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11 मई 2026

33. भंडारा : आंबेडकर की पराजय सदी का एक आश्चर्य

सन उन्नीस सौ चौवन के मई माह की दो तारीख का वह रविवार फुर्सत के साथ अपना ताल मेल नहीं बिठा पा रहा था । यह मतदान का दिन था जो भंडारा के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था । भंडारा संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में मतदान के लिए  दो मई और सात मई यह दो तिथियाँ निर्धारित की गई थीं । चुनाव की व्यवस्था हेतु  समस्त शासकीय अमला तत्पर था, पोलिंग पार्टियाँ दूरस्थ इलाकों की ओर रवाना हो चुकी थीं । पुरानी डॉज गाड़ियों और बैलगाड़ियों से चुनाव सामग्री पहुँचाई जा  चुकी थीं । जंगलों के भीतर बसे वे गाँव जहाँ रास्ते रास्ते में ही दम तोड़ देते थे वहाँ भी चुनाव संपन्न करवाने वाले कर्मचारी अपने सर पर भी लोहे की पेटियां लादकर पहुँच चुके थे  । कठिनाइयों और असुविधाओं के बीच भी शासकीय अमले के यह लोग बहुत उत्साहित और निश्चिन्त थे, आखिर एक चुनाव संपन्न करवाने का अनुभव उनके पास था ।

चुनाव के दिन लोगों का उत्साह आसमान छू रहा था । ढाई साल बाद ही जनता को पुनः वोट डालने का अवसर प्राप्त हुआ था । दोनों तिथियों में सम्पूर्ण संसदीय क्षेत्र में आशा के विपरीत मतदान हुआ और मुहर लगे हुए बैलेट पेपर लोहे की मजबूत मतपेटियों में बंद हो गए । एक सप्ताह बाद भंडारा मुख्यालय में मतगणना प्रारंभ हुई । फिर आई मई माह की पंद्रह तारीख । मतगणना स्थल के बाहर दूर दूर तक लाउडस्पीकर लगे थे जिनसे हर राउंड के बाद घोषणा की जा रही थी । दूरस्थ गांवों में चौपालों पर भीड़ इकठ्ठा थी और लोग आल इंडिया रेडियो के नागपुर केंद्र से आती हवा में घुली ध्वनि तरंगों को ताम्बे के एरियल से जुड़े वाल्व वाले रेडियो सेट में पकड़कर सुनने की कोशिश कर रहे थे । जहाँ यह सुविधा नहीं थी वहाँ अगले दिन आने वाले अखबार या किसी हरकारे की राह देखी जा रही थी ।

अंततः चुनाव परिणाम की अंतिम घोषणा हुई । कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव कार्यालयों में लक्ष्मी बम फोड़े जाने लगे, पेढ़े बाँटे जाने लगे  । यहाँ हवा में उड़ता हुआ गुलाल रौशनियों को गुलाबी आभा प्रदान कर रहा था लेकिन वहीं कहीं सदियों से पीड़ित शोषित जनता की अँधेरी बस्तियों में छाया अँधेरा और गहरा गया था । उनके उजाले की एकमात्र आस बाबासाहेब डॉ.भीमराव आम्बेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से चुनाव हार गए थे ।

ज़िला कार्यालय की इमारत पर लगे लाउड स्पीकर से उस दिन की सबसे दुखद ख़बर गूँज रही थी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी डॉ.बी. आर.आंबेडकर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी भाऊराव बोरकर से आठ हज़ार वोटों से चुनाव हार चुके हैं यह चुनाव परिणाम सबकी आशाओं के विपरीत था आरक्षित सीट से कांग्रेस के भाऊराव बोरकर को एक लाख इकतालीस हज़ार एक सौ चौसठ वोट मिले थे वहीं बाबासाहेब के वोटों की संख्या थी एक लाख बतीस हज़ार चार सौ त्र्यासी । मात्र आठ हज़ार छह सौ इक्यासी वोटों से उनकी हार हुई थी । जिन मतपत्रों पर उनके नाम के आगे मुहर नहीं लगी थे वे मतपत्र किनके थे इस बात को सब जानते थे ।

वहीं सामान्य सीट के परिणाम भी घोषित हो चुके थे । यहाँ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता एक लाख उनन्चास हज़ार छह सौ छत्तीस वोट पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के पूनमचंद राका पर विजय प्राप्त कर चुके थे । राका को एक लाख चोवीस हज़ार दो सौ सडसठ मत प्राप्त हुए थे । इस तरह अशोक मेहता पच्चीस हज़ार वोटो से यह चुनाव जीत गए थे । अपने प्रतीक रूप में झोपड़ी जीत गई थी लेकिन झोपड़ियों में रहने वाले दबे,कुचले,उपेक्षित लोग हार गए थे । 

भंडारा के निवासियों के लिए बाबासाहेब आंबेडकर के हार जाने की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन सत्य सर्वविदित था । दिनकर राव के घर में सारे कार्यकर्त्ता इकठ्ठे हुए और बाबासाहेब की हार के कारणों का विश्लेषण किया गया जैसा कि भंडारा के वरिष्ठ कवि पत्रकार अमृत बंसोड और दिनकर राव के पुत्र सुमंत बताते हैं बाबासाहेब के साथ धोखा हुआ था मुंबई की कहानी फिर यहाँ दोहराइ गई थी । बाबासाहेब ने मनरो स्कूल के मैदान में अपने सहयोगियों से एक वोट अशोक मेहता को देने की सार्वजानिक अपील की थी,उनके आग्रह पर  मतदाताओं ने ऐसा किया भी इसलिए उन्हें डेढ़ लाख वोट मिले लेकिन अशोक मेहता के सपोर्टर्स ने सामान्य सीट के लिए एक वोट तो अशोक मेहता को दिया लेकिन आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब को अपना वोट नहीं दिया । फलस्वरूप कांग्रेस के उम्मीदवार भाऊराव बोरकर चुनकर आ गए अन्यथा बाबासाहेब यह चुनाव अवश्य जीत जाते आखिर आठ  हज़ार वोटों का अंतर क्या मायने रखता है कांग्रेस के बोरकर भी एस सी कम्युनिटी से आते थे , इस आधार पर भी बहुत से वोट उन्हें मिले ।

मध्यप्रांत के इस महत्वपूर्ण ज़िले भंडारा की राजनीति में अगले कुछ सालों में अनेक परिवर्तन हुए बाबासाहेब के साथी नाशिक राव तिरपुडे जो दलित वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ते हुए सन अड़तालीस में जेल गए थे,बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए आचार्य कृपलानी के सहयोगी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव अशोक मेहता भी समाजवादी से कांग्रेसी हो गए और दो बैलों की  जोड़ी चुनाव चिन्ह पर उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर भंडारा से ही आगामी चुनाव लड़ा बाबासाहेब के सिपहसालार दिनकर राव रहाटे अपना सब कुछ त्यागकर अंत तक  पीड़ित शोषित वर्ग की सेवा में लगे रहे, साहूकार के पास घर गिरवी रखकर कर्ज लेकर बच्चों का पालन पोषण करते रहे उनकी आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि वे कर्ज पटा पाते , अतः उन्नीस सौ पचहत्तर में उनका वह घर भी कर्ज की भेंट चढ़ गया

भाऊराव बोरकर भी सत्ता का सुख अधिक दिनों तक नहीं भोग सके और छह माह पश्चात एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया उसके एक साल बाद उन्नीस सौ पचपन में भंडारा में पुनः उपचुनाव हुआ जिसमे सहानुभूति लहर के कारण भाऊराव बोरकर की पत्नी, कांग्रेस की प्रत्याशी अनुसूया बोरकर विजयी रही बाबासाहेब तब तक अपने नए मिशन में लग चुके थे और जातिवादी ताकतों के खिलाफ़ दलित पीड़ित शोषित जनता को लामबंद कर रहे थे अंततः उन्नीस सौ छप्पन के अक्तूबर माह की चौदह  तारीख को अपने सात लाख अनुयायियों के साथ नागपुर की दीक्षा भूमि पर एक भव्य समारोह में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया  

अक्टूबर 56 मे नागपूर मे बाबासाहेब 

स्वास्थ्य उनका ठीक नहीं चल रहा था, जीवन भर के संघर्ष को कहीं न कहीं विराम लगना ही था । दो माह पश्चात ही छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को उनकी अंतिम सांस के साथ उनके जीवन का यह सफ़र समाप्त हुआ   

चैत्य भूमि नागपूर 

बाबासाहेब और भंडारा का यह सम्बन्ध बहुत कम लोगों को ज्ञात है लेकिन एक समय था जब भंडारा इसी बात के लिए प्रसिद्ध हुआ था जब लोग चेहरे पर आश्चर्य का भाव लाकर पूछते थे “अरे ! क्या यह वही भंडारा है जिसकी जनता ने बाबासाहेब को चुनाव में हरा दिया था ?”  लेकिन वास्तविकता यह है कि बाबासाहेब को जनता ने नहीं इस राजनीति की कुटिल चालों ने हराया था भंडारा में वे मात्र आठ हज़ार वोटो से हारे थे जबकि उनके अपने कार्यक्षेत्र मुंबई में यह संख्या साढ़े चौदह हज़ार थी । यह तथ्य ध्यान में रखा जाना चाहिए । चुनाव के बाद बाबासाहेब ने सभी कार्यकर्ताओं का धन्यवाद दिया और मुंबई के लिए रवाना हो गए

 

बाबासाहेब का समाधि स्थल मुंबई 

भंडारा से विदा लेते हुए बाबासाहेब ने उन्हें दोनों समय खाने का डबा,चाय नाश्ता पहुँचाने वाली युवती मालती बाई मेंढे के घर के सामने कार रुकवाई मालती अपनी आँखों में आँसू लिए हाथ जोड़े चुपचाप खड़ी थी बाबासाहेब कार से उतरे और मालती के सर पर हाथ रखकर कहा “ बेटी, तुमने मेरा बहुत ख्याल रखा, तुम जीवन में जो कुछ भी बनना चाहती हो मुझे बताओ, मैं तुम्हारी मदद करूँगा ?” मालती बाई ने कहा “ डॉक्टर बनना चाहती हूँ बाबासाहेब   डॉ आंबेडकर ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया और विदा ली आगामी वर्षों में उनके सहयोग से मालती बाई ने मेडिकल की उच्च शिक्षा ग्रहण की बाद में दिनकर राव रहाटे के परिवार में ही उनके छोटे भाई से उनका विवाह संपन्न हुआ और वे महाराष्ट्र में डॉक्टर मालती ताई रहाटे के रूप में प्रसिद्ध हुईं

 साभार - मित्र सुमंत रहाटे और नागपूर के पत्रकार अमृत बनसोड जी 

शरद कोकास 

10 मई 2026

32. भंडारा : बाबासाहेब ने किसके लिए कहा था "यह अशोक नहीं सम्राट अशोक हैं"



भाषण देते हुए डॉ आंबेडकर 

कल मैंने आपको बताया था कि मुंबई से चुनाव हार जाने के पश्चात किस तरह बाबासाहेब अम्बेडकर को 1954 मे पुनः भंडारा लोकसभा से उपचुनाव मे शामिल होकर दिल्ली मे लोकसभा मे जाने का अवसर मिला। चुनाव के पहले भंडारा मे किस तरह उनके चुनाव प्रचार की तैयारी चल रही थी , कहाँ दफ्तर बनाया गया था , कहाँ चुनावी सभा हुई थी , इस बात को जानिए विस्तार से इस पोस्ट मे । 
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता 
भंडारा के नौतलाव मैदान मे मंच सज चुका था , हजारों लोगों की भीड़ बाबासाहेब को सुनने , उन्हे देखने के लिए आई थी । आखिर वे उस दौर के नायक थे जिन्होंने लाखों लोगों को जाति के आधार पर होने वाले शोषण से मुक्त किया था , जिन्होंने संविधान निर्माण मे अपनी महती भूमिका निभाई थी 

बाबासाहेब बोलने के लिए खड़े हुए । करतल ध्वनि से उनका स्वागत हुआ । उन्होंने जनता का अभिवादन स्वीकार किया । वे जनता के मन की बात जानते थे । भंडारा के इतिहास से भी वे वाकिफ़ थे । जनता के दुखों पर मरहम लगाते हुए उन्होंने अपनी बात सबके सामने रखी । 

उन्होंने स्पष्ट किया शिड्फेयूल कास्डट फेडरेशन का एक ही उद्देश्य है जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त करना, युवाओं के लिए रोजगार की और आम जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का समुचित प्रबंध करना ।यद्यपि उन  दिनों सभी पार्टियों के घोषणा पत्र में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ यही बातें हुआ करती थीं । 

देखिए कितने उदारमना थे बाबासाहेब 

मुख्य मुख्य बातें कहने के बाद उन्होंने जनता के मन में गाँठ की तरह बंधी हुई वोट के बहिष्कार की बात को ध्यान में रखते हुए कहा 

“यद्यपि मुंबई में हमने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से धोखा खाया है लेकिन हम किसी को धोखा देने के बारे में सोच भी नहीं सकते ।“ 

लोगों के अशोक मेहता को वोट न देने की बात पर उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो कुछ नहीं कहा लेकिन परोक्ष रूप से इतना अवश्य कहा कि “हमने संविधान में जनतांत्रिक चुनाव की यह व्यवस्था की है । यह भी कहा है कि हमारा वोट बहुत महत्वपूर्ण है, यह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए ।“ 

भंडारा की जनता उनकी अपनी थी, यह उनका अपना परिवार था, उनके दुःख उनके अपने थे । उनके पूर्वजों ने भी वही अपमान और पीड़ा सही थी । जनता उनकी बात के स्थूल अर्थ को समझ नहीं पाई अतः अवसर देखकर उन्होंने पत्र का उल्लेख करना आवश्यक समझा “ मुझे सुचेता कृपलानी का पत्र प्राप्त हुआ है जिसमे उन्होंने भंडारा की जनता से सहयोग की अपेक्षा की है ।“ 

सुचेता कृपलानी 
बाबासाहेब स्वयं विद्वान थे और अशोक मेहता की विद्वता का सम्मान करते थे । वे जानते थे कि सम्प्रति सामान्य सीट से भंडारा से चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस के उम्मीदवार पूनमचंद राका से अशोक मेहता कहीं बेहतर हैं । उन्होंने भरी सभा में एक रूपक गढ़ते हुए कहा कि 

“भंडारा की इस सामान्य सीट से चुनाव लड़ने वाले अशोक समझ लीजिये हमारे लिए सम्राट अशोक हैं । बेहतर होगा कि हम अपना एक वोट व्यर्थ न गवाएँ ।“ 

महाराष्ट्र के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं उस समय नागपुर से निकलने वाले प्रमुख अखबार ‘तरुण भारत‘ ने इक्कीस अप्रेल चौवन की इस सभा में दिया गया बाबासाहेब का यह व्याख्यान विस्तार से  प्रकाशित किया था । 

अब जानिए उन अनजान लोगों के नाम जिन्होंने बाबासाहेब को चुनाव मे प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग दिया ( यह जानकारी मुझे बाबासाहेब के चुनाव प्रभारी दीनदयाल रहाटे के पुत्र और मेरे मित्र सुमंत रहाटे,अमृत बंसोड, और भंडारा के अन्य वरिष्ठ लोगों  से प्राप्त हुई है )

बाबासाहेब का यह व्याख्यान भंडारा में उनके पक्ष में वातावरण निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था  ৷ फेडरेशन के अध्यक्ष दिनकर राव के मित्र भानुदास बंसोड़  उनके सक्रिय सहयोगी थे । हुसैन रामटेके उनकी रोज़ के मंडली के सदस्य थे । हुसैन रामटेके सिर्फ नाम से ही हुसैन थे लेकिन  मुस्लिम समुदाय के दलित समाज में भी उनकी काफी पैठ थी ৷ 

भोजराज रामटेके सी पी आई के कार्यकर्त्ता थे और गोंदिया में रहते थे लेकिन वे भी बाबासाहेब का चुनाव प्रचार करने के लिए आ गए थे ৷ 

भंडारा में ही शुक्रवारी मोहल्ले में रहने वाले मेंढे पहलवान अपने अखाड़े के साथियों के साथ उनका सहयोग करने आ गए थे ৷ 

स्टेशन के निकट वरठी के रहने वाले नारायण राव फुले उनके सहयोगी थे वहीं भंडारा के श्यामचरण नंदागौली ने युवाओं की एक टीम खड़ी कर ली थी ৷ 

अ.शि. रंगारी और करडी के रहने वाले शेंडे बाबू भी दल बल के साथ उपस्थित हो गए ৷ 

यह ऐसा उपचुनाव था जिसमे जवाहर लाल नेहरू को भी आना पड़ा 

सामान्य सीट के लिए यहीं पर कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रचार भी ज़ोरों पर था । देश के प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की थी अतः वह चाहती थी कि भंडारा से उनकी सीट बरकरार रहे फिर इस बार तो आम्बेडकर यहाँ से चुनाव लड़ रहे थे । कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरु को भी यहाँ आना पड़ा । आंबेडकर की सभा की तरह भंडारा के निकट गोंदिया में नेहरू की विशाल सभा हुई जिसमे देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना का क्रियान्वयन और कृषि, औद्योगिक व वाणिज्यिक विकास के मुद्दे दोहराए गए । 

हाथी चुनाव चिन्ह बाबासाहेब को सबसे पहली बार मिला था 

बाबासाहेब का चुनाव चिन्ह ‘हाथी’ भंडारा की दीवारों पर दिखाई देने लगा था ৷ बच्चे अपनी कमीज़ की जेब पर हाथी छाप,बैल जोड़ी छाप,झोपडी छाप के बिल्ले  लगाकर लाउड स्पीकर लगे रिक्शों के पीछे दौड़ते और फेंके गए बिल्ले और पर्चे बटोरते ৷ आज की तारीख  में हाथी यह चुनाव चिन्ह बाबासाहेब के आदर्शों पर चलने वाली  बहुजन समाज पार्टी के पास है । यह चुनाव चिन्ह उस समय उन दलित, शोषित, पीड़ित लोगों को उनकी ताकत का अहसास दिलाता था । 

कांग्रेस का चुनाव चिन्ह उन दिनों दो बैलों की जोड़ी था जिस पर 1952 से 1969 तक कॉंग्रेस चुनाव लड़ती रही जो विभाजन के बाद 1977 मे बाद में गाय बछड़ा हुआ और 1977 मे हाथ या पंजे पर आकर स्थिर हो गया । 

इस चुनाव चिन्ह पर कांग्रेस के दो उम्मीदवार दो वर्ग एक सामान्य एक आरक्षित से चुनाव लड़ रहे थे । सामान्य वर्ग से अशोक मेहता की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को झोपड़ी निशान मिला था । 

बाबासाहेब के भंडारा के कार्यकर्ताओं की जन सभाओं में भीड़ उमड़ने लगी थी ৷ वे सभी आसपास के क्षेत्रों में दौरा करने लगे । भंडारा के मेरे मित्र और दिनकर राव के भतीजे भगवान रहाटे बताते हैं कि उनकी माँ सुभद्रा बाई अपनी तमाम सखी सहेलियों  के साथ उनके भाषण सुनने जाती थी ৷ भगवान उस समय माँ के पेट में थे और दिनकर राव के बेटे सुमंत का जन्म नहीं हुआ था ৷ पूरे भंडारा संसदीय क्षेत्र में जाने कितने स्थानों पर सभाएँ हुई और लोगों ने संकल्प लिया, चाहे जो हो इस बार बाबासाहेब को जिताना ही है । यह चुनाव उनके लिए आत्मसम्मान के प्रश्न के अलावा एक चुनौती भी था ।

लेकिन बाबासाहेब के दुश्मन यहाँ भी थे 

भंडारा के लोग जात पात,भेदभाव, ऊँच नीच सब भूलकर बाबासाहेब का तन मन धन से साथ दे रहे थे । लेकिन भंडारा का एक बहुत बड़ा भद्र वर्ग उनके साथ नहीं था ৷ यह वह वर्ग था जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही अपने आपको अंग्रेजों का उत्तराधिकारी घोषित कर चुका था ৷ जाति और वर्ण के संस्कार जिसकी नसों में ज़हर की तरह फ़ैल चुके थे जो अब भी बाहरी इलाके में बनी इन बस्तियों में रहने वालों को हिकारत की नज़रों से देखता था ৷ बाबासाहेब की असली लड़ाई व्यवस्था के साथ साथ इन लोगों से भी थी ৷ लेकिन वे संवैधानिक रूप से चुनाव जीतकर एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी यह लड़ाई लड़ना चाहते थे ৷ आखिर संविधान में यह व्यवस्था उन्होंने ही तो की थी ৷ 

इसके अतिरिक्त भंडारा में अपने आप को परंपरागत कांग्रेसी मानने वाला भी एक वर्ग था जो सैद्धांतिक रूप से बाबासाहेब को पसंद करता था, उनकी विद्वता का सम्मान करता था और स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये गए उनके कार्यों की सराहना भी करता था । इनमे गाँधी और नेहरू के अनुयायियों के साथ साथ अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे । 

यह सभी कांग्रेसजन बाबासाहेब को चाहते थे लेकिन उनका कहना यही था कि अगर वे कांग्रेस से चुनाव लड़ते तो वे उनका साथ अवश्य देते ।

विशेष बात यह कि कॉंग्रेस का विरोधी होने के कारण इस चुनाव मे भारतीय जनसंघ भी उनका सहयोगी था । 

यह एक ऐसा स्वप्न था जिसके घटित होने की संभावना प्रारंभ में ही दम तोड़ चुकी थी ।

( शेष अगले अंक मे, यह इतिहास आपको कैसा लगा अवश्य बताएं  )

आपका 

शरद कोकास 


6 मई 2026

30. भंडारा : बाबासाहेब के हाथी ,बैल जोड़ी और झोपडी में टक्कर

सुमन बाई यशोदा बाई (AI)
“अगो बाई, बाबासाहेबा सारखा येवढ़ा मोठा मानूस आमच्या भंडारा हून यीलेक्शन लढून राह्यला आहे ?“ बाबासाहेब आम्बेडकर के भंडारा से चुनाव लड़ने की बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए यशोदा बाई ने अपनी पड़ोसन सुमन से पूछा । “काऊन ? “ सुमन बाई ने जवाब दिया “ आमचा भंडारयात काई कमी आहे का ?“ सुमन बाई का कहना सही था, भंडारा में ऐसी कोई कमी नहीं थी जिसकी वज़ह से उपचुनाव में रिक्त हुई इस सीट पर बाबासाहेब चुनाव न लड़ते ।
 
बाबासाहेब 1951-52 मुंबई चुनाव हार चुके थे 

भंडारा की गलियों में उन दिनों एक ही शोर था .. आमचे बाबासाहेब .. हमारे बाबासाहेब भंडारा से चुनाव लड़ रहे हैं ৷ जिलाधीश कार्यालय में चुनाव के लिए प्रत्याशियों द्वारा नामांकन भरे जा चुके थे ৷ देश के प्रथम चुनावों में मुंबई की उत्तर मध्य सीट से चुनाव में बाबासाहेब द्वारा सफलता न प्राप्त करने को भंडारा की जनता ने बहुत गंभीरता से लिया था और वे ठान कर बैठे थे कि कुछ भी हो बाबासाहेब को भंडारा से जिताना ही है ৷ भंडारा के सुर्ख़ियों में आने का और मुंबई से भी आगे निकल जाने का यह स्वर्णिम अवसर था ৷ 1954 मे  यह अवसर उपचुनाव के रूप में अनायास ही उनके सामने आ गया । 

उन दिनों सामान्य व आरक्षित दो सीटें होती थीं      

उन्नीस सौ इक्यावन-बावन के प्रथम लोकसभा चुनाव में मध्य प्रांत की भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से सामान्य सीट के लिए से कांग्रेस के चतुर्भुज जसानी ने ज्वालाप्रसाद दुबे को हराकर संसद का चुनाव जीता था वहीं आरक्षित सीट से कांग्रेस के तुलाराम साखरे निर्वाचित हुए थे । 

चुनाव परिणाम आते ही विपक्षियों ने जसानी के निर्वाचन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए उन पर मुक़दमा कर दिया । ऐसा क्यों हुआ इसका कारण बताता हूँ । उन दिनों भंडारा में मूलजी भाई बीड़ी कारखाना बहुत प्रसिद्ध था । इस कारखाने से शासकीय अनुबंध के अनुसार मिलिट्री में बीड़ी सप्लाई होती थी । चतुर्भुज जसानी इस कंपनी में भागीदार थे । चूँकी यह एक लाभ का पद था इसलिए इस पर रहते हुए उन्हें चुनाव लड़ने की पात्रता ही नहीं थी । अतः इस आधार पर कोर्ट ने विपक्षियों की याचिका पर कार्यवाही करते हुए उनका निर्वाचन अवैध घोषित कर दिया ।

1951-52 प्रथम लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीट के प्रत्याशी  

यहाँ से सांसद पद के लिये शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी के रूप में नागपुर के सखाराम मेश्राम ने नामांकन भरा था । 

कांग्रेस कैंडिडेट के रूप में तुलाराम साखरे के अलावा गंगाराम ठवरे ने भी फॉर्म भरा था, 

वहीं गोंदिया के हेमराज खांडेकर ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में फॉर्म भरा था यद्यपि वो कांग्रेस के पक्ष में ही थे । 

कांग्रेस ठवरे को अपना प्रत्याशी घोषित करने वाली थी लेकिन ठवरे का नामांकन रद्द हो गया इसलिए कांगेस ने तुलाराम साखरे को अपना प्रत्याशी घोषित किया । 

ठवरे भंडारा के ही थे और साखरे नागपुर से आये थे लेकिन अंततः आरक्षित सीट से कांग्रेस के तुलाराम साखरे ने एस सी फेडरेशन के सखाराम मेश्राम को हराकर यह चुनाव जीता ।

ठवरे का नामांकन क्यों रद्द हुआ पता है ?

ठवरे के नामांकन रद्द होने के पीछे यह कारण था कि उन्होंने स्वयं को श्यिडूल्ड कास्ट घोषित कर फॉर्म भरा था जबकि वे महानुभाव पंथ से आते थे । यह पंथ जात-पात नहीं मानता था । चुनाव के बाद ठवरे ने इस बात को लेकर चैलेंज किया कि पंथ भले जात-पात न माने लेकिन जाति तो उनकी एस सी है । कोर्ट ने विभिन्न पक्षों पर विचार करने के पश्चात उनके पक्ष में निर्णय दिया और उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकारी माना लेकिन तब तक चुनाव सम्पन्न हो चुका था, और ठवरे चुनाव नहीं लड़ पाए थे अतः इस सीट का भी चुनाव रद्द करने की बाध्यता उत्पन्न हो गई । 

इस तरह उन्नीस सौ चौवन में भंडारा से उपचुनाव होना तय हुआ । मतदान हेतु दो मई और सात मई की तारीखें तय की गईं ।

अब इस उपचुनाव में तुरत फुरत में बाबासाहेब के लिए चुनाव कार्यालय की तलाश हुई ৷ भंडारा के ही एक समृद्ध निवासी श्री कोलते जी ने वरठी जाने वाली रोड पर बना अपना बंगला बाबासाहेब को चुनाव कार्यालय हेतु प्रदान कर दिया ৷ चुनाव प्रचार का प्रभार शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के जिला अध्यक्ष और बाबासाहेब के अनुयायी दिनकर राव रहाटे को सौंपा गया ৷ उस समय तक दिनकर राव अपनी शिक्षक की नौकरी से त्यागपत्र दे चुके थे और अपना पूरा समय और जीवन पार्टी को समर्पित करने का प्रण कर चुके थे ৷ वे पार्टी के इतने निष्ठावान सदस्य थे कि आन्दोलन करने के आरोप में सन अड़तालीस में डेढ़ वर्ष जेल में भी बिताकर भी आ चुके थे ৷

वरठी जाने वाली मेन रोड पर ठक्कर अम्बालाल की बड़े से बुलंद दरवाज़े वाली खँडहर नुमा हवेली के निकट दिनकर राव का मकान था ৷ उनके घर के आसपास की पूरी बस्ती निम्न वर्गीय मजदूरों कामगारों की बस्ती थी। इस बस्ती के पीछे टेकडी की ढलान के बाद जोगी तलाव और उसका मैदान शुरू होता था । अप्रेल का महीना था ৷ गर्मियों का आगमन हो रहा था दिनकर राव के घर के सामने सड़क पर एक पंडाल लगा दिया गया और उनकी पत्नी भागीरथा बाई तमाम कार्यकर्ताओं के लिए चाय नाश्ते और भोजन का प्रबंध करने में लग गई ৷ घर की कोई आमदनी तो थी नहीं, कोई गेहूँ पहुँचा देता कोई चावल ৷ दाल, सब्जी, तेल मसाले, दूध आदि का भी प्रबंध भी जन सहयोग से हो ही जाता था ৷

बाबासाहेब जब नामांकन जमा करने और चुनाव प्रचार के लिए भंडारा पहुँचे तो उनके और सहयोगियों के रहने की व्यवस्था कोलते के बंगले में ही गई ৷ वही उनका चुनाव कार्यालय भी था ৷ बाबासाहेब को दोनों समय चाय, नाश्ता और भोजन का ‘डबा’ पहुँचाने की ज़िम्मेदारी समिति की ही एक युवा कार्यकर्त्ता मालती बाई मेंढे ने स्वीकार की ৷

मुंबई के समान द्विकोणी मुकाबला यहाँ भी था ৷ सामान्य व आरक्षित सीट दोनों पर कुल मिलाकर चार उम्मीदवार खड़े थे । सामान्य सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता और कांग्रेस के पूनमचंद राका के बीच चुनाव होना था वहीं आरक्षित सीट पर बाबासाहेब के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे भाउराव बोरकर जिन्हें कांग्रेस की ओर से मैदान में उतारा गया था ৷ बोरकर भंडारा से लगे वैनगंगा के किनारे स्थित अम्बाड़ी गाँव के रहने वाले थे और मराठी साहित्य से स्नातकोत्तर थे ৷ आश्चर्य की बात यह कि मुंबई के काजरोलकर की भांति बोरकर भी बाबासाहेब के अनुयायी थे लेकिन सम्प्रति चुनाव में उनके विरुद्ध थे ৷ यह कथन बिलकुल सही है कि अपने स्वार्थ के लिए राजनीति में सब कुछ जायज़ है।

शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी बाबासाहेब को चुनाव चिन्ह मिला ‘हाथी’ जो दलित ,पीड़ित, शोषित जनता की आतंरिक शक्ति का प्रतीक बना । कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था ‘दो बैलोंकी जोड़ी’ वहीं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी अशोक मेहता ने चुनाव चिन्ह ‘झोपडी’ पर चुनाव लड़ना तय किया । देश की बहुसंख्य निरक्षर जनता जो प्रत्याशियों के नाम पढ़ने में असमर्थ थी इन चुनाव चिन्हों को बेहतर समझ सकती थी । पढ़े लिखे लोग भी नाम से अधिक प्रतीकों को महत्त्व देते थे इसीलिए आज तक चुनावों में यह प्रथा चली आ रही है यह अवश्य है कि अब यह केवल महत्त्व देना नहीं रहा बल्कि प्रतीक पूजा और व्यक्ति पूजा में बदल चुका है ।