आईये पड़ोस को अपना विश्व बनायें
मुंबई की इस हार से बाबासाहेब आंबेडकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ৷ वे जानते थे संसद में उनके लिए कुर्सी भले न हो लेकिन देश के लोगों के दिलों में उनके लिए बहुत जगह थी और आनेवाली कई सदियों तक उस पद से उन्हें कोई नहीं हटा सकता था । मनुष्य के सुख, उसकी अस्मिता,अधिकार और गौरव के लिए लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में वे हमेशा के लिए विजेता घोषित कर दिए गए थे । नेहरू जी मतभेदों के बावजूद उन्हें खोना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से उनके सरकार में आने की व्यवस्था कर दी । लेकिन जनता के प्रतिनिधि के रूप में सरकार में आने का महत्त्व तब भी था और आज भी है और फिर बाबासाहेब तो देश की असंख्य जनता के चहेते थे इसलिए जैसे ही मध्य प्रांत के भंडारा ज़िले में यह प्रथम लोकसभा चुनाव रद्द घोषित किये जाने के बाद वह सीट खाली हुई बाबासाहेब ने भंडारा सीट से उपचुनाव लड़ कर लोक सभा में जाने का निर्णय कर लिया ৷पास पड़ोस
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5 मई 2026
29.एक ऐसा चुनाव जिसमे डॉ.आंबेडकर भी हार गए थे
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
| डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मुंबई में |
बाबासाहेब कांगेस में न होने के बावजूद अकेले नहीं थे,समाजवादी विचारधारा के प्रणेता अशोक मेहता जो सामान्य सीट से चुनाव लड़ रहे थे, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों के साथ उनके पक्ष में खड़े थे ৷ सामान्य जनता के बीच ऐसा मौखिक सन्देश दिया गया कि दो वोटों में से एक वोट सामान्य सीट के लिए अशोक मेहता को और एक वोट आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब आंबेडकर को दिया जाए ।
बॉम्बे राज्य की राजधानी मुंबई पूरे देश के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था । सिनेमा उद्योग, कपड़ा उद्योग, मछली
व्यवसाय ऐसे अनेक क्षेत्रों में यहाँ के मजदूर कार्यरत थे । जहाँ एक ओर अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही थीं वहीं टीन और तिरपाल की छत के नीचे तंग झोपड़ियों में जाने कितने जीवन साँस ले रहे थे । “मुंबई ऐसी नगरी है जो सुबह इंसान को भूखा जगा तो सकती है लेकिन भूखा सोने नहीं देती ।“ यह मुहावरा पूरे देश में फ़ैल चुका था । मुंबई आने वाली रेलगाड़ियों में अपने सपनों की गठरी
| १९५४ में मुंबई |
व्यवसाय ऐसे अनेक क्षेत्रों में यहाँ के मजदूर कार्यरत थे । जहाँ एक ओर अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही थीं वहीं टीन और तिरपाल की छत के नीचे तंग झोपड़ियों में जाने कितने जीवन साँस ले रहे थे । “मुंबई ऐसी नगरी है जो सुबह इंसान को भूखा जगा तो सकती है लेकिन भूखा सोने नहीं देती ।“ यह मुहावरा पूरे देश में फ़ैल चुका था । मुंबई आने वाली रेलगाड़ियों में अपने सपनों की गठरी
लादे प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में देश के कोने कोने से लोग चले आ रहे थे । यही थे वे वोटर जिन्हें आगामी चुनाव में बाबासाहेब का राजनीतिक भविष्य तय करना था ।
पूरे देश में यह चुनाव धूमधाम से संपन्न हुआ ৷ देश की जनता के लिए मताधिकार का यह पहला अवसर था ৷ पूरे देश में सत्रह करोड़ साठ लाख मतदाताओं में से दस करोड़ सत्तर लाख मतदाताओं ने अर्थात साठ प्रतिशत मतदाताओं ने इस चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग किया ৷ यह जनतंत्र का प्रथम उत्सव था जिसे हर पांच साल बाद दोहराया जाना था । मुंबई में यह चुनाव जनवरी उन्नीस सौ बावन में संपन्न हुआ । तीन जनवरी का वह दिन मुंबई वासियों के लिए हर्ष का दिन था । स्वतंत्र भारत में पहली बार वे अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे थे । मतगणना के लिए सात जनवरी का दिन तय हुआ और ग्यारह जनवरी को चुनाव परिणामों की घोषणा हुई ।
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| नारायण सदाशिव काजरोलकर |
इकसठ वोट कम मिले इस तरह वह सीट के हिसाब से दूसरे स्थान पर और वोटों के हिसाब से चौथे स्थान पर रहे ।
जैसा कि आजकल होता है उन दिनों भी चुनाव के उपरांत इस चुनाव में डॉ आंबेडकर के हारने व कांग्रेस के जीतने के कारणों का विश्लेषण किया गया । सोशलिस्ट पार्टी का सहयोग एक छद्म साबित हुआ था । नेहरु के रूप में कांग्रेस की देशव्यापी छवि उनके कद से भी बड़ी हो गई थी । गाँधी की चिता से उठती लपटों के अक्स अभी जनता की आँखों में दिखाई दे रहे थे और उसका इतनी जल्दी धूमिल होना असंभव था । इसके अलावा हार के कुछ स्थानीय कारण भी थे । विभाजन के पश्चात उत्तर मुंबई में ऐसे अनेक लोगों के आगमन हुआ था जिन्हें देश के पुनर्निर्माण में बाबासाहेब के योगदान के बारे में बिलकुल पता नहीं था । वर्तमान सरकार ने उनके पुनर्वास की व्यवस्था की थी । वे अपने देवता अपने मूल निवास के मंदिरों में छोड़ आये थे और अपने पालनहार के रूप में उन्होंने नई प्रतिमाएँ गढ़ ली थीं जो मनुष्यों के रूप में उनके देवता थे और भविष्य में अनेक वर्षों तक उसी स्थान पर बने रहने वाले थे ।
मुंबई की इस हार से बाबासाहेब आंबेडकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ৷ वे जानते थे संसद में उनके लिए कुर्सी भले न हो लेकिन देश के लोगों के दिलों में उनके लिए बहुत जगह थी और आनेवाली कई सदियों तक उस पद से उन्हें कोई नहीं हटा सकता था । मनुष्य के सुख, उसकी अस्मिता,अधिकार और गौरव के लिए लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में वे हमेशा के लिए विजेता घोषित कर दिए गए थे । नेहरू जी मतभेदों के बावजूद उन्हें खोना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से
उनके सरकार में आने की व्यवस्था कर दी । लेकिन जनता के प्रतिनिधि के रूप में सरकार में आने का महत्त्व तब भी था और आज भी है और फिर बाबासाहेब तो देश की असंख्य जनता के चहेते थे इसलिए जैसे ही मध्य प्रांत के भंडारा ज़िले में यह प्रथम लोकसभा चुनाव रद्द घोषित किये जाने के बाद वह सीट खाली हुई बाबासाहेब ने भंडारा सीट से उपचुनाव लड़ कर लोक सभा में जाने का निर्णय कर लिया ৷
| डॉ आंबेडकर मार्ग मुंबई |
मुंबई का यह चुनाव अनेक मायनों में ऐतिहासिक रहा । इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि अंत तक कोई नहीं जान सकता कि राजनीति में ऊँट किस करवट बैठेगा । बाबासाहेब ने जिस जनता के लिए काम किया उसी जनता ने उन्हें हरा दिया इस घटना ने जनता व नेता के संबंधों का एक नया समीकरण स्थापित किया । लेकिन इसीके साथ यह भी तय हुआ कि जिस व्यक्ति की जगह लोगों के मन में होती है और जो जनता के लिए निस्वार्थ भावना से काम करता है देर से ही सही उसका उचित सम्मान होता है ।
बाबासाहेब को हराने वाले काजरोलकर को आज देश में बहुत कम लोग जानते होंगे लेकिन बाबासाहेब को पूरा विश्व जानता है । बाद में इस क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने की स्मृति में मुंबई उत्तर से दक्षिण तक पूरे मुंबई के मध्य से गुजरती हुई एक लम्बी सड़क बनाई गई जिसका नाम डॉक्टर आंबेडकर मार्ग रखा गया है ।
4 मई 2026
28.जब एक मतदाता दो वोट दे सकता था
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
यह १९४७ के बाद की बात है । आज़ाद देश अब एक शिशु नहीं रहा था । बढ़ते बच्चे की तरह वह वर्ष की चौथी पायदान चढ़ चुका था ৷ आधी रात को मिली आज़ादी के समय मनाये गये उत्सव में जलाई गईं रंगीन बत्तियां लोगों के दिन चढ़े तक सोते रहने की वज़ह से दिन के उजाले में भी जल रही थीं ৷ इस बीच ऐसे कई लोग थे जो देश की सीधी सादी, भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाकर, जन भावनाएँ भड़काकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए थे। वे चाहते थे कि पहली बार मिली स्वतंत्रता के स्वर्गीय सुख में देश की जनता कुछ साल और डूबी रहे ৷ लेकिन इस बीच सब धर्मों की अलग अलग किताबों से ऊपर राष्ट्र धर्म की एक किताब जिसे संविधान कहते हैं देश में लागू की जा चुकी थी ৷ लोग उसे पूज नहीं रहे थे बल्कि पढ़ रहे थे । इस देश का आम आदमी भविष्य में लिखी जाने वाली दुष्यंत की इस काव्य पंक्ति को जी रहा था
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।
अंतरिम सरकार में शामिल हमारे तारनहार भी यह सत्य जान गए थे कि इन सरफिरों को यूँही नहीं बहलाया जा सकता इसलिए चार साल बाद ही सही उचित समय देखकर अक्तूबर उन्नीस सौ इक्यावन से फरवरी उन्नीस सौ बावन के बीच चुनाव कराये जाने की घोषणा कर दी गई ৷ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात होने वाले देश के प्रथम लोकसभा चुनाव के लिए जनता का उत्साह कुछ इस तरह था जैसे उन्हें बहन या बेटी के लिए वर का चयन करना हो ।
जनतांत्रिक पद्धति से होने वाला यह पहला लोक सभा चुनाव सभी के लिए उत्सुकता का विषय था ৷ हमारा देश इस पहले लोकसभा चुनाव में विश्व के विभिन्न देशों की तरह सार्वजनीन वयस्क मताधिकार पद्धति अपना कर जनतंत्र की राह पर आगे बढ़ने हेतु कदम रख चुका था ৷ इस चुनाव में देश के चौरानबे संसदीय क्षेत्रों में यह व्यवस्था थी कि एक मतदाता दो वोट दे सकता था, एक सामान्य सीट से खड़े होने वाले प्रत्याशी के लिए तथा दूसरा वोट आरक्षित सीट से खड़े होने वाले प्रत्याशी के लिए ।
उन्नीस सौ सत्तावन तक दो वोट देने की यह व्यवस्था चलती रही । उस समय सन उन्नीस सौ तीस से बत्तीस तक तीन साल तक लगातार गोलमेज परिषद हुई थी । इस परिषद में डॉ.आंबेडकर ने यह प्रस्ताव रखा था कि श्येडूल्ड कास्ट बहुल क्षेत्रों में उन्हें न्याय दिलाने हेतु उनका भी एक प्रतिनिधि निर्वाचित किया जाए । यद्यपि उनके लिए स्वतंत्र मतदार संघ की बात नहीं मानी गई थी लेकिन गाँधीजी इस द्विस्तरीय चुनाव व्यवस्था और अलग से एक प्रतिनिधि के निर्वाचन के लिए वे तैयार थे । यह व्यवस्था उन्नीस सौ पैंतीस के इंडिया एक्ट के तहत की गई । इसी आधार पर प्रारंभ में उन्नीस सौ सैंतीस में मुंबई व मद्रास प्रोविंस के चुनाव भी हुए थे । बाबासाहेब द्वारा इसी परिषद् में नए संविधान में इस वर्ग के प्रतिनिधित्व की बात भी रखी गई थी ।
बाबासाहेब आंबेडकर संविधान निर्माण हेतु बनाई गई ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे ৷ संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका एवं महत्ता साबित हो चुकी थी इसलिए नेहरू जी की इच्छा थी कि बाबासाहेब कांग्रेस की सीट पर यह चुनाव लड़ें ৷ बाबासाहेब ने उनकी इच्छा का सम्मान अवश्य किया लेकिन वे सिद्धांतवादी थे, अपने नीतिगत मतभेदों की वज़ह से उन्होंने कोई समझौता नहीं किया न ही कोई प्रलोभन उन्हें भटका सका ৷ उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए गठित अपनी पार्टी शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से ही चुनाव लड़ना तय किया ৷ सन उन्नीस सौ बयालीस में स्थापित इस फेडरेशन के वे संस्थापक थे ৷
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| काजरोलकर |
उन्होंने मुंबई के उत्तर मध्य क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी प्रारंभ की ৷ मुंबई लोकसभा क्षेत्र से दो प्रत्याशी चुने जाने थे एक सामान्य सीट से और एक आरक्षित सीट से । आरक्षित सीट से बाबासाहेब आंबेडकर के विरुद्ध कांग्रेस के नारायण सदाशिव काजरोलकर प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे ৷ सामान्य सीट से कांग्रेस के विट्ठल गाँधी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता, सी पी आई के अमृत श्रीपाद डांगे , आर आर पी यानि राम राज्य परिषद से केशव जोशी, तथा स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में नीलकंठ परुलेकर व गोपाल देशमुख ऐसे लगभग आठ प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे ।
मज़े की बात यह कि बाबासाहेब के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी काजरोलकर बाबासाहेब आंबेडकर के ही शिष्य थे लेकिन इस वक्त वे कांग्रेस द्वारा गोद लिए जा चुके थे ৷ राजनीति के ओलम्पिक में कूटनीति के कुछ नए खेल शामिल किये जा रहे थे । फिर भी बाबासाहेब अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे । उन्हें विश्वास था, देश की जिस जनता की अस्मिता के लिए वे हमेशा से लड़ते आये हैं, वह जनता उनका साथ अवश्य देगी ৷
लेकिन उन्हें ज्ञात नहीं था कि चुनाव तो षडयंत्रों की पाठशाला होती है जिसका प्रथम सत्र इसी प्रथम चुनाव से प्रारंभ
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| सुकुमार सेन |
होने जा रहा था ৷ आगे की कक्षाओं में पढाया जाने वाला बूथ कैप्चरिंग,ई वी एम मैनेजमेंट , हॉर्स ट्रेडिंग इत्यादी का पाठ्यक्रम अभी तैयार नहीं हुआ था ।संविधान के साथ ही चुनाव आयोग का भी जन्म हुआ था । प्रथम चुनाव आयुक्त के रूप में सुकुमार सेन की ज़िम्मेदारी थी इस प्रथम चुनाव को भलीभांति संपन्न करवाना ৷ यह देश का बहुत महत्वपूर्ण चुनाव था । इस चुनाव से एक ऐसी परम्परा स्थापित होने जा रही थी जिस पर सम्पूर्ण देश एवं जनतंत्र का भविष्य टिका हुआ था ৷
मुंबई उत्तर मध्य के इस संसदीय क्षेत्र से सामान्य सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार थे विट्ठल बालकृष्ण गाँधी । वे मूलतः रत्नागिरी के रहने वाले थे और कांग्रेस की राजनीति में काफी सक्रिय थे । वे अमेरिका से पढाई करके लौटे थे इसलिए उन्हें अमेरिकन गाँधी भी कहा जाता था । वे नेहरु जी के बहुत प्रिय थे और मुंबई के मेयर रहते हुए उन्होंने सार्वजनिक परिवहन में प्रयुक्त होने वाले टैक्सी को पीले और काले इन दो रंगों में पेंट करने का यह सुझाव दिया था । यह सुझाव आज तक अमल में लाया जा रहा है । विट्ठल गाँधी के विरुद्ध प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता, कम्युनिस्ट पार्टी के श्रीपाद अमृत डांगे जैसे महत्वपूर्ण लोग चुनाव लड़ रहे थे ।
2 मई 2026
27. बाबासाहेब आंबेडकर और हुसैन रामटेके के बिना चाय
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
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| डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर |
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर 1954 मे महाराष्ट्र के भंडारा शहर से और मुंबई से लोकसभा का चुनाव हार गए थे । यह सब कैसे हुआ था ? कौन लोग इसके पीछे थे? कैसी पॉलिटिक्स हुई थी ? इन सबको विस्तार से मैंने लिखा है अगली सात कड़ियों मे पढ़ना न भूलें । प्रस्तुत है यह प्रथम किश्त
दिनकर राव रहाटे अपने शिक्षकीय दायित्व से मुक्त होकर स्कूल से लौटे ही थे कि उनके मित्र भानुदास बंसोड उनसे मिलने आ गए ..”सुना है बाबासाहेब का भंडारा से बाय इलेक्शन लड़ने का विचार है ?” दिनकर राव जी ने सर हिलाते हुए कहा “ हाँ, बाबासाहेब से ऐसी बात तो हुई थी, उन्होंने यहाँ संभावनाओं के बारे में पता करने के लिए कहा है ৷“
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| गांधी चौक भंडारा |
दिनकर राव और भानुदास जी दोनों बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा गठित सिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे और बाबासाहेब के सच्चे अनुयायी थे ৷ दिनकर राव जी फेडरेशन के भण्डारा ज़िले के अध्यक्ष थे ৷ वे भंडारा के निकट शहापुर के नानाजी जोशी विद्यालय के संस्थापक शिक्षकों में से एक थे ৷ लेकिन उन दिनों वे भंडारा से वरठी अर्थात भंडारा रोड रेलवे स्टेशन जाने वाले मार्ग पर दाभा गाँव के निकट जनपद के एक स्कूल में पाँचवी से आठवीं के छात्रों को गणित पढ़ाते थे ৷
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| चाय की दुकान |
अचानक उन्होंने चाय वाले से मुख़ातिब होकर कहा .. “साखर कमी टाकली का रे आज चहात ?”चाय वाले ने तुरंत हाथ से थोड़ी शक्कर उनकी चाय में डाली और घोलने के लिए एक चम्मच दे दिया । चम्मच से चीनी घोलते हुए दिनकर राव ने कहा “भानुदास भाऊ , जैसे चाय में साखर जरुरी होती है वैसे ही बाबासाहेब का संसद में होना जरुरी है । अगर नेहरु जी चाहते तो वे बाकायदा जनता द्वारा मुंबई से ही निर्वाचित होकर लोक सभा में आ जाते ৷ अभी बाबासाहेब राज्य सभा में हैं लेकिन शायद वे उससे संतुष्ट नहीं हैं ৷”
“उनके चाहने न चाहने से क्या होता है ? ” भानुदास जी ने आक्षेप लेते हुए कहा ৷ “फिर से कांग्रेस भंडारा से उनके विरुद्ध कोई कैंडिडेट खड़ा कर देगी जैसे मुंबई में किया था । अगर उनसे उनकी जमती तो फिर आजादी के बाद की अंतरिम सरकार से इस्तीफा कायको देते ? “
“ठीक कह रहे हो तुम ৷” दिनकर राव जी ने कहा “ मानते हैं कि उनके कांग्रेस से नीतियों को लेकर मतभेद हैं लेकिन नेहरू जी बाबासाहेब की विद्वता का बहुत सम्मान करते हैं ৷ इसीलिए उनको अपनी अंतरिम सरकार में लॉ मिनिस्टर बनाया था। “
“ तो फिर देश के पहले चुनाव में उनकी मदद भी करना था ना ।“ भानुदास जी की चाय ख़तम हो चुकी थी “ हा कप घेउन जा रे “ उन्होंने चाय वाले को इशारा किया । “वे तो एक्कावन के पार्लियामेंट के पहले इलेक्शन में ही फेडरेशन की सीट से ही मुंबई नार्थ सेन्ट्रल से चुनाव जीत जाते लेकिन पता नहीं कहाँ क्या गड़बड़ हो गई , नेहरू जी को उस समय कोई स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए था ना ?”
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| इसी बस्ती मे रहते थे दीनदयाल रहाटे |
दिनकर राव रहाटे जी ने उनकी बात का समर्थन किया “ हौ बरोबर बोले, तुम्हारी बात ठीक है फिर भी ऐसा हुआ । हमारे बाबासाहेब के पास अर्थशास्त्र व कानून की इतनी डिग्रियाँ हैं, एक तो कोलम्बिया यूनिवर्सिटी यू एस ए से डॉक्टरेट की और एक लंडन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ़ साइंस की और ग्रेस इन से बार एट ला यानि बैरिस्टर की है ৷ इसके अलावा भी कितना पढ़े लिखे हैं, कित्ती डिग्री है उनके पास वे फिर इतना महत्वपूर्ण संविधान उन्होंने गढ़ा है, कानून के विशेषज्ञ हैं, फिर भी राजनीति में वे आजकल के नेताओं से कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ ही गए ৷”
“होता है भाई होता है पॉलिटिक्स में सब होता है ।“ भानुदास जी हँसने लगे और विषय परिवर्तित करते हुए कहा ... “ अरे ! हुसेन नई आया आज ! उसके बिगेर चाय पिने का मजाच नई आता ।“ हुसैन रामटेके उनके शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे । “ क्या मालूम “ दिनकर राव ने कंधे उचकाते हुए कहा “ चलो, पान खाते क्या ? फिर दोनों मित्र पान की दुकान की ओर बढ़ गए ।
28 अप्रैल 2026
26 . फॉर हूम द बेल टॉल्स
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
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| भंडारा शहर की मेन रोड |
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| गांधी चौक सदा गुलज़ार |
हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना
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| महाल रोड पर एक प्रेस |
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| पुराने समय की ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन |
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| पुराने समय का डायल वाला टेलीफोन |
पंडित राव जी की पहचान एक बुद्धिजीवी के रूप में तो थी ही लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उनके यहाँ टेलीफोन था ৷ उस समय जिसके घर में टेलीफोन होता था वह बड़ा आदमी कहलाता था । हम लोग इस मायने में खुशनसीब थे कि हमारे मोहल्ले में दो टेलीफोन थे ৷ एक पंडितराव के यहाँ और एक एड्वोकेट शंगर्पवार के यहाँ । अनेक लोगों ने उनके घर के टेलीफोन नंबर अपने रिश्तेदारों को दे रखे थे जो अक्सर पंडित राव जी के टेलीफोन की घंटी बजाया करते थे ৷
| हेमिंग्वे का उपन्यास |
| पास पड़ोस का फोन |
| ट्रंक काल टेलीफोन एक्सचेंज में बुक होते थे |
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| पहले यहाँ हुआ करता था पंडितराव जी का घर |
| लोकवाणी चौक |
अभी भंडारा की इन गलियों में मुझे ऐसे बहुत से निशान दिखाई दे रहे हैं ৷ इनमे कुछ निशान तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर आप चौंक जायेंगे ৷ ध्यान से देखिये आपको इन गलियों में बाबासाहेब आम्बेडकर के पाँव के निशान भी दिखाई देंगे , उन दिनों के जब उन्होंने भंडारा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के दौरान यहाँ डेरा डाला था ৷
अख़बार पर आज बहुत सी बातें हुई बशीर महताब का एक शेर जो मुझे बहुत अच्छा लगता है वह भी पढ़ लीजिये...
मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें
हर रोज़ नया फ़ितना बयाँ करती हैं ।
शरद कोकास
26 अप्रैल 2026
25. सिलबट्टे की खीर
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
| दादा हलमारे के घर के सामने की सीमेंट की बेंच |
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| सारवे का बाड़ा 2017 की तस्वीर |
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| छोटी बहन सीमा और माया के साथ एक तस्वीर |
मैट्रिक के बाद जब मैं उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु भोपाल गया तो मेरे जाने के दो साल बाद माया भी वहाँ पढ़ने आ गई थी । बाबूजी के आग्रह पर बोपचे काका ने अपनी बिटिया को रीजनल कॉलेज में पढ़ने भेजा था ৷ माया पढ़ने में काफी होशियार थी ৷ बी एस सी ऑनर्स बी एड की अपनी पढाई पूर्ण करने के बाद उसने भंडारा में ही शिक्षक की नौकरी ज्वाइन कर ली और डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर के पद तक पहुँची ৷ बचपन से हम लोगों के बीच का भाई बहन का यह रिश्ता अब अपने अपने परिवार के विस्तार के साथ और प्रगाढ़ हो गया है ৷ उसका विवाह भी भंडारा के जे एम पटेल कॉलेज के व्याख्याता मदन लाल जी देशमुख के साथ हुआ इस तरह भंडारा उनका स्थायी निवास हो गया ।
| हम लोगों का नाट्य स्थल दुर्गा मंदिर 2012 |
छाया और माया हम बच्चों के दिन प्रतिदिन के उधमबाजी वाले खेलों में तो शामिल नहीं थीं लेकिन वे हमारी सांस्कृतिक टीम की सक्रिय सदस्य थीं । क्वांर के माह में आनेवाले शारदीय नवरात्र की हमारे यहाँ धूम मचती थी । एक माह पूर्व ही मोहल्ले की बालपुरी नव दुर्गा उत्सव समिति के सदस्य सक्रिय हो जाते थे । यह ग़रीब लोगों की समिति थी, चंदा भी बहुत कम होता था इसलिए ऑर्केस्ट्रा , फिल्म , मिमिक्री जैसे कार्यक्रम नहीं होते थे लेकिन हम बच्चों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर प्रदान करने हेतु दो दिनों का सांस्कृतिक कार्यक्रम अवश्य रखा जाता था । छाया, माया, मेरी बहन सीमा, शंगर्पवार जी की बिटिया शुभा और प्रमोद भोयर सहित हम बच्चों की सांस्कृतिक टीम डांस, नाटक, गीत, कविता जैसे कार्यक्रमों की रिहर्सल में जुट जाती ।
वैसे तो हम लोगों ने बहुत से नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम किये लेकिन एक नाटक मुझे विशेष रूप से याद है इसका नाम था ‘वरवंट्याची खीर’ अर्थात ‘सिलबट्टे की खीर’ । मराठी में पाटा यानि सिल और वरवंटा का अर्थ बट्टा होता है । एक तरह से इसे ‘बट्टे की खीर’ भी कह सकते हैं इस नाटक में मैंने मुसाफिर की और माया ने माई की भूमिका का निर्वाह किया था । इस नाटक का कथानक बड़ा मज़ेदार था ।
एक मुसफ़िर भटकता हुआ एक एक गाँव में पहुँच जाता है । उन दिनों यात्री पैदल ही यात्राये करते थे । शाम होती है तो वह रात बिताने के लिए कोई ठिकाना ढूँढता है । संयोग से उसे गाँव की सीमा पर ही एक बुढ़िया का घर दिखाई देता है । बुढिया उसे रात बिताने के लिए अपनी झोपडी में आसरा दे देती है ।
बुढिया तो भोजन कर चुकी होती है लेकिन आतिथेय के नाते उससे पूछती है “तुम कुछ नहीं खाओगे ?“ मुसाफ़िर रुखा सा जवाब देता है “मैं किसी के यहाँ का कुछ नहीं खाता । आपने मुझे सहारा दिया इतना काफी है । “ लेकिन वृद्धा का मन नहीं मानता । वह ज़ोर देती है तो मुसाफिर कहता है “ अच्छा माई ऐसा करो चूल्हे पर एक बर्तन में पानी उबलने रख दो ।“
फिर वह थैले में से एक बट्टा निकालता है और वृद्धा से कहता है “इसे भी पानी में डाल दो । “ बुढिया पूछती है “ इससे क्या होगा ? यह तो पत्थर है । “ वह कहता है “माई, इसे ऐसा वैसा पत्थर न समझो यह चमत्कारी पत्थर है, इसीसे खीर बनेगी ।“
बहुत देर तक पानी उबलने के बाद भी जब कुछ नहीं होता तो वृद्धा चिंतित हो जाती है । वह कहती है “बेटा, इसमें तो कुछ नहीं हो रहा है ।“ वह कहता है “माई लगता है कहीं कुछ गड़बड़ हो गई है । ऐसा करो इसमें थोड़ा दूध डाल दो ।“ वृद्धा दूध डाल देती है । उसके बाद भी कुछ नहीं होता तो कहता है “माई कुछ तो गड़बड़ अवश्य है इसका जादू काम नहीं कर रहा है, ऐसा करो थोड़ा चावल डाल दो ।“ फिर वह कुछ देर बाद वह माई को फुसलाकर चीनी, काजू, किशमिश भी डलवा लेता है । खीर पक जाने के बाद वह बर्तन से बट्टा निकाल लेता है और उसे धो पोछ कर थैले में रख देता है । फिर चटखारे लेते हुए ख़ुद खीर खाता है और माई से कहता है “ माई तुम भी चखो , देखो इस चमत्कारी बट्टे की खीर कितनी स्वादिष्ट बनी है ।“
कभी कभी लगता है हम देशवासियों की हालत उस सीधी सादी बुढिया जैसी हो गई है और हमारे पालनहार उस चालाक मुसाफिर जैसे हो गए हैं । सारे के सारे योजनाओं का सिल और बट्टा लिए घूम रहे हैं और हमारे दिए गए टैक्स के पैसों से, हमारे श्रम से अर्जित धन और खेतों में उपजाए धान्य की वज़ह से बनी सुख सुविधाओं की खीर का उपभोग कर रहे हैं । हम उनकी इस चालाकी को उनका चमत्कार समझ कर ही प्रसन्न हैं।
शरद कोकास
24 अप्रैल 2026
24.बेटा बात कर नहीं वे बेटावदकर हैं
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
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| रहाटे ,नईम और मैं |
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| शरद प्रमोद का यवतमाल का घर |
कुछ वर्षों पश्चात शरद और प्रमोद के पिताजी का तबादला यवतमाल हो गया था । कुछ दिनों तक तो उनकी ख़बर मिलती रही फिर मैं बाहर पढने चला गया और उनसे संपर्क टूट गया । लेकिन शीघ्र ही उनसे फिर मुलाकात हुई और यह दोस्ती का सिलसिला अब तक जारी है । शरद एयर फ़ोर्स में लांस नायक का कार्यकाल पूरा करने के बाद यांत्रिकी के व्याख्याता हो गए और प्रमोद यवतमाल के कॉलेज में सिविल इंजिनीअरिंग के व्याख्याता हो गए । वर्तमान में वे दोनों अपनी चौरासी वर्षीय माताजी, और परिवार के साथ यवतमाल में निवास कर रहे हैं ।
भंडारा का हमारा यह मोहल्ला जिसे हम अपने नन्हे पांवों से रोज़ ही नापते थे कुछ और आगे तक था । भोयर काका के बाद वाले ब्लॉक में देशमुख रहते थे । फिर उसी लाइन में आगे के मकानों में बम्बावाले, जोगलेकर और भी बहुत से लोग ৷ वहीं पर एक परिवार रहता था माँ उनका नाम ‘बेटा बात कर’ बताती थी । मैंने एक दिन माँ से पूछा “यह कैसा नाम है?” तो माँ ने कहा “यह उनका सरनेम है ।“ मुझे कई दिनों तक समझ में नहीं आया कि ऐसा सरनेम कैसे हो सकता है बाद में किसी ने बताया कि उनका सरनेम ‘बेटा बात कर’ नहीं बल्कि ‘बेटावदकर’ है , अर्थात वे बेटावद गाँव के रहने वाले हैं । महाराष्ट्र में अनेक सरनेम ऐसे ही बनते हैं जैसे
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| लता मंगेशकर |
तेंदूल गाँव के रहने वाले तेंदुलकर, मंगेशी गाँव के मंगेशकर, उज्जैन के उज्जैनकर, खरगोन के खरगोनकर अम्बावड़े गाँव के आंबेडकर ।
मैंने मराठी उपनामों की जब खोज की तो मुझे अनेक तरह के रोचक सरनेम पता चले । यह सरनेम अजीब से लगते हैं लेकिन तय है कि कहीं न कहीं से इनका उद्भव हुआ ही होगा । इनकी उत्पत्ति के बारे में जानना बहुत रोचक है । गाँव के नाम पर सरनेम कैसे होते हैं यह तो हमने देखा । अब कुछ सरनेम प्राणियों के नाम पर देखें, जैसे सुअर के नाम पर डुकरे, चींटी के नाम पर मुंगी, बिल्ली के नाम पर मांजरेकर,कौवे के नाम पर कावले, बन्दर के नाम पर माकडे । कोल्हिया या सियार के नाम पर कोल्हे या लांडगे, गधे के नाम पर गाढवे , गाय जैसे मुँह वाले गायतोंडे और गायों के मालिक गायधनी, गोस्वामी, गोसावी और गोसाई । कुछ सरनेम शिकारियों जैसे होते हैं जिन्होंने बाघ मारा वे वाघमारे, जिन्होंने बाघ पकड़ा वे वाघधरे , फिर हत्तीमारे, तीतरमारे आदि भी हैं । संभव है इनके पूर्वजों ने इन प्राणियों का शिकार किया हो अथवा यह प्राणी अथवा वनस्पति इनके प्राचीन कबीले या कुनबे के टोटम या गण चिन्ह रहे हों ।
महाराष्ट्र में रंगों के नाम पर भी अनेक सरनेम मिलते हैं जैसे काले, गोरे,पिवले,हिरवे,निले आदि । वहीं धातुओं के नाम पर सरनेम हैं पितले, ताम्बे, लोखंडे,सोने,चांदे आदि । कुछ सरनेम शारीरिक स्थितियों पर भी होते हैं जैसे एकबोटे यानि एक ऊँगली वाले , खोकले यानि खांसने वाले,बोबड़े अर्थात जिनके दांत न हों , पोट दुखे जिनका पेट दुखता हो, पोटफाड़े बाप रे.. पेट फाड़ने वाले या बारह हाथ वाले बाराहाते और कानफाड़े,नाकतोड़े और डोईफोड़े जैसे हिंसक सरनेम भी ।
फिर हगे होते हैं तो चाटे भी, ढगे भी होते हैं और फुगे भी । संतानों की संख्या पर अष्टपुत्रे और दशपुत्रे या पाँच लड़कों वाले पाचपोरे । कुछ खरे होते हैं तो कुछ खोटे । मीठा बोलने वाले गोडबोले या गोडे तथा कडवा बोलने वाले कडू । करमरकर को हम लोग अंग्रेजी में बोलते थे ‘डू डाय डू’ । खाने की वस्तुओं पर भी कई सरनेम होते हैं जैसे दहीवड़े, भाजीपाले, खोबरे,साखरे आदि । अब कुछ खाते हैं तो कुछ नखाते हैं । कुछ लेले है तो कुछ नेने यानि ले जा ।
रुई के व्यवसाय वाले कापसे या रुइकर कहलाये और कम्बल वाले काम्बले । पेशवा के यहाँ विभिन्न पदों पर काम करने वाले अर्जनवीस,फड़नवीस,महाजन,राजे,कुलकर्णी,पाटील,पूजा करने वाले पुजारी, कपड़ा सिलने वाले शिम्पी और सुनार यानि सोनार, जौहरी और रत्नपारखी, बांस का काम वाले बंसोड, लकड़ी का काम करने वाले सुतार , दूध बेचने वाले गवली, बगीचे वाले माली और बर्तन बनने वाले मतकरी, भाला चलाने वाले भालधरे या भालेराव, ठेकेदार यानि मुकादम आदि । इनके अलावा सूबेदार है, देशपांडे और देशमुख हैं। उसी तरह बुद्धिमान शहाणे या सहस्त्रबुद्धे हो गए, स्टेनोग्राफर टिपनिस हुए और वेद पढ़ने वाले वेदपाठक ।
यह मजेदार जानकारी आपको कैसी लगी जरूर बताईएगा
आपका शरद कोकास
23.हाफ कैंची से लेकर फुल कैंची तक –भाग दो
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
| फिल्म मंज़िल मे अमिताभ मौसमी |
फिल्म मंज़िल का अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी पर फिल्माया यह गीत हम सहज रूप से गीत गुनगुनाते हैं लेकिन क्या कभी ख्याल आता है कि गायन की इस कला तक पहुँचने के लिए हमारे पुरखों ने कितनी लम्बी यात्रा की है ৷ पहली पहली बार कोई भी काम करते हुए कभी भी हमारे मन में यह ख्याल नहीं आता कि इसे पहली बार किसने किया होगा ?
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| कार्ल वान ड्राइस |
बचपन में पहली बार जब मैंने साइकिल का हैंडल पकड़कर उसके पायडल पर पांव रखा था तो मुझे भी यह ख्याल कहाँ आया था कि पहली बार साईकिल किस इंसान ने चलाई होगी या साइकिल का आविष्कार किसने किया होगा ৷ बरसों बाद पता चला कि वह एक फारेस्ट ऑफिसर कार्ल वान ड्राइस था जो सन अठारह सौ सत्रह में जर्मनी के जंगलों में काम करता था ৷ जंगल के भीतर दूर दूर तक जाने के लिए उसके पांव नाकाफ़ी थे इसलिए उसे एक ऐसी सवारी की आवश्यकता थी जो उसे तुरंत उन घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच से अपने गंतव्य तक पहुँचा सके ৷
फिर जाने कितने असफल प्रयोगों के बाद, जाने कितने कलपुर्जे बनाने और बदलने के बाद जर्मनी के एक जंगल अधिकारी ने आखिर दुनिया की पहली साइकिल बना ही ली थी ৷ कई बार गिरने पड़ने के बाद आखिर वह साइकिल चलने में भी सफल हो गया था ৷ सीखने में मैं उसका वंशज था । उम्र के शुरुआती वर्षों में साइकिल चलाने का यह हुनर मुझमे पैदा करने का श्रेय मैं अपने दो मित्रों शरद और प्रमोद भोयर को देता हूँ ৷
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| भोयर काका इसी घर मे आए थे |
शरद और प्रमोद उर्फ़ प्रवीण के पिता श्री वामन पुंडलीक भोयर की पोस्टिंग भंडारा के निकट बेला स्थित बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में हुई थी ৷ बाबूजी भी उसी कॉलेज में थे । बाबूजी ने उन्हें अपने ही पड़ोस में एक किराए का मकान दिलवा दिया ৷ यह मकान जोगीतलाव में खुलने वाली गली के बाद वाली चाल में दूसरे नंबर पर था ৷ वे बाबूजी के मित्र थे इसलिए हम उन्हें भोयर काका कहने लगे । उनके दोनों बेटे शरद और प्रमोद से मेरी मित्रता प्रारंभ हुई और यह मित्रता भोयर काका के भंडारा से तबादला हो जाने के बाद भी जारी रही ।
हमारी दोस्ती की शुरुआत बरसात की उन शामों में हुई जब ज़मीन थोड़ी नर्म हो जाती है और लोहे का लम्बा सूजा गाड़ कर खेलने वाला खेल शुरू हो जाता है । घर के भीतर जाने वाली पायरी और बाहरी दीवार के बीच वाले कोने में हमारा कंचे का अड्डा हुआ करता था । आँगन में घेरा बनाकर भौरा खेलना भी हमारा प्रिय खेल था । भौरे में लोहे की नोक लगाने के लिए हम लोग लोहार के पास जाया करते थे और गाहे बगाहे उस नोक को फर्शी पर घिस घिस कर धार दिया करते थे ताकि प्रतिद्वंद्वी का लकड़ी का भौरा एक चोट में ही तोडा जा सके ।
शरद के घर का पिछला दरवाज़ा जोगीतलाव के मैदान में खुलता था । वह हम लोगों के लिए खेल का एक विस्तृत मैदान था । जब बारिश होती तो हम लोग सूजे वाला खेल खेलते और बारिश बंद होने पर गिल्ली डंडा । फिर धीरे धीरे और भी दोस्त आने लगे और हमारा यह खेल क्रिकेट में बदल गया । क्रिकेट यह गिल्ली डंडे के खेल का अपडेटेड वर्शन था । मैदान में अपनी आरक्षित पिच पर हम लोग प्रतिदिन देर शाम तक क्रिकेट खेला करते थे ৷ हमारी टीम में शरद और प्रमोद के एक मामा भी रहते थे जिन्हें हम केशव मामा कहते थे और वे हमारे हम उम्र थे । उनके अलावा शंकर सव्वालाखे और नरेश तिवारी भी हमारी टीम के सदस्य थे । नरेश उर्फ़ गुल्लू शरद के घर के सामने ही एक झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में रहता था ।
जब हमारा खेल शुरू होता तो घड़ियों के कांटे हमारे लिए रुक जाते । स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से बाहर आकर हमें डराने वाले अभ्यास के भयावह दैत्य मैदान के बाहर ही खड़े रहते । फिर जैसे ही अँधेरा होने लगता शरद व प्रमोद के घर में सांध्य दीप जलते दिखाई देने । इससे पहले कि काकू के डाँटने की आवाज़ हम तक पहुँचे हम लोग अपने घरेलू जुगाड़ से बनाये स्टम्प, गेंद और बल्ला उठाकर घर लौट आते ৷ भोयर काका और काकू की आवाज़ दूर तक मेरा पीछा करती .. जय देव जय देव जय आनंद रूपा ..जय देव जय देव जय मंगल मूर्ती .. दर्शन मात्रे मनोकामना पूर्ति.. ।
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| इसे कहते हैं कैंची साइकिल |
शरद और प्रमोद के साथ किया जाने वाला सबसे एडवेंचरस काम था साइकिल चलाना सीखना । यह काम हम लोग पिताओं की छुट्टी के दिन या उनके नौकरी से आने के बाद किया करते थे इसलिए कि उन दिनों घर में केवल एक ही साइकिल होती थी। शरद मुझसे पहले साइकिल चलाना सीख गया था । एक दिन उसने मुझे अपने साइकिल थमाई और कहा “उल्टा पांव इस पाइडल पर रखो और दूसरा बीच से निकालकर दूसरे पाइडल पर रखो ।” फिर उसने पीछे कैरियर से साइकिल पकड़ी और कहा “ अब चढ़ जाओ और आधा आधा पाइडल मारो, मैं पकडे हूँ । मैंने पहले ही दिन सफलता पूर्वक यह लेसन पूर्ण कर लिया ।
इस तरह मैं ‘आधी कैंची’ में प्रवीण हो गया । फिर दो दिन आधी कैंची की प्रैक्टिस के बाद उसने मुझे फुल कैंची सिखाई मतलब पूरा पाइडल मार कर साइकिल चलाना। आखिरी लेसन तब मिला जब मैं हैंडल पर नज़र रखने के चक्कर में शरद के घर के सामने वाले बिजली के खम्भे से टकराया “ अरे अरे .. हैंडल पर नहीं ..रोड पर नज़र रखो ।“ बचपन के इस आनंद की कल्पना वही कर सकता है जिसने उस उम्र में साइकिल सीखी हो । सीट पर बैठकर चलाने का समय तो तब आया जब हमारी हाईट साइकिल के बराबर हो गई ৷ जीवन का सफ़र भी साइकिल के सफ़र की तरह होता है । बहुत से लोग सीट पर बैठकर साइकिल चला ही नहीं पाते , उनका कद , उनकी योग्यता और स्थिति सफ़र सिर्फ हाफ़ कैंची से फुल कैंची तक ही रहता है
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| पीछे शरद सामने प्रमोद माताजी और बहूएं यवतमाल |
यह वे दिन थे जब हम अपनी पतंगों को उड़ाते हुए उनके साथ अपनी खुशियों और उमंगों को भी आसमान तक पहुंचता हुआ देखते थे । लट्टू के साथ हमारा मन भी झूमता था और दूर जाती गेंद के साथ हम दूर जाती दुश्चिंताओं को देखते थे । मैंने साइकिल सिखाने का श्रेय तो शरद को दिया लेकिन इस सवारी के आविष्कार का श्रेय मैं बचपन के उस बालसुलभ अहं और अपनी नासमझी वाली समझ में सभ्यता के बचपन में जन्म लेने वाले उस आदिम मनुष्य को ही देता रहा जिसने पेड़ के गोल तने को लुढ़काकर पहिये का अविष्कार किया था ৷
हम सब आज भी यही करते हैं । विज्ञान के आधार पर हमें आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने हेतु किये गए अविष्कारों का श्रेय वैज्ञानिकों या अविष्कारकों को न देकर हम अपनी गौरवशाली संस्कृति का गुणगान करते हुए उन पौराणिक कथा लेखकों को देते हैं जिन्होंने इसकी कल्पना मात्र की थी ৷ यद्यपि अतीत से लेकर अद्यतन प्रत्येक अविष्कार में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान प्रशंसनीय है चाहे वह कल्पना क्यों न हो । यह ठीक उस तरह है जैसे कि हमारे व्यक्तित्व निर्माण में बचपन से लेकर अब तक के हर पल का योगदान है ৷
23 अप्रैल 2026
22 सूनी दोपहरियों की बदमाशियाँ
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
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| देशबंधु वार्ड की गली मे हमारा मकान |
यद्यपि पौराणिक पात्रों के नामों पर बच्चों के नाम तो अभी भी रखे जाते हैं लेकिन इन पात्रों में भी ऐसे अनेक नाम हैं जो कहीं सुनने को नहीं मिलते जैसे रावण, कंस या दुर्योधन ৷ लड़कियों में शूर्पणखा,ताड़का या हिडिम्बा यह नाम मिलना तो असम्भव है ৷ द्रौपदी नाम भी बहुत कम मिलता है ৷
ऐसा ही कुछ था उस बच्चे का नाम ৷ वह रामकिशन के घर के बाद वाली गली में रहता था ৷ उसके घर में एक स्त्री थी जिसका रंग साँवला था, इतना साँवला कि माँ उसे काली कहती थी । माँ पड़ोस की सभी स्त्रियों से बात करती थी लेकिन उससे नहीं ৷ वह स्त्री अक्सर हमारे घर के सामने से निकलती थी और कनखियों से हमारे घर की ओर देख लेती थी ৷ माँ अगर दरवाज़े पर खड़ी हो तब भी कभी वह उनसे आँख नहीं मिलाती थी ৷
मैंने एक दिन माँ से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया “ तुम्हारे पहले जन्मदिन पर हमने तुम्हे सोने की एक पतली सी चैन पहनाई थी । जब तुम आंगन में खेल रहे थे तब यह स्त्री घर में आई थी और चुपचाप तुम्हारे गले से चैन उतारकर ले गई ৷ फिर जब पुलिस में रिपोर्ट की गई और मोहल्ले वालों को पता चल गया तो वह स्त्री जाने कब घर में आई और चुपचाप वह चैन बगीचे में फेंक कर चली गई । चैन मिल गई तो फिर आगे कोई कार्यवाही नहीं की गई । “
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| हमारे घर वाली गली |
उस के घर तो मैं वैसे भी कभी नहीं गया लेकिन उसके बाद वाले रमाबाई के घर ज़रूर जाता था । रमाबाई विधवा थी और बर्तन माँजकर अपना गुजारा करती थी । छोटी बहन सीमा जब नन्ही सी थी तो रमा बाई उसका बहुत लाड़ किया करती थी । रमाबाई का एक बेटा था जिसका नाम सुधाकर था । उसे जब महाराष्ट्र राज्य परिवहन यानि एस टी में कंडक्टर की नौकरी मिल गई थी तो रमाबाई ने बर्तन माँजना बन्द कर दिया । इनका सरनेम अम्बाडारे था ।
रमाबाई के घर के सामने एक बड़े से अहाते वाला मकान था जिनके यहाँ गायें थी और हमारे दूधवाले के न आने पर मैं उसके यहाँ से दस पैसे में एक गिलास का दूध लाया करता था । रमाबाई के मकान से लगा हुआ भरतलाल का मकान था ৷ भरतलाल जी वैसे तो अच्छे आदमी थे लेकिन कभी कभी तरंग में रहते तो पूरे मोहल्ले में उधम मचा देते थे । लेकिन कोकास गुरूजी का वे बहुत सम्मान करते थे इसलिए कि उन्हें शांत भी बाबूजी ही करते थे ৷ उनके बेटे का नाम सुभाष था । उसके घर के सामने उन्ही के भाई नागपुरे का मकान था ।
| नागपुरे का मकान |
यह तमाम बस्ती गरीबों की बस्ती थी जिनके मकान की दीवारें मिट्टी की थीं और उनके ज़ख्मों की तरह रिसती रहती थीं ৷ ओलावृष्टि से अथवा बंदरों के प्रकोप से अक्सर खपरे टूट जाते थे और मूसलाधार बरसात के दिनों में घर के भीतर पानी टपकता रहता था ৷ इतनी आय किसी की नहीं थी कि बार बार मरम्मत करवा सकें ৷ अभाव इनके घर में सदा अपना डेरा डाले रहते थे और किसी की आर्थिक क्षमता इतनी नहीं थी कि अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें । गली के इन दोनों अंतिम मकानों के बाद रिंग रोड थी ।
हमारी गली की पूर्व से होने वाली शुरुआत में घर से निकलते ही बाईं ओर डाकरे का बाड़ा आता था लेकिन उसका दरवाज़ा गली में न खुल कर मुख्य सड़क पर खुलता था । गली से बाहर निकलो तो दाहिनी ओर यह सड़क आगे बाज़ार तक जाती थी ৷ बाईं ओर कुछ दूर जाकर यही सड़क रिंग रोड से मिल जाती थी जहाँ त्रिकोण का एक कोण बनता था । गली के ठीक सामने सड़के के दूसरी ओर एक बिजली का खम्भा था जिसकी बाईं ओर मटन वाले भेदरे काका रहते थे, उनके दाईं ओर येवले, फिर सामने दादा हलमारे जिनके घर के सामने सीमेंट की दो बेंचें बनी थी ।
| भैयालाल पटले का मकान |
डाकरे के बाड़े में अनेक किरायेदार रहते थे ৷ आगे बढ़ने पर एक ऊंची इमारत थी ৷ यह कांग्रेस के नेता भैयालाल पटले का अस्थायी आवास था ৷ पटले जी बाद में जिला पंचायत के अध्यक्ष बने । उस घर में जाने के लिये हमारे घर के पीछे से भी एक रास्ता था । जब मैं नौ-दस साल का था तब कभी कभार शौकिया तौर पर उनके यहाँ चाय बनाने के लिए जाया करता था । मैने वहीं उनके रसोइये से चाय बनाना सीखा । मेहनताने में मुझे एक कप चाय मिला करती थी, बाल्यावस्था में यह मेरा प्रथम पारिश्रमिक था ।
डाकरे और पटले के मकान के बीच एक झोपड़ीनुमा मकान था जिसके पिछवाड़े में हम लोगों के घर के लिविंग रूम की खिड़की खुलती थी । पटले के घर के सामने जाम्भुलकर का मकान था, जहाँ लीला रहती थी । लीला हम सब बच्चों से बड़ी थी और हम सब की बॉस थी । रंगोली बनाना, भुलाबाई के गाने गाना और लड़कियों वाले तमाम खेल जैसे लघोरी यानि कवेलू के टुकड़े एक के ऊपर एक रखकर उन पर गेंद से निशाना लगाना, नदी पहाड़, डबा आइस पाइस , बिल्लस यानि बिट्टी,सागर गोटी, पत्थर के टुकड़ों या चूड़ी उछालकर खेलने वाला खेल , पुराने कपड़े का सोटा बनाकर वृत में बैठे बच्चों की पीठ पर मरने वाला खेल ‘आईचा पत्र हरवला’ , आंखमिचौली यानि आंधळी कोशिंबीर जैसे अनेक खेल मैंने लीला की मंडली में ही सीखे थे ৷ कपड़े की गुड़िया व गुड्डे वाला खेल नानी की नातिन अन्नू के साथ खेलता था ৷
| लीला ताई |
लीला के मकान की दाहिनी ओर किराना वाले नन्दू काका यानि नंदलाल बैस ने अपना मकान बनाया था जिस पर ‘जलाराम निवास‘ लिखा था । नंदू काका स्वयं अपने खामतालाव वाले मकान में रहा करते थे और यह मकान उन्होंने किराये पर दे दिया था ৷ इस मकान में बाद में श्री महेश पाण्डेय रहने आये थे वे स्थानीय जे.एम.पटेल कॉलेज में प्रोफेसर थे और उनकी दो नन्ही नन्ही बेटियाँ थीं । महेश पाण्डेय के भाई मधुप पाण्डेय नागपुर में रहते थे और मंचों के सुप्रसिद्ध कवि थे ।
इस मकान के दायीं ओर एक सँकरी सी गली थी जो बमुश्किल तीस फिट लम्बी थी ৷ यह गली जोगीतालाव के मैदान में खुलती थी । इस मैदान में जकातदार कन्या शाला थी जिसके सामने से एक रास्ता अन्धविद्यालय और महिला समाज बालक मन्दिर की ओर जाता था । अन्धविद्यालय के सामने एक टेकड़ी थी जिसके खत्म होते ही मनरो हाइस्कूल था । जकातदार कन्या शाला की बाईं ओर बी. एड. कॉलेज था ৷ बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज बेला से सन सडसठ में बाबूजी इसी बी एड कॉलेज में प्रोफ़ेसर बनकर आ गए थे । इस सँकरी गली के ठीक सामने सड़क की दूसरी ओर पटले के घर की बाईं ओर एक गली और थी जिसमें हमारे मकान का पीछे का दरवाज़ा खुलता था ।
| जकातदार कन्या शाला |
जोगी तलाव की ओर जाने वाली इस सँकरी गली के बाद कुछ मकान और थे । पहला मकान एक बाड़ेनुमा या चालनुमा मकान था, जिसमें अनेक किरायेदार रहा करते थे । पहले नबर के ब्लॉक में हमेशा नये लोग आते थे । एक बार इस ब्लॉक में एक नया जोड़ा रहने के लिये आया । इस ब्लॉक की एक खिड़की संकरी गली में खुलती थी ৷ मोहल्ले के बड़ी उम्र के बदमाश लड़के सूनी दोपहरियों में उस खिड़की की दरारों से ताक झाँक किया करते थे । एक दिन उचक उचक कर दरार से झाँककर देखने के प्रयास में एक लड़का हड़बड़ाहट में खिड़की से टकरा गया । शोर मचा तो उस घर में रहने वाले सज्जन घर से बाहर आये और लड़कों को गालियाँ देनी शुरू कर दी । कुछ समझ आने के बाद अपने समवयस्कों से उनकी बदमाशियों के किस्से सुनते हुए मुझे मालूम हुआ कि वे झाँककर क्या देखते थे ৷
अभी के बच्चों को मोबाइल में गेम खेलते हुए देखता हूँ तो याद आता है हम लोग स्कूल से आने के बाद घर में टिकते ही नहीं थे बस्ता पटक कर सीधे जोगीतालाव के मैदान निकल जाते और गिल्ली डंडा , भौरा , घुप्पस ( जमीन में लोहे की डंडी गाड़ने वाला खेल ) और एक लकड़ी उछलने वाला खेल खेलते थे
पटले के घर के सामने जाम्भुलकर का मकान था, जहाँ लीला रहती थी । लीला हम सब बच्चों से बड़ी थी और हम सब की बॉस थी । लड़कियों वाले सारे खेल मैंने लीला ताई से ही सीखे |
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| टायर के खेल |
इन खेलों में रंगोली बनाना, भुलाबाई के गाने गाना और लड़कियों वाले तमाम खेल जैसे लघोरी यानि कवेलू के टुकड़े एक के ऊपर एक रखकर उन पर गेंद से निशाना लगाना, नदी पहाड़, डबा आइस पाइस , बिल्लस यानि बिट्टी,सागर गोटी, पत्थर के टुकड़ों या चूड़ी उछालकर खेलने वाला खेल , पुराने कपड़े का सोटा बनाकर वृत में बैठे बच्चों की पीठ पर मरने वाला खेल ‘आईचा पत्र हरवला’ , आंखमिचौली यानि आंधळी कोशिंबीर जैसे अनेक खेल मैंने लीला की मंडली में ही सीखे थे ৷ कपड़े की गुड़िया व गुड्डे वाला खेल नानी की नातिन अन्नू के साथ खेलता था ৷
आप लोगों ने बचपन में इनमे से कौन से खेल खेले हैं ?
( पुस्तक " बैतूल से भंडारा : एक जन इतिहास से एक अंश
21. ठाकरे किराना में चंदामामा घराना
प्रस्तुतकर्ता :
शरद कोकास
शहर की गलियों से गुज़रते हुए मुझे अक्सर दुष्यंत का वह शेर याद आता है जिसमे वे कहते हैं ..”शहर की भीड़ भाड़ से बचकर, तू गली से निकल रही होगी ৷ “ भंडारा शहर इतना बड़ा शहर नहीं था कि उसकी सड़कों पर भीड़ भाड़ रहे फिर गलियों में तो आवाजाही बहुत ही कम थी ৷ जिस गली में हमारा मकान था वह गली दो मुख्य सड़कों को जोड़ती थी, एक शहर के भीतर की सड़क और एक रिंग रोड । यह भीतर की सड़क भी आगे जाकर रिंग रोड में मिल जाती थी । इस तरह हमारा मोहल्ला एक त्रिकोण के भीतर आ जाता था । एक भुजा हमारी गली और दोनों सड़कें दो भुजाएँ ।
हमारी गली में अधिकांश निम्नमध्यवर्गीय लोग ही रहा करते थे । उनमें कुछ घर लोधी जाति के लोगों के थे जिनके उपनाम ठाकरे, माहुले और सव्वालाखे थे और उनकी भाषा छत्तीसगढ़ी से बहुत कुछ मिलती जुलती थी । घर के सामने एक बाड़ी थी जहाँ आगे चलकर मकान के दाहिनी ओर रहने वाले पाण्डुरंग ठाकरे के काका भोजराम ठाकरे ने मकान बनाया । जैसा कि गांवों के मकानों में होता है मकान बनने से पूर्व वहाँ एक बाड़ी थी जिसमे मचान बनाकर कद्दू की बेल लगाईं गई थी । उसके बगल में एक टीला था जिस पर पांडुरंग ठाकरे की गाय बन्धती थी । पांडुरंग ठाकरे की अपने ही घर में एक छोटे सी कम पूंजी में लगाई गई किराने की दुकान थी ৷ और
बचपन के उन दिनों में राजाओं महाराजाओं और परियों की कहानियाँ पढ़ने का शौक तो होता था लेकिन पत्रिकाएँ खरीदने के लिए जेब में पैसे नहीं होते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे की दुकान में आई रद्दी में मैं पत्रिकाएँ खोजता था और मुझे अचानक बच्चों की मशहूर पत्रिका चंदामामा दिख जाती थी ৷ उनके बरामदे में लकड़ी का एक झूला लगा था जिस पर बैठकर मैं ‘ चंदामामा ‘ पत्रिका की कहानियाँ पढ़ा करता था । उस समय बच्चों की पत्रिका चंदामामा बड़ी मशहूर थी ৷ इसमें राजाओं की कहानियाँ होती थीं, कुछ नीति परक, कुछ बोध कथाएँ यह पत्रिका दक्षिण से निकलती थी और उस समय तमिल के अलावा कई अन्य भाषाओं में आती थी ৷ इस पत्रिका में कलाकारों द्वारा कहानियों पर बनाये चित्र होते थे ৷ मज़े की बात यह कि कहानी भले ही उत्तर भारत के किसी नगर के बारे में हो वहाँ का राजा दक्षिण के राजाओं की तरह वेशभूषा और आभूषण धारण किये होता था ৷ आखिर चित्रकार तो दक्षिण के ही होते थे ।
चंदामामा के अलावा बाल पत्रिकाओं के घराने में पराग, नंदन, चम्पक जैसी पत्रिकाएँ भी प्रारंभ हो चुकी थीं कहीं कहीं लोटपोट पत्रिका भी मिल जाती थी ৷ यह पत्रिकाएँ नियमित पढ़ने को तो मिलती नहीं थी कभी कभार बैतूल आते जाते स्टेशन पर बाबूजी ख़रीद कर दे देते थे वर्ना ठाकरे किराना में आई रद्दी में तो मिल ही जाती थीं ৷
पांडुरंग ठाकरे थोड़ा ऊँचा सुनते थे और उनकी माँ उन्हें ‘बहरा‘ कहकर बुलाती थी सो उनकी किराने की दुकान भी ‘ किराना स्टोर्स ‘ की बजाय ‘‘बहरे की दुकान “ के नाम से प्रसिद्ध थी । पांडुरंग ठाकरे जितने ग़रीब थे उतने ही ग़रीब उनके ग्राहक भी थे, इसलिए उनकी दुकान बमुश्किल चल पाती थी । जब घर में दुकान नहीं चली तो एक दिन उन्होंने नुक्कड़ के खाली पड़े एक मकान में ,जिसे हम लोग बोम्बल्या भागवत का मकान कहते थे, की छपरी में अपनी दुकान लगा ली जिसके एक पटिये पर मैंने पिपरमेंट की मीठी गोली का मेहनताना लेकर चाक से लिख दिया था ‘ ठाकरे किराना स्टोर्स ‘ । लेकिन वहाँ भी उनकी दुकान नहीं चली तो वे अपनी दुकान समेट कर वापस घर आ गये ।
उनकी दुकान के बन्द होने का सबसे बड़ा कारण पास ही एक बड़ी दुकान का होना था जिसे ‘भाटया की दुकान’ कहते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे के पास इतनी पूंजी नहीं थी कि वे अपनी दुकान में अधिक सामान रख सकते ৷ जिसे उनके यहाँ वांछित सामान नहीं मिलता वह भाटया की दुकान चला जाता और फिर सारा सामान वहीं से खरीदने लगता ৷ धीरे धीरे इनके सभी ग्राहक वहाँ चले गए ৷ पूंजी का खेल किस तरह होता है यह बात मुझे उन्ही दिनों समझ में आ गई थी ৷ आज देश में मल्टी नेशनल कम्पनियाँ और माल्स किस तरह छोटे छोटे व्यवसायियों का धंधा चौपट कर रहे हैं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किस तरह इन छोटे व्यापारियों को उजाड़ रहा है इस बात को इस उदाहरण से भलीभांति समझा जा सकता है ৷
पांडुरंग ठाकरे के चार बच्चे थे अशोक, अरुण, मनोहर और मंगला । बाद में उनकी एक और बेटी हुई जो बहुत गोरी थी और जिसके बाल भूरे थे इस वज़ह से सभी उसे भूरी कहकर बुलाते थे । उनके घर में रहनेवाली एक वृद्धा के बारे में दबी जुबान में कहा जाता था कि वह जादू-टोना करती थी , हालाँकि प्रकट में ऐसा कहने का साहस किसी में नहीं था ৷ हम लोग ऐसे किसी भी अन्धविश्वास को नहीं मानते थे बल्कि ऐसा कहने वालों का विरोध भी करते थे । लेकिन गाँवों में यह अन्धविश्वास बहुत अधिक था ৷ छत्तीसगढ़ आने के बाद मैंने देखा कि यहाँ के गांवों में इतना अंधविश्वास है कि गाँव में कोई बीमारी फ़ैलने या किसी बच्चे की मृत्यु होने पर ऐसी ही किसी स्त्री को ‘टोनही’ करार दे दिया जाता है और उसे प्रताड़ित किया जाता है ৷ मैंने बाद में स्त्री की इस पीड़ा पर ‘डायन’ कविता लिखी थी ৷ उसमे रात्रि के अंतिम पहर में नग्नावस्था में नदी का जल लेने गई स्त्री का चित्रण करते हुए मेरे अवचेतन में बचपन का यही चित्र था ৷
बचपन में हम दोस्तों को उनके वर्ग या उनकी हैसियत से नहीं बल्कि उनके अपने जैसे बच्चे होने की वज़ह से चुनते हैं ৷ पांडुरंग़ ठाकरे का तीसरे नम्बर का बेटा मनोहर लगभग मेरे बराबर का था । उससे बड़ा अरुण थोड़ा मेन्टली रिटार्डेड था और हमेशा उसकी लार बहा करती थी, उसके बुद्धू होने के कारण सब उसे ‘ बुद्ध्या ‘ कह कर बुलाते थे । मेरी गली में मकान मालकिन पार्वती बाई चव्हाण की नातिन अन्नू, सामने वाली बाड़ी की बाईं ओर रहने वाले उरकुडा माहुले के बच्चे थे रामकिशन, राधाकिशन और प्रमिला यही सब मेरे बचपन के साथी थे । रामकिशन की एक निराश्रित मौसी भी थी जिसे सब मिलखी मौसी कहते थे । वह किसी स्किन डिसऑर्डर के कारण अंग्रेज़ों की तरह गोरी दिखाई देने लगी थी ৷ इतनी गोरी कि बड़ा होने के बाद मैं उसे ‘मिल्की मौसी ’ कहकर बुलाने लगा था ।
शरद कोकास
हमारी गली में अधिकांश निम्नमध्यवर्गीय लोग ही रहा करते थे । उनमें कुछ घर लोधी जाति के लोगों के थे जिनके उपनाम ठाकरे, माहुले और सव्वालाखे थे और उनकी भाषा छत्तीसगढ़ी से बहुत कुछ मिलती जुलती थी । घर के सामने एक बाड़ी थी जहाँ आगे चलकर मकान के दाहिनी ओर रहने वाले पाण्डुरंग ठाकरे के काका भोजराम ठाकरे ने मकान बनाया । जैसा कि गांवों के मकानों में होता है मकान बनने से पूर्व वहाँ एक बाड़ी थी जिसमे मचान बनाकर कद्दू की बेल लगाईं गई थी । उसके बगल में एक टीला था जिस पर पांडुरंग ठाकरे की गाय बन्धती थी । पांडुरंग ठाकरे की अपने ही घर में एक छोटे सी कम पूंजी में लगाई गई किराने की दुकान थी ৷ और
बचपन के उन दिनों में राजाओं महाराजाओं और परियों की कहानियाँ पढ़ने का शौक तो होता था लेकिन पत्रिकाएँ खरीदने के लिए जेब में पैसे नहीं होते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे की दुकान में आई रद्दी में मैं पत्रिकाएँ खोजता था और मुझे अचानक बच्चों की मशहूर पत्रिका चंदामामा दिख जाती थी ৷ उनके बरामदे में लकड़ी का एक झूला लगा था जिस पर बैठकर मैं ‘ चंदामामा ‘ पत्रिका की कहानियाँ पढ़ा करता था । उस समय बच्चों की पत्रिका चंदामामा बड़ी मशहूर थी ৷ इसमें राजाओं की कहानियाँ होती थीं, कुछ नीति परक, कुछ बोध कथाएँ यह पत्रिका दक्षिण से निकलती थी और उस समय तमिल के अलावा कई अन्य भाषाओं में आती थी ৷ इस पत्रिका में कलाकारों द्वारा कहानियों पर बनाये चित्र होते थे ৷ मज़े की बात यह कि कहानी भले ही उत्तर भारत के किसी नगर के बारे में हो वहाँ का राजा दक्षिण के राजाओं की तरह वेशभूषा और आभूषण धारण किये होता था ৷ आखिर चित्रकार तो दक्षिण के ही होते थे ।
चंदामामा के अलावा बाल पत्रिकाओं के घराने में पराग, नंदन, चम्पक जैसी पत्रिकाएँ भी प्रारंभ हो चुकी थीं कहीं कहीं लोटपोट पत्रिका भी मिल जाती थी ৷ यह पत्रिकाएँ नियमित पढ़ने को तो मिलती नहीं थी कभी कभार बैतूल आते जाते स्टेशन पर बाबूजी ख़रीद कर दे देते थे वर्ना ठाकरे किराना में आई रद्दी में तो मिल ही जाती थीं ৷
पांडुरंग ठाकरे थोड़ा ऊँचा सुनते थे और उनकी माँ उन्हें ‘बहरा‘ कहकर बुलाती थी सो उनकी किराने की दुकान भी ‘ किराना स्टोर्स ‘ की बजाय ‘‘बहरे की दुकान “ के नाम से प्रसिद्ध थी । पांडुरंग ठाकरे जितने ग़रीब थे उतने ही ग़रीब उनके ग्राहक भी थे, इसलिए उनकी दुकान बमुश्किल चल पाती थी । जब घर में दुकान नहीं चली तो एक दिन उन्होंने नुक्कड़ के खाली पड़े एक मकान में ,जिसे हम लोग बोम्बल्या भागवत का मकान कहते थे, की छपरी में अपनी दुकान लगा ली जिसके एक पटिये पर मैंने पिपरमेंट की मीठी गोली का मेहनताना लेकर चाक से लिख दिया था ‘ ठाकरे किराना स्टोर्स ‘ । लेकिन वहाँ भी उनकी दुकान नहीं चली तो वे अपनी दुकान समेट कर वापस घर आ गये ।
उनकी दुकान के बन्द होने का सबसे बड़ा कारण पास ही एक बड़ी दुकान का होना था जिसे ‘भाटया की दुकान’ कहते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे के पास इतनी पूंजी नहीं थी कि वे अपनी दुकान में अधिक सामान रख सकते ৷ जिसे उनके यहाँ वांछित सामान नहीं मिलता वह भाटया की दुकान चला जाता और फिर सारा सामान वहीं से खरीदने लगता ৷ धीरे धीरे इनके सभी ग्राहक वहाँ चले गए ৷ पूंजी का खेल किस तरह होता है यह बात मुझे उन्ही दिनों समझ में आ गई थी ৷ आज देश में मल्टी नेशनल कम्पनियाँ और माल्स किस तरह छोटे छोटे व्यवसायियों का धंधा चौपट कर रहे हैं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किस तरह इन छोटे व्यापारियों को उजाड़ रहा है इस बात को इस उदाहरण से भलीभांति समझा जा सकता है ৷
पांडुरंग ठाकरे के चार बच्चे थे अशोक, अरुण, मनोहर और मंगला । बाद में उनकी एक और बेटी हुई जो बहुत गोरी थी और जिसके बाल भूरे थे इस वज़ह से सभी उसे भूरी कहकर बुलाते थे । उनके घर में रहनेवाली एक वृद्धा के बारे में दबी जुबान में कहा जाता था कि वह जादू-टोना करती थी , हालाँकि प्रकट में ऐसा कहने का साहस किसी में नहीं था ৷ हम लोग ऐसे किसी भी अन्धविश्वास को नहीं मानते थे बल्कि ऐसा कहने वालों का विरोध भी करते थे । लेकिन गाँवों में यह अन्धविश्वास बहुत अधिक था ৷ छत्तीसगढ़ आने के बाद मैंने देखा कि यहाँ के गांवों में इतना अंधविश्वास है कि गाँव में कोई बीमारी फ़ैलने या किसी बच्चे की मृत्यु होने पर ऐसी ही किसी स्त्री को ‘टोनही’ करार दे दिया जाता है और उसे प्रताड़ित किया जाता है ৷ मैंने बाद में स्त्री की इस पीड़ा पर ‘डायन’ कविता लिखी थी ৷ उसमे रात्रि के अंतिम पहर में नग्नावस्था में नदी का जल लेने गई स्त्री का चित्रण करते हुए मेरे अवचेतन में बचपन का यही चित्र था ৷
बचपन में हम दोस्तों को उनके वर्ग या उनकी हैसियत से नहीं बल्कि उनके अपने जैसे बच्चे होने की वज़ह से चुनते हैं ৷ पांडुरंग़ ठाकरे का तीसरे नम्बर का बेटा मनोहर लगभग मेरे बराबर का था । उससे बड़ा अरुण थोड़ा मेन्टली रिटार्डेड था और हमेशा उसकी लार बहा करती थी, उसके बुद्धू होने के कारण सब उसे ‘ बुद्ध्या ‘ कह कर बुलाते थे । मेरी गली में मकान मालकिन पार्वती बाई चव्हाण की नातिन अन्नू, सामने वाली बाड़ी की बाईं ओर रहने वाले उरकुडा माहुले के बच्चे थे रामकिशन, राधाकिशन और प्रमिला यही सब मेरे बचपन के साथी थे । रामकिशन की एक निराश्रित मौसी भी थी जिसे सब मिलखी मौसी कहते थे । वह किसी स्किन डिसऑर्डर के कारण अंग्रेज़ों की तरह गोरी दिखाई देने लगी थी ৷ इतनी गोरी कि बड़ा होने के बाद मैं उसे ‘मिल्की मौसी ’ कहकर बुलाने लगा था ।
शरद कोकास
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