7 जून 2026

56 .बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं पुराने मकान

मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । छप्पर की कमर झुक जाती है, दीवारों के पलस्तर में बेशुमार झुर्रियाँ दिखाई देने लगती हैं, बरसातों में  नज़ले ज़ुकाम की तरह टूटे खपरैल से होता हुआ पानी भीतर टपकने लगता है, उनकी त्वचा पर पड़े सीलन के धब्बे किसी चर्म रोग की तरह दिखाई देने लगते हैं , वे बमुश्किल साँस ले पाते हैं और देर रात तक खाँसते हैं । 

गर्मियों में अक्सर उनकी नींद सुबह जल्दी उचट जाती है और वे अपने आसपास बने युवा मकानों को एसी और कूलर की लोरी में गहरी नींद में सोता हुआ देखते हैं ।


सर्दियों में वे कानों में मफ़लर लपेटने के बावजूद कभी भी ढह जाने का अंदेशा लिए काँपते हैं । बेमौसम बारिश में अपने आँगन में पानी से भरे डबरे में अपना अक्स देखते हुए वे सोचते हैं कि वे भी कभी जवान थे ।

मेरा बचपन बैतूल के इस पुराने मकान की जवानी का गवाह है ।


हम बच्चे  खेलकर आते थे और दालान से होते हुए बीच का कमरा और आंगन पार कर सीधे रसोईघर में प्रवेश करते थे । दालान के बाद  बीच में एक बड़ा कमरा था । इसकी छत बांस और मिटटी से बनी थी जो ऊपर वाले कमरे का मिट्टी का फर्श थी ।
दालान के बाद बीच के कमरे में सीमा 

बीच के कमरे के बाद छपरी से बाहर 
यहाँ से लकड़ी के पटियों से बनी दस पायदान वाली सीढ़ियाँ ऊपर की ओर जाती थीं । बिनाका गीतमाला में जब अमीन सयानी साहब ‘पायदान’ शब्द कहते थे तो हमारे जेहन में इन्ही सीढ़ियों का अक्स उभरता था ।
लकड़ी की सीढ़ियों पर सुभाष बाबू 
हम लोग सीढ़ियों से चढकर ऊपर जाते लेकिन उतरते वक़्त छत से बाहर निकले बाँस के दो टुकड़ों से किसी जिमनास्ट की भांति लटककर नीचे आ जाते  । सीढ़ियों से ऊपर पहुँचते ही दाहिनी ओर मदन मोहन ताउजी का एक कमरा था जहाँ हम बच्चे इनडोर गेम्स खेल खेला करते थे ।
मदन मोहन ताउजी का कमरा 
बीच में एक बड़ा हाल नुमा कमरा जिसमें बाहर झाँकती छोटी छोटी दो खिड़कियाँ थीं, फिर मनमोहन ताउजी यानि दादाभैया का कमरा । 
मनमोहन ताउजी का कमरा 
दिवाली के दिन यह कमरा लक्ष्मी जी को आवंटित हो जाता था । लक्ष्मी पूजन हेतु सारे लोग इस कमरे में जुटते । दादाभैया लक्ष्मीजी की प्रतिमा की स्थापना करते और स्थल सजावट करते । हम सब श्रमजीवी थे इसलिए प्रतिमा के साथ कुदाल, फावड़े, आरी,बसूला, हथौड़ी,खुरपी आदि औजार रखे जाते । पूजन का प्रोटोकाल बिलकुल तय था, सबसे पहले दादाजी और उनके भाई, फिर दोनों ताउजी, फिर बाबूजी, फिर सभी  चाचा लोग  और उसके बाद तीसरी पीढी में हम बच्चों का नंबर आता था । तब तक हम लोग इतने ऊब जाते कि नीचे जाकर पटाखे जलाने में व्यस्त हो जाते । उसके बाद तो लक्ष्मी जी खुद कह देती थीं ..जाओ बच्चों , खेलो कूदो, मेरी इबादत बड़े होने के बाद कर लेना ।

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नीचे बीच वाले कमरे के बाद एक छपरी थी जिसमे जाली लगी थी,


उसके बाद जच्चाघर जैसा एक कमरा जिसे हम ‘माँ की कोठरी’ कहते थे । मेरे बड़े भाइयों और मेरे अलावा अनेक बच्चों ने आँखे खोलते ही सबसे पहले इसी कोठरी की दीवारें देखी थीं और खिड़की से आती सुबह की धूप की पहली उष्मा महसूस की थी । माँ की यह कोठरी बिना अवकाश लिए नवजात शिशुओं के आगमन से सदा प्रफुल्लित रहती थी । वैसे यह एरिया छोटी दादी के अंडर में आता था ।
इस खिड़की से पहली बार मैंने दुनिया देखी थी 
इस छपरी को पार करने के बाद बीच में एक बड़ा सा आंगन था जो हमारा डायनिंग लॉन था ।

आंगन पार करते ही उस पार  रसोई घर व भंडार घर के कमरे, स्नानगृह आदि । रसोई में दादियाँ,दोनों बड़ी माताएँ  , व चाची खाना बनाया करती थीं । माँ का आगमन चूँकी छुट्टियों में मेहमानों की तरह होता था इसलिये उन्हें  सुबह शाम चूल्हा जलाकर चाय का अदहन चढ़ाकर सबको चाय पिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाती थी । हालाँकि यह कार्य भी आसान नहीं था, पच्चीस तीस सदस्यों को जिनका जागने का समय अलग अलग था, चाय पिलाते पिलाते दो घंटे का समय तो उन्हें लग ही जाता था, यही क्रम शाम को भी जारी रहता । 

बाबा नागार्जुन की कविता में आंगन से ऊपर उठता धुआं भले कई दिनों के बाद दिखाई देता हो लेकिन हमारे घर में प्रतिदिन शाम को धुआं उठने का यह दृश्य अनिवार्य था । इस धुएँ में शामिल छौंकी हुई दाल की गंध,फूलगोभी की सब्ज़ी की महक, कच्ची कैरी की चटनी में शामिल पुदीने की ख़ुशबू जैसे ही हम लोगों के नासापुटों तक पहुँचती हम लोग थाली लिए बड़ी माँ के सामने खड़े हो जाते । थाली में दाल,रोटी, सब्ज़ी, चटनी प्याज़, आदि लेकर हम लोग आंगन में आ जाते और पसरकर बैठ जाते । 


उन दिनों एक थाली में अकेले बैठकर खाने जितने हम लोग सभ्य नहीं हुए थे । अक्सर यह होता था कि दो बच्चे एक बड़ी सी थाली में खाना शुरू करते और फिर एक एक कर बच्चे उनके साथ शामिल हो जाते । ओपनिंग बैट्समैन के आउट होने के बाद भी लास्ट विकेट तक भोजन का यह सिलसिला उसी पिच पर जारी रहता, साथ ही रसोईघर से मांग और पूर्ति के नियमानुसार रोटियों और सब्जियों की आपूर्ति जारी रहती।


  इस भोजन सत्र में सबसे अधिक आकर्षण मदन मोहन ताउजी के बेटे यानि हमारे मुल्लू भैया और होशंगाबाद वाली पुष्पा बुआ के बेटे संतोष भैया का एक साथ भोजन करना था । वे उम्र में बड़े थे सो उनकी पार्टी अलग थी । उनके साथ थाली में भोजन का दुस्साहस करने वाले बच्चे जल्दी ही आउट हो जाते लेकिन मुल्लू भैया और संतोष भैया पिच पर लगभग डेढ़-दो घंटे डटे रहते।  दोनों ही अखाड़े में वर्जिश करते थे इसलिए उनकी खुराक काफी तगड़ी थी । 


दोनों भाइयों में कभी कभी मिर्ची खाने की प्रतियोगिता भी होती थी जिसका समापन तीखेपन को न सह पाने के कारण हिचकी, आँखों से पानी आने जैसी क्रियाओं पर ही होता था । पुरस्कार स्वरूप उन्हें एक गगरी पानी और मुठ्ठी भर गुड़ प्रदान किया जाता था । वैसे भोजन में ज़्यादातर रोटी, सब्ज़ी ,प्याज़ और चटनी हुआ करती थी, दाल का कोटा ज़रा कम था । गेहू तो खेत में ही होता था सो बहुतायत में उपलब्ध था लेकिन चावल एक विलासिता की वस्तु थी इसलिए कभी कभार ही पकता था । 


हम लोगों के भोजन सत्र इतने मनोरंजक होते थे कि भोजन संपन्न होने के पश्चात भी किसी के उठने का मन नहीं करता था । इन सत्रों में विगत में संपन्न शादी ब्याह और बारातों के किस्से, फूफाओं और जीजाओं के साथ की गई शरारतों के किस्से बहुत चाव से सुने सुनाये जाते । बड़े भाइयों और चाचाओं द्वारा सुनाये गए उन किस्सों में हम बच्चों को कहानी सुनने का मज़ा आता था । 


मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । वे भले ही किसी काम के न हों लेकिन उनके हमारे आसपास बने रहने से रौनक बनी रहती हैं उनकी उपस्थिति हमें न केवल अपने बल्कि मनुष्य जाति के बचपन की याद दिलाती हैं ।















55. रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क


बैतूल शहर अपनी परंपराओं,अपने संस्कारों और अपनी मासूमियत के साथ इस तरह बड़ा हो रहा था कि उसे देखने वाले दावे के साथ कह सकते थे कि वह बड़ा होकर किसी बड़े शहर की सोहबत में भी नहीं बिगड़ेगा । बड़े शहरों के नाम पर बैतूल के दक्षिण की ओर नागपुर था और उत्तर की ओर भोपाल । दोनों शहर मोहल्ले के बड़े बच्चों की तरह बैतूल से काफी दूर दूर रहते थे । 

अपनी देह में महुए की आदिम गंध लिए बैतूल धीरे धीरे बड़ा हो रहा था  । अंग्रेजों को इसकी  देहगंध से कोई सरोकार नहीं था लेकिन उन्हें इसकी शीतलता पसंद थी इसलिए उन्होंने गोंड राजा द्वारा किसी समय निर्मित खेड़ला किले  से छह किलोमीटर दूर अपने सरकारी दफ्तर और आवास बनाये, उन दिनों वस्तुओं के आयात निर्यात की सुविधा के लिए रेल लाइन के निकट ही मंडी हुआ करती थी । बैतूल में रेलवे स्टेशन के निकट का यह क्षेत्र गंज कहलाने लगा । धीरे धीरे बस्ती बसनी शुरू हुई, सदर में बंगले बने,शहर में बाज़ार बने । हमारा मोहल्ला कोठीबाज़ार के अंतर्गत आता था और साप्ताहिक बाज़ार लगने की वज़ह से इतवारी बाज़ार कहलाता था । यह शहर के लगभग अंतिम छोर पर बसा था । यहाँ हमारे दो मकान थे एक नया मकान जो 1957 मे बना था 


और पुराना मकान लगभग सन 1925 मे बना था


गंज से आने वाली रिंग रोड बीच में ही कालापाठा  की ओर मुड़ जाती थी जहाँ सागौन वन में सागौन के चौड़े चौड़े पत्तों के ऊपर से आसमान शहर के भीतर झाँकने की कोशिश करता था ।

वर्षा के दिनों में बादल उन ऊँचे ऊँचे पेड़ों के ऊपर पसर जाते और कुछ देर ठहर कर बरस जाते । नमी लिए हुए जंगल की आदिम गंध उस वीरानी में चारों ओर पसर जाती । लाल लाल बीर बहूटियाँ अपने पट खोलकर मिटटी के टीलों में दीमकों के साथ अपने घर बनाने लगतीं ।

बैतूल में उन दिनों जंगल ही जंगल थे इसलिए शहर में भी जंगल विभाग के दफ्तर भी सर्वप्रथम यहीं खुले ।

हमारे घर के सामने से गुजरने वाली वह सड़क शहर की अंतिम सड़क थी । उसके बाद  टी अक्षर की ऊपरी डंडी की तरह रिंग रोड आ जाती थी ।


यह शहर की सीमा रेखा की तरह ही थी । रिंग रोड के उस पार मुस्लिमों का कब्रस्तान था


और उसीसे लगा हिन्दुओं का स्मशान ।

उन दिनों मैं आत्मा में विश्वास करता था और सोचता था कि जीते जी तो  हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ते हैं लेकिन मरने के बाद उनकी रूह और आत्माएँ कितने चैन से पास पास घर बनाकर एक साथ रहती हैं । यह सत्य मैंने बड़े होने के बाद जाना कि मृत्यु के बाद देह हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है और उसे जीवित लोगों के संसार से कोई सरोकार नहीं होता है । फिर भी शेष जीवित लोग आत्मा, परलोक,श्राद्ध  आदि के नाम पर अपना मन बहलाने के लिए उसके अस्तित्व का आभास कायम रखते हैं । 

गर्मियों की उन सूनी दोपहरियों में हम लोग अक्सर कब्रस्तान चले जाते थे इसलिए कि वहाँ के आम बहुत मीठे होते थे । यद्यपि इस बात की कोई गुंजाइश नहीं थी कि कोई मुर्दा कब्र से बाहर निकलकर हमें डांटेगा फिर भी पत्थर चलाते हुए हमें इस बात का ध्यान रहता था कि पैर किसी कब्र पर न पड़े । अगर ऐसा होता तो हम लोग तुरंत पाँव छूने की मुद्रा में झुक जाते और कब्र छूकर माफ़ी मांग लेते ।


छुप छुप कर धूम्रपान करने के लिए यह मरघट बहुत उपयुक्त जगह थी इसलिए मोहल्ले के बड़े भाई लोग किसी क़ब्र पर बैठकर सिगरेट फूंकते नज़र आ जाते । सर्दियों के दिनों में हम लोग बगल के स्मशान चले जाते थे । जलती हुई किसी चिता के करीब बैठकर देह को गर्मी देना अच्छा लगता था । दादाजी बताते थे कि हमारा मकान  बनने से पहले बस्ती तक कब्रस्तान का विस्तार था और नींव खोदते समय कुछ बच्चों के कंकाल भी निकले थे । उस समय बाल मृत्यु दर काफी अधिक थी और हिन्दु मुसलमान दोनों में बच्चों को मुख्य स्मशान से कुछ अलग हटकर दफ़नाने की परम्परा थी । 
मदन मोहन कोकाश 
बाज़ार के दिनों के अलावा मोहल्ले की शामें बहुत शांत हुआ करती थीं । अँधेरा घिरने से पहले घर के सामने पानी सींचकर खटिया बिछा दी जातीं या बेंचे रख दी जातीं । हम लोग एक छोर से दूसरी छोर तक दौड़ लगाते फिर थक कर बेंचों पर बैठ जाते  । इधर हम लोग रेस टीप खेलने में व्यस्त होते उधर सामने वाले दालान में मदन मोहन ताउजी की बैठक जम जाती । एक रेहल निकल आती उस पर रखी होती गीता प्रेस गोरखपुर से छपी तुलसी कृत रामचरितमानस की टीका वाली प्रति, साथ ही अगरबत्ती का स्टैंड और उसमे लगी चन्दन अगरबत्ती । ताउजी दुकान बंद करने के बाद कुछ देर टहलने जाते फिर लौटकर हाथ मुँह धोते और गमछे  से मुँह पोछते हुए अपना आसन ग्रहण करते।

इतनी देर में मानस पाठ सुनने की इच्छुक श्रोता मंडली वहाँ एकत्रित हो जाती । इनमे होते पड़ोस के फारेस्ट डिपार्टमेंट वाले चंद्रकांत गुंडे बाबू, छत्तीस इंच मोहरी का पजामा पहनने वाले फद्दी गुरूजी, आमले वाले पटेल, बाजू की  प्रिंटिंग प्रेस वाले सुरेश बाजपेयी जी, शिवदुलारे श्रीवास जी, मुंशी जी, हमारे फर्नीचर के कारखाने में काम करने वाले सद्दू गोंड और भी बहुत सारे लोग । पीले बल्ब की टिमटिमाती रौशनी में मदन भैया हाथ जोड़कर पहले बाल काण्ड का एक श्लोक पढ़ते.. 

वर्णानामर्थ संघानां रसानां छंद सामपि ।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।।

अर्थात, अक्षरों,अर्थ समूहों,रसों, छंदों और मंगलों को करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ । फिर वे रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क वाला पृष्ठ खोलते और अपना पाठ प्रारंभ करते । उनके मुँह से सस्वर दोहे,सोरठे और चौपाइयों का पाठ चलता रहता, साथ साथ वे उनकी व्याख्या भी करते जाते और श्रोता गण भक्ति रस में सराबोर हो जाते । 

साठ के दशक के बच्चे हम लोग 
उस खुले खुले से मोहल्ले में रहने वालों और आते जाते लोगों  के लिए यह दृश्य बहुत मनोरम होता था । वहीं आंखमिचौली खेलते हुए हम बच्चों के लिए यह दृश्य  बड़ों के संरक्षण में बड़े होने की एक सुखद अनुभूति की भांति अवचेतन में आकार लेता था । चन्दन की अगरबत्ती की गंध हमें अपनी ओर खींचती थी । धोती पहने माथे पर तिलक लगाए मदन मोहन ताउजी हमें तुलसीदास की तरह दिखाई देते थे । वे हम बच्चों से भी आग्रह करते थे कि हम बैठकर राम कथा सुने लेकिन हम लोग उसे विशुद्ध धार्मिक कृत्य मानते थे और उसे बुजुर्गों के जीवन का हिस्सा मानकर खेलने कूदने में लग जाते थे ।  बावज़ूद इसके कभी कभार सुस्ताने या पानी पीने के बहाने कोई प्रसंग सुनने बैठ जाते थे और आश्चर्य कि कथा में हमारा मन रमने लगता था ।

बड़े होने के बाद सभी धर्मों के धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने के तारतम्य में मैंने सर्वप्रथम तुलसी कृत मानस और उसके बाद वाल्मीकि कृत रामायण भी पढ़ी । मानस पढ़ने का आधार बैतूल का यही प्रसंग था । बाबूजी भी भंडारा में जीवन भर नियम से प्रतिदिन रामचरित मानस का पाठ करते रहे ।

जगमोहन कोकास मेरे बाबूजी 

इस मकान के दालान में संपन्न होने वाला मानस पाठ बाबूलाल दादाजी के निधन के पश्चात नए वाले मकान के दालान में संपन्न होने लगा । मदन मोहन ताउजी का यह क्रम उनके जीवन तक चलता रहा और गुंडे बाबू ,सुरेश चाचा, फद्दी गुरूजी, सद्दू गोंड और मुंशीजी भी नियमित रूप से उनके श्रोताओं में शामिल होते रहे । 


54. मैं आज भी फेंके हुए सिक्के उठा सकता हूँ


उन दिनों अँधेरा घिरते ही बाज़ार उठने लगता था । बाज़ारवाद जैसे शब्द ने छोटे मोटे शहरों के शब्दकोश में प्रवेश नहीं किया था । जनरेटर से बिजली सप्लाई कर देर तक बाज़ार रौशन रखने का ख़याल भी किसीको नहीं आया था । उन दिनों पैसे से अधिक परिवार प्यारा होता था इसलिए जैसे दिन भर के थके हारे पंछी शाम को घोसले की और उड़ान भरते हैं उसी तरह ग्राहक हों या दुकानदार शाम होते ही घर लौटने की तैयारी करने लगते । पिताओं को अपने बच्चे याद आने लगते और बच्चों को अपना घर । 

 कुछ दुकानदार जिनके यहाँ कोई फुरसतिया ग्राहक अपनी दोपहर की नींद पूरी करने के बाद अलसाते हुए पहुँचता था अपनी दुकान ज़रा देर से समेट पाते थे इसलिए दिवसावसान पर उनके लिए लालटेन जलाना आवश्यक हो जाता था । यद्यपि विष्णु खरे की कविता ‘ लालटेन जलाना ‘ में दी गई लालटेन जलाने की प्रक्रिया का वे पूर्णरूपेण निर्वाह नहीं कर पाते थे । 

इधर बैलों को भी समय का भान हो जाता और वे अलार्म की तरह अपने गले में बंधी घंटियाँ बजाते हुए कहते ‘चलो मालिक चलो, घर जाने का टेम हो गया ।’ जिनके पास सब्जियाँ या माल बच जाता वे उन्हें गठरियों में बांधते और डेरे-डंडे के साथ बैलगाड़ी पर लादते हुए संगी साथियों से अगले दिन किसी जगह लगने वाले  हाट के बारे में पूछने लगते । 

हम लोग तो जैसे गाड़ियों के रवाना होने की राह देखते रहते थे । इसके बाद प्रारंभ होता था हम बच्चों का अन्वेषण अभियान । हम बच्चों की टीम किसी पुरातत्त्ववेत्ता की तरह उजड़े बाज़ार का क्षेत्र एक्सप्लोर करने में जुट जाती । हमारा उद्देश्य होता गिरे हुए या छूटे हुए सिक्के बटोरना । 

दुकानदार उन दिनों अपनी रेजगारी बोरों के नीचे तह  में रखते थे । जाते हुए वे वैसे भी जल्दी में होते इसलिए कई बार रेजगारी समेटते हुए कुछ सिक्के शरारतन इधर उधर खिसक जाते थे । उनके मालिक को अँधेरे में उनका पता ही नहीं चलता था । 

हमारा लक्ष्य  ऐसे ही बिछुड़े हुए सिक्कों को ढूँढना होता था । हम लोग एक अनुशासित टीम की तरह पूरे क्षेत्र में फैल जाते । स्ट्रीट लाइट के निकट की जगह अमूमन बड़े भाई लोगों द्वारा जबरन हथिया ली जाती और हम छोटे बच्चों को अँधेरे के निकट की जगह मिलती । यद्यपि यह बात भाई लोगों की समझ में नहीं आती थी कि गुम होने की संभावना तो अँधेरे में ही अधिक होती है फिर वह सिक्के हों या समझ । 

कुछ स्थानों पर सिक्के अवश्यम्भावी रूप से प्राप्त होते थे । कभी कभी हमें संदेह होता था कि वे दूकानदार जानबूझकर हम बच्चों के लिए कुछ सिक्के छोड़ जाते हैं । जगहों की तरह कुछ बच्चों के लिए भी यह तय था कि उन्हें हमेशा सिक्के मिलते ही हैं हालाँकि बाद में हमें पता चलता था कि वे अपनी झूठी शान बरक़रार रखने या डींग हांकने के लिए झूठ बोलते थे । 

यद्यपि हर एक को इकन्नी, दुअन्नी चवन्नी या अठन्नी मिल ही जाती थी फिर भी जिन बच्चों को सिक्के नहीं मिलते थे वे नगर पालिका द्वारा काटे गए बाज़ार टैक्स की रंगबिरंगी पर्चियों से ही संतोष कर लेते थे । यह उनके लिए सांत्वना पुरस्कार की तरह होता था । 

सिक्के बटोरने से प्रारंभ हुआ यह कार्य बहुत आनंद दायक था। इसके विस्तार में फिर हम लोगों ने आइसक्रीम के प्लास्टिक के चम्मच, माचिस के खोखे, डाक टिकट आदि बटोरना प्रारम्भ किया ।यह हम लोगों का खजाना होता था और दोस्तों के बीच डींग हांकने के काम आता था । कुछ बड़े होने के बाद मैंने विचार बटोरना शुरू किया । उन दिनों अख़बारों में एक कालम आता था ‘अनमोल वचन’ ..मैं उन्हें एक कॉपी में उतार लेता था । फिर धीरे धीरे मैंने अच्छे शब्द बटोरने शुरू किये फिर अच्छी कविताएँ , अच्छी कहानियां और किताबें । वैसे बटोरने की यह आदत अब भी बनी हुई है अब इनमे अच्छे दोस्त भी शामिल हो गए हैं । 

ऐसा भयानक काम आपने कभी नहीं किया होगा 

सिक्के बटोरने के इस उपक्रम में एक और भयंकर काम हम लोग किया करते थे । हमारा घर मरघट के निकट था और किसी भी शव को अनिवार्य रूप से हमारे मोहल्ले की इस सड़क से ही गुजरना पड़ता था । उन दिनों सिक्कों की इतनी किल्लत भी नहीं थी और मृत्यु को उत्सव की तरह मनाया जाता था इसलिए बैंड बाजे के पीछे चलती हुई शव यात्रा में अर्थी के ऊपर धान की लाई और बतासे के अलावा सिक्के भी लुटाये जाते थे । हमारे घर के सामने की सडक समाप्त होते ही बमुश्किल सौ मीटर की दूरी पर मरघट था इसलिए ‘क्या लेकर आये थे और क्या लेकर जाओगे’ इस भाव के साथ कंजूसी से बचाए हुए सारे सिक्के इसी सड़क पर लुटा दिए जाते थे ।

मुर्दा गुजर जाने के बाद हम लोग लाई बतासे गुलाल के बीच पड़े हुए सिक्के बटोरने के लिए टूट पड़ते । ‘मुर्दा गुजरना’ यह शब्द प्रयोग आपको अजीब सा लगेगा क्योंकि आपने अब तक जीवित आदमी का गुजर जाना ही सुना होगा .. लेकिन हम लोग रोज ही यह वाक्य कहते थे और गुजरने वाले मुर्दों की राह देखा करते थे । जिस दिन कोई मुर्दा नहीं गुज़रता उस दिन हमें अच्छा नहीं लगता था ।

फेंके हुए पैसे बटोर लेने के बाद हमें बड़े भाईसाहब की अदालत में हाजिर होना पड़ता था जहाँ हिसाब दिया जाता कि किसकी कितनी आमदनी हुई है । बड़े भैया नीम के पेड़ के नीचे एक गड्ढा खोदते और कहते “सब लोग अपने अपने सिक्के इसमें डाल दो और साबुन से हाथ धो लो, कल तक यह सिक्के पवित्र हो जायेंगे,फिर ले लेना ।“ 

पैसे तो मुर्दा ले गया 

अगले दिन सुबह सुबह ही हम लोग अपने पवित्र सिक्के हासिल करने हेतु  नीम के पेड़ के नीचे जुट जाते । बड़े भैया सबकी उपस्थिति में वह गड्ढा खोदते और पैसे बाँट देते लेकिन वे पैसे पहले से कम होते थे । बड़े भैया सांत्वना प्रकट करते हुए कहते “कोई बात नहीं, मुर्दा अपना हिस्सा ले गया ।“ आगे चलकर जब मुर्दा पूरे के पूरे पैसे हड़पने लगा तो हम लोगों को शक़ हुआ । एक दिन हम लोगों ने तय किया कि आज जागेंगे और छुपकर देखेंगे । 

हमने ध्यान से देखा तो पता चला कि देर रात सब बच्चों और बड़ों के सो जाने बड़े भैया ही सर पर सफ़ेद चादर ओढ़कर आते थे और गड्ढा खोदकर पैसे निकाल लेते थे फिर अँधेरे में गुम हो जाते थे । हमने उनसे शिकायत की तो उन्होंने हमें डराते हुए कहा “अरे वह मुर्दा ही है ... उसे देखना मत और भूलकर भी उसके पास नहीं जाना,पकड़ लेगा तो सिक्कों के साथ तुम्हे भी ले जायेगा ।“ 

दंगवाड़ा उत्खनन मे पंचमार्क सिक्के बटोरते शरद कोकास 

बचपन के वे दिन बीत गए और यह सिलसिला समाप्त हो गया । मुझे नहीं पता था कि बड़े होने के बाद पुरातत्त्व में स्नातकोत्तर की कक्षा में मुझे फिर प्रैक्टिकल में उसी तरह पंचमार्क सिक्के ढूँढने होंगे । ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद मैंने उज्जैन में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व की स्नातकोत्तर कक्षा में प्रवेश लिया था । पहले ही माह एक दिन गुरुदेव डॉ. वाकणकर हमें एक पुरातात्विक स्थल पर ले गए और कहा कि “ यहाँ बहुत सारे पंचमार्क सिक्के पड़े हैं उन्हें ढूंढो । यह काम तुम्हारे कोर्स में है ।“ 

प्राचीन समय में मुद्रा हेतु इन्ही पंचमार्क सिक्कों का उपयोग होता था । यह पंचमार्क सिक्के ताम्बे की शीट को छोटे छोटे टुकड़ों में काटकर ,फिर उन पर मुहर या राजकीय मुद्रा रखकर ,हथौड़े से प्रहार कर यानि पंच कर बनाये जाते थे, इन्हें आहत सिक्के भी कहा जाता है । कुछ स्थानों पर यह सोने और चांदी के भी पाए गए हैं लेकिन अधिकतर ताम्बे के ही होते थे ।

मैंने वाकणकर सर से पूछा “ सर , यह इतने सारे सिक्के यहाँ कैसे आ गए ? उन्होंने जवाब दिया “ हो सकता है यहाँ उस ज़माने में हाट बाज़ार लगता हो ।“  मैंने कहा “या फिर किसी मुर्दे के ऊपर से यह सिक्के फेंके गए हों ?” सर मुस्कुराए ..”दुष्ट, मतलब तुम बचपन में फेंके हुए सिक्के बटोरने का काम कर चुके हो ?” सर को मैंने विस्तार से जो किस्सा बताया वही आज आपके सामने दोहरा रहा हूँ । 

वैसे एक बात कहना तो मैं भूल ही गया । 

मुर्दों पर फेंके गए सिक्के तो मैंने खूब बटोरे लेकिन बारातों में घोड़ी पर चढ़े दूल्हे पर लुटाये गए सिक्कों को बटोरने की मेरी मुराद अधूरी ही रह गई । वैसे भी ताम झाम व दहेज़ प्रेमी दूल्हे और मुर्दे में कोई ख़ास फ़र्क तो होता नहीं है  ।


53 गुदना गुदवा लो भैया बैतूल बजार में

टैटू बनवाते हुए शरद कोकास 
“ शरम नहीं आती तुम लोगों को ? क्या कर रहे हो ..चलो उठो यहाँ से “ “ मैंने और बिन्नू भैया ने देखा कि सामने से श्याम काका दहाड़ते हुए चले आ रहे हैं । बिन्नू भैया ने झट मुझे कोहनी मारी । हम लोग उकडूँ बैठे हुए थे इसलिए उठने में ज़रा भी देर नहीं हुई । बिन्नू भैया फुर्तीले थे, वे तो सरपट निकल लिए  लेकिन मैं पकड़ में आ गया ।“ क्या चल रहा था ये ?” चाचा ने डाँटते हुए पूछा “ कुछ नहीं चाचा, गुदना गुदवा रहे थे “ “ गुदना ..?  यह क्या भले घर के बच्चों का काम है ?” मैं चुप था । चाचा ने कहा “ चलो घर .. अब दुबारा यहाँ दिखना भी नहीं ।“ 

यह दृश्य विगत सदी में साठ के दशक में, मई माह के एक रविवार को, बैतूल नामक शहर के इतवारी बाज़ार नामक मोहल्ले में, दुर्गा मंदिर की बाईं ओर मोहनजोदाड़ो के टीले की तरह दिखाई देने वाले एक ऊँचे से टीले पर साप्ताहिक बाज़ार में लगने वाली गुदना गुदवाने की एक दुकान के सामने घटित हुआ था  । यह टीला हमारे नए घर के पीछे के दरवाज़े के ठीक सामने की ओर था । इस दुकान में चान्दी के आभूषण पहने आदिवासी बालाएँ और महिलायें अपने हाथ, पांव, ठोड़ी आदि में गुदना गुदवाने के लिए बाकायदा अपॉइंटमेंट लेकर आती थीं । उधर उनके घर के लोग दुकानों से सामान खरीदते उतनी देर में यह बालाएँ गुदना गुदवा लेती । कभी कभी इनके साथ कुछ युवक भी होते थे ।  

गुदना गोदने वाली स्त्री के पास मिटटी के एक दिये में काजल जैसी कोई चीज होती थी । वह बोतल से अरंडी का तेल निकालती, उसमे वह काजल घोलती फिर एक कपडे में लिपटी हुई छोटी छोटी सुइयां निकालती थी । जिस युवती को गुदना गुदवाना होता उसका हाथ अपने हाथ में लेकर  सबसे पहले वह उस पर तेल लगाती, फिर गुदना गुदवाने वाली उस युवती से पूछती “ क्या गुदवाना है ? “ वह युवती अपनी रूचि के अनुसार कोई आकृति बताती जैसे सूर्य, चन्द्र ,तारे, फूल पत्ती, बिच्छू, या ऐसी ही कोई आकृति । फिर वह गोदने वाली कपड़े की थैली से उपयुक्त सुई निकालती और उसे काजल वाले तेल में डुबोकर धीरे धीरे उसके हाथ पर चुभोते हुए वह आकृति बना देती । सुई के चुभने से थोड़ा बहुत दर्द तो होता था लेकिन गुदना गोदने वाली उसे बातों में लगाये रहती । गुदना समाप्त होते ही उस पर हल्दी का लेप लगा दिया जाता ।

मैं और बिन्नू भैया अक्सर वहाँ खड़े हो जाते और गुदना गुदवाने का यह दृश्य देखते । गोदने वाली स्त्री जिसे गुदनारी कहते थे उसकी बातें भी बड़ी मज़ेदार होती थीं “ ठोड़ी में गुदवाओगी तो दांत मोती जैसे चमकते रहेंगे “ “ इतना सुन्दर गोदूंगी कि तुम्हारा प्रेमी देखता ही रह जायेगा । “ यदि कोई उम्रदराज़ गोंड स्त्री आती तो उससे कहती “ गुदना नहीं गुदवाओगी तो बूड़ा देव नाराज हो जायेंगे ।“ 

गुदनारी की बात सुनकर युवतियाँ  हँस देतीं । उन्हें किसी देवी देवता के नाराज़ होने की चिंता नहीं होती थी ।वे केवल इतना चाहती थीं कि बस उनका प्रेमी खुश रहे । अक्सर वे श्रृंगार के रूप में गुदना गुदवाती थीं । कभी कभी उनके साथ आनेवाले युवक भी बिंदी, सितारा, फूल जैसी कोई आकृति गुदवा लेते । जब वे एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराते हुए गुदना गुदवाते थे उन्हें दर्द महसूस नहीं होता था । किसी ने सच कहा है जब मनुष्य प्रेम में होता है तो उसे किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं होता । 

अलग अलग स्थानों पर गोदे जाने वाले गुदने के नाम भी अलग अलग होते थे, जैसे ठोड़ी का गुदना मुटकी, नाक का फुल्ली और कान का गुदना झुमका कहलाता था । हाथों के अलावा यह स्त्रियाँ अपने माथे, कान, पिंडली, जांघ, आदि पर भी गुदना गुदवाती थीं । इन आदिवासी जनों के अलावा यहाँ पढ़े लिखे लोग भी आते थे यह लोग केवल हाथ पर नाम गुदवाते थे । कुछ लोग शरीर में कुछ जगहों पर राम नाम भी लिखवाते थे । कुछ लोग इसलिए गुदवाते थे कि उससे धार्मिक मान्यताएँ जुड़ी थीं जैसे कि गुदवाओगे नहीं तो स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी, मोक्ष नहीं मिलेगा,पितृ तर्पण नहीं होगा आदि आदि ।

गुदना गोदने वाली स्त्री गुदने से सम्बंधित अच्छी अच्छी कहानियाँ भी सुनाया करती थी । उस समय की कहानियाँ तो मुझे याद नहीं लेकिन बड़े होने के बाद मैंने उरांव आदिवासियों के बीच प्रचलित गुदने की एक कहानी सुनी थी । 

एक कहानी 

ऐसा कहा जाता है की एक बार औरंगजेब की सेना ने पटना के निकट रोहतासगढ़ के किले पर आक्रमण कर दिया । उरांव राजा उरगन ठाकुर की सेना में बलशाली स्त्रियों की एक टुकड़ी थी जो पुरुषों की वेशभूषा में लड़ती थी। इस टुकड़ी ने तीन बार औरंगजेब की सेना को हराया । फिर किसी लुन्दरी ग्वालन नामक स्त्री ने मुगलों को यह रहस्य बता दिया कि यह योद्धा पुरुष नहीं हैं बल्कि पुरुष के रूप में लड़ने वाली यह स्त्रियाँ हैं । बस फिर क्या था ,पितृसत्ता के पोषक औरंगजेब के सैनिकों का मनोबल बढ़ गया और उन्होंने इन वीर स्त्रियों को येन केन हरा दिया । तीन बार मुगलों को मज़ा चखाने वाली इस घटना की याद में आज भी उरांव स्त्रियाँ अपने माथे पर तीन खड़ी डंडियाँ गुदवाती हैं । 

उन दिनों यह सब कुछ हमें बहुत रोमांचक लगता था । इसी रोमांचक अनुभव को प्राप्त करने के लिए एक दिन मैंने और बिन्नू भैया ने मिलकर विचार किया था कि हम दोनों अपने हाथ पर अपना नाम गुदवायेंगे । हम लोग गुदने वाले की दुकान पर अपना नम्बर लगाकर बैठे ही थे कि यह हादसा घटित हुआ और हमारा प्लान फेल हो गया ।  

मुझे याद है ..श्याम काका ने कहा था कि  अच्छे घरों के बच्चे गुदना नहीं गुदवाते हैं । आज जब मैं अच्छे घरों के बच्चों को बतौर फ़ैशन  अपने जिस्म में यहाँ वहाँ टैटू लगाये देखता हूँ तो मुझे उस घटना की याद आती है । फिर हम लोग कभी गुदना नहीं गुदवा पाए और जीवन भर अच्छे घरों के बच्चे बने रहे ।

अब आदिवासी क्षेत्रों में ही गुदना अपने पारंपरिक रूप में शेष है हालाँकि अब उसका चलन भी कम होता जा रहा है । शहरों की युवा पीढी को टैटू लगाये हुए देखता हूँ तो सोचता हूँ यह विकास के द्वारा मानव को उपहार में मिला साम्यवाद है  या नवीनता और परिवर्तन के प्रति मनुष्य का आकर्षण ..जो भी हो किसी का वह कथन सत्य लगता है कि विकास का चक्र आगे बढ़ने के क्रम में कुछ मामलों में खुद को दोहराता है ।



52. आदिवासी अपनी वनोपज महुआ, अचार,चिरौंजी बेचने आते हैं


बैतूल के इस साप्ताहिक बाज़ार में आनेवाले सभी आदिवासी केवल ज़रूरत का सामान खरीदने यहाँ नहीं आते थे बल्कि बहुत सारे आदिवासी अपनी वनोपज महुआ, अचार,चिरौंजी जैसी वस्तुएं बेचने के लिए भी यहाँ आते थे । बिक्री के बाद उन्हें जो पैसे प्राप्त होते उससे वे नमक, किराना, साबुन,अनाज और अन्य ज़रूरत का सामान खरीद लेते । इस तरह वे ग्राहक भी होते और दुकानदार भी, यद्यपि शहर के लोगों जैसे चालाक दुकानदार तो वे हो भी नहीं सकते थे । शहर के लोग भी उन दिनों इतने सभ्य नहीं हुए थे कि उनकी वनोपज को औने-पौने दामों में खरीद लें । फिर भी उनकी वस्तुओं को इतने कम दामों में बिकता देख कर आश्चर्य होता था । चिरौंजी जैसी वस्तु भी सूखे मेवों की दुकान पर पहुँचकर बीस पच्चीस गुना महंगे दामों में बिकने लगती थी ।

आज आदिवासी पहले की अपेक्षा समझदार हो गए हैं । वे अब इस तरह ठगे नहीं जाते । हालाँकि अब उन्हें ठगने वालों ने नए तरीके ईज़ाद कर लिए हैं । आज आदिवासियों के जंगल और ज़मीन पर मल्टी नेशनल कम्पनियाँ कब्ज़ा कर रही हैं, उन्हें असीमित दोहन के अधिकार और लायसेंस दिए जा रहे हैं । आदिवासी उस समय भी इन चालाक शहर वासियों का मुकाबला नहीं कर सकते थे आज भी वे बमुश्किल अपने शोषण के खिलाफ़ कुछ बोल पाते हैं । यह बात और है कि अब तो अपने शोषण के खिलाफ़ पढ़े-लिखे शहरी भी बोल नहीं पा रहे हैं ।

ये सब ताड़ी के अधिकारी  

सुबह से शाम तक चलने वाला बैतूल का यह हाट बाज़ार केवल सब्जी भाजी या आवश्यक वस्तुओं के लिए नहीं होता था बल्कि मनोरंजन के भी यहाँ भरपूर साधन होते थे । हमारी लाइन के पीछे की ओर मरघट के सामने वाले मैदान में जहाँ सफाई कर्मियों की बस्ती थी वहाँ ऊपर नीचे चलने वाले लकड़ी के हवाई झूले लगते थे ।


खाने पीने की वस्तुओं के अलावा स्त्रियों और बच्चों के लिए इतना मनोरंजन पर्याप्त था । लेकिन बड़ों का मन इस तरह थोड़ी देर झूलने और झूमने से थोड़े ही भरता सो वहीं एक किनारे पर ताड़ी की एक दुकान के रूप में उनके झूमने का भी बेहतर प्रबंध था । घर लौटते हुए जहाँ ठहरना उनके लिये अनिवार्य था । 

इतने अलंकारों से तो आप समझ ही गए होंगे कि ताड़ी कोई नशीला पदार्थ है वास्तव में ताड़ी का अर्थ है ताड़ के या छीन्द के पेड़ का रस । पेड़ से यह रस प्राप्त करने के लिए अर्थात ताड़ी उतारने के लिए ताड़ के पेड़ पर चढ़कर ऊपर की ओर पत्तों के निचले हिस्से में तने पर एक हल्का सा चीरा लगाया जाता है, फिर उसमे एक खपच्ची फँसाकर उसका दूसरा सिरा वहीं तने से बंधी एक मटकी में लगा दिया जाता है ताड़ के पेड़ के तने से बूँद बूंद रस निकलता है और नाली नुमा खपच्ची से बहता हुआ धीरे मटकी में इकठ्ठा होने लगता है । कुछ घंटों बाद जब मटकी रस से भर जाती है , एक आदमी पेड़ पर चढ़कर उसे उतार लेता है ।


धीरे धीरे फर्मेंटेशन होते जाने के कारण यह रस नशीला होता जाता है । हालाँकि  इसका नशा बहुत हल्का रहता है । एक तरह से यह लोकल प्राकृतिक बियर ही होती है । महाराष्ट्र में नागपुर की ओर ताड़ी नमक इस पेय को नीरा कहते हैं और सरकार द्वारा बाकायदा इसे प्राप्त करने और बिक्री हेतु लाइसेंस प्रदान किये जाते हैं ।

अब इनमें कुछ लोग ऐसे भी होते थे जिन्हें इतने मामूली से झूमने में आनंद नहीं आता था अर्थात उनका झूमने का माद्दा इससे थोड़ा अधिक था । ये हमारे पियक्कड़ समाज के उन लोगों की तरह थे जिन्हें ताड़ी लेडीज़ ड्रिंक लगता था । ऐसे मर्दों को अपनी मर्दानगी का अवसर प्रदान करने हेतु वहीं पास में देसी शराब ठेके की व्यवस्था भी थी यहाँ सरकारी शराब के अलावा महुए की शराब भी मिलती थी । हालाँकि ज़्यादातर आदिवासी अपने घरों में ही महुए की शराब बनाने में विश्वास रखते थे इसलिए यहाँ वे सरकार के आबकारी विभाग के माध्यम से सरकार को वित्तीय सहायता पहुँचाने के उद्देश्य से एकत्रित होते थे । 

जैसे जैसे संध्या परी का आगमन होता लाल परी की बिक्री बढ़ जाती । चालीस वाट के टिमटिमाते पीले बल्ब की रौशनी में देसी शराब भट्टी की खिड़की पर उपस्थित उन मानव आकृतियों को पहचानना मुश्किल होता  । कुछ दूरी पर बाहर मैदान में अँधेरे में जलते हुए पुआल पर छोटी छोटी मछलियाँ भूनी जा रही होतीं । वातावरण में उपस्थित इस स्वप्न दृश्य में सोंधी सोंधी सी गंध और कुछ न समझ में आने वाली ध्वनियों के बीच जाने कितने घीसू,माधव और देवदास दिखाई देने लगते । उनके सामने बोतल और गिलास के साथ चखने के रूप में भुनी हुई ताज़ी छोटी छोटी सुनहरी मछलियाँ, भुनी कलेजी और शाकाहारी चना चबैना भी मौजूद होता । फिर शाम ढलने के साथ धीरे धीरे यह वैभव भी ढलने लगता ।



51.बैतूल का साप्ताहिक हाट बाज़ार

 

रविवार और गुरुवार को हमारा मोहल्ला एक रंगमंच बन जाता था । हफ़्ते के इन दो दिनों में लगने वाला यह हाट बाज़ार हम लोगों के लिये बैतूल के हमारे इतवारी बाज़ार नामक मोहल्ले के स्थायी से दिखाई देने वाले परिवेश में दृश्य परिवर्तन की तरह होता था । 
दुर्गा मंदिर से लगी दुकानें 
रंगमंच पर प्रॉपर्टी अर्थात ज़रूरी उपकरणों का प्रवेश सुबह से ही प्रारंभ हो जाता था सबसे पहले बैलगाड़ियों, छोटे ट्रकों का आना शुरू होता, उनसे एक एक कर सामान उतरता , कैनवास के तम्बू, तिरपाल ,सब्जियों के टोकरे, तराजू, बाँट, खाली बोरे, हलवाइयों की भट्टियाँ, बड़े बड़े थाल , बाल्टियाँ , फल वालों के लकड़ी के स्टैंड, आदि । सबकी अपनी अपनी दुकान की जगह तय रहती थी कोई किसी के क्षेत्र में अतिकरामं नहीं कर सकता था चारों कोनों में तिरपाल बांधने के लिए ज़मीन गीली कर लोहे के बड़े बड़े खूंटे गाड़े जाते। टन टन टन खूंटों पर पड़ती घन की मार से हम लोग समझ जाते कि अब इन पर तिरपाल बांधा जायेगा यह तम्बू जिसे हम लोग तिरपाल कहते थे यह तार्पोलीन का देशज रूपांतर था । 

बोरों मे सब्ज़ी 
बाज़ार के इस रंगमंच पर दुकान लगाने हेतु आवश्यक वस्तुएं स्थापित हो जाने के पश्चात गीले बोरों के में लिपटे सब्जियों के गठ्ठर उतारे जाते और उन्हें करीने से सामने बिछे हुए बोरों पर सजाया जाता । उधर रघुवीर टाकीज के सामने फल वालों की दुकानें सज जातीं । मोहल्ले के अंतिम छोर पर बनी रिंग रोड पर मिर्च मसाले और अनाज की दुकानें लाल रंग में रंगी दिखाई देतीं वहीं तापी की कपड़ों में प्रेस करने की दुकान के सामने वाले हिस्से में हलवाइयों की भट्टियाँ तैयार हो जातीं । मंदिर की दाहिनी ओर मिशन स्कूल के सामने मनिहारी की दुकानें सजतीं और मेन रोड पर चांदी के जेवरों की ।

ग्यारह बारह बजे तक बाज़ार के इस मंच की सज सज्जा जारी रहती थी । फिर दुकानदार दुकान की को झुककर प्रणाम करते और गद्दी पर बैठ जाते । अब संवाद शुरू होते, बैंगन एक आना किलो, टमाटर दो आना,  लो कटहल ताज़ा कटहल । अब नए पात्रों के रूप में ग्राहकों का आना शुरू होता । 

ख़मीर की ख़ुमारी में गर्म गर्म जलेबियाँ 

दोपहर तक बाज़ार अपने शबाब पर आ जाता था । हलवाई की दुकान पर भट्टी के लाल लाल दहकते हुए कोयले पर रखी कढ़ाई में खौलते तेल से जलेबियों की महक उठने लगती । जैसे ही खुशी से फूलती उसे चाशनी में दबा दिया जाता । गुड़पट्टी तो घर से बनाकर लाई जाती थी । ढेर पर मंडराती हुई ततैया से बचते हुए ग्राहक गुड़ में पगे सेव के लड्डू खरीदते और वहीं दुकान पर खड़े खड़े खा जाते ।


मैदे के टुकड़ों को चाशनी में डुबोकर बनाये हुए खाजा को बंधवाकर घर ले जाना अधिक उचित होता था यह लम्बे समय तक टिकने वाली मिठाई होती थी बूंदी के लड्डू तो गरमागरम तुरंत तैयार किये जाते जलेबी के साथ कॉम्बिनेशन के लिए एक भट्टी में गरमागरम आलुबोंड़े निकलते रहते ।

उधर मनिहारी की दुकान पर आदिवासी बालाएँ चूड़ी ,कंगन, बिंदिया, चोटी में लगाने के बैंगनी रंग वाले फुंदने, रंगबिरंगी कंघियाँ और शीशे, नेलपालिश और आलता, आदि खरीदने हुए दिकाही देतीं वहीं पास में होती बच्चों के खिलौनों की दुकानें, मिट्टी की कमर मटकाने वाली गुड़िया, पी पी करने वाला बाजा , रंगीन कागज की चरखी ,

हम लोगों को पैसे मिलते थे उससे हम लोग क्या क्या खरीदते थे 

बैतूल शहर के आसपास से अनेक ग्रामीण जन  सब्जी भाजी ,कपडा , मिठाई और जरुरत की वस्तुएं खरीदने अपने बालबच्चों सहित आते थे । इन गाँव वालों में आदिवासियों की संख्या अधिक हुआ करती थी l गोंड आदिवासियों को सबसे पहले मैंने इसी हाट बाज़ार में देखा l उनकी भाषा गोंडी थी लेकिन सामान खरीदने के लिए वे कामचलाऊ भाषा सीख चुके थे । दुकानदारों ने भी गोंडी के कुछ शब्द सीख लिए थे और उन्हें भी सामान बेचने में कोई दिक्कत नहीं होती थी । आज हम दुनिया के किसी भी देश में बने प्रोडक्ट का विज्ञापन देश की किसी भी भाषा में देख सकते हैं 

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