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10 जून 2026

111.भंडारा : कब्रस्तान के भूतों के साथ क्रिकेट देखने का मज़ा


भंडारा शहर के गाँधी चौक वाले क्षेत्र की बसाहट, गोटियाँ जमे हुए कैरम बोर्ड के मध्य भाग की तरह सघन थी, वहीं मनरो स्कूल चौक तक आते आते कैरम के कार्नर वाले पॉकेट के आसपास के क्षेत्र की तरह विरल  हो जाती थी ৷ बाज़ार की ओर से आने वाला रास्ता इस चौक से आगे स्टेशन की ओर चला जाता था जिस पर पारस मेटल वर्क्स जैसे पीतल के कुछ कारखाने मात्र थे ৷ शुक्रवारी की ओर से शोर मचाते हुए आनेवाला रास्ता इस चौक पर आकर शांत हो जाता था और मनरो स्कूल के ग्राउंड और कब्रस्तान के बीच से खामोशी ओढ़कर गुजरते हुए सीधा सिंधी कॉलोनी ओर चला जाता था ৷ 

उधर जाना बहुत कम होता था ৷ हाँ कभी कभार इस मैदान पर क्रिकेट खेलने अथवा हॉकी या फुटबाल के मैच देखने के लिए अवश्य जाते थे ৷


बाद में यहाँ हुतात्मा स्मारक,पानी की टंकी और आगे स्टेट बैंक कॉलोनी का निर्माण हो गया बची खुची जगह रावण ने अपने आत्मदाह के लिए हथिया ली और यह मैदान दशहरा मैदान कहलाने लगा ৷

यही वह नव तालाब का ऐतिहासिक मैदान था जहाँ डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा सन उन्नीस सौ चौवन में भंडारा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के दौरान विशाल आम सभा आयोजित की गई थी  ৷

कब्रस्तान की दीवार उस पार क्या होगा यह हम लोगों के लिए एक रहस्य ही था ৷

कब्रस्तान की दीवार 

दोस्त बताते थे कि इस कब्रस्तान में दफनाए गए मुर्दे रात में जाग जाते हैं और बड़े बड़े पेड़ों के साये में भीतर ही भीतर टहलते रहते हैं ৷ अन्य बच्चों की तरह हमारे दिमागों में भी बचपन से ही भूत-प्रेत,जिन्न आदि  की कहानियाँ डाल दी गई थीं ৷
मैदान और उस पार कब्रस्तान की दीवार 

वैसे तो दिन के समय हमें कोई डर नहीं लगता था फिर भी कभी कभार मैच देखते हुए कोई सफ़ेद कपडे पहने हुए बुज़ुर्ग सा व्यक्ति यदि पास आकर बैठ जाए तो सिट्टी पिट्टी गम हो जाती थी ৷ शाम के बाद तो  वहाँ ठहरने का सवाल ही पैदा नहीं होता था ৷ किसे पता था कि आगे चलकर यहीं स्टेट बैंक कॉलोनी में हमारा घर होगा ৷
मैदान के पूर्व मे स्टेट बैंक कालोनी 

छत पर जाती सीढ़ियों वाला हमारा घर 
बहुत दिनों तक मुझे इस बात का कोई गुमान ही नहीं था कि कब्रस्तान वाले इस रास्ते पर आगे चलकर कोई बस्ती भी हो सकती है इसलिए कि उस रोड से कोई आता जाता दिखाई नहीं देता था ৷ दरअसल इस कॉलोनी तक जाने वाला मुख्य रास्ता गाँधी चौक से पुलिस स्टेशन के पीछे से होता हुआ जाता था ৷ सभी लोग उसी रास्ते से आना जाना पसंद करते थे ৷  

शहर की बाहरी सीमा पर बसी इस सिंधी कॉलोनी का जन्म उन्नीस सौ सैंतालीस में देश के विभाजन के साथ ही हुआ था ৷ पाकिस्तान से ट्रेने भर भरकर हिन्दुस्तान आ रही थीं ৷ पंजाबी भाषी अधिकांश लोग पंजाब प्रांत में शरण ले रहे थे, लेकिन सिंधी भाषी जानते थे कि राष्ट्रगीत में आनेवाली पंक्ति ‘पंजाब सिंध गुजरात मराठा’ में से बाकी सब तो इस आज़ाद देश में हैं, बस सिंध नहीं है ৷ इसलिए उन्होंने देश भर के कस्बों और शहरों में अपना सिंध बसाया ৷ यह बात अलग है कि बरसों से वहाँ रहने वाले तथाकथित मूल निवासियों ने  उन्हें अपनत्व की उस नज़र से नहीं देखा जिसके वे हक़दार थे ৷ तत्कालीन सरकार ने अवश्य उन पर रहम किया और उन्हें शरणार्थी करार देकर ऐसे शहरों और कस्बों की आबादी सीमा से बाहर उन्हें बसा दिया ৷

सिंधी कॉलोनी में रहने वाले इन भारतवासियों के मकान एक ही डिज़ाइन में बने थे, सामने एक छोटा सा वरांडा और भीतर एक कमरा बस ৷ सर पर छत तो मिल गई लेकिन पेट के लिए तो इंतजाम खुद ही करना था सो उन्होंने पापड़, बड़ी, अचार, पिपरमेंट, गोली, बिस्किट, टोस्ट, डबलरोटी बेचने जैसे छोटे मोटे व्यवसाय प्रारम्भ किए । जीवन कुछ व्यवस्थित हो जाने के पश्चात फिर उन्होंने अपने बच्चों को भी पढ़ने के लिए स्कूल भेजने की शुरुआत की ৷ वे जानते थे कि वे स्वयं भले ही बिना पढ़े लिखे रह जाएँ लेकिन अगली पीढ़ी के लिए शिक्षा ज़रूरी थी ৷ 

ढोला स्कूल तक आने वाले ऐसे ही अनेक बच्चों की भीड़ में शामिल था घनश्यामदास हेमनदास कौरानी जिससे आगे चलकर मेरी दोस्ती हुई ৷ घनश्याम के पिता हेमनदास कौरानी की राशन की दुकान थी । हेमनदास जी स्वयं अधिक पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूक थे ৷ उनके बड़े बेटे खूबचंद एम बी बी एस तक शिक्षा प्राप्त कर चुके थे और अकोला महाराष्ट्र के एक अस्पताल में चिकित्सक की नौकरी कर रहे थे । 

भारत के अन्य प्रदेशों में रहने वाले सिंधी समुदाय की भांति भंडारा के सिंधी समुदाय में भी एक बात विशेष थी कि उन लोगों ने कभी किसी काम को छोटा काम नहीं समझा और अपनी मेहनत और लगन के चलते धीरे धीरे आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से सम्पन्न होने लगे । हेमनदास जी ने भी कुछ समय बाद भंडारा में मेन रोड पर एक दुकान ख़रीद ली और वहाँ कपडे का व्यवसाय प्रारंभ किया ৷ उनका मंझला बेटा पहलाज राय मैट्रिक तक हम लोगों के साथ पढ़ता रहा फिर उसने उस दुकान का कारोबार संभाल लिया ৷ 

घनश्याम कुछ अलग तरह का लड़का था ৷ महाराष्ट्र में नाम, पिता का नाम और सरनेम एक साथ कहने की परम्परा थी ৷ जब हम लोग उसका नाम कहते ‘घनश्यामदास हेमनदास कौरानी’ तो वह चिढ जाता और कहता “नहीं, मुझे जी एच कौरानी कहो ৷” बाद में उसने अपने नाम के साथ लगा ‘घन’ हटा दिया और ‘श्याम एच कौरानी’ लिखने लगा ৷ एकेडेमिक कैरियर में भी उसने अपनी अलग रह चुनी । मेरे और नईम के साथ वह भी नागपुर पढ़ने गया था लेकिन वह भंडारा लौटा नहीं, ग्रेजुएशन के पश्चात उसने एल एल बी की डिग्री प्राप्त की और नागपुर में ही वकालत शुरू कर दी । हम ‘थ्री इडियट्स’ में घनश्याम सबसे अधिक बुद्धिमान था लेकिन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से वह काफी नाज़ुक मिज़ाज़ था ৷ जिस दिन स्कूल में हमारी फेयरवेल थी उसी दिन उसको हर्निया का दर्द उठा और उसकी सर्जरी करवानी पड़ी ৷ बाद में धीरे धीरे वह अनेक व्याधियों से ग्रस्त होता गया और अभी कुछ साल पहले यह दुनिया छोड़कर चला गया ৷ 

अपनी कक्षा के वे सहपाठी जिन्हें मैंने दोस्त का दर्जा दिया हुआ था उनमे राकेश सक्सेना से भी मेरी अच्छी दोस्ती थी । राकेश के पिता वकील थे और वह बस स्टैंड के सामने एक बंगले में रहता था । जब मैं छठवीं कक्षा में था तब एक बार वह मुझे अपने साथ अपने घर ले गया था । उन दिनों उसके घर में कार थी और सुख सुविधा के तमाम साधन जैसे टेलीफोन,फ्रिज,ए सी, कूलर,गैस आदि । मुझे वह सब देखकर बहुत अच्छा लगा था । उसका घर देखकर मुझे महसूस हुआ था कि मध्यवर्ग में भी दो वर्ग होते हैं एक वे जिनके पास सुविधा के सारे साधन होते हैं और एक वे जिनके पास फ़कत इनका ख़्वाब होता है । 

अपनी कक्षा के इन दोस्तों के साथ साथ  कुछ सीनियर लड़कों से भी मेरी दोस्ती थी । बाबूजी का कहना था कि अपने सहपाठियों के अलावा अपने सीनीयर्स से भी दोस्ती करना चाहिये इसलिये कि उनसे पढ़ाई में मदद मिलती है । मैंने उनकी बात मानकर अपने एक सीनियर छात्र जयंत दिवे से दोस्ती कर ली थी । जयंत मेरी पढ़ाई में मदद किया करता था । उसने पुस्तकों से  भी मेरी मदद की थी । बाद में वह हायर सेकंडरी में मेरिट में आया था । जयंत के अलावा विपिन भट्ट से भी मेरी मित्रता थी । वह प्राथमिक शाला से ही मेरा सीनियर था और चौथी कक्षा में खेले गये नाटक ‘भूख हड़ताल‘ में उसने मेरे व नानक के पिता की भूमिका अदा की थी । यह नाटक जब बाबूजी के बेला स्थित कॉलेज में हुआ था तो वह अपने घर से तीन मील पैदल चलकर कॉलेज पहुँचा था । इनके अलावा सीनियर छात्रों में चंद्रहास नेमा भी मेरा मित्र था ৷ वैसे कुछ और सीनियर्स भी थे लेकिन उनसे मेरी दोस्ती नहीं थी इसलिये कि वे पढ़ने लिखने में होशियार नहीं थे । 

कितना छोटा सा शहर था भंडारा और उसमे भी हिन्दी मीडियम का एकमात्र विद्यालय था गाँधी विद्यालय जहाँ मराठी के अलावा एक अतिरिक्त सुविधा के रूप में हिन्दी माध्यम भी था ৷ इसलिए भंडारा में रहने वाले जितने भी गैर मराठी भाषी थे उनके बच्चे इसी विद्यालय में पढ़ते थे । यद्यपि  इस स्कूल में शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा नहीं  था लेकिन वहाँ पढ़ना हमारी विवशता भी थी । नगर निगम के स्कूल ऐसे ही होते हैं मेरी यह मान्यता इसी वज़ह से बनी ।  वैसे बच्चों को हिन्दी माध्यम में भरती करने का बाबूजी का यह जूनून मुझ तक ही सीमित रहा, हिन्दी माध्यम के स्कूल की हालत देखकर बाद में बाबूजी ने सीमा और शेखर को  मराठी माध्यम की  शाला में ही प्रवेश दिलवाया । 


शरद कोकास 


7 जून 2026

55. बैतूल : रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क


बैतूल शहर अपनी परंपराओं,अपने संस्कारों और अपनी मासूमियत के साथ इस तरह बड़ा हो रहा था कि उसे देखने वाले दावे के साथ कह सकते थे कि वह बड़ा होकर किसी बड़े शहर की सोहबत में भी नहीं बिगड़ेगा । बड़े शहरों के नाम पर बैतूल के दक्षिण की ओर नागपुर था और उत्तर की ओर भोपाल । दोनों शहर मोहल्ले के बड़े बच्चों की तरह बैतूल से काफी दूर दूर रहते थे । 

अपनी देह में महुए की आदिम गंध लिए बैतूल धीरे धीरे बड़ा हो रहा था  । अंग्रेजों को इसकी  देहगंध से कोई सरोकार नहीं था लेकिन उन्हें इसकी शीतलता पसंद थी इसलिए उन्होंने गोंड राजा द्वारा किसी समय निर्मित खेड़ला किले  से छह किलोमीटर दूर अपने सरकारी दफ्तर और आवास बनाये, उन दिनों वस्तुओं के आयात निर्यात की सुविधा के लिए रेल लाइन के निकट ही मंडी हुआ करती थी । बैतूल में रेलवे स्टेशन के निकट का यह क्षेत्र गंज कहलाने लगा । धीरे धीरे बस्ती बसनी शुरू हुई, सदर में बंगले बने,शहर में बाज़ार बने । हमारा मोहल्ला कोठीबाज़ार के अंतर्गत आता था और साप्ताहिक बाज़ार लगने की वज़ह से इतवारी बाज़ार कहलाता था । यह शहर के लगभग अंतिम छोर पर बसा था । यहाँ हमारे दो मकान थे एक नया मकान जो 1957 मे बना था 


और पुराना मकान लगभग सन 1925 मे बना था


गंज से आने वाली रिंग रोड बीच में ही कालापाठा  की ओर मुड़ जाती थी जहाँ सागौन वन में सागौन के चौड़े चौड़े पत्तों के ऊपर से आसमान शहर के भीतर झाँकने की कोशिश करता था ।

वर्षा के दिनों में बादल उन ऊँचे ऊँचे पेड़ों के ऊपर पसर जाते और कुछ देर ठहर कर बरस जाते । नमी लिए हुए जंगल की आदिम गंध उस वीरानी में चारों ओर पसर जाती । लाल लाल बीर बहूटियाँ अपने पट खोलकर मिटटी के टीलों में दीमकों के साथ अपने घर बनाने लगतीं ।

बैतूल में उन दिनों जंगल ही जंगल थे इसलिए शहर में भी जंगल विभाग के दफ्तर भी सर्वप्रथम यहीं खुले ।

हमारे घर के सामने से गुजरने वाली वह सड़क शहर की अंतिम सड़क थी । उसके बाद  टी अक्षर की ऊपरी डंडी की तरह रिंग रोड आ जाती थी ।


यह शहर की सीमा रेखा की तरह ही थी । रिंग रोड के उस पार मुस्लिमों का कब्रस्तान था


और उसीसे लगा हिन्दुओं का स्मशान ।

उन दिनों मैं आत्मा में विश्वास करता था और सोचता था कि जीते जी तो  हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ते हैं लेकिन मरने के बाद उनकी रूह और आत्माएँ कितने चैन से पास पास घर बनाकर एक साथ रहती हैं । यह सत्य मैंने बड़े होने के बाद जाना कि मृत्यु के बाद देह हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है और उसे जीवित लोगों के संसार से कोई सरोकार नहीं होता है । फिर भी शेष जीवित लोग आत्मा, परलोक,श्राद्ध  आदि के नाम पर अपना मन बहलाने के लिए उसके अस्तित्व का आभास कायम रखते हैं । 

गर्मियों की उन सूनी दोपहरियों में हम लोग अक्सर कब्रस्तान चले जाते थे इसलिए कि वहाँ के आम बहुत मीठे होते थे । यद्यपि इस बात की कोई गुंजाइश नहीं थी कि कोई मुर्दा कब्र से बाहर निकलकर हमें डांटेगा फिर भी पत्थर चलाते हुए हमें इस बात का ध्यान रहता था कि पैर किसी कब्र पर न पड़े । अगर ऐसा होता तो हम लोग तुरंत पाँव छूने की मुद्रा में झुक जाते और कब्र छूकर माफ़ी मांग लेते ।


छुप छुप कर धूम्रपान करने के लिए यह मरघट बहुत उपयुक्त जगह थी इसलिए मोहल्ले के बड़े भाई लोग किसी क़ब्र पर बैठकर सिगरेट फूंकते नज़र आ जाते । सर्दियों के दिनों में हम लोग बगल के स्मशान चले जाते थे । जलती हुई किसी चिता के करीब बैठकर देह को गर्मी देना अच्छा लगता था । दादाजी बताते थे कि हमारा मकान  बनने से पहले बस्ती तक कब्रस्तान का विस्तार था और नींव खोदते समय कुछ बच्चों के कंकाल भी निकले थे । उस समय बाल मृत्यु दर काफी अधिक थी और हिन्दु मुसलमान दोनों में बच्चों को मुख्य स्मशान से कुछ अलग हटकर दफ़नाने की परम्परा थी । 
मदन मोहन कोकाश 
बाज़ार के दिनों के अलावा मोहल्ले की शामें बहुत शांत हुआ करती थीं । अँधेरा घिरने से पहले घर के सामने पानी सींचकर खटिया बिछा दी जातीं या बेंचे रख दी जातीं । हम लोग एक छोर से दूसरी छोर तक दौड़ लगाते फिर थक कर बेंचों पर बैठ जाते  । इधर हम लोग रेस टीप खेलने में व्यस्त होते उधर सामने वाले दालान में मदन मोहन ताउजी की बैठक जम जाती । एक रेहल निकल आती उस पर रखी होती गीता प्रेस गोरखपुर से छपी तुलसी कृत रामचरितमानस की टीका वाली प्रति, साथ ही अगरबत्ती का स्टैंड और उसमे लगी चन्दन अगरबत्ती । ताउजी दुकान बंद करने के बाद कुछ देर टहलने जाते फिर लौटकर हाथ मुँह धोते और गमछे  से मुँह पोछते हुए अपना आसन ग्रहण करते।

इतनी देर में मानस पाठ सुनने की इच्छुक श्रोता मंडली वहाँ एकत्रित हो जाती । इनमे होते पड़ोस के फारेस्ट डिपार्टमेंट वाले चंद्रकांत गुंडे बाबू, छत्तीस इंच मोहरी का पजामा पहनने वाले फद्दी गुरूजी, आमले वाले पटेल, बाजू की  प्रिंटिंग प्रेस वाले सुरेश बाजपेयी जी, शिवदुलारे श्रीवास जी, मुंशी जी, हमारे फर्नीचर के कारखाने में काम करने वाले सद्दू गोंड और भी बहुत सारे लोग । पीले बल्ब की टिमटिमाती रौशनी में मदन भैया हाथ जोड़कर पहले बाल काण्ड का एक श्लोक पढ़ते.. 

वर्णानामर्थ संघानां रसानां छंद सामपि ।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।।

अर्थात, अक्षरों,अर्थ समूहों,रसों, छंदों और मंगलों को करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ । फिर वे रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क वाला पृष्ठ खोलते और अपना पाठ प्रारंभ करते । उनके मुँह से सस्वर दोहे,सोरठे और चौपाइयों का पाठ चलता रहता, साथ साथ वे उनकी व्याख्या भी करते जाते और श्रोता गण भक्ति रस में सराबोर हो जाते । 

साठ के दशक के बच्चे हम लोग 
उस खुले खुले से मोहल्ले में रहने वालों और आते जाते लोगों  के लिए यह दृश्य बहुत मनोरम होता था । वहीं आंखमिचौली खेलते हुए हम बच्चों के लिए यह दृश्य  बड़ों के संरक्षण में बड़े होने की एक सुखद अनुभूति की भांति अवचेतन में आकार लेता था । चन्दन की अगरबत्ती की गंध हमें अपनी ओर खींचती थी । धोती पहने माथे पर तिलक लगाए मदन मोहन ताउजी हमें तुलसीदास की तरह दिखाई देते थे । वे हम बच्चों से भी आग्रह करते थे कि हम बैठकर राम कथा सुने लेकिन हम लोग उसे विशुद्ध धार्मिक कृत्य मानते थे और उसे बुजुर्गों के जीवन का हिस्सा मानकर खेलने कूदने में लग जाते थे ।  बावज़ूद इसके कभी कभार सुस्ताने या पानी पीने के बहाने कोई प्रसंग सुनने बैठ जाते थे और आश्चर्य कि कथा में हमारा मन रमने लगता था ।

बड़े होने के बाद सभी धर्मों के धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने के तारतम्य में मैंने सर्वप्रथम तुलसी कृत मानस और उसके बाद वाल्मीकि कृत रामायण भी पढ़ी । मानस पढ़ने का आधार बैतूल का यही प्रसंग था । बाबूजी भी भंडारा में जीवन भर नियम से प्रतिदिन रामचरित मानस का पाठ करते रहे ।

जगमोहन कोकास मेरे बाबूजी 

इस मकान के दालान में संपन्न होने वाला मानस पाठ बाबूलाल दादाजी के निधन के पश्चात नए वाले मकान के दालान में संपन्न होने लगा । मदन मोहन ताउजी का यह क्रम उनके जीवन तक चलता रहा और गुंडे बाबू ,सुरेश चाचा, फद्दी गुरूजी, सद्दू गोंड और मुंशीजी भी नियमित रूप से उनके श्रोताओं में शामिल होते रहे । 

शरद कोकास 

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