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10 जून 2026

123. भंडारा : ‘कटी पतंग’ पकड़ने दौड़े ‘हाथी मेरे साथी’

 



छात्र जीवन के शब्दकोष में पढाई-लिखाई,क्लास,सर,मैडम,कॉपी,किताब,पैन, घंटी,पीरियड,प्रेयर,लैब

लायब्रेरी,अटेंडेंस,होमवर्क,प्रैक्टिकल,एग्जाम,हॉलीडेज,खेलकूद,शरारत,छेड़खानी,नाटक,गाना,पिकनिक,फंक्शन

के अलावा एक ऐसा शब्द और होता है जिसे ‘बंक’ कहते हैं ৷ वाक्य में इसका प्रयोग ‘क्लास से बंक मारना’ में होता है ৷

यह एक ऐसा कार्य होता है जिसके अंतर्गत सारे छात्र छात्राएँ आपस में सलाह कर लेते हैं कि आज इस इस पीरियड में नहीं जाना है ৷ एक साथ क्लास से गोल मारने का लाभ यह होता है कि पढ़ाई का नुकसान नहीं होता ৷ यह कार्य साहस की पृष्ठभूमि में योजनाबद्ध तरीके से परस्पर सहयोग और विश्वास पर आधारित होता है और इसमें धोखा देने वाले का सामूहिक बहिष्कार होने की संभावना हो सकती है ৷ अलग अलग क्षेत्रों में इस क्रिया  के अलग अलग नाम हो सकते हैं जैसे हम लोग स्कूल में इसे ‘कॉमन चाट’ और कॉलेज में ‘जनरल गोल’ कहते थे ৷ 

हम लोग भंडारा जैसे छोटे से शहर के छोटे से स्कूल में पढ़ते थे ৷ यहाँ कॉमन चाट का कल्चर नहीं के बराबर था इसलिए सामूहिक बंक मारने की ऐसी नौबत ही नहीं आई  ৷ जिसको जब कोई काम होता या स्कूल  आने का मन नहीं होता तो वह वैसे ही स्कूल नहीं आता था ৷ पढ़ाई-लिखाई से सरोकार भी बहुत कम लोगों को था  ৷ वैसे कभी किसी रोज़ पढ़ने का मन नहीं होता था तो हम लोग टीचर से निवेदन कर लेते कि सर आज मन नहीं है, क्लास छोड़ दीजिए  ৷ हमारे कुछ टीचर इतने भले थे कि कई बार हमारी भावनाओं का मान रखते हुए ख़ुद ही पढ़ाने नहीं आते थे ৷ वैसे भी वे लोग साल भर टीकाकरण, जनगणना, मत गणना, पशुगणना, मलेरिया उन्मूलन, कुष्ठ उन्मूलन,चेचक उन्मूलन  जैसे सरकारी महत्त्व के कार्यक्रमों में लगे रहते थे ৷ 

इसी तारतम्य में एक बार सब बच्चों का बंक मारकर फिल्म देखने का प्रोग्राम बन गया ৷ यद्यपि संवैधानिक रूप से इसके लिए बंक मारना शब्द उचित नहीं होगा इसलिए कि यह पहले ही घोषित किया जा चुका था कि अगले दिन शिक्षकों के किसी अन्य कार्य में व्यस्त होने के कारण दोपहर बाद कक्षायें नहीं लगेंगी । बच्चों ने तय किया कि इस समय का सदुपयोग पढाई लिखाई, नोट्स बनाने या किसी शिक्षक का सर खाने जैसे व्यर्थ के कामों में न कर फिल्म देखने में किया जाये ৷ वैसे भी उन दिनों श्रीकृष्ण टाकीज़ में ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी फिल्म लगी थी और माना जा रहा था कि चंद प्रणय दृश्यों को यदि नज़र अंदाज़ कर दिया  जाए तो यह फिल्म बच्चों के मनोरंजन के लिए ही बनी है ৷  

  समय का सदुपयोग करने में लड़कों की बुद्धि ज़रा कम चलती है इसलिए फिल्म देखने का प्रोग्राम उनके द्वारा पहले नहीं बनाया गया लेकिन जैसे ही किसी गुप्त भेदिये द्वारा लड़कों को यह पता चला कि अगले दिन कक्षा की तमाम लड़कियों का मैटिनी शो में फिल्म जाने का प्रोग्राम है ‘हम क्या लड़कियों से कम हैं’ की प्रतिस्पर्धा भावना से उन्होंने भी अपना प्रोग्राम भी बना लिया । सिनेमाहाल में लड़के लडकियाँ भले ही अलग अलग क्लास में बैठते लेकिन मासूमियत भरा यह अहसास तो बना रहता कि लड़कियों के साथ पिक्चर देखने गए थे ৷ 

वह राजेश खन्ना उर्फ़ ‘काका’ का युग था । उस समय शहर में राजेश खन्ना की दो फिल्मे लगी थीं, आदर्श में ‘कटी पतंग’ और श्रीकृष्ण में ‘हाथी मेरे साथी’ । कटी पतंग के बारे में सुन रखा था कि वह रोने धोने वाली फिल्म है ৷ वैसे भी  हमारा फर्स्ट प्रेफरेंस तो ‘हाथी मेरे साथी’ ही थी ৷  तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार दोपहर तीन बजे हम लोग श्रीकृष्ण टाकीज़ पहुँचे ৷ बुकिंग विंडो पर भारी भीड़ थी लेकिन हमारी क्लास में कुछ ऐसे छात्र थे जिन्हें बुकिंग विंडो के जंगले के ऊपर चढ़कर, खिड़की में हाथ घुसाकर टिकट प्राप्त कर लेने में महारत हासिल थी ৷ 

उस ज़माने में शहर में चल रही फ़िल्म का मनोवैज्ञानिक प्रभाव यह होता था कि शहर में जिस हीरो की फिल्म जितने दिन चलती थी उतने दिन लड़के उसी स्टाइल में चलते फिरते व बात करते थे ৷ हालाँकि टिकट खिड़की पर इन मित्रों के शौर्य एवं बल प्रदर्शन को देखकर मुझे लग रहा था कि वे राजेश खन्ना को नहीं बल्कि हाथियों को इस फिल्म का हीरो समझ रहे थे ৷ वैसे कमोबेश यह बात सच भी थी ৷

टिकट कटाकर फुर्ती से हम लोग भीतर प्रवेश कर गए ৷ फर्स्ट क्लास के पीछे ही लेडीज़ क्लास था ৷ इंटरवल तक तो कोई चांस नहीं था लेकिन जैसे ही प्रोजेक्टर बंद हुआ और हाल में लाइट जली हम लोगों ने तपाक से गर्दन घुमाई और  कनखियों से पीछे देखना शुरू किया ৷ हमें अपनी क्लास की एक भी लड़की वहाँ नहीं दिखाई दी ৷ क्षण भर के लिए यह ख्याल भी आया कि कहीं बालकनी में ना चली गई हों लेकिन उन दिनों हायर सेकंडरी के पहले यह वर्ग परिवर्तन संभव ही नहीं था ৷ लेडीज़ क्लास में झांकना अभद्रता थी लेकिन जब कोई न दिखा तो हम पूरा घूम गए और आँखें फाड़ फाड़कर भी देखा, लेकिन फिर भी कोई न दिखा ৷

शेष फिल्म हम लोगों ने घनघोर दुःख और निराशा में देखी ৷ हमारा दुःख उस दुःख से कम नहीं था जैसा कि राजेश खन्ना को अपने प्रिय हाथी रामू के मर जाने के बाद रहा होगा ৷ हमारी इच्छाएँ भी तो हाथी जैसी ही थीं जिन्हें सहेजकर रखना बहुत कठिन था ৷ परदे पर ‘दी एंड’ आने के पहले ही उनका ‘दी एंड’ हो चुका था ৷ शो खत्म होने पर हाल की बत्तियां जलते ही हम लोग सर झुकाए हुए भारी मन और भारी कदमों से बाहर निकले ৷ किसी चमत्कार की आशा में एकाध निगाह लेडीज़ क्लास की ओर भी डाली ৷ 

श्रीकृष्ण टाकीज़ से बाहर आकर गाँधी चौक की ओर बढ़ते हुए जैसे ही हम लोग आदर्श टाकीज़ के सामने पहुँचे अचानक एक लड़का चीखा ..”वो देख लडकियाँ” सबके झुके हुए सर तत्काल ऊपर उठे, हमने देखा ‘कटी पतंग’ का शो छूट चुका था और आदर्श टाकीज़ से बाहर आने वाली दर्शकों की भीड़  में  हमारी क्लास की लड़कियां भी चली आ रही थीं ৷ हमें समझ में आ गया कि हमारी पतंग इस तरह कटी थी ৷ 

अगला दिन हम लोगों के लिए खीझ और ग्लानि के पर्व की तरह था ৷ हमारा गुप्त भेदिया आधी ख़बर ग़लत लाया था लेकिन सिर्फ इसलिए पिटते पिटते बचा था कि उसकी आधी ख़बर सही थी  ৷ उनका गुप्त भेदिया परफेक्ट था । उन्हें पहले ही पता चल गया था कि लड़के उन्ही के चक्कर में फिल्म देखने गए थे और ‘कटी पतंग’ की जगह ‘हाथी मेरे साथी’ देख आए थे ৷ यही कारण था कि हम लोग उनसे ठीक ठीक नज़रें भी नहीं मिला पा रहे थे ৷ बाद में पता चला कि उन लोगों का तो पहले से ही प्रोग्राम ‘कटी पतंग’ देखने का था ৷

हालाँकि हम लोग बहुत दिनों इस प्रश्न का उत्तर नहीं ढूंढ पाए कि ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी भीड़खेंचू पॉपुलर फिल्म छोड़कर लडकियाँ ‘कटी पतंग’ जैसी रोनी धोनी फिल्म देखने कैसे पहुँच गईं ? सच बात तो यह थी कि हम लोग उस उम्र में भी कार्निवाल में खेल दिखाने वाले ‘ओ मेरे हाथी’ पर ही अटके हुए थे और हमारी हमउम्र लडकियाँ ‘ये जो मोहब्बत है’ तक पहुँच गई थीं ৷ इस तरह इस घटना के आलोक में हमें यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि लड़कियाँ शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी लड़कों की अपेक्षा पहले मेच्योर होती हैं । 

 शरद कोकास 

67.भंडारा : भविष्य के एक गायक की हत्या


कालखंड, बीसवीं सदी में सत्तर का दशक । स्थल, भंडारा की आदर्श टाकीज़ का लेडीज़ क्लास । फिल्म, दिल एक मंदिर, शाम छह बजे का पहला खेल जो अब समाप्ति पर है । परदे पर एक मार्मिक दृश्य और हॉल में गूंजती हुई रफ़ी साहब की आवाज़ “जाने वाले कभी नहीं आते, जाने वाले की याद आती है ।“ घुप्प अँधेरा है और मैं किसी का चेहरा नहीं देख पा रहा हूँ लेकिन दबी दबी सिसकियों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही है । मुझे न वह दृश्य समझ में आ रहा है न गाने के बोलों का अर्थ, लेकिन माँ को रोता देख मैं भी धीरे धीरे सुबक रहा हूँ। 

हम इसीलिए सिनेमा मे दुख के दृश्य देखकर रोते हैं 

कुछ बड़े होने के बाद जब ऐसे दृश्यों को समझ कर मैंने उन पर रिएक्ट करना शुरू किया तो समझ में आया कि दूसरों के दुःख में द्रवित होना यह हम मनुष्यों का यह मूल स्वभाव है । इसीलिए ऐसे किसी फिल्म या नाटक के काल्पनिक दृश्य में भी हमारी कैथार्सिस या भाव विरेचन की यह प्रक्रिया जारी रहती है । हाँ,  हम सायास अपने आप को इस भावनाओं के विरेचन से अवश्य रोक सकते हैं  लेकिन ऐसा  कर पाना बहुत मुश्किल होता है । आँसू  रोकने की कोशिश करोगे तो और ज़्यादा आँसू निकलेंगे । मैं तो ऐसा  कभी सायास भी नहीं कर पाया । आज भी  सिनेमा के परदे पर किसी भावुक दृश्य में आँसू अपने आप बहने लगते हैं  । 

मृत्यु के दर्शन पर आज तक जाने कितने लोगों ने क्या क्या लिखा है, लेकिन मैं जब भी सोचता हूँ तो इसे एक इंसान की देह की अनुपस्थिति के रूप में ही सोचता हूँ । कैसा होता है ना, एक इंसान का इस दुनिया से चले जाना । वह अपनी देह के साथ जीवन भर इस संसार में उपस्थित रहता है, हम उसे देख सकते हैं, उसे छू सकते हैं, उसकी आवाज़ सुन सकते हैं । मृत्यु के बाद वह एक तस्वीर बन जाता है और घर की किसी दीवार पर एक फ्रेम के भीतर कैद होकर टंग जाता है  । 

बैतूल के अपने दवाखाने में दादाजी अब अपनी ही कुर्सी के पीछे दीवार पर वीरेंद्र चाचा द्वारा बनाई एक खूबसूरत फ्रेम के भीतर एक तस्वीर के रूप में विराजमान थे  । तस्वीर में भी दादाजी की मूछों से उनका रौब टपकता था । यह तस्वीर बरसों उस कमरे में टंगी रही । जब भी मैं उस तस्वीर की ओर  देखता मुझे उनका वह रूप याद आता जब दूध रोटी खाते समय उनकी इन बड़ी बड़ी सफेद मूँछों पर दूध की सफ़ेदी की एक परत और चढ़ जाया करती थी । 

उनकी यह तस्वीर वही तस्वीर थी जो उनके भंडारा आने पर योगेश काले मामा ने खींची थी और जो एल्बम में अब भी उपस्थित है । एल्बम में दादाजी की तस्वीर देखते हुए उन क्षणों को याद करने की कोशिश करता हूँ जो मैंने दादाजी के साथ बिताये थे । दादाजी के साथ बिताये हुए बहुत कम क्षणों के निगेटिव मेरे मस्तिष्क के डार्क रूम में हैं। इनमे  डेढ़ साल की उम्र में मेरे जानी जोकर बनने का एक किस्सा भी है । 

अरे ! मैं तो जॉनी जोकर बन गया 

उन दिनों बैतूल के हमारे घर में एक गाय थी जिसका नाम लक्ष्मी था । लक्ष्मी ‘गाय जैसी सीधी’ इस मुहावरे को ग़लत साबित करते हुए पूरे मोहल्ले में अपने सींग मारने के लिए प्रसिद्ध थी । उसके मरखनी होने की वज़ह से बच्चे तो बच्चे बड़े भी उसके करीब नहीं जाते थे । दादी माँ की ड्यूटी थी उसे बांधने और दूध दुहने की । सुबह होते ही उसे खोल दिया जाता और घर के पास ही नागोराव जी के घर के सामने वह अन्य गायों के साथ नार में शामिल हो जाती । फिर वह शाम ढले गोधूली बेला में ही लौटती । 

उस दिन शाम को मुल्लू भैया देवी मन्दिर के पास कबाड़ में मिली एक पेराम्बुलेटर यानी बाबा गाड़ी में मुझे घुमा रहे थे । घर लौटती हुई लक्ष्मी के कानों में जैसे ही इस पुरानी गाड़ी की चूं चूं आवाज़ पहुँची वह उसे पृथ्वी का कोई विचित्र  जीव मानकर सींग मारने के लिए उस ओर दौड़ी । भैया खतरा भाँप कर गाड़ी छोड़कर अलग हो गये लेकिन मुझे बाहर निकलने का अवसर उन्हें नहीं मिला । लक्ष्मी ने अपने दोनों सींग गाड़ी में फँसाये और उसे उछाल दिया । 

मैं जैसे ही अंतरिक्ष से धरती पर आया मुझे पता चला मेरा सर फटा हुआ है । घर तक की यात्रा मुल्लू भैया की गोद में रोते हुए पूरी की । बापू ने तुरंत डेटाल के पानी से मेरा ज़ख्म धोया पट्टी बांधी और कहा “तुम्हे कुछ नहीं हुआ है , जाओ अब खेलो ।“ 

बापू का मेरे अंतर्मन को दिया हुआ सजेशन अपना काम कर गया और मैं चोट का दर्द भूल गया । अपने सर पर बन्धी हुई पट्टी लेकर एक विशिष्टता बोध के साथ मैं बाहर आया  और अपने दोस्तों पर इम्प्रेशन मारते हुए  कहा “ देखो, मैं जानी जोकर बन गया हूँ ।“ 

अपने साथ के बच्चों पर इम्प्रेशन मारने की मेरी यह आदत उन्ही दिनों डेवलप हुई थी । मैं एवरेज बच्चों की तरह नहीं रहना चाहता था । 

उस साल भी अपनी गायन की कॉपी अपने साथ लेकर मैं बैतूल इसी लिए गया था कि दोस्तों को कुछ राग रागिनियाँ सुना कर अपना प्रभाव जमा सकूँ  । लेकिन लौटते वक्त जाने किस बेखयाली में वह कॉपी वहीं  छूट गई । 

जुलाई 1965 का माह लग गया था और मेरी पाँचवी की कक्षा शुरू हो गई थी । स्कूल से आने के बाद मैं खेलने चला जाता था जबकि पिछले साल वह संगीत विद्यालय का समय होता था । एक दिन बाबूजी ने पूछा “गायन क्लास क्यों नहीं जा रहे हो ?” मैंने उन्हें बताया कि मेरी कॉपी बैतूल में छूट गई है और बिना कॉपी के संगीत विद्यालय जाने में मुझे शर्म आती है । 

यहीं था संगीत विद्यालय 
उन दिनों के अभिभावकों के भीतर अपने बच्चों को जैक ऑफ़ आल बनाने की ज़िद नहीं थी इसलिए बाबूजी ने भी जोर नहीं दिया । मैं उसके बाद संगीत विद्यालय नहीं गया और इस तरह भविष्य के एक गायक की हत्या हो गई ।

रूपचंद से दोस्ती 

हिंदी माध्यम का वह केवल एक ही प्रायमरी स्कूल था इसलिए सभी नॉन मराठी यानी सिन्धी,पंजाबी,मुस्लिम,बंगाली छात्र इसी स्कूल में पढ़ते थे । मेरी क्लास के सभी छात्र छात्राएँ संपन्न घरों से थे और न केवल उम्र में बल्कि कद में भी मुझसे बड़े थे । होना तो नहीं चाहिए था लेकिन इस बात को लेकर मेरे भीतर एक गिल्ट कॉम्प्लेक्स पैदा होने लगा । यद्यपि मैं पढने में सबसे आगे था लेकिन मेरी दोस्ती किसी से नहीं हो पा रही थी  । नानक भी उन दिनों थोड़ा कटने सा लगा था । ऐसे समय मेरी दोस्ती रूपचन्द नामक एक लड़के से हुई । 

रूपचंद गांधी चौक से स्टेशन जानेवाले रास्ते पर बीड़ी कारखाने के पीछे बसी दलितों की बस्ती मे एक कच्चे मकान में रहता था । उस के पिता स्कूल के पास ही एक बीड़ी कारखाने में मुनीम थे । हम लोग दोपहर की छुट्टी में अक्सर उस कारखाने चले जाते थे और वहीं बैठकर खाना खाते थे । रूपचन्द भी कभी कभार मेरे घर आ जाया करता था । एक बार जब मैं पीछे के आंगन में नंगा नहा रहा था तब वह गली से होता हुआ सीधे पीछे आ गया । 

किसी दोस्त के सामने निर्वस्त्र होने का यह पहला अवसर था । उन दिनों शेम शेम कहने का चलन नहीं था फिर भी मुझे अचानक शर्म सी महसूस हुई । बड़े होने के बाद जब मैंने अदन के बगीचे में हव्वा द्वारा ज्ञान का फल चखे जाने और अपने निर्वस्त्र होने पर शर्मा जाने के अहसास का किस्सा पढ़ा मुझे अपने बचपन का वह दृश्य याद आ गया । उस दिन मुझे भी अहसास हुआ कि अब मैं बच्चा नहीं हूँ और अगले दिन से ही मैंने अंडरवियर पहनकर नहाना शुरू कर दिया ।  अंडरवियर पहनकर नहाने का यह सिलसिला पूरी स्कूल लाइफ मे चलता रहा ।  

उसी साल मकान मालकिन नानी ने मकान के पुनर्निर्माण का काम प्रारम्भ किया । वे किराये से देने के लिये आंगन के बगल में दो कमरे और निकालना चाहती थीं  । उन्होंने बाबूजी को अल्टीमेटम दे दिया कि वे मकान खाली कर दें । लेकिन उस मकान का किराया बहुत कम था और उससे अधिक देने की स्थिति में हम लोग नहीं थे इसलिये बाबूजी वह मकान छोड़ना नहीं चाहते थे । उन्होंने थोड़ा सा किराया बढ़ा दिया और निर्माण होने तक उसी असुविधा में रहना स्वीकार कर लिया । 

शायद उस समय मकान का किराया अठारह रुपए था । 

माँ बाबूजी मैं और मुझसे छोटे दोनों भाई बहन सामान सहित दो कमरों में सिमट गए । उस साल हमारे यहाँ नागपुर से मेरे फुफेरे भाई बच्चन भैया,बहन निर्मल जीजी और परमानन्द मामा भी आए थे । वे भी हम लोगों के साथ धूल मिट्टी के बीच रहे । उन दिनों मेहमानों के आने जाने का काफी चलन था और उन्हें किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा भी नहीं दी जाती थी । परमानन्द मामा मिलिट्री में थे और अंग्रेज़ी तरीके से रहते थे,स्पून नाइफ के साथ अंग्रेज़ी तरीक़े से खाना खाते थे फिर भी हम लोगों के साथ उन्हें बहुत मज़ा आया  । माँ बताती थी कि वे बचपन से ही अनुशासन प्रिय और सलीके से रहने वाले थे इसलिये उनकी भाभी उन्हें मज़ाक में ‘काला अंग्रेज़’ कहती थीं । मुझे याद है मामा ने  अपने कैमरे से हम लोगों की ढेर सारी तस्वीरें भी ली थीं ।