कालखंड, बीसवीं सदी में सत्तर का दशक । स्थल, भंडारा की आदर्श टाकीज़ का लेडीज़ क्लास । फिल्म, दिल एक मंदिर, शाम छह बजे का पहला खेल जो अब समाप्ति पर है । परदे पर एक मार्मिक दृश्य और हॉल में गूंजती हुई रफ़ी साहब की आवाज़ “जाने वाले कभी नहीं आते, जाने वाले की याद आती है ।“ घुप्प अँधेरा है और मैं किसी का चेहरा नहीं देख पा रहा हूँ लेकिन दबी दबी सिसकियों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही है । मुझे न वह दृश्य समझ में आ रहा है न गाने के बोलों का अर्थ, लेकिन माँ को रोता देख मैं भी धीरे धीरे सुबक रहा हूँ।
हम इसीलिए सिनेमा मे दुख के दृश्य देखकर रोते हैं
कुछ बड़े होने के बाद जब ऐसे दृश्यों को समझ कर मैंने उन पर रिएक्ट करना शुरू किया तो समझ में आया कि दूसरों के दुःख में द्रवित होना यह हम मनुष्यों का यह मूल स्वभाव है । इसीलिए ऐसे किसी फिल्म या नाटक के काल्पनिक दृश्य में भी हमारी कैथार्सिस या भाव विरेचन की यह प्रक्रिया जारी रहती है । हाँ, हम सायास अपने आप को इस भावनाओं के विरेचन से अवश्य रोक सकते हैं लेकिन ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल होता है । आँसू रोकने की कोशिश करोगे तो और ज़्यादा आँसू निकलेंगे । मैं तो ऐसा कभी सायास भी नहीं कर पाया । आज भी सिनेमा के परदे पर किसी भावुक दृश्य में आँसू अपने आप बहने लगते हैं ।
मृत्यु के दर्शन पर आज तक जाने कितने लोगों ने क्या क्या लिखा है, लेकिन मैं जब भी सोचता हूँ तो इसे एक इंसान की देह की अनुपस्थिति के रूप में ही सोचता हूँ । कैसा होता है ना, एक इंसान का इस दुनिया से चले जाना । वह अपनी देह के साथ जीवन भर इस संसार में उपस्थित रहता है, हम उसे देख सकते हैं, उसे छू सकते हैं, उसकी आवाज़ सुन सकते हैं । मृत्यु के बाद वह एक तस्वीर बन जाता है और घर की किसी दीवार पर एक फ्रेम के भीतर कैद होकर टंग जाता है ।
बैतूल के अपने दवाखाने में दादाजी अब अपनी ही कुर्सी के पीछे दीवार पर वीरेंद्र चाचा द्वारा बनाई एक खूबसूरत फ्रेम के भीतर एक तस्वीर के रूप में विराजमान थे । तस्वीर में भी दादाजी की मूछों से उनका रौब टपकता था । यह तस्वीर बरसों उस कमरे में टंगी रही । जब भी मैं उस तस्वीर की ओर देखता मुझे उनका वह रूप याद आता जब दूध रोटी खाते समय उनकी इन बड़ी बड़ी सफेद मूँछों पर दूध की सफ़ेदी की एक परत और चढ़ जाया करती थी ।
उनकी यह तस्वीर वही तस्वीर थी जो उनके भंडारा आने पर योगेश काले मामा ने खींची थी और जो एल्बम में अब भी उपस्थित है । एल्बम में दादाजी की तस्वीर देखते हुए उन क्षणों को याद करने की कोशिश करता हूँ जो मैंने दादाजी के साथ बिताये थे । दादाजी के साथ बिताये हुए बहुत कम क्षणों के निगेटिव मेरे मस्तिष्क के डार्क रूम में हैं। इनमे डेढ़ साल की उम्र में मेरे जानी जोकर बनने का एक किस्सा भी है ।
अरे ! मैं तो जॉनी जोकर बन गया
उन दिनों बैतूल के हमारे घर में एक गाय थी जिसका नाम लक्ष्मी था । लक्ष्मी ‘गाय जैसी सीधी’ इस मुहावरे को ग़लत साबित करते हुए पूरे मोहल्ले में अपने सींग मारने के लिए प्रसिद्ध थी । उसके मरखनी होने की वज़ह से बच्चे तो बच्चे बड़े भी उसके करीब नहीं जाते थे । दादी माँ की ड्यूटी थी उसे बांधने और दूध दुहने की । सुबह होते ही उसे खोल दिया जाता और घर के पास ही नागोराव जी के घर के सामने वह अन्य गायों के साथ नार में शामिल हो जाती । फिर वह शाम ढले गोधूली बेला में ही लौटती ।
उस दिन शाम को मुल्लू भैया देवी मन्दिर के पास कबाड़ में मिली एक पेराम्बुलेटर यानी बाबा गाड़ी में मुझे घुमा रहे थे । घर लौटती हुई लक्ष्मी के कानों में जैसे ही इस पुरानी गाड़ी की चूं चूं आवाज़ पहुँची वह उसे पृथ्वी का कोई विचित्र जीव मानकर सींग मारने के लिए उस ओर दौड़ी । भैया खतरा भाँप कर गाड़ी छोड़कर अलग हो गये लेकिन मुझे बाहर निकलने का अवसर उन्हें नहीं मिला । लक्ष्मी ने अपने दोनों सींग गाड़ी में फँसाये और उसे उछाल दिया ।
मैं जैसे ही अंतरिक्ष से धरती पर आया मुझे पता चला मेरा सर फटा हुआ है । घर तक की यात्रा मुल्लू भैया की गोद में रोते हुए पूरी की । बापू ने तुरंत डेटाल के पानी से मेरा ज़ख्म धोया पट्टी बांधी और कहा “तुम्हे कुछ नहीं हुआ है , जाओ अब खेलो ।“
बापू का मेरे अंतर्मन को दिया हुआ सजेशन अपना काम कर गया और मैं चोट का दर्द भूल गया । अपने सर पर बन्धी हुई पट्टी लेकर एक विशिष्टता बोध के साथ मैं बाहर आया और अपने दोस्तों पर इम्प्रेशन मारते हुए कहा “ देखो, मैं जानी जोकर बन गया हूँ ।“
अपने साथ के बच्चों पर इम्प्रेशन मारने की मेरी यह आदत उन्ही दिनों डेवलप हुई थी । मैं एवरेज बच्चों की तरह नहीं रहना चाहता था ।
उस साल भी अपनी गायन की कॉपी अपने साथ लेकर मैं बैतूल इसी लिए गया था कि दोस्तों को कुछ राग रागिनियाँ सुना कर अपना प्रभाव जमा सकूँ । लेकिन लौटते वक्त जाने किस बेखयाली में वह कॉपी वहीं छूट गई ।
जुलाई 1965 का माह लग गया था और मेरी पाँचवी की कक्षा शुरू हो गई थी । स्कूल से आने के बाद मैं खेलने चला जाता था जबकि पिछले साल वह संगीत विद्यालय का समय होता था । एक दिन बाबूजी ने पूछा “गायन क्लास क्यों नहीं जा रहे हो ?” मैंने उन्हें बताया कि मेरी कॉपी बैतूल में छूट गई है और बिना कॉपी के संगीत विद्यालय जाने में मुझे शर्म आती है ।
| यहीं था संगीत विद्यालय |
रूपचंद से दोस्ती
हिंदी माध्यम का वह केवल एक ही प्रायमरी स्कूल था इसलिए सभी नॉन मराठी यानी सिन्धी,पंजाबी,मुस्लिम,बंगाली छात्र इसी स्कूल में पढ़ते थे । मेरी क्लास के सभी छात्र छात्राएँ संपन्न घरों से थे और न केवल उम्र में बल्कि कद में भी मुझसे बड़े थे । होना तो नहीं चाहिए था लेकिन इस बात को लेकर मेरे भीतर एक गिल्ट कॉम्प्लेक्स पैदा होने लगा । यद्यपि मैं पढने में सबसे आगे था लेकिन मेरी दोस्ती किसी से नहीं हो पा रही थी । नानक भी उन दिनों थोड़ा कटने सा लगा था । ऐसे समय मेरी दोस्ती रूपचन्द नामक एक लड़के से हुई ।
रूपचंद गांधी चौक से स्टेशन जानेवाले रास्ते पर बीड़ी कारखाने के पीछे बसी दलितों की बस्ती मे एक कच्चे मकान में रहता था । उस के पिता स्कूल के पास ही एक बीड़ी कारखाने में मुनीम थे । हम लोग दोपहर की छुट्टी में अक्सर उस कारखाने चले जाते थे और वहीं बैठकर खाना खाते थे । रूपचन्द भी कभी कभार मेरे घर आ जाया करता था । एक बार जब मैं पीछे के आंगन में नंगा नहा रहा था तब वह गली से होता हुआ सीधे पीछे आ गया ।
किसी दोस्त के सामने निर्वस्त्र होने का यह पहला अवसर था । उन दिनों शेम शेम कहने का चलन नहीं था फिर भी मुझे अचानक शर्म सी महसूस हुई । बड़े होने के बाद जब मैंने अदन के बगीचे में हव्वा द्वारा ज्ञान का फल चखे जाने और अपने निर्वस्त्र होने पर शर्मा जाने के अहसास का किस्सा पढ़ा मुझे अपने बचपन का वह दृश्य याद आ गया । उस दिन मुझे भी अहसास हुआ कि अब मैं बच्चा नहीं हूँ और अगले दिन से ही मैंने अंडरवियर पहनकर नहाना शुरू कर दिया । अंडरवियर पहनकर नहाने का यह सिलसिला पूरी स्कूल लाइफ मे चलता रहा ।
उसी साल मकान मालकिन नानी ने मकान के पुनर्निर्माण का काम प्रारम्भ किया । वे किराये से देने के लिये आंगन के बगल में दो कमरे और निकालना चाहती थीं । उन्होंने बाबूजी को अल्टीमेटम दे दिया कि वे मकान खाली कर दें । लेकिन उस मकान का किराया बहुत कम था और उससे अधिक देने की स्थिति में हम लोग नहीं थे इसलिये बाबूजी वह मकान छोड़ना नहीं चाहते थे । उन्होंने थोड़ा सा किराया बढ़ा दिया और निर्माण होने तक उसी असुविधा में रहना स्वीकार कर लिया ।
शायद उस समय मकान का किराया अठारह रुपए था ।
माँ बाबूजी मैं और मुझसे छोटे दोनों भाई बहन सामान सहित दो कमरों में सिमट गए । उस साल हमारे यहाँ नागपुर से मेरे फुफेरे भाई बच्चन भैया,बहन निर्मल जीजी और परमानन्द मामा भी आए थे । वे भी हम लोगों के साथ धूल मिट्टी के बीच रहे । उन दिनों मेहमानों के आने जाने का काफी चलन था और उन्हें किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा भी नहीं दी जाती थी । परमानन्द मामा मिलिट्री में थे और अंग्रेज़ी तरीके से रहते थे,स्पून नाइफ के साथ अंग्रेज़ी तरीक़े से खाना खाते थे फिर भी हम लोगों के साथ उन्हें बहुत मज़ा आया । माँ बताती थी कि वे बचपन से ही अनुशासन प्रिय और सलीके से रहने वाले थे इसलिये उनकी भाभी उन्हें मज़ाक में ‘काला अंग्रेज़’ कहती थीं । मुझे याद है मामा ने अपने कैमरे से हम लोगों की ढेर सारी तस्वीरें भी ली थीं ।

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