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10 जून 2026

82 . भंडारा : आज चलिए मेरे साथ मेरे स्कूल जाने के रस्ते पर


बजरंग चौक भंडारा 
बचपन के वे दिन नन्हे नन्हे पाँवों के ज़मीन से पहचान के दिन थे ৷ स्कूल के सामने का बागीचा, सामने की मज़ार,
ढोला स्कूल के सामने की रोड पर मज़ार 

जेल के पिछवाड़े के खजूर के पेड़, बाँस के झुरमुट,
जेल के पीछे की सड़क 
दुर्गा मंदिर के पीछे छतरियों के खँडहर, हाथीखाने के सामने बनी गलियां , चिचबन मैदान,
चिचबन मैदान स्टेडियम 
खामतालाव के दूसरी ओर  का जंगल, पारस मेटल वर्क्स तक रेल की पटरियों वाला रास्ता ৷ नन्हे पाँव धीरे धीरे इन सबसे परिचय प्राप्त कर रहे थे ৷ था । सुबह घर से निकलकर स्कूल तक का रास्ता तो मैं सीधे ही तय करता था लेकिन लौटते हुए मानो पाँव आज़ाद हो जाते थे और सीधे न लौटकर अलग अलग रास्तों से भटकते हुए मुझे घर ले आते थे  । 

स्कूल के आसपास की चीजों को याद कर लिया चलिए अब घर से निकलते हैं 
वह जो टीन का खुला हुआ दरवाज़ा है वही मेरा घर है 

हमारी गली से निकल कर दाहिनी  ओर जाने वाला रास्ता सीधे स्कूल जाता था । चलिए वहीं मुड़ते हैं ।  पहली वाली तस्वीर पुरानी है उसमे जो टूटा फूटा घर दिख रहा हा वह डाकरे का बाड़ा का कॉर्नर है । अब नीचे का चित्र देखिए उस कॉर्नर वाली जगह एक रूम बना दिखता है हरी जाली लगी है जिस पर । 

दाहिनी ओर गली और सामने का रास्ता 

वैसे आपको बता  दूँ कि  घर से स्कूल तक लगभग डेढ़ किलोमीटर के उस रास्ते में आने वाले प्रत्येक मकान और दुकान को मैं ध्यान से देखा करता और कोशिश करता कि उनके भीतर चल रही ज़िंदगी का जायज़ा ले सकूँ । 

कस्बाई रिहायश में मकान सड़क से ही शुरू हो जाते थे । वे ऐसे मकान नहीं होते थे कि बाहर  का दरवाज़ा बंद तो सबसे संपर्क समाप्त ৷ अधिकतर मकानों में आंगन थे और कोई बाउंड्रीवाल जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी ৷ सुबह खुलने वाले घर के दरवाज़े रात के पहले बंद नहीं होते थे इसलिए मेरा यह ताका झाँकी का काम जिसे सभ्य शब्दों में ऑब्जरवेशन कहते हैं भलीभांति संपन्न हो जाता था ৷

आज आप लोगों के साथ, अपने उन्ही नन्हे कदमों से, फिर एक बार बचपन के उसी रास्ते पर चलने का मन कर रहा है जिन रास्तों ने मेरे वज़ूद जो एक पहचान दी ৷ सोच रहा हूँ इस रास्ते पर आने वाले घरों और उन घरों में रहने वाले लोगों से भी आपका परिचय करवाता चलूँ ৷

तो चलिए आगे बढ़ते हैं  

 गली से बाहर निकलते हुए और मुख्य सड़क पर पहुंचते हुए जो दाहिनी ओर जो यह पहला घर आता है वह भागवत जी का है ।   भागवत जी मोटा स चश्मा लगाते  थे , हमेशा सैंडो बनियान  मे दिखते थे ।  वे बच्चों पर बहुत चिल्लाया करते थे इसलिये बच्चों ने उनका नाम ‘ बोम्बल्या भागवत ’ रख दिया था । मराठी में बोम्बलने का अर्थ चिल्लाना होता है । भागवत जी बरसों यहाँ रहे बाद में उन्होंने यह मकान सम्पत्ति सम्बन्धी किसी विवाद के कारण खाली कर दिया था । लेकिन अभी भी शायद इसमे कोई रहता नहीं है । 

2012 मे बोम्बल्या भागवत का घर 

2023 मे बोम्बल्या भागवत का घर 

चलिए अब हम सबसे पहले दाहिनी और रहने वालों से परिचय प्राप्त करते हैं ৷ भागवत के मकान के बाद एक बड़े से आंगन वाला मकान आता है जिसमें  दादा हलमारे के रिश्तेदार रहते थे । वह एक कच्चा झोपड़ीनुमा मकान था और उसमे एक बड़ा सा आंगन था । उसके बाद हलमारे का मकान था । मकान मालिक हलमारे जी जिन्हे सब दादा कहते थे ,शिक्षा विभाग में अधिकारी थे । उनका ड्राइंग रूम सुसज्जित था और मुझे बहुत अच्छा लगता था । उनके घर के सामने बैठने के लिए पत्थर की दो बेंचें बनी थीं ৷ बाबूजी अक्सर हलमारे काका के यहाँ जाते थे और सीमेंट की इन बेंचों पर बैठकर गपियाया करते थे ।  अब तो इस घर मे कोई रहता नहीं , घर भी टूट फूट चुका है और यह बेंच भी अब वहाँ नहीं है अलबत्ता टीन का दरवाज़ा  अवश्य वहाँ है , देखिए 2012 के बाद की 2023 की यह तस्वीर 
2012 मे दादा हलमारे का घर 

2023 मे सीमेंट की बेंचें नहीं रहीं 

आगे बढ़ाने पर उसके बाद एक केश कर्तनालय मिलता है , मेरे बचपन के दिनों मे तो उसका कोई नाम नहीं था , बस नाई की दुकान कहते थे लेकिन अभी देखा मैंने वहाँ "विजय सेलून" ऐसा एक बोर्ड लगा है | 2012 मे जब मैं भंडारा गया था बचपन के मित्रों पड़ोसियों सेलून के मालिक भैया, अशोक तिवारी के साथ एक फ़ोटो खिंचवाया था। 
2012 मे भैया अशोक तिवारी के साथ 

2023 मे विजय सेलून 

इसके बाद एक कच्चा मकान आता है दाहिनी ओर जिसमे गायें बंधी रहती थीं देखिए चित्र मे 
भैया का घर 

भैया जी 

उसके बाद आगे बढ़ने  पर दाहिनी ओर  ‘लोक वाणी ‘ के संपादक पंडितराव का मकान आता था उसमे भी एक चारदीवारी मे टीन का दरवाज़ा था , फिर आँगन , बगीचा और उनका घर जिसके अहाते मे प्रिंटिंग मशीन रखी  थी जिस पर साप्ताहिक अखबार लोकवाणी छपता  था । अब इस मकान का रूप बदल गया है । यहाँ कोई स्मृति सभागृह है । 
2023 लोकवाणी 

पंडित राव के घर के बाद एक पतली सी गली थी जो आगे रवि रेहपाड़े के घर के पास निकलती थी ।  आगे बढ़ने  पर दाहिनी ओर ही बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज या डी  एड  कॉलेज आता था , जिसका बड़ा भारी शायद दस फुट का गेट  था , उसमे एक छोटा दरवाज़ा  भी था । अब यहाँ बेसिक प्राथमिक शाला है , चित्र मे देखिए । 

। फिर आगे बढ़ने पर एक मन्दिर नुमा इमारत आती थी जिसे ‘नागठाना’ कहते थे ,इसकी तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं । 
2023 नागठाना 

नागठाना  के बाद एक झोपड़ी थी आश्चर्य की बात यह कि हमारे बचपन में यह झोपड़ी जैसी थी वैसे ही आज भी है

यह देखिए 2023  की यह तस्वीर

उसके बाद आती थी भाट्या की किराने की दुकान जिसके जिक्र मे मैंने लिखा था कि जहाँ लगभग सभी वस्तुएँ मिल जाया करती थीं । यहाँ देखते हैं आजकल क्या है , चलो भाई गूगल अर्थ का स्ट्रीट व्यू देखते हैं । 

ओह  यहाँ भी एक किराना दुकान थी जो अब कहीं और स्थानांतरित हो गई है । हालांकि इस की एक तस्वीर मेरे पास है उसके बाद उससे लगा हुआ पंडित लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला का मकान था जहां अभी दरवाज़ा दिख रहा है वहीं गली के अंदर जो पीछे एक आँगन मे खुलती थी । जहाँ मैं तीज के अवसर पर सीदा पहुँचाने जाया करता था । ‘ सीदा’ अर्थात पंडित को पूजा के एवज में दिया जाने वाला रसोई का सामान । माँ किसी किसी त्यौहार पर मुझे एक सूप में रखकर चावल, गेहूँ का आटा ,दाल , शक्कर और आलू देती थी उसे मैं पहुंचा आता था । पहले साल जब मैं सूप में यह सब लेकर गया तो मुझे बहुत शर्म आई सो अगले साल से माँ ने यह सब सामग्री पुड़िया में बान्धकर थैले में देना शुरू कर दिया । पंडित लछमन प्रसाद शुक्ल बहुत साफ हिन्दी बोलते थे और बहुत रोचक तरीके से सत्यनारायण की कथा सुनाते थे । बाद में नीलू जीजी का विवाह भी उन्होंने ही करवाया था । 

उसके एक दो मकान बाद एक माड़ी वाला मकान था जहाँ हमारे ही स्कूल की एक लड़की रहती थी । वह मुझसे सीनियर थी और उसका नाम सन्ध्या था । उसकी एक छोटी बहन और एक भाई था , बस इतना मुझे याद है । वही मकान जहां अभी विवेक ट्रेडिंग कंपनी का बोर्ड लगा है । 

ठीक इनके सामने अजय पनके  का घर है , अजय भाई 1976 मे बाबूजी के स्टूडेंट थे बी एड कॉलेज मे आजकल रिटायर होकर अपने घर के सामने इस तरह बैठे रहते हैं 


इसके आगे बढ़ते जाते हैं गुर्जर चौक आता था यहाँ पर गुर्जर जी का मकान था जो कि एक पेट्रोल पंप के मालिक थे। उनके घर के भीतर हरसिंगार  का एक पेड़ था मराठी मे जिसे पारिजात कहते हैं । स्कूल जाते हुए मैं देखता था कि उस पेड़ की एक डाल  सड़क पर आ गई है वहाँ से गुजरते हुए रोज सुबह बहुत सारे फूल जमीन पर बिछे हुए मिलते थे । इसी टीन के दरवाजे के बाईं  ओर था हरसिंगार । 

यहीं एक भैंसों का तबेला भी था जिसमे भैंसे बंधी रहती थीं आज यह उजाड़ पड़ा है 

अब आगे बढ़ते हैं यहाँ चित्र मे जो इमारत दिखाई दे रही है वहाँ पर एक मकान था जिसमें बाद  में शंगरपवार वकील आकर रहने लगे थे। 

उसके बाद आगे बढ़ने पर बिल्डिंग के बाद एक पुराना मकान दिखाई देता है यहाँ पर कभी राहांगडाले वकील रहा करते थे यह अब भी वैसा का वैसा ही है
इसके बाद बजरंग चौक जहाँ से लगभग चार रास्ते यह कहें कि गलियां अलग दिशाओं में जाती थीं । एक भारतीय संगीत विद्यालय या सूर्यवंशी टेलर वाले चौक में एक योगेश काले मामा के घर के सामने से होते हुए नानोटी के घर तरफ एक बीच से निकलकर फ़त्तू जी के घर की ओर इस वाली गली  में हांडे  सर रहते थे। 
इसके बाद मुस्लिम आबादी शुरू होती थी आगे मस्जिद और मांझावाले अब्बास  भाई का मकान यहाँ पर किसी पीर की गद्दी भी  थी देखते हैं पहले क्यास्थिति थी और आज क्या स्थिति  है ।  यहाँ पर एक रिक्शेवाले का मकान भी था मुस्लिम रिक्शा वाला था जिसके घर के आँगन मे  रिक्शा खड़ा रहता था

यह सड़क आज ऐसी दिखती है । 


माँझा वाले अब्बास भाई का घर 
मुझे लगता है यह जो खाली जगह दिख रही है यहीं था रिक्शेवाले का मकान 
अब यहाँ से नूरी मस्जिद दिखाई देने लगी 
यहाँ से दो रास्ते हैं लेकिन हमे दाहिनी ओर जाना है 
दाहिनी ओर नईम के अब्बा की लकड़ी टाल थी 
सामने पुरानी टंकी यानी ढोला दिख रहा है उसके सामने थी हमारी ढोला प्राइमेरी स्कूल यहाँ अब नई पानी की टंकी है 
यह इमारत अब नहीं है 
तो इस तरह हम रोज जाते थे स्कूल 

66 भंडारा : देह राग में जन्म आरोह है अवरोह मृत्यु

यहीं था भारतीय संगीत महाविद्यालय 

जिन बच्चों के जीवन में दादा दादी, नाना-नानी सभी का अस्तित्व होता है उनके संस्कार उन बच्चों की अपेक्षा बेहतर होते हैं जिन्हें यह सुख नहीं मिला होता है ।दादा दादी की उपस्थिति तो मेरे जीवन में थी लेकिन नाना नानी को मैंने कभी नहीं देखा था । वे लोग माँ के विवाह से पूर्व ही वे गुजर गए थे । इसलिए सबसे बड़े मामा ही मेरे लिए नाना जैसे थे, उन्हीने माँ की देखभाल की थी और उन का विवाह संपन्न करवाया था । 

1964 के उस साल हम लोग जून की शुरुआत में ही बैतूल से लौट आये मुम्बई से बड़े मामा अपने परिवार सहित भंडारा आने वाले थे । 

मामा मामी और और उनके बच्चे यानि लाल दादा, मन्जू दीदी, मणि दादा, बेबी दीदी और पप्पू का वह भंडारा प्रवास मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षणों में से है । वैनगंगा का तट, अम्भोरा, कोरम्बी जाने कितनी जगहों पर हमारे पाँव पड़े । तस्वीरें खींचने का दायित्व बाबूजी के कॉलेज के ही एक शिक्षक श्री योगेश काले का था  । वे माँ को दीदी कहते थे सो हम बच्चे उन्हें मामा कहते थे । काले मामा एक अच्छे चित्रकार व फोटोग्राफर भी थे । मेरी पायडल वाली मोटर में भी उन्होंने ही पेंट किया था । 

1964 जून की यह तस्वीर 
उन दिनों एक जुलाई का दृश्य आम दिनों से भिन्न होता था सड़क पर स्कूल ड्रेस पहने बच्चों की भीड़ टन टन घंटी बजाते साइकिल और रिक्शे वाले । मेरे पाँव पहले ही दिन रास्ता नापते हुए देशबंधु वार्ड और खामतालाव वार्ड पार कर मस्जिद से कुछ आगे बने ढोला स्कूल की इमारत में पहुँच गए ।
ढोला प्राइमरी स्कूल 
बाईं ओर के पहले कमरे में चौथी कक्षा लगती थी और प्रधान अध्यापक शिवहरे गुरूजी क्लास टीचर थे । उस  साल बोर्ड के इम्तिहान होने थे और गुरूजी ने साल के प्रारम्भ से ही मुझे पढ़ाई करने की हिदायत दे दी थी । कक्षा में पहला नंबर आने के लिए कोंचने वालों में बाबूजी के साथ गुरूजी भी शामिल थे । तीसरी कक्षा में बीमारी की वज़ह से मेरी रैंक  चौथी आई थी सो उसकी भी भरपाई करना था  । 

दोपहर में स्कूल से लौटने के बाद मैं पढाई करता और शाम को खेलने निकल जाता । मेरे अवचेतन में दबे शब्द जो पहले बड़बड़ाहट के रूप में निकलते थे अब गुनगुनाहट में बदल गए । बाबूजी ने एक दिन मुझे कोई गीत गुनगुनाते हुए देखा तो भारतीय संगीत विद्यालय के संचालक अपने मित्र सुधाकर हांडे से यह बात बताई। हांडे सर ने मुझे अपने विद्यालय की शास्त्रीय गायन की प्रवेशिका कक्षा में  भरती कर लिया । हांडे सर दृष्टिबाधित थे लेकिन बहुत सुन्दर थे । उनका गौर वर्ण और मीठी आवाज़ मेरे कानों में अब भी गूंजती है । उन्होंने प्रेम विवाह किया था और उनके दो बेटे थे । 

बेला के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में बाबूजी के साथ एक शिक्षक श्री गजानन राव नानोटी भी थे । वे तबले में विशारद थे ৷ बाबूजी ने उनसे जब मेरी संगीत में रूचि के विषय में बात की तो उन्होंने बाबूजी से कहा कि वे मुझे तबला सीखने के लिये उनके पास भेजें ৷ बाबूजी ने मुझसे कहा लेकिन मेरी रुचि गायन में थी इसलिए मैंने गायन की कक्षा ही ज्वाइन की । 

नानोटी काका का निवास 
मेरी शामें अब खेल के मैदान की बजाय  राग रागिनियों की सोहबत में गुज़रने लगीं । शाम होते ही मैं अपनी कॉपी उठाता और संगीत विद्यालय की ओर कदम बढ़ा देता । 

इधर शरद,प्रमोद,गुल्लू,बाबा, मन्या,और रामकिशन खुप्पस, कंचे और भौरा खेलने के लिए मेरी राह देखते और मैं संगीत विद्यालय में आलाप,तान,आरोह अवरोह, वादी,संवादी, ध्वनि ,नाद, लय, मात्रा, ताल, स्वर, चल स्वर, अचल स्वर, शुद्ध स्वर, विकृत स्वर जैसे दोस्तों के साथ अल्हैया बिलावल,यमन खमाज,भूपाली,बागेश्री  जैसे रागों के खेल खेलता  रहता । 

हांडे सर मुझे बहुत चाहते थे, वे अक्सर कहते थे जीवन एक राग की तरह ही है । जीवन की शुरुआत बचपन के आरोह से होती । फिर हम युवावस्था तक पहुँचते हैं और उसके बाद जीवन का अवरोह प्रारंभ होता है वृद्धावस्था आती है जहाँ हमारी स्थिति फिर बचपन जैसी होती है । इसी बीच सुख दुःख के आलाप, तान ,लय आदि आते हैं । 

हांडे सर ने बहुत मनोयोग से मुझे संगीत की शिक्षा दी । मेरे पास एक कॉपी थी जिसमें कई राग रागिनियों के बोल लिखे थे । अक्सर ऐसा होता था कि घर में कोई आता तो बाबूजी मुझे कोई राग गाने के लिये कहते । यद्यपि बिना साज के गाना कठिन होता था लेकिन मैं बोल सुनाकर ही प्रसन्न हो जाता था । 

इस तरह वह साल भी बीत गया और परीक्षा का समय आ गया । सर ने एक तारीख दी और कहा कि इस दिन सभी लोगों को आना है इस दिन बाहर से एक्ज़ामिनर आयेंगे और परीक्षा लेंगे उसके बाद सभी को एक प्रमाणपत्र मिलेगा । अब पता नहीं कैसे मुझे तारीख को लेकर कंफ्यूज़न हो गया । जो तिथि मुझे याद थी उस दिन मैं पहुँचा तो पता चला कि गायन की परीक्षा तो एक दिन पूर्व ही हो गई है । मैं बहुत निराश हो गया और रुआँसा भी हो गया । 

लेकिन हाँडॆ सर ने कहा “ निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है , हम ही तुम्हारी परीक्षा ले लेंगे ৷ “ फिर उन्होंने कई राग रागिनियाँ मुझसे गवाईं और इस तरह मेरी परीक्षा सम्पन्न हुई । हालाँकि यह मुझे बहुत बाद में पता चला कि मूल परीक्षा में मुझे अनुपस्थित बताया गया था और उस दिन मेरा मन रखने के लिये ही मुझसे गवाया गया था । इसलिए उस परीक्षा का कोई प्रमाणपत्र मेरे पास नहीं है ৷

सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी और दिन धोने के बाद सिकुड़ जाने वाले सूती कपड़े की तरह कुछ छोटे हो गए थे ।

 उस साल फिर बैतूल में पुराने मकान के उपरी कमरे में लक्ष्मीजी हमारी राह देख रही थीं । पटाखे छुड़ाकर और गन्ने खाकर हम लोग भंडारा लौट आये । आते समय बाबूजी दादा दादी यानी  बापू और अम्मा को भी साथ ले आये थे । बापू ने भंडारा पहुँचते ही घर में ही छपरी में एक अस्थायी दवाखाना खोल दिया और मोहल्ले के तमाम लोग उनके पास अपने दुख दर्द लेकर आने लगे । बापू उन्हे निशुल्क परामर्श व दवाएँ दिया करते थे । 

दादा दादी के सान्निध्य मे कुछ दिन 

सामने की गली से शुरू होने वाले हमारे घर का पिछला दरवाज़ा पीछे की गली में खुलता था जहाँ बंद गली के आख़िरी मकान के रूप में सहसराम और गजराबाई का मकान था । घर के  आँगन में  पकी मिटटी की एक नान्द थी, जिसे मिट्टी में आधा गाड़ दिया गया था  । उसमें वे लोग घर का बचा हुआ खाना डाल दिया करते थे । शाम को जब सहसराम अपने खेत से हीरा मोती की जोड़ी लिए घर लौटते तो वे बैल  उस नांद में मुँह डालकर अपना भोजन तलाशने लगते । जानवर बिना कुछ कहे हमारा जूठन खा लिया करते थे, यह तो बाद में मुझे मालूम हुआ कि उस वक़्त भी हमारे देश में ऐसे कई लोग थे जिन्हें जानवरों की तरह जूठन भी नसीब नहीं होता था ।

बापू की सुबह चिड़ियों के चहचहाने से होती । मुझे साथ लेकर वे मुंह अँधेरे गजरा बाई के खेत की ओर निकल जाया करते और खेत से ज्वार का एक भुट्टा तोड़कर उसके दाने चिडियों को खिलाया करते । मैं उनके साथ ‘आ’ ‘आ’ कहता हुआ चिड़ियों को मनुष्यों की भाषा सिखाने का प्रयास करता ।  गजराबाई के घर में एक गाय थी और गाय जैसी एक बिटिया जिसका नाम शांति था ।


वह गाय का दूध दुहती थी । प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व की कक्षा में जब मैंने बेटी के लिए संस्कृत शब्द ‘दुहिता’ पढ़ा तो मेरे मानस पटल पर दूध दुहती हुई शांति का चेहरा ही उभरा । शांति अभी भंडारा में ही अपने नाती पोतों के साथ उसी घर में रहती है । कुछ दिनों बाद अम्मा और बापू  वापस बैतूल चले गये ।

उस वर्ष का जाड़ा प्रेमचंद की कहानी पूस की रात के जाड़े की तरह ही हाड़ कंपा देने वाला था । 

वह जनवरी का महीना था । सुबह स्कूल से लौटा तो देखा दरवाज़े पर पोस्टमैन खड़ा है और उसके हाथों में एक तार है । उन दिनों टेलीग्राम आने का अर्थ होता था किसी की मृत्यु की सूचना । बाबूजी ने काँपते हाथों से तार खोला । तार बैतूल से आया था और उसमें बापू के निधन का समाचार था । हम लोगों ने जल्दी जल्दी तैयारी की और नागपुर के लिए रवाना हो गए । नागपुर में स्टेशन पर ही अन्य रिश्तेदार भी मिल गए । हम सब पेसेन्जर से बैतूल के लिए रवाना हुए लेकिन बैतूल की परम्परा के अनुसार अग्निसंस्कार तो शाम को ही हो चुका था । वहाँ पहुँचने के बाद बाबूजी चिता के दर्शन के लिए गए । बापू की मृत्यु के उपरान्त दसवें दिन दशगात्र हुआ और हम सभी के सर मुंडा दिए गए । दशगात्र के तीसरे दिन तेरहवीं हुई । 

दादाजी का अंतिम चित्र 
ग़नीमत कि ठण्ड उसके बाद कम हो गई थी वर्ना सर पर लगी टोपी भी सर की रक्षा नहीं कर सकती थी । सब बच्चों के बीच घुटा हुआ सर लेकर जाना भी बहुत अटपटा सा लगता था इसलिए कि  बच्चे चमनगोटा या टकलू कहकर मजाक उड़ाते थे । ऐसे में मेरी दोस्ती नानक चंद पंजाबी से हुई । वह बिलकुल भी मज़ाक नहीं उड़ाता था । नानक के पिता की गांधी चौक में मेन रोड पर किराने की एक दुकान थी, जहाँ कभी कभी मैं नानक के साथ बैठा करता था ।

मैंने अपने अकेलेपन में फिर शब्दों से दोस्ती कर ली । चाक पर पात्र रखने से पहले मिटटी गूंदने की तरह मैं कागज़ पर कुछ कुछ लिखने लगा था । फिर एक दिन पोस्टकार्ड पर एक छोटी सी कहानी लिखकर नागपुर से निकलने वाले अखबार  ‘नवभारत’ के बच्चों के कालम ‘बच्चों की फुलवारी’ में भेज दी । 

नानक के घर नवभारत आता था उसने स्कूल में बताया कि तुम्हारी कहानी “सुनो सबकी करो मनकी‘ अखबार में छपी है । फिर मैंने उसे मैंने नानक की दुकान पर ही देखा । मेरी पहली प्रकाशित कहानी की कोई कॉपी मेरे पास नहीं है यहाँ तक कि यह भी याद नहीं कि उसमे मैंने क्या लिखा था । 

नानक से मेरी दोस्ती सातवीं क्लास तक चली । फिर स्कूल से निकलने के बाद उससे मिलना जुलना कम हो गया । नौकरी लगने के बाद छुट्टियों मे कभी भंडारा जाता तो उसकी दुकान पर जाता था लेकिन हमेशा उसे नशे में धुत पाता । मैंने और घनश्याम ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह शराबियों की तरह हमें भरोसा देता रहा  । इधर मौत घात लगाये बैठी थी एक दिन उसे अपने साथ ले गई बड़े होने के बाद नानक को पीने की लत हो गई थी जिसकी वज़ह से उसका असामयिक निधन हो गया ।  

शरद कोकास