12 जून 2009

पास पड़ोस पर दूर तक नज़र डालें

पास पड़ो का अर्थ केवल अपने घर के आसपास के घरों से ना लें,यह पड़ोस पूरा मोहल्ला हो सकता है,पड़ोस का मोहल्ला भी ,पड़ोस का शहर या पड़ोस का ज़िला भी ,फिर पड़ोस के राज्य को और पड़ोस के देश को भी कह सकते हैं अपना पास पड़ोस. अब जब इतना सब कुछ अपने पड़ोस में आ गया है तो उनके बारे में भी हम वही बातें करेंगे जो अपने पड़ोस के बारे मे करते हैं,पड़ोसियों के सुख-दुख मे शामिल होते हैं,उन्हें तीज-त्योहार पर शुभकामनायें देते है,अपने घर कोई अच्छी सब्ज़ी बनी तो एक कटोरी उनके घर पहुंचाते हैं,कोशिश करते है कि उनसे लडाई-झगडा ना हो और हो भी गया तो ज़्यादा दिन तक बोलचाल बन्द ना रहे.मिल जुल कर रहने के तो अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन लडाई का सिर्फ एक कारण पर्याप्त है मसलन उनका पानी हमारे आंगन में बहकर क्यों आया,या उनके बच्चे ने हमारे बच्चे की पिटाई क्यों कर दी.वगैरह वगैरह..अब इसे विस्तृत सन्दर्भ में देखें तो लडाई के कारण 'हमारे राज्य की नदी का पानी वे कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं?' से लेकर 'उनका आतंकवादी हमारे देश में कैसे घुस आया' तक हो सकते हैं और भी हैं कारण.. उनके राज्य का निवासी हमारे राज्य का निवासी कैसे हो सकता है या हमारे यहाँ बनने वाली बिजली पर पहले हमारा हक़ है आदि. अरे अरे. मै तो ज़रा ज़्यादा ही विस्तार में चला गया था . कोई बात नहीं पडोसी देश तक बाद में पहुंचेंगे पहले बात अपने पड़ोस याने घर के पास से ही शुरु की जाये पता नहीं इसमें आपकी रुचि हो ना हो लेकिन मुझे लगता है अमूमन हर भारतीय की अपने पड़ोस सम्बन्धी अवधारणा लगभग एक सी होती है भले ही गाँव और शहर के पड़ोस में अंतर हो लेकिन हमारे जीवन के मूल राग तो वही हैं,प्रेम,घृणा,क्रोध,ईर्ष्या...यही सब मिलकर इस दुनिया में हमारे अस्तित्व को निर्धारित करते हैं.आज का मूल वाक्य यही कि पड़ोसी से कोई व्यवहार करने से पहले हम अवश्य सोचें .."जैसे हमारे लिये वह पड़ोसी है वैसे ही हम भी उसके लिये पड़ोसी हैं.
"

आपका-शरद कोकास

5 टिप्‍पणियां:

  1. भईया कहते है रिश्ते दार से पहले पडोसी होता है, इस लिये हमे अपने पडोसी से जरुर बना कर रखनी चाहिये, बहुत सुंदर लिखा आप ने धन्यवाद

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  2. दिक्कत तो यही है ना कि पास पडोस से अन्जान रहना मार्डन होना बनता जा रहा है

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  3. बहुत अच्छी बात कही आपने......एक अच्छा पास-पड़ोस मिलना आजकल दुर्लभ हो गया है, खासकर के बड़े शहरों में जहां सब अपने घरों में बंद हैं......कोई खबर नहीं आस-पास की. इसीलिए अपनी पसंद तो छोटे शहर और विशषकर गाँव हैं, जहां भी जाओ एक अपनापन होता है....

    साभार
    हमसफ़र यादों का.......

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  4. बेनामी05/07/2009, 11:28:00 pm

    raviwar.com se aapke blog ka pata chala. bahoot sundar blog hai.
    Rajni

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आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें