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10 जून 2026

106.भंडारा : मैंने सपनों में सिक्कों के पेड़ लगाए


उस ज़माने में जब पैसे बहुत मेहनत और ईमानदारी से कमाए जाते थे, बड़े अक्सर बच्चों से कहते “जानते हो पैसे पेड़ पर नहीं उगते ৷’ फिर बच्चे जीवन भर इस जानकारी को अवचेतन में लिए लिए पैसे कमाने के साथ साथ बचाने के असफल प्रयास में लगे रहते ৷ यद्यपि सत्ता एवं पूंजीपतियों के गठजोड़ की वज़ह से शोषण उन दिनों भी कम नहीं था और निरक्षरता इतनी अधिक कि मनुष्य अपने शोषण और बदहाली के कारणों को ठीक से जान भी नहीं पाता  था ৷

मैं भी एक मामूली से शिक्षक का बेटा था और वरिष्ठ पीढ़ी के उपदेशों को ग्रहण करने का संस्कार मुझे जन्म घूँटी में मिला था ৷ पेड़ और पैसे संबंधी यह सूत्र वाक्य जाने कैसे मेरे मन में अपने  भौतिक अर्थ में स्थापित हो गया৷ मुझे अक्सर सपने में दिखाई देता कि आँगन में जाम के पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर मैंने दस पैसे का सिक्का बो दिया है, फिर कुछ दिनों बाद वह बड़ा होकर एक विशाल पेड़ बन गया है और उसमे अलग अलग शाखाओं पर पांच पैसे, दस पैसे, चवन्नी और अठन्नी उग आये हैं ৷ 

यह सपना इतनी बार आता था कि एक दिन बैतूल में जीनियस से दिखाई देने वाले एक बड़े भैया से  मैंने अपने इस सपने का बखान कर दिया  ৷ उन्होंने ऐनक संभालते हुए कहा “ऐसा कैसे हो सकता है ?” फिर वह गंभीरता से कुछ देर तक सोचते रहे ৷ मुझे लगा वह कहेंगे “पेड़ पर कभी पैसे नहीं उग सकते ৷”  लेकिन उन्होंने प्रकट में कहा “तुमने दस पैसे बोये थे, उस पर पाँच पैसे, चवन्नी या अठन्नी के सिक्के कैसे उग सकते हैं ?उस पर तो दस पैसे ही उगने चाहिए ৷” मैंने पहली बार महसूस किया कि जीनियस वास्तव में ऐसे ही होते हैं ৷  

उस साल छुट्टियों में बैतूल में मैंने जब मदनमोहन ताउजी को अपने इस सपने के बारे में बताया उन्होंने कहा “सच तो है, पैसे पेड़ पर नहीं उगते लेकिन गुल्लक में तो जमा होते हैं ৷” फिर उन्होंने मेरे लिए लकड़ी की एक गुल्लक बना दी ৷ यह गुल्लक एक आयताकार बॉक्स था जिसमे नीचे से प्लाईवुड की एक तख्ती लगी थी और ऊपर से पैसे डालने के लिए एक छेद था ৷ भंडारा लौटकर उसमे पैसे जमा करना जैसे मेरा रोज़ का शगल हो गया ৷ जेबखर्च से बचाए और माँ,बाबूजी,बुआ,मौसी,चाची,बड़ी माँ आदि से प्राप्त पैसों से कुछ ही महीनों में यह पेटी आधे के लगभग भर गई ৷

एक दिन मैंने सिक्का डालने के लिये जैसे ही गुल्लक निकाली वह मुझे कुछ हल्की सी लगी । मैंने उसे हिलाकर देखा तो महसूस किया वह लगभग खाली है ৷ उसमे से सारे पैसे गायब हो चुके थे । मैंने तुरंत माँ को यह बात बताई । माँ ने कहा  “हो न हो यह काम प्रभा का ही है क्योंकि वह रोज़ हमारे घर आया करती है और जिस अलमारी में वह गुल्लक रखी है  उसके पास बिछे पलंग पर बैठकर किताब पढ़ा करती  है ।“ 

बात तुरंत मकान मालकिन नानी तक पहुंचाई गई ৷ नानी बड़ी सयानी थीं ৷ उन्होंने अगली सुबह पड़ोस के चार- पाँच बच्चों को बुलाया, उनमें प्रभा  भी थी । सभी बच्चों को उन्होंने भुने हुए चने खाने के लिये दिये और खाने के बाद उनसे कहा कि “मैंने यह चने  मंतर फूँककर दिये हैं ৷ जिस बच्चे ने भी गुल्लक से पैसे चुराये होंगे रात भर में उसका पेट फूल जाएगा और वह मर जायेगा ।“  

वह लड़की यह सुनकर घबरा गई और रोने लगी ৷बस फिर नानी के पुचकारते ही उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया । उसने बताया कि वह गुल्लक के नीचे लगे प्लायवुड को पेंचकस से उचका लेती थी और उस गैप से पैसे निकाल लेती थी । उसने नौ रुपये तो तुरंत लाकर दे दिये । माँ ने धीरे से यह बात प्रभा की माँ को बता दी । वे  यह बात सुनकर बहुत शर्मिन्दा हुईं । उन्होंने माँ से पूछा कि “उस गुल्लक में कितने रुपये थे ।“ माँ ने अन्दाज़ से कहा “ पच्चीस रुपये ৷ “ बाद में वे पैसे भी उन्होंने लाकर दे दिये ৷

प्रभा बहुत अच्छी लड़की थी और मुझे भी बहुत अच्छी लगती थी ৷ लेकिन फिर वह कभी हमारे घर नहीं आई ৷ वह मुझसे नज़रें नहीं मिलाती थी और सड़क पर मुझे देखकर वह अपना रास्ता बदल लेती थी ৷ कुछ समय बाद  उसके पिता का तबादला कहीं और हो गया और वे मोहल्ला छोड़कर चले गए ৷ मुझे इस बात का हमेशा अफ़सोस रहा कि उसे मैं आत्मग्लानि से बाहर नहीं निकाल पाया ৷ 

अपराध कबूलवाने का नानी द्वारा अपनाया गया यह तरीका भी मुझे उचित नहीं लगा था इसलिए कि मैं जानता था ऐसा कोई मंतर नहीं होता जिससे किसी का कुछ बिगाड़ा जा सके ৷ बड़े होने के बाद जब मैंने अंधश्रद्धा निर्मूलन क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ किया तो महसूस किया कि बच्चे अपने बचपन से प्राप्त ऐसे अवैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर जीवन भर जीते हैं ৷ बड़े इस बात को कभी महसूस नहीं करते कि उन्होंने बच्चों के जीवन में जो अंधविश्वास बोए हैं  उनसे उनका कितना अहित हुआ है ৷



7 जून 2026

54. बैतूल : मैं आज भी फेंके हुए सिक्के उठा सकता हूँ


उन दिनों अँधेरा घिरते ही बाज़ार उठने लगता था । बाज़ारवाद जैसे शब्द ने छोटे मोटे शहरों के शब्दकोश में प्रवेश नहीं किया था । जनरेटर से बिजली सप्लाई कर देर तक बाज़ार रौशन रखने का ख़याल भी किसीको नहीं आया था । उन दिनों पैसे से अधिक परिवार प्यारा होता था इसलिए जैसे दिन भर के थके हारे पंछी शाम को घोसले की और उड़ान भरते हैं उसी तरह ग्राहक हों या दुकानदार शाम होते ही घर लौटने की तैयारी करने लगते । पिताओं को अपने बच्चे याद आने लगते और बच्चों को अपना घर । 

 कुछ दुकानदार जिनके यहाँ कोई फुरसतिया ग्राहक अपनी दोपहर की नींद पूरी करने के बाद अलसाते हुए पहुँचता था अपनी दुकान ज़रा देर से समेट पाते थे इसलिए दिवसावसान पर उनके लिए लालटेन जलाना आवश्यक हो जाता था । यद्यपि विष्णु खरे की कविता ‘ लालटेन जलाना ‘ में दी गई लालटेन जलाने की प्रक्रिया का वे पूर्णरूपेण निर्वाह नहीं कर पाते थे । 

इधर बैलों को भी समय का भान हो जाता और वे अलार्म की तरह अपने गले में बंधी घंटियाँ बजाते हुए कहते ‘चलो मालिक चलो, घर जाने का टेम हो गया ।’ जिनके पास सब्जियाँ या माल बच जाता वे उन्हें गठरियों में बांधते और डेरे-डंडे के साथ बैलगाड़ी पर लादते हुए संगी साथियों से अगले दिन किसी जगह लगने वाले  हाट के बारे में पूछने लगते । 

हम लोग तो जैसे गाड़ियों के रवाना होने की राह देखते रहते थे । इसके बाद प्रारंभ होता था हम बच्चों का अन्वेषण अभियान । हम बच्चों की टीम किसी पुरातत्त्ववेत्ता की तरह उजड़े बाज़ार का क्षेत्र एक्सप्लोर करने में जुट जाती । हमारा उद्देश्य होता गिरे हुए या छूटे हुए सिक्के बटोरना । 

दुकानदार उन दिनों अपनी रेजगारी बोरों के नीचे तह  में रखते थे । जाते हुए वे वैसे भी जल्दी में होते इसलिए कई बार रेजगारी समेटते हुए कुछ सिक्के शरारतन इधर उधर खिसक जाते थे । उनके मालिक को अँधेरे में उनका पता ही नहीं चलता था । 

हमारा लक्ष्य  ऐसे ही बिछुड़े हुए सिक्कों को ढूँढना होता था । हम लोग एक अनुशासित टीम की तरह पूरे क्षेत्र में फैल जाते । स्ट्रीट लाइट के निकट की जगह अमूमन बड़े भाई लोगों द्वारा जबरन हथिया ली जाती और हम छोटे बच्चों को अँधेरे के निकट की जगह मिलती । यद्यपि यह बात भाई लोगों की समझ में नहीं आती थी कि गुम होने की संभावना तो अँधेरे में ही अधिक होती है फिर वह सिक्के हों या समझ । 

कुछ स्थानों पर सिक्के अवश्यम्भावी रूप से प्राप्त होते थे । कभी कभी हमें संदेह होता था कि वे दूकानदार जानबूझकर हम बच्चों के लिए कुछ सिक्के छोड़ जाते हैं । जगहों की तरह कुछ बच्चों के लिए भी यह तय था कि उन्हें हमेशा सिक्के मिलते ही हैं हालाँकि बाद में हमें पता चलता था कि वे अपनी झूठी शान बरक़रार रखने या डींग हांकने के लिए झूठ बोलते थे । 

यद्यपि हर एक को इकन्नी, दुअन्नी चवन्नी या अठन्नी मिल ही जाती थी फिर भी जिन बच्चों को सिक्के नहीं मिलते थे वे नगर पालिका द्वारा काटे गए बाज़ार टैक्स की रंगबिरंगी पर्चियों से ही संतोष कर लेते थे । यह उनके लिए सांत्वना पुरस्कार की तरह होता था । 

सिक्के बटोरने से प्रारंभ हुआ यह कार्य बहुत आनंद दायक था। इसके विस्तार में फिर हम लोगों ने आइसक्रीम के प्लास्टिक के चम्मच, माचिस के खोखे, डाक टिकट आदि बटोरना प्रारम्भ किया ।यह हम लोगों का खजाना होता था और दोस्तों के बीच डींग हांकने के काम आता था । कुछ बड़े होने के बाद मैंने विचार बटोरना शुरू किया । उन दिनों अख़बारों में एक कालम आता था ‘अनमोल वचन’ ..मैं उन्हें एक कॉपी में उतार लेता था । फिर धीरे धीरे मैंने अच्छे शब्द बटोरने शुरू किये फिर अच्छी कविताएँ , अच्छी कहानियां और किताबें । वैसे बटोरने की यह आदत अब भी बनी हुई है अब इनमे अच्छे दोस्त भी शामिल हो गए हैं । 

ऐसा भयानक काम आपने कभी नहीं किया होगा 

सिक्के बटोरने के इस उपक्रम में एक और भयंकर काम हम लोग किया करते थे । हमारा घर मरघट के निकट था और किसी भी शव को अनिवार्य रूप से हमारे मोहल्ले की इस सड़क से ही गुजरना पड़ता था । उन दिनों सिक्कों की इतनी किल्लत भी नहीं थी और मृत्यु को उत्सव की तरह मनाया जाता था इसलिए बैंड बाजे के पीछे चलती हुई शव यात्रा में अर्थी के ऊपर धान की लाई और बतासे के अलावा सिक्के भी लुटाये जाते थे । हमारे घर के सामने की सडक समाप्त होते ही बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर मरघट था इसलिए ‘क्या लेकर आये थे और क्या लेकर जाओगे’ इस भाव के साथ कंजूसी से बचाए हुए सारे सिक्के इसी सड़क पर लुटा दिए जाते थे ।

मुर्दा गुजर जाने के बाद हम लोग लाई बतासे गुलाल के बीच पड़े हुए सिक्के बटोरने के लिए टूट पड़ते । ‘मुर्दा गुजरना’ यह शब्द प्रयोग आपको अजीब सा लगेगा क्योंकि आपने अब तक जीवित आदमी का गुजर जाना ही सुना होगा .. लेकिन हम लोग रोज ही यह वाक्य कहते थे और गुजरने वाले मुर्दों की राह देखा करते थे । जिस दिन कोई मुर्दा नहीं गुज़रता उस दिन हमें अच्छा नहीं लगता था ।

फेंके हुए पैसे बटोर लेने के बाद हमें बड़े भाईसाहब की अदालत में हाजिर होना पड़ता था जहाँ हिसाब दिया जाता कि किसकी कितनी आमदनी हुई है । बड़े भैया नीम के पेड़ के नीचे एक गड्ढा खोदते और कहते “सब लोग अपने अपने सिक्के इसमें डाल दो और साबुन से हाथ धो लो, कल तक यह सिक्के पवित्र हो जायेंगे,फिर ले लेना ।“ 

पैसे तो मुर्दा ले गया 

अगले दिन सुबह सुबह ही हम लोग अपने पवित्र सिक्के हासिल करने हेतु  नीम के पेड़ के नीचे जुट जाते । बड़े भैया सबकी उपस्थिति में वह गड्ढा खोदते और पैसे बाँट देते लेकिन वे पैसे पहले से कम होते थे । बड़े भैया सांत्वना प्रकट करते हुए कहते “कोई बात नहीं, मुर्दा अपना हिस्सा ले गया ।“ आगे चलकर जब मुर्दा पूरे के पूरे पैसे हड़पने लगा तो हम लोगों को शक़ हुआ । एक दिन हम लोगों ने तय किया कि आज जागेंगे और छुपकर देखेंगे । 

हमने ध्यान से देखा तो पता चला कि देर रात सब बच्चों और बड़ों के सो जाने बड़े भैया ही सर पर सफ़ेद चादर ओढ़कर आते थे और गड्ढा खोदकर पैसे निकाल लेते थे फिर अँधेरे में गुम हो जाते थे । हमने उनसे शिकायत की तो उन्होंने हमें डराते हुए कहा “अरे वह मुर्दा ही है ... उसे देखना मत और भूलकर भी उसके पास नहीं जाना,पकड़ लेगा तो सिक्कों के साथ तुम्हे भी ले जायेगा ।“ 

दंगवाड़ा उत्खनन मे पंचमार्क सिक्के बटोरते शरद कोकास 

बचपन के वे दिन बीत गए और यह सिलसिला समाप्त हो गया । मुझे नहीं पता था कि बड़े होने के बाद पुरातत्त्व में स्नातकोत्तर की कक्षा में मुझे फिर प्रैक्टिकल में उसी तरह पंचमार्क सिक्के ढूँढने होंगे । ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद मैंने उज्जैन में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व की स्नातकोत्तर कक्षा में प्रवेश लिया था । पहले ही माह एक दिन गुरुदेव डॉ. वाकणकर हमें एक पुरातात्विक स्थल पर ले गए और कहा कि “ यहाँ बहुत सारे पंचमार्क सिक्के पड़े हैं उन्हें ढूंढो । यह काम तुम्हारे कोर्स में है ।“ 

प्राचीन समय में मुद्रा हेतु इन्ही पंचमार्क सिक्कों का उपयोग होता था । यह पंचमार्क सिक्के ताम्बे की शीट को छोटे छोटे टुकड़ों में काटकर ,फिर उन पर मुहर या राजकीय मुद्रा रखकर ,हथौड़े से प्रहार कर यानि पंच कर बनाये जाते थे, इन्हें आहत सिक्के भी कहा जाता है । कुछ स्थानों पर यह सोने और चांदी के भी पाए गए हैं लेकिन अधिकतर ताम्बे के ही होते थे ।

मैंने वाकणकर सर से पूछा “ सर , यह इतने सारे सिक्के यहाँ कैसे आ गए ? उन्होंने जवाब दिया “ हो सकता है यहाँ उस ज़माने में हाट बाज़ार लगता हो ।“  मैंने कहा “या फिर किसी मुर्दे के ऊपर से यह सिक्के फेंके गए हों ?” सर मुस्कुराए ..”दुष्ट, मतलब तुम बचपन में फेंके हुए सिक्के बटोरने का काम कर चुके हो ?” सर को मैंने विस्तार से जो किस्सा बताया वही आज आपके सामने दोहरा रहा हूँ । 

वैसे एक बात कहना तो मैं भूल ही गया । 

मुर्दों पर फेंके गए सिक्के तो मैंने खूब बटोरे लेकिन बारातों में घोड़ी पर चढ़े दूल्हे पर लुटाये गए सिक्कों को बटोरने की मेरी मुराद अधूरी ही रह गई । वैसे भी ताम झाम व दहेज़ प्रेमी दूल्हे और मुर्दे में कोई ख़ास फ़र्क तो होता नहीं है  ।

शरद कोकास 

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