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2 मई 2026

27. भंडारा : बाबासाहेब आंबेडकर और हुसैन रामटेके के बिना चाय

डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर 

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर 1954 मे महाराष्ट्र के भंडारा शहर से और मुंबई से लोकसभा का चुनाव हार गए थे । यह सब कैसे हुआ था ? कौन लोग इसके पीछे थे? कैसी पॉलिटिक्स हुई थी ? इन सबको विस्तार से मैंने लिखा है अगली सात कड़ियों मे पढ़ना न भूलें ।  प्रस्तुत है यह प्रथम किश्त 
 

दिनकर राव रहाटे अपने शिक्षकीय दायित्व से मुक्त होकर स्कूल से लौटे ही थे कि उनके मित्र भानुदास बंसोड उनसे मिलने आ गए ..”सुना है बाबासाहेब का भंडारा से बाय इलेक्शन लड़ने का विचार है ?” दिनकर राव जी ने सर हिलाते हुए कहा “ हाँ, बाबासाहेब से ऐसी बात तो हुई थी, उन्होंने यहाँ संभावनाओं के बारे में पता करने के लिए कहा है ৷“

गांधी चौक भंडारा 
यह सन उन्नीस सौ चौवन के आते हुए बसंत के दिनों की एक शाम थी ৷ भंडारा के यह दोनों मित्र चौक में खड़े थे और कप बशी में चाय पीते हुए तत्कालीन राजनीति और भंडारा की वर्तमान स्थिति पर चर्चा कर रहे थे ৷ भंडारा में लोकसभा की वर्तमान सीट खाली हो चुकी थी और उस सीट से बाबासाहेब आम्बेडकर को प्रत्याशी बनाए जाने पर विचार चल रहा था ৷

दिनकर राव और भानुदास जी दोनों बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा गठित सिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे और बाबासाहेब के सच्चे अनुयायी थे ৷ दिनकर राव जी फेडरेशन के भण्डारा ज़िले के अध्यक्ष थे ৷ वे भंडारा के निकट शहापुर के नानाजी जोशी विद्यालय के संस्थापक शिक्षकों में से एक थे ৷ लेकिन उन दिनों वे भंडारा से वरठी अर्थात भंडारा रोड रेलवे स्टेशन जाने वाले मार्ग पर दाभा गाँव के निकट जनपद के एक स्कूल में पाँचवी से आठवीं के छात्रों को गणित पढ़ाते थे ৷

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अचानक उन्होंने चाय वाले से मुख़ातिब होकर कहा .. “साखर कमी टाकली का रे आज चहात ?”चाय वाले ने तुरंत हाथ से थोड़ी शक्कर उनकी चाय में डाली और घोलने के लिए एक चम्मच दे दिया । चम्मच से चीनी घोलते हुए दिनकर राव ने कहा “भानुदास भाऊ , जैसे चाय में साखर जरुरी होती है वैसे ही बाबासाहेब का संसद में होना जरुरी है । अगर नेहरु जी चाहते तो वे बाकायदा जनता द्वारा मुंबई से ही निर्वाचित होकर लोक सभा में आ जाते ৷ अभी बाबासाहेब राज्य सभा में हैं लेकिन शायद वे उससे संतुष्ट नहीं हैं ৷”

“उनके चाहने न चाहने से क्या होता है ? ” भानुदास जी ने आक्षेप लेते हुए कहा ৷ “फिर से कांग्रेस भंडारा से उनके विरुद्ध कोई कैंडिडेट खड़ा कर देगी जैसे मुंबई में किया था । अगर उनसे उनकी जमती तो फिर आजादी के बाद की अंतरिम सरकार से इस्तीफा कायको देते ? “


“ठीक कह रहे हो तुम ৷” दिनकर राव जी ने कहा “ मानते हैं कि उनके कांग्रेस से नीतियों को लेकर मतभेद हैं लेकिन नेहरू जी बाबासाहेब की विद्वता का बहुत सम्मान करते हैं ৷ इसीलिए उनको अपनी अंतरिम सरकार में लॉ मिनिस्टर बनाया था। “

“ तो फिर देश के पहले चुनाव में उनकी मदद भी करना था ना ।“ भानुदास जी की चाय ख़तम हो चुकी थी “ हा कप घेउन जा रे “ उन्होंने चाय वाले को इशारा किया । “वे तो एक्कावन के पार्लियामेंट के पहले इलेक्शन में ही फेडरेशन की सीट से ही मुंबई नार्थ सेन्ट्रल से चुनाव जीत जाते लेकिन पता नहीं कहाँ क्या गड़बड़ हो गई , नेहरू जी को उस समय कोई स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए था ना ?”


इसी बस्ती मे रहते थे दिनकर राव रहाटे 

दिनकर राव रहाटे जी ने उनकी बात का समर्थन किया “ हौ बरोबर बोले, तुम्हारी बात ठीक है फिर भी ऐसा हुआ । हमारे बाबासाहेब के पास अर्थशास्त्र व कानून की इतनी डिग्रियाँ हैं, एक तो कोलम्बिया यूनिवर्सिटी यू एस ए से डॉक्टरेट की और एक लंडन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ़ साइंस की और ग्रेस इन से बार एट ला यानि बैरिस्टर की है ৷ इसके अलावा भी कितना पढ़े लिखे हैं, कित्ती डिग्री है उनके पास वे फिर इतना महत्वपूर्ण संविधान उन्होंने गढ़ा है, कानून के विशेषज्ञ हैं, फिर भी राजनीति में वे आजकल के नेताओं से कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ ही गए ৷”

“होता है भाई होता है पॉलिटिक्स में सब होता है ।“ भानुदास जी हँसने लगे और विषय परिवर्तित करते हुए कहा ... “ अरे ! हुसेन नई आया आज ! उसके बिगेर चाय पिने का मजाच नई आता ।“ हुसैन रामटेके उनके शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे । “ क्या मालूम “ दिनकर राव ने कंधे उचकाते हुए कहा “ चलो, पान खाते क्या ? फिर दोनों मित्र पान की दुकान की ओर बढ़ गए ।



24 अप्रैल 2026

24. भंडारा : बेटा बात कर नहीं वे बेटावदकर हैं

रहाटे ,नईम और मैं  
बचपन के भूगोल में अपना मोहल्ला या पास पड़ोस वहीं तक होता था जहाँ तक हमारे नंगे पांवों की पहुँच होती थी । नगर पालिका द्वारा निर्धारित सीमा से इसका कोई लेना देना नहीं होता था । सीमाएँ भी केवल ज़मीन पर बनाई जा सकती थीं, मित्रता की ज़मीन पर अतीत वर्तमान और भविष्य किसी भी काल में कोई सीमा रेखा नहीं खींची जा सकती थी । दोस्तों के मकानों में कमरों की आतंरिक सज्जा अलग अलग होती थी लेकिन लोगों के अंतःकरण एक होते थे । वहाँ हमारी माँ जैसी एक माँ होती थी और पिता जैसे एक पिता , दोस्त के भाई बहन यानि अपने भाई बहन । यहाँ तक कि उनके मामा चाचा बुआ के साथ भी वही रिश्ता ।

शरद प्रमोद का यवतमाल का घर 

कुछ वर्षों पश्चात शरद और प्रमोद के पिताजी का तबादला यवतमाल हो गया था । कुछ दिनों तक तो उनकी ख़बर मिलती रही फिर मैं बाहर पढने चला गया और उनसे संपर्क टूट गया । लेकिन शीघ्र ही उनसे फिर मुलाकात हुई और यह दोस्ती का सिलसिला अब तक जारी है । शरद एयर फ़ोर्स में लांस नायक का कार्यकाल पूरा करने के बाद यांत्रिकी के व्याख्याता हो गए और प्रमोद यवतमाल के कॉलेज में सिविल इंजिनीअरिंग के व्याख्याता हो गए । वर्तमान में वे दोनों अपनी चौरासी वर्षीय माताजी, और परिवार के साथ यवतमाल में निवास कर रहे हैं ।

भंडारा का हमारा यह मोहल्ला जिसे हम अपने नन्हे पांवों से रोज़ ही नापते थे कुछ और आगे तक था । भोयर काका के बाद वाले ब्लॉक में देशमुख रहते थे । फिर उसी लाइन में आगे के मकानों में बम्बावाले, जोगलेकर और भी बहुत से लोग ৷ वहीं पर एक परिवार रहता था माँ उनका नाम ‘बेटा बात कर’ बताती थी । मैंने एक दिन माँ से पूछा “यह कैसा नाम है?” तो माँ ने कहा “यह उनका सरनेम है ।“ मुझे कई दिनों तक समझ में नहीं आया कि ऐसा सरनेम कैसे हो सकता है बाद में किसी ने बताया कि उनका सरनेम ‘बेटा बात कर’ नहीं बल्कि ‘बेटावदकर’ है , अर्थात वे बेटावद गाँव के रहने वाले हैं । महाराष्ट्र में अनेक सरनेम ऐसे ही बनते हैं जैसे
लता मंगेशकर 

तेंदूल गाँव के रहने वाले तेंदुलकर, मंगेशी गाँव के मंगेशकर, उज्जैन के उज्जैनकर, खरगोन के खरगोनकर अम्बावड़े गाँव के आंबेडकर ।मैंने मराठी उपनामों की जब खोज की तो मुझे अनेक तरह के रोचक सरनेम पता चले । यह सरनेम अजीब से लगते हैं लेकिन तय है कि कहीं न कहीं से इनका उद्भव हुआ ही होगा । इनकी उत्पत्ति के बारे में जानना बहुत रोचक है । गाँव के नाम पर सरनेम कैसे होते हैं यह तो हमने देखा । अब कुछ सरनेम प्राणियों के नाम पर देखें, जैसे सुअर के नाम पर डुकरे, चींटी के नाम पर मुंगी, बिल्ली के नाम पर मांजरेकर,कौवे के नाम पर कावले, बन्दर के नाम पर माकडे । कोल्हिया या सियार के नाम पर कोल्हे या लांडगे, गधे के नाम पर गाढवे , गाय जैसे मुँह वाले गायतोंडे और गायों के मालिक गायधनी, गोस्वामी, गोसावी और गोसाई । कुछ सरनेम शिकारियों जैसे होते हैं जिन्होंने बाघ मारा वे वाघमारे, जिन्होंने बाघ पकड़ा वे वाघधरे , फिर हत्तीमारे, तीतरमारे आदि भी हैं । संभव है इनके पूर्वजों ने इन प्राणियों का शिकार किया हो अथवा यह प्राणी अथवा वनस्पति इनके प्राचीन कबीले या कुनबे के टोटम या गण चिन्ह रहे हों ।

महाराष्ट्र में रंगों के नाम पर भी अनेक सरनेम मिलते हैं जैसे काले, गोरे,पिवले,हिरवे,निले आदि । वहीं धातुओं के नाम पर सरनेम हैं पितले, ताम्बे, लोखंडे,सोने,चांदे आदि । कुछ सरनेम शारीरिक स्थितियों पर भी होते हैं जैसे एकबोटे यानि एक ऊँगली वाले , खोकले यानि खांसने वाले,बोबड़े अर्थात जिनके दांत न हों , पोट दुखे जिनका पेट दुखता हो, पोटफाड़े बाप रे.. पेट फाड़ने वाले या बारह हाथ वाले बाराहाते और कानफाड़े,नाकतोड़े और डोईफोड़े जैसे हिंसक सरनेम भी ।

फिर हगे होते हैं तो चाटे भी, ढगे भी होते हैं और फुगे भी । संतानों की संख्या पर अष्टपुत्रे और दशपुत्रे या पाँच लड़कों वाले पाचपोरे । कुछ खरे होते हैं तो कुछ खोटे । मीठा बोलने वाले गोडबोले या गोडे तथा कडवा बोलने वाले कडू । करमरकर को हम लोग अंग्रेजी में बोलते थे ‘डू डाय डू’ । खाने की वस्तुओं पर भी कई सरनेम होते हैं जैसे दहीवड़े, भाजीपाले, खोबरे,साखरे आदि । अब कुछ खाते हैं तो कुछ नखाते हैं । कुछ लेले है तो कुछ नेने यानि ले जा ।

रुई के व्यवसाय वाले कापसे या रुइकर कहलाये और कम्बल वाले काम्बले । पेशवा के यहाँ विभिन्न पदों पर काम करने वाले अर्जनवीस,फड़नवीस,महाजन,राजे,कुलकर्णी,पाटील,पूजा करने वाले पुजारी, कपड़ा सिलने वाले शिम्पी और सुनार यानि सोनार, जौहरी और रत्नपारखी, बांस का काम वाले बंसोड, लकड़ी का काम करने वाले सुतार , दूध बेचने वाले गवली, बगीचे वाले माली और बर्तन बनने वाले मतकरी, भाला चलाने वाले भालधरे या भालेराव, ठेकेदार यानि मुकादम आदि । इनके अलावा सूबेदार है, देशपांडे और देशमुख हैं। उसी तरह बुद्धिमान शहाणे या सहस्त्रबुद्धे हो गए, स्टेनोग्राफर टिपनिस हुए और वेद पढ़ने वाले वेदपाठक ।
यह मजेदार जानकारी आपको कैसी लगी जरूर बताईएगा

आपका शरद कोकास