11 मई 2026

33.आंबेडकर की पराजय सदी का एक आश्चर्य

सन उन्नीस सौ चौवन के मई माह की दो तारीख का वह रविवार फुर्सत के साथ अपना ताल मेल नहीं बिठा पा रहा था । यह मतदान का दिन था जो भंडारा के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था । भंडारा संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में मतदान के लिए  दो मई और सात मई यह दो तिथियाँ निर्धारित की गई थीं । चुनाव की व्यवस्था हेतु  समस्त शासकीय अमला तत्पर था, पोलिंग पार्टियाँ दूरस्थ इलाकों की ओर रवाना हो चुकी थीं । पुरानी डॉज गाड़ियों और बैलगाड़ियों से चुनाव सामग्री पहुँचाई जा  चुकी थीं । जंगलों के भीतर बसे वे गाँव जहाँ रास्ते रास्ते में ही दम तोड़ देते थे वहाँ भी चुनाव संपन्न करवाने वाले कर्मचारी अपने सर पर भी लोहे की पेटियां लादकर पहुँच चुके थे  । कठिनाइयों और असुविधाओं के बीच भी शासकीय अमले के यह लोग बहुत उत्साहित और निश्चिन्त थे, आखिर एक चुनाव संपन्न करवाने का अनुभव उनके पास था ।

चुनाव के दिन लोगों का उत्साह आसमान छू रहा था । ढाई साल बाद ही जनता को पुनः वोट डालने का अवसर प्राप्त हुआ था । दोनों तिथियों में सम्पूर्ण संसदीय क्षेत्र में आशा के विपरीत मतदान हुआ और मुहर लगे हुए बैलेट पेपर लोहे की मजबूत मतपेटियों में बंद हो गए । एक सप्ताह बाद भंडारा मुख्यालय में मतगणना प्रारंभ हुई । फिर आई मई माह की पंद्रह तारीख । मतगणना स्थल के बाहर दूर दूर तक लाउडस्पीकर लगे थे जिनसे हर राउंड के बाद घोषणा की जा रही थी । दूरस्थ गांवों में चौपालों पर भीड़ इकठ्ठा थी और लोग आल इंडिया रेडियो के नागपुर केंद्र से आती हवा में घुली ध्वनि तरंगों को ताम्बे के एरियल से जुड़े वाल्व वाले रेडियो सेट में पकड़कर सुनने की कोशिश कर रहे थे । जहाँ यह सुविधा नहीं थी वहाँ अगले दिन आने वाले अखबार या किसी हरकारे की राह देखी जा रही थी ।

अंततः चुनाव परिणाम की अंतिम घोषणा हुई । कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव कार्यालयों में लक्ष्मी बम फोड़े जाने लगे, पेढ़े बाँटे जाने लगे  । यहाँ हवा में उड़ता हुआ गुलाल रौशनियों को गुलाबी आभा प्रदान कर रहा था लेकिन वहीं कहीं सदियों से पीड़ित शोषित जनता की अँधेरी बस्तियों में छाया अँधेरा और गहरा गया था । उनके उजाले की एकमात्र आस बाबासाहेब डॉ.भीमराव आम्बेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से चुनाव हार गए थे ।

ज़िला कार्यालय की इमारत पर लगे लाउड स्पीकर से उस दिन की सबसे दुखद ख़बर गूँज रही थी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी डॉ.बी. आर.आंबेडकर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी भाऊराव बोरकर से आठ हज़ार वोटों से चुनाव हार चुके हैं यह चुनाव परिणाम सबकी आशाओं के विपरीत था आरक्षित सीट से कांग्रेस के भाऊराव बोरकर को एक लाख इकतालीस हज़ार एक सौ चौसठ वोट मिले थे वहीं बाबासाहेब के वोटों की संख्या थी एक लाख बतीस हज़ार चार सौ त्र्यासी । मात्र आठ हज़ार छह सौ इक्यासी वोटों से उनकी हार हुई थी । जिन मतपत्रों पर उनके नाम के आगे मुहर नहीं लगी थे वे मतपत्र किनके थे इस बात को सब जानते थे ।

वहीं सामान्य सीट के परिणाम भी घोषित हो चुके थे । यहाँ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता एक लाख उनन्चास हज़ार छह सौ छत्तीस वोट पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के पूनमचंद राका पर विजय प्राप्त कर चुके थे । राका को एक लाख चोवीस हज़ार दो सौ सडसठ मत प्राप्त हुए थे । इस तरह अशोक मेहता पच्चीस हज़ार वोटो से यह चुनाव जीत गए थे । अपने प्रतीक रूप में झोपड़ी जीत गई थी लेकिन झोपड़ियों में रहने वाले दबे,कुचले,उपेक्षित लोग हार गए थे । 

भंडारा के निवासियों के लिए बाबासाहेब आंबेडकर के हार जाने की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन सत्य सर्वविदित था । दिनकर राव के घर में सारे कार्यकर्त्ता इकठ्ठे हुए और बाबासाहेब की हार के कारणों का विश्लेषण किया गया जैसा कि भंडारा के वरिष्ठ कवि पत्रकार अमृत बंसोड और दिनकर राव के पुत्र सुमंत बताते हैं बाबासाहेब के साथ धोखा हुआ था मुंबई की कहानी फिर यहाँ दोहराइ गई थी । बाबासाहेब ने मनरो स्कूल के मैदान में अपने सहयोगियों से एक वोट अशोक मेहता को देने की सार्वजानिक अपील की थी,उनके आग्रह पर  मतदाताओं ने ऐसा किया भी इसलिए उन्हें डेढ़ लाख वोट मिले लेकिन अशोक मेहता के सपोर्टर्स ने सामान्य सीट के लिए एक वोट तो अशोक मेहता को दिया लेकिन आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब को अपना वोट नहीं दिया । फलस्वरूप कांग्रेस के उम्मीदवार भाऊराव बोरकर चुनकर आ गए अन्यथा बाबासाहेब यह चुनाव अवश्य जीत जाते आखिर आठ  हज़ार वोटों का अंतर क्या मायने रखता है कांग्रेस के बोरकर भी एस सी कम्युनिटी से आते थे , इस आधार पर भी बहुत से वोट उन्हें मिले ।

मध्यप्रांत के इस महत्वपूर्ण ज़िले भंडारा की राजनीति में अगले कुछ सालों में अनेक परिवर्तन हुए बाबासाहेब के साथी नाशिक राव तिरपुडे जो दलित वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ते हुए सन अड़तालीस में जेल गए थे,बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए आचार्य कृपलानी के सहयोगी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव अशोक मेहता भी समाजवादी से कांग्रेसी हो गए और दो बैलों की  जोड़ी चुनाव चिन्ह पर उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर भंडारा से ही आगामी चुनाव लड़ा बाबासाहेब के सिपहसालार दिनकर राव रहाटे अपना सब कुछ त्यागकर अंत तक  पीड़ित शोषित वर्ग की सेवा में लगे रहे, साहूकार के पास घर गिरवी रखकर कर्ज लेकर बच्चों का पालन पोषण करते रहे उनकी आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि वे कर्ज पटा पाते , अतः उन्नीस सौ पचहत्तर में उनका वह घर भी कर्ज की भेंट चढ़ गया

भाऊराव बोरकर भी सत्ता का सुख अधिक दिनों तक नहीं भोग सके और छह माह पश्चात एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया उसके एक साल बाद उन्नीस सौ पचपन में भंडारा में पुनः उपचुनाव हुआ जिसमे सहानुभूति लहर के कारण भाऊराव बोरकर की पत्नी, कांग्रेस की प्रत्याशी अनुसूया बोरकर विजयी रही बाबासाहेब तब तक अपने नए मिशन में लग चुके थे और जातिवादी ताकतों के खिलाफ़ दलित पीड़ित शोषित जनता को लामबंद कर रहे थे अंततः उन्नीस सौ छप्पन के अक्तूबर माह की चौदह  तारीख को अपने सात लाख अनुयायियों के साथ नागपुर की दीक्षा भूमि पर एक भव्य समारोह में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया  

अक्टूबर 56 मे नागपूर मे बाबासाहेब 

स्वास्थ्य उनका ठीक नहीं चल रहा था, जीवन भर के संघर्ष को कहीं न कहीं विराम लगना ही था । दो माह पश्चात ही छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को उनकी अंतिम सांस के साथ उनके जीवन का यह सफ़र समाप्त हुआ   

चैत्य भूमि नागपूर 

बाबासाहेब और भंडारा का यह सम्बन्ध बहुत कम लोगों को ज्ञात है लेकिन एक समय था जब भंडारा इसी बात के लिए प्रसिद्ध हुआ था जब लोग चेहरे पर आश्चर्य का भाव लाकर पूछते थे “अरे ! क्या यह वही भंडारा है जिसकी जनता ने बाबासाहेब को चुनाव में हरा दिया था ?”  लेकिन वास्तविकता यह है कि बाबासाहेब को जनता ने नहीं इस राजनीति की कुटिल चालों ने हराया था भंडारा में वे मात्र आठ हज़ार वोटो से हारे थे जबकि उनके अपने कार्यक्षेत्र मुंबई में यह संख्या साढ़े चौदह हज़ार थी । यह तथ्य ध्यान में रखा जाना चाहिए । चुनाव के बाद बाबासाहेब ने सभी कार्यकर्ताओं का धन्यवाद दिया और मुंबई के लिए रवाना हो गए

 

बाबासाहेब का समाधि स्थल मुंबई 

भंडारा से विदा लेते हुए बाबासाहेब ने उन्हें दोनों समय खाने का डबा,चाय नाश्ता पहुँचाने वाली युवती मालती बाई मेंढे के घर के सामने कार रुकवाई मालती अपनी आँखों में आँसू लिए हाथ जोड़े चुपचाप खड़ी थी बाबासाहेब कार से उतरे और मालती के सर पर हाथ रखकर कहा “ बेटी, तुमने मेरा बहुत ख्याल रखा, तुम जीवन में जो कुछ भी बनना चाहती हो मुझे बताओ, मैं तुम्हारी मदद करूँगा ?” मालती बाई ने कहा “ डॉक्टर बनना चाहती हूँ बाबासाहेब   डॉ आंबेडकर ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया और विदा ली आगामी वर्षों में उनके सहयोग से मालती बाई ने मेडिकल की उच्च शिक्षा ग्रहण की बाद में दिनकर राव रहाटे के परिवार में ही उनके छोटे भाई से उनका विवाह संपन्न हुआ और वे महाराष्ट्र में डॉक्टर मालती ताई रहाटे के रूप में प्रसिद्ध हुईं

 साभार - मित्र सुमंत रहाटे और नागपूर के पत्रकार अमृत बनसोड जी 

शरद कोकास 

10 मई 2026

32.बाबासाहेब ने किसके लिए कहा था "यह अशोक नहीं सम्राट अशोक हैं"



भाषण देते हुए डॉ आंबेडकर 

कल मैंने आपको बताया था कि मुंबई से चुनाव हार जाने के पश्चात किस तरह बाबासाहेब अम्बेडकर को 1954 मे पुनः भंडारा लोकसभा से उपचुनाव मे शामिल होकर दिल्ली मे लोकसभा मे जाने का अवसर मिला। चुनाव के पहले भंडारा मे किस तरह उनके चुनाव प्रचार की तैयारी चल रही थी , कहाँ दफ्तर बनाया गया था , कहाँ चुनावी सभा हुई थी , इस बात को जानिए विस्तार से इस पोस्ट मे । 
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता 
भंडारा के नौतलाव मैदान मे मंच सज चुका था , हजारों लोगों की भीड़ बाबासाहेब को सुनने , उन्हे देखने के लिए आई थी । आखिर वे उस दौर के नायक थे जिन्होंने लाखों लोगों को जाति के आधार पर होने वाले शोषण से मुक्त किया था , जिन्होंने संविधान निर्माण मे अपनी महती भूमिका निभाई थी 

बाबासाहेब बोलने के लिए खड़े हुए । करतल ध्वनि से उनका स्वागत हुआ । उन्होंने जनता का अभिवादन स्वीकार किया । वे जनता के मन की बात जानते थे । भंडारा के इतिहास से भी वे वाकिफ़ थे । जनता के दुखों पर मरहम लगाते हुए उन्होंने अपनी बात सबके सामने रखी । 

उन्होंने स्पष्ट किया शिड्फेयूल कास्डट फेडरेशन का एक ही उद्देश्य है जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त करना, युवाओं के लिए रोजगार की और आम जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का समुचित प्रबंध करना ।यद्यपि उन  दिनों सभी पार्टियों के घोषणा पत्र में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ यही बातें हुआ करती थीं । 

देखिए कितने उदारमना थे बाबासाहेब 

मुख्य मुख्य बातें कहने के बाद उन्होंने जनता के मन में गाँठ की तरह बंधी हुई वोट के बहिष्कार की बात को ध्यान में रखते हुए कहा 

“यद्यपि मुंबई में हमने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से धोखा खाया है लेकिन हम किसी को धोखा देने के बारे में सोच भी नहीं सकते ।“ 

लोगों के अशोक मेहता को वोट न देने की बात पर उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो कुछ नहीं कहा लेकिन परोक्ष रूप से इतना अवश्य कहा कि “हमने संविधान में जनतांत्रिक चुनाव की यह व्यवस्था की है । यह भी कहा है कि हमारा वोट बहुत महत्वपूर्ण है, यह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए ।“ 

भंडारा की जनता उनकी अपनी थी, यह उनका अपना परिवार था, उनके दुःख उनके अपने थे । उनके पूर्वजों ने भी वही अपमान और पीड़ा सही थी । जनता उनकी बात के स्थूल अर्थ को समझ नहीं पाई अतः अवसर देखकर उन्होंने पत्र का उल्लेख करना आवश्यक समझा “ मुझे सुचेता कृपलानी का पत्र प्राप्त हुआ है जिसमे उन्होंने भंडारा की जनता से सहयोग की अपेक्षा की है ।“ 

सुचेता कृपलानी 
बाबासाहेब स्वयं विद्वान थे और अशोक मेहता की विद्वता का सम्मान करते थे । वे जानते थे कि सम्प्रति सामान्य सीट से भंडारा से चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस के उम्मीदवार पूनमचंद राका से अशोक मेहता कहीं बेहतर हैं । उन्होंने भरी सभा में एक रूपक गढ़ते हुए कहा कि 

“भंडारा की इस सामान्य सीट से चुनाव लड़ने वाले अशोक समझ लीजिये हमारे लिए सम्राट अशोक हैं । बेहतर होगा कि हम अपना एक वोट व्यर्थ न गवाएँ ।“ 

महाराष्ट्र के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं उस समय नागपुर से निकलने वाले प्रमुख अखबार ‘तरुण भारत‘ ने इक्कीस अप्रेल चौवन की इस सभा में दिया गया बाबासाहेब का यह व्याख्यान विस्तार से  प्रकाशित किया था । 

अब जानिए उन अनजान लोगों के नाम जिन्होंने बाबासाहेब को चुनाव मे प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग दिया ( यह जानकारी मुझे बाबासाहेब के चुनाव प्रभारी दीनदयाल रहाटे के पुत्र और मेरे मित्र सुमंत रहाटे,अमृत बंसोड, और भंडारा के अन्य वरिष्ठ लोगों  से प्राप्त हुई है )

बाबासाहेब का यह व्याख्यान भंडारा में उनके पक्ष में वातावरण निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था  ৷ फेडरेशन के अध्यक्ष दिनकर राव के मित्र भानुदास बंसोड़  उनके सक्रिय सहयोगी थे । हुसैन रामटेके उनकी रोज़ के मंडली के सदस्य थे । हुसैन रामटेके सिर्फ नाम से ही हुसैन थे लेकिन  मुस्लिम समुदाय के दलित समाज में भी उनकी काफी पैठ थी ৷ 

भोजराज रामटेके सी पी आई के कार्यकर्त्ता थे और गोंदिया में रहते थे लेकिन वे भी बाबासाहेब का चुनाव प्रचार करने के लिए आ गए थे ৷ 

भंडारा में ही शुक्रवारी मोहल्ले में रहने वाले मेंढे पहलवान अपने अखाड़े के साथियों के साथ उनका सहयोग करने आ गए थे ৷ 

स्टेशन के निकट वरठी के रहने वाले नारायण राव फुले उनके सहयोगी थे वहीं भंडारा के श्यामचरण नंदागौली ने युवाओं की एक टीम खड़ी कर ली थी ৷ 

अ.शि. रंगारी और करडी के रहने वाले शेंडे बाबू भी दल बल के साथ उपस्थित हो गए ৷ 

यह ऐसा उपचुनाव था जिसमे जवाहर लाल नेहरू को भी आना पड़ा 

सामान्य सीट के लिए यहीं पर कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रचार भी ज़ोरों पर था । देश के प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की थी अतः वह चाहती थी कि भंडारा से उनकी सीट बरकरार रहे फिर इस बार तो आम्बेडकर यहाँ से चुनाव लड़ रहे थे । कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरु को भी यहाँ आना पड़ा । आंबेडकर की सभा की तरह भंडारा के निकट गोंदिया में नेहरू की विशाल सभा हुई जिसमे देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना का क्रियान्वयन और कृषि, औद्योगिक व वाणिज्यिक विकास के मुद्दे दोहराए गए । 

हाथी चुनाव चिन्ह बाबासाहेब को सबसे पहली बार मिला था 

बाबासाहेब का चुनाव चिन्ह ‘हाथी’ भंडारा की दीवारों पर दिखाई देने लगा था ৷ बच्चे अपनी कमीज़ की जेब पर हाथी छाप,बैल जोड़ी छाप,झोपडी छाप के बिल्ले  लगाकर लाउड स्पीकर लगे रिक्शों के पीछे दौड़ते और फेंके गए बिल्ले और पर्चे बटोरते ৷ आज की तारीख  में हाथी यह चुनाव चिन्ह बाबासाहेब के आदर्शों पर चलने वाली  बहुजन समाज पार्टी के पास है । यह चुनाव चिन्ह उस समय उन दलित, शोषित, पीड़ित लोगों को उनकी ताकत का अहसास दिलाता था । 

कांग्रेस का चुनाव चिन्ह उन दिनों दो बैलों की जोड़ी था जिस पर 1952 से 1969 तक कॉंग्रेस चुनाव लड़ती रही जो विभाजन के बाद 1977 मे बाद में गाय बछड़ा हुआ और 1977 मे हाथ या पंजे पर आकर स्थिर हो गया । 

इस चुनाव चिन्ह पर कांग्रेस के दो उम्मीदवार दो वर्ग एक सामान्य एक आरक्षित से चुनाव लड़ रहे थे । सामान्य वर्ग से अशोक मेहता की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को झोपड़ी निशान मिला था । 

बाबासाहेब के भंडारा के कार्यकर्ताओं की जन सभाओं में भीड़ उमड़ने लगी थी ৷ वे सभी आसपास के क्षेत्रों में दौरा करने लगे । भंडारा के मेरे मित्र और दिनकर राव के भतीजे भगवान रहाटे बताते हैं कि उनकी माँ सुभद्रा बाई अपनी तमाम सखी सहेलियों  के साथ उनके भाषण सुनने जाती थी ৷ भगवान उस समय माँ के पेट में थे और दिनकर राव के बेटे सुमंत का जन्म नहीं हुआ था ৷ पूरे भंडारा संसदीय क्षेत्र में जाने कितने स्थानों पर सभाएँ हुई और लोगों ने संकल्प लिया, चाहे जो हो इस बार बाबासाहेब को जिताना ही है । यह चुनाव उनके लिए आत्मसम्मान के प्रश्न के अलावा एक चुनौती भी था ।

लेकिन बाबासाहेब के दुश्मन यहाँ भी थे 

भंडारा के लोग जात पात,भेदभाव, ऊँच नीच सब भूलकर बाबासाहेब का तन मन धन से साथ दे रहे थे । लेकिन भंडारा का एक बहुत बड़ा भद्र वर्ग उनके साथ नहीं था ৷ यह वह वर्ग था जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही अपने आपको अंग्रेजों का उत्तराधिकारी घोषित कर चुका था ৷ जाति और वर्ण के संस्कार जिसकी नसों में ज़हर की तरह फ़ैल चुके थे जो अब भी बाहरी इलाके में बनी इन बस्तियों में रहने वालों को हिकारत की नज़रों से देखता था ৷ बाबासाहेब की असली लड़ाई व्यवस्था के साथ साथ इन लोगों से भी थी ৷ लेकिन वे संवैधानिक रूप से चुनाव जीतकर एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी यह लड़ाई लड़ना चाहते थे ৷ आखिर संविधान में यह व्यवस्था उन्होंने ही तो की थी ৷ 

इसके अतिरिक्त भंडारा में अपने आप को परंपरागत कांग्रेसी मानने वाला भी एक वर्ग था जो सैद्धांतिक रूप से बाबासाहेब को पसंद करता था, उनकी विद्वता का सम्मान करता था और स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये गए उनके कार्यों की सराहना भी करता था । इनमे गाँधी और नेहरू के अनुयायियों के साथ साथ अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे । 

यह सभी कांग्रेसजन बाबासाहेब को चाहते थे लेकिन उनका कहना यही था कि अगर वे कांग्रेस से चुनाव लड़ते तो वे उनका साथ अवश्य देते ।

विशेष बात यह कि कॉंग्रेस का विरोधी होने के कारण इस चुनाव मे भारतीय जनसंघ भी उनका सहयोगी था । 

यह एक ऐसा स्वप्न था जिसके घटित होने की संभावना प्रारंभ में ही दम तोड़ चुकी थी ।

( शेष अगले अंक मे, यह इतिहास आपको कैसा लगा अवश्य बताएं  )

आपका 

शरद कोकास 


8 मई 2026

31.नौतलाव में बाबासाहेब का भाषण

आपने नहीं सुना होगा नौतलाव मैदान का नाम चलिए आज आपको बताते हैं भंडारा के उस मैदान के बारे में जहाँ डॉ आंबेडकर ने अपना चुनावी भाषण दिया था 
पूर्व का नौतलाव आज का दशेरा मैदान  और कब्रस्तान 
भंडारा शहर के अंतिम छोर पर जहाँ लार्ड मनरो के नाम पर बना मनरो स्कूल था वहीं कब्रस्तान भी था । उससे आगे मुश्ताक़ पटेल की ज़मीन थी जहाँ ढेर सारी अमराइयों के बीच ईदगाह थी जो ईद के रोज़ गुलज़ार दिखाई देती थी । 
तालाब से लगी ईदगाह , मेरे घर के सामने ( सन 2000)
पटेल मियाँ के घर के पास एक मस्जिद भी थी जहाँ आम के पेड़ों पर कूकती हुई कोयल अज़ान के सुर में सुर मिलाकर आगंतुकों का स्वागत करती थी ।
पटेल जी का मकान 
अब यहाँ रावण जलाया जाता है 
उस ज़माने में यहाँ नौ तालाब हुआ करते थे । इनसे लगा ग्राउंड नौतालाब या नउतलाव मैदान कहलाता था । इस मैदान को हम लोगों ने बाद में मनरो स्कूल ग्राउंड, फिर शास्त्री स्कूल के ग्राउंड के रूप में जाना । आज की पीढी इसे दशहरा मैदान के रूप में जानती है इसलिए कि यहाँ दशहरे के दिन रावण जलाया जाता है । अमराइयाँ अब ख़त्म हो चली हैं, नौ तालाब भी अब एक तालाब में सिमट गए हैं ।
हरी हरी काई में सिमटता तालाब 
तालाबों के शहर भंडारा में आपका स्वागत है । 

यह वाक्य अब केवल भंडारा रोड स्टेशन पर सुमधुर स्वर में किये जा रहे अनाउंसमेंट में सुनाई देता है । कभी अपने जल के साथ अठखेलियाँ करने वाली नर्म ज़मीन प्लाटों में बंटकर बड़े बड़े मकानों की नींव के नीचे दफ्न होती जा रही है । ईदगाह आज भी वहीं पर है । 

आपको पता है आपके शहर से कितने तालाब गायब हो गए और उन्हें पाट कर वहाँ इमारतें खड़ी कर दी गईं ?

२१ अप्रेल १९५४ के दिन ऐसा क्या हुआ था ?

वह बुधवार का दिन था । तारीख इक्कीस माह अप्रेल सन उन्नीस सौ चौवन । नउतलाव मैदान भीड़ से खचाखच भरा हुआ था । भंडारा के इतिहास में वह एक अभूतपूर्व दिन था उस दिन यहाँ बाबासाहेब आम्बेडकर की जंगी चुनावी सभा होने वाली थी । भंडारा शहर के आसपास के सैकड़ों गांवों से जाने कितने लोग पैदल पैदल, साइकिलों से या बैलगाड़ियों से आये थे । इन्ही में एक थे ग्राम माडगी में रहने वाले कृषक और बीड़ी कामगार प्रह्लाद गोस्वामी जो बाईस किलोमीटर दूर से अपनी पत्नी प्रमिला के साथ पैदल चलकर बाबासाहेब की बात सुनने आये थे । (गोस्वामी जी के पुत्र श्री एस पी गोस्वामी अभी फेसबुक पर हैं और मेरे मित्र हैं )

बाबासाहेब आंबेडकर इस चुनाव में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की और से प्रत्याशी थे । फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने तम्बुओं में और घरों में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की थी । वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था हालाँकि वह महज मेला नहीं था ।

बाबासाहेब के अलावा अन्य प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार भी ज़ोरों से चल रहा था । भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से भी दो सांसद चुने जाने थे एक सामान्य वर्ग से एक आरक्षित वर्ग से । प्रत्येक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी । बाबासाहेब आंबेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं यह बात पूरे देश में फ़ैल चुकी थी । देश के सभी बड़े बड़े नेताओं की निगाह इस चुनाव पर थी ।

अब देखिये इस चुनाव में मुकाबला कैसा था


आरक्षित सीट
 
शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से डॉ.भीमराव आंबेडकर

विरुद्ध

कांग्रेस पार्टी से अम्बाडी गाँव के भाउराव बोरकर

सामान्य सीट
 
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता

विरुद्ध

कांग्रेस पार्टी के पूनमचंद राका

देखिये पॉलिटिक्स कैसी होती है

भंडारा आने से पूर्व बाबासाहेब को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य सुचेता कृपलानी का पत्र मिला था जिसमे उन्होंने मुंबई के चुनावों में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी द्वारा उन्हें पूर्ण सहयोग दिए जाने के बावजूद उनकी विजय न होने पर खेद व्यक्त किया था । पत्र का आशय यह था कि मुंबई में जो हुआ सो हुआ लेकिन भंडारा में अशोक मेहता जैसे विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजसेवी व्यक्ति उनकी पार्टी से खड़े हैं । उनके विरुद्ध पूनमचंद राका नामक उम्मीदवार हैं जिनकी छवि जनता के बीच किसी समाजसेवक या राजनैतिक कार्यकर्त्ता के रूप में मेहता जी से कम है । यदि बाबासाहेब के सहयोग से एक सीट अशोक मेहता जीत जाते हैं तो भंडारा के लिए वे एक अच्छे सांसद साबित होंगे तथा अपनी विद्वता,ज्ञान और समझ से वे भंडारा की स्थिति को लेकर संसद में उचित प्रश्न भी रख सकेंगे ।

बाबासाहेब इस सत्य से अवगत हो चुके थे कि मुंबई के प्रथम लोकसभा चुनावों (1951-52) में उनकी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को बहुत सहयोग दिया था किन्तु प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स की ओर से उन्हें यथेष्ट सहयोग नहीं मिला था । उनकी हार के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था । वहीं कहीं सुचेता कृपलानी की अपील भी उनके मन में उमड़ घुमड़ रही थी

लेकिन जनता के मन में क्या था देखिये

भंडारा की जनता की राजनीतिक समझ कहीं बेहतर थी । जनता इस सत्य से भलीभांति वाकिफ़ थी कि उन्नीस सौ बावन के चुनावों में बाबासाहेब को मुंबई में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स के वोट नहीं मिले थे । इस वज़ह से उनके मन में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रति गुस्सा भी था । 

भीतर ही भीतर संक्रमण की तरह यह बात भी फ़ैल चुकी थी कि हम आरक्षित सीट से बाबासाहेब को तो वोट देंगे लेकिन सामान्य सीट वाला दूसरा वोट किसी को नहीं देंगे, भले ही वह व्यर्थ चला जाए ।

इसके बाद क्या हुआ ,सभा में बाबासाहेब ने क्या कहा और चुनाव में क्या हुआ यह अगली किश्तों में पढ़िए


आपका

शरद कोकास

6 मई 2026

30.बाबासाहेब के हाथी ,बैल जोड़ी और झोपडी में टक्कर

सुमन बाई यशोदा बाई (AI)
“अगो बाई, बाबासाहेबा सारखा येवढ़ा मोठा मानूस आमच्या भंडारा हून यीलेक्शन लढून राह्यला आहे ?“ बाबासाहेब आम्बेडकर के भंडारा से चुनाव लड़ने की बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए यशोदा बाई ने अपनी पड़ोसन सुमन से पूछा । “काऊन ? “ सुमन बाई ने जवाब दिया “ आमचा भंडारयात काई कमी आहे का ?“ सुमन बाई का कहना सही था, भंडारा में ऐसी कोई कमी नहीं थी जिसकी वज़ह से उपचुनाव में रिक्त हुई इस सीट पर बाबासाहेब चुनाव न लड़ते ।
 
बाबासाहेब 1951-52 मुंबई चुनाव हार चुके थे 

भंडारा की गलियों में उन दिनों एक ही शोर था .. आमचे बाबासाहेब .. हमारे बाबासाहेब भंडारा से चुनाव लड़ रहे हैं ৷ जिलाधीश कार्यालय में चुनाव के लिए प्रत्याशियों द्वारा नामांकन भरे जा चुके थे ৷ देश के प्रथम चुनावों में मुंबई की उत्तर मध्य सीट से चुनाव में बाबासाहेब द्वारा सफलता न प्राप्त करने को भंडारा की जनता ने बहुत गंभीरता से लिया था और वे ठान कर बैठे थे कि कुछ भी हो बाबासाहेब को भंडारा से जिताना ही है ৷ भंडारा के सुर्ख़ियों में आने का और मुंबई से भी आगे निकल जाने का यह स्वर्णिम अवसर था ৷ 1954 मे  यह अवसर उपचुनाव के रूप में अनायास ही उनके सामने आ गया । 

उन दिनों सामान्य व आरक्षित दो सीटें होती थीं      

उन्नीस सौ इक्यावन-बावन के प्रथम लोकसभा चुनाव में मध्य प्रांत की भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से सामान्य सीट के लिए से कांग्रेस के चतुर्भुज जसानी ने ज्वालाप्रसाद दुबे को हराकर संसद का चुनाव जीता था वहीं आरक्षित सीट से कांग्रेस के तुलाराम साखरे निर्वाचित हुए थे । 

चुनाव परिणाम आते ही विपक्षियों ने जसानी के निर्वाचन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए उन पर मुक़दमा कर दिया । ऐसा क्यों हुआ इसका कारण बताता हूँ । उन दिनों भंडारा में मूलजी भाई बीड़ी कारखाना बहुत प्रसिद्ध था । इस कारखाने से शासकीय अनुबंध के अनुसार मिलिट्री में बीड़ी सप्लाई होती थी । चतुर्भुज जसानी इस कंपनी में भागीदार थे । चूँकी यह एक लाभ का पद था इसलिए इस पर रहते हुए उन्हें चुनाव लड़ने की पात्रता ही नहीं थी । अतः इस आधार पर कोर्ट ने विपक्षियों की याचिका पर कार्यवाही करते हुए उनका निर्वाचन अवैध घोषित कर दिया ।

1951-52 प्रथम लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीट के प्रत्याशी  

यहाँ से सांसद पद के लिये शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी के रूप में नागपुर के सखाराम मेश्राम ने नामांकन भरा था । 

कांग्रेस कैंडिडेट के रूप में तुलाराम साखरे के अलावा गंगाराम ठवरे ने भी फॉर्म भरा था, 

वहीं गोंदिया के हेमराज खांडेकर ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में फॉर्म भरा था यद्यपि वो कांग्रेस के पक्ष में ही थे । 

कांग्रेस ठवरे को अपना प्रत्याशी घोषित करने वाली थी लेकिन ठवरे का नामांकन रद्द हो गया इसलिए कांगेस ने तुलाराम साखरे को अपना प्रत्याशी घोषित किया । 

ठवरे भंडारा के ही थे और साखरे नागपुर से आये थे लेकिन अंततः आरक्षित सीट से कांग्रेस के तुलाराम साखरे ने एस सी फेडरेशन के सखाराम मेश्राम को हराकर यह चुनाव जीता ।

ठवरे का नामांकन क्यों रद्द हुआ पता है ?

ठवरे के नामांकन रद्द होने के पीछे यह कारण था कि उन्होंने स्वयं को श्यिडूल्ड कास्ट घोषित कर फॉर्म भरा था जबकि वे महानुभाव पंथ से आते थे । यह पंथ जात-पात नहीं मानता था । चुनाव के बाद ठवरे ने इस बात को लेकर चैलेंज किया कि पंथ भले जात-पात न माने लेकिन जाति तो उनकी एस सी है । कोर्ट ने विभिन्न पक्षों पर विचार करने के पश्चात उनके पक्ष में निर्णय दिया और उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकारी माना लेकिन तब तक चुनाव सम्पन्न हो चुका था, और ठवरे चुनाव नहीं लड़ पाए थे अतः इस सीट का भी चुनाव रद्द करने की बाध्यता उत्पन्न हो गई । 

इस तरह उन्नीस सौ चौवन में भंडारा से उपचुनाव होना तय हुआ । मतदान हेतु दो मई और सात मई की तारीखें तय की गईं ।

अब इस उपचुनाव में तुरत फुरत में बाबासाहेब के लिए चुनाव कार्यालय की तलाश हुई ৷ भंडारा के ही एक समृद्ध निवासी श्री कोलते जी ने वरठी जाने वाली रोड पर बना अपना बंगला बाबासाहेब को चुनाव कार्यालय हेतु प्रदान कर दिया ৷ चुनाव प्रचार का प्रभार शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के जिला अध्यक्ष और बाबासाहेब के अनुयायी दिनकर राव रहाटे को सौंपा गया ৷ उस समय तक दिनकर राव अपनी शिक्षक की नौकरी से त्यागपत्र दे चुके थे और अपना पूरा समय और जीवन पार्टी को समर्पित करने का प्रण कर चुके थे ৷ वे पार्टी के इतने निष्ठावान सदस्य थे कि आन्दोलन करने के आरोप में सन अड़तालीस में डेढ़ वर्ष जेल में भी बिताकर भी आ चुके थे ৷

वरठी जाने वाली मेन रोड पर ठक्कर अम्बालाल की बड़े से बुलंद दरवाज़े वाली खँडहर नुमा हवेली के निकट दिनकर राव का मकान था ৷ उनके घर के आसपास की पूरी बस्ती निम्न वर्गीय मजदूरों कामगारों की बस्ती थी। इस बस्ती के पीछे टेकडी की ढलान के बाद जोगी तलाव और उसका मैदान शुरू होता था । अप्रेल का महीना था ৷ गर्मियों का आगमन हो रहा था दिनकर राव के घर के सामने सड़क पर एक पंडाल लगा दिया गया और उनकी पत्नी भागीरथा बाई तमाम कार्यकर्ताओं के लिए चाय नाश्ते और भोजन का प्रबंध करने में लग गई ৷ घर की कोई आमदनी तो थी नहीं, कोई गेहूँ पहुँचा देता कोई चावल ৷ दाल, सब्जी, तेल मसाले, दूध आदि का भी प्रबंध भी जन सहयोग से हो ही जाता था ৷

बाबासाहेब जब नामांकन जमा करने और चुनाव प्रचार के लिए भंडारा पहुँचे तो उनके और सहयोगियों के रहने की व्यवस्था कोलते के बंगले में ही गई ৷ वही उनका चुनाव कार्यालय भी था ৷ बाबासाहेब को दोनों समय चाय, नाश्ता और भोजन का ‘डबा’ पहुँचाने की ज़िम्मेदारी समिति की ही एक युवा कार्यकर्त्ता मालती बाई मेंढे ने स्वीकार की ৷

मुंबई के समान द्विकोणी मुकाबला यहाँ भी था ৷ सामान्य व आरक्षित सीट दोनों पर कुल मिलाकर चार उम्मीदवार खड़े थे । सामान्य सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता और कांग्रेस के पूनमचंद राका के बीच चुनाव होना था वहीं आरक्षित सीट पर बाबासाहेब के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे भाउराव बोरकर जिन्हें कांग्रेस की ओर से मैदान में उतारा गया था ৷ बोरकर भंडारा से लगे वैनगंगा के किनारे स्थित अम्बाड़ी गाँव के रहने वाले थे और मराठी साहित्य से स्नातकोत्तर थे ৷ आश्चर्य की बात यह कि मुंबई के काजरोलकर की भांति बोरकर भी बाबासाहेब के अनुयायी थे लेकिन सम्प्रति चुनाव में उनके विरुद्ध थे ৷ यह कथन बिलकुल सही है कि अपने स्वार्थ के लिए राजनीति में सब कुछ जायज़ है।

शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी बाबासाहेब को चुनाव चिन्ह मिला ‘हाथी’ जो दलित ,पीड़ित, शोषित जनता की आतंरिक शक्ति का प्रतीक बना । कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था ‘दो बैलोंकी जोड़ी’ वहीं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी अशोक मेहता ने चुनाव चिन्ह ‘झोपडी’ पर चुनाव लड़ना तय किया । देश की बहुसंख्य निरक्षर जनता जो प्रत्याशियों के नाम पढ़ने में असमर्थ थी इन चुनाव चिन्हों को बेहतर समझ सकती थी । पढ़े लिखे लोग भी नाम से अधिक प्रतीकों को महत्त्व देते थे इसीलिए आज तक चुनावों में यह प्रथा चली आ रही है यह अवश्य है कि अब यह केवल महत्त्व देना नहीं रहा बल्कि प्रतीक पूजा और व्यक्ति पूजा में बदल चुका है ।

5 मई 2026

29.एक ऐसा चुनाव जिसमे डॉ.आंबेडकर भी हार गए थे


डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मुंबई में 
1951 मे मुंबई का  प्रथम लोकसभा चुनाव 

सन उन्नीस सौ इन्क्यावन का प्रथम लोकसभा का यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण था । जनता को इस चुनाव में यह साबित करके दिखाना था कि वह न केवल बाबासाहेब की विचारधारा और सिद्धांतों के सम्मान के अलावा संविधान के लिए किये गए उनके परिश्रम की न केवल सराहना करती है बल्कि उसका पालन करने का संकल्प भी लेती है साथ ही दलितों के लिए लड़ी गई लड़ाई में उनकी भूमिका को रेखांकित करती है ।


दो वोट एक सामान्य एक आरक्षित सीट के लिए 

बाबासाहेब कांगेस में न होने के बावजूद अकेले नहीं थे,समाजवादी विचारधारा के प्रणेता अशोक मेहता जो सामान्य सीट से चुनाव लड़ रहे थे, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों के साथ उनके पक्ष में खड़े थे ৷ सामान्य जनता के बीच ऐसा मौखिक सन्देश दिया गया कि दो वोटों में से एक वोट सामान्य सीट के लिए अशोक मेहता को और एक वोट आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब आंबेडकर को दिया जाए ।

बॉम्बे राज्य की राजधानी मुंबई पूरे देश के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था । सिनेमा उद्योग, कपड़ा उद्योग, मछली
1951 में मुंबई 

व्यवसाय ऐसे अनेक क्षेत्रों में यहाँ के मजदूर कार्यरत थे । जहाँ एक ओर अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही थीं वहीं टीन और तिरपाल की छत के नीचे तंग झोपड़ियों में जाने कितने जीवन साँस ले रहे थे । 

“मुंबई ऐसी नगरी है जो सुबह इंसान को भूखा जगा तो सकती है लेकिन भूखा सोने नहीं देती ।“

यह मुहावरा पूरे देश में फ़ैल चुका था । मुंबई आने वाली रेलगाड़ियों में अपने सपनों की गठरी 
लादे प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में देश के कोने कोने से लोग चले आ रहे थे । यही थे वे वोटर जिन्हें आगामी चुनाव में बाबासाहेब का राजनीतिक भविष्य तय करना था ।

3 जनवरी 52 मुंबई प्रथम लोकसभा चुनाव 

पूरे देश में यह चुनाव धूमधाम से संपन्न हुआ ৷ देश की जनता के लिए मताधिकार का यह पहला अवसर था ৷ पूरे देश में सत्रह करोड़ साठ लाख मतदाताओं में से दस करोड़ सत्तर लाख मतदाताओं ने अर्थात साठ प्रतिशत मतदाताओं ने इस चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग किया ৷ यह जनतंत्र का प्रथम उत्सव था जिसे हर पांच साल बाद दोहराया जाना था । मुंबई में यह चुनाव जनवरी उन्नीस सौ बावन में संपन्न हुआ । तीन जनवरी का वह दिन मुंबई वासियों के लिए हर्ष का दिन था । स्वतंत्र भारत में पहली बार वे अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे थे । मतगणना के लिए सात जनवरी का दिन तय हुआ और ग्यारह जनवरी को चुनाव परिणामों की घोषणा हुई ।

नारायण सदाशिव काजरोलकर 
राजनीति की बाज़ी शतरंज की तरह होती है वह कभी भी किसी ओर पलट सकती है । मुंबई में इस चुनाव की बहुत धूम मची लेकिन अंततः दिल्ली मुंबई पर हावी रही । इस संसदीय क्षेत्र से दो लोग चुने जाने थे । 

सामान्य सीट से एक लाख उनंचास हज़ार एक सौ अड़तीस वोटों से कांग्रेस के विट्ठल गाँधी विजयी रहे वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता को एक लाख उनतालीस हज़ार सात सौ इकतालीस वोट मिले । 

अशोक मेहता स्वयं तो हारे ही, आरक्षित सीट पर बाबासाहेब को वोट देने की उनकी मौखिक अपील भी जनता के बीच नहीं पहुँच पाई और तमाम कोशिशों के बावजूद बाबासाहेब यह चुनाव हार गए ৷ 

आरक्षित सीट से यह चुनाव श्येद्युल कास्ट फेडरेशन के डॉ भीमराव आंबेडकर के विरुद्ध कांग्रेस के नारायण सदोबा काजरोलकर ने जीता और इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया ৷ उन्हें एक लाख अड़तीस हज़ार एक सौ सैंतीस वोट मिले । वोटों के हिसाब से बाबासाहेब आंबेडकर चौथे स्थान पर रहे ৷ उन्हें काजरोलकर से चौदह हज़ार पांच सौ इकसठ वोट कम मिले इस तरह वह सीट के हिसाब से दूसरे स्थान पर और वोटों के हिसाब से चौथे स्थान पर रहे ।

बाबासाहेब के हारने के पीछे क्या कारण था 

जैसा कि आजकल होता है उन दिनों भी चुनाव के उपरांत इस चुनाव में डॉ आंबेडकर के हारने व कांग्रेस के जीतने के कारणों का विश्लेषण किया गया । सोशलिस्ट पार्टी का सहयोग एक छद्म साबित हुआ था । नेहरु के रूप में कांग्रेस की देशव्यापी छवि उनके कद से भी बड़ी हो गई थी । गाँधी की चिता से उठती लपटों के अक्स अभी जनता की आँखों में दिखाई दे रहे थे और उसका इतनी जल्दी धूमिल होना असंभव था । 

इसके अलावा हार के कुछ स्थानीय कारण भी थे । विभाजन के पश्चात उत्तर मुंबई में ऐसे अनेक लोगों के आगमन हुआ था जिन्हें देश के पुनर्निर्माण में बाबासाहेब के योगदान के बारे में बिलकुल पता नहीं था । वर्तमान सरकार ने उनके पुनर्वास की व्यवस्था की थी । वे अपने देवता अपने मूल निवास के मंदिरों में छोड़ आये थे और अपने पालनहार के रूप में उन्होंने नई प्रतिमाएँ गढ़ ली थीं जो मनुष्यों के रूप में उनके देवता थे और भविष्य में अनेक वर्षों तक उसी स्थान पर बने रहने वाले थे ।

मुंबई की इस हार से बाबासाहेब आंबेडकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ৷ वे जानते थे संसद में उनके लिए कुर्सी भले न हो लेकिन देश के लोगों के दिलों में उनके लिए बहुत जगह थी और आनेवाली कई सदियों तक उस पद से उन्हें कोई नहीं हटा सकता था । मनुष्य के सुख, उसकी अस्मिता,अधिकार और गौरव के लिए लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में वे हमेशा के लिए विजेता घोषित कर दिए गए थे । 

बाबासाहेब को राज्यसभा मे ले लिया गया 

नेहरू जी मतभेदों के बावजूद उन्हें खोना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से उनके सरकार में आने की व्यवस्था कर दी । लेकिन जनता के प्रतिनिधि के रूप में सरकार में आने का महत्त्व तब भी था और आज भी है और फिर बाबासाहेब तो देश की असंख्य जनता के चहेते थे इसलिए जैसे ही मध्य प्रांत के भंडारा ज़िले में यह प्रथम लोकसभा चुनाव रद्द घोषित किये जाने के बाद वह सीट खाली हुई बाबासाहेब ने भंडारा सीट से उपचुनाव लड़ कर लोक सभा में जाने का निर्णय कर लिया ৷

डॉ आंबेडकर मार्ग मुंबई 
मुंबई का यह चुनाव अनेक मायनों में ऐतिहासिक रहा । इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि अंत तक कोई नहीं जान सकता कि राजनीति में ऊँट किस करवट बैठेगा । बाबासाहेब ने जिस जनता के लिए काम किया उसी जनता ने उन्हें हरा दिया इस घटना ने जनता व नेता के संबंधों का एक नया समीकरण स्थापित किया । लेकिन इसीके साथ यह भी तय हुआ कि जिस व्यक्ति की जगह लोगों के मन में होती है और जो जनता के लिए निस्वार्थ भावना से काम करता है देर से ही सही उसका उचित सम्मान होता है ।

बाबासाहेब को हराने वाले काजरोलकर को आज देश में बहुत कम लोग जानते होंगे लेकिन बाबासाहेब को पूरा विश्व जानता है । बाद में इस क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने की स्मृति में मुंबई उत्तर से दक्षिण तक पूरे मुंबई के मध्य से गुजरती हुई एक लम्बी सड़क बनाई गई जिसका नाम डॉक्टर आंबेडकर मार्ग रखा गया है ।


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आपका 
शरद कोकास 

4 मई 2026

28.जब एक मतदाता दो वोट दे सकता था

यह १९४७ के बाद की बात है । आज़ाद देश अब एक शिशु नहीं रहा था । बढ़ते बच्चे की तरह वह वर्ष की चौथी पायदान चढ़ चुका था ৷ आधी रात को मिली आज़ादी के समय मनाये गये उत्सव में जलाई गईं रंगीन बत्तियां लोगों के दिन चढ़े तक सोते रहने की वज़ह से दिन के उजाले में भी जल रही थीं ৷ इस बीच ऐसे कई लोग थे जो देश की सीधी सादी, भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाकर, जन भावनाएँ भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए थे। वे चाहते थे कि पहली बार मिली स्वतंत्रता के स्वर्गीय सुख में देश की जनता कुछ साल और डूबी रहे ৷ लेकिन इस बीच सब धर्मों की अलग अलग किताबों से ऊपर राष्ट्र धर्म की एक किताब जिसे संविधान कहते हैं देश में लागू की जा चुकी थी ৷ लोग उसे पूज नहीं रहे थे बल्कि पढ़ रहे थे । इस देश का आम आदमी भविष्य में लिखी जाने वाली दुष्यंत की इस काव्य पंक्ति को जी रहा था

सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।


अंतरिम सरकार में शामिल हमारे तारनहार भी यह सत्य जान गए थे कि इन सरफिरों को यूँही नहीं बहलाया जा सकता इसलिए चार साल बाद ही सही उचित समय देखकर अक्तूबर उन्नीस सौ इक्यावन से फरवरी उन्नीस सौ बावन के बीच चुनाव कराये जाने की घोषणा कर दी गई ৷ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात होने वाले देश के प्रथम लोकसभा चुनाव के लिए जनता का उत्साह कुछ इस तरह था जैसे उन्हें बहन या बेटी के लिए वर का चयन करना हो ।

जनतांत्रिक पद्धति से होने वाला यह पहला लोक सभा चुनाव सभी के लिए उत्सुकता का विषय था ৷ हमारा देश इस पहले लोकसभा चुनाव में विश्व के विभिन्न देशों की तरह सार्वजनीन वयस्क मताधिकार पद्धति अपना कर जनतंत्र की राह पर आगे बढ़ने हेतु कदम रख चुका था ৷ इस चुनाव में देश के चौरानबे संसदीय क्षेत्रों में यह व्यवस्था थी कि एक मतदाता दो वोट दे सकता था, एक सामान्य सीट से खड़े होने वाले प्रत्याशी के लिए तथा दूसरा वोट आरक्षित सीट से खड़े होने वाले प्रत्याशी के लिए ।

उन्नीस सौ सत्तावन तक दो वोट देने की यह व्यवस्था चलती रही । उस समय सन उन्नीस सौ तीस से बत्तीस तक तीन साल तक लगातार गोलमेज परिषद हुई थी । इस परिषद में डॉ.आंबेडकर ने यह प्रस्ताव रखा था कि श्येडूल्ड कास्ट बहुल क्षेत्रों में उन्हें न्याय दिलाने हेतु उनका भी एक प्रतिनिधि निर्वाचित किया जाए । यद्यपि उनके लिए स्वतंत्र मतदार संघ की बात नहीं मानी गई थी लेकिन गाँधीजी इस द्विस्तरीय चुनाव व्यवस्था और अलग से एक प्रतिनिधि के निर्वाचन के लिए वे तैयार थे । यह व्यवस्था उन्नीस सौ पैंतीस के इंडिया एक्ट के तहत की गई । इसी आधार पर प्रारंभ में उन्नीस सौ सैंतीस में मुंबई व मद्रास प्रोविंस के चुनाव भी हुए थे । बाबासाहेब द्वारा इसी परिषद् में नए संविधान में इस वर्ग के प्रतिनिधित्व की बात भी रखी गई थी ।


बाबासाहेब आंबेडकर संविधान निर्माण हेतु बनाई गई ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे ৷ संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका एवं महत्ता साबित हो चुकी थी इसलिए नेहरू जी की इच्छा थी कि बाबासाहेब कांग्रेस की सीट पर यह चुनाव लड़ें ৷ बाबासाहेब ने उनकी इच्छा का सम्मान अवश्य किया लेकिन वे सिद्धांतवादी थे, अपने नीतिगत मतभेदों की वज़ह से उन्होंने कोई समझौता नहीं किया न ही कोई प्रलोभन उन्हें भटका सका ৷ उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए गठित अपनी पार्टी शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से ही चुनाव लड़ना तय किया ৷ सन उन्नीस सौ बयालीस में स्थापित इस फेडरेशन के वे संस्थापक थे ৷
काजरोलकर 

उन्होंने मुंबई के उत्तर मध्य क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी प्रारंभ की ৷ मुंबई लोकसभा क्षेत्र से दो प्रत्याशी चुने जाने थे एक सामान्य सीट से और एक आरक्षित सीट से । आरक्षित सीट से बाबासाहेब आंबेडकर के विरुद्ध कांग्रेस के नारायण सदाशिव काजरोलकर प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे ৷ सामान्य सीट से कांग्रेस के विट्ठल गाँधी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता, सी पी आई के अमृत श्रीपाद डांगे , आर आर पी यानि राम राज्य परिषद से केशव जोशी, तथा स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में नीलकंठ परुलेकर व गोपाल देशमुख ऐसे लगभग आठ प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे ।

मज़े की बात यह कि बाबासाहेब के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी काजरोलकर बाबासाहेब आंबेडकर के ही शिष्य थे लेकिन इस वक्त वे कांग्रेस द्वारा गोद लिए जा चुके थे ৷ राजनीति के ओलम्पिक में कूटनीति के कुछ नए खेल शामिल किये जा रहे थे । फिर भी बाबासाहेब अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे । उन्हें विश्वास था, देश की जिस जनता की अस्मिता के लिए वे हमेशा से लड़ते आये हैं, वह जनता उनका साथ अवश्य देगी ৷

लेकिन उन्हें ज्ञात नहीं था कि चुनाव तो षडयंत्रों की पाठशाला होती है जिसका प्रथम सत्र इसी प्रथम चुनाव से प्रारंभ
सुकुमार सेन 

होने जा रहा था ৷ आगे की कक्षाओं में पढाया जाने वाला बूथ कैप्चरिंग,ई वी एम मैनेजमेंट , हॉर्स ट्रेडिंग इत्यादी का पाठ्यक्रम अभी तैयार नहीं हुआ था ।संविधान के साथ ही चुनाव आयोग का भी जन्म हुआ था । प्रथम चुनाव आयुक्त के रूप में सुकुमार सेन की ज़िम्मेदारी थी इस प्रथम चुनाव को भलीभांति संपन्न करवाना ৷ यह देश का बहुत महत्वपूर्ण चुनाव था । इस चुनाव से एक ऐसी परम्परा स्थापित होने जा रही थी जिस पर सम्पूर्ण देश एवं जनतंत्र का भविष्य टिका हुआ था ৷

मुंबई उत्तर मध्य के इस संसदीय क्षेत्र से सामान्य सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार थे विट्ठल बालकृष्ण गाँधी । वे मूलतः रत्नागिरी के रहने वाले थे और कांग्रेस की राजनीति में काफी सक्रिय थे । वे अमेरिका से पढाई करके लौटे थे इसलिए उन्हें अमेरिकन गाँधी भी कहा जाता था । वे नेहरु जी के बहुत प्रिय थे और मुंबई के मेयर रहते हुए उन्होंने सार्वजनिक परिवहन में प्रयुक्त होने वाले टैक्सी को पीले और काले इन दो रंगों में पेंट करने का यह सुझाव दिया था । यह सुझाव आज तक अमल में लाया जा रहा है । विट्ठल गाँधी के विरुद्ध प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता, कम्युनिस्ट पार्टी के श्रीपाद अमृत डांगे जैसे महत्वपूर्ण लोग चुनाव लड़ रहे थे ।



2 मई 2026

27. बाबासाहेब आंबेडकर और हुसैन रामटेके के बिना चाय

डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर 

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर 1954 मे महाराष्ट्र के भंडारा शहर से और मुंबई से लोकसभा का चुनाव हार गए थे । यह सब कैसे हुआ था ? कौन लोग इसके पीछे थे? कैसी पॉलिटिक्स हुई थी ? इन सबको विस्तार से मैंने लिखा है अगली सात कड़ियों मे पढ़ना न भूलें ।  प्रस्तुत है यह प्रथम किश्त 
 

दिनकर राव रहाटे अपने शिक्षकीय दायित्व से मुक्त होकर स्कूल से लौटे ही थे कि उनके मित्र भानुदास बंसोड उनसे मिलने आ गए ..”सुना है बाबासाहेब का भंडारा से बाय इलेक्शन लड़ने का विचार है ?” दिनकर राव जी ने सर हिलाते हुए कहा “ हाँ, बाबासाहेब से ऐसी बात तो हुई थी, उन्होंने यहाँ संभावनाओं के बारे में पता करने के लिए कहा है ৷“

गांधी चौक भंडारा 
यह सन उन्नीस सौ चौवन के आते हुए बसंत के दिनों की एक शाम थी ৷ भंडारा के यह दोनों मित्र चौक में खड़े थे और कप बशी में चाय पीते हुए तत्कालीन राजनीति और भंडारा की वर्तमान स्थिति पर चर्चा कर रहे थे ৷ भंडारा में लोकसभा की वर्तमान सीट खाली हो चुकी थी और उस सीट से बाबासाहेब आम्बेडकर को प्रत्याशी बनाए जाने पर विचार चल रहा था ৷

दिनकर राव और भानुदास जी दोनों बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा गठित सिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे और बाबासाहेब के सच्चे अनुयायी थे ৷ दिनकर राव जी फेडरेशन के भण्डारा ज़िले के अध्यक्ष थे ৷ वे भंडारा के निकट शहापुर के नानाजी जोशी विद्यालय के संस्थापक शिक्षकों में से एक थे ৷ लेकिन उन दिनों वे भंडारा से वरठी अर्थात भंडारा रोड रेलवे स्टेशन जाने वाले मार्ग पर दाभा गाँव के निकट जनपद के एक स्कूल में पाँचवी से आठवीं के छात्रों को गणित पढ़ाते थे ৷

की
अचानक उन्होंने चाय वाले से मुख़ातिब होकर कहा .. “साखर कमी टाकली का रे आज चहात ?”चाय वाले ने तुरंत हाथ से थोड़ी शक्कर उनकी चाय में डाली और घोलने के लिए एक चम्मच दे दिया । चम्मच से चीनी घोलते हुए दिनकर राव ने कहा “भानुदास भाऊ , जैसे चाय में साखर जरुरी होती है वैसे ही बाबासाहेब का संसद में होना जरुरी है । अगर नेहरु जी चाहते तो वे बाकायदा जनता द्वारा मुंबई से ही निर्वाचित होकर लोक सभा में आ जाते ৷ अभी बाबासाहेब राज्य सभा में हैं लेकिन शायद वे उससे संतुष्ट नहीं हैं ৷”

“उनके चाहने न चाहने से क्या होता है ? ” भानुदास जी ने आक्षेप लेते हुए कहा ৷ “फिर से कांग्रेस भंडारा से उनके विरुद्ध कोई कैंडिडेट खड़ा कर देगी जैसे मुंबई में किया था । अगर उनसे उनकी जमती तो फिर आजादी के बाद की अंतरिम सरकार से इस्तीफा कायको देते ? “


“ठीक कह रहे हो तुम ৷” दिनकर राव जी ने कहा “ मानते हैं कि उनके कांग्रेस से नीतियों को लेकर मतभेद हैं लेकिन नेहरू जी बाबासाहेब की विद्वता का बहुत सम्मान करते हैं ৷ इसीलिए उनको अपनी अंतरिम सरकार में लॉ मिनिस्टर बनाया था। “

“ तो फिर देश के पहले चुनाव में उनकी मदद भी करना था ना ।“ भानुदास जी की चाय ख़तम हो चुकी थी “ हा कप घेउन जा रे “ उन्होंने चाय वाले को इशारा किया । “वे तो एक्कावन के पार्लियामेंट के पहले इलेक्शन में ही फेडरेशन की सीट से ही मुंबई नार्थ सेन्ट्रल से चुनाव जीत जाते लेकिन पता नहीं कहाँ क्या गड़बड़ हो गई , नेहरू जी को उस समय कोई स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए था ना ?”


इसी बस्ती मे रहते थे दिनकर राव रहाटे 

दिनकर राव रहाटे जी ने उनकी बात का समर्थन किया “ हौ बरोबर बोले, तुम्हारी बात ठीक है फिर भी ऐसा हुआ । हमारे बाबासाहेब के पास अर्थशास्त्र व कानून की इतनी डिग्रियाँ हैं, एक तो कोलम्बिया यूनिवर्सिटी यू एस ए से डॉक्टरेट की और एक लंडन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ़ साइंस की और ग्रेस इन से बार एट ला यानि बैरिस्टर की है ৷ इसके अलावा भी कितना पढ़े लिखे हैं, कित्ती डिग्री है उनके पास वे फिर इतना महत्वपूर्ण संविधान उन्होंने गढ़ा है, कानून के विशेषज्ञ हैं, फिर भी राजनीति में वे आजकल के नेताओं से कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ ही गए ৷”

“होता है भाई होता है पॉलिटिक्स में सब होता है ।“ भानुदास जी हँसने लगे और विषय परिवर्तित करते हुए कहा ... “ अरे ! हुसेन नई आया आज ! उसके बिगेर चाय पिने का मजाच नई आता ।“ हुसैन रामटेके उनके शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे । “ क्या मालूम “ दिनकर राव ने कंधे उचकाते हुए कहा “ चलो, पान खाते क्या ? फिर दोनों मित्र पान की दुकान की ओर बढ़ गए ।



28 अप्रैल 2026

26 . फॉर हूम द बेल टॉल्स

भंडारा शहर की मेन  रोड 
भंडारा शहर उन दिनों इतना छोटा था कि लोग टहलने निकलते थे और कुछ देर बाद पता चलता थे कि लो शहर तो कबका ख़त्म हो चुका है और वे  शहर की सीमा से बाहर आ गए हैं इतने छोटे शहर की ख़बरें अखबार में तो छपती नहीं थीं न यहाँ के स्थानीय समाचार रेडियो पर आते थे फिर भी लोगों का मन तो होता ही था कि जानें शहर में क्या चल रहा है उनके लिए , शहर में  किसने नई दुकान डाली है, किस लोकल नेता ने जनता को क्या झूठा आश्वासन दिया है से लेकर किस के घर में चोरी हुई है, कौन किसकी लड़की को भगा ले गया है और किस की बीबी ने अपने शराबी पति से तंग आकर उसे ‘सोड़चिठ्ठी’ दे दी है, तक सभी ख़बरें महत्वपूर्ण थीं     

गांधी चौक सदा गुलज़ार 
शहर की ताज़ा ख़बरें जानने के लिए गाँधी चौक के किसी टी स्टाल पर हाफ़ चाय पीते हुए खड़े होना ही पर्याप्त था पान की दुकान वाला भी पान के साथ ऐसी चटपटी ख़बरें लपेट कर देता था जिन्हें आप काफी देर तक चुघल सकते थे किसी सेलून में दाढ़ी बनवाते हुए ‘किसी से न कहना’ के अंदाज़ में सभी खबरें आपको मिल जाती थीं इनमे कुछ ऐसी भी ख़बरें होती थीं जिन्हें अख़बार में छपने का सौभाग्य कभी प्राप्त हो ही नहीं सकता था इसके बावजूद जिन्हें देश दुनिया की ख़बरें जानना होता था वे नागपुर से निकलने वाले अख़बार मंगाते थे ख़बरें हर आदमी के पास होती थी अदा ज़ाफरी साहब ने ऐसे ही शहर के लोगों के लिए लिखा होगा ..

हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है

कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

महाल रोड पर एक प्रेस 
लेकिन इन सबके बावजूद शहर में कुछ ऐसे सजग पत्रकार थे जो अपनी कम पूंजी में ही सही साप्ताहिक अख़बार निकालते थे ऐसे ही एक पत्रकार थे हमारे मोहल्ले के अनंत रघुनाथराव पंडितराव पंडितराव जी ने अकबर इलाहाबादी का शेर सुन रखा था “खींचों न कमानों को न तलवार निकालो , जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो ।“ हालाँकि कोई तोप उनके मुकाबिल नहीं थी और रोज़ अख़बार निकलने लायक संसाधन भी उनके पास नहीं थे इसलिए वे सप्ताह में एक बार सोमवार को अख़बार निकालते थे । उनके अख़बार का नाम था ‘लोकवाणी’ और इसकी कीमत थी मात्र दस पैसे ।

पुराने समय की ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन 
पंडित राव जी एक झोला लटकाए साइकिल पर घूमते हुए हफ़्ते भर तक शहर की ख़बरें इकठ्ठा करते थे । उनके यहाँ एक कम्पोज़र था जो अलग अलग अक्षरों के लोहे से बने गुटकों को जिन्हें टाइप कहते थे एक लोहे की फ्रेम के भीतर सेट करता था । फिर पूरा पन्ना तैयार हो जाने के बाद उसे कस देता था ताकि छपाई के समय वे गिरे नहीं । फिर उसे वह ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन पर चढ़ाता था और रोलर पर स्याही डालता था । इतवार की शाम से ही धड़ धड़ की आवाज़ के साथ वह मशीन चलने लगती थी और थोड़ी देर में ही सत्रह बाई ग्यारह इंच के टैबलायड  साइज़ के चार पेज छप जाते थे ।  सोमवार की सुबह पंडितराव जी खुद अख़बार बाँटने निकलते थे । दूर मोहल्लों में बांटने के लिए उन्होंने एक हॉकर भी रखा था ।

पुराने समय का डायल वाला टेलीफोन 

पंडित राव जी की पहचान एक बुद्धिजीवी के रूप में तो थी ही लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उनके यहाँ टेलीफोन था
उस समय जिसके घर में टेलीफोन होता था वह बड़ा आदमी कहलाता था । हम लोग इस मायने में खुशनसीब थे कि हमारे मोहल्ले में दो टेलीफोन थे एक पंडितराव के यहाँ और एक एड्वोकेट शंगर्पवार के यहाँ । अनेक लोगों ने उनके घर के टेलीफोन नंबर अपने रिश्तेदारों को दे रखे थे जो अक्सर पंडित राव जी के टेलीफोन की घंटी बजाया करते थे  

हेमिंग्वे का उपन्यास 
अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास “ फॉर हूम द बेल टॉल्स “ के शीर्षक की तरह पंडितराव जी को भी पता नहीं होता था कि घंटी किसके लिए बज रही है इन पी पी नंबरों पर जब किसी का कोई रिश्तेदार फोन करता और पंडित राव जी से कहता “ कृपया फलां फलां को बुला दीजिये” पंडितराव जी जैसे सज्जन व्यक्ति पैदल ही नंगे पाँव उस व्यक्ति को बुलाने दौड़ जाते थे और “तुमचा फोन “ कह कर लौट आते । वे कितने भी व्यस्त हों उन्होंने पड़ोस के लोगों को बुलाने में कभी कोई कोताही नहीं की ।

पास पड़ोस का फोन 
उन दिनों पड़ोस के ऐसे बड़े आदमी का टेलीफोन नंबर पी पी नंबर कहलाता था हम लोग पी पी नंबर  का अर्थ नहीं जानते थे जिससे पूछो वह अलग अलग मतलब बताता था, कोई कहता पी पी यानि पर्सनल फोन तो कोई कहता पर्टिकुलर फोन हम लोगों ने सहूलियत के लिए इसका नाम रखा था ‘पास पड़ोस का फोन’ बाद में ज्ञात हुआ कि इसका वास्तविक अर्थ था पर्टिकुलर पर्सन अर्थात किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए आनेवाला फोन या उसके घर का नंबर

ट्रंक काल टेलीफोन एक्सचेंज में बुक होते थे 
लोग इमरजेंसी में जैसे किसी की मृत्यु आदि की सूचना देने के लिए इन्ही लोगों के घर से ट्रंक काल बुक करते थे और यह लोग इतने अच्छे कि कभी उसके पैसे भी नहीं लेते थे जबकि उन दिनों फोन का बिल बहुत ज़्यादा आता था । पास पड़ोस के फोन का उपयोग करने का यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक शहर में एस टी डी पी सी ओ नहीं खुल गए अथवा लोगों के घरों  में फोन नहीं लग गए । वह समय कब का बीत चुका है । अब तो हर जेब में मोबाइल है और पंडितराव जैसे परोपकारी लोग दुनिया से जा  चुके हैं  

पहले यहाँ हुआ करता था पंडितराव जी का घर 
एक ज़माना बीत गया यह सब घटित हुए तबसे लेकर अब तक जाने कितना पानी भंडारा की वैनगंगा नदी में बह चुका होगा भंडारा की गलियों से लेकर सडकों तक की सूरत बदल गई है पुराने मकान अब भी साँस ले रहे हैं लेकिन उनका वैभव अब ऊँची ऊँची इमारतों के आगे फीका पड़ रहा है लोग भी अब पंडितराव जी और शंगर्पवार जी जैसे कहाँ शेष हैं अब तो लगता है सब आपाधापी में हैं हर कोई दौड़ रहा है, जैसे उन्हें कहीं जाने की कोई जल्दी हो दौड़ सब रहे हैं लेकिन कोई कहीं पहुँच नहीं रहा है वे ऐसे दिन थे जब पड़ोस में रहने वालों को आपके रिश्तेदारों के नाम भी मालूम रहते थे । अब रिश्तेदार तो दूर बगल में कौन रहता है यह भी पता नहीं होता

लोकवाणी चौक 
लेकिन अभी भी समय बीत कर रीत नहीं गया है लोग विकास की अंधी दौड़ में दौड़ अवश्य रहे हैं लेकिन वे अभी चुके नहीं हैं फिर कोई कितना भी होशियार हो,  दौड़ जीतने की जल्दी में हो ,दौड़ते हुए एक न एक बार पीछे मुड़कर देखता ज़रूर है हम आप भी अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में बीते दिनों की धूल पर अपने पिछले कदमों के निशान ज़रूर देखते हैं ताकि हम बेहतर जान सकें कि हमें अगला कदम कौनसा रखना है

अभी भंडारा की इन गलियों में मुझे ऐसे बहुत से निशान दिखाई दे रहे हैं इनमे कुछ निशान तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर आप चौंक जायेंगे ध्यान से देखिये आपको इन गलियों में बाबासाहेब आम्बेडकर के पाँव के निशान भी दिखाई देंगे , उन दिनों के जब उन्होंने भंडारा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के दौरान यहाँ डेरा डाला था

अख़बार पर आज बहुत सी बातें हुई  बशीर महताब का एक शेर जो मुझे बहुत अच्छा लगता है वह भी पढ़ लीजिये...

मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें

हर रोज़ नया फ़ितना बयाँ करती हैं

शरद कोकास