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10 जून 2026

154. भंडारा : भगवान की माँ उन्हें कौनसी कहानी सुनाती थी

चिकित्सा विज्ञान आज बहुत आगे बढ़ चुका है हर मर्ज के लिए किसिम किसिम की दवाएँ मौजूद हैं लेकिन आज तक नींद की गोलियाँ बनाने वाली दवा कम्पनियाँ ऐसी दवा नहीं बना सकी जिसमे बिस्तर पर लेटकर माँ से कहानी सुनकर सुला देने जैसी तासीर हो ।

बचपन के उन बिस्तरों पर तकिया पर सर रखने के बावजूद तब तक नींद नहीं आती थी जब तक माँ कोई कहानी नहीं सुना देती थी । जाने कितनी पुराण कथाएँ कितने किस्से माँ को याद थे । दिवाली के बाद जब ठण्ड आने लगती, एकादशी के दिन से विवाह प्रारम्भ हो जाने की घोषणा के साथ माँ कहती अब चार महीने की नींद के बाद ग्यारस के दिन भगवान जागेंगे और तुलसी विवाह के साथ शादी ब्याह शुरू हो जायेंगे । 

मैंने माँ से कहा माँ,तुम हमें कहानी सुनाती हो तो हम रात भर के लिए सो जाते हैं और सुबह जाग जाते हैं, भगवान की माँ उन्हें ऐसी कौनसी कहानी सुनाती है जिसे सुनकर वे चार महीने के लिये सो जाते हैं ? और यह कहानी कब सुनाती है ? 

माँ हँसकर कहती “ जैसे ही बरसात शुरू होती है देवशयनी एकादशी आती है भगवान की माँ उन्हें इसी दिन कहानी सुनाती है, जिसे सुनकर वे चार महीने के लिए सो जाते हैं ।“ “लेकिन वह कहानी है कौनसी ?“ माँ जानती थी, बच्चा ज़िद्दी है मानेगा नहीं । 

माँ ने कहा “अब यह तो पता नहीं कि वे उन्हें कौनसी कहानी सुनाती है लेकिन मैं तुम्हे तुलसी विवाह की कहानी सुनाती हूँ । “

“हाँ सुनाओ ना माँ “ इतना कहकर मैंने माँ की गोद में अपना सर रख दिया । माँ ने प्यार से मेरे बालों में उंगलियाँ घुमाई और कहा “तो सुनो । जालंधर नाम का एक राक्षस था जिसे शिवजी से वरदान प्राप्त था । उसका विवाह वृंदा से हुआ था । एक बार वह शिवाजी के कैलाश पर्वत पर पहुँच गया और उसने पार्वती देवी पर बुरी नजर डाली ।“

“बुरी नज़र माने ?” मैंने उचक कर सवाल पूछा ।माँ थोड़ा हिचकिचाई “मतलब वो माता पार्वती को परेशान करना चाहता था । अच्छा सुनो बीच में मत बोलो नहीं तो हम भूल जायेंगे ।“ मुझे पता था माँ भूलेगी बिलकुल नहीं फिर भी मैं चुप रहा । 

माँ ने मुस्कुराकर कहा “फिर शिवजी को गुस्सा आया । वे उसे भस्म कर देना चाहते थे लेकिन उन्हें पता चला कि  वृंदा अपने पति की इतनी भक्ति करती है कि कोई उसके पति का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्होंने विष्णु जी से सलाह की । विष्णु जी को एक उपाय सूझा, वे ऋषि का वेष धारण कर वृंदा के पास गए और उससे कहा कि जालंधर की शिवजी से लड़ाई हो गई है और वह मारा गया है , यह सुनकर वृंदा मूर्छित हो गई । लेकिन जैसे ही उसे होश आया उसने ऋषि से प्रार्थना की कि  वे उसके पति को जीवित कर दे ।“  

मुझे टेक्निकली कहानी समझने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी फिर भी मैं चुप रहा । माँ ने कहना जारी रखा “विष्णु जी ने फिर जालंधर का रूप धर लिया । वृंदा ने जैसे ही जालंधर बने विष्णु को अपना पति माना उसकी पवित्रता नष्ट हो गई और उधर सचमुच का जालंधर मारा गया । लेकिन जैसे ही वृंदा को असलियत मालूम पडी कि यह उसका पति नहीं बल्कि विष्णु है उसने विष्णु को शाप दे दिया कि तुम पत्थर बन जाओगे और मेरे पैरों के पास पड़े रहोगे । फिर उसने खुद को भी नष्ट कर दिया और वह खुद एक पौधा हो गयी और तुलसी कहलाई । इसीलिए तुलसी के पास जो गोल गोल पत्थर या शालिग्राम पड़ा रहता है वह विष्णु ही है । इसीलिए हर साल एकादशी पर तुलसी का विवाह विष्णु से करवाया जाता है ।

सवाली राम के दिमाग में सवाल आया “ लेकिन माँ ,उसका पति तो जालंधर था ना फिर उसका विवाह जालंधर से क्यों नहीं करते ? विष्णु ने तो उसे धोखा दिया था ?” माँ ने कहा “ अरे वह राक्षस था न , दोबारा उसका विवाह राक्षस से क्यों करते और विष्णु जी तो भगवान थे इसलिए उसका विवाह भगवान के साथ करते हैं ।“

कहानी बहुत ऊबाऊ थी और पेचीदा भी, लेकिन अपनी विधा में थी तो कहानी ही और फिर माँ ने सुनाई थी, और कोई सुनाता था बहस कर लेता अब माँ से क्या बहस करना यह सोचकर चुपचाप सो गया । 

वे बचपन के दिन थे उन दिनों सुनी गई कहानियों में रोचकता प्रमुख तत्व होता था , अचानक इंसान की जगह बन्दर का प्रकट होना, धड का सर से जुड़ जाना, रूप बदलकर इंसान से गधा हो जाना  जैसे चमत्कारों की बातें सुनाने में मजा आता था । हालाँकि बच्चे सवाल पूछते हैं लेकिन माँ बाप उनके सही सही जवाब कहाँ देते हैं । बड़े होकर बच्चे सवाल पूछना भूल जाते हैं और फिर अपने बच्चों को वही काल्पनिक कथाएं सुनाते हैं । वे भी अपने बच्चों को उनके सवालों के सही जवाब नहीं देते । ऐसा पीढी दर पीढी चलता रहता है ।

मैं भी सवाल पूछना छोड़कर तुलसी विवाह वाले दिन की राह देखने लगता । उस दिन बाबूजी बाजार से गन्ने लेकर आते तुलसी वाले गमले के चारों ओर उन्हें खड़ा कर विवाह मंडप बनाया जाता, फिर श्लोक पढ़कर उनकी शादी की जाती । महाराष्ट में यह शादी बिलकुल पारम्परिक तरीके से होती है उसी तरीके से जैसे वर वधु का विवाह होता है । वर शालिग्राम और वधु तुलसी के पौधे के बीच एक वस्त्र जिसे अंतरपट कहते हैं रखा जाता और फिर मंगलाष्टक गाये जाते हैं । पाँच मंगलाष्टक के पश्चात ‘कुर्यात सदा मंगलम’ कहकर विवाह सम्पन्न हुआ ऐसा माना जाता । मुझे मंगलाष्टक गाने में बहुत मज़ा आता था इसलिए तुलसी विवाह के दिन मेरी काफी डिमांड होती थी ।

बचपन में माँ से जिन सवालों को पूछने का मौका नहीं मिला वे सवाल मैंने बड़े होकर अपने गुरूजी से पूछे,  जैसे इन कहानियों में राक्षस हमेशा बुरे क्यों होते हैं ? ऐसा क्यों कहा जाता है की वे देवियों पर बुरी नजर डालते हैं ? जब वे इतने ख़राब है तो फिर देवता उन्हें कभी न मरने का वरदान क्यों देते हैं ? और फिर उसके बाद षड्यंत्र करके उन्हें क्यों मार देते हैं ? ऐसा है तो वरदान देना ही नहीं चाहिए था ना ? फिर देवता ऐसे क्यों होते हैं कि  वे किसी के साथ भी कुछ भी कर सकते हैं ? विष्णुजी  को क्या और कोई तरीका नहीं आता था जालंधर को मारने का ? 

गुरूजी ध्यान से मेरे सवाल सुनते और कहते “बेटा यह सब कहानियां है, इन्हें कहानियों की तरह ही देखो, श्रद्धापूर्वक इनमे विश्वास करो और खुश रहो । “ खैर, मैंने उस समय भी गुरूजी की बात नहीं मानी और अपने सवालों के जवाब ढूँढता रहा । यह क्रम आज भी जारी है ।    

ऐसे ही दिवाली का त्योहार होता था । शुरू शुरू में तो हम लोग हर दिवाली पर बैतूल पहुंच जाया करते थे । लेकिन बाद में हम लोगों की और बाबूजी की छुट्टियों में तालमेल न होने के कारण बैतूल जाना बन्द हो गया । हालाँकि बैतूल की दिवाली में ज़्यादा मज़ा आता था । वहाँ पुराने घर में दादाभैया के कमरे में यह पूजा होती थी । सबसे पहले बापू , फिर उनके छोटे भाई , फिर दादा भैया , फिर उनके छोटे भाई और फिर हम लोगों की पीढ़ी के बच्चे । इस तरह सीनियरटी के अनुसार सबको पूजा करते देखने का भी अपना अलग आनन्द था । उसके बादा पटाखे , धूम्धाम खाना पीना आदि । वैसे ही उसके बाद गोवर्धन पूजा का भी आनंद आता था ।

शरद कोकास 

 



152. भंडारा : अठरा ते अठरा टिम्बा ची रांगोली

बरसात की अंतिम बूँदें जब बाय बाय कह कर चली जातीं पंछी निश्चिन्त हो जाते कि अब उनके घोसलों की छत नहीं टपकेगी । इधर आँगन अपनी बदसूरती पर हाय तौबा मचाने लगता कि ‘भैया मेरा तो सारा मेकअप ही धुल गया है, कुछ करो ।‘ आंगन की गुहार पर माँ आदेश देती “जा कहीं से गोबर ढूंढकर ला, आंगन में छड़ा डालना है ।“ हम एक छोटी टुटही बाल्टी लेकर गायों के शौचालय की तलाश में निकल पड़ते और जोगीतालाव के मैदान से पवित्र गोबर ढूंढ लाते । उसके बाद शुरू होता आंगन लीपने का काम । 

छड़ा या सड़ा डालने के लिए एक बाल्टी पानी में गोबर का संपृक्त घोल बनाया जाता और उसे धीरे धीरे पूरे आंगन में छिडक दिया जाता। तत्पश्चात  ताड़ के पत्ते वाली झाड़ू से उसे समतल कर दिया जाता । दो तीन दिनों में आँगन का रूप इतना बदल जाता कि वह आईना मांगने लगता । शुरू शुरू में तो यह काम माँ ही करती थी लेकिन बाद में यह काम मुझे इतना अच्छा लगने लगा कि मैंने यह चार्ज माँ से ले लिया । 

इसके बाद प्रारंभ होता रंगोली  की डिज़ाइन ढूँढने का अभियान । इस अभियान की शुरुआत हम बच्चों की टीम लीडर लीला ताई के घर से होती । पूरे मोहल्ले में  लीला ताई  की रंगोली  की कॉपी सबसे ज़्यादा अपडेट रहती थी और उसमें नित नई रांगोलियों की डिज़ाइनों  का समावेश होता रहता था । हालाँकि नई डिज़ाइन  पर वह अपना कॉपीराइट समझती थी और हमें उतारने नहीं देती थी । 

मैं उसे एक नई डिज़ाइन लाकर देने  का प्रलोभन देता और एक घंटे के लिए कॉपी मांग लाता फिर  फुर्ती से उसकी सारी डिज़ाइनें  पेन से अपनी कॉपी में उतार लेता  । इनमे होतीं छह बिंदु आड़े और छह बिंदु खड़े वाली वर्गाकार रंगोली  यानी सहा ते सहा, ऐसे ही ऊपर की लाइन में पंद्रह बिंदु फिर उससे नीचे घटते क्रम में चौदह ,तेरह, बारह होते हुए एक तक पहुँचने वाली तिकोनी रंगोली  यानी पंदरा ते एक वाली डिज़ाइन। इसके अलावा उस कॉपी में होती कुछ बेल बूटे, मोर और चिड़िया की आकृतियाँ, साथ ही तिकोनी,चौकोनी शटकोणी  आकार की छोटी बड़ी अनेक डिज़ाइनें  । 

कॉपी में लगभग पचास डिज़ाइनें हो जाने के बाद अगला कदम होता बाज़ार से सफ़ेद और रंगीन रंगोली  पाउडर लाना । सफ़ेद रंगोली  पायली के भाव से मिलती थी और सस्ती भी होती थी जबकि रंगीन रंगोली  अपेक्षाकृत महंगी । हम सफ़ेद रंग की रंगोली  एक थाली में लेते और होली के बचे हुए रंग ,कुछ  नीली और लाल स्याही के साथ उसे मिलाकर उसे ज़िंदगी की तरह रंगीन बना देते । शेष रंग बाज़ार से ले आते ।

दशहरे के आठ दस दिन पहले हमारा यह रंगोली  बनाओ अभियान प्रारंभ होता । मैं माँ के साथ ही सुबह जल्दी जाग जाता और जोगी तलाव से काऊफ्रेश गोबर ढूंढ लाता । टीन के डिब्बे में गोबर का घोल भरकर उसके मुँह पर चारों उंगलियां लगाकर छड़ा डालने या छिड़काव करने की टेक्नीक में मैं कुछ ही दिनों में सिद्धहस्त हो गया था । इस बीच बाबूजी चाय बनाकर आवाज़ देते । चाय के उपरांत अपनी रंगोली  किट लेकर मैं आँगन में पहुँच जाता और अपना मोर्चा संभाल लेता ।

रंगोली  की किताब के पन्ने पलटकर सबसे पहले यह तय किया जाता कि आज कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली  डालनी है । फिर बिंदु डाले जाते और सफ़ेद रंगोली  से आड़ी तिरछी खड़ी रेखाएँ खींच कर उसका क्राफ्ट तैयार कर लिया जाता । अब समस्या यह कि कौनसा रंग भरना है । मध्यवर्गीय अवचेतन में यह बात बराबर बनी रहती कि अपने पास जो रंग मात्रा में कम है अथवा महंगा है उसका इस्तेमाल कम करना है और जो बहुतायत में है उसका उपयोग ज़्यादा । यह भी ध्यान रखना पड़ता कि कोई रंग आधे में ही न समाप्त हो जाए वर्ना पड़ोस की लड़कियों द्वारा मज़ाक उडाये जाने की पूरी सम्भावना होती । अतः इस योजना के क्रियान्वयन हेतु माँ की मदद लेनी पड़ती ।

पूरी रंगोली  बन जाने के बाद विभिन्न कोणों से उसका परीक्षण किया जाता, कहीं कोई लाइन छोटी बड़ी तो नहीं हो गई, रंग कहीं गहरा या हल्का तो नहीं हो गया । माँ उत्तर प्रदेश की थीं उन्हें रंगोली  डालने की प्रैक्टिस नहीं थी लेकिन रंगों के बारे में उनका ज्ञान अद्भुत था । माँ द्वारा अपनी बनाई हुई रंगोली  पास किये जाने और इनाम में एक चुम्मी मिलने के बाद अपना भ्रमण कार्यक्रम प्रारंभ होता । 

सामने वाली ठाकरे की बेबी, बाजू के घर की मंगला, बेदरे काका की लता, कलकोटवार की माधुरी, हलमारे के यहाँ की रंजू और अंत में हमारी लीला ताई सबके घर की विज़िट होने के बाद शुरू होता आत्मालोचना का दौर । सबकी बनाई रंगोलियों के साथ अपनी रंगोली की तुलना करते हुए मन ही मन अपनी गलतियाँ काऊंट कर ली जातीं जिन्हें अगली सुबह ठीक करने का वादा भी अपने आप से कर लिया जाता ।

माँ को मेरी बनाई हुई रंगोली  बहुत अच्छी लगती थी । एक दिन मैंने माँ से कहा “माँ तुम भी रंगोली  बनाना सीख लो न । तुम्हारे यहाँ झाँसी में रंगोली  नहीं बनाते थे क्या ?”  माँ ने मुस्कुराते हुए कहा “ बनाते थे ना, हम आटे से रंगोली  बनाते थे । वहाँ इसे चौक पूरना कहते हैं ।“ मुझे जानकर आश्चर्य हुआ “ मतलब महाराष्ट्र अभी सबसे एडवांस है ?”  

बाबूजी अपने बेटे का गुरुर बढ़ता हुआ देख रहे थे ।उन्होंने हमारे माँ बेटे के वार्तालाप में हस्तक्षेप करते हुए कहा “ ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि महाराष्ट्र सबसे आगे है, रंगोली  सभी प्रान्तों में बनाई जाती है लेकिन उन्हें अलग अलग नामों से जाना जाता है, महाराष्ट्र में जो रंगोली  है वह यू पी में चौक है । राजस्थान में इसे मांडना कहते हैं तो बिहार में अरिपन । वहीं कर्णाटक में यह रंगवल्ली कहलाती है, तमिलनाडु में कोल्लम, आंध्र में मुग्गालू, हिमाचल में अदूपन । केरल में ओणम के अवसर पर फूलों की रंगोली बनाते हैं, तो कहीं चावल के आटे से । बंगाल में पिसे चावल के  घोल से अल्पना बनाते हैं । कहीं कहीं हल्दी से और गेरू से भी बनाते हैं। 

अपना एटिकेट फिर भी बरक़रार था “फिर भी इसकी शुरुआत तो महाराष्ट्र से ही हुई होगी न?” बाबूजी ने सोचा लड़के का घमंड जरा चूर किया जाये,  बोले “ऐसा बिलकुल नहीं है । इसकी शुरुआत तो आदिम काल से हुई है जब मनुष्य ने गुफाओं में चित्र बनाना सीखा । फिर हड़प्पा में भी इसके संकेत मिलते हैं । हमारी पुराण कथाओं में भी इसका उल्लेख है कि ब्रह्मा ने सबसे पहले उर्वशी का चित्र बनाया था फिर उसमे जान डाल दी ।

मैंने सोचा काश ऐसे ही ब्रह्मा जी मेरी रंगोली  के साथ भी करते तो कितना अच्छा होता, मेरे बनाये बेल बूटे जीवंत हो जाते, पौधे लहलहाने लगते, कुओं में पानी भर जाता, नदियाँ अपने आप बहने लगतीं, एक चाँद मेरे आंगन में भी जगमगाने लगता । बाबूजी की बातों से मेरा दर्प चकनाचूर हो चुका था लेकिन मेरा रंगोली  बनाना बंद नहीं हुआ । बहन सीमा के कुछ बड़े हो जाने के बाद उसने भी मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया ।

बचपन में शुरू हुआ रंगोली  बनाने का यह सिलसिला आज भी जारी है । अब तो बिटिया कोपल भी मेरा साथ देने लगी है । आसपास देखता हूँ तो पता चलता है रंगोली  की यह कला अब प्रोफेशनल रूप ले चुकी है। कला के इस क्षेत्र में बड़े बड़े कलाकार आ गए हैं, कोई बीस फीट की रंगोली  बनाता है तो कोई चालीस फीट की, कोई ज़मीन पर बनाता है तो कोई पानी पर चारकोल बुरादा या तेल छिड़ककर । नए नए रिकॉर्ड ।

हमारे समय की तरह सफ़ेद रंगोली में स्याही मिलाकर  नया रंग बनाने की अब जरूरत नहीं, अब तो बाजार में कई रंग मौजूद हैं । अलावा इसके कोई फूलो की रंगोली बना रहा है तो कोई बुरादे से या चारकोल से । अब आंगन लीपकर सतह बनाने की भी जरुरत नहीं, इसके लिए सुन्दर ड्राइंग बोर्ड और ग्लास व प्लास्टिक शीट्स आ गई हैं  । इसके अलावा जाने कितने तरह के सांचे और पॉट,रेडीमेड स्टीकर्स  । रंगोली  अब कपड़ों पर भी बनाई जाने लगी है ।

बचपन की मेरी रंगोली की किताब समय के साथ गुम हो गई और हाथ से कॉपी में उतारने का चलन भी ख़त्म हो गया , लेकिन नन्ही नन्ही बच्चियों को दिवाली के आसपास प्रिंटेड किताबों का सहारा लेकर रंगोली  बनाते देखता हूँ तो मन प्रसन्न हो जाता है । किसी घर के सामने से गुजरते हुए, रंगोली  बनाते हुए बच्चों को देखकर पल भर ठहरता हूँ और सोचता हूँ यह कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली होगी । 

रंगोली जैसे मेरा जीवन दर्शन है और बार बार मिटाने और बनाने की मेरी रचना प्रक्रिया का उत्स । यह जानते हुए भी कि कल इसे धोकर, झाड़ू लगाकर फिर नई रंगोली  बनानी  होगी हर बच्चा हर दिन उसी तन्मयता के साथ  रंगोली  बनाता है । मुझे कभी कभी रंगोली  जीवन  की तरह लगती है, यह जानते हुए भी कि जीवन एक दिन ख़त्म हो जाना है हम जीना नहीं छोड़ते बल्कि हर दिन नए उत्साह और कभी न ख़त्म होने वाली जिजीविषा के साथ जीते हैं ।

शरद कोकास 

151. भंडारा : किल्ला नहीं इसे किला कहते हैं



हमारे देश के ज़्यादातर लोग इतिहास, इतिहास की किताबों में  नहीं पढ़ते बल्कि किस्से कहानियों में पढ़ते हैं । हालाँकि उनका उद्देश्य मनोरंजन होता है, लेकिन इतिहास ज्ञान साइड इफेक्ट की तरह चला आता है । कला का बाज़ार जनता की यह कमज़ोरी जानता है, और किस्से कहानियों और फिल्मों के माध्यम से उसके सामने एक ऐसा इतिहास परोस देता है जिसके सच में झूठ कितना मिला है जानना मुश्किल होता है । अब तक कथा, कहानी, उपन्यास और फिल्मो को इतिहास कहने की कोशिश भी नहीं की गई थी और इनके लिए ‘ऐतिहासिक’ इस विशेषण का प्रयोग ही पर्याप्त  था लेकिन  अब व्यवस्था इस गोरखधंधे में धंधे में शामिल हो गई है और विशुद्ध मनोरंजन के लिए प्रस्तुत इन विधाओं को इतिहास कह कर जनता के अवचेतन से खिलवाड़ करने लगी है । समझदार जनता उसके बहकावे में नहीं आती है और ऐसी रचनाओं के गर्भ में छुपे इतिहास और कथा तत्व में अंतर करना जानती है ।

इतिहास को किस्सों में पढ़ने की इस परम्परा में बचपन में पाठय पुस्तकों में पढ़ा गया एक किस्सा याद आता है, शिवाजी और तानाजी मालसुरे का किस्सा । महाराष्ट्र के बच्चों को सिंहगढ़ के किले की कहानी घूटी में पिलाई जाती है, जिसका की वर्ड होता है ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’  यानी किला तो मिल गया लेकिन किले को जीतने वाला हमारा शेर चल गया ।  इसी घटना की स्मृति में बच्चे हर साल दिवाली के अवसर पर अपने आँगन में मिटटी का किला बनाते हैं और उसे सजाते हैं । इससे पहले कि मैं आपको किला बनाने की प्रक्रिया बताऊँ इस घटना का हम संक्षिप्त पुनर्पाठ कर लेते हैं, वैसे संभव है यह विवरण पढ़कर आपको हाल ही में बनी फिल्म ‘तानाजी’ की याद आई होगी जो इसी घटना पर आधारित है ।


पुणे शहर से तीस किलोमीटर दूर सह्याद्री पर्वत श्रंखला की एक पहाड़ी पर बने सिंहगढ़ किले का इतिहास सन तेरह सौ अठ्ठाइस से प्रारंभ होता है जब यह किला मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा आदिवासी कबीलों के सरदार नाग नाइक से हस्तगत कर लिया गया था । कौडिन्य ऋषि के बनाये प्राचीन मंदिर के नाम पर इस किले का नाम कोंढाणा किला था । तुगलक वंश से होता हुआ यह किला मराठों के पास आया लेकिन सन सोलह सौ पैंसठ में पुरंदर की संधि के तहत यह किला अन्य तेईस किलों सहित शिवाजी द्वारा औरंगजेब को दे दिया गया ।

किन्तु आगरा में छल द्वारा हत्या का षड़यंत्र रचे जाने पर शिवाजी क्षुब्ध हो गए और उन्होंने संधि भंग कर अपने किले वापस लेने की मुहीम प्रारंभ कर दी । फरवरी सोलह सौ सत्तर में यह अभियान प्रारंभ हुआ और उसके लिए योग्य सेनापति तलाशा जाने लगा । तानाजी मालसुरे ने अपने बेटे रायबा के विवाह की तैयारियों में व्यस्तता के बावजूद यह ज़िम्मेदारी ग्रहण कर ली । उन्होंने कहा “आधी लगीन  कोंढाण्याचे मग रायबा चे” अर्थात पहले लगन किले का बाद में बेटे का  । ‘आधी लगीन  कोंढाण्याचे’ यह उक्ति मुहावरे की भांति महाराष्ट्र में आज भी प्राथमिकता के पर्याय में उपयोग में लाई जाती है ।

फिर सोलह फरवरी का दिन आया । तानाजी ने अपने भाई सूर्याजी और पांच सौ मावले सैनिकों के साथ किले पर अधिकार कर लिया लेकिन किले के अभिभावक उदयभान से लड़ते हुए वे  वीरगति को प्राप्त हुए । जब शिवाजी तक यह ख़बर पहुँची तब उनके मुंह से निकला ‘ अरे गढ़ आ गया लेकिन हमारा शेर चला गया’ तानाजी की स्मृति में इस किले का नाम उन्होंने सिंहगढ़ रखा ।

हमारा राजनीतिक इतिहास ऐसे ही युद्धों का इतिहास है जहाँ सत्ता के लिए राजाओं के बीच युद्ध होते हैं । यहाँ साम्राज्य विस्तार प्रमुख होता है और राज्यधर्म का विस्तार गौण । इतिहास के विश्लेषण में यह सुविधा होती है कि घटना को किसी भी बिंदु पर रोक कर हम उसे अपनी इच्छानुसार रूप दे सकते हैं । इसीलिए किसीको यह नहीं पता चला कि उसके बाद सिंहगढ़ का किला पुनः औरंगजेब द्वारा हस्तगत कर लिया गया जिसे दोबारा तानाजी की तरह बाल कावले ने जीता । कुछ समय बाद फिर उसे मुगलों द्वारा छीन लिया गया जिसे महारानी ताराबाई ने वापस लिया । अंग्रेजों के तोपों की धमक सुनता हुआ अब यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पास है । किस्सों में पढ़े गए इतिहास के अंतर्गत हमने तानाजी पर इतिहास को विराम लगा दिया और बाल कावले और ताराबाई अनचीन्हे रह गए  ।

अवचेतन में बिम्ब आरोपित करने की उस उम्र में जब मुझे न इतिहास से कोई सरोकार था न राजनीति से मैंने पहली बार इस किले की कहानी के आलोक में  गुद्दू वानखेड़े को अपने आंगन में मिट्टी का किला बनाते हुए देखा । “क्या बना रहे हो गुद्दू “ पूछने पर उसने कहा “यह दिवाली का किल्ला है ।“ मैंने प्रतिवाद किया “किल्ला नहीं इसे किला कहते हैं ।“  उसकी भाषाई अनभिज्ञता में दृढ़ता थी “ नहीं, यह रायगढ़ का किल्ला है, पिछले साल  मैंने सिंहगढ़ का किल्ला बनाया था । चलो साथ मिलकर बनाते हैं ।“

मैंने उसका साथ देते हुए ध्यान से किला बनाने की पूरी प्रक्रिया देखी और अगले साल दिवाली  पर स्वतन्त्र रूप से  किला बनाने की शुरुआत की । सबसे पहले जगह का चयन ज़रूरी  था । आँगन के  एक कोने में अमरुद के पेड़ के नीचे मुझे उपयुक्त जगह दिखाई दी । सबसे पहला काम था पास के जोगीतालाव मैदान से दो तसले मिटटी खोद कर लाना । मैं जैसे ही तसले लेकर मैदान पहुँचा मोहल्ले के बड़े भैया लोग खुदाई करते दिखे , मेरे दुबले पतले हाथ पांव देखकर उन्हें दया आ गई और उन्होंने दो तसले मिटटी मुझे गिफ्ट कर दी ।

अब इसके बाद आवश्यक सामग्री का जुगाड़ करना था, दो तीन फटे पुराने बोरे, टीन  के पुराने पीपे और ईटें, पानी,रस्सी  इत्यादी  फिर उसे सजाने के लिए छोटे छोटे सैनिक मिट्टी के खिलौने आदि आदि । सजावट का काम तो बाद का था पहले निर्माण जरुरी था । मैंने बीचोबीच टीन का पीपा रखा और आसपास ईटें जमा दी । यह किले का बेस था । फिर बाल्टी में मिटटी घोलकर उसमे बोरा डुबोया और उसे पीपे के आसपास ईट और लकड़ी टिकाकर बिछाते हुए एक पहाड़ी का रूप दिया । फिर पीपे और ईटों पर मिट्टी के लोंदे जमाते हुए दीवारें बनाई लकड़ी का पटिया रखकर छत बनाई और पानी लगाकर उसे चिकनाया ।अब पहाड़ी की बारी थी । जहाँ जहाँ गैप दिखी वहाँ मिट्टी से गुफाएँ बनाई । किले तक पहुँचने के लिए स्लोप बनाया और माचिस की तीलियों से रेलिंग के खम्भे बनाए । फिर धागे को स्याही से रंगकर उसकी रेलिंग बना दी । अगले चरण में  पहाड़ी पर जगह जगह ढेर सारी मिटटी बिछाई और वहाँ राई के दाने बिखेर दिए । 

अब पहाड़ी है तो झील भी जरुरी है ना  इसके लिए मुझे पहाड़ी की तलहटी में उपयुक्त जगह दिखाई दी  । मैंने एक बड़ा सा पॉलिथीन लिया और उसे नीचे बिछाकर आसपास मिट्टी की मेढ़ बना दी ताकि पानी बाहर न बहे , आसपास कुछ चमकीले पत्थर भी रख दिए जो चट्टानों का आभास दे रहे थे ।

अगले दिन जब मिट्टी कुछ सूख गई तो मैंने एक बर्तन में गेरू घोला और दूसरे  में चूना जिससे मैंने गुफाओं के प्रवेश द्वार और किले की दीवारों पर कलाकारी की । घर में थोड़ा सा लकड़ी का बुरादा पड़ा था, होली के बचे हुए हरे रंग से जिसे रंगकर मैंने किले के रास्ते पर घास की तरह बिछा दिया । पिछली बार दशहरे के मेले से मिटटी के सैनिक खरीदकर लाया था उन्हें किले के द्वार पर तैनात कर दिया, मिट्टी के शेर गुफ़ा के पास रख दिए और मोर को जंगल में जगह दे दी ।  अब मेरा किला लगभग तैयार था ।

अगले चार पांच दिनों तक मैं उन जगहों पर हल्का हल्का पानी छिड़कता रहा जहाँ मैंने राई बोई थी।  चौथे पाँचवे दिन जब राई से अंकुर निकलने लगे और मेरी पहाड़ी हरी भरी दिखाई देने लगी । हरियाली देखकर मेरा उत्साह बढ़ गया । अब दीवाली तक उसे सजाने का काम  ही शेष था  और रात में दिए जलाकर रौशनी की व्यवस्था भी करनी थी ।

जब मेरा किला पूर्ण हो गया और प्रदर्शन के लिए तैयार हो गया तो मै जाकर गुद्दू को बुला लाया और कहा “देख मेरा सिंह गढ़ का किला बन गया ।“ गुद्दू मेरा किला देखकर बहुत खुश हुआ  और तालियाँ बजाकर कहने लगा “वा कितना अच्छा किल्ला बनाया है । “ मैंने चीखकर कहा .. “ किल्ला नहीं, यह किला है ।“ 

शरद कोकास 

19 मई 2026

39. भंडारा : सुबह सुबह नहाने का आज़ादी से सम्बन्ध

 

बचपन के शब्दकोष में पर्व का अर्थ है नए कपड़े और मिठाई, जिसके विस्तार में दिवाली और ईद आते हैं । रोचक कथाओं के आलंबन में तीज त्योहारों का उत्साह जन्म लेता है और राष्ट्रीय पर्वों के मनाये जाने की कथा बिना चीनी की दूध रोटी की तरह बेस्वाद लगती है । 

गुरूजी की बेंत के आतंक में होमवर्क की तरह जन गण मन रट लेने की विवशता बचपन में ही प्रश्न करने की आकुलता की हत्या कर देती है । फिर हम जीवन भर तिरंगे के सामने अगरबत्ती लगाकर और नारियल फोड़कर उसे सलाम करते हुए धूप में खड़े खड़े गाने का अभिनय करते हैं और कोई नहीं पूछता था कि इसमें जो लिखा है उसका मतलब क्या है  ? न हम सवाल पूछते हैं न रघुवीर सहाय  की यह पंक्तियाँ पढ़ते हैं .. 

राष्ट्रगीत में भला कौन वह 

भारत-भाग्य विधाता है 

फटा सुथन्ना पहने जिसका  

गुन हरचरना गाता है 

मखमल टमटम बल्लम तुरही 

पगड़ी छत्र चंवर के साथ 

तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर 

जय-जय कौन कराता है 

मैंने भी बड़े होने तक यह सवाल किसी से नहीं पूछा । पंद्रह अगस्त से दो दिन पूर्व ही दूसरी तीसरी कक्षा के बच्चों ने बता दिया था कि यह आज़ादी का दिन है, इस दिन सबको सुबह नहा धोकर झंडा फहराने स्कूल आना है , झंडा फहराने के बाद मिठाई मिलेगी । सुबह सुबह नहाने का आज़ादी से क्या सम्बन्ध है यह मुझे समझ में नहीं आया, रोज़ तो हम स्कूल से आने के बाद नहाते थे । जैनेन्द्र जितेन्द्र ने प्रस्ताव रखा कि रात में सब मिलकर उनके घर पर पढ़ाई करेंगे और सुबह तैयार होकर वहीं से स्कूल चले जायेंगे, नहाये हैं या नहीं नहाये हैं किसे पता चलता है । मैं खुशी खुशी तैयार हो गया । स्वतंत्रता दिवस से मेरा कोई लेना देना नहीं था लेकिन मुफ़्त में मिलने वाली मिठाई मैं छोड़ नहीं सकता था । 

जैनेन्द्र और जितेन्द्र दोनों जुड़वाँ भाइयों के पिता भगत साहब किसी सरकारी विभाग में थे । दोनों से बड़े उनके एक भाई थे जिन्हें बाबा कहकर बुलाते थे । उनसे छोटे दोनों भाइयों के नाम थे  पप्पू  यानि योगेश और संतोष l वे उस समय पुराणकर वकील के यहाँ किराये से रहते थे । बहुत छोटा सा मकान था उनका  एक सामने का कमरा एक बीच का और एक रसोई । इतने छोटे मकान में इतने सारे लोग । लेकिन यह उन दिनों आम बात थी । नए प्रांत में ज़िलों के गठन के बाद बहुत सारे लोग नौकरी के सिलसिले में गांवों से शहर आये थे और उन्हें इसी तरह के छोटे छोटे दड़बे नुमा मकानों में जगह मिली थी । उस समय तनख्वाह भी इतनी नहीं होती थी कि बड़े मकान किराये से लेकर रह सकें । हाँ, जो  लोग वहाँ के स्थाई निवासी थे और संपन्न थे या जिनके पैतृक मकान थे वे अपेक्षाकृत बड़े घरों में रहते थे ।

घर में खाना खिलाकर बाबूजी ने मुझे जैनेन्द्र जितेन्द्र के यहाँ पहुँचा दिया । कुछ देर पढ़ाई का अभिनय करने के पश्चात हम लोग सोने चले गए । जैनेन्द्र जितेन्द्र की माँ ने हम सब बच्चों के लिए बीच के कमरे में ज़मीन पर बिस्तर लगा दिया था । बातें करते हुए सब लोग सो गए, लेकिन मेरी आँखों से नींद नदारद । कुछ देर बाद मुझे कारण समझ में आया कि मुझे बगैर तकिये के नींद नहीं आ रही है । उनके यहाँ किसी की तकिया लगाने की आदत नहीं थी सो मुझे भी तकिया नहीं मिली थी । दरअसल तकिया उनके यहाँ था ही नहीं । 

अनिद्रा की इस स्थिति में मुझे घर की याद सताने लगी और मैंने सुबकना शुरू कर दिया । मेरे रोने से उनके पिताजी की नींद खुल गई । मैंने उन्हें कारण बताया तो उन्होंने समझाने की कोशिश की, तकिये का विकल्प भी रखा लेकिन मेरी एक ही रट थी …घर जाऊँगा । फिर वे उठे चप्पलें पहनी और मुझे घर तक छोड़ने आये । बाबूजी आश्चर्य से गुजरकर गुस्से तक पहुँचे, इससे पहले कि वे मुझे डाँटते मैं गहरी नींद में सो चुका था । 

बड़े होने के बाद एक दिन मैंने उस घटना का विश्लेषण किया कि उस दिन घर जाने की ज़िद के पीछे असल कारण क्या था,घर की याद या तकिया न होना । मुझे तकिये का सम्बन्ध सुविधा की अपेक्षा आदत के अधिक निकट लगा । उस उम्र में इतना विवेक मुझमें नहीं था कि आदतों के साथ समझौता कैसे किया जाता है । कुछ लोगों के भीतर बड़े होने के बाद भी यह विवेक उत्पन्न नहीं होता । मुझे लगता है अगर उस दिन बिना तकिये  के नीन्द आ जाती तो शायद घर की याद नहीं आती ।

अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को उनके बचपन से ही सुविधाजीवी बना देते हैं । बच्चों की हर वैध अवैध मांग पूर्ण करना माँ-बाप अपना कर्तव्य समझते हैं । बच्चे भी उस सुविधा को अपना अधिकार समझने लगते हैं और जब उन्हें यह सुविधा प्राप्त नहीं होती  है तो वे विद्रोह कर बैठते हैं । बचपन में उनकी इच्छाएं  पूरी करना माँ-बाप के लिए आसान होता है किन्तु जब उनकी इच्छाएँ बढ़ने लगती हैं तब एक सीमित आय के व्यक्ति के लिए उन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं होता । बचपन में अपराध की ओर प्रवृत होने के पीछे यह एक प्रमुख कारण है । बड़े होने के बाद हम सुविधा को आदत करार देते हुए उसे हासिल करने के लिए बहुत सारे अवांछित कार्य भी करते हैं |

विगत सदी के उत्तरार्ध में जन्म लेने वाले बच्चों की इच्छाएँ इतनी बड़ी नहीं हुआ करती थीं जिन्हें पूरा करना मध्यवर्गीय माता - पिता के लिए मुश्किल होता । बच्चों के लिए सबसे महंगा शौक उन दिनों सिनेमा देखना होता था और देर सवेर,रोते झींकते उनकी यह इच्छा पूरी हो ही जाती थी । बच्चों को महंगी या सस्ती ड्रेस का अंतर पता नहीं था फिर रेडीमेड कपड़ों का चलन भी नहीं के बराबर था । माँ बाप द्वारा दिलवाए गये साल के दो ड्रेस काफी थे । घर से बाहर किसी होटल में खाने का चलन भी नहीं था जलेबी,बूंदी,बालूशाही,भजिये ,आलूबोंड़े बेसन और रवे के लड्डू घर में ही बन जाते थे या कभी कभार साप्ताहिक बाज़ार के दिन जो भी सस्ती मिठाई घर में आ जाती थी उसीमे संतोष हो जाता था । 

पंद्रह अगस्त की सुबह जैनेन्द्र जितेन्द्र मुझे लेने घर आ गये । मेरी आँखों में पिछली रात का कोई अपराध बोध नहीं था । रोज़ की तरह हम लोग स्कूल के लिए रवाना हो गए । हमारे प्रधान अध्यापक शिवहरे जी यानि बड़े गुरुजी ने झंडा फहराया । जन गण मन,वन्दे मातरम  से लेकर विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा तक सारे गीत हमने गाए । सिनेमा के गानों से कुछ अलग इन गीतों को गाने का मेरा यह पहला अवसर था । अगली छब्बीस जनवरी तक मैंने सब गीत रट लिए थे । 

मेरी नज़रें मिठाई की तलाश कर रही थीं । मैंने जितेन्द्र से पूछा तो पता चला कि ध्वजारोहण के बाद सब बच्चों को गांधी चौक ले जाया जायेगा । वहाँ से आने के बाद घर जाने से पहले मिठाई मिलेगी । बहुत कठिन शर्त थी इसलिए कुछ बच्चे वहीं से वापस घर चले गए । हम बचे हुए बच्चे जुलूस की शक्ल में गाँधी चौक पहुँचे । वहाँ सफ़ेद कुरता पजामा और गाँधी टोपी पहने एक व्यक्ति द्वारा झंडा फहराया गया । पूछने पर पता चला कि उन्हें नेताजी कहते हैं । ‘अच्छा तो नेता ऐसा दिखाई देता है’ , यह किसी नेता के बारे में मेरे अवचेतन का पहला बिम्ब था । उन दिनों महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी का शासन था और कांग्रेस के नेताओं की यह प्रिय वेशभूषा हुआ कराती थी । वे शायद नगर पालिका के अध्यक्ष या कोई विधान सभा सदस्य रहे होंगे ।  ‘नेताजी’ इस विशेषण में सुभाषचंद्र बोस का बिम्ब मेरे अवचेतन में स्थापित होने से पूर्व भंडारा के उन्ही नेताजी का बिम्ब था ।

नेताजी ने  अपने भाषण में बताया कि आज के दिन हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था इसलिए हम आज स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं । घर आकर मैंने बाबूजी से पूछा “अंग्रेज कैसे दिखाई देते हैं ?” उन्होंने धर्मयुग में छपी एक तस्वीर मुझे दिखाई जिसमे  नेहरू जी और लार्ड माउंटबेटन साथ साथ थे । मैंने रट लिया सैनिक  टोपी वाले अंग्रेज माउंटबेटन और गाँधी टोपी वाले नेहरू जी । बाबूजी ने संक्षेप में आज़ादी की लड़ाई और इतिहास से भी मेरा परिचय कराया था और नागपुर में नेहरूजी से उनकी मुलाकात की घटना भी सुनाई थी । आज़ादी के इतिहास के बारे में यह मेरा पहला पाठ था । 

असली बात तो रह ही गई, स्कूल लौटने के बाद हम भाषण सुनने वाले बच्चों को कांच के एक ग्लास मे चार गुलाब जामुन मिले । पहले वाले बच्चों को सांत्वना पुरस्कार की तरह बूंदी पर ही टरका दिया गया था । कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस का सार यही था ।


शरद कोकास 

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13 अप्रैल 2026

19. भंडारा : कवेलुओं को दुलराती डालियाँ


उन दिनों मैं अपनी हमउम्र नन्ही नहीं बच्चियों को फ्रिल वाली फ्रॉक पहने देखता था और सोचता था परियाँ भी ऐसी ही फ्रॉक पहनती होंगी
৷ माँ मुझे रात को कहानी सुनाकर सुला देती थी ৷ सुबह जब मैं जागता तो कहानी के कुछ दृश्य ही मुझे याद रहते ৷ मुझे ऐसा लगता जैसे रात हवाओं पर सवार होकर कोई परी खिड़की से आई थी और मुझे कोई कहानी सुना गई ৷ कुछ बड़े होने के बाद मैंने रंगीन किताबों में उन परियों की तस्वीरें देखीं ৷ उनकी फ्राकें बहुत ख़ूबसूरत थीं ৷ तस्वीर देखकर कीमत का अंदाज़ लगाना मुश्किल था फिर भी इतना तो समझ में आ ही गया कि वे जो फ्राकें पहने हैं, वे मेरे घर के आसपास रहनेवाली ग़रीब बच्चियों की फ्राकों से बहुत महंगी हैं ৷ यह भी मैं जान गया था कि परियाँ सिर्फ किताबों और कहानियों में होती हैं वास्तविकता में नहीं ৷ फिर कभी कोई किसी बच्ची को नन्ही परी कहता था तो मुझे हँसी आती थी ৷

 


समझ के सोपान चढ़ते हुए मुझे यह भी समझ में आ गया कि दुनिया में बच्चों को कहानी सुनाने का हक़ सिर्फ़ माताओं को होता है
৷ परियाँ कहानी नहीं सुनातीं बल्कि परियों की कहानियाँ भी माँ ही सुनाती है ৷ माँ के पास एक कहानियों का पिटारा था जिसके भीतर  ढेर सारी कहानियाँ थीं, परी और जादूगर की , वीर योद्धाओं की, गाँव के भोले भाले लोगों की और  पौराणिक पात्रों की ৷ उन्हीं में एक कहानी यूनान के शक्तिशाली वीर हर्क्यूलिस की कहानी भी थी ৷ 

 

एक बार वीर हर्क्यूलिस किसी राजा के आदेश पर सोने के सेब की खोज में निकला । यह सुनहरा सेब यूनान के पश्चिम में एक महासागर के तट पर एक बाग़  में उगा था । वहाँ आकाश पृथ्वी तक झुक आया था लेकिन वीर अटलांटिस उसे अपनी पीठ पर थामकर नीचे पृथ्वी पर गिरने से रोके हुए था । हरक्युलिस ने उससे सेब तोड़ने हेतु निवेदन किया । अटलांटिस ने उसके निवेदन को स्वीकार करते हुए कहा “ ऐसा करो, तो फिर तुम कुछ देर इस आकाश को थामे रहो ৷” जब तक अटलांटिस सेब तोड़ता हरक्युलिस ने आकाश अपनी पीठ पर थाम  लिया लेकिन  आकाश इतना वज़नी था कि हरक्युलिस घुटनों तक पृथ्वी में धंस गया । फिर उसे सेब मिल गया और वह सेब लेकर राजा के पास चला गया ৷ इसी वीर अटलांटिस के नाम पर अटलांटिक  महासागर का नाम पड़ा है ৷

 


मैं रोज़ देखता था, घर के बरामदे का छप्पर भी आकाश की तरह नीचे तक झुक आया था लेकिन लकड़ी की कुछ बल्लियाँ हरक्युलिस की तरह उसे थामे हुए थीं
৷ वहीं एक अमरूद का एक पेड़ भी उग आया था जिसकी डालियों ने छप्पर तक पहुँचने की ज़ुर्रत कर ली थी ৷ डर लगता था कहीं वे डालियाँ उस कमज़ोर छप्पर को तोड़ न दें ৷ एक दिन मैंने देखा कि वे डालियाँ उन कवेलुओं को बिलकुल भी परेशान नहीं कर रही हैं बल्कि वे उन्हें अपने स्पर्श से दुलरा रही हैं ।

 

ठण्ड के दिनों में ठण्ड बहुत पड़ती थी, फिर भी भंडारा और आसपास के क्षेत्र में  प्रेमचंद की कथा ‘पूस की रात‘ में बताई रातों की तरह ठंडी रातें नहीं होती थीं৷ हाँ सुबह सुबह हल्की ठण्ड ज़रूर होती थी ৷ ऐसे समय अमरूद के पेड़ के नीचे बैठकर गुनगुनी धूप सेंकने में बहुत आनंद आता था । यहीं बैठकर मैं पहाड़े रटा करता था... दो एकम दो ,दो दुनी चार ৷ निदा फाज़ली साहब का शेर सुनने समझने तक और कवि होने तक मैं दो दुनी चार को ही सच समझता था ৷ दो साल की उम्र तक यह आँगन ही मेरा क्रिड़ास्थल था । टीन के मुख्य दरवाज़े से प्रवेश करते ही दोनों ओर क्यारियाँ थी जिनमें बाबूजी ने फूलों के पौधे लगाये थे ৷ इन क्यारियों में लगे पौधों के साथ मैं भी धीरे धीरे बड़ा हो रहा था ।

 

आप सोच रहे होंगे ना निदा फ़ाज़ली साहब का वो शेर कौनसा है..तो लीजिये मुलाहिज़ा फरमाइये

 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है

सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला ৷

 


माँ बाबूजी रोज़ आंगन के पौधों में पानी डालते थे
৷ समझ और नादानी का खेल खेलते हुए यह बात समझ में आ ही गई थी कि बच्चों की तरह इन पौधों को भी बढ़ने के लिए भोजन पानी की ज़रूरत होती है ৷ मैंने शौक शौक में उनका हाथ बँटाने की ज़िम्मेदारी ले ली ৷ मैंने नन्ही उँगलियों से क्यारी में लगे पौधों के पास छोटी छोटी नालियाँ बनाईं ৷ मैं लम्बी क्यारी के एक सिरे पर पानी डालता और वह छोटी छोटी नालियों से बहकर सभी पौधों की जड़ों तक पहुँच जाता । नालियों में पानी बहता हुआ देखकर मैं कल्पना करता था कि पृथ्वी के बनने के बाद जब पहली बार नदियाँ बनी होंगी तो उन नदियों में भी पानी इसी तरह बहा  होगा ।

 

बाल मन में उपजती प्रश्नों की दुनिया में एक प्रश्न यह भी था कि इस नाली में तो पानी मैं बहा रहा हूँ लेकिन नदियों में पानी कौन बहाता होगा ? हालाँकि ईश्वर का कोई भी खयाल उस वक़्त मेरे मन में नहीं था और बाबूजी मुझे यह वैज्ञानिक तथ्य बता ही चुके थे कि ब्रह्माण्ड में सूर्य के बाद अन्य ग्रहों के साथ पृथ्वी कैसे बनी, पहाड़, चट्टाने और समंदर कैसे बने , नदियाँ कैसे बनी और उनमे पानी कैसे आया ৷ पौराणिक कहानियों में वर्णित वर्षा करवाने वाले देवता इन्द्र पर मुझे कतई विश्वास नहीं था इसलिए कि बाबूजी मुझे पहले ही बता चुके थे बादल कैसे बनते हैं, बिजली क्यों कड़कती है और वर्षा कैसे होती है ৷ मेरे लिए मेरे पिता दुनिया के तमाम इन्द्रों से बड़े थे ৷

 


मिट्टी मुझे बहुत अधिक आकर्षित करती थी
। शैशव अवस्था में अन्य बच्चों की तरह मृदा भक्षण पर माँ के हाथों से तमाचे खाने के बाद भी यह आकर्षण समाप्त नहीं हुआ । किसानों के कीचड़ में सने हुए पांव और मजदूरों के मिटटी के गारे से सने हुए पांव आज भी मुझे आकर्षित करते हैं ৷ मिट्टी के प्रति इस आकर्षण की वज़ह से आगे चलकर मुझे दिवाली का  ‘किल्ला’  बनाना और गणेशोत्सव में मिटटी का पहाड़ बनाना अच्छा लगने लगा  था । भले ही ‘देश की मिट्टी’, ‘वतन की मिट्टी’ जैसे संप्रत्ययों  से प्रेम करने वाले कथित राष्ट्रवादी लोग कभी नंगे पाँव ज़मीन पर न चले हों लेकिन मेरे भीतर मिट्टी की यह ललक अभी भी बरक़रार है  । मैं इस मिटटी को कभी भी चूम सकता हूँ ৷

 

सुबह स्कूल से आने के बाद दोपहर बाद खाना खाकर मैं मिट्टी से खेलते हुए उन क्यारियों से पत्ते साफ किया करता और अपनी बनाई इन नदियों में पानी बहाया करता ৷ मानों अपने इस सृजनात्मक कार्य में मैं ही अपना ईश्वर था ৷ जाने कितनी देर मैं उन पत्तियों को सूंघा करता था ৷ चन्दन की गंध को मैं चन्दन की लकड़ी के चंदनी रंग में और मोगरे की गंध जो मोगरे के सफ़ेद रंग में महसूस करता ৷ जैसे मैं धुएं की गंध में काला रंग महसूस किया करता था वैसे ही पत्तियों की गंध को मैं हरे रंग में महसूस करता । गीली मिट्टी की गंध मुझे बहुत अच्छी लगती थी उसे मैं मिट्टी के रंग में महसूस करता । अदृश्य गंध को उसके स्त्रोत के रंग में महसूस करने का मेरा यह अपना तरीका था । दूध की गंध को मैं आज भी अपनी माँ के रूप और उनकी ममता के रंग में महसूस करता हूँ ৷



माँ की याद तो आज भी बहुत बहुत आती है

 
शरद कोकास