अब जब इतना सब कुछ अपने पड़ोस में आ गया है तो उनके बारे में भी हम वही बातें करेंगे जो अपने पड़ोस के बारे मे करते हैं,पड़ोसियों के सुख-दुख मे शामिल होते हैं,उन्हें तीज-त्योहार पर शुभकामनायें देते है,अपने घर कोई अच्छी सब्ज़ी बनी तो एक कटोरी उनके घर पहुंचाते हैं,कोशिश करते है कि उनसे लडाई-झगडा ना हो और हो भी गया तो ज़्यादा दिन तक बोलचाल बन्द ना रहे.
मिल जुल कर रहने के तो अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन लडाई का सिर्फ एक कारण पर्याप्त है मसलन उनका पानी हमारे आंगन में बहकर क्यों आया,या उनके बच्चे ने हमारे बच्चे की पिटाई क्यों कर दी.वगैरह वगैरह..अब इसे विस्तृत सन्दर्भ में देखें तो लडाई के कारण 'हमारे राज्य की नदी का पानी वे कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं?' से लेकर 'उनका आतंकवादी हमारे देश में कैसे घुस आया' तक हो सकते हैं और भी हैं कारण.. उनके राज्य का निवासी हमारे राज्य का निवासी कैसे हो सकता है या हमारे यहाँ बनने वाली बिजली पर पहले हमारा हक़ है आदि.
अरे अरे. मै तो ज़रा ज़्यादा ही विस्तार में चला गया था . कोई बात नहीं पडोसी देश तक बाद में पहुंचेंगे पहले बात अपने पड़ोस याने घर के पास से ही शुरु की जाये पता नहीं इसमें आपकी रुचि हो ना हो लेकिन मुझे लगता है अमूमन हर भारतीय की अपने पड़ोस सम्बन्धी अवधारणा लगभग एक सी होती है भले ही गाँव और शहर के पड़ोस में अंतर हो लेकिन हमारे जीवन के मूल राग तो वही हैं,प्रेम,घृणा,क्रोध,ईर्ष्या...यही सब मिलकर इस दुनिया में हमारे अस्तित्व को निर्धारित करते हैं.
आज का मूल वाक्य यही कि पड़ोसी से कोई व्यवहार करने से पहले हम अवश्य सोचें .."जैसे हमारे लिये वह पड़ोसी है वैसे ही हम भी उसके लिये पड़ोसी हैं.
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आपका- शरद कोकास
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आपका- शरद कोकास