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16 नवंबर 2009

हम तो मनोरंजन के लिये सिनेमा देखते हैं यह सब देखना है तो ... पैसे क्यों खर्च करें


                 
           हम फिल्में क्यों देखते हैं ?


हम में से नब्बे प्रतिशत लोग इस प्रश्न का उत्तर देंगे “ मनोरंजन के लिये “ । फिल्म बनाने वाले भी सरकार की तरह जनता की पसन्द को ध्यान में रख कर और अपनी अक्ल से उनकी समझ का अन्दाज़ लगाकर  फिल्में बनाते हैं । जो लोग जनता की नब्ज़ पहचानते हैं उनकी फिल्में सफल होती हैं । हाँलाकि अब यह फार्मूला भी काम नहीं कर रहा है और एक्ज़िट पोल की तरह निर्माताओं के दावे ग़लत साबित हो रहे हैं । इसीलिये रियलिटी शो में कलाकारों को प्रस्तुत कर उनसे फिल्म का प्रमोशन करवाया जा रहा है ताकि दर्शक किसी तरह उनकी फिल्में देखने आये । लेकिन इस बीच दर्शकों की एक नई समझ विकसित हुई है और वे बेसिर-पैर की फिल्मों को नकार रहे हैं इनमें न केवल भूत-प्रेत,अपराध, फूहड़ हास्य ,सस्ते रोमांस आदि की फिल्में है बल्कि दर्शक तकनीकी दृष्टि से कमज़ोर फिल्मों को भी नापसन्द कर रहा है । इसके बावज़ूद निर्माता करोड़ों रुपये खर्च कर ऐसी निरर्थक फिल्में बना रहे हैं ।

            वहीं दूसरी ओर ऐसी फिल्में भी बन रही हैं जिनमें जनता से जुड़े हुए विषयों पर सार्थक सम्वाद है ,जिनमें पर्यावरण प्रदूषण से उपजी समस्याओं पर चिंता है , निजीकरण और आर्थिक मन्दी से उपजे हालात पर ध्यान आकर्षित करने का प्रयास है , कारखानों में छँटनी से उपजी बेरोजगारी और किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या के बाद समाज का नज़रिया है । सिर पर मैला ढोने वाले सफाई कामगारों के हालात पर एक नज़र है , बच्चों के मनोविज्ञान पर बात है ,धर्म और समाज के रिश्तों की पड़ताल है ।
लेकिन फिर वही मूल प्रश्न .. हम तो मनोरंजन के लिये सिनेमा देखते हैं यह सब देखना है तो ... पैसे क्यों खर्च करें ?  पाँच –छह सौ की टिकट हम यह सब देखने के लिये थोड़े ही खरीदते हैं ? हमें देश और समाज की चिंता है लेकिन उसके बारे में हम अन्य माध्यमों से जान लेंगे ..सिनेमा से ही क्यों जानें ?
लेकिन समाज की चिंता करने वाले फिल्मकार इससे निराश नहीं है वे अपनी गाँठ का पैसा लगाकर ऐसी फिल्में बना रहे हैं और बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य या लोकप्रियता की फिक्र किये बगैर अपने काम में लगे हैं । शायद इसीलिये अब ज़रूरत है ऐसी फिल्में दर्शकों तक पहुँचाई जायें । इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर विगत 13,14,15 नवम्बर को भिलाई में जन संस्कृति मंच द्वारा “ मुक्तिबोध स्मृति फिल्म एवं कला उत्सव “ का आयोजन किया गया । इस उत्सव में प्रथम दिन उद्घाटन के अवसर पर हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक डॉ.मैनेजर पाण्डेय उपस्थित थे । .मैनेजर पाण्डेय ने मुक्तिबोध की पुस्तक “भारत इतिहास और संस्कृति “ पर 1962 में लगे प्रतिबन्ध के बारे में विस्तार से बताया । तत्पश्चात शाम को कवि विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल का कविता पाठ हुआ । इस अवसर पर चित्रों व कविता पोस्टर्स की प्रदर्शनी भी लगाई गई तथा कमलेश्वर साहू के कविता संग्रह "पानी का पता पूछ रही थी मछली "का विमोचन किया गया । 
            फिल्मोत्सव के दूसरे दिन फिल्मों का प्रदर्शन किया गया । इनमें चार्ली चैपलीन की मॉडर्न टाइम्स, गीतांजली राव की ‘प्रिंटेड रेनबो ‘ ,विनोद राजा की ‘महुआ  मेववाज़ ‘ इटली के विक्टोरिया डिसिका की ‘बाइसिकल थीफ ‘, राजेश चक्रवर्ती की ‘हिप हिप हुर्रे ‘ इंग्लैंड के रैम्डोल की सीरीज़ ‘ ओपन अ डोर ‘ इरान के माजीद मजीदी की एक नेत्रहीन बालक पर बनी फिल्म ‘ कलर ऑफ पैराडाइज़ “ ,मिशेल टी क्लेरे की फिल्म ब्लड एंड ऑयल , सूर्यशंकर दास की नियमगिरी के जंगलों पर बनी फिल्म ‘ नियामराजा का विलाप “ अमुधन आर .पी की सिर पर मैला ढोने वाली स्त्री पर बनी फिल्म “ पी (शिट) “ तुषार वाघेला की आत्महत्या करने वाले किसानों पर बनी फिल्म “फैंटम ऑफ अ फर्टाइल लैंड “का प्रदर्शन किया गया ।
इस फिल्म उत्सव की विशेष बात यह कि इसमें अंतिम दिन प्रसिद्ध फिल्म मेकर व निर्देशक एम.एस.सथ्यु की विभाजन के बाद मुस्लिमों की स्थिति पर बनी फिल्म “गर्म हवा” का प्रदर्शन किया गया । इस फिल्म के प्रदर्शन के दौरान श्री सथ्यु स्वयं उपस्थित रहे और उन्होने दर्शकों के प्रश्न के उत्तर भी दिये ।
इस फिल्म उत्सव मे प्रदर्शित फिल्मों पर अगामी पोस्ट में एक एक कर नज़र डालने की कोशिश करूँगा ताकि आप सभी को इन की विषय-वस्तु से परिचय कराते हुए वर्तमान समय में इनकी ज़रूरत व उपयोगिता व महत्व के बारे में कुछ बतला सकूँ व आपके विचार जान सकूँ ।
फिलहाल हम इस प्रश्न पर ही चर्चा करें ..हम फिल्में क्यों देखते हैं और प्रतिरोध का सिनेमा क्यों ज़रूरी है और ये फिल्मकार क्यों बनाते हैं इस तरह की फिल्में ?
(चित्र 1.कवि विनोद कुमार शुक्ल ,2 कवि वीरेन डंगवाल ,विनोद जी व मंगलेश डबराल 3 उद्घाटन चित्र- रमेश मुक्तिबोध.डॉ.मैनेजर पाण्डेय,मेघनाथ जी, मिता दास व मीना शर्मा 4 जन संस्कृति मंच के सियाराम शर्मा व  डॉ.मैनेजर पाण्डेय  व दर्शक 5.शरद कोकास व डॉ.मैनेजर पाण्डेय 6. "गर्म हवा " के निर्देशक एम.एस.सथ्यु )

                                                                                     आपका -शरद कोकास             

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