विगत दिनों नागपुर जाना हुआ था , छोटी बहन की ननद की बेटी के विवाह में । विवाह समारोह दिन में सम्पन्न हुआ । मंत्र पढ़े गये और ‘कुर्यात सदा मंगलम...’ की ध्वनि के साथ ममता रिधोरकर व सारंग पेंढारकर एक दूजे के साथ परिणय सूत्र में आबद्ध हो गये । तत्पश्चात भोजन सम्पन्न हुआ , पारम्परिक पकवानों के अलावा बेसन का झुनका और ज्वार की रोटी यानि भाकर भी जम कर खाई गई । भोजनोपरांत वैदिक विवाह पद्धति से भी विवाह सम्पन्न हुआ । कुछ देर पश्चात वर - वधू हाथ में शक्कर से भरी हुई एक कटोरी लेकर आये और सारंग ने चम्मच से शक्कर देते हुए कहा “ मुँह मीठा कीजिये , आज से इसका नाम शमिका हो गया है ।“ मुझे याद आया महाराष्ट्रियन ब्राह्मणों में विवाह के उपरांत एक रस्म होती है जिसमें वधू का मायके का प्रथम नाम बदल दिया जाता है और उसे दूसरा नाम दिया जाता है । इसके लिये पंडित द्वारा वधू को तीन विकल्प दिये जाते हैं । उसे अपनी पसन्द का एक नाम चुनना होता है ।
| चित्रा व राजेन्द्र |
मैं शक्कर फाँकते हुए कुछ सोच ही रहा था कि मेरे फुफेरे भाई राजेन्द्र शर्मा की पत्नी चित्रा ने मुझसे सवाल किया “ भैया , क्या यह गलत प्रथा नहीं है कि मायके का दिया हुआ नाम ससुराल में बदल दिया जाए ? “ मैंने कहा “ हाँ गलत तो है , यह स्त्री के अस्तित्व व अस्मिता का सवाल है । मेरे विचार से नाम क्या सर्नेम भी नहीं बदलना चाहिये । “ “ तो फिर आपने भाभी का सर्नेम क्यों बदला ? “ उसने तपाक से सवाल किया ।
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| शरद विश्वकर्मा ( कोकास ) व लता कोकास |
“ हा हा हा ...” मैं ज़ोरों से हँसा । “ भई , मैं तो उपनाम बदलने के पक्ष में ही नहीं था । विवाह के पश्चात दो वर्षों तक इनका नाम लता विश्वकर्मा ही था । लेकिन होता यह था कि जब भी मैं इनके स्कूल जाता था तो मेरा स्वागत आइये विश्वकर्मा जी कह कर किया जाता । उधर मेरे दोस्तों के बीच इन्हे श्रीमती कोकास कह कर सम्बोधित किया जाता । इस तरह अपनी पहचान को लेकर कई बार विचित्र स्थितियाँ उत्पन्न हो जातीं थीं । अब इस तरह के परम्परावादी समाज में हम दोनों दो - दो नामों के साथ तो नहीं रह सकते थे ना , इसलिये तय किया गया कि एक को तो नाम बदलना ही होगा । अंतत: इनका उपनाम बदल दिया गया ।“
“ वही तो ।“ चित्रा ने फिर सवाल किया । तो भाभीजी ने ही अपना नाम क्यों बदला आपने क्यों नहीं ? “ मैंने कहा .. “ भई, अगर कुछ हज़ार वर्षों पूर्व की मातृसत्तात्मक परिवार की स्थिति होती तो अवश्य ही मैं अपना नाम बदल लेता लेकिन क्या करें हमारे यहाँ पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था है । नाम बदलने से पहले व्यवस्था बदलना ज़रूरी है , और वह इतनी जल्दी तो हो नहीं सकता । “
लेकिन प्रश्न जहाँ का तहाँ है , आखिर स्त्री नाम क्यों बदले ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह अपने पूर्व नाम और उपनाम के साथ ही अपना अस्तित्व बनाये रखे । वैसे यह सम्भव तो है ,मैंने बहुत सी विदूषी महिलाओं को देखा है जिन्होंने विवाह के उपरांत भी अपने उपनाम नहीं बदले इसलिये कि उनकी पहचान ही पहले के नाम के साथ जुड़ी थी । लेकिन इस तरह होता यह है कि व्यावसायिक क्षेत्र में तो उनका पूर्व नाम ही प्रचलित होता है और सामाजिक क्षेत्र में पति का उपनाम जुड़ जाता है । इस तरह उन्हें दो नामों के साथ जीना पड़ता है । हमारी एक रंगकर्मी व लेखिका मित्र हैं ऊषा वैरागकर , रंगकर्मी श्री अजय आठले से विवाह के पश्चात उन्होंने अपना नाम ऊषा वैरागकर आठले लिखना प्रारम्भ किया और अब वे पूरी तरह ऊषा आठले हो गई हैं । लेकिन पुराने लोग अभी भी उन्हें पुराने नाम से ही जानते हैं । और अपने पूर्व नाम को लेकर संकल्पित हमारी ब्लॉगर मित्र वन्दना अवस्थी दुबे से तो आप परिचित हैं ही ।
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| सारंग पेंढारकर व शमिका ( ममता ) पेंढारकर |
फिर भी इसका तात्कालिक उपाय तो यही है कि प्रथम नाम तो कम से कम न बदला जाये , लेकिन प्रथायें तो प्रथायें है और हम इनका विरोध भी करते हैं लेकिन जानते हैं व्यावहारिक जगत में इनका हल ढूँढना इतना आसान नहीं है । इसके लिये नई सोच के युवाओं को ही आगे आना होगा । बहरहाल कु. ममता रिधोरकर अब सौभाग्यवती शमिका पेंढारकर हो गई हैं । श्री सारंग पेंढारकर का नाम वही है जो पहले था । उनके नाम के आगे महाराष्ट्र की परम्परा के अनुसार सौ. भी नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि वे पुरुष हैं , हाँलाकि इतनी अच्छी लड़की से विवाह कर सौभाग्यवान तो वे हो ही चुके हैं । फिलहाल इस चर्चा के बहाने हम , दोनों को अपनी शुभकामनायें और बधाई दें और उनके सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करें ।
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें




