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6 जनवरी 2011

अगर मेरा नाम शरद विश्वकर्मा होता तो..

विगत दिनों नागपुर जाना हुआ था , छोटी बहन की ननद की बेटी के विवाह में । विवाह समारोह दिन में सम्पन्न हुआ । मंत्र पढ़े गये और  ‘कुर्यात सदा मंगलम...’ की ध्वनि के साथ ममता रिधोरकर व सारंग पेंढारकर एक दूजे के साथ परिणय सूत्र में आबद्ध हो गये । तत्पश्चात भोजन सम्पन्न हुआ , पारम्परिक पकवानों के अलावा बेसन का झुनका और ज्वार की रोटी यानि भाकर भी जम कर खाई गई । भोजनोपरांत वैदिक विवाह पद्धति से भी विवाह सम्पन्न हुआ । कुछ देर पश्चात वर - वधू हाथ में शक्कर से भरी हुई एक कटोरी लेकर आये और सारंग ने चम्मच से शक्कर देते हुए कहा “ मुँह मीठा कीजिये , आज से इसका नाम शमिका हो गया है ।“ मुझे याद आया महाराष्ट्रियन ब्राह्मणों में विवाह के उपरांत एक रस्म होती है जिसमें वधू का मायके का प्रथम नाम बदल दिया जाता है और उसे दूसरा नाम दिया जाता है  । इसके लिये पंडित द्वारा वधू को तीन विकल्प दिये जाते हैं । उसे अपनी पसन्द का एक नाम चुनना होता है ।
चित्रा व राजेन्द्र
मैं शक्कर फाँकते हुए कुछ सोच ही रहा था कि मेरे फुफेरे भाई राजेन्द्र शर्मा की पत्नी चित्रा ने मुझसे सवाल किया “ भैया , क्या यह गलत प्रथा नहीं है कि मायके का दिया हुआ नाम ससुराल में बदल दिया जाए ? “ मैंने कहा “ हाँ गलत तो है , यह स्त्री के अस्तित्व व अस्मिता का सवाल है । मेरे विचार से नाम क्या सर्नेम भी नहीं बदलना चाहिये । “ “ तो फिर आपने भाभी का सर्नेम क्यों बदला ? “ उसने तपाक से सवाल किया ।

शरद विश्वकर्मा ( कोकास ) व लता कोकास 
“ हा हा हा ...” मैं ज़ोरों से हँसा । “ भई , मैं तो उपनाम बदलने के पक्ष में ही नहीं था । विवाह के पश्चात दो वर्षों तक इनका नाम लता विश्वकर्मा ही था । लेकिन होता यह था कि जब भी मैं इनके स्कूल जाता था तो मेरा स्वागत आइये विश्वकर्मा जी कह कर किया जाता । उधर मेरे दोस्तों के बीच इन्हे श्रीमती कोकास कह कर सम्बोधित किया जाता । इस तरह अपनी पहचान को लेकर कई बार विचित्र स्थितियाँ उत्पन्न हो जातीं थीं । अब इस तरह के परम्परावादी समाज में हम दोनों दो - दो नामों के साथ तो नहीं रह सकते थे ना , इसलिये तय किया गया कि एक को तो नाम बदलना ही होगा । अंतत: इनका उपनाम बदल दिया गया ।“
“ वही तो ।“ चित्रा ने फिर सवाल किया । तो भाभीजी ने ही अपना नाम क्यों बदला आपने क्यों नहीं ? “ मैंने कहा .. “ भई, अगर कुछ हज़ार वर्षों पूर्व की मातृसत्तात्मक परिवार की स्थिति होती तो अवश्य ही मैं अपना नाम बदल लेता लेकिन क्या करें हमारे यहाँ पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था है । नाम बदलने से पहले व्यवस्था बदलना ज़रूरी है , और वह इतनी जल्दी तो हो नहीं सकता । “
लेकिन प्रश्न जहाँ का तहाँ है , आखिर स्त्री नाम क्यों बदले ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि वह अपने पूर्व नाम और उपनाम के साथ ही अपना अस्तित्व बनाये रखे । वैसे यह सम्भव तो है ,मैंने बहुत सी विदूषी महिलाओं को देखा है जिन्होंने विवाह के उपरांत भी अपने उपनाम नहीं बदले इसलिये कि उनकी पहचान ही पहले के नाम के साथ जुड़ी थी । लेकिन इस तरह होता यह है कि व्यावसायिक क्षेत्र में तो उनका पूर्व नाम ही प्रचलित होता है और सामाजिक क्षेत्र में पति का उपनाम जुड़ जाता है । इस तरह उन्हें दो नामों के साथ जीना पड़ता है । हमारी एक रंगकर्मी व लेखिका मित्र हैं ऊषा वैरागकर , रंगकर्मी श्री अजय आठले से विवाह के पश्चात उन्होंने अपना नाम ऊषा वैरागकर आठले लिखना प्रारम्भ किया और अब वे पूरी तरह ऊषा आठले हो गई हैं । लेकिन पुराने लोग अभी भी उन्हें पुराने नाम से ही जानते हैं । और अपने पूर्व नाम को लेकर संकल्पित हमारी ब्लॉगर मित्र वन्दना अवस्थी दुबे से तो आप परिचित हैं ही ।  
सारंग पेंढारकर व शमिका ( ममता ) पेंढारकर 
                         फिर भी इसका तात्कालिक उपाय तो यही है कि प्रथम नाम तो कम से कम न बदला जाये , लेकिन प्रथायें तो प्रथायें है और हम इनका विरोध भी करते हैं लेकिन जानते हैं व्यावहारिक जगत में इनका हल ढूँढना इतना आसान नहीं है  । इसके लिये नई सोच के युवाओं को ही आगे आना होगा ।  बहरहाल कु. ममता रिधोरकर अब सौभाग्यवती शमिका पेंढारकर हो गई हैं । श्री सारंग पेंढारकर का नाम वही है जो पहले था । उनके नाम के आगे महाराष्ट्र की परम्परा के अनुसार सौ. भी नहीं जोड़ा जा सकता क्योंकि वे पुरुष हैं , हाँलाकि इतनी अच्छी लड़की से विवाह कर सौभाग्यवान तो वे हो ही चुके हैं । फिलहाल इस चर्चा के बहाने हम , दोनों को अपनी शुभकामनायें और बधाई दें और उनके सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करें । 
 
    
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें

21 सितंबर 2010

जन्मदिन मुबारक हो पाबला जी

                जन्मदिन पर करेंगे पाबला जी ब्लॉगजगत पर फिल्म बनाने की घोषणा

            पिछले साल पाबला जी के जन्मदिन  21 सितम्बर पर मैं रात भर उनके लिए गिफ्ट तलाशता रहा और अंत में अपनी विवशता प्रकट करते हुए और खाली पीली बधाई देते हुए “ बल्ले बल्ले आज पाबला जी का जन्मदिन है “ शीर्षक से एक पोस्ट लगा दी ।
कुछ दिनों बाद पाबला जी मेरे यहाँ आए और कहने लगे “ शरद जी , कोई बात नहीं आप मुझे गिफ्ट नहीं दे पाए लेकिन मैं सारे ब्लॉगजगत को एक गिफ्ट देने जा रहा हूँ । “ मैंने कहा “ वाह ! यह तो बहुत अच्छी बात है लेकिन यह गिफ्ट है क्या ? “ पाबला जी ने कहा “ मैं सोच रहा हूँ ब्लॉगजगत पर एक फिल्म बनाऊँ । “ मैंने कहा …” यह तो अच्छा विचार है वैसे भी छत्तीसगढ़ में बहुत से लोग फिल्म बना रहे हैं , फिल्म निर्माण हेतु उचित वातावरण भी है , लेकिन यह तो बताएँ कि फिल्म ब्लॉगजगत पर होगी मतलब ब्लॉग का इतिहास जैसा कुछ होगा या किसी ब्लॉगर की कहानी ? “
पाबला जी ने कहा …” इतिहास पर तो अभी बनाने की ज़रूरत नहीं है हम लोग ठीक ठाक ढंग से ब्लॉगिंग करेंगे तो आनेवाली पीढ़ी खुद ही हमारा सम्मानजनक इतिहास लिखेगी , और वैसे भी डॉक्युमेन्ट्री क्या बनाना , पूरी फ़ीचर फिल्म बनाते हैं । वैसे अभी ज़्यादा कुछ सोचा नहीं है , इसी संदर्भ में आपसे चर्चा करने आया हूँ । “ मैंने सोचा यह तो अच्छी बात है । पाबला जी के मन में विचार आया है , इस तरह  वे आधे फिल्म निर्माता तो बन ही गए । क्यों न उनका एक इन्टरव्यू ले लिया जाए । मैंने उनका जो साक्षात्कार लिया , वह जस का तस यहाँ प्रस्तुत है ।
 
शरद : पाबला जी सर्वप्रथम यह बताएँ कि फिल्म हिन्दी में बनेगी या छत्तीसगढ़ी में ?
पाबला जी : माना कि छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अभी बहुत संभावनाएँ हैं लेकिन ब्लॉगिंग का क्षेत्र तो विश्वव्यापी है ,अनेक भाषाओं के लोग यहाँ हैं लेकिन ज़्यादातर हमारे  ब्लॉगर भाई बहन हिन्दी भाषी हैं , इसलिए हिन्दी में बनाना उचित होगा ।
शरद : फिल्म की कोई कहानी तो सोची होगी आपने ?
पाबला जी : कहानी का क्या सोचना , फिल्म बनाना शुरू कर देंगे , कहानी अपने आप बनती जाएगी ।
शरद : फिर भी…हमारे यहाँ बहुत से ब्लॉगर देश के प्रतिष्ठित कथाकार हैं । सूरजप्रकाश जी का तो ब्लॉग ही है ‘ कथाकार ‘ नाम से और उदयप्रकाश जी की कहानी पर भी फिल्म बन रही है ।
पाबला जी : वाह ! यह तो अच्छी बात है । देखते हैं कुछ कथाकारों से सम्पर्क करते हैं । वैसे थोड़ा बहुत आयडिया मेरे दिमाग़ में है  । यह एक ब्लॉगर की कहानी होगी और उसमें प्रेम ,रोमांस ,जीवन के उतार चढ़ाव , स्टंट , कॉमेडी वगैरह सब कुछ होगा ।
शरद : मतलब पूरी मसाला फिल्म ?
पाबला जी : नहीं इसे आजकल टोटल इन्टरटेनमेन्ट कहते हैं । वैसे मेरी कहानी में हीरो एक युवा ब्लॉगर है …
शरद : जिसे ब्लॉगिंग करने वाली एक लड़की से प्रेम हो जाता है । इसमें नया क्या है ?
पाबला जी : नया है ना । कुछ दिनों बाद उसे पता चलता है कि जिससे वह रोज़ चैट करता है , जिसके ब्लॉग पर रोज़ टिप्पणी करता है , वह लड़की नहीं है ।
शरद : मतलब बड़ी उम्र की महिला है ?
पाबला जी : जी नहीं … वह महिला भी नहीं है , वह एक अधेड़ उम्र का पुरुष है जो लड़की के नाम से ब्लॉगिंग कर रहा है और साथ ही साथ इस गरीब से प्रेम का नाटक कर रहा है ।
शरद : बाप रे ! यह तो धाँसू आयडिया है । फिर …?
पाबला जी : उस लड़के को जैसे ही पता चलता है पहले तो उसका दिल टूट जाता है । वह बहुत रोना धोना करता है ,लानतें भेजता है , लेकिन फिर वह संभल जाता है और उस पर धोखाधड़ी का इल्ज़ाम लगा कर मुकदमा कायम कर देता है ।
शरद : इस तरह का भी कोई मुकदमा हो सकता है क्या ?
पाबला जी : हिन्दी फिल्म में सब कुछ हो सकता है । वैसे द्विवेदी जी से इस बारे में राय ले लेंगे ।
शरद : जी बेहतर । आगे क्या होता है ?
पाबला जी : वह अधेड़ पुरुष जो लड़की बनकर ब्लॉगिंग कर रहा होता है पहले तो उसे समझाता है और उससे मुकदमा वापस लेने का अनुरोध करता है इसलिये कि नकली भूमिका करते हुए इस बीच उसे भी इस लड़के से सचमुच प्यार हो चुका होता है ।
शरद : अरे बाप रे ! मतलब समलैंगिक जैसा कुछ ? यह तो विदेशी कहानी के प्लाट जैसा लग रहा है । कुछ अवार्ड वगैरह के लिए भिजवाएंगे क्या ?
पाबला जी : ना ! पहले फिल्म तो बन जाए , बाद की बाद में देखेंगे ।
शरद : कास्टिंग के बारे में क्या सोचा है ? हीरो के लिए बहुत सारे कपूर और खान मौज़ूद हैं फिल्मी दुनिया में ।
पाबला जी : आप भी कहाँ लगाए शरद जी । हमारे यहाँ हीरो की कमी है क्या …दीपक , महफ़ूज़ , और भी बहुत सारे स्मार्ट युवा हैं , किसी को भी ले लेंगे ।
शरद : ओह…तो ऐसा बताइये ना कि पूरी कास्टिंग ब्लॉगजगत से ही होगी … और हीरोइन की तो इसमें ज़रूरत ही नहीं है इसलिए कि नायक ही नायिका है ।
पाबला जी : ना ! इतनी भी यथार्थवादी फिल्म नहीं बनानी । बाद में जब यह हीरो उदास हो जाएगा और आत्महत्या की ओर प्रवृत होने लगेगा इस हीरो की ज़िंदगी में एक सचमुच की हीरोइन आएगी मतलब एक लड़की आएगी , लेकिन उसका भी पहले से एक प्रेमी होगा ।
शरद : वह तो पुरुष होगा ना ?
पाबला जी : भाई , इतना भी नहीं उलझाना है जनता को , वैसे यह पुरुष खलनायक की तरह एन्ट्री लेगा ।
शरद : मतलब विलेन ? इस रोल के लिए अपने ललित शर्मा ठीक रहेंगे । मूँछें भी ज़ोरदार हैं ।
पाबला जी : ना ! मूँछों से क्या होता है उनका चेहरा तो मासूम है , देखते हैं , ब्लॉगजगत में बहुत सारे विध्वंसकारी जीव हैं उनसे बात करेंगे , वैसे अभिनय तो कोई भी कर सकता है  ।
शरद : और कॉमेडियन भी तो चाहिए ? आजकल इन्टेलेक्चुअल कॉमेडी का ज़माना है ।
पाबला जी : हँसते रहो वाले तनेजा जी हैं ना , और भी बहुत से लोग हैं उन तक अप्रोच करेंगे ।
शरद : वकील वाले रोल के लिए द्विवेदी जी फिट हैं ।
पाबला जी : हाँ और उनके जूनियर का रोल संजीव  को दे देंगे ।
शरद : और उस अधेड़ उम्र के ब्लॉगर के लिए ?
पाबला जी : अरे ! इस रोल के लिए हमारे यहाँ क्या कमी है … ढेर हैं ।
शरद : फिर हीरोइन के लिए क्या करेंगे ?
पाबला जी : देखते हैं , अभी सोचा नहीं है । हाल में खींचे गए ताज़े फोटो सहित आवेदन मंगवाएंगे  
शरद : फिर कहानी की बात रह गई … उसके बाद क्या होता है ?
पाबला जी : बस मुकदमा चलता रहता है , इधर नायक नायिका का प्रेम चलता रहता है , उधर वह अधेड़ ब्लॉगर उस लड़के को फाँसना चाहता है लेकिन जब उसे पता चलता है कि वह लड़का एक अन्य लड़की से प्रेम करता है सो गुस्से में वह उसे पिटवाने के लिए गुंडे भेजता है ।
शरद : पाबला जी गुंडे के रोल के लिए भी मुझे दो - एक लोग दिखाई दे रहे है ।
पाबला जी : ठीक है ठीक है , उसके लिए भी सोचेंगे , अभी नाम ले लोगे तो वे बुरा मान जाएंगे । इनके अलावा एक - दो सहनायक व सहनायिका भी ज़रूरी होंगे , आजकल एक हीरो एक हीरोइन से काम नहीं बनता , साथ में एक पैरेलल स्टोरी भी चलनी चाहिए  ।
शरद : गीत - संगीत व नृत्य फिल्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष होता है इसके लिए आपने क्या सोचा है ?
पाबला जी : बहुत से लोग हैं , सारथी जी हैं ,और गाने के लिए अदा जी हैं अल्पना जी हैं ,अजित भाई भी अच्छा गाते हैं। और गीतकारों की तो कोई कमी नहीं , इतने लोग हैं कविता लिखने वाले , आपका भी चांस बनता है । और डांस का क्या है जहाँ देखेंगे कि जनता बोर हो सकती है वहाँ डांस डाल देंगे । वैसे भी आजकल डांस कहाँ होता है पी टी होती है ।  
शरद : शूटिंग के लिए स्टूडिओ की भी ज़रूरत होगी , आउटडोर लोकेशन और विदेश में चित्रांकन की भी ।
पाबला जी : हाँ उसके लिए लोकल बात करते हैं । विदेश के लिये समीर भाई से बात करते हैं कनाडा वगैरह में कुछ दृश्य शूट हो जायें तो फिल्म बहुत चलेगी ।
शरद : पाबला जी डायरेक्शन का काम भी तो किसी को देना होगा ।
पाबला जी : अपने केसवानी जी से बात करेंगे , और अपने अय्यर जी हैं ही ड्रामा वाले ।
शरद : गिरीश जी को भी कहीं फिट कीजिये ।
पाबला जी : हाँ है ना , वह पुरुष ब्लॉगर लड़की की आवाज़ में अपनी बातचीत पोडकास्ट करवाता है ,उसमें ।
शरद : अरे वा ,मतलब कुल मिलाकर मज़ा आ जाएगा लेकिन एक बात है , इस फिल्म बनाने में खर्चा तो काफी आ जायेगा , उसकी व्यवस्था भी तो कहीं से करनी होगी ।
पाबला जी : बिलकुल ! यही सोचकर तो मैं आया था आपके पास चर्चा करने के लिए ।
शरद : ठीक है ना पाबला जी , इस पर अपन बाद में चर्चा करेंगे , अभी एक ज़रूरी काम मुझे याद आ गया है ।

            मित्रों , इस तरह सोचा हुआ यह इन्टरव्यू अधूरा ही रह गया । कोशिश करूँगा कि यह बातचीत जल्दी ही हो । वैसे वह शुभ दिन आज आ गया है , कम से कम पाबला जी को जन्मदिन की बधाई तो दे ही दीजिए ।  

(तमाम चित्र शरद कोकास के घर पर पाबला जी , और ब्लॉगर मित्र गण ,शूटिंग के लिए सम्भावनाओँ की तलाश में ? )
   
     
     

8 मई 2010

रिश्ते में तो समीर लाल मेरे मामा लगते हैं ..


                    

विगत चार मई को मुम्बई से छोटे भाई आशीष की पत्नी श्वेता का एस एम एस आया “ भैया आज CHANGE RELATION DAY “ है अगर एक दिन के लिये रिलेशन चेंज हो जाये तो आप मेरे साथ क्या रिश्ता बनाना चाहेंगे ? “ मैने पहली बार सुना कि ऐसा भी कोई दिन होता है । फिर मैं इस बात पर हँसा कि यह दिन बनाने वालों ने हर दिन को एक विशेष दिन बना दिया है पिता दिवस ,माता दिवस , चिकित्सक दिवस , शिक्षक दिवस , स्वास्थ्य दिवस . पर्यावरण दिवस , पृथ्वी दिवस ,कुष्ठ दिवस , साक्षरता दिवस वगैरह वगैरह ।  लगता है कि कुछ दिनो बाद साधारण दिन कोई बचेगा ही नहीं  और ग़लती से एकाध दिन बच गया तो उस दिन भी लोग इस बात के लिये भी एस एम एस करेंगे कि बधाई हो आज निहायत साधारण दिन है  । जो भी हो मोबाइल कम्पनी वालों का तो धन्धा हो ही जायेगा ।
बहरहाल मुझे एस एम एस का जवाब तो देना ही था सो मैने लिखा “ मैं तुम्हे आज के दिन अपनी माँ बनाना चाहूंगा । इसलिये कि इससे बड़ा और कौनसा रिश्ता हो सकता है ।“ इस अद्भुत दिन के बारे में सोचते हुए मुझे ख्याल आया कि हम भारतीय कितने सौभाग्यशाली हैं जो एक दूसरे के साथ इतने पारिवारिक रिश्तों में बन्धे हैं । फिर मुझे अपने ब्लॉगजगत का ख्याल आया , यह भी तो हम लोगों का एक बड़ा परिवार है । फिर यह ख्याल आया कि मानलो अगर ब्लॉग जगत के अपने मित्रों से यह एस एम एस मुझे आता तो मैं उसका क्या जवाब देता । बस दिमाग में एक एक कर नाम आने लगे और मैं उनके साथ अपने रिश्ते जोड़ने लगा ।
सबसे पहले दिनेशराय द्विवेदी जी का ख्याल आया । वे अगर मुझसे पूछते कि एक दिन के लिये आप मुझे अपना क्या बनाना चाहेंगे तो मैं कहता “ फूफाजी “ । ब्लॉग जगत में सबसे अधिक रिश्तों को सम्बोधन से जोड़ने वाले  महफूज़ अली को मैं चाचाजी बना लेता  । चौंकिये मत , यहाँ उम्र का सवाल नहीं है सवाल रिश्ते का है । वैसे भी मेरे पास अपने खानदान की नौ पीढ़ीयों के चार सौ लोगों की लिस्ट है और जिसमें मेरे कई चाचा उम्र में मुझसे बहुत छोटे है और कुछ  को तो मैने देखा भी नहीं है । अभी पिछले दिनों एक विवाह समारोह में मैने एक बच्ची से पूछा “ किसकी शादी में आई हो ? “तो उसने कहा “अपनी नानी की “ ।
फिर हमारे यहाँ यह भी होता है कि शादी के बाद ढेर सारे नये रिश्तेदार बन जाते हैं जिनमे कईयों का पता तो बरसों बाद चलता है । किस्सा है ना कि पति ने गधों के झुन्ड की ओर इशारा कर पत्नी से कहा “ देखो, तुम्हारे रिश्तेदार ।“ पत्नी ने कहा “ हाँ , सब शादी के बाद के हैं । “  अब अपने गिरीश बिल्लोरे जी को ही ले लो , साले के मित्र हैं तो पहली मुलाकात में ही जिस तत्परता के साथ जीजाश्री का उच्चारण किया कि मुझे अपने पर्स में से नोट खिसकते दिखाई दे गये । सो जबलपुर वाले सभी ब्लॉगर्स के साथ तो अब यही रिश्ता बनता है । लेकिन नहीं .. जबलपुर में मेरी ननिहाल भी है सो कुछ रिश्ते तो वहाँ के भी बनेंगे ,सो इस रिश्ते से श्री समीर लाल मेरे मामा हुए और महेन्द्र मिश्र जी भी ।अजित वडनेरकर जी के घर अपने साढ़ूभाई के साथ गया था सो वे भी साढ़ूभाई हुए । यही रिश्ता गिरिजेश राव के साथ  भी बनता है  । अजय कुमार झा को मै फुफेरा भाई कहता और अशोक कुमार पाण्डे को मौसेरा भाई । डॉ.अनुराग ,गौतम राजरिषी का कज़िन होना मैं पसन्द करता । ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के लिये मामा के रिश्ते का खयाल इसलिये आया कि मेरे एक मामा का नाम भी यही है और रूपचन्द शास्त्री जी का मैं भतीजा बनना पसन्द करता ।रावेन्द्र कुमार रवि का चचेरा भाई और  खुशदीप का मैं मामा बन जाता और राजीव तनेजा का फूफा । मिथिलेश दुबे का मैं दादा बनना पसन्द करता और दीपक मशाल का नाना । ज़ाकिर अली रजनीश को मैं मामू बना लेता । अमिताभ श्रीवास्तव मेरा चचेरा भाई होता । अरविन्द मिश्रा जी मेरे चाचा होते और कानपुर के होने के नाते अनूप शुक्ल जी मेरे मामा । अविनाश वाचस्पति का मैं बड़ा भाई बन जाता । ओम आर्य  मेरा भांजा होता और कुलवंत हैप्पी को मेरे बच्चे मामा कह कर हैप्पी होते । डॉ. दराल मुझे अपने मामा ससुर जैसे लगते ।        
छत्तीसगढ़ तो अपना घर है इसलिये यहाँ के ब्लॉगर्स तो अपने भाई हुए लेकिन भाई तो सब पहले से ही है रिलेशन चेंज करने का मज़ा तो तब है जब इनसे अलग अलग रिश्ते बनाये जायें सो पाबला जी को मैने चाचा बना लिया और संजीव तिवारी को भतीजा ।  सूर्यकांत गुप्ता तो खैर साढ़ूभाई हैं  ललित शर्मा , राजकुमार सोनी, राजकुमार ग्वालानी , गगन शर्मा ,गिरीश पंकज ,अरविन्द झा ,संजीत त्रिपाठी, बालकृष्ण अय्यर , अनिल पुसदकर भी साढ़ू भाई हुए । सॉरी सॉरी.. अनिल पुसदकर नहीं ,सब गड़बड़ हो जायेगा उन्हे फिलहाल चचेरा भाई रहने दिया जाये । वैसे अगर उन्हे साढ़ूभाई बनना है तो अभी भी देर नहीं हुई है । हम सब मिलकर दुआ करें कि अगले चेंज रिलेशन डे तक यह शुभकार्य संपन्न हो जाये । बचे अवधिया जी उन्हे  मैं मौसाजी बनाना चाहूंगा ।अलबेला खत्री को मैं चाचा ससुर बनाता ।सिद्धेश्वर सिंह जी की छत्तीसगढ़ मे ससुराल है सो वे रिश्ते में अपने जीजा हुए ।
अब कुछ ब्लॉगर बहनों की बात भी हो जाये । अगर उनकी तरफ से यह सवाल आता तो... ? बहुत सारे रिश्ते मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं । सबसे पहले मुम्बई में अनिता जी , उन्हे मैं मौसी बना लेता । रश्मि जी का जेठ बनना मुझे अच्छा लगता । घुघूति बासूती जी को पता नहीं क्यों मामी कहने का मन हो रहा है और निर्मला कपिला जी को चाची । आशा जोगलेकर जी को मैं बुआ कहता और वन्दना अवस्थी दुबे का देवर बन जाता । लवली कुमारी , कविता रावत , पूजा,पल्लवी,रंजना ,गार्गी ,मुक्ति, ये सब बेटियाँ और बबली  का चाचा बन जाता और पारुल का मामा । मेरी छोटी बहन का नाम सीमा है सो सीमा गुप्ता भी छोटी बहन हुई । रश्मिप्रभा जी का मैं बड़ा भाई बनता , अदा जी मेरी बड़ी बहन होतीं । अल्पना जी मौसी ,हरकीरत हीर , ज्योति सिंह छोटी बहन । शेफाली पाण्डे के मौसाजी श्री मधुकर जोशी का मैं मित्र हूँ सो इस रिश्ते से उनका भी मौसा हुआ । शोभना चौधरी और मीनू खरे का मैं चाचा कहलाना पसन्द करता और मनीषा पाण्डे का मामा । रचना दीक्षित का मै फूफा बनता ।
बाप रे बाप ... कितने ही नाम और याद आ रहे हैं और यह सूची तो बढ़ती ही जा रही है । इसे यहीं विराम दिया जाये वरना नाइस अंकल नाराज हो जायेंगे । सो मैं चलता हूँ आप मेरी इस व्यंग्यकथा को पढ़ते रहिये और इन गड्डमड्ड रिश्तों के संसार से सार निकालते रहिये । वैसे सच कहूँ इन रिश्तों के बारे में  सोचने में अच्छा लगा .. । फर्ज़ कीजिये अगर यही सवाल मैं आपसे करता तो आप क्या उत्तर देते ? चलते चलते ताऊ को भी याद कर लें .. वे तो ताऊ हैं सो मै उनका भी भतीजा हुआ ना । अंत में...आपके जीवन में अस्तित्व में आ चुके सभी रिश्ते फले फूलें और आप ताउम्र उनका निर्वाह कर सकें इस दुआ के साथ , आपका एक दिन के रिश्ते का भाई,भतीजा,भांजा ,चाचा,मामा, ताऊ.साला. जीजा, इत्यादि  --  शरद कोकास               
आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें

1 अप्रैल 2010

बाल (ब्लॉग ) ना बाँका कर सके जो जग बैरी होय

एक अप्रेल "मूर्ख दिवस " पर एक व्यंग्य रचना                               
                                             बाल (ब्लॉग ) ना बाँका कर सके

पिछले दिनों मेरे हाथ दो ब्लॉगर्स की टेलीफोन पर बातचीत का एक टेप हाथ लग गया । हुआ यह कि हमारे एक मित्र को फोन टेप  करने का नया नया शौक सूझा और पहला फोन आने के बाद उन्होने बिना टेप सुने अपना मोबाइल मुझे थमा दिया । मैने उनसे पूछा तो उन्होने बताया कि बहुत दिनो बाद एक ऐसे मित्र का फोन आया था जो कभी ब्लॉगिंग किया करते थे और पिछले कई महीनों से उनसे नहीं मिले थे । मैने उन दोनो का यह संवाद सुना तो हँस हँस कर लोट-पोट हो गया । उनका  पहला संवाद उनका  कुछ इस तरह था ।
पहला मित्र : कहो भई क्या हाल हैं ?
दूसरा मित्र : बढिया है ब्लॉगिंग मे लगे हुए हैं...तुम सुनाओ ।
पहला मित्र : अरे उस दिन मैं जल्दी जल्दी में था देखा कि तुम्हारे “ बाल “  बहुत कम हो गये हैं....।
            बस सारी गड़बड़ यहीं पर हुई । पहले मित्र ने “ बाल “ कहा और अगले ने “ ब्लाग “ सुन लिया । अब आगे का संवाद कुछ इस तरह है कि पहले मित्र “ बाल “ के बारे में बात कर रहे हैं और दूसरे मित्र “ ब्लाग “ के बारे में बता रहे हैं । इस संवाद से किस तरह का हास्य  उपजा  यह आप खुद ही पढ़ लीजिये । शुरू करते हैं  पहले मित्र की बात से । ध्यान रखिये मित्र 1 ‘ बाल  ‘ के बारे मे कह रहे हैं और मित्र 2 ‘  ब्लाग  ‘ के बारे में
1- अरे उस दिन मैं जल्दी में था देखा तुम्हारे  “ बाल “ बहुत कम हो गये हैं ...
2- क्या बतायें यार ! आजकल टाइम ही नहीं मिलता न ठीक से देख पाता हूँ न रख-रखाव कर पाता हूँ । और मेरा क्या ब्लॉगिंग की दुनिया मे बहुत से लोगों का यही हाल है ।
1- अरे.. ? मतलब सबके कम हो गये हैं क्या ?
2- और क्या ? शुरू शुरू में तो सभी के ज़्यादा रहते हैं फिर आना कम हो जाता है तो धीरे धीरे कम होने लगते हैं ।मेरे साथ क्या सभी के साथ यह समस्या है ।
1- हम्मममम....यह तो है । देखता हूँ किसी दिन सबकी प्रोफाइल और सबकी तस्वीर ।
2- तस्वीर से क्या होगा  ,वह तो सभी ने पहले की लगा रखी है । लेकिन बाकी सब कम हो गया है ।
1-वो शरद कोकास के भी कम हो गये हैं क्या ..उनके तो बहुत थे ।जबरदस्ती हँसता हुआ फोटो लगा रखा है ।
2- हाँ शुरू शुरु में वह बहुत सक्रिय रहे .. वैसे अभी भी है लेकिन बहुत बहुत दिनों बाद दिखाई देते है ।
1- हाँ निष्क्रियता का असर तो पड़ता है ..और द्विवेदी जी के तो मेरे ख्याल से पहले से ही इतने ही हैं ।
2- हाँ उनके तो इतने ही हैं लेकिन वे लगे रहते हैं वे सक्रिय हैं । वैसे ही डॉ. दराल भी हैं और शास्त्री जी । इनकेकुछ न कुछ  तो लगभग रोज़ ही आते हैं ।
1- हाँ सक्रिय रहने से भी असर  पड़ता है । घनापन दिखाई देता है । वैसे भी ये लोग  बुद्धिजीवी हैं इनके कम होने स्वाभाविक हैं  ..कम रहने से भी क्या फर्क पड़ता है ,बुद्धि का असर तो थोड़े से में ही दिखाई दे जाता है । वैसे भी बुद्धि से इसका क्या सम्बन्ध ।
2- और क्या ...बुद्धि का इससे क्या सम्बन्ध अब पाबला जी को ही देख लो ..
1- हाहाहा... पाबला जी के तो सब  के सब पगड़ी के नीचे छुपे हुए रहते हैं और डॉ. अमरजीत के भी ।
2- हाँ वही तो , पगड़ी के अन्दर जो दिमाग़ है उससे वे  ऐसी ऐसी बेहतरीन चीज़ें निकालकर लाते  हैं कि पूछो मत । प्रिंट मीडिया  पर चर्चा में तो आते ही रहते हैं लेकिन  “ बुखार “ में आना ज़रा कम हुआ है अभी ।
1- अरे...! हाँ बुखार से असर तो पड़ता है कमी आ जाती है ।लेकिन इसकी प्रिंट मीडिया में भी चर्चा होती है यह तो बहुत अच्छी बात है ।
2- लेकिन “ मेले “ में उनका आना कम नहीं हुआ है । वहाँ हमेशा सब  कुछ नया होता है ।
1- फिर भी ... मेले  में तो धूल ही धूल होती है । वहाँ कम जाना चाहिये । इतने समझदार तो हैं वे । खैर ... इससे क्या तुमने तो बताया ही है कि सब कुछ पगड़ी से ढँका रहता है .. इसीलिये इतना तेज़ दिमाग़ पाया है उन्होने । अब असलियत जानना है तो कभी घर जाकर देखना पड़ेगा ।
और हाँ ..एक बात मैने देखी कि जितनी ब्लागर महिलायें हैं सभी के सुन्दर हैं ,सजे सँवरे हुए ।
2- वाह ! कैसी बात करते हो । महिलाओं को तो यह प्रकृति की देन है वे अपना घर भी कितना सुन्दर और सजाकर रखती हैं फिर यहाँ तो सजाना ही है । एकदम साफ –सुथरा और सुन्दर दिखाई देता है उनके यहाँ ।
1- और विदेश मे रहने वाली  ब्लागर बहने भी देखो ..अदा जी , अल्पना जी ,  बबली जी को ही देखो ..उनके चित्र से ही दिखाई देता है कि कितने सुन्दर हैं ।
2- बबली जी के ना.. पूरे के पूरे ? “ अमेजिंग “.. और उनका ..वो तो  “मसाला “ पर रेसिपी भी बताती हैं ।
1- अच्छा... इसकी भी रेसिपी होती है क्या ? इसीलिये उनका सौन्दर्यबोध भी इतना अच्छा है । लेकिन अपने राव साहब ,और मिश्राजी और शुक्ला जी और भी बहुत से लोग इनके भी अब पके हुए दिखाई देते हैं ।
2- वाह कैसी बात करते हो । यह सब परिपक्व लोग हैं , पके हुए तो होंगे ही और वैसे ही दिखाई भी देंगे ।
1- लेकिन उस महफूज़ को देखो कितने हसीन अन्दाज़ में सब सामने किये रहता है ।
2- अरे उसकी उम्र है भाई अभी दिखाने की । अभी सब सामने सामने दिखता है । और वही क्या अजय ,मिथिलेश ,जाकिर , अशोक ,दीपक सब सामने  सामने दिखते हैं , दिखना भी चाहिये । अभी तो उम्र है इन लोगों की अभी तो दिखेंगे ही .. कुछ साल बाद सबके बराबर हो जायेंगे ।
1- अजित वडनेरकर जी के भी अच्छे हैं ।
2- अरे हाँ खूबसूरत ,और पता अभी वे किताब भी छपवाने वाले हैं , पिछले दिनो दिल्ली गये थे , वहीं से ।
1- वा वा यह अच्छी खबर सुनाई , यह किताब तो बहुत लोगों के काम आयेगी ,कितना महान काम कर रहे हैं वे      राजीव गान्धी के समय यह किताब आती तो उनको भी फायदा हो जाता ।
2- हाँ तकनीक पर भी किताब होनी चाहिये , रवि रतलामी जी शायद इस दिशा में कुछ काम करें ।
1- रवि जी..? उनके तो खुद ही इतने कम हैं । वो क्या तकनीक बतायेंगे ।
2- नहीं भई इतने भी कम नहीं हैं ,  पुराने हैं लेकिन लगातार आ ही रहे हैं । जानकार तो हैं वे ..बल्कि वे तो औरों का भी खयाल रखते हैं । और अपने अलबेला भाई के भी बहुत हैं ... बल्कि नये नये आते जा रहे हैं ।
1- तभी.... वे तो टीवी पर भी दिखाई देते है किसी दिन उनको एडवर्टाइज़िंग कम्पनी वाले पकड़ते ही हैं । लेकिन मुझे तो केसवानी जी सबसे स्मार्ट दिखाई देते हैं । कम उपस्थिति के बावज़ूद उनको देख सब भ्रम टूट जाते हैं । इतने कम होने के बावज़ूद वे अलग से प्रभाव डालते हैं , यही उदयप्रकाश जी के बारे में भी कह सकते हैं ।
2- अच्छा वो बाजेवाली गली वाले केसवानी जी  । और उदयप्रकाश जी भाई वो तो वैसे भी बहुत अनुभवी लेखक हैं ।उनके हों न हों क्या फर्क पड़ता है ।
1-लेकिन ललित शर्मा की मूछों का अलग प्रभाव पड़ता है ।
2- नहीं उससे क्या .. न भी हो तो क्या लेखन में दम होना चाहिये । जो उनमे पर्याप्त है ।
1- अभी खुशदीप, राजीव , विवेक इनपर तो कुछ साल तक कोई खतरा नहीं दिखाई देता मुझे ।
2 क्या बात कर रहे हैं ये तो अभी जोश से भरे युवा हैं । अभी तो आना-जाना लगा रहेगा ..कुछ साल बाद किसने देखा है अच्छे अच्छे लोगों के कम हो जाते हैं ।
1 फिर धीरे-धीरे स्थायित्व आ जाता है .. चलो अच्छा है सभी के सलामत रहें , प्रदूषण से दूषित वातावरण से बचे रहें...सब के सब खूबसूरत दिखते रहें ।
2 लेकिन सब कुछ अच्छा नहीं है भाई ..अब वातावरण थोड़ा खराब हो चला है । कुछ लोग जानबूझकर प्रदूषण फैला रहे हैं । कहीं धर्म के नाम पर कहीं वर्चस्व के नाम पर कहीं गुटबाज़ी के नाम पर ...
1 अरे कहीं सर मुंडाने या पगड़ी धारण करने का चक्कर तो नहीं है मतलब मठाधीशी का ?
2 नहीं ऐसा नहीं है ,,खैर सब ठीक हो जायेगा यहाँ सब समझदार लोग हैं । 
1 लेकिन पता नहीं भाई ऐसा लगता है कि कुछ लोग दिखाने के लिये जबरदस्ती विग लगा रहे हैं ...
2 विग नहीं भाई विजेट कहते हैं । हाँ लगाये हैं ना कुछ लोगों ने और अब तो गूगल ने भी यह सुविधा दे रखी है
1 क्या बात कर रहे हो ...गूगल यह काम भी कर रहा है अपने ब्लागर्स के लिये ? यह तो बहुत अच्छी बात है ।
2 हाँ सभी को सजने सँवरने का मौका दिया जा रहा है । कुछ लोग तो इसका अच्छा उपयोग कर रहे हैं अब अपने संजीव भाई को ही देख लो  कितने अच्छे तरीके से लगा रखें हैं साइड में और ऊपर नीचे सब तरफ  ... 
             इसके बाद मुझे इतनी हँसी आई कि  हँसते हँसते गलती से डिलीट का बटन दब गया और. और क्या अब  गिरीश जी अगर इसे पोडकास्ट के लिये मांगेंगे तो नही दे सकूंगा । इसलिये बस यहीं विराम ..इस दुआ के साथ कि ब्लॉग जगत में और ब्लॉग जगत से बाहर भी कोई आपका बाल (ब्लॉग ) ना बाँका कर सके । - आपका शरद कोकास             
आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें

28 फ़रवरी 2010

होली पर भिलाई में एक नये ब्लॉगर की रैगिंग


भिलाई में एक नये ब्लॉगर की  " रैगिंग "

कॉलेज में जब सत्र प्रारम्भ होता है तो यह दृश्य बहुत आम होता है कि कुछ सीनियर्स मिलकर एक नये जूनियर की रैगिंग  या इंट्रोडक्शन ले रहे हैं । वह बेचारा जूनियर अपने सीनियर्स के ऊलजलूल सवालों का सामना कर रहा होता है और सीनियर्स उसके जवाबों का मज़ा ले रहे होते हैं । एक तरह से यह परिचय सत्र होता है और इस बहाने उस नये छात्र को अपनी परम्परा में शामिल कर लिया जाता है । कुछ दिनों बाद वह जूनियर अपने सीनियर्स की बाँहों में बाँहें डालकर घूमता हुआ दिखाई देता है ।  

ऐसा ही कुछ विगत दिनों एक नये ब्लॉगर के साथ हुआ । भिलाई में कुछ सीनियर ब्लॉगर्स इकठ्ठा हुए । सर्वश्री बी.एस.पाबला , जी.के.अवधिया , ललित शर्मा , संजीव तिवारी , कसौन्धन दर्पण ,गुप्ता जी , शरद कोकास और इन महारथियों के बीच “ बिगुल “ बजाने के चक्कर में फँस गया राजकुमार सोनी । राजकुमार को तकनीकी जानकारी देने के नाम पर घेर घार कर बुलाया गया था और बाकी लोग होली की पूर्व सन्ध्या पर होली मिलन के नाम पर इकठ्ठा हुए थे । शरद कोकास को खुराफात सूझी और जब राजकुमार नेट रूम में तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे उनकी   रैगिंग करने की योजना बन गई  । इस रैगिंग  या परिचय सत्र  या साक्षात्कार में होली  मिलन का भी आनन्द शामिल था । जैसे ही राजकुमार पहुंचे पहला सवाल दन से शरद ने दागा ..
शरद कोकास : क्यों भई राजकुमार ..अच्छे खासे पत्रकारिता कर रहे थे ..क्या सोचकर ब्लॉगिंग में आ गये ? ( राजकुमार निश्चित रूप से इस सवाल को सुनकर सकपका गये.. ऐसा मुझे लगा ..सीनीयर खुश हुए )
राजकुमार : अरे भाई ! मैं तो ब्लॉगिंग में आना ही नहीं चाहता था ।( देखा ..मैने मन ही मन सोचा मै ठीक कह रहा था ना  ..लेकिन राजकुमार बोले .. “ इसलिये कि मुझे लगता था ब्लॉगिंग में गम्भीर किस्म के लोग हैं ही नहीं  । ( अब मेरा मुँह देखने लायक था..हूँ...ये मज़ाल ..सीनियर्स का अपमान ? ) राजकुमार ने बात जारी रखी ..” लेकिन भाई संजीव तिवारी ने बहुत कहा कि क्या हर्ज है , आप जो लिखते – पढ़ते हैं ,अखबारों में लिखते हैं उसे ही ब्लॉग पर क्यों नहीं लिखते ? कुछ मित्रों ने भी कहा । मैने कहा मुझे तकनीकी जानकारी बिलकुल नहीं है , लेकिन मित्रों ने कहा तो क्या हुआ लिखना- पढ़ना तो आता है , तकनीक भी आ जायेगी , आखिर मछली के बच्चे को कहीं तैरना सिखाना पड़ता है ? मैने भी सोचा क्या हर्ज़ है । जब अखबार में मेरा कालम छपता है तब ढेरों फोन आते हैं पत्र आते हैं तो मैने सोचा ब्लॉगिंग में भी लिखूंगा तो लोग मेरा लिखा जान सकेंगे । क्योंकि ब्लॉग की पाठक संख्या भी कम नहीं है । मै चाहता हूँ इस बहाने छत्तीसगढ़ को दुनिया जाने और मेरा लिखा जाने ।अगर धमाके दार लिख रहा हूँ तो उस रूप में अगर कमज़ोर लिख रहा हूँ तो उस रूप में  जाने ।
ललित शर्मा बहुत देर से यह बौद्धिक किस्म की रैगिंग देख रहे थे , उन्हे लगा कि नये ब्लॉगर की कुछ खिंचाई करना चाहिये सो उन्होने दन से अगला सवाल दागा ... “क्यों कॉलेज के दिनों में तो बहुत फ्लर्ट करते रहे होगे तो ब्लॉगिंग में भी करने का इरादा है क्या ?
राजकुमार ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया ..” भैया मैं इस प्रक्रिया से शायद ही कभी गुजर पाऊँ ..लेकिन यह है कि बड़ी खुशी होती है जब मैं ब्लॉगिंग में देखता हूँ कि  अस्सी अस्सी साल की बुज़ुर्ग 20-25 साल के नौजवानों की कविताओं पर टिप्पणियाँ करती हैं तो बड़ा अच्छा लगता है । और नया कोई ब्लॉगर है और अगर वो कोई लड़की है तो भाई लोग ऐसा भिड़ जाते हैं उसको बधाई देने के लिये  । अभी मै संजीव भाई से कह रहा था और अवधिया जी ने तो एक पोस्ट भी लिखी है टिप्पणियों पर । भाई लोगों ने एक रटा रटाया फार्मूला बना लिया है । एक महोदय लिखते हैं ..प्रभावशाली अभिव्यक्ति , कुछ लिखते हैं अद्भुत , सुन्दर ,बढ़िया । एक जन को कुछ नहीं मिलता तो वो बस नाइस ही नाइस लिखता है । तो मैने तो ऐसा कुछ नही किया मगर इधर देखता हूँ तो लगता है कि  यह दुनिया बहुत खूबसूरत है और लोग अपनी अपनी  तरह से दुनिया को खूबसूरत बनाने  का प्रयास कर रहे हैं ।
मैं देख रहा था कि ललित शर्मा जो जवाब सुनना चाह रहे थे वह उन्हे नहीं मिला । होली का मौका है और राजकुमार सोनी इतनी गम्भीरता से उनके अगम्भीर प्रश्नों का जवाब दिये जा रहे हैं ..ब्लॉगिंग की दुनिया को बहुत खूबसूरत बता रहे हैं , उन्होने अपने फौजी अन्दाज़ में राजकुमार को छेड़ा ...? क्यों .. कभी अपनी यौवनावस्था में फ्लर्ट करने की कोशिश नही की ?
राजकुमार सोनी ,ललित भाई के इस सवाल पर मुस्कराये और कहा..
सब इसी पोस्ट मे पढ़ लेंगे क्या .. राजकुमार ने क्या कहा यह देखते है अगली पोस्ट में ..
( चित्र में आप सभी को पहचान रहे होंगे  ,बीच के चित्र में कवि योगेन्द्र मौद्गिल जी है  जो भिलाई कवि सम्मेलन में आये थे और जहाँ से ब्लॉगरों ने जिनका अपहरण कर लिया .. इसकी रपट आगे कभी )
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