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10 जून 2026

123. भंडारा : ‘कटी पतंग’ पकड़ने दौड़े ‘हाथी मेरे साथी’

 



छात्र जीवन के शब्दकोष में पढाई-लिखाई,क्लास,सर,मैडम,कॉपी,किताब,पैन, घंटी,पीरियड,प्रेयर,लैब

लायब्रेरी,अटेंडेंस,होमवर्क,प्रैक्टिकल,एग्जाम,हॉलीडेज,खेलकूद,शरारत,छेड़खानी,नाटक,गाना,पिकनिक,फंक्शन

के अलावा एक ऐसा शब्द और होता है जिसे ‘बंक’ कहते हैं ৷ वाक्य में इसका प्रयोग ‘क्लास से बंक मारना’ में होता है ৷

यह एक ऐसा कार्य होता है जिसके अंतर्गत सारे छात्र छात्राएँ आपस में सलाह कर लेते हैं कि आज इस इस पीरियड में नहीं जाना है ৷ एक साथ क्लास से गोल मारने का लाभ यह होता है कि पढ़ाई का नुकसान नहीं होता ৷ यह कार्य साहस की पृष्ठभूमि में योजनाबद्ध तरीके से परस्पर सहयोग और विश्वास पर आधारित होता है और इसमें धोखा देने वाले का सामूहिक बहिष्कार होने की संभावना हो सकती है ৷ अलग अलग क्षेत्रों में इस क्रिया  के अलग अलग नाम हो सकते हैं जैसे हम लोग स्कूल में इसे ‘कॉमन चाट’ और कॉलेज में ‘जनरल गोल’ कहते थे ৷ 

हम लोग भंडारा जैसे छोटे से शहर के छोटे से स्कूल में पढ़ते थे ৷ यहाँ कॉमन चाट का कल्चर नहीं के बराबर था इसलिए सामूहिक बंक मारने की ऐसी नौबत ही नहीं आई  ৷ जिसको जब कोई काम होता या स्कूल  आने का मन नहीं होता तो वह वैसे ही स्कूल नहीं आता था ৷ पढ़ाई-लिखाई से सरोकार भी बहुत कम लोगों को था  ৷ वैसे कभी किसी रोज़ पढ़ने का मन नहीं होता था तो हम लोग टीचर से निवेदन कर लेते कि सर आज मन नहीं है, क्लास छोड़ दीजिए  ৷ हमारे कुछ टीचर इतने भले थे कि कई बार हमारी भावनाओं का मान रखते हुए ख़ुद ही पढ़ाने नहीं आते थे ৷ वैसे भी वे लोग साल भर टीकाकरण, जनगणना, मत गणना, पशुगणना, मलेरिया उन्मूलन, कुष्ठ उन्मूलन,चेचक उन्मूलन  जैसे सरकारी महत्त्व के कार्यक्रमों में लगे रहते थे ৷ 

इसी तारतम्य में एक बार सब बच्चों का बंक मारकर फिल्म देखने का प्रोग्राम बन गया ৷ यद्यपि संवैधानिक रूप से इसके लिए बंक मारना शब्द उचित नहीं होगा इसलिए कि यह पहले ही घोषित किया जा चुका था कि अगले दिन शिक्षकों के किसी अन्य कार्य में व्यस्त होने के कारण दोपहर बाद कक्षायें नहीं लगेंगी । बच्चों ने तय किया कि इस समय का सदुपयोग पढाई लिखाई, नोट्स बनाने या किसी शिक्षक का सर खाने जैसे व्यर्थ के कामों में न कर फिल्म देखने में किया जाये ৷ वैसे भी उन दिनों श्रीकृष्ण टाकीज़ में ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी फिल्म लगी थी और माना जा रहा था कि चंद प्रणय दृश्यों को यदि नज़र अंदाज़ कर दिया  जाए तो यह फिल्म बच्चों के मनोरंजन के लिए ही बनी है ৷  

  समय का सदुपयोग करने में लड़कों की बुद्धि ज़रा कम चलती है इसलिए फिल्म देखने का प्रोग्राम उनके द्वारा पहले नहीं बनाया गया लेकिन जैसे ही किसी गुप्त भेदिये द्वारा लड़कों को यह पता चला कि अगले दिन कक्षा की तमाम लड़कियों का मैटिनी शो में फिल्म जाने का प्रोग्राम है ‘हम क्या लड़कियों से कम हैं’ की प्रतिस्पर्धा भावना से उन्होंने भी अपना प्रोग्राम भी बना लिया । सिनेमाहाल में लड़के लडकियाँ भले ही अलग अलग क्लास में बैठते लेकिन मासूमियत भरा यह अहसास तो बना रहता कि लड़कियों के साथ पिक्चर देखने गए थे ৷ 

वह राजेश खन्ना उर्फ़ ‘काका’ का युग था । उस समय शहर में राजेश खन्ना की दो फिल्मे लगी थीं, आदर्श में ‘कटी पतंग’ और श्रीकृष्ण में ‘हाथी मेरे साथी’ । कटी पतंग के बारे में सुन रखा था कि वह रोने धोने वाली फिल्म है ৷ वैसे भी  हमारा फर्स्ट प्रेफरेंस तो ‘हाथी मेरे साथी’ ही थी ৷  तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार दोपहर तीन बजे हम लोग श्रीकृष्ण टाकीज़ पहुँचे ৷ बुकिंग विंडो पर भारी भीड़ थी लेकिन हमारी क्लास में कुछ ऐसे छात्र थे जिन्हें बुकिंग विंडो के जंगले के ऊपर चढ़कर, खिड़की में हाथ घुसाकर टिकट प्राप्त कर लेने में महारत हासिल थी ৷ 

उस ज़माने में शहर में चल रही फ़िल्म का मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह होता था कि शहर में जिस हीरो की फिल्म जितने दिन चलती थी उतने दिन लड़के उसी स्टाइल में चलते फिरते व बात करते थे ৷ हालाँकि टिकट खिड़की पर इन मित्रों के शौर्य एवं बल प्रदर्शन को देखकर मुझे लग रहा था कि वे राजेश खन्ना को नहीं बल्कि हाथियों को इस फिल्म का हीरो समझ रहे थे ৷ वैसे कमोबेश यह बात सच भी थी ৷

टिकट कटाकर फुर्ती से हम लोग भीतर प्रवेश कर गए ৷ फर्स्ट क्लास के पीछे ही लेडीज़ क्लास था ৷ इंटरवल तक तो कोई चांस नहीं था लेकिन जैसे ही प्रोजेक्टर बंद हुआ और हाल में लाइट जली हम लोगों ने तपाक से गर्दन घुमाई और  कनखियों से पीछे देखना शुरू किया ৷ हमें अपनी क्लास की एक भी लड़की वहाँ नहीं दिखाई दी ৷ क्षण भर के लिए यह ख्याल भी आया कि कहीं बालकनी में ना चली गई हों लेकिन उन दिनों हायर सेकंडरी के पहले यह वर्ग परिवर्तन संभव ही नहीं था ৷ लेडीज़ क्लास में झांकना अभद्रता थी लेकिन जब कोई न दिखा तो हम पूरा घूम गए और आँखें फाड़ फाड़कर भी देखा, लेकिन फिर भी कोई न दिखा ৷

शेष फिल्म हम लोगों ने घनघोर दुःख और निराशा में देखी ৷ हमारा दुःख उस दुःख से कम नहीं था जैसा कि राजेश खन्ना को अपने प्रिय हाथी रामू के मर जाने के बाद रहा होगा ৷ हमारी इच्छाएँ भी तो हाथी जैसी ही थीं जिन्हें सहेजकर रखना बहुत कठिन था ৷ परदे पर ‘दी एंड’ आने के पहले ही उनका ‘दी एंड’ हो चुका था ৷ शो खत्म होने पर हाल की बत्तियां जलते ही हम लोग सर झुकाए हुए भारी मन और भारी कदमों से बाहर निकले ৷ किसी चमत्कार की आशा में एकाध निगाह लेडीज़ क्लास की ओर भी डाली ৷ 

श्रीकृष्ण टाकीज़ से बाहर आकर गाँधी चौक की ओर बढ़ते हुए जैसे ही हम लोग आदर्श टाकीज़ के सामने पहुँचे अचानक एक लड़का चीखा ..”वो देख लडकियाँ” सबके झुके हुए सर तत्काल ऊपर उठे, हमने देखा ‘कटी पतंग’ का शो छूट चुका था और आदर्श टाकीज़ से बाहर आने वाली दर्शकों की भीड़  में  हमारी क्लास की लड़कियां भी चली आ रही थीं ৷ हमें समझ में आ गया कि हमारी पतंग इस तरह कटी थी ৷ 

अगला दिन हम लोगों के लिए खीझ और ग्लानि के पर्व की तरह था ৷ हमारा गुप्त भेदिया आधी ख़बर ग़लत लाया था लेकिन सिर्फ इसलिए पिटते पिटते बचा था कि उसकी आधी ख़बर सही थी  ৷ उनका गुप्त भेदिया परफेक्ट था । उन्हें पहले ही पता चल गया था कि लड़के उन्ही के चक्कर में फिल्म देखने गए थे और ‘कटी पतंग’ की जगह ‘हाथी मेरे साथी’ देख आए थे ৷ यही कारण था कि हम लोग उनसे ठीक ठीक नज़रें भी नहीं मिला पा रहे थे ৷ बाद में पता चला कि उन लोगों का तो पहले से ही प्रोग्राम ‘कटी पतंग’ देखने का था ৷

हालाँकि हम लोग बहुत दिनों इस प्रश्न का उत्तर नहीं ढूंढ पाए कि ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी भीड़खेंचू पॉपुलर फिल्म छोड़कर लडकियाँ ‘कटी पतंग’ जैसी रोनी धोनी फिल्म देखने कैसे पहुँच गईं ? सच बात तो यह थी कि हम लोग उस उम्र में भी कार्निवाल में खेल दिखाने वाले ‘ओ मेरे हाथी’ पर ही अटके हुए थे और हमारी हमउम्र लडकियाँ ‘ये जो मोहब्बत है’ तक पहुँच गई थीं ৷ इस तरह इस घटना के आलोक में हमें यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि लड़कियाँ शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी लड़कों की अपेक्षा पहले मेच्योर होती हैं । 

 शरद कोकास 

113.बैतूल : अजीब दास्ताँ है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम


ज्योति टॉकीज 

गर्मियों के उन दिनों में सूरज का ज़ोर बस दोपहर पर ही चलता था ৷ शाम होते ही स्त्रियाँ बाल्टियों में पानी लेकर निकलतीं जिसे आंगन में सींचते हुए वे सूरज के अरमानों पर पानी फेर देतीं ৷ शामें कुछ ऐसी ठंडी हो जाती थीं कि सूरज पर रहम आने लगता ৷ आंगन में पड़ी धूल पर पानी पड़ते ही हवा में मिटटी की सोंधी सोंधी महक उठती ৷ मुझे लगता अगर मैं इत्र फरोश होता तो माटी की वह सोंधी गंध काँच की एक  छोटी सी शीशी में कैद कर लेता और भविष्य में जब भी मुझे खूबसूरत शामों वाले उस अतीत में जाना होता उस शीशी से ख़ुशबू का एक कतरा  रुई के फाये में लगाता और धीरे से कान के पीछे खोंस लेता ৷ 

दोपहर भर अलसाने के बाद इधर मोहल्ले की सयानी कुतिया नीम के पेड़ की छाँव से अंगड़ाई लेकर उठ खड़ी होती, उधर रघुबीर टॉकीज़ की मुंडेर पर लगे लाउडस्पीकर से शाम के पहले खेल की सूचना देता रिकॉर्ड बज उठता ..जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा .. इसका अर्थ होता बुकिंग शुरू हो गई है, अब आप टिकट कटा सकते हैं ৷ गणेश जी की आरती के  बाद धर्म से सीधे संस्कृति में प्रवेश करता हुआ अगला रिकॉर्ड बजता ...प्यार किया कोई चोरी नहीं की प्यार किया... प्यार किया कोई चोरी नहीं की, छुप छुप आहें भरना  क्या, जब प्यार किया तो डरना क्या ..৷ 

बस इतना सुनकर वैजयंती मालाओं, आशा पारेखों, वहीदा रहमानों , निम्मी सिम्मियों, देवानंदों और दिलीप कुमारों के तमाम प्रेमी सिनेमाघर की ओर कदम बढ़ा देते ৷ कुछ ‘अजीब दास्ताँ है ये’ सुनाकर,’लग जा गले के फिर ये मुलाकात हो न हो ’ कहकर और हज़ारों रंग के नज़ारे बन जाने वाले कवि नीरज के ख़त लिखकर रिकार्डिंग का अवरोह पुनः गणेश वंदना के साथ ही होता “जय जय हो गणेश काटो हमरे कलेश, आये शरण तिहारी बलिहारी हो, जय गणपति विजय हमारी हो ৷“ जैसे ही यह वंदना समाप्त होती गेटकीपर दरवाज़ों पर लगे काले पर्दे सर्र से सरका कर गेट बंद करते और भारतीय समाचार चित्र के साथ रघुबीर टाकीज में सिनेमा का पहला खेल शुरू हो जाता ৷  

रघुबीर टाकीज के मंदिर जैसे पवित्र परिसर में हम बच्चों की आवाजाही बिलकुल घर आंगन की तरह ही थी ৷ बुकिंग विंडो पर बुकिंग क्लर्क की और गेट पर गेट कीपर की नौकरी विरासत में लगभग हमारे मोहल्ले के बड़े भैया लोगों को ही मिली हुई थी, सतीश उदासी, राजू उदासी,सुधीर गुंडे, और हमारे दिनेश काका उनमे शामिल ৷ उनके रहने से लाइन में न लगने के अलावा कभी कभी मुफ़्त में फ़िल्म देखने की अतिरिक्त सुविधा भी हम लोगों को मिल ही जाती थी ৷ 

रघुबीर टाकीज़ के परिसर में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर मैनेजर का कक्ष, बालकनी और लेडीज़ क्लास की बुकिंग विंडो थी ৷ बाईं ओर लोवर क्लास की बुकिंग खिड़की और चाय भजिये की होटल, सामने एक लम्बा सा वरांडा उसमे लगा पोस्टर का जाली वाला बॉक्स और थर्ड, सेकण्ड, फर्स्ट और लेडीज़ क्लास के गेट ৷ थर्ड क्लास सबसे आगे की ओर थी यहाँ ज़मीन पर बैठना होता था ৷ उसके पीछे सेकण्ड क्लास थी जहाँ बैठने के लिए  बेंचे थीं जिन पर पीठ टिकाने के लिए पट्टियाँ भी लगी थी ৷ 

लकड़ी की इन पट्टियों में ढेर सारी दरारें थी जिनमे खटमलों ने अपने फ्लैट्स बना लिए थे ৷ दिन भर भूखे रहने वाले यह खूबसूरत से जीव शाम शो शुरू होते ही अपने घरों से बाहर निकलते और जिनकी पीठ उनके घरों की दीवारों से टिकी होती उन पर हमला बोल देते ৷  अब आदमी ‘काँटों से खींच के ये आंचल’ पर नृत्य करती हुई खूबसूरत वहीदा रहमान को देखकर ‘आज फिर जीने की तमन्ना’ पूरी करे या इन शोषक खटमलों पर ध्यान दे ৷

 इसीलिये हम लोग सेकण्ड क्लास में कभी नहीं जाते थे ৷ वैसे भी हमें सैमसंग वाले दारासिंह और ढिशुम ढिशुम वाले शेट्टी पसंद थे ৷ हाँ कभी मुफ्त में सेकण्ड क्लास में बैठने का अवसर प्राप्त हो गया तो सबसे पहले टाकीज से बाहर आते ही वरांडे में पहले अपनी कमीज़ उतारकर उसे ज़ोर ज़ोर से झटकारते ताकि ‘नदी का पानी नदी में जा’ की तरह खटमल वापस अपने निवास स्थान पर चले जाएँ ৷

सेकण्ड क्लास के ठीक पीछे फर्स्ट क्लास थी जहाँ बाकायदा कुर्सियां लगी हुई थीं ৷ हालाँकि इन कुर्सियों में गद्दियाँ नहीं थीं और बैठने वाली सीट बैक पोर्शन की तरह ही दो तीन पटिये जोड़कर बनाई गई थी ৷ यहाँ खटमलों के बंगलों के अलावा उनके बंकर भी बने हुए थे ৷ जैसे ही कोई इन सीटों पर बैठता वे अपने बंकरों में छुप जाते और फिर पूरे तीन घंटे अपने बंकरों से बाहर निकलकर सिनेमा देखने में मग्न लोगों के पार्श्व भाग पर हमला करते रहते ৷ 

फ़र्स्ट क्लास में बैठकर सिनेमा देखने में एक दिक्कत और थी ৷ सेकण्ड क्लास से बाहर आकर हम लोग कमीज तो झटकार लेते थे लेकिन फर्स्ट क्लास से बाहर आकर पैंट उतारकर झटकारना बहुत कठिन काम था ৷ उसके लिए सेंसर बोर्ड से अनुमति भी नहीं मिलती ৷ फिर हम लोग तो हाफ पैंट आश्रम में थे इसलिए हम लोगों के लिए तो और भी मुश्किल थी ৷ खटमलों का प्रत्यक्ष हमला रोकने के लिए हमारे पास आधे अधूरे साधन थे ৷ आखिर पैबंद लगी उन कमज़ोर हाफ़ पैंटों के पीछे हम अपना क्या क्या छुपाते ৷

लेडीज़ क्लास यहाँ भी भंडारा की आदर्श और श्रीकृष्ण टाकीज़ की तरह फर्स्ट क्लास के पीछे ही था, जहाँ से बर्तोल्त ब्रेख्त द्वारा बताये गए कैथोर्सिस अर्थात भावनाओं के विरेचन का बिलकुल भी ध्यान न रखते हुए सिसकियाँ, आहें और अरे अरे, च्चा च्च,  उफ़ उफ़ की आवाजें लगातार आती रहती थीं ৷ इन सब आवाजों के अलावा नौनिहालों के इस बोझिल वातावरण को बर्दाश्त न कर पाने की सूचना देने वाले, उनके महाभयंकर रुदन की आवाजें भी इनमें शामिल रहती थीं ৷ खटमलों द्वारा काटे जाने से बचने अथवा उन्हें घर तक ले जाने की विवशता से बचने की उनके लिए कोई संभावना नहीं थी ৷ यह पितृसत्तात्मक समाज था और स्त्रियों को वह सब करने की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी जो पुरुषों को प्राप्त थी ৷

लेडीज़ क्लास के ऊपर बालकनी थी जिसकी बुकिंग विंडो भी सबसे अलग थी और ऊपर तक जाने की सीढियां भी ৷ यह संपन्न और विशिष्ट लोगों का क्लास था ৷ सुना था कि वहाँ नर्म मखमली गद्दियों वाली कुर्सियां लगी हैं ৷ हम लोगों को सपने में भी कभी बालकनी में बैठकर सिनेमा देखने का ख्याल नहीं आता था ৷ जो लोग बालकनी में बैठकर सिनेमा देखने की हैसियत रखते थे, हम लोग मन ही मन उनसे इर्ष्या करते और सोचते कभी अपना भी टाइम आएगा ৷ 

वर्ग व्यवस्था के इस ढाँचे में हम लोग सर्वहारा थे ৷ अपनी स्थिति  से खुश होते हुए भी हम इन ज़ंजीरों  को तोड़ने का प्रयास करते, हालाँकि थर्ड क्लास में बैठकर बुर्जुआ मानसिकता के फेर में खटमल जैसी आपदाओं से बचने की मान्यता गढ़ लेते और देश की तमाम जनता की भांति थर्ड क्लास में ही खुश रहते ৷ वैसे यहाँ एक सुविधा थी कि हम लोग घर से बोरा ला सकते थे और आराम से पैर फैलाकर और अपने साथी की गोद में सर रखकर लेटे हुए भी पिक्चर देख सकते थे ৷ यथार्थवादी सिनेमा देखते हुए हम कभी कभी यह स्वप्न भी देखते कि कभी तो ऐसी क्रांति होगी जब सभी क्लासों  में एक जैसी कुर्सियाँ होंगी और सभी क्लासों का टिकट भी एक ही मूल्य का होगा ৷ कालांतर में इस स्वप्न का पहला भाग तो पूरा हो गया, लेकिन दूसरा भाग पूरा होना अभी शेष है ৷ हालाँकि ऐसा कभी होगा इस देश में इसकी संभावना तो नहीं के बराबर है ৷


शरद कोकास 

74 .भंडारा : आदर्श टाकीज़ के रुपहले परदे पर दो खेलों में


    आँगन में बैठकर सुबह की धूप सेंकते हुए अचानक कानों में बैंड बाजे की आवाज़ आने लगती हम बच्चे दौड़कर गली के मुहाने पर पहुंचते, पटले की बिल्डिंग से इस ओर आता  हुआ एक जुलूस , आगे आगे बैंड वाले पीछे एक चार चक्कों वाली गाड़ी जिस पर सिनेमा के पोस्टर लगे हैं । उसके पीछे एक रिक्शा और रिक्शे में बैठा सखाराम माइक पर चीखता हुआ .. आदर्श टाकीज़ के रुपहले परदे पर....देखिये ... रोजाना दो खेलों में, जेमिनी का महान शाहाकार, महान सामाजिक पारिवारिक चित्रपट ...गृहस्थी .. जिसमे हैं शानदार सितारे अशोक कुमार, मनोज कुमार, निरूपा राय , राजश्री, ललिता पवार, शोभा खोटे  और हँसी का बेताज बादशाह मेहेमूद । 

सत्तर के दशक में कस्बों और शहरों में यह दृश्य आम था ৷ इसमें एक बात गौर करने लायक थी राज्य की भाषा कोई भी हो लेकिन हिंदी सिनेमा का प्रचार हिन्दी भाषा में ही होता था ৷ हम बच्चों को सिनेमा से कोई विशेष मतलब नहीं होता था लेकिन पीले लाल ताव के कागज़ पर छपी सिनेमा के एक्टरों की तस्वीरें हमें अच्छी लगती थीं उन दिनों बाज़ार में बायनाकुलर की तरह दिखाई देने वाला एक खिलौना भी मिलता था जिसमे सिनेमा की कटी हुई फिल्म का एक टुकड़ा लगाकर हम लोग सिनेमा का मज़ा ले लेते थे 

उस समय तक सिनेमा माँ के साथ लेडीज़ क्लास में ही देखा था इसलिए कि गोद के बच्चों की एंट्री फ्री होती थी और पांच साल तक के बच्चों की आधी टिकट लगती थी । वैसे भी वहाँ बेंचें लगी थीं इसलिए सीट जैसा कोई चक्कर नहीं था । बचपन में माँ के साथ सिनेमा देखने के बाद फिर एक लम्बा गैप रहा । फिर कुछ बड़ा होने पर बाबूजी के साथ जेंट्स क्लास में जाना शुरू किया और नवीं दसवीं तक आते आते दोस्तों के साथ सिनेमा का आनंद लेना शुरू हो गया जो कॉलेज के ज़माने तक चलता रहा ।

अपने जीवन का पहला सिनेमा मैंने भंडारा की आदर्श टाकीज़ में देखा था ।  भंडारा  में उस समय दो टाकीज़े हुआ करती थीं एक का नाम था आदर्श जो गांधी चौक पर थी और दूसरी श्रीकृष्ण जो उससे निकट ही महल जाने के रास्ते पर थी । श्रीकृष्ण टाकीज की जगह अब एक भव्य काम्प्लेक्स बन चुका  है लेकिन आदर्श टाकीज़ अपने बदले हुए रूप में उसी स्थान पर विराजमान है । 

उस समय के सिनेमाघर आज के सिनेमाघरों से बिलकुल ही भिन्न थे । इन सिनेमाघरों में पांच क्लास हुआ करती थीं, सबसे सामने थर्ड क्लास, उसके पीछे सेकन्ड और उसके पीछे फ़र्स्ट । सबसे आखिर में लेडीज़ क्लास होती थी  जिसके ऊपर बालकनी होती थी । कस्बों के सिनेमाघरों में नीचे की ओर  बनी क्लास में पुरुष व स्त्रियाँ साथ साथ बैठकर फिल्में नहीं देखते थे लेकिन सभ्रांत वर्ग के लोग सपरिवार बालकनी में जाया करते थे । 

जब हम लोग सिनेमा जाते थे तो बाबूजी फ़र्स्ट क्लास में सबसे पीछे की लाइन बैठते थे और मैं माँ के साथ लेडीज़ क्लास में सबसे सामने की बेंच पर । दोनों क्लासों के बीच छोटा सा एक लकड़ी का पार्टीशन था । पूरी फिल्म में मैं कभी माँ की गोद में रहता कभी बाबूजी की गोद में । जब माँ के पास ऊब जाता तो माँ मुझे पार्टीशन के उस पार बाबूजी को थमा देती कुछ देर बाद मैं फिर माँ के पास लौट आता । इस तरह आवागमन करते हुए मैंने ढेर साडी फिल्मे देखीं जिनके नाम याद नहीं हैं फिर भी माँ के साथ लेडीज़ क्लास में बैठकर देखी हुई फिल्मों में से कुछ फिल्मों के नाम स्मृति में हैं जैसे ‘संत ज्ञानेश्वर’ , ‘सम्पूर्ण रामायण‘ , ‘हम हिन्दुस्तानी‘ , ‘मैं चुप रहूँगी’ ‘दादी माँ’ आदि । 

जब समझदार हो जाने की उम्र में आ जाने के कारण सिनेमा प्रशासन द्वारा मुझे लेडीज़ क्लास से बेदख़ल कर दिया गया  तब मैं बाबूजी के साथ फ़र्स्ट क्लास में बैठ कर सिनेमा देखने लगा । वैसे भी मेरी जगह माँ की गोद में बैठने का सुख मेरी छोटी बहन को मिलने लगा था । लेकिन बीच में एक खराब दौर ऐसा भी आया जब मैं न हिंदुस्तान का रहा न पाकिस्तान का । हुआ यह कि शुरू शुरू में तो बाबूजी माँ को और हम बच्चों को साथ लेकर सिनेमा जाते थे लेकिन कस्बों में विद फैमिली देखने की वैसी परम्परा न होने के कारण यह क्रम शीघ्र ही समाप्त हो गया । अब बाबूजी अकेले ही सिनेमा चले जाते थे और माँ कभी कभार पड़ोसनों के साथ । मेरा नम्बर दोनों पार्टी में नहीं आता था इसलिए साल भर के इस अभाव की पूर्ति मैं दो महीनों की छुट्टियों में बैतूल में अपने भाइयों के साथ सिनेमा देखकर कर लिया करता था । वैसे भी बैतूल में इतना बड़ा कुनबा था कि  किसी को पता ही नहीं होता था कौन कहाँ किसके साथ जा रहा है ।

बाबूजी भी इस बात को जानते थे इसलिए कुछ नहीं कहते थे । लेकिन भंडारा लौटकर आने के पश्चात सिवाय पंद्रह अगस्त छब्बीस जनवरी को बच्चों वाला सिनेमा फ्री में देखने के अलावा जुलाई से अप्रेल तक सिनेमा देखने का कोई चांस नहीं होता था । एक बार एक अप्रत्याशित सी बात हुई । बाबूजी शाम को ड्यूटी से लौटकर आये और मुझसे कहा चलो सिनेमा देखकर आते हैं । मुझे आश्चर्य हुआ लेकिन बाबूजी के साथ सिनेमा देखने का अवसर लम्बे समय के बाद आ रहा था इसलिए ख़ुशी भी मुझसे छुपाई नहीं जा रही थी ।

बाबूजी मुझे साईकिल की पिछली सीट पर बिठाकर आदर्श टाकीज ले गए । उन्होंने  फर्स्ट क्लास की दो टिकटें कटवाई और हाल में प्रवेश कर गए । मैंने पोस्टर में देख लिया था, वह फिल्म थी राजकपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ । यह उसका पहला वर्शन था जो लगभग साढ़े चार घंटे का था और उसमे दो इंटरवल होते थे । उस के पहले भाग में एक पब्लिक स्कूल का दृश्य था , जिसमे खाते पीते घरों के साफ सुथरे, सजे धजे बच्चे , मुझ जैसे नगर निगम के स्कूल में पढने वाले बच्चे के भीतर एक काम्प्लेक्स पैदा कर रहे थे । अचानक परदे पर एक दृश्य आता है जिसमें बालक ऋषि कपूर अपनी टीचर को कपड़े बदलते हुए देखने के बाद उसके नग्न शरीर की कल्पना करता है । बाबूजी के साथ बैठकर वह दृश्य देखते हुए मैं अचानक असहज हो गया  ।  

बाबूजी तन्मयता से फिल्म देख रहे थे लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था । अचानक मेरी नज़र पड़ी तो देखा मेरे स्कूल के दो सीनियर बच्चे पास की कुर्सियों पर बैठे हैं । उन्होंने मुझे पहचानकर आवाज़ लगाई.. शरद .. और पास आने का इशारा किया । मैंने बाबूजी से कहा मैं वहाँ बैठूँगा उन्होंने कुछ नहीं कहा , सो शेष फिल्म मैंने दोस्तों के साथ बैठकर देखी । वैसे भी वह फिल्म फ्लॉप थी इसलिए पूरी टॉकीज़ लगभग खाली थी । 

बहुत से लोगों को यह बात ज्ञात नहीं होगी कि साढ़े चार घंटे लम्बाई की दो इंटरवल वाली यह फिल्म उस समय बिलकुल नहीं चली थी । राजकपूर को इस फिल्म से बहुत घाटा हुआ जिसे पूरा करने के लिए फिर उन्होंने बॉबी फिल्म बनाई। बरसों बाद को फिल्म को सम्पादित कर छोटा करने के बाद जब यह फिल्म दोबारा रिलीज़ हुई तब इस फिल्म ने एक इतिहास रच दिया । आज इस फिल्म की गणना राजकपूर की क्लासिक फिल्मों में होती है । 


शरद कोकास 

71 भंडारा : लाल किले और मांडू के महलों के चबूतरे


उन दिनों कस्बों और छोटे शहरों में मेन रोड नामक एक रास्ता हुआ करता था ৷ शहर की मुख्य दुकानें इसी रोड के दोनों ओर हुआ करती थीं ৷ कुछ दुकानों के ऊपर दुकान के मालिक का निवास हुआ करता था अतः रात में भीतर से दुकान बंद करने की सुविधा उन्हें प्राप्त थी ৷ सुबह सुबह दुकानें खुलतीं, दुकान मालिक दुकान के आगे झाड़ू लगाकर पानी सींचते और अगरबत्ती लगाकर बोहनी की राह देखते ৷ अगरबत्ती की खुशबुओं के बीच बाज़ार की सुबह एक पवित्र सी सुबह लगती ৷

भंडारा का मुख्य बाज़ार गांधी  चौक के आसपास ही केन्द्रित था । गांधी चौक से बस स्टैंड जाने वाली मेन रोड के दोनों ओर कुछ  दुकानें थीं जिनमें कपड़ा,किराना,अनाज,जूते,बर्तन,स्टेशनरी,दवा,मिठाई,बल्ब से लेकर हार्डवेयर सामग्री तक सब कुछ मिला करता था । उसी तरह एक रास्ता गांधी चौक से महल की ओर जाता था उस पर भी दुकानों का निर्माण  प्रारंभ हो चुका था ৷ शहर के दोनों सिनेमाघर भी इसी मार्ग पर थे ৷

बस स्टैंड के पास का क्षेत्र बड़ा बाज़ार कहलाता था । पोस्ट ऑफिस चौक और तुरस्कर टी हाउस के बीच एक पुरानी इमारत थी जिसे बारादरी कहते थे । शायद बारह दरवाज़ों की वज़ह से इसका यह नाम पड़ा था ৷ यह अंग्रेजों के समय बनी लाल पत्थर की एक ईमारत थी ৷ लाल किले और मांडू के महलों का आभास देती इस इमारत में केवल खम्भे और चबूतरे शेष थे ৷ छत की जगह आसमान दिखाई देता था  इन्ही चबूतरों पर  प्रति रविवार और बुधवार को सब्ज़ी बाज़ार लगा करता था । 

बाबूजी रविवार और बुधवार ड्यूटी से लौटने के बाद अपनी साइकिल की  घंटी टनटनाते हुए बाज़ार जाते थे और दो तीन दिनों के लिए सब्ज़ियाँ फल इत्यादि ले आते थे । हम बच्चे उनके लौटने का बेसब्री से इंतज़ार करते ৷ वयस्कों की प्रिय सब्जी से हमें कोई सरोकार न होता लेकिन उनके थैले में सब्ज़ी के अलावा हम लोगों की मनपसन्द कोई न कोई चीज़ अवश्य होती थी, कभी सिंघाड़े, कभी अमरूद ,जिन्हे स्थानीय भाषा में जाम कहते हैं ,कभी पपीता,चना बूट,जामुन,बेर आदि । सेब,अनार जैसे महँगे फलों की किस्मत में उस झोले के माध्यम से हमारे घर तक का प्रवास नहीं लिखा था । महँगे फलों को हम सजी हुई फलों की दुकान  में या  ‘अ’ अनार का पढ़ते हुए किताबों में देखते थे । हमें पता था, बाबूजी की जेब में रखी आमदनी की किताब में ‘अ’ से अनार नहीं बल्कि ‘अ’ से अमरुद लिखा है ।

इधर जैसे ही ठण्ड शुरू होती ओस से भीगी हुई चने की भाजी बाज़ार में आने लगती ৷ हरे चने को मराठी में सोला कहते हैं ৷ हम बच्चों के लिए एक हाथ में हरे चने का गुच्छा पकड़कर दूसरे हाथ से एक एक चना ढूँढकर और उसे दांत या नाखूनों की सहायता से छीलकर खाने से बड़ा करतब और टाइम पास कुछ नहीं होता था ৷ अक्सर हम लोग आंगन में आग जलाकर उसमे हरे चनों से युक्त वह गुच्छा भूनते और फिर राख से काले पड़ चुके होलों या सोलों को छीलकर उनके भीतर से चने निकालकर खाते ৷ यह हमें सीप से मोती निकालने की तरह लगता था ৷ महाराष्ट्र में गेहूँ ,चना,ज्वार आदि की हरी बालियों को आग में भूनकर बने इस भुने अनाज को हुरडा कहते हैं ৷ कभी कभी हम लोग खेतों की ओर चले जाते और किसानों के साथ हुरडा पार्टी में शामिल हो जाते ৷ भुने हुए उन हरे चनों का सोंधापन आज भी कभी कभी ज़ुबान पर मचल जाता है ৷

बादाम,अखरोट,खुबानी,चिलगोज़ा, जैसे मेवों के हमने केवल नाम सुने थे और बड़ी बड़ी दुकानों में उन्हें कांच के मर्तबानों में सजा हुआ देखा था । बहुत से मेवे तो हम पहचानते ही नहीं थे कि कैसे दिखाई देते हैं । स्मृति के हल्के से चित्र में एक काबुलीवाला था जिसे बलराज सहानी कहते थे, जब पहली बार काबुलीवाला आया पिस्ता बादाम लाया यह गीत सुना तो बाबूजी से पूछा था पिस्ता क्या होता है ? बाबूजी ने केवल इतना बताया कि एक मेवा होता है ৷ पिस्ता नामक इस अफगानी मेवे के दर्शन उस उम्र में हुए जब काबुलीवाला फिल्म देखने की समझ पैदा हुई ৷

ऐसा नहीं कि हमने उस ग़रीबी में मेवे न देखे हों ৷ मेवों के नाम पर कभी कभी खीर में डालने के लिए बाबूजी चार आठ आने के छुहारे, काजू या चिरौंजी ले आया करते थे । टुकड़े वाले काजू कुछ सस्ते मिला करते थे लेकिन कभी कभार पुड़िया में कोई साबुत काजू निकल आता था ৷ माँ पुड़िया खोलकर खीर में डालने से पहले  वह साबुत काजू मुझे पकड़ा देती , मैं काफ़ी देर तक उस काजू को उलट पलट कर देखता फिर आशा भरी नज़रों से माँ की ओर देखता ,माँ मेरा आशय समझकर गर्दन ऊपर करते हुए मुझे संकेत देती ‘खा लो’ ,  फिर मैं उस साबुत काजू को लेकर गली में चला जाता और आधे घंटे तक उसे कुतर कुतर कर खाता रहता ৷

दुकानों के अलावा बादाम के दर्शन पास पड़ोस में होने वाले सत्यनारायण की कथा में पूजा की चौकी पर भी होते थे । पंडित लक्षमण प्रसाद शुक्ला चौकी पर लाल कपड़ा बिछाते और नवग्रहों की स्थापना करते हुए वहाँ नौ सुपारी,नौ खारीक, नौ बादाम रखते । पड़ोस में होने वाली इन कथाओं में मैं सबसे आगे बैठता और मिलने वाली खारीक या छुहारे की लालच में लीलावती कलावती की पूरी कथा सुनता । पंडित जी मुझे कोकास गुरूजी के बेटे के रूप में जानते थे इसलिए कथा समाप्त होने पर अपना माल असबाब समेटते हुए मुझ पर कृपा बरसाते हुए वे मुझे एक छुहारा पकड़ा देते लेकिन मैं ललचाई नज़रों से बादाम की ओर देखता । ऐसा कई बार हुआ लेकिन कभी भी उन्हें मुझ पर तरस नहीं आया और मैं ग्रहों की कृपा से वंचित ही रहा  ।

शरद कोकास 

67.भंडारा : भविष्य के एक गायक की हत्या


कालखंड, बीसवीं सदी में सत्तर का दशक । स्थल, भंडारा की आदर्श टाकीज़ का लेडीज़ क्लास । फिल्म, दिल एक मंदिर, शाम छह बजे का पहला खेल जो अब समाप्ति पर है । परदे पर एक मार्मिक दृश्य और हॉल में गूंजती हुई रफ़ी साहब की आवाज़ “जाने वाले कभी नहीं आते, जाने वाले की याद आती है ।“ घुप्प अँधेरा है और मैं किसी का चेहरा नहीं देख पा रहा हूँ लेकिन दबी दबी सिसकियों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही है । मुझे न वह दृश्य समझ में आ रहा है न गाने के बोलों का अर्थ, लेकिन माँ को रोता देख मैं भी धीरे धीरे सुबक रहा हूँ। 

हम इसीलिए सिनेमा मे दुख के दृश्य देखकर रोते हैं 

कुछ बड़े होने के बाद जब ऐसे दृश्यों को समझ कर मैंने उन पर रिएक्ट करना शुरू किया तो समझ में आया कि दूसरों के दुःख में द्रवित होना यह हम मनुष्यों का यह मूल स्वभाव है । इसीलिए ऐसे किसी फिल्म या नाटक के काल्पनिक दृश्य में भी हमारी कैथार्सिस या भाव विरेचन की यह प्रक्रिया जारी रहती है । हाँ,  हम सायास अपने आप को इस भावनाओं के विरेचन से अवश्य रोक सकते हैं  लेकिन ऐसा  कर पाना बहुत मुश्किल होता है । आँसू  रोकने की कोशिश करोगे तो और ज़्यादा आँसू निकलेंगे । मैं तो ऐसा  कभी सायास भी नहीं कर पाया । आज भी  सिनेमा के परदे पर किसी भावुक दृश्य में आँसू अपने आप बहने लगते हैं  । 

मृत्यु के दर्शन पर आज तक जाने कितने लोगों ने क्या क्या लिखा है, लेकिन मैं जब भी सोचता हूँ तो इसे एक इंसान की देह की अनुपस्थिति के रूप में ही सोचता हूँ । कैसा होता है ना, एक इंसान का इस दुनिया से चले जाना । वह अपनी देह के साथ जीवन भर इस संसार में उपस्थित रहता है, हम उसे देख सकते हैं, उसे छू सकते हैं, उसकी आवाज़ सुन सकते हैं । मृत्यु के बाद वह एक तस्वीर बन जाता है और घर की किसी दीवार पर एक फ्रेम के भीतर कैद होकर टंग जाता है  । 

बैतूल के अपने दवाखाने में दादाजी अब अपनी ही कुर्सी के पीछे दीवार पर वीरेंद्र चाचा द्वारा बनाई एक खूबसूरत फ्रेम के भीतर एक तस्वीर के रूप में विराजमान थे  । तस्वीर में भी दादाजी की मूछों से उनका रौब टपकता था । यह तस्वीर बरसों उस कमरे में टंगी रही । जब भी मैं उस तस्वीर की ओर  देखता मुझे उनका वह रूप याद आता जब दूध रोटी खाते समय उनकी इन बड़ी बड़ी सफेद मूँछों पर दूध की सफ़ेदी की एक परत और चढ़ जाया करती थी । 

उनकी यह तस्वीर वही तस्वीर थी जो उनके भंडारा आने पर योगेश काले मामा ने खींची थी और जो एल्बम में अब भी उपस्थित है । एल्बम में दादाजी की तस्वीर देखते हुए उन क्षणों को याद करने की कोशिश करता हूँ जो मैंने दादाजी के साथ बिताये थे । दादाजी के साथ बिताये हुए बहुत कम क्षणों के निगेटिव मेरे मस्तिष्क के डार्क रूम में हैं। इनमे  डेढ़ साल की उम्र में मेरे जानी जोकर बनने का एक किस्सा भी है । 

अरे ! मैं तो जॉनी जोकर बन गया 

उन दिनों बैतूल के हमारे घर में एक गाय थी जिसका नाम लक्ष्मी था । लक्ष्मी ‘गाय जैसी सीधी’ इस मुहावरे को ग़लत साबित करते हुए पूरे मोहल्ले में अपने सींग मारने के लिए प्रसिद्ध थी । उसके मरखनी होने की वज़ह से बच्चे तो बच्चे बड़े भी उसके करीब नहीं जाते थे । दादी माँ की ड्यूटी थी उसे बांधने और दूध दुहने की । सुबह होते ही उसे खोल दिया जाता और घर के पास ही नागोराव जी के घर के सामने वह अन्य गायों के साथ नार में शामिल हो जाती । फिर वह शाम ढले गोधूली बेला में ही लौटती । 

उस दिन शाम को मुल्लू भैया देवी मन्दिर के पास कबाड़ में मिली एक पेराम्बुलेटर यानी बाबा गाड़ी में मुझे घुमा रहे थे । घर लौटती हुई लक्ष्मी के कानों में जैसे ही इस पुरानी गाड़ी की चूं चूं आवाज़ पहुँची वह उसे पृथ्वी का कोई विचित्र  जीव मानकर सींग मारने के लिए उस ओर दौड़ी । भैया खतरा भाँप कर गाड़ी छोड़कर अलग हो गये लेकिन मुझे बाहर निकलने का अवसर उन्हें नहीं मिला । लक्ष्मी ने अपने दोनों सींग गाड़ी में फँसाये और उसे उछाल दिया । 

मैं जैसे ही अंतरिक्ष से धरती पर आया मुझे पता चला मेरा सर फटा हुआ है । घर तक की यात्रा मुल्लू भैया की गोद में रोते हुए पूरी की । बापू ने तुरंत डेटाल के पानी से मेरा ज़ख्म धोया पट्टी बांधी और कहा “तुम्हे कुछ नहीं हुआ है , जाओ अब खेलो ।“ 

बापू का मेरे अंतर्मन को दिया हुआ सजेशन अपना काम कर गया और मैं चोट का दर्द भूल गया । अपने सर पर बन्धी हुई पट्टी लेकर एक विशिष्टता बोध के साथ मैं बाहर आया  और अपने दोस्तों पर इम्प्रेशन मारते हुए  कहा “ देखो, मैं जानी जोकर बन गया हूँ ।“ 

अपने साथ के बच्चों पर इम्प्रेशन मारने की मेरी यह आदत उन्ही दिनों डेवलप हुई थी । मैं एवरेज बच्चों की तरह नहीं रहना चाहता था । 

उस साल भी अपनी गायन की कॉपी अपने साथ लेकर मैं बैतूल इसी लिए गया था कि दोस्तों को कुछ राग रागिनियाँ सुना कर अपना प्रभाव जमा सकूँ  । लेकिन लौटते वक्त जाने किस बेखयाली में वह कॉपी वहीं  छूट गई । 

जुलाई 1965 का माह लग गया था और मेरी पाँचवी की कक्षा शुरू हो गई थी । स्कूल से आने के बाद मैं खेलने चला जाता था जबकि पिछले साल वह संगीत विद्यालय का समय होता था । एक दिन बाबूजी ने पूछा “गायन क्लास क्यों नहीं जा रहे हो ?” मैंने उन्हें बताया कि मेरी कॉपी बैतूल में छूट गई है और बिना कॉपी के संगीत विद्यालय जाने में मुझे शर्म आती है । 

यहीं था संगीत विद्यालय 
उन दिनों के अभिभावकों के भीतर अपने बच्चों को जैक ऑफ़ आल बनाने की ज़िद नहीं थी इसलिए बाबूजी ने भी जोर नहीं दिया । मैं उसके बाद संगीत विद्यालय नहीं गया और इस तरह भविष्य के एक गायक की हत्या हो गई ।

रूपचंद से दोस्ती 

हिंदी माध्यम का वह केवल एक ही प्रायमरी स्कूल था इसलिए सभी नॉन मराठी यानी सिन्धी,पंजाबी,मुस्लिम,बंगाली छात्र इसी स्कूल में पढ़ते थे । मेरी क्लास के सभी छात्र छात्राएँ संपन्न घरों से थे और न केवल उम्र में बल्कि कद में भी मुझसे बड़े थे । होना तो नहीं चाहिए था लेकिन इस बात को लेकर मेरे भीतर एक गिल्ट कॉम्प्लेक्स पैदा होने लगा । यद्यपि मैं पढने में सबसे आगे था लेकिन मेरी दोस्ती किसी से नहीं हो पा रही थी  । नानक भी उन दिनों थोड़ा कटने सा लगा था । ऐसे समय मेरी दोस्ती रूपचन्द नामक एक लड़के से हुई । 

रूपचंद गांधी चौक से स्टेशन जानेवाले रास्ते पर बीड़ी कारखाने के पीछे बसी दलितों की बस्ती मे एक कच्चे मकान में रहता था । उस के पिता स्कूल के पास ही एक बीड़ी कारखाने में मुनीम थे । हम लोग दोपहर की छुट्टी में अक्सर उस कारखाने चले जाते थे और वहीं बैठकर खाना खाते थे । रूपचन्द भी कभी कभार मेरे घर आ जाया करता था । एक बार जब मैं पीछे के आंगन में नंगा नहा रहा था तब वह गली से होता हुआ सीधे पीछे आ गया । 

किसी दोस्त के सामने निर्वस्त्र होने का यह पहला अवसर था । उन दिनों शेम शेम कहने का चलन नहीं था फिर भी मुझे अचानक शर्म सी महसूस हुई । बड़े होने के बाद जब मैंने अदन के बगीचे में हव्वा द्वारा ज्ञान का फल चखे जाने और अपने निर्वस्त्र होने पर शर्मा जाने के अहसास का किस्सा पढ़ा मुझे अपने बचपन का वह दृश्य याद आ गया । उस दिन मुझे भी अहसास हुआ कि अब मैं बच्चा नहीं हूँ और अगले दिन से ही मैंने अंडरवियर पहनकर नहाना शुरू कर दिया ।  अंडरवियर पहनकर नहाने का यह सिलसिला पूरी स्कूल लाइफ मे चलता रहा ।  

उसी साल मकान मालकिन नानी ने मकान के पुनर्निर्माण का काम प्रारम्भ किया । वे किराये से देने के लिये आंगन के बगल में दो कमरे और निकालना चाहती थीं  । उन्होंने बाबूजी को अल्टीमेटम दे दिया कि वे मकान खाली कर दें । लेकिन उस मकान का किराया बहुत कम था और उससे अधिक देने की स्थिति में हम लोग नहीं थे इसलिये बाबूजी वह मकान छोड़ना नहीं चाहते थे । उन्होंने थोड़ा सा किराया बढ़ा दिया और निर्माण होने तक उसी असुविधा में रहना स्वीकार कर लिया । 

शायद उस समय मकान का किराया अठारह रुपए था । 

माँ बाबूजी मैं और मुझसे छोटे दोनों भाई बहन सामान सहित दो कमरों में सिमट गए । उस साल हमारे यहाँ नागपुर से मेरे फुफेरे भाई बच्चन भैया,बहन निर्मल जीजी और परमानन्द मामा भी आए थे । वे भी हम लोगों के साथ धूल मिट्टी के बीच रहे । उन दिनों मेहमानों के आने जाने का काफी चलन था और उन्हें किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा भी नहीं दी जाती थी । परमानन्द मामा मिलिट्री में थे और अंग्रेज़ी तरीके से रहते थे,स्पून नाइफ के साथ अंग्रेज़ी तरीक़े से खाना खाते थे फिर भी हम लोगों के साथ उन्हें बहुत मज़ा आया  । माँ बताती थी कि वे बचपन से ही अनुशासन प्रिय और सलीके से रहने वाले थे इसलिये उनकी भाभी उन्हें मज़ाक में ‘काला अंग्रेज़’ कहती थीं । मुझे याद है मामा ने  अपने कैमरे से हम लोगों की ढेर सारी तस्वीरें भी ली थीं । 


9 जून 2026

63.नागपुर चार : लाल,पीले,नीले,हरे कांचों से आती रौशनी

मैं और बच्चन भैया 

नागपुर का पंचशील टाकीज चौक 

जीवन में ऐसी अनेक बातें होती हैं जो बचपन में निरर्थक लगती हैं लेकिन बड़े होने के बाद उनके बारे में सोचकर देखें तो लगता है उनमे भी कुछ न कुछ अर्थ निहित होता ही होता था । 

मौसी और बुआ इनमे बड़ा कौन होता है ?

नागपुर स्टेशन पर उतरने के बाद बाबूजी कभी हम लोगों को सीधे मौसी के यहाँ इतवारी नहीं ले गए । वे हमेशा हम लोगों को बड़ी बुआ के यहाँ धंतोली ही ले जाते थे । माँ ने कभी इस बात को लेकर न कोई ज़िद की न कोई झगड़ा किया कि उन्हें पहले अपनी बहन के यहाँ जाना है । वैसे वे चाहतीं तो कह सकती थीं कि “पहले मेरी बहन के यहाँ चलो” और बाबूजी को इसमें कोई हर्ज भी न होता  क्योंकि  माँ के बहनोई बाबूजी के चचेरे भाई भी तो थे । 

मामा और चाचा इनमे बड़ा कौन होता है 

हालाँकि मुंबई की यात्राओं में बाबूजी स्टेशन से सीधे दयानंद मामाजी के यहाँ माटुँगा जाते थे जबकि मुंबई में प्रभादेवी में उनके चचेरे भाई वीरेंद्र कोकाश रहते थे । हाँ अगले दिन वे हम सब लोगों को वहाँ अवश्य ले जाते । मुझे लगता था कि नागपुर यात्रा में माँ की अनकही शिकायत वे मुंबई यात्रा में दूर कर देते थे । वैसे यह सिलसिला वीरेंद्र चाचाजी के मुंबई आने के बाद यानि सन पचहत्तर के बाद ही शुरू हुआ । उससे पहले तो मुंबई केवल मेरे मामा का गाँव था ।

बड़े होने के बाद मैंने इस बात पर विचार किया तो मुझे कुछ सूक्ष्म कारण नज़र आये । नागपुर में स्टेशन या बस स्टैंड से सीधे बड़ी बुआ के यहाँ धन्तोली जाने की वज़ह यह थी कि स्टेशन और बस स्टैंड सीताबर्डी क्षेत्र में आता था और धन्तोली उससे काफी करीब था । जबकि इतवारी की दूरी उसके दुगुने से भी अधिक थी । ज़ाहिर है वहाँ सामान सहित जाने में रिक्शा भाड़ा अधिक लगता । पहले के लोगों के मन में भाई बहनों के प्रति प्रेम की कोई कमी नहीं थी लेकिन जेब में पैसे कम हुआ करते थे, इसलिए व्यावहारिकता को प्रसन्न करने के लिए भावुकता और प्रेम की बलि चढ़ानी पड़ती थी ।

आनंद टाकीज नागपुर 

नागपुर स्टेशन से धन्तोली की ओर बढ़ते हुए साइकिल रिक्शे वाला बस कुछ ही पायडल मारता और फिर एक लम्बी साँस खींचकर रिक्शे की सीट पर बैठ जाता ।


सीधी ढलान से ढुलकता हुआ रिक्शा टेकड़ी वाले गणेश मंदिर के सामने से होते हुए लोहा पुल तक पहुंचता ।

फिर शनि मंदिर के बाद दाहिना मोड़ आते ही आनंद टाकीज़ आ जाती थी । बाबूजी आनंद टाकीज के सामने साईकिल की एक दुकान की ओर उंगली उठाकर कहते वहाँ शम्भुदयाल जीजा की दुकान है ।

शम्भुदयाल कोकास शिवनाथ फूफाजी के भाई थे और उन्होंने उस ज़माने में जुगाड़ कर तीन गियर वाली एक साइकिल बनाई थी । अब यहाँ उनकी दूकान तो नहीं है लेकिन लाइन से अनेक साइकिल दुकाने हैं 

उन्ही की दुकान से लगी गली से तेलीपुरा मोहल्ले की शुरुआत होती है ।


इस गली में बड़े होने के बाद भी काफी समय आना जाना हुआ । यहाँ छोटेलाल जी का घर है जिनकी पुत्री उषा से ब्याह रचाने हेतु प्रदीप भैया बारात लेकर गए थे और अपने टेप रिकार्डर के साथ विवाह की लाइव ऑडियो रिकार्डिंग करने के लिए मैं भी उस बारात में शामिल हुआ था  । इसी मोहल्ले में आजकल रीजनल कॉलेज भोपाल की मेरी क्लासमेट अर्चना श्रीवास्तव रहती हैं जो फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा  के लिए एक ‘उपाय’ नमक एक संस्था चलाती हैं । अर्चना के पिता बिहारीलाल जी श्रीवास्तव हिंदी भाषी संघ विद्यालय में शिक्षक थे साथ ही शैक्षणिक पुस्तकों के प्रकाशक भी थे ।

आनंद टाकीज़ अब बंद पड़ी है और किसी विवाद की वज़ह से वह अपने पुराने रूप में सुरक्षित है साथ ही उसी लाइन में श्याम होटल की इमारत है डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर जब भी नागपुर आते थे वे इसी होटल में ठहरते थे इसलिए इस इमारत को उनके स्मृतिचिन्ह के रूप में सुरक्षित करने की मांग की जा रही है ।

श्याम होटल बाबासाहेब का अस्थायी निवास 

रिक्शा आगे बढ़ता जाता था और बाबूजी दृष्टि के दायरे में आनेवाली उन जगहों के बारे में बताते जाते थे । तेलीपुरा की इस गली के बाद कुछ तंग सी गलियाँ और थीं जिनके नाम मोदी नंबर एक, मोदी नंबर दो, मोदी नंबर तीन कुछ इस प्रकार के थे । मोदी यह नाम पहली बार मैंने इसी सिलसिले में सुना था । मुझे पता नहीं था बाद में यह नाम सिर्फ गली तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि देश से जुड़ जायेगा और देश के लोगों की दिमाग की गलियाँ  भी इसी नाम की हो जाएँगी । 

आनंद टाकीज के बाद उसी मार्ग पर  श्री टाकीज़ आती थी, आजकल जहाँ बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र का चौक है , उसके आगे NEEDOS बार एंड रेस्टारेंट जहाँ मुन्ना  भैया यानी प्रकाश चन्द्र कोकास मैनेजर थे । 

नीडोस 

फिर एक बायाँ मोड़ और नाग नदी का पुल पार करते ही मेहाड़िया चौक ।
MEHADIYA CHAUK  
नाग नदी जिसके नाम पर नागपुर शहर का नाम पड़ा था उस समय भी शहर भर की गन्दगी अपने भीतर समेटे हुए एक नाले की तरह दिखाई देती थी । इस नदी का अस्तित्व उस माँ की तरह है  जो बच्चों का बचा हुआ और फेंका हुआ जूठन खुद खा जाती है और अंततः फूड पायज़निंग का शिकार होकर मर जाती है । 
नाग नदी 

मेहाड़िया चौक से धन्तोली एरिया शुरू हो जाता है । आज यहाँ विश्वविख्यात यशवंत स्टेडियम है जो उन दिनों नहीं था ।

यशवंत स्टेडियम 
मैं यहाँ से रिक्शे से उचक उचक कर देखना शुरू कर देता जैसे बुआ का घर मुझे दिखाई दे जायेगा । रिक्शेवाले के कुछ पायडल मारते ही फिर अगले चौक पर आनन्दाश्रम होटल के निकट
आनंदाश्रम होटल जो आज भी वैसा ही है 

धन्तोली पार्क का पश्चिम की ओर  का गेट दिखाई दे जाता और मैं समझ जाता बस अगले चौक पर पार्क के कोने से दाहिने मुड़ना है । यहीं आगे नानीवड़ेकर  और भाग्योदय मंगल कार्यालय थे यानि मैरिज प्लेस । 


फिर पूर्व की ओर का गेट आयेगा उसके सामने पार्क एवेन्यू स्ट्रीट और उसमे दाहिनी ओर शिवनाथ फूफाजी का मकान  ‘359 पार्क एवेन्यू’ । यह नाम मुझे किसी कहानी उपन्यास या फिल्म के नाम की तरह लगता था । बाद में आई शशिकपूर की फिल्म ’36 चौरंगी लेन ‘ मैंने इसी वज़ह से देखी थी ।
शिवनाथ  फूफाजी  का मकान 
यह घर फिल्मों में दिखाए घर की तरह ही खूबसूरत था, जैसे बचपन के उन दिनों में मेरे सपनों की एक जगह । फूफाजी का दुमंजिला मकान पुराने वास्तुशिल्प के अनुसार से बना था जिनमे दरवाज़ों और मेहराबों पर लकड़ी की नक्काशी  हुआ करती थी । खिड़कियों के पल्लों में छोटे छोटे चौकोर लाल,पीले,नीले और हरे काँच जड़े हुए थे । सामने धनवटे कॉलेज के परिसर में लगे दरख्तों को पारकर सुबह की धूप गैलरी में आती और फिर इन रंगबिरंगे कांचों से छनकर ऊपर के हाल में इंद्रधनुषी वातावरण का निर्माण कर देती थी । 

निचली मंजिल में सामने दालान, फिर एक बड़ा सा हाल उसके पीछे स्पेस । यहाँ से लकड़ी की सीढियाँ शुरू होती थीं जो बीच में एक लैंडिंग से मुड़कर ऊपर हाल तक पहुँचती थीं । इन सीढ़ियों पर कालीन नहीं बिछा था लेकिन इन पर पाँव रखते हुए किसी राजमहल की सीढियाँ चढ़ने का आभास होता था । पुरानी फिल्मों में एक बड़े से हाल से ऊपर की ओर जाती हुई सीढियां आपने देखी होंगी कुछ इसी तरह की थी यह सीढियां जिन पर चलते हुए धम्म धम्म की आवाज़ होती थी, आनेवाला किस मूड में है यह उसके सीढ़ियों पर चढ़ने के अंदाज़ से ही पता चल जाता था ।

स्पेस के बाद पीछे की ओर आँगन से लगा हुआ एक बड़ा सा रसोई घर, उसके बाद आंगन में बंधी हुई गाय, उसके बाद स्नान घर और लगभग पचास मीटर दूर शौचालय । नागपुर जैसे शहर के हृदयस्थल में गाँव की हवेली का आभास देते हुए फूफाजी के इस मकान के बाईं और दो ब्लॉक और थे जिन्हें उन्होंने किराये से दिया हुआ था । उनका पीछे का खाली हिस्सा भी इसी दूरी में शामिल था । अब यह तीनो मकान अपने नए आधुनिक रूप में तीनों भाइयों और उनके परिवार का आशियाना हैं 

पुराने घर की जगह अब नया घर है 
फूफाजी की माताजी गंगा भागीरथी फूलदुलारी देवी अपने अच्छे दिनों में रोज़ रसोईघर गोबर से लीपती थीं । वे शुद्धता का बहुत ध्यान रखती थीं और बहुत से नियमो को मानने वाली थीं । किसीका भी बिना नहाये रसोई में प्रवेश करना उन्हें गवारा न था । वे सफ़ेद वस्त्र धारण करतीं और माथे पर चन्दन का गोल टीका लगातीं । यद्यपि बाद में उन्होंने अपना साम्राज्य अपनी बहू यानि हमारी विद्या बुआ को सौंप दिया था लेकिन उनकी ठसक कम नहीं हुई थी । उनके भोजन करते समय उनके आसपास हम बच्चे तो दूर एक मक्खी तक नहीं मंडरा सकती थी । प्यास के आवेदन पर गलती से कोई रसोईघर  में घुसा और छह फिट दूरी पर भी यदि पानी का कोई छींटा उन्हें दिखाई दे गया तो वे थाली से उठ जाती थीं । फिर बुआजी उन्हें मनाकर दूसरी थाली परोसकर देती थीं । 

विद्या बुआ बाबूजी से भी बड़ी थीं 
जीवन भर रसोईघर में इस सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने वाली दादी माँ अपने अंतिम समय में पक्षाघात से पीड़ित रहीं । सन इकहत्तर में वे सब दीन धरम, नियम करम छोड़कर विदा हो गईं  । उनके अंतिम समय तक शिवनाथ फूफाजी और विद्या बुआ ने तन मन धन से उनकी सेवा की और उनके मन को किसी प्रकार का आघात नहीं लगने दिया । 

दादी कर्मकांडी थीं लेकिन फूफाजी आस्थावान होते हुए भी काफी प्रगतिशील थे । आवास के परिसर में ही उन्होंने एक छोटा सा शिवमंदिर बनाया हुआ था जहाँ प्रतिदिन वे शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे । दादी के निधन के पश्चात फूफाजी ने विधिवत अंतिम संस्कार के सभी कार्यक्रम किये लेकिन तेरहवीं पर ब्राह्मण भोज के लिए मना कर दिया । उनका कहना था कि मृतक की आत्मा की शांति के नाम पर पंडितों को भोजन करवाने की बजाय क्यों न ज़रूरत मंदों को भोजन करवाया जाए । 

तेरहवीं के दिन वे पास ही के अंध विद्यालय गए और वहाँ के छात्रावास से पंद्रह बीस दृष्टि बाधित बच्चों को ले आए । फिर उन्हें भरपेट भोजन करवाया तथा धन, वस्त्र और आवश्यकता की कुछ वस्तुएं देकर विदा किया । ज़ाहिर है कि इन बच्चों में सभी जाति और धर्म के लोग थे । उनके इस अनूठे कार्य का कुछ ऐसा प्रभाव हुआ कि अनेक लोगों ने फिर इसका अनुकरण करना प्रारंभ किया ।

बुआजी फूफाजी का परिवार मेरे लिए आज भी एक आदर्श परिवार की तरह है । उन दिनों बुआजी फूफाजी के इस परिवार में बड़ी बेटी श्यामा थीं जिनका विवाह नागपुर में ही हीरालाल जी से हुआ था और वे वहीं  जरीपटका में रहते थे । उनके बाद रमा, निर्मला, प्रमिला तीन बेटियाँ और सतीश, प्रदीप, दीपक तीन बेटे । फूफाजी के बड़े बेटे जगदीश का सन इकसठ में ही एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था । 

मेरे ताउजी मनमोहन कोकाश जिनकी ससुराल निकट ही कामठी में है बताते थे कि वे अपने साले साहब के साथ नागपुर अपनी बहन के यहाँ आ रहे थे कि रास्ते में उन्हें भीड़ दिखी, पता चला कि कोई नवयुवक सड़क दुर्घटना में घायल हो गया है । सहज मानवीय स्वभाव में या जल्दबाज़ी में ‘होगा कोई’ यह सोचकर वे वहाँ रुके नहीं । घर लौटने के कुछ समय बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि वह तो उन्ही का भांजा जगदीश था ।

फूफाजी के तीन बेटे सतीश प्रदीप दीपक 
फिर यह घटना उनके जीवन भर के लिए सबक बन गई, वैसे भी उन्हें अपना यह भांजा सबसे प्यारा था । बचपन में सुनी इस घटना का असर मुझ पर कुछ ऐसा हुआ कि मैं आज भी कहीं भीड़ देखकर रुक जाता  हूँ और लोगों से घटना के बारे में पूछता हूँ यह सोचकर कि इस दुर्घटना का शिकार कहीं कोई अपना तो नहीं है ।

फूफाजी के दुःख के बारे में क्या कहूँ । सन पचहत्तर में जब ‘शोले’ आई थी । उसमे एक दृश्य था जिसमे गब्बर सिंह रहीम चाचा के बेटे अहमद को मारकर घोड़े की पीठ पर उसे लादकर रामगढ़ भेज देता है । इस दृश्य में रहीम चाचा बने हंगल साहब का एक डॉयलाग था “जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है ...बाप के कन्धों पर बेटे का जनाज़ा, इससे भारी बोझ कोई नहीं है।“ 

यह फिल्म देखने के बाद पहला ख्याल यही मन में आया कि शिवनाथ फूफाजी ने जब अपने युवा बेटे जगदीश की अर्थी अपने कन्धों पर उठाई होगी तब अपने आँसू भीतर ही भीतर जज़्ब करते हुए, बुआ को दिलासा देते हुए, क्या उन्होंने ऐसा ही कुछ नहीं सोचा होगा ? 

स्मृतियों की इस यात्रा में फ़िलहाल नागपुर में मैं उतनी देर ही रुका हूँ जितनी देर दो स्टेशनों के बीच चलने वाली ट्रेन किसी बीच के स्टेशन पर ठहरती है । नागपुर मेरे भीतर किस तरह बसा है और आशा-निराशा, खुशी,रुमान,घुटन,विद्रोह जैसे कितने ही भावों के प्रथम प्रतिबिम्ब के जनक के रूप में मेरे भीतर इस शहर की उपस्थिति है इसका ज़िक्र शायद आगे के पन्नों में आये ।  

जगदीश भैया की यह चिठ्ठी भेजते हुए बच्चन भैया यानी सतीश कोकास ने कहा था 

जगदीश भैया की चिठ्ठी 

शरद आशिर्वाद। कल अचानक कचरे से ऐसी चिट्ठी मिली जिसे धरोहर का दर्जा दिया जा सकता है। ये चिट्ठी बडे भैया जगदीश ने 29-6-1961 को नानाजी (बाबूलाल, बैतूल) को भेजी थी जो उन्हे 1-7-1961 को मिल गयी थी। 2-7-1961 को भैया की एक्सीडेन्ट मे मौत हो गयी। बडे मामा सूचना मिलने पर अन्त्य संसकार मे आते समय ये पत्र लेकर आये व बप्पा को दिये जो अब तक सुरक्षित है। मै लेमिनेट करवा रहा हू।

बुआ के परिवार मे एकविवाह समारोह मे माँ 


नई पीढ़ी