2 दिसम्बर 1984 ..का वह दिन । एक सप्ताह से मैं भोपाल में अपने रंगकर्मी व कवि मित्र सुरेश स्वप्निल के साथ आवारागर्दी कर रहा था ..। ओपन एयर थियेटर..भारत भवन में बावा कारंत का नाटक..श्यामला हिल्स की ठंडी हवाएँ... ..रीजनल कॉलेज के अपने दोस्त...मार्क्सवाद और फ्राइड पर बहस ...छोटे तालाब में बोटिंग ...न्यू मार्केट में मटरगश्ती...इब्राहिमपुरे के पटिये... स्टोनवाश की जींस...रंगमहल में दोपहर के शो में चार्ली चैपलीन की फिल्म ... वगैरह वगैरह बदमस्तियाँ चल ही रही थीं कि अचानक दोपहर में मैने ऐलान कर दिया .. छत्तीसगढ एक्सप्रेस से वापस जा रहा हूँ । हमारी दोस्ती में रोकने का तरीका एक ही था बैग से कपड़े और सामान निकालकर इधर उधर फेंक दिये जायें ताकि ट्रेन के समय तक उन्हे बटोरा नहीं जा सके और जाना कैंसल हो जाये ।
अचानक पी.एण्ड.टी कॉलोनी के पास से गुजरते हुए याद आया कि दुर्ग स्टेशन पर एक मित्र छोटू ने कहा था..भाईजान भोपाल जा रहे हो वहाँ पी.एण्ड टी. कॉलोनी में मेरे एक रिश्तेदार रहते हैं कदीर अहमद ..हो सके तो..। हम लोग उसी कॉलोनी के भीतर थे ,कदीर अहमद का मकान मिल गया .. हम उन्हे देख रहे थे लेकिन घर का कोई सदस्य हमें नहीं देख पा रहा था , गैस की वज़ह से सभी की आँखें सूजी हुई थी । अचानक याद आया ..अरे आज तो ईदे-मिलादुन्नबी है.. मैने जैसे ही आदतन "ईद मुबारक " कहा वे फूट फूट कर रोने लगे ।पता चला कि उस घर के बाकी लोग तो बच गये थे लेकिन बुज़ुर्ग जो भाग नहीं पाये थे वे बच नहीं पाये थे ।और कमोबेश हर घर का यही हाल था । सबसे ज़्यादा मारे गये वे ग़रीब जो खुले में रहते थे । जो लोग बन्द कमरों मे सो रहे थे वे बच गये । हाँलाकि कौन बच गया और कौन नहीं बच सका इसका कोई मापदंड नहीं था । कुछ लोग आँख में जलन की वज़ह से पानी के छींटे मारते रहे सो गैस के पानी में घुलनशील होने की वज़ह से बच गये । कुछ लोग भागकर सुरक्षित स्थानो पर चले गये सो बच गये तो कुछ भागने के कारण ज़्यादा गैस साँस के साथ लेने की वज़ह से मर गये ..। सब कुछ गड्डमडड हो रहा था .. लोग इतने असहाय थे कि किसीकी समझ मे यह नहीं आ रहा था कि इन मौतों का असली ज़िम्मेदार तो यह मल्टीनेशनल है ..यह यूनियन कार्बाइड का खूनी कारखाना ।वापस लौटते हुए मैं भी सिर्फ अपने बारे में सोच रहा था ...मान लो दो दिसम्बर की उस शाम, सात बजे छूटने वाली छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस दो घंटे लेट हो जाती तो ? .... क्योंकि सुना तो यही था कि रात नौ बजे के बाद उस स्टेशन पर कोई ज़िन्दा नहीं बचा था यहाँ तक कि स्टेशन मास्टर हरीश धुर्वे भी...।
मित्रों .. अगर ऐसा होता तो आप लोग कैसे जान पाते कोई शरद कोकास भी था ......आप भी यही कहेंगे ना .. हमसे मिलना था इसलिये बच गये ??? (चित्र 1-कमला पार्क से भोपाल ताल का नज़ारा 2-यूनियन कार्बाइड कारखाना 3-गैसपीड़ित 4-भोपाल स्टेशन का प्लेट्फॉर्म नम्बर एक जहाँ मैने मौत से रेस जीती ::: गूगल व कैमरा-ए-कोकास से साभार )
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें