13 अप्रैल 2026

19. कवेलुओं को दुलराती डालियाँ


उन दिनों मैं अपनी हमउम्र नन्ही नहीं बच्चियों को फ्रिल वाली फ्रॉक पहने देखता था और सोचता था परियाँ भी ऐसी ही फ्रॉक पहनती होंगी
माँ मुझे रात को कहानी सुनाकर सुला देती थी सुबह जब मैं जागता तो कहानी के कुछ दृश्य ही मुझे याद रहते मुझे ऐसा लगता जैसे रात हवाओं पर सवार होकर कोई परी खिड़की से आई थी और मुझे कोई कहानी सुना गई कुछ बड़े होने के बाद मैंने रंगीन किताबों में उन परियों की तस्वीरें देखीं उनकी फ्राकें बहुत ख़ूबसूरत थीं तस्वीर देखकर कीमत का अंदाज़ लगाना मुश्किल था फिर भी इतना तो समझ में आ ही गया कि वे जो फ्राकें पहने हैं, वे मेरे घर के आसपास रहनेवाली ग़रीब बच्चियों की फ्राकों से बहुत महंगी हैं यह भी मैं जान गया था कि परियाँ सिर्फ किताबों और कहानियों में होती हैं वास्तविकता में नहीं फिर कभी कोई किसी बच्ची को नन्ही परी कहता था तो मुझे हँसी आती थी

 


समझ के सोपान चढ़ते हुए मुझे यह भी समझ में आ गया कि दुनिया में बच्चों को कहानी सुनाने का हक़ सिर्फ़ माताओं को होता है
परियाँ कहानी नहीं सुनातीं बल्कि परियों की कहानियाँ भी माँ ही सुनाती है माँ के पास एक कहानियों का पिटारा था जिसके भीतर  ढेर सारी कहानियाँ थीं, परी और जादूगर की , वीर योद्धाओं की, गाँव के भोले भाले लोगों की और  पौराणिक पात्रों की उन्हीं में एक कहानी यूनान के शक्तिशाली वीर हर्क्यूलिस की कहानी भी थी  

 

एक बार वीर हर्क्यूलिस किसी राजा के आदेश पर सोने के सेब की खोज में निकला । यह सुनहरा सेब यूनान के पश्चिम में एक महासागर के तट पर एक बाग़  में उगा था । वहाँ आकाश पृथ्वी तक झुक आया था लेकिन वीर अटलांटिस उसे अपनी पीठ पर थामकर नीचे पृथ्वी पर गिरने से रोके हुए था । हरक्युलिस ने उससे सेब तोड़ने हेतु निवेदन किया । अटलांटिस ने उसके निवेदन को स्वीकार करते हुए कहा “ ऐसा करो, तो फिर तुम कुछ देर इस आकाश को थामे रहो ” जब तक अटलांटिस सेब तोड़ता हरक्युलिस ने आकाश अपनी पीठ पर थाम  लिया लेकिन  आकाश इतना वज़नी था कि हरक्युलिस घुटनों तक पृथ्वी में धंस गया । फिर उसे सेब मिल गया और वह सेब लेकर राजा के पास चला गया इसी वीर अटलांटिस के नाम पर अटलांटिक  महासागर का नाम पड़ा है

 


मैं रोज़ देखता था, घर के बरामदे का छप्पर भी आकाश की तरह नीचे तक झुक आया था लेकिन लकड़ी की कुछ बल्लियाँ हरक्युलिस की तरह उसे थामे हुए थीं
वहीं एक अमरूद का एक पेड़ भी उग आया था जिसकी डालियों ने छप्पर तक पहुँचने की ज़ुर्रत कर ली थी डर लगता था कहीं वे डालियाँ उस कमज़ोर छप्पर को तोड़ न दें एक दिन मैंने देखा कि वे डालियाँ उन कवेलुओं को बिलकुल भी परेशान नहीं कर रही हैं बल्कि वे उन्हें अपने स्पर्श से दुलरा रही हैं ।

 

ठण्ड के दिनों में ठण्ड बहुत पड़ती थी, फिर भी भंडारा और आसपास के क्षेत्र में  प्रेमचंद की कथा ‘पूस की रात‘ में बताई रातों की तरह ठंडी रातें नहीं होती थीं हाँ सुबह सुबह हल्की ठण्ड ज़रूर होती थी ऐसे समय अमरूद के पेड़ के नीचे बैठकर गुनगुनी धूप सेंकने में बहुत आनंद आता था । यहीं बैठकर मैं पहाड़े रटा करता था... दो एकम दो ,दो दुनी चार निदा फाज़ली साहब का शेर सुनने समझने तक और कवि होने तक मैं दो दुनी चार को ही सच समझता था दो साल की उम्र तक यह आँगन ही मेरा क्रिड़ास्थल था । टीन के मुख्य दरवाज़े से प्रवेश करते ही दोनों ओर क्यारियाँ थी जिनमें बाबूजी ने फूलों के पौधे लगाये थे इन क्यारियों में लगे पौधों के साथ मैं भी धीरे धीरे बड़ा हो रहा था ।

 

आप सोच रहे होंगे ना निदा फ़ाज़ली साहब का वो शेर कौनसा है..तो लीजिये मुलाहिज़ा फरमाइये

 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है

सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

 


माँ बाबूजी रोज़ आंगन के पौधों में पानी डालते थे
समझ और नादानी का खेल खेलते हुए यह बात समझ में आ ही गई थी कि बच्चों की तरह इन पौधों को भी बढ़ने के लिए भोजन पानी की ज़रूरत होती है मैंने शौक शौक में उनका हाथ बँटाने की ज़िम्मेदारी ले ली मैंने नन्ही उँगलियों से क्यारी में लगे पौधों के पास छोटी छोटी नालियाँ बनाईं मैं लम्बी क्यारी के एक सिरे पर पानी डालता और वह छोटी छोटी नालियों से बहकर सभी पौधों की जड़ों तक पहुँच जाता । नालियों में पानी बहता हुआ देखकर मैं कल्पना करता था कि पृथ्वी के बनने के बाद जब पहली बार नदियाँ बनी होंगी तो उन नदियों में भी पानी इसी तरह बहा  होगा

 

बाल मन में उपजती प्रश्नों की दुनिया में एक प्रश्न यह भी था कि इस नाली में तो पानी मैं बहा रहा हूँ लेकिन नदियों में पानी कौन बहाता होगा ? हालाँकि ईश्वर का कोई भी खयाल उस वक़्त मेरे मन में नहीं था और बाबूजी मुझे यह वैज्ञानिक तथ्य बता ही चुके थे कि ब्रह्माण्ड में सूर्य के बाद अन्य ग्रहों के साथ पृथ्वी कैसे बनी, पहाड़, चट्टाने और समंदर कैसे बने , नदियाँ कैसे बनी और उनमे पानी कैसे आया पौराणिक कहानियों में वर्णित वर्षा करवाने वाले देवता इन्द्र पर मुझे कतई विश्वास नहीं था इसलिए कि बाबूजी मुझे पहले ही बता चुके थे बादल कैसे बनते हैं, बिजली क्यों कड़कती है और वर्षा कैसे होती है मेरे लिए मेरे पिता दुनिया के तमाम इन्द्रों से बड़े थे

 


मिट्टी मुझे बहुत अधिक आकर्षित करती थी
। शैशव अवस्था में अन्य बच्चों की तरह मृदा भक्षण पर माँ के हाथों से तमाचे खाने के बाद भी यह आकर्षण समाप्त नहीं हुआ । किसानों के कीचड़ में सने हुए पांव और मजदूरों के मिटटी के गारे से सने हुए पांव आज भी मुझे आकर्षित करते हैं मिट्टी के प्रति इस आकर्षण की वज़ह से आगे चलकर मुझे दिवाली का  ‘किल्ला’  बनाना और गणेशोत्सव में मिटटी का पहाड़ बनाना अच्छा लगने लगा  था । भले ही ‘देश की मिट्टी’, ‘वतन की मिट्टी’ जैसे संप्रत्ययों  से प्रेम करने वाले कथित राष्ट्रवादी लोग कभी नंगे पाँव ज़मीन पर न चले हों लेकिन मेरे भीतर मिट्टी की यह ललक अभी भी बरक़रार है  । मैं इस मिटटी को कभी भी चूम सकता हूँ

 

सुबह स्कूल से आने के बाद दोपहर बाद खाना खाकर मैं मिट्टी से खेलते हुए उन क्यारियों से पत्ते साफ किया करता और अपनी बनाई इन नदियों में पानी बहाया करता मानों अपने इस सृजनात्मक कार्य में मैं ही अपना ईश्वर था जाने कितनी देर मैं उन पत्तियों को सूंघा करता था चन्दन की गंध को मैं चन्दन की लकड़ी के चंदनी रंग में और मोगरे की गंध जो मोगरे के सफ़ेद रंग में महसूस करता जैसे मैं धुएं की गंध में काला रंग महसूस किया करता था वैसे ही पत्तियों की गंध को मैं हरे रंग में महसूस करता गीली मिट्टी की गंध मुझे बहुत अच्छी लगती थी उसे मैं मिट्टी के रंग में महसूस करता अदृश्य गंध को उसके स्त्रोत के रंग में महसूस करने का मेरा यह अपना तरीका था दूध की गंध को मैं आज भी अपनी माँ के रूप और उनकी ममता के रंग में महसूस करता हूँ



माँ की याद तो आज भी बहुत बहुत आती है

 
शरद कोकास 

 

 


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