ईद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ईद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

10 जून 2026

109.भंडारा : कूँक कूँक करती मुर्गियों से संवाद

अपने बचपन की उन गलियों में भटकते हुए एक दिन मैं जगजीत सिंह की गाई हुई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों का कैसेट ख़रीद लाया था और जैसे ही उसे कैसेट प्लेयर पर लगाया गुलज़ार साहब की आवाज़ में उनकी एक मशहूर नज़्म गूंजने लगी ...

बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों सी गलियाँ

सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के कसीदे

गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा

चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे

एक बकरी के मिम्याने की आवाज़

और धुन्दलाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साये   

अरे..! मैं चौंक गया.. यह दृश्य तो मेरा देखा हुआ है ৷ भंडारा में अपने ढोला प्राइमरी स्कूल जाते हुए और स्कूल से लौटते हुए हर रोज़ मैं इसी दृश्य के भीतर से होकर ही तो गुज़रता था ৷ बाईं ओर सत्तार दरोगा का मकान, फिर शफ़ी भाई पानवाले और हफीज़ पटेल का घर ৷ उसके बाद की गली में नईम का घर ৷ जैसे ही नईम अपनी गली में मुड़ता, मैं नईम से ‘कल मिलेंगे’ कहकर, नूरी मस्ज़िद के सामने से, कूँक कूँक करती मुर्गियों और  क्वैक क्वैक करती हुई बत्तखों से बतियाता हुआ और मिमियाती बकरियों को हकालता हुआ अपने घर की ओर बढ़ जाता ৷  


वैसे तो अनेक मुस्लिम परिवारों के बच्चे हमारे स्कूल में पढ़ते थे जिनमे कय्यूम था,अशरफ था लेकिन मेरी दोस्ती नईम से ही हुई ৷ नईम के अब्बा जनाब मुनीर खान सरकारी विभाग में ड्राफ्ट्समैन थे ৷ पुराने ढंग का, मिट्टी की मोटी मोटी दीवारों वाला उनका मकान, मस्जिद के पास ही स्थित था । अकसर घर लौटते हुए पानी पीने के लिए मैं नईम के घर रुक जाता ৷ मकान के दरवाज़े पर सबसे पहले नईम की फूफी  से दुआ सलाम  होती थी । वैधव्य के सफ़ेद लिबास में उनके साँवले चेहरे पर दुख साफ़ पढ़ा जा सकता था ৷ वे हमेशा मुझसे मेरे हाल चाल पूछतीं जिसमे मैं उनके ममत्व का अक्स देखता ৷   


नईम की माँ का निधन उन्हीं दिनों हो गया था जब हम लोग स्कूल में पढ़ते थे । वे डायबिटीज़ की मरीज़ थीं जो उन दिनों एक असाध्य सा रोग था ৷ नईम के घर में उससे छोटे दो भाई थे अल्ताफ़ और सैफ़ और एक छोटी बहन शाहीन ৷ नईम की माँ के गुजर जाने के बाद उनकी बुआ ने बच्चों की देखभाल की ৷ कभी कभी मैं नईम और उसके भाई बहनों के लिए सोचता तो मुझे बहुत दुःख होता ৷ मैंने पहली बार जीवन में महसूस किया कि माँ के नहीं रहने पर जीवन कैसा होता है ৷ अक्सर ऐसा सोचते हुए मेरी ऑंखें भर आतीं ৷

नईम की माँ मुझे बिलकुल अपनी माँ जैसी लगती थीं ৷ वे मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछतीं, सीमा और बबलू के बारे में पूछतीं, पढाई लिखाई के बारे में पूछतीं ৷ मैं जब भी नईम के घर जाता सीधे उनकी रसोई में चला जाता ৷ मुगलाई शैली में बने मांसाहारी व्यंजनों का सबसे पहला पहला स्वाद मेरी ज़ुबान पर नईम की माँ के हाथों बने खाने का ही है ৷

नईम के घर के सामने का हिस्सा जो रोड की तरफ खुलता था उसमे मुनीर खान चचा ने एक लकड़ी की टाल खोल ली थी ৷ उसके बाद हमें गली से होकर घर जाने की ज़रूरत नहीं रही ৷ हम लोग टाल के बड़े से दरवाज़े से ही आना जाना करने लगे ৷ रमज़ान ईद के शीर खुरमे का स्वाद अभी ज़ुबान से उतर भी नहीं पाता था कि चचा बकरीद के लिए एक बकरा ख़रीद लाते ৷ स्कूल से लौटते हुए हम लोग उस बकरे के लिए हरी पत्तियाँ तोड़कर लाते ৷ फिर नईम घर के भीतर से जर्मन सिल्वर के एक घमेले में मुरमुरे लेकर आता और उसे बकरे के सामने रख देता৷ वह कहता कि इसे खाने से ईद तक बकरा मोटा हो जाएगा ৷ लेकिन बकरीद के अगले रोज़ ही वह बकरा गायब हो जाता৷  छुट्टी के बाद जब मैं नईम के घर पहुँचता और उससे पूछता कि वह बकरा कहाँ गया , तो वह कहता उसकी कुर्बानी दे दी गई ৷ 

मैंने चचा  से पूछा कि कुर्बानी क्यों दी जाती है तो उन्होंने बताया "इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने पैगंबर इब्राहिम से उनकी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी मांगी थी। जब इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने लगे, तो अल्लाह ने उनके जज़्बे से खुश होकर बेटे की जगह एक मेमने (बकरे) को भेज दिया था। इसी परंपरा के तहत बकरा ईद पर बकरे, भेड़ या अन्य जानवर की कुर्बानी दी जाती है।"

यह वह समय था जब कुर्बानी,शरीयत,रोज़ा,नमाज़,जकात,बुरखा,अल्लाह,मस्जिद,इबादत,सवाब, कुरआन जैसे शब्द, दान,पुण्य,ईश्वर,पर्दा,पूजा,प्रार्थना,व्रत, उपवास,सेवा,मंदिर,प्रणाम, पोथी, पुराण जैसे शब्दों के साथ बचपन के मेरे शब्दकोष में सहअस्तित्व स्थापित कर रहे थे ৷ मज़ेदार बात यह कि इस शब्दकोष में धर्म,मज़हब जैसे शब्द साथ साथ रहते थे और आपस में कभी लड़ाई नहीं करते थे ৷ प्रेम,मोहब्बत और दोस्ती जैसे शब्दों का स्थान इन सभी शब्दों से ऊपर था ৷   

जाने कितनी ईद और दिवालियाँ इस तरह बीत गईं ৷ मैं और नईम साथ साथ पढ़े और बढ़े ৷ मैट्रिक के बाद हम दोनों बी एस सी करने के लिए नागपुर पढने चले गए ৷ नईम तो वापस भंडारा आ गया लेकिन मैं कभी स्थायी रूप से भंडारा नहीं लौट पाया ৷ पढाई लिखाई पूरी हो जाने पर मुझे स्टेट बैंक की दुर्ग शाखा में नौकरी मिली और नईम को भंडारा शाखा में ৷ फिर शादी ब्याह, बच्चे और तमाम लंतरानियाँ ज़िंदगी की चलती रहीं, हम लोग एक दूसरे के परिवार के सुख दुःख में, शादी ब्याह आदि में शामिल होते रहे ৷  बचपन की हमारी यह मित्रता आज भी कायम है, भले ही अब हमारी मुलाकातें कभी कभार होती हैं लेकिन होती ज़रूर हैं ৷ हाँ, फोन पर हम लोग अक्सर बतियाते रहते हैं और इस बात की सत्यता स्थापित करते हैं कि दोस्ती कभी भौतिक उपस्थिति की मोहताज़ नहीं होती है ৷

शरद कोकास 

19 मई 2026

39. भंडारा : सुबह सुबह नहाने का आज़ादी से सम्बन्ध

 

बचपन के शब्दकोष में पर्व का अर्थ है नए कपड़े और मिठाई, जिसके विस्तार में दिवाली और ईद आते हैं । रोचक कथाओं के आलंबन में तीज त्योहारों का उत्साह जन्म लेता है और राष्ट्रीय पर्वों के मनाये जाने की कथा बिना चीनी की दूध रोटी की तरह बेस्वाद लगती है । 

गुरूजी की बेंत के आतंक में होमवर्क की तरह जन गण मन रट लेने की विवशता बचपन में ही प्रश्न करने की आकुलता की हत्या कर देती है । फिर हम जीवन भर तिरंगे के सामने अगरबत्ती लगाकर और नारियल फोड़कर उसे सलाम करते हुए धूप में खड़े खड़े गाने का अभिनय करते हैं और कोई नहीं पूछता था कि इसमें जो लिखा है उसका मतलब क्या है  ? न हम सवाल पूछते हैं न रघुवीर सहाय  की यह पंक्तियाँ पढ़ते हैं .. 

राष्ट्रगीत में भला कौन वह 

भारत-भाग्य विधाता है 

फटा सुथन्ना पहने जिसका  

गुन हरचरना गाता है 

मखमल टमटम बल्लम तुरही 

पगड़ी छत्र चंवर के साथ 

तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर 

जय-जय कौन कराता है 

मैंने भी बड़े होने तक यह सवाल किसी से नहीं पूछा । पंद्रह अगस्त से दो दिन पूर्व ही दूसरी तीसरी कक्षा के बच्चों ने बता दिया था कि यह आज़ादी का दिन है, इस दिन सबको सुबह नहा धोकर झंडा फहराने स्कूल आना है , झंडा फहराने के बाद मिठाई मिलेगी । सुबह सुबह नहाने का आज़ादी से क्या सम्बन्ध है यह मुझे समझ में नहीं आया, रोज़ तो हम स्कूल से आने के बाद नहाते थे । जैनेन्द्र जितेन्द्र ने प्रस्ताव रखा कि रात में सब मिलकर उनके घर पर पढ़ाई करेंगे और सुबह तैयार होकर वहीं से स्कूल चले जायेंगे, नहाये हैं या नहीं नहाये हैं किसे पता चलता है । मैं खुशी खुशी तैयार हो गया । स्वतंत्रता दिवस से मेरा कोई लेना देना नहीं था लेकिन मुफ़्त में मिलने वाली मिठाई मैं छोड़ नहीं सकता था । 

जैनेन्द्र और जितेन्द्र दोनों जुड़वाँ भाइयों के पिता भगत साहब किसी सरकारी विभाग में थे । दोनों से बड़े उनके एक भाई थे जिन्हें बाबा कहकर बुलाते थे । उनसे छोटे दोनों भाइयों के नाम थे  पप्पू  यानि योगेश और संतोष l वे उस समय पुराणकर वकील के यहाँ किराये से रहते थे । बहुत छोटा सा मकान था उनका  एक सामने का कमरा एक बीच का और एक रसोई । इतने छोटे मकान में इतने सारे लोग । लेकिन यह उन दिनों आम बात थी । नए प्रांत में ज़िलों के गठन के बाद बहुत सारे लोग नौकरी के सिलसिले में गांवों से शहर आये थे और उन्हें इसी तरह के छोटे छोटे दड़बे नुमा मकानों में जगह मिली थी । उस समय तनख्वाह भी इतनी नहीं होती थी कि बड़े मकान किराये से लेकर रह सकें । हाँ, जो  लोग वहाँ के स्थाई निवासी थे और संपन्न थे या जिनके पैतृक मकान थे वे अपेक्षाकृत बड़े घरों में रहते थे ।

घर में खाना खिलाकर बाबूजी ने मुझे जैनेन्द्र जितेन्द्र के यहाँ पहुँचा दिया । कुछ देर पढ़ाई का अभिनय करने के पश्चात हम लोग सोने चले गए । जैनेन्द्र जितेन्द्र की माँ ने हम सब बच्चों के लिए बीच के कमरे में ज़मीन पर बिस्तर लगा दिया था । बातें करते हुए सब लोग सो गए, लेकिन मेरी आँखों से नींद नदारद । कुछ देर बाद मुझे कारण समझ में आया कि मुझे बगैर तकिये के नींद नहीं आ रही है । उनके यहाँ किसी की तकिया लगाने की आदत नहीं थी सो मुझे भी तकिया नहीं मिली थी । दरअसल तकिया उनके यहाँ था ही नहीं । 

अनिद्रा की इस स्थिति में मुझे घर की याद सताने लगी और मैंने सुबकना शुरू कर दिया । मेरे रोने से उनके पिताजी की नींद खुल गई । मैंने उन्हें कारण बताया तो उन्होंने समझाने की कोशिश की, तकिये का विकल्प भी रखा लेकिन मेरी एक ही रट थी …घर जाऊँगा । फिर वे उठे चप्पलें पहनी और मुझे घर तक छोड़ने आये । बाबूजी आश्चर्य से गुजरकर गुस्से तक पहुँचे, इससे पहले कि वे मुझे डाँटते मैं गहरी नींद में सो चुका था । 

बड़े होने के बाद एक दिन मैंने उस घटना का विश्लेषण किया कि उस दिन घर जाने की ज़िद के पीछे असल कारण क्या था,घर की याद या तकिया न होना । मुझे तकिये का सम्बन्ध सुविधा की अपेक्षा आदत के अधिक निकट लगा । उस उम्र में इतना विवेक मुझमें नहीं था कि आदतों के साथ समझौता कैसे किया जाता है । कुछ लोगों के भीतर बड़े होने के बाद भी यह विवेक उत्पन्न नहीं होता । मुझे लगता है अगर उस दिन बिना तकिये  के नीन्द आ जाती तो शायद घर की याद नहीं आती ।

अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को उनके बचपन से ही सुविधाजीवी बना देते हैं । बच्चों की हर वैध अवैध मांग पूर्ण करना माँ-बाप अपना कर्तव्य समझते हैं । बच्चे भी उस सुविधा को अपना अधिकार समझने लगते हैं और जब उन्हें यह सुविधा प्राप्त नहीं होती  है तो वे विद्रोह कर बैठते हैं । बचपन में उनकी इच्छाएं  पूरी करना माँ-बाप के लिए आसान होता है किन्तु जब उनकी इच्छाएँ बढ़ने लगती हैं तब एक सीमित आय के व्यक्ति के लिए उन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं होता । बचपन में अपराध की ओर प्रवृत होने के पीछे यह एक प्रमुख कारण है । बड़े होने के बाद हम सुविधा को आदत करार देते हुए उसे हासिल करने के लिए बहुत सारे अवांछित कार्य भी करते हैं |

विगत सदी के उत्तरार्ध में जन्म लेने वाले बच्चों की इच्छाएँ इतनी बड़ी नहीं हुआ करती थीं जिन्हें पूरा करना मध्यवर्गीय माता - पिता के लिए मुश्किल होता । बच्चों के लिए सबसे महंगा शौक उन दिनों सिनेमा देखना होता था और देर सवेर,रोते झींकते उनकी यह इच्छा पूरी हो ही जाती थी । बच्चों को महंगी या सस्ती ड्रेस का अंतर पता नहीं था फिर रेडीमेड कपड़ों का चलन भी नहीं के बराबर था । माँ बाप द्वारा दिलवाए गये साल के दो ड्रेस काफी थे । घर से बाहर किसी होटल में खाने का चलन भी नहीं था जलेबी,बूंदी,बालूशाही,भजिये ,आलूबोंड़े बेसन और रवे के लड्डू घर में ही बन जाते थे या कभी कभार साप्ताहिक बाज़ार के दिन जो भी सस्ती मिठाई घर में आ जाती थी उसीमे संतोष हो जाता था । 

पंद्रह अगस्त की सुबह जैनेन्द्र जितेन्द्र मुझे लेने घर आ गये । मेरी आँखों में पिछली रात का कोई अपराध बोध नहीं था । रोज़ की तरह हम लोग स्कूल के लिए रवाना हो गए । हमारे प्रधान अध्यापक शिवहरे जी यानि बड़े गुरुजी ने झंडा फहराया । जन गण मन,वन्दे मातरम  से लेकर विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा तक सारे गीत हमने गाए । सिनेमा के गानों से कुछ अलग इन गीतों को गाने का मेरा यह पहला अवसर था । अगली छब्बीस जनवरी तक मैंने सब गीत रट लिए थे । 

मेरी नज़रें मिठाई की तलाश कर रही थीं । मैंने जितेन्द्र से पूछा तो पता चला कि ध्वजारोहण के बाद सब बच्चों को गांधी चौक ले जाया जायेगा । वहाँ से आने के बाद घर जाने से पहले मिठाई मिलेगी । बहुत कठिन शर्त थी इसलिए कुछ बच्चे वहीं से वापस घर चले गए । हम बचे हुए बच्चे जुलूस की शक्ल में गाँधी चौक पहुँचे । वहाँ सफ़ेद कुरता पजामा और गाँधी टोपी पहने एक व्यक्ति द्वारा झंडा फहराया गया । पूछने पर पता चला कि उन्हें नेताजी कहते हैं । ‘अच्छा तो नेता ऐसा दिखाई देता है’ , यह किसी नेता के बारे में मेरे अवचेतन का पहला बिम्ब था । उन दिनों महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी का शासन था और कांग्रेस के नेताओं की यह प्रिय वेशभूषा हुआ कराती थी । वे शायद नगर पालिका के अध्यक्ष या कोई विधान सभा सदस्य रहे होंगे ।  ‘नेताजी’ इस विशेषण में सुभाषचंद्र बोस का बिम्ब मेरे अवचेतन में स्थापित होने से पूर्व भंडारा के उन्ही नेताजी का बिम्ब था ।

नेताजी ने  अपने भाषण में बताया कि आज के दिन हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था इसलिए हम आज स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं । घर आकर मैंने बाबूजी से पूछा “अंग्रेज कैसे दिखाई देते हैं ?” उन्होंने धर्मयुग में छपी एक तस्वीर मुझे दिखाई जिसमे  नेहरू जी और लार्ड माउंटबेटन साथ साथ थे । मैंने रट लिया सैनिक  टोपी वाले अंग्रेज माउंटबेटन और गाँधी टोपी वाले नेहरू जी । बाबूजी ने संक्षेप में आज़ादी की लड़ाई और इतिहास से भी मेरा परिचय कराया था और नागपुर में नेहरूजी से उनकी मुलाकात की घटना भी सुनाई थी । आज़ादी के इतिहास के बारे में यह मेरा पहला पाठ था । 

असली बात तो रह ही गई, स्कूल लौटने के बाद हम भाषण सुनने वाले बच्चों को कांच के एक ग्लास मे चार गुलाब जामुन मिले । पहले वाले बच्चों को सांत्वना पुरस्कार की तरह बूंदी पर ही टरका दिया गया था । कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस का सार यही था ।


शरद कोकास 

मित्रों, पोस्ट के अंत मे टिप्पणियों के नीचे जाएं । यहाँ “ मुख्यपृष्ठ “ पर क्लिक करने से आप मेरे ब्लॉग्स के मीनू या लेटेस्ट सूची तक पहुँच सकते हैं उसके नीचे जहां " वेब वर्शन देखें " लिखा है उसे क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा उसमें साइड बार में मेरी पुस्तकों के चित्र हैं जो वस्तुतः उन्हें पढने के लिए लिंक हैं । उन पर क्लिक करें और “कविता कोश” में मेरी कविताएँ पढ़ें । उसी तरह वहाँ दिए गए ब्लॉग्स के चित्र पर टच कर आप मेरे अन्य ब्लॉग्स तक पहुँच सकते हैं - शरद कोकास