12 मई 2026
34. बाबासाहेब के बाद महाराष्ट्र
बजबजाती नालियों की बदबू से भरी गलियाँ जस की तस थीं । इन गलियों में रहने वाले कभी अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए अपनी कमर में झाड़ू बांधकर चला करते थे ताकि किसी सवर्ण का पैर उन पर न पड़े और इस अपराध का जवाब उन्हें अपनी पीठ पर कोड़े खाकर न देना पड़े । सड़क पर थूकने की भी जिन्हें इज़ाज़त नहीं थी जो थूक इकठ्ठा करने के लिए गले में मटकी बांधे हुए चलते थे, उन्होंने अब अपनी मटकियाँ फोड़ दी थीं । इन बस्तियों में अब बाबासाहेब का नारा गूँज रहा था “शिक्षित हो,संगठित हो, संघर्ष करो ।“ अपने जीवनकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही वे जान गए थे कि इस देश के निवासियों की पहली ज़रूरत है शिक्षा । असहयोग के आवरण में लिपटे विरोध के बावजूद इसका सूत्रपात हो चुका था ।लेकिन यह पहला शंखनाद नहीं था । उनसे भी पहले सन अठारह सौ अड़तालीस में ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने महाराष्ट्र में स्त्री शिक्षा की शुरुआत कर दी थी l पुणे जैसे शहर में स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए एक स्कूल खोलना अपने आप में एक विद्रोह था । उस समय स्त्री शिक्षा का अधिकार जैसी कोई बात किसी की कल्पना में भी नहीं थी । पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उकसाना भी एक तरह का सामाजिक अपराध था ।
सावित्री बाई जब अपने घर से निकलकर लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं तो स्त्री शिक्षा के विरोधी सड़क के दोनों ओर खड़े हो जाते थे । वे केवल शब्दों में लिपटी हुई गन्दगी ही नहीं बल्कि गोबर, कीचड़ और मैला जैसी गन्दगी भी उन पर फेंकते थे । सावित्रीबाई उन्हें कोई जवाब नहीं देतीं । वे अपने साथ एक थैली में धुली हुई एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थीं । स्कूल पहुंचकर पहले वे अपनी साड़ी बदलतीं और कक्षा में जाकर पितृसत्ता द्वारा शोषित उन स्त्रियों के मस्तिष्क में शिक्षा के बीज बोतीं । उन्हें ज्ञात था कि उनका लगाया हुआ यह पौधा एक दिन महाविशाल वृक्ष बनेगा । इस बात में कोई दो राय नहीं कि महाराष्ट्र के इस समाज ने स्त्री शिक्षा के लिए संघर्ष किया है इसीलिए आज स्त्री शिक्षा के मामले में महाराष्ट्र अग्रणी है ।
महाराष्ट्र का निर्माण यद्यपि एक मई उन्नीस सौ साठ को हुआ लेकिन उससे पूर्व ही गांवों में शिक्षा संस्थानों का खुलना प्रारंभ हो चुका था । ब्रिटिश काल से चली आ रही शिक्षा प्रणाली में देशकालानुसार परिवर्तन कर उसे लागू करने का ज़िम्मा राजनीतिक इच्छा शक्ति पर निर्भर करता था । मराठा साम्राज्यों के समय प्रारंभ की गई मराठी शालाएँ भी चल रही थीं । शिक्षा के स्तर तथा मानकों की कोई बात ही नहीं थी , औसत दर्जे की शिक्षा मिल जाए इतना ही काफी था । निजी स्कूल न के बराबर थे और शिक्षा को मूलभूत अधिकारों में शामिल करने की संवैधानिक व्यवस्था पर अनेक मत मतांतर थे । फिर भी महाराष्ट्र अपनी प्रगतिशील सोच के कारण शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तरक्की कर रहा था ।
स्त्री शिक्षा की स्थिति में भी परिवर्तन आ चुका था लेकिन पितृसत्तात्मक विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया था । धर्म परिवर्तन का अर्थ सब कुछ त्याग देना नहीं था, पत्थर,मिट्टी और पीतल के बने देवी देवता पूजाघरों में विद्यमान थे बस उनके साथ आंबेडकर और बुद्ध की प्रतिमाएँ और जुड़ गई थीं । मस्तिष्क में वैचारिक परिवर्तन नहीं हुआ था इसलिए अवैज्ञानिक विचार अभी जीवन से चिपके हुए थे ।
साड़ी में सजी धजी लडकियाँ अपनी लाल पीले रिबन से बंधी अपनी चोटियाँ लहराते हुए स्कूल जाने लगी थीं और विद्यार्थिनी कहलाने लगी थीं । लेकिन स्कूल से आने के बाद वे फिर छात्रा से बेटी और बहन बन जाती थीं और पिताओं,भाईयों और धर्मगुरुओं के बनाये समाज के नियमों से संचालित होने लगती थीं । समय अपनी क्रूर हँसी हँस रहा था ..वह जानता था कि समाज उससे अधिक तेज़ गति से चलकर उससे आगे नहीं हो सकता ।
भंडारा में अभी इतनी बरसात नहीं हुई थी शहर की दीवारों पर चुनाव के दौरान नील से लिखी गई प्रत्याशियों को वोट देने की अपीलें और चुनाव चिन्ह के रेखांकन धुल जाएँ । आज़ादी के समय ख़रीदी गई लोगों की छतरियों में अनगिनत छेद हो चुके थे, अभावों का आसमान अपनी बुलंदी में उन छेदों से झाँक रहा था और उनकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ा रहा था । कपसीले बादलों में दिल्ली के लाल किले से की गई घोषणाओं और विकास के वादों का अस्पष्ट सा अक्स था ।
जिससे तारीख का एक पन्ना रोज़ फाड़ दिया जाता है ऐसे टीन पर छपे लक्ष्मी गणेश की फोटो वाले वाल कैलेण्डर से सन छप्पन का इकतीस दिसंबर वाला आख़िरी पन्ना फाड़ा जा चुका था । गाँवों में बरगद के नीचे चौपाल पर रेडिओ बज रहे थे । समाचारों में बताया जा रहा था कि आल इंडिया रेडिओ अब आकाशवाणी है । प्रथम पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य आत्मनिर्भरता, कृषि का विकास, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण तथा शरणार्थियों की व्यवस्था आदि अब पूर्ण हो चुका है ।
दूसरी पंचवर्षीय योजना प्रारंभ हो चुकी थी और नेहरू जी के कोट में लगे लाल गुलाब की खुशबू औद्योगिक विकास, घरेलु उत्पादन जैसे शब्दों के साथ घर घर तक पहुँच रही थी । भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला जैसे इस्पात संयंत्रों की ताज़ा ताज़ा बनी पहली ब्लास्ट फर्नेस काला धुआं उगलने लगी थी ।
11 मई 2026
33.आंबेडकर की पराजय सदी का एक आश्चर्य
चुनाव के दिन लोगों का उत्साह आसमान छू रहा था । ढाई साल बाद ही जनता को पुनः वोट डालने का अवसर प्राप्त हुआ था । दोनों तिथियों में सम्पूर्ण संसदीय क्षेत्र में आशा के विपरीत मतदान हुआ और मुहर लगे हुए बैलेट पेपर लोहे की मजबूत मतपेटियों में बंद हो गए । एक सप्ताह बाद भंडारा मुख्यालय में मतगणना प्रारंभ हुई । फिर आई मई माह की पंद्रह तारीख । मतगणना स्थल के बाहर दूर दूर तक लाउडस्पीकर लगे थे जिनसे हर राउंड के बाद घोषणा की जा रही थी । दूरस्थ गांवों में चौपालों पर भीड़ इकठ्ठा थी और लोग आल इंडिया रेडियो के नागपुर केंद्र से आती हवा में घुली ध्वनि तरंगों को ताम्बे के एरियल से जुड़े वाल्व वाले रेडियो सेट में पकड़कर सुनने की कोशिश कर रहे थे । जहाँ यह सुविधा नहीं थी वहाँ अगले दिन आने वाले अखबार या किसी हरकारे की राह देखी जा रही थी ।
अंततः चुनाव परिणाम की अंतिम घोषणा हुई । कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव कार्यालयों में लक्ष्मी बम फोड़े जाने लगे, पेढ़े बाँटे जाने लगे । यहाँ हवा में उड़ता हुआ गुलाल रौशनियों को गुलाबी आभा प्रदान कर रहा था लेकिन वहीं कहीं सदियों से पीड़ित शोषित जनता की अँधेरी बस्तियों में छाया अँधेरा और गहरा गया था । उनके उजाले की एकमात्र आस बाबासाहेब डॉ.भीमराव आम्बेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से चुनाव हार गए थे ।
ज़िला कार्यालय की इमारत पर लगे लाउड स्पीकर से उस दिन की सबसे दुखद ख़बर गूँज रही थी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी डॉ.बी. आर.आंबेडकर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी भाऊराव बोरकर से आठ हज़ार वोटों से चुनाव हार चुके हैं ৷ यह चुनाव परिणाम सबकी आशाओं के विपरीत था ৷ आरक्षित सीट से कांग्रेस के भाऊराव बोरकर को एक लाख इकतालीस हज़ार एक सौ चौसठ वोट मिले थे वहीं बाबासाहेब के वोटों की संख्या थी एक लाख बतीस हज़ार चार सौ त्र्यासी । मात्र आठ हज़ार छह सौ इक्यासी वोटों से उनकी हार हुई थी । जिन मतपत्रों पर उनके नाम के आगे मुहर नहीं लगी थे वे मतपत्र किनके थे इस बात को सब जानते थे ।
वहीं सामान्य सीट के परिणाम भी घोषित हो चुके थे । यहाँ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता एक लाख उनन्चास हज़ार छह सौ छत्तीस वोट पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के पूनमचंद राका पर विजय प्राप्त कर चुके थे । राका को एक लाख चोवीस हज़ार दो सौ सडसठ मत प्राप्त हुए थे । इस तरह अशोक मेहता पच्चीस हज़ार वोटो से यह चुनाव जीत गए थे । अपने प्रतीक रूप में झोपड़ी जीत गई थी लेकिन झोपड़ियों में रहने वाले दबे,कुचले,उपेक्षित लोग हार गए थे ।
भंडारा के
निवासियों के लिए बाबासाहेब आंबेडकर के हार जाने की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन
सत्य सर्वविदित था । दिनकर राव के घर में सारे कार्यकर्त्ता इकठ्ठे हुए और
बाबासाहेब की हार के कारणों का विश्लेषण किया गया ৷ जैसा कि भंडारा के वरिष्ठ कवि पत्रकार अमृत बंसोड और दिनकर राव के पुत्र
सुमंत बताते हैं बाबासाहेब के साथ धोखा हुआ था ৷ मुंबई की कहानी फिर यहाँ दोहराइ गई थी । बाबासाहेब ने मनरो स्कूल के मैदान
में अपने सहयोगियों से एक वोट अशोक मेहता को देने की सार्वजानिक अपील की थी,उनके
आग्रह पर मतदाताओं ने ऐसा किया भी इसलिए
उन्हें डेढ़ लाख वोट मिले लेकिन अशोक मेहता के सपोर्टर्स ने सामान्य सीट के लिए एक
वोट तो अशोक मेहता को दिया लेकिन आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब को अपना वोट नहीं
दिया । फलस्वरूप कांग्रेस के उम्मीदवार भाऊराव बोरकर चुनकर आ गए अन्यथा बाबासाहेब
यह चुनाव अवश्य जीत जाते ৷ आखिर आठ हज़ार वोटों का अंतर क्या मायने रखता है ৷ कांग्रेस के बोरकर भी एस सी कम्युनिटी से आते थे ,
इस आधार पर भी बहुत से वोट उन्हें मिले ।
मध्यप्रांत के इस महत्वपूर्ण ज़िले भंडारा की राजनीति में अगले कुछ सालों में अनेक परिवर्तन हुए ৷ बाबासाहेब के साथी नाशिक राव तिरपुडे जो दलित वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ते हुए सन अड़तालीस में जेल गए थे,बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए ৷ आचार्य कृपलानी के सहयोगी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव अशोक मेहता भी समाजवादी से कांग्रेसी हो गए और दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिन्ह पर उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर भंडारा से ही आगामी चुनाव लड़ा ৷ बाबासाहेब के सिपहसालार दिनकर राव रहाटे अपना सब कुछ त्यागकर अंत तक पीड़ित शोषित वर्ग की सेवा में लगे रहे, साहूकार के पास घर गिरवी रखकर कर्ज लेकर बच्चों का पालन पोषण करते रहे ৷ उनकी आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि वे कर्ज पटा पाते , अतः उन्नीस सौ पचहत्तर में उनका वह घर भी कर्ज की भेंट चढ़ गया ৷
भाऊराव बोरकर भी सत्ता का सुख अधिक दिनों तक नहीं भोग सके और छह माह पश्चात एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया ৷ उसके एक साल बाद उन्नीस सौ पचपन में भंडारा में पुनः उपचुनाव हुआ जिसमे सहानुभूति लहर के कारण भाऊराव बोरकर की पत्नी, कांग्रेस की प्रत्याशी अनुसूया बोरकर विजयी रही ৷ बाबासाहेब तब तक अपने नए मिशन में लग चुके थे और जातिवादी ताकतों के खिलाफ़ दलित पीड़ित शोषित जनता को लामबंद कर रहे थे ৷ अंततः उन्नीस सौ छप्पन के अक्तूबर माह की चौदह तारीख को अपने सात लाख अनुयायियों के साथ नागपुर की दीक्षा भूमि पर एक भव्य समारोह में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया ৷
अक्टूबर 56 मे नागपूर मे बाबासाहेब
स्वास्थ्य उनका ठीक नहीं चल रहा था, जीवन भर के संघर्ष को कहीं न कहीं विराम लगना ही था । दो माह पश्चात ही छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को उनकी अंतिम सांस के साथ उनके जीवन का यह सफ़र समाप्त हुआ ৷
शरद कोकास
10 मई 2026
32.बाबासाहेब ने किसके लिए कहा था "यह अशोक नहीं सम्राट अशोक हैं"
| भाषण देते हुए डॉ आंबेडकर |
कल मैंने आपको बताया था कि मुंबई से चुनाव हार जाने के पश्चात किस तरह बाबासाहेब अम्बेडकर को 1954 मे पुनः भंडारा लोकसभा से उपचुनाव मे शामिल होकर दिल्ली मे लोकसभा मे जाने का अवसर मिला। चुनाव के पहले भंडारा मे किस तरह उनके चुनाव प्रचार की तैयारी चल रही थी , कहाँ दफ्तर बनाया गया था , कहाँ चुनावी सभा हुई थी , इस बात को जानिए विस्तार से इस पोस्ट मे ।
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| प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता |
बाबासाहेब बोलने के लिए खड़े हुए । करतल ध्वनि से उनका स्वागत हुआ । उन्होंने जनता का अभिवादन स्वीकार किया । वे जनता के मन की बात जानते थे । भंडारा के इतिहास से भी वे वाकिफ़ थे । जनता के दुखों पर मरहम लगाते हुए उन्होंने अपनी बात सबके सामने रखी ।
उन्होंने स्पष्ट किया शिड्फेयूल कास्डट फेडरेशन का एक ही उद्देश्य है जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त करना, युवाओं के लिए रोजगार की और आम जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का समुचित प्रबंध करना ।यद्यपि उन दिनों सभी पार्टियों के घोषणा पत्र में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ यही बातें हुआ करती थीं ।
देखिए कितने उदारमना थे बाबासाहेब
मुख्य मुख्य बातें कहने के बाद उन्होंने जनता के मन में गाँठ की तरह बंधी हुई वोट के बहिष्कार की बात को ध्यान में रखते हुए कहा
“यद्यपि मुंबई में हमने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से धोखा खाया है लेकिन हम किसी को धोखा देने के बारे में सोच भी नहीं सकते ।“
लोगों के अशोक मेहता को वोट न देने की बात पर उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो कुछ नहीं कहा लेकिन परोक्ष रूप से इतना अवश्य कहा कि “हमने संविधान में जनतांत्रिक चुनाव की यह व्यवस्था की है । यह भी कहा है कि हमारा वोट बहुत महत्वपूर्ण है, यह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए ।“
भंडारा की जनता उनकी अपनी थी, यह उनका अपना परिवार था, उनके दुःख उनके अपने थे । उनके पूर्वजों ने भी वही अपमान और पीड़ा सही थी । जनता उनकी बात के स्थूल अर्थ को समझ नहीं पाई अतः अवसर देखकर उन्होंने पत्र का उल्लेख करना आवश्यक समझा “ मुझे सुचेता कृपलानी का पत्र प्राप्त हुआ है जिसमे उन्होंने भंडारा की जनता से सहयोग की अपेक्षा की है ।“
| सुचेता कृपलानी |
“भंडारा की इस सामान्य सीट से चुनाव लड़ने वाले अशोक समझ लीजिये हमारे लिए सम्राट अशोक हैं । बेहतर होगा कि हम अपना एक वोट व्यर्थ न गवाएँ ।“
महाराष्ट्र के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं उस समय नागपुर से निकलने वाले प्रमुख अखबार ‘तरुण भारत‘ ने इक्कीस अप्रेल चौवन की इस सभा में दिया गया बाबासाहेब का यह व्याख्यान विस्तार से प्रकाशित किया था ।
अब जानिए उन अनजान लोगों के नाम जिन्होंने बाबासाहेब को चुनाव मे प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग दिया ( यह जानकारी मुझे बाबासाहेब के चुनाव प्रभारी दीनदयाल रहाटे के पुत्र और मेरे मित्र सुमंत रहाटे,अमृत बंसोड, और भंडारा के अन्य वरिष्ठ लोगों से प्राप्त हुई है )
बाबासाहेब का यह व्याख्यान भंडारा में उनके पक्ष में वातावरण निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था ৷ फेडरेशन के अध्यक्ष दिनकर राव के मित्र भानुदास बंसोड़ उनके सक्रिय सहयोगी थे । हुसैन रामटेके उनकी रोज़ के मंडली के सदस्य थे । हुसैन रामटेके सिर्फ नाम से ही हुसैन थे लेकिन मुस्लिम समुदाय के दलित समाज में भी उनकी काफी पैठ थी ৷
भोजराज रामटेके सी पी आई के कार्यकर्त्ता थे और गोंदिया में रहते थे लेकिन वे भी बाबासाहेब का चुनाव प्रचार करने के लिए आ गए थे ৷
भंडारा में ही शुक्रवारी मोहल्ले में रहने वाले मेंढे पहलवान अपने अखाड़े के साथियों के साथ उनका सहयोग करने आ गए थे ৷
स्टेशन के निकट वरठी के रहने वाले नारायण राव फुले उनके सहयोगी थे वहीं भंडारा के श्यामचरण नंदागौली ने युवाओं की एक टीम खड़ी कर ली थी ৷
अ.शि. रंगारी और करडी के रहने वाले शेंडे बाबू भी दल बल के साथ उपस्थित हो गए ৷
यह ऐसा उपचुनाव था जिसमे जवाहर लाल नेहरू को भी आना पड़ा
सामान्य सीट के लिए यहीं पर कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रचार भी ज़ोरों पर था । देश के प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की थी अतः वह चाहती थी कि भंडारा से उनकी सीट बरकरार रहे फिर इस बार तो आम्बेडकर यहाँ से चुनाव लड़ रहे थे । कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरु को भी यहाँ आना पड़ा । आंबेडकर की सभा की तरह भंडारा के निकट गोंदिया में नेहरू की विशाल सभा हुई जिसमे देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना का क्रियान्वयन और कृषि, औद्योगिक व वाणिज्यिक विकास के मुद्दे दोहराए गए ।
हाथी चुनाव चिन्ह बाबासाहेब को सबसे पहली बार मिला था
बाबासाहेब का चुनाव चिन्ह ‘हाथी’ भंडारा की दीवारों पर दिखाई देने लगा था ৷ बच्चे अपनी कमीज़ की जेब पर हाथी छाप,बैल जोड़ी छाप,झोपडी छाप के बिल्ले लगाकर लाउड स्पीकर लगे रिक्शों के पीछे दौड़ते और फेंके गए बिल्ले और पर्चे बटोरते ৷ आज की तारीख में हाथी यह चुनाव चिन्ह बाबासाहेब के आदर्शों पर चलने वाली बहुजन समाज पार्टी के पास है । यह चुनाव चिन्ह उस समय उन दलित, शोषित, पीड़ित लोगों को उनकी ताकत का अहसास दिलाता था ।
कांग्रेस का चुनाव चिन्ह उन दिनों दो बैलों की जोड़ी था जिस पर 1952 से 1969 तक कॉंग्रेस चुनाव लड़ती रही जो विभाजन के बाद 1977 मे बाद में गाय बछड़ा हुआ और 1977 मे हाथ या पंजे पर आकर स्थिर हो गया ।
इस चुनाव चिन्ह पर कांग्रेस के दो उम्मीदवार दो वर्ग एक सामान्य एक आरक्षित से चुनाव लड़ रहे थे । सामान्य वर्ग से अशोक मेहता की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को झोपड़ी निशान मिला था ।
बाबासाहेब के भंडारा के कार्यकर्ताओं की जन सभाओं में भीड़ उमड़ने लगी थी ৷ वे सभी आसपास के क्षेत्रों में दौरा करने लगे । भंडारा के मेरे मित्र और दिनकर राव के भतीजे भगवान रहाटे बताते हैं कि उनकी माँ सुभद्रा बाई अपनी तमाम सखी सहेलियों के साथ उनके भाषण सुनने जाती थी ৷ भगवान उस समय माँ के पेट में थे और दिनकर राव के बेटे सुमंत का जन्म नहीं हुआ था ৷ पूरे भंडारा संसदीय क्षेत्र में जाने कितने स्थानों पर सभाएँ हुई और लोगों ने संकल्प लिया, चाहे जो हो इस बार बाबासाहेब को जिताना ही है । यह चुनाव उनके लिए आत्मसम्मान के प्रश्न के अलावा एक चुनौती भी था ।
लेकिन बाबासाहेब के दुश्मन यहाँ भी थे
भंडारा के लोग जात पात,भेदभाव, ऊँच नीच सब भूलकर बाबासाहेब का तन मन धन से साथ दे रहे थे । लेकिन भंडारा का एक बहुत बड़ा भद्र वर्ग उनके साथ नहीं था ৷ यह वह वर्ग था जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही अपने आपको अंग्रेजों का उत्तराधिकारी घोषित कर चुका था ৷ जाति और वर्ण के संस्कार जिसकी नसों में ज़हर की तरह फ़ैल चुके थे जो अब भी बाहरी इलाके में बनी इन बस्तियों में रहने वालों को हिकारत की नज़रों से देखता था ৷ बाबासाहेब की असली लड़ाई व्यवस्था के साथ साथ इन लोगों से भी थी ৷ लेकिन वे संवैधानिक रूप से चुनाव जीतकर एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी यह लड़ाई लड़ना चाहते थे ৷ आखिर संविधान में यह व्यवस्था उन्होंने ही तो की थी ৷
इसके अतिरिक्त भंडारा में अपने आप को परंपरागत कांग्रेसी मानने वाला भी एक वर्ग था जो सैद्धांतिक रूप से बाबासाहेब को पसंद करता था, उनकी विद्वता का सम्मान करता था और स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये गए उनके कार्यों की सराहना भी करता था । इनमे गाँधी और नेहरू के अनुयायियों के साथ साथ अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे ।
यह सभी कांग्रेसजन बाबासाहेब को चाहते थे लेकिन उनका कहना यही था कि अगर वे कांग्रेस से चुनाव लड़ते तो वे उनका साथ अवश्य देते ।
विशेष बात यह कि कॉंग्रेस का विरोधी होने के कारण इस चुनाव मे भारतीय जनसंघ भी उनका सहयोगी था ।
यह एक ऐसा स्वप्न था जिसके घटित होने की संभावना प्रारंभ में ही दम तोड़ चुकी थी ।
( शेष अगले अंक मे, यह इतिहास आपको कैसा लगा अवश्य बताएं )
आपका
शरद कोकास
8 मई 2026
31.नौतलाव में बाबासाहेब का भाषण
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| पूर्व का नौतलाव आज का दशेरा मैदान और कब्रस्तान |
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| पटेल जी का मकान |
| अब यहाँ रावण जलाया जाता है |
यह वाक्य अब केवल भंडारा रोड स्टेशन पर सुमधुर स्वर में किये जा रहे अनाउंसमेंट में सुनाई देता है । कभी अपने जल के साथ अठखेलियाँ करने वाली नर्म ज़मीन प्लाटों में बंटकर बड़े बड़े मकानों की नींव के नीचे दफ्न होती जा रही है । ईदगाह आज भी वहीं पर है ।
२१ अप्रेल १९५४ के दिन ऐसा क्या हुआ था ?
वह बुधवार का दिन था । तारीख इक्कीस माह अप्रेल सन उन्नीस सौ चौवन । नउतलाव मैदान भीड़ से खचाखच भरा हुआ था । भंडारा के इतिहास में वह एक अभूतपूर्व दिन था उस दिन यहाँ बाबासाहेब आम्बेडकर की जंगी चुनावी सभा होने वाली थी । भंडारा शहर के आसपास के सैकड़ों गांवों से जाने कितने लोग पैदल पैदल, साइकिलों से या बैलगाड़ियों से आये थे । इन्ही में एक थे ग्राम माडगी में रहने वाले कृषक और बीड़ी कामगार प्रह्लाद गोस्वामी जो बाईस किलोमीटर दूर से अपनी पत्नी प्रमिला के साथ पैदल चलकर बाबासाहेब की बात सुनने आये थे । (गोस्वामी जी के पुत्र श्री एस पी गोस्वामी अभी फेसबुक पर हैं और मेरे मित्र हैं )
बाबासाहेब आंबेडकर इस चुनाव में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की और से प्रत्याशी थे । फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने तम्बुओं में और घरों में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की थी । वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था हालाँकि वह महज मेला नहीं था ।
बाबासाहेब के अलावा अन्य प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार भी ज़ोरों से चल रहा था । भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से भी दो सांसद चुने जाने थे एक सामान्य वर्ग से एक आरक्षित वर्ग से । प्रत्येक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी । बाबासाहेब आंबेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं यह बात पूरे देश में फ़ैल चुकी थी । देश के सभी बड़े बड़े नेताओं की निगाह इस चुनाव पर थी ।
अब देखिये इस चुनाव में मुकाबला कैसा था
आरक्षित सीट
शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से डॉ.भीमराव आंबेडकर
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी से अम्बाडी गाँव के भाउराव बोरकर
सामान्य सीट
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता
विरुद्ध
कांग्रेस पार्टी के पूनमचंद राका
देखिये पॉलिटिक्स कैसी होती है
भंडारा आने से पूर्व बाबासाहेब को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य सुचेता कृपलानी का पत्र मिला था जिसमे उन्होंने मुंबई के चुनावों में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी द्वारा उन्हें पूर्ण सहयोग दिए जाने के बावजूद उनकी विजय न होने पर खेद व्यक्त किया था । पत्र का आशय यह था कि मुंबई में जो हुआ सो हुआ लेकिन भंडारा में अशोक मेहता जैसे विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजसेवी व्यक्ति उनकी पार्टी से खड़े हैं । उनके विरुद्ध पूनमचंद राका नामक उम्मीदवार हैं जिनकी छवि जनता के बीच किसी समाजसेवक या राजनैतिक कार्यकर्त्ता के रूप में मेहता जी से कम है । यदि बाबासाहेब के सहयोग से एक सीट अशोक मेहता जीत जाते हैं तो भंडारा के लिए वे एक अच्छे सांसद साबित होंगे तथा अपनी विद्वता,ज्ञान और समझ से वे भंडारा की स्थिति को लेकर संसद में उचित प्रश्न भी रख सकेंगे ।
बाबासाहेब इस सत्य से अवगत हो चुके थे कि मुंबई के प्रथम लोकसभा चुनावों (1951-52) में उनकी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को बहुत सहयोग दिया था किन्तु प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स की ओर से उन्हें यथेष्ट सहयोग नहीं मिला था । उनकी हार के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था । वहीं कहीं सुचेता कृपलानी की अपील भी उनके मन में उमड़ घुमड़ रही थी
लेकिन जनता के मन में क्या था देखिये
भंडारा की जनता की राजनीतिक समझ कहीं बेहतर थी । जनता इस सत्य से भलीभांति वाकिफ़ थी कि उन्नीस सौ बावन के चुनावों में बाबासाहेब को मुंबई में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स के वोट नहीं मिले थे । इस वज़ह से उनके मन में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रति गुस्सा भी था ।
इसके बाद क्या हुआ ,सभा में बाबासाहेब ने क्या कहा और चुनाव में क्या हुआ यह अगली किश्तों में पढ़िए
आपका
शरद कोकास
6 मई 2026
30.बाबासाहेब के हाथी ,बैल जोड़ी और झोपडी में टक्कर
उन्नीस सौ इक्यावन-बावन के प्रथम लोकसभा चुनाव में मध्य प्रांत की भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से सामान्य सीट के लिए से कांग्रेस के चतुर्भुज जसानी ने ज्वालाप्रसाद दुबे को हराकर संसद का चुनाव जीता था वहीं आरक्षित सीट से कांग्रेस के तुलाराम साखरे निर्वाचित हुए थे ।
ठवरे के नामांकन रद्द होने के पीछे यह कारण था कि उन्होंने स्वयं को श्यिडूल्ड कास्ट घोषित कर फॉर्म भरा था जबकि वे महानुभाव पंथ से आते थे । यह पंथ जात-पात नहीं मानता था । चुनाव के बाद ठवरे ने इस बात को लेकर चैलेंज किया कि पंथ भले जात-पात न माने लेकिन जाति तो उनकी एस सी है । कोर्ट ने विभिन्न पक्षों पर विचार करने के पश्चात उनके पक्ष में निर्णय दिया और उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकारी माना लेकिन तब तक चुनाव सम्पन्न हो चुका था, और ठवरे चुनाव नहीं लड़ पाए थे अतः इस सीट का भी चुनाव रद्द करने की बाध्यता उत्पन्न हो गई ।
अब इस उपचुनाव में तुरत फुरत में बाबासाहेब के लिए चुनाव कार्यालय की तलाश हुई ৷ भंडारा के ही एक समृद्ध निवासी श्री कोलते जी ने वरठी जाने वाली रोड पर बना अपना बंगला बाबासाहेब को चुनाव कार्यालय हेतु प्रदान कर दिया ৷ चुनाव प्रचार का प्रभार शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के जिला अध्यक्ष और बाबासाहेब के अनुयायी दिनकर राव रहाटे को सौंपा गया ৷ उस समय तक दिनकर राव अपनी शिक्षक की नौकरी से त्यागपत्र दे चुके थे और अपना पूरा समय और जीवन पार्टी को समर्पित करने का प्रण कर चुके थे ৷ वे पार्टी के इतने निष्ठावान सदस्य थे कि आन्दोलन करने के आरोप में सन अड़तालीस में डेढ़ वर्ष जेल में भी बिताकर भी आ चुके थे ৷
वरठी जाने वाली मेन रोड पर ठक्कर अम्बालाल की बड़े से बुलंद दरवाज़े वाली खँडहर नुमा हवेली के निकट दिनकर राव का मकान था ৷ उनके घर के आसपास की पूरी बस्ती निम्न वर्गीय मजदूरों कामगारों की बस्ती थी। इस बस्ती के पीछे टेकडी की ढलान के बाद जोगी तलाव और उसका मैदान शुरू होता था । अप्रेल का महीना था ৷ गर्मियों का आगमन हो रहा था दिनकर राव के घर के सामने सड़क पर एक पंडाल लगा दिया गया और उनकी पत्नी भागीरथा बाई तमाम कार्यकर्ताओं के लिए चाय नाश्ते और भोजन का प्रबंध करने में लग गई ৷ घर की कोई आमदनी तो थी नहीं, कोई गेहूँ पहुँचा देता कोई चावल ৷ दाल, सब्जी, तेल मसाले, दूध आदि का भी प्रबंध भी जन सहयोग से हो ही जाता था ৷
बाबासाहेब जब नामांकन जमा करने और चुनाव प्रचार के लिए भंडारा पहुँचे तो उनके और सहयोगियों के रहने की व्यवस्था कोलते के बंगले में ही गई ৷ वही उनका चुनाव कार्यालय भी था ৷ बाबासाहेब को दोनों समय चाय, नाश्ता और भोजन का ‘डबा’ पहुँचाने की ज़िम्मेदारी समिति की ही एक युवा कार्यकर्त्ता मालती बाई मेंढे ने स्वीकार की ৷
मुंबई के समान द्विकोणी मुकाबला यहाँ भी था ৷ सामान्य व आरक्षित सीट दोनों पर कुल मिलाकर चार उम्मीदवार खड़े थे । सामान्य सीट पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता और कांग्रेस के पूनमचंद राका के बीच चुनाव होना था वहीं आरक्षित सीट पर बाबासाहेब के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे भाउराव बोरकर जिन्हें कांग्रेस की ओर से मैदान में उतारा गया था ৷ बोरकर भंडारा से लगे वैनगंगा के किनारे स्थित अम्बाड़ी गाँव के रहने वाले थे और मराठी साहित्य से स्नातकोत्तर थे ৷ आश्चर्य की बात यह कि मुंबई के काजरोलकर की भांति बोरकर भी बाबासाहेब के अनुयायी थे लेकिन सम्प्रति चुनाव में उनके विरुद्ध थे ৷ यह कथन बिलकुल सही है कि अपने स्वार्थ के लिए राजनीति में सब कुछ जायज़ है।
शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी बाबासाहेब को चुनाव चिन्ह मिला ‘हाथी’ जो दलित ,पीड़ित, शोषित जनता की आतंरिक शक्ति का प्रतीक बना । कांग्रेस का चुनाव चिन्ह था ‘दो बैलोंकी जोड़ी’ वहीं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी अशोक मेहता ने चुनाव चिन्ह ‘झोपडी’ पर चुनाव लड़ना तय किया । देश की बहुसंख्य निरक्षर जनता जो प्रत्याशियों के नाम पढ़ने में असमर्थ थी इन चुनाव चिन्हों को बेहतर समझ सकती थी । पढ़े लिखे लोग भी नाम से अधिक प्रतीकों को महत्त्व देते थे इसीलिए आज तक चुनावों में यह प्रथा चली आ रही है यह अवश्य है कि अब यह केवल महत्त्व देना नहीं रहा बल्कि प्रतीक पूजा और व्यक्ति पूजा में बदल चुका है ।
5 मई 2026
29.एक ऐसा चुनाव जिसमे डॉ.आंबेडकर भी हार गए थे
| 1951 में मुंबई |
व्यवसाय ऐसे अनेक क्षेत्रों में यहाँ के मजदूर कार्यरत थे । जहाँ एक ओर अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही थीं वहीं टीन और तिरपाल की छत के नीचे तंग झोपड़ियों में जाने कितने जीवन साँस ले रहे थे ।
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| नारायण सदाशिव काजरोलकर |
| डॉ आंबेडकर मार्ग मुंबई |
4 मई 2026
28.जब एक मतदाता दो वोट दे सकता था
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।
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| काजरोलकर |
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| सुकुमार सेन |
2 मई 2026
27. बाबासाहेब आंबेडकर और हुसैन रामटेके के बिना चाय
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| डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर |
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर 1954 मे महाराष्ट्र के भंडारा शहर से और मुंबई से लोकसभा का चुनाव हार गए थे । यह सब कैसे हुआ था ? कौन लोग इसके पीछे थे? कैसी पॉलिटिक्स हुई थी ? इन सबको विस्तार से मैंने लिखा है अगली सात कड़ियों मे पढ़ना न भूलें । प्रस्तुत है यह प्रथम किश्त
दिनकर राव रहाटे अपने शिक्षकीय दायित्व से मुक्त होकर स्कूल से लौटे ही थे कि उनके मित्र भानुदास बंसोड उनसे मिलने आ गए ..”सुना है बाबासाहेब का भंडारा से बाय इलेक्शन लड़ने का विचार है ?” दिनकर राव जी ने सर हिलाते हुए कहा “ हाँ, बाबासाहेब से ऐसी बात तो हुई थी, उन्होंने यहाँ संभावनाओं के बारे में पता करने के लिए कहा है ৷“
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| गांधी चौक भंडारा |
दिनकर राव और भानुदास जी दोनों बाबासाहेब आम्बेडकर द्वारा गठित सिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे और बाबासाहेब के सच्चे अनुयायी थे ৷ दिनकर राव जी फेडरेशन के भण्डारा ज़िले के अध्यक्ष थे ৷ वे भंडारा के निकट शहापुर के नानाजी जोशी विद्यालय के संस्थापक शिक्षकों में से एक थे ৷ लेकिन उन दिनों वे भंडारा से वरठी अर्थात भंडारा रोड रेलवे स्टेशन जाने वाले मार्ग पर दाभा गाँव के निकट जनपद के एक स्कूल में पाँचवी से आठवीं के छात्रों को गणित पढ़ाते थे ৷
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“उनके चाहने न चाहने से क्या होता है ? ” भानुदास जी ने आक्षेप लेते हुए कहा ৷ “फिर से कांग्रेस भंडारा से उनके विरुद्ध कोई कैंडिडेट खड़ा कर देगी जैसे मुंबई में किया था । अगर उनसे उनकी जमती तो फिर आजादी के बाद की अंतरिम सरकार से इस्तीफा कायको देते ? “
“ठीक कह रहे हो तुम ৷” दिनकर राव जी ने कहा “ मानते हैं कि उनके कांग्रेस से नीतियों को लेकर मतभेद हैं लेकिन नेहरू जी बाबासाहेब की विद्वता का बहुत सम्मान करते हैं ৷ इसीलिए उनको अपनी अंतरिम सरकार में लॉ मिनिस्टर बनाया था। “
“ तो फिर देश के पहले चुनाव में उनकी मदद भी करना था ना ।“ भानुदास जी की चाय ख़तम हो चुकी थी “ हा कप घेउन जा रे “ उन्होंने चाय वाले को इशारा किया । “वे तो एक्कावन के पार्लियामेंट के पहले इलेक्शन में ही फेडरेशन की सीट से ही मुंबई नार्थ सेन्ट्रल से चुनाव जीत जाते लेकिन पता नहीं कहाँ क्या गड़बड़ हो गई , नेहरू जी को उस समय कोई स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए था ना ?”
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| इसी बस्ती मे रहते थे दिनकर राव रहाटे |
दिनकर राव रहाटे जी ने उनकी बात का समर्थन किया “ हौ बरोबर बोले, तुम्हारी बात ठीक है फिर भी ऐसा हुआ । हमारे बाबासाहेब के पास अर्थशास्त्र व कानून की इतनी डिग्रियाँ हैं, एक तो कोलम्बिया यूनिवर्सिटी यू एस ए से डॉक्टरेट की और एक लंडन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ़ साइंस की और ग्रेस इन से बार एट ला यानि बैरिस्टर की है ৷ इसके अलावा भी कितना पढ़े लिखे हैं, कित्ती डिग्री है उनके पास वे फिर इतना महत्वपूर्ण संविधान उन्होंने गढ़ा है, कानून के विशेषज्ञ हैं, फिर भी राजनीति में वे आजकल के नेताओं से कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ ही गए ৷”
“होता है भाई होता है पॉलिटिक्स में सब होता है ।“ भानुदास जी हँसने लगे और विषय परिवर्तित करते हुए कहा ... “ अरे ! हुसेन नई आया आज ! उसके बिगेर चाय पिने का मजाच नई आता ।“ हुसैन रामटेके उनके शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के सक्रिय सदस्य थे । “ क्या मालूम “ दिनकर राव ने कंधे उचकाते हुए कहा “ चलो, पान खाते क्या ? फिर दोनों मित्र पान की दुकान की ओर बढ़ गए ।
28 अप्रैल 2026
26 . फॉर हूम द बेल टॉल्स
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| भंडारा शहर की मेन रोड |
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| गांधी चौक सदा गुलज़ार |
हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना
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| महाल रोड पर एक प्रेस |
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| पुराने समय की ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन |
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| पुराने समय का डायल वाला टेलीफोन |
पंडित राव जी की पहचान एक बुद्धिजीवी के रूप में तो थी ही लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उनके यहाँ टेलीफोन था ৷ उस समय जिसके घर में टेलीफोन होता था वह बड़ा आदमी कहलाता था । हम लोग इस मायने में खुशनसीब थे कि हमारे मोहल्ले में दो टेलीफोन थे ৷ एक पंडितराव के यहाँ और एक एड्वोकेट शंगर्पवार के यहाँ । अनेक लोगों ने उनके घर के टेलीफोन नंबर अपने रिश्तेदारों को दे रखे थे जो अक्सर पंडित राव जी के टेलीफोन की घंटी बजाया करते थे ৷
| हेमिंग्वे का उपन्यास |
| पास पड़ोस का फोन |
| ट्रंक काल टेलीफोन एक्सचेंज में बुक होते थे |
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| पहले यहाँ हुआ करता था पंडितराव जी का घर |
| लोकवाणी चौक |
अभी भंडारा की इन गलियों में मुझे ऐसे बहुत से निशान दिखाई दे रहे हैं ৷ इनमे कुछ निशान तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर आप चौंक जायेंगे ৷ ध्यान से देखिये आपको इन गलियों में बाबासाहेब आम्बेडकर के पाँव के निशान भी दिखाई देंगे , उन दिनों के जब उन्होंने भंडारा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के दौरान यहाँ डेरा डाला था ৷
अख़बार पर आज बहुत सी बातें हुई बशीर महताब का एक शेर जो मुझे बहुत अच्छा लगता है वह भी पढ़ लीजिये...
मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें
हर रोज़ नया फ़ितना बयाँ करती हैं ।
शरद कोकास



















