चुनाव के दिन लोगों का उत्साह आसमान छू रहा था । ढाई साल बाद ही जनता को पुनः वोट डालने का अवसर प्राप्त हुआ था । दोनों तिथियों में सम्पूर्ण संसदीय क्षेत्र में आशा के विपरीत मतदान हुआ और मुहर लगे हुए बैलेट पेपर लोहे की मजबूत मतपेटियों में बंद हो गए । एक सप्ताह बाद भंडारा मुख्यालय में मतगणना प्रारंभ हुई । फिर आई मई माह की पंद्रह तारीख । मतगणना स्थल के बाहर दूर दूर तक लाउडस्पीकर लगे थे जिनसे हर राउंड के बाद घोषणा की जा रही थी । दूरस्थ गांवों में चौपालों पर भीड़ इकठ्ठा थी और लोग आल इंडिया रेडियो के नागपुर केंद्र से आती हवा में घुली ध्वनि तरंगों को ताम्बे के एरियल से जुड़े वाल्व वाले रेडियो सेट में पकड़कर सुनने की कोशिश कर रहे थे । जहाँ यह सुविधा नहीं थी वहाँ अगले दिन आने वाले अखबार या किसी हरकारे की राह देखी जा रही थी ।
अंततः चुनाव परिणाम की अंतिम घोषणा हुई । कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव कार्यालयों में लक्ष्मी बम फोड़े जाने लगे, पेढ़े बाँटे जाने लगे । यहाँ हवा में उड़ता हुआ गुलाल रौशनियों को गुलाबी आभा प्रदान कर रहा था लेकिन वहीं कहीं सदियों से पीड़ित शोषित जनता की अँधेरी बस्तियों में छाया अँधेरा और गहरा गया था । उनके उजाले की एकमात्र आस बाबासाहेब डॉ.भीमराव आम्बेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से चुनाव हार गए थे ।
ज़िला कार्यालय की इमारत पर लगे लाउड स्पीकर से उस दिन की सबसे दुखद ख़बर गूँज रही थी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी डॉ.बी. आर.आंबेडकर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी भाऊराव बोरकर से आठ हज़ार वोटों से चुनाव हार चुके हैं ৷ यह चुनाव परिणाम सबकी आशाओं के विपरीत था ৷ आरक्षित सीट से कांग्रेस के भाऊराव बोरकर को एक लाख इकतालीस हज़ार एक सौ चौसठ वोट मिले थे वहीं बाबासाहेब के वोटों की संख्या थी एक लाख बतीस हज़ार चार सौ त्र्यासी । मात्र आठ हज़ार छह सौ इक्यासी वोटों से उनकी हार हुई थी । जिन मतपत्रों पर उनके नाम के आगे मुहर नहीं लगी थे वे मतपत्र किनके थे इस बात को सब जानते थे ।
वहीं सामान्य सीट के परिणाम भी घोषित हो चुके थे । यहाँ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता एक लाख उनन्चास हज़ार छह सौ छत्तीस वोट पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के पूनमचंद राका पर विजय प्राप्त कर चुके थे । राका को एक लाख चोवीस हज़ार दो सौ सडसठ मत प्राप्त हुए थे । इस तरह अशोक मेहता पच्चीस हज़ार वोटो से यह चुनाव जीत गए थे । अपने प्रतीक रूप में झोपड़ी जीत गई थी लेकिन झोपड़ियों में रहने वाले दबे,कुचले,उपेक्षित लोग हार गए थे ।
भंडारा के
निवासियों के लिए बाबासाहेब आंबेडकर के हार जाने की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन
सत्य सर्वविदित था । दिनकर राव के घर में सारे कार्यकर्त्ता इकठ्ठे हुए और
बाबासाहेब की हार के कारणों का विश्लेषण किया गया ৷ जैसा कि भंडारा के वरिष्ठ कवि पत्रकार अमृत बंसोड और दिनकर राव के पुत्र
सुमंत बताते हैं बाबासाहेब के साथ धोखा हुआ था ৷ मुंबई की कहानी फिर यहाँ दोहराइ गई थी । बाबासाहेब ने मनरो स्कूल के मैदान
में अपने सहयोगियों से एक वोट अशोक मेहता को देने की सार्वजानिक अपील की थी,उनके
आग्रह पर मतदाताओं ने ऐसा किया भी इसलिए
उन्हें डेढ़ लाख वोट मिले लेकिन अशोक मेहता के सपोर्टर्स ने सामान्य सीट के लिए एक
वोट तो अशोक मेहता को दिया लेकिन आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब को अपना वोट नहीं
दिया । फलस्वरूप कांग्रेस के उम्मीदवार भाऊराव बोरकर चुनकर आ गए अन्यथा बाबासाहेब
यह चुनाव अवश्य जीत जाते ৷ आखिर आठ हज़ार वोटों का अंतर क्या मायने रखता है ৷ कांग्रेस के बोरकर भी एस सी कम्युनिटी से आते थे ,
इस आधार पर भी बहुत से वोट उन्हें मिले ।
मध्यप्रांत के इस महत्वपूर्ण ज़िले भंडारा की राजनीति में अगले कुछ सालों में अनेक परिवर्तन हुए ৷ बाबासाहेब के साथी नाशिक राव तिरपुडे जो दलित वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ते हुए सन अड़तालीस में जेल गए थे,बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए ৷ आचार्य कृपलानी के सहयोगी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव अशोक मेहता भी समाजवादी से कांग्रेसी हो गए और दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिन्ह पर उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर भंडारा से ही आगामी चुनाव लड़ा ৷ बाबासाहेब के सिपहसालार दिनकर राव रहाटे अपना सब कुछ त्यागकर अंत तक पीड़ित शोषित वर्ग की सेवा में लगे रहे, साहूकार के पास घर गिरवी रखकर कर्ज लेकर बच्चों का पालन पोषण करते रहे ৷ उनकी आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि वे कर्ज पटा पाते , अतः उन्नीस सौ पचहत्तर में उनका वह घर भी कर्ज की भेंट चढ़ गया ৷
भाऊराव बोरकर भी सत्ता का सुख अधिक दिनों तक नहीं भोग सके और छह माह पश्चात एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया ৷ उसके एक साल बाद उन्नीस सौ पचपन में भंडारा में पुनः उपचुनाव हुआ जिसमे सहानुभूति लहर के कारण भाऊराव बोरकर की पत्नी, कांग्रेस की प्रत्याशी अनुसूया बोरकर विजयी रही ৷ बाबासाहेब तब तक अपने नए मिशन में लग चुके थे और जातिवादी ताकतों के खिलाफ़ दलित पीड़ित शोषित जनता को लामबंद कर रहे थे ৷ अंततः उन्नीस सौ छप्पन के अक्तूबर माह की चौदह तारीख को अपने सात लाख अनुयायियों के साथ नागपुर की दीक्षा भूमि पर एक भव्य समारोह में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया ৷
अक्टूबर 56 मे नागपूर मे बाबासाहेब
स्वास्थ्य उनका ठीक नहीं चल रहा था, जीवन भर के संघर्ष को कहीं न कहीं विराम लगना ही था । दो माह पश्चात ही छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को उनकी अंतिम सांस के साथ उनके जीवन का यह सफ़र समाप्त हुआ ৷
शरद कोकास
















