमा का भी जन्म हुआ था ৷ बाबूजी हमेशा कहते कि इसे राखी के दिन पैदा होना था लेकिन यह एक दिन लेट पैदा हुई ৷ यद्यपि तारीख के अनुसार उसका जन्मदिन हम लोग सत्ताईस अगस्त को ही मनाते थे । 

आज छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कथाकार और लोक कला मर्मज्ञ परदेशीराम जी ने बताया कि छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य नाचा में एक प्रसंग आता है जब बहन विदाई के समय अपने भाई की कमर पकड़कर रोती है और कहती है ‘ अगर इस तरह विदा लेकर मुझे पति के घर न जाना पड़ता तो मैं तेरे साथ खेत में नागर चलाती और उसमें भी सामने का बड़ा वजनी हिस्सा मैं थामती और तुझसे कहती तू पीछे का छोटा और कम भार का हिस्सा थाम ৷ “  

इस कथा से मेरा एक और कांसेप्ट क्लियर हुआ कि भाई बहन का सम्बन्ध मित्रता का तो होता ही है और मेहनत के कामों में वह केवल अपने पिता या भाई की सहायता ही नहीं करती बल्कि हमारे जीवन में थोपे गए इस पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री हेतु वर्जित घोषित किये गए समस्त कार्य संपन्न कर सकने का दम भी रखती है ৷    


शरद कोकास 

142 .चेहरे पर केक मलने की परम्परा कब शुरू हुई

उत्सवधर्मिता हम होमो सेपियंस के जींस में है ৷ अनुष्ठान हमारे जीवन से जुड़े हैं ৷ खुशियाँ उनका सहउत्पाद हैं ৷ कृषि से पूर्व शिकार के भी उत्सव हुआ करते थे ৷ जैसे आदिम मानव जब हिरण का शिकार करने जाता था तो वह धरती पर या दीवार पर एक हिरण का चित्र बनाता था,भाले की नोक से उसका स्पर्श करता था और उसके इर्द गिर्द नाचता था ৷ ऐसा करने के पीछे उसकी मान्यता थी कि इस तरह शिकार प्राप्त करने में उसे सफलता मिलेगी ৷ आग की खोज के बाद भोजन पकाना और खाना भी एक उत्सव ही  होता था ৷

उत्सव की यह परंपरा फिर कृषि अवस्था में भी चली आई ৷ इसमें बीज बोने से लेकर फसल काटने तक तमाम अनुष्ठान और उत्सव हुआ करते थे ৷ धीरे धीरे जब इन अनुष्ठानों और उत्सवों में धर्म का प्रवेश हुआ इनका स्वरूप विकृत होता गया ৷ इन मेहनतकश इंसानों के बीच एक पुरोहित वर्ग का जन्म हुआ जिसने इन्हें सुव्यवस्थित करने और इनका लाभ मनुष्य को दिलाने के नाम पर उनका नेतृत्व करना प्रारंभ किया ৷

धीरे धीरे इन उत्सवों में कर्मकाण्ड प्रवेश करते गए, धर्म, ईश्वर और भाग्य का इनमे समावेश हुआ ৷ फिर जैसे जैसे अलग अलग धर्मों के ईश्वर अलग हुए उत्सव भी अलग होते गए ৷ उत्सवों से लोगों के रोजगार जुड़ते गए ৷ आगे उत्सव विलासिता और धन के प्रदर्शन के प्रतीक बन गए  ৷

वैभव और उत्सव का सम्बन्ध भले धन से हो लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इनसे प्राप्त होने वाली खुशी का पैमाना दोनों में बराबर होता है अर्थात खुशी पैदा करने वाले हारमोंस अमीर और ग़रीब दोनों में बराबर मात्रा में स्त्रवित होते हैं ৷ जैसे दस लाख का सूट पहनने से साहब को जो खुशी मिलती है उतनी ही खुशी एक ग़रीब को नई कमीज़ पहनने से मिलती है ৷ यह बात अलग है कि ग़रीब को तीज त्यौहार पर भी नए कपडे नसीब नहीं होते ৷ 

एक मध्यवर्गीय या निम्नवर्गीय परिवार में तीज त्योहारों के अलावा उत्सव के अवसर बहुत कम आते हैं । इनमे विवाहोत्सव और जन्मोत्सव प्रमुख हैं । उत्सव से फिर अपना बचपन याद आता है ৷ बाबूजी का जन्मदिन दशहरे के दिन और माँ का जन्मदिन दिवाली के दिन आता था सो अलग से मनाये जाने ला प्रश्न ही उद्भव नहीं होता था  । मेरे जन्मदिन अर्थात तीस सितम्बर को माँ सुबह सुबह मुझे नहला धुलाकर टीका लगा देती थी । खीर तो खैर सबके जन्मदिन पर बनती ही थी  ।  

मैं बैतूल में देखता था कि बड़ी माँ और चाचियाँ मुल्लू भैया को उनके जन्मदिन के दिन टोकरी में रखकर कुछ दूर तक घसीटती थीं ৷ मैंने पूछा “ऐसा क्यों करते हैं आप लोग ?” तो उन्होंने बताया कि विजय भैया मूल में पैदा हुए थे उनका मूल उतारने के लिए हर जन्मदिन पर ऐसा करना अनिवार्य है ৷ बड़े होने के बाद ज्ञात हुआ कि जन्मदिन मनाने के ऐसे अजीबोगरीब तरीके हमारे देश में नहीं हैं बल्कि अन्य देशोंमे भी हैं ৷ जैसे ब्रिटेन में बच्चे के जन्मदिन पर उसे हवा में उछाला जाता है ৷ उसे बर्थ डे बंप कहते हैं ৷ जर्मनी में बच्चे से चर्च की सफाई करवाई जाती है और हंगरी में बर्थ डे बेबी के कान खींचे जाते हैं ৷ 

हमारे देश में दीपक से बच्चे की आरती उतारने, तिलक लगाने और खीर खिलाने की परम्परा में धीरे से केक काटने की परम्परा प्रविष्ट हो गई ৷ बच्चे अब अपना जन्मदिन स्कूल में मना लेते हैं स्कूल में हों तो अन्य बच्चों को टॉफ़ी बाँटते हैं और बड़े हुए तो दोस्तों के साथ पार्टी करते हैं ৷ अब तो सुबह की राह भी नहीं देखी जाती रात बारह बजे ही केक काट लिया जाता है ৷

पिछले कुछ वर्षों से केक काटने के बाद जिसका जन्मदिन है उसके चेहरे पर केक मलने की परम्परा शुरू हुई है ৷ मैंने जब पहली बार यह दृश्य देखा तो बड़ा अजीब सा लगा ৷ इस चलन का उद्भव कैसे हुआ यह जानने की मैंने कोशिश की तो बड़ी मज़ेदार बातें पता चलीं ৷ जैसे अमेरिका में बच्चे के पहले जन्मदिन पर ‘स्मैश केक’ बनाया जाता है जो काफी नर्म होता है ৷ फिर बच्चे को उस केक के  सामने बैठा दिया जाता है ৷ बच्चा इस नर्म केक को हाथ से सानते हुए , मुँह नाक पर चुपड़ते हुए मनचाहे तरीके से खाता है ৷ इसमें सबका मनोरंजन होता है ৷

इसी तरह कनाडा में जन्मदिन पर बच्चों की नाक पर पेस्ट्री,केक या मख्खन लगा दिया जाता है जिसे वे जीभ से चाट चाट कर खाते हैं ৷ इसे ‘नोज़ ग्रीसिंग’, ‘ग्रीस फेस’ या ‘बटर्ड नोज़’ कहते हैं ৷ इसका आशय होता है जीवन भर आपके भीतर स्निग्धता बनी रहे ৷ इस तरह अन्य देशों में भी यह चुपड़ने वाली प्रथाएँ हो सकती हैं ৷ संभव है जन्मदिन मनाने का यह तरीका बाद में बड़ों को भी पसंद आने लगा हो ৷

कुछ इसी तरह की प्रथाएँ विवाह उत्सव में भी चलती हैं ৷ हमारे यहाँ दूल्हा दुल्हन को हल्दी लगाते हुए बाकी लोगों को भी हल्दी चुपड़ देते हैं, इसे ‘हल्दी खेलना’ कहते हैं ৷ आंध्रप्रदेश में दूल्हा दुल्हन के सर पर पापड़ तोड़ कर उसके चेहरे पर मल देता है ৷ मुझे ज्ञात हुआ कि ऐसे ही प्राचीन रोम में दुल्हन के सर पर सूखा केक रखकर तोड़ा जाता था ৷ अब इसका क्या उद्देश्य था यह तो पता नहीं लेकिन यह प्रश्न मेरे मन में अवश्य आया कि पापड़ दुल्हन के सर पर रखकर ही क्यों तोड़ा जाता है ৷ कुछ विद्वानों का कथन है इसका सम्बन्ध दुल्हन के कौमार्य भंग से हो सकता है , लेकिन वह तो दूल्हे का भी होता है ?

खैर, केक काटने की परम्परा तो अब आम हो गई है ৷ अब तो काटने और चुपड़ने के लिए केक भी अलग अलग आने लगे हैं ৷ चाहे जन्मोत्सव हो, विवाहोत्सव हो या कोई उद्घाटन हो केक काटना अनिवार्य है ৷ क्या पता कुछ समय बाद अंतिम संस्कार के समय भी केक काटा जाने लगे और उसे मृतक के चेहरे पर मला जाने लगे ৷ फिर शायद किसी दिन हमें पता चले कि इस चलन को शुरू करने के पीछे दुनिया के केक बनाने वाले बड़े बड़े बेकर्स का मार्केटिंग फंडा था ৷ पूंजीवाद के दौर में कुछ भी संभव है ৷

शरद कोकास 

141. कानपुर : अरे ! कुत्ता खाते हो शरम नहीं आती



बनखंडेश्वर मंदिर के सामने,एक सौ चार बटे चार सौ तेरह, सीसामऊ कानपुर ৷ यह पता था रामे मामा का ৷ रामे मामा यानी मुंबई वाले हमारे दयानंद मामा के साले रामचंद्र शर्मा  जो सत्तर के उस दशक में  अपने तीन बेटों प्रकाश,सुशील,प्रेम और बिटिया किरण के साथ इस भवन में उपरी मंज़िल पर रहते थे ৷ नीचे सब दुकानें थीं ৷ इसी घर से हमारे छोटे मामा सर्वदानंद की शादी होनी तय हुई थी ৷

शादी की धूमधाम ख़त्म हुई ৷ मुंबई से आये मेरे हमउम्र ममेरे भाई अनिल उर्फ़ पप्पू ने प्रस्ताव रखा “ यार शरद, उत्तर प्रदेश की पचमेल मिठाई,उड़द के दाल की कचोरियाँ और समोसे खा खाकर मैं ऊब गया हूँ ৷ चलो बाज़ार चलकर ‘हॉट डॉग’ खाकर आते हैं ৷ 

“हॉट डॉग ? यह क्या होता है ?” मैंने चौंककर पूछा ৷ पप्पू ने जवाब दिया “वह मीट को कीमे की तरह पीस कर उसके सासेज़ बनाते हैं और उसे बन में रखकर ग्रिल करते हैं ৷” हॉट डॉग के इस संक्षिप्त परिचय में मुझे केवल ‘कीमा’ समझ में आया৷  बाकी ‘सासेज़’ शब्द मेरे लिए बिलकुल नया था ৷ शेष परिचय खाते हुए मिल जायेगा यह सोचकर मैंने कहा “ चलो ৷ ”  

सीढियाँ उतरकर हम लोग नीचे आये और बनखंडेश्वर मंदिर की लाइन में चलते हुए देखने लगे कहीं ‘हॉट डॉग’ का बोर्ड लगा हो ৷ बोर्ड तो हमें चाट, गुपचुप, पानी पतासा, समोसा, कचोरी, आदि के भी नहीं दिखाई दे रहे थे फिर ‘हॉट डॉग’ का कैसे दिखाई देता ৷ अचानक सामने एक होटल आ गई ৷ हम लोग भीतर प्रवेश कर गए और एक टेबल पर बैठ गए ৷ एक छोकरा आया, उसने टेबल पर कपडा मारा और ज़ोर  से  आवाज़ लगाई तीन नंबर टेबल पर साहब को पानी मारो ৷ हमें पता था पानी मारना मतलब पानी का गिलास रखकर आर्डर लेना होता है ৷ ऐसे ही ग्राहक को चाय, समोसा, कचोरी भी मारे जाते हैं ৷

बनखण्डेश्वर मंदिर रोड 

पानी मारने वाला बैरा आया “हाँ मुन्ना, बोलो क्या  लगाऊं ?” पानी रखकर उसने पूछा “ एक प्लेट ‘हॉट डॉग’ ৷” पप्पू ने आर्डर किया ৷ बैरे ने पूछा “क्या बोले ? समोसा ? कचोरी ? “ “नहीं भाई वो हॉट डॉग होता है ना सासेज़ को ब्रेड वाले बन में रखकर बनाते हैं ৷” पप्पू ने उसे समझाते हुए कहा ৷ “अच्छा डबलरोटी का पकौड़ा ?” बैरे ने अपने आई क्यू का इस्तेमाल किया ৷  “नहीं भाई वो सब नहीं ৷” पप्पू थोड़ा खीझने लगा था ৷ बैरे ने कहा “आप क्या कह रहे हैं मेरी तो समझ में नहीं आता ৷ यहाँ कानपुर में उसे क्या  बोलते है वो बताओ ৷“ पप्पू ने कहा “उसे तो पूरी दुनिया में हॉट डॉग ही कहते हैं ৷”

बैरे ने साफ़ कहा “फिर तो मुन्ना वो यहाँ नहीं मिलता ৷ कहीं और देखिए ৷” बैरे की बात सुनकर हम लोग होटल से बाहर  आ गए ৷ मैंने पप्पू से कहा “यार, भीतर बैठने के पहले ही पूछ लेते तो बेहतर था ৷” जैसे रेगिस्तान में मुसाफ़िर चश्मे की तलाश में आगे बढ़ता है हम लोग भी आगे बढ़ते गए ৷ आगे एक होटल और मिली ৷ ठीक सामने भट्टी थी जिस पर चढ़ी कढाई में एक हलवाई गरम गरम आलू बोंडे तल रहा था ৷ आलूबोंडों की खुशबू इतनी अच्छी थी कि मेरे मुँह में पानी आने लगा ৷ मैंने पप्पू से कहा “ हॉट डॉग वाट डॉग छोड़ो, यहीं आलूबोंडे  खा लेते हैं ৷ पप्पू ने कहा “ ठीक है, पहले इसके मालिक से पूछ तो लें ৷”

बड़ी बड़ी मूंछों और घुटे हुए सर वाला होटल मालिक जो शक्ल से ही हलवाई लग रहा था हमें अपनी  ओर आता देख खुश हुआ “कहिये ?” “भैया आपके यहाँ हॉट डॉग मिलेगा क्या ?” पप्पू ने पूरे आत्मविश्वास से पूछा ৷ “क्या बोले ? फिर से बोलो ?” मालिक ने कान खुजाते हुए पूछा ৷ पप्पू ने जवाब दिया “हॉट डॉग ৷” मालिक ने दोहराया “हॉट डॉग, हॉट याने गरम डॉग याने कुत्ता ৷ ओये.. चलो निकलो यहाँ से.. कुत्ता खाते हो शर्म नहीं आती ....छी छी.. राम राम राम राम .. सब भ्रष्ट कर दिया.. चलो भागो यहाँ से ৷” 

हमने पिटे हुए वकील की तरह थोड़ी जिरह करने की कोशिश की लेकिन उसने हमें ठहरने ही नहीं दिया ৷ वैसे भी इतने बेआबरू होने के बाद वहाँ रुकने का सवाल ही पैदा नहीं होता था ৷ मैंने हसरत भरी निगाहों से आलूबोंड़े की कढ़ाई की ओर  देखा ৷ पप्पू ने हाथ पकड़कर खींचा “चलो,जल्दी चलो, पिटना है क्या यहाँ रुककर, उसके तेवर नहीं देखे ৷” 

अगली होटल ज़रा आधुनिक सी दिखाई दे रही थी ৷ हम लोग भीतर प्रवेश कर गए ৷काउंटर पर जो युवा बैठा हुआ था  वह पैंट शर्ट पहने हुए था ৷ पप्पू ने कहा “इसे पक्का पता होगा ৷“ “सर आपके यहाँ हॉट डॉग मिलेगा क्या ৷“ उसने उक्त व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहा ৷ मैंने ध्यान दिया, धोती पहना हुआ आदमी भैया कहलाता है और पैंट पहना हुआ आदमी अपने आप सर हो जाता है ৷ उसने  धीरे से कहा “हॉट डॉग ? ओह.. सॉरी, हॉट डॉग, तो हमारे यहाँ नहीं है৷ 

हमें संतोष हुआ, बन्दे को इतना तो पता है कि हॉट डॉग क्या होता है ৷ मैंने सोचा इसी से पूछ लिया जाये “सर, कानपुर में यह कहाँ मिलेगा ?” वह मुस्कुराने लगा “भाई, यह डिश तो मुझे पता है, मुंबई में मिलती है, शायद आप लोग वहीं से आए हैं ? पप्पू ने हाँ में सर हिलाया ৷ “लेकिन कानपुर में इसका मिलना मुश्किल है,  सॉरी ৷” उसने हमारे सामान्य ज्ञान में वृद्धि की ৷

उसने इस तरह दो बार ‘सॉरी’ कहा कि हम लोग पिघल गए और हमने अपने अपमान की पूरी दास्तान उसे सुना दी ৷ बदले में उसने हमें पुचकारते हुए हॉट डॉग के आभासी चित्र के साथ अपने होटल की बासी डबलरोटी सेंक कर चटनी के साथ खिला दी ৷ हमने खा तो ली लेकिन लौटते हुए भुनभुनाने लगे, अच्छा मतलब बम्बई वाला जानकर इसने भी हमें बेवकूफ बना दिया ৷ लेकिन हम भी नहीं माने और लौटते में एक दुकान पर आलू टिकिया की गरम गरम चाट बनवाई और साथ में फुलकी भी खाई चार चार आने की ৷

बरसों बाद जब मैं नौकरी करने के लिए दुर्ग आया मेरी मुलाकात मनोज रूपड़ा से हुई ৷ उसकी मिठाई की दुकान पर हम लोगों की बैठक जमती थी जिसमे मैं, कथाकार कैलाश बनवासी, पूरन हार्डी, अनिल कामड़े, हरी सेन आदि मित्र शामिल रहते थे ৷ मनोज ने कहानियाँ लिखने की शुरुआत की थी और मै भी कविता के क्षेत्र में कदम रख रहा था ৷ मनोज कहानियां लिखता और दूकान में ही हम लोगों को पढ़ पढ़कर सुनाता था ৷ 

एक दिन मनोज ने पूछा “यार ये ‘सासेज़’ क्या होता है ?” उन दिनों वह अपने कहानी ‘युयुत्सा’ लिख रहा था जिसमे उसका एक कैरेक्टर होटल में ‘सासेज़’ आर्डर करता है ৷ उसके बात सुनकर मुझे कानपुर के हॉट डॉग वाला किस्सा याद आ गया ৷ इतना तो मुझे पता था कि हॉट डॉग में ‘सासेज़’ का ही इस्तेमाल होता है  

आप लोग भी सोच रहे होंगे कि जबसे कहे जा रहा है लेकिन यह हॉट डॉग आखिर होता क्या है ৷ इसके  लिए पहले आपको ‘सासेज़’ क्या होता है यह समझना होगा ৷ सासेज़ यह बीफ़,पोर्क,चिकन आदि के कीमे से बनता है ৷ कीमे को भूनकर उसमें विभिन्न मसाले,ब्रेड का चूरा आदि मिलाकर उसकी लम्बी लम्बी लोई बनाई जाती है, या मसाला मिले कीमे को बेक किया जाता है, स्टीम किया जाता है या ग्रिल किया जाता है ৷ कहीं कहीं उसे धुएँ में भी पकाया जाता है ৷ यह कुछ उसी तरह है जैसे हमारे यहाँ कबाब बनाया जाता है ৷ इस गरम गरम ‘सासेज़’ को एक बन के बीच रखकर यानी दबाकर खाया जाता है, बोले तो अपन के यहाँ के  वड़ा पाँव स्टाइल में ৷ 

लेकिन अब भी आपके दिमाग में ‘डॉग’ शब्द  अटका होगा ? आप ठीक सोच रहे हैं यहाँ इस डॉग का अर्थ उसी डॉग से है जिसे हम कुत्ता कहते हैं ৷ ऐसा कहा जाता है कि उन्नीस सौ से पहले जर्मनी और आसपास क्षेत्रों में सासेज़ के लिए कुत्ते के मांस का प्रयोग किया जाता था जो बाद में बंद हो गया ৷ इस डिश के लिए ‘हॉट डॉग’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिका के अखबार नॉक्स विले जर्नल में सन अठारह सौ त्र्यान्बे में किया गया ৷

खैर माँसाहार के नाम से नाक भौं सिकोड़ने की ज़रूरत नहीं अब तो शाकाहारियों के लिए ‘वेजिटेबल हॉट डॉग’ भी आ गए हैं ৷ बढ़िया आलू की टिक्की जैसे किसी भी चीज़ को किस कर उसकी टिक्की बनाइये उसे भून कर तल कर बन के बीच में रखिये उस पर थोड़ा सौस लगाइए ৷ भीतर उबला मटर, कटे प्याज़, हरा धनिया रखिये, थोड़े सेव भी,फिर थोड़ा थोड़ा चाट मसाला,जीरा पाउडर,काली मिर्च  छिड़क दीजिये और दबा कर खा जाइये ৷ अब ‘डॉग’ शब्द से आपको क्या करना है इस नाम का तो इस व्यंजन के साथ गठ बंधन हो ही गया है ৷ 

शहरों के नाम, सड़कों के नाम, इमारतों के नाम भले ही बदल दें आप ज़रा हॉट डॉग का नाम बदल कर दिखाइए ৷ आखिर पिज्जा बर्गर के नाम भी तो नहीं बदल पाए ना हम ৷ इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने से उसका इलाहाबादीपन नहीं गया, न ही लेनिनग्राद का नाम सेंट पीटर्सबर्ग करने से लेनिन का नाम भुला दिया गया  ৷ उसी तरह हॉट डॉग का नाम ‘हॉट आलू’ या ‘हॉट गोभी’ कर देने से उसका स्वाद थोड़े ही बदल जाएगा ৷ 

शरद कोकास 


140. जबलपुर : खूबसूरत बंगलों में रहने वाले खूबसूरत लोग

मैं हमेशा सोचता था कि बजबजाती नालियों से भरी तंग गलियों में रहने वाले झोपडपट्टी के बच्चे, खूबसूरत बँगलों वाली साफ सुथरी पॉश कालोनियों में रहने वाले बच्चों को देखकर क्या सोचते होंगे ৷ क्या कभी उन्हें इस बात का ख्याल आता होगा कि नाक नक्श और अंग संरचना में ठीक उन्ही की तरह दिखाई देने वाले यह बच्चे उनसे अच्छे कपड़े क्यों पहने हुए हैं और इन बड़े बड़े मकानों में कैसे रह रहे हैं ৷ 

मेरे मन में यह बात भी आती कि कालोनियों में रहने वाले यह खूबसूरत बच्चे,  मैले कुचैले कपड़े पहने गंदे से दिखने वाले उन बच्चों को देखकर क्या सोचते होंगे ৷ मैं अक्सर देखता था कि उन बंगलों में रहने वाले लोग इन बच्चों को गंदे बच्चे कहकर उनकी ओर संदेह भरी नज़रों से देखते हैं और चोर या उठाईगीर समझकर दुत्कार कर भगा देते हैं ৷ 

बाबूजी जब बताते कि भगवान ने सारे बच्चों को दुनिया में एक जैसा पैदा किया है तब मैं उनसे पूछता कि फिर यह बच्चे इतने गरीब क्यों है ? वे कहते “उनकी किस्मत ऐसी ही है ৷” मैंने उनसे कभी बहस तो नहीं की लेकिन भगवान और भाग्य से भरोसा उठना मेरा उन्ही दिनों शुरू हो गया था ৷ किताबों की दुनिया से गुजरते हुए धीरे धीरे मुझे मेरे सवालों का जवाब मिलना शुरू हुआ और एक दिन मैं जान गया कि कोई ग़रीब और कोई अमीर कैसे होता है ৷

मेरे शहर में कोई ऐसी पॉश कालोनी तो थी नहीं लेकिन बड़े शहरों में इस तरह की कालोनियों में भटकना मुझे अच्छा लगता था ৷ हालाँकि कभी किसीने मुझे दुत्कार कर भगाया नहीं, शायद मैं शक्ल सूरत से झोपडपट्टी वाला बच्चा लगता नहीं था ৷ फिर भी ‘कुत्ते से सावधान’ या ‘बीवेयर ऑफ़ डॉग्स’ जैसी पट्टी लगे वाले बंगलों के सामने से गुजरते हुए मैं थोड़ा सतर्क रहता था और सोचता था कुत्तों से सावधान वाला बोर्ड लगाने की बजाय ज़्यादा ज़रूरत तो इन बंगलों में रहने वाले लोगों से सावधान रहने का बोर्ड लगाने की है ৷

इन जगमगाती सडकों से गुजरते हुए मैं सोचता काश हम लोग भी कभी इस तरह के बंगले में रह पाते ৷ हालाँकि मैं जानता बाबूजी जीवन भर शिक्षक की नौकरी करेंगे और यह संभव नहीं होगा ৷ मेरे मन में दबी इस सुप्त इच्छा की पूर्ति तब होती जब हमें मुंबई में दयानंद मामा के बंगले में कुछ दिन रहने का अवसर मिलता ৷ 

अपनी सुप्त इच्छाओं को साकार करने का एक अवसर मुझे तब भी मिला जब हम लोग जबलपुर में आशा मौसी के विवाह में शामिल होने गए थे ৷ आशा मौसी के पिता महावीर प्रसाद शर्मा माँ के मामा थे इसलिए मैं उन्हें नाना कहता था और माँ की मामी श्रीमती गायत्री देवी को नानी ৷ निकटस्थ रिश्तों में वही एक थीं जो मेरे लिए नानी हो सकती थीं ৷  


नानाजी आर्डिनेंस फैक्ट्री जबलपुर में फोरमैन थे और खूबसूरत बंगलों वाली वेस्टलैंड खमरिया की  पॉश कॉलोनी में रहते थे ৷ उनका बंगला भी मुंबई वाले मामाजी के बंगले जैसा ही बड़ा सा बंगला था, आगे पीछे ढेर सारी जगह ,बड़ा सा लॉन बड़े बड़े कमरे और बाथरूम और बगीचे में आम के पेड़ ৷  नानाजी के चार बेटों ओमप्रकाश,रविप्रकाश, ज्ञानप्रकाश और वेदप्रकाश में सबसे छोटे वेदू मामा मुझसे उम्र में कुछ ही बड़े हैं  इसलिए उनसे दोस्ती का रिश्ता भी निराला था । 
रविप्रकाश मामा और निर्मल मामी 
मुझे याद है जबलपुर जाने के लिए माँ ने नई साड़ी खरीदी थीं ৷ बाबूजी और मैंने भी नये कपड़े सिलवाये थे । मैंने बॉटल ग्रीन कलर की एक फुलपैंट सिलवाई थी जिसकी मोहरी चौदह इंच की थी । यह बात मुझे इसलिये याद है क्योंकि वह मेरे जीवन की पहली फुलपैंट थी । इससे पहले स्कूल में और बाहर मैं हाफ पैंट ही पहना करता था ৷ 

भंडारा से जबलपुर की उस यात्रा में गोन्दिया जबलपुर नैरो गेज की ट्रेन से जबलपुर जाने का वह अनुभव अद्भुत था । धीमी गति से हिलते डुलते चलने वाली उस छोटी सी ट्रेन को लेकर उन दिनों कई किस्से चलते थे ৷ एक किस्सा मशहूर था कि ट्रेन के बार बार बार रुकने पर एक यात्री ने गार्ड से पूछा “गार्ड साहब, ट्रेन बार बार क्यों रुक रही है ?” तो उन्होंने जवाब दिया “ इसका कारण एक गाय है, जो इंजन के सामने आ जाती है ৷ हम उसे भगाते हैं, लेकिन गाड़ी चलते ही फिर वह भागकर सामने पटरी पर आ जाती है ৷

आशा मौसी के विवाह में शामिल होने मुम्बई से दयानन्द मामा अपने पूरे परिवार सहित आये थे । झांसी से कृष्णदत्त मामा और कानपुर से रामचन्द्र मामा सपरिवार । मातृकुल के बच्चों की एक पूरी टीम जिनमे किशन,प्रकाश,बेबी,दीदी,चित्रा वगैरह शामिल ৷ शादी के दो दिन पहले से हम लोगों ने लान को सजाना प्रारम्भ कर दिया । धागे में रंगीन पन्नियाँ चिपकाकर ऊपर बान्धने के लिए एक मन्डप तैयार करने की ज़िम्मेदारी हम बच्चों की थी । बीच बीच में मठरी, बालूशाही, और बून्दी के लड्डू आदि का आयात जारी था । हमसे बड़े लोगों का एक ग्रूप अलग था जिसमें लाल दादा, ज्ञान मामा ,दया मामी के भाई श्रवण और रवि मामा वगैरह थे । 

लाल दादा ने उस समय एक पैरोड़ी बनाई थी जिसमें माँ की एक बहन सुषमा के पतिदेव  मदन जी का ज़िक्र था । एक दिन पहले ही वेदू मामा और ज्ञान मामा का उपनयन संस्कार भी हुआ । उनके सर मुन्डा दिये गये, जिसके कारण वे बहुत दुखी हुए । पंडित जी ने संस्कार करते हुए कहा “उपनयन के बाद पेड़ पर चढ़ना वर्जित है ৷” लेकिन अगले ही दिन चटनी के लिये आम की ज़रूरत पड़ी और वेदू मामा पंडित जी की निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए पेड़ पर  चढ़ गये । 

शादी वाले दिन शाम से ही हम लोग बहुत उत्साह में थे । हम लोग नये कपड़े पहन कर इतरा रहे थे । पहली बार फुल पैंट पहनना मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था ৷ रात नौ बजे लगभग दूल्हा बने रामकिशन मौसाजी यानि डॉ.रामकृष्ण गोरख बारात लेकर हमारे यहाँ पहुँचे । बारात भोपाल से आई थी । द्वारचार हुआ फिर खाना पीना और रात में फेरे । जागकर शादी देखने का पहला अवसर था ৷ याद नहीं कि लम्बा चलने  वाला यह सीरियल हमने किस एपिसोड देखा ৷ 

बात झोपडपट्टी के बच्चों से शुरू की थी आशा मौसी के विवाह तक पहुँच गई ৷ ज़िंदगी ऐसे ही मंज़िलों को धोखा देते हुए चलती है नाना नानी को गुजरे कई साल हो गए विगत वर्षों में आशा मौसी और रामकिशन मौसा जी भी गुजर गए ৷ ओमप्रकाश, ज्ञान,रवि और वेदू मामा ने अपने अपने मकान बना लिए ৷ रवि मामा की सालीजी यानी लता जी से मेरा विवाह हो गया और हम लोगों ने भी शहर की एक पॉश कॉलोनी में अपना मकान बना लिया ৷ 

मेरे घर के पास अटल आवास नाम की एक झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी है जिसे मैं जे जे कॉलोनी कहता हूँ ৷ मैले कुचैले कपडे पहने हुए वहाँ रहने वाले कुछ बच्चे अक्सर मेरी स्ट्रीट से गुजरते हैं ৷ उन्हें देखकर मैं सोचता हूँ क्या यह बच्चे भी यही सोचते होंगे कि भगवान ने कुछ बच्चों को गरीबों के घर में और कुछ बच्चों को अमीरों के घर में क्यों पैदा किया ৷ क्या इसे भी वे अपनी किस्मत मानकर चुप रह जाते होंगे ?

शरद कोकास