बैतूल का हमारा वह खपरैल वाला मकान ठीक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इस कविता में बताये गए मकान की तरह ही नगर के अंतिम छोर पर था । आठ दस मकानों के बाद से ही रिंग रोड के उस पार से खेत शुरू हो जाते थे ।
नगर से दूर कुछ गाँव की-सी बस्ती एक
हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम
जहाँ पत्राजाल अंतराल से झलकते हैं
लाल खपरैल श्वेत छज्जों के सँवारे धाम
मुझे आश्चर्य होता था कि खपरैल वाले उस छोटे से मकान में इतने सारे लोग कैसे रह लेते थे । मुझे यह मकान जादूगर के उस छोटे से डिब्बे मैजिक बॉक्स की तरह मालूम होता था जिसमे से जादूगर जाने क्या क्या चीज़ें निकाल लेता है । हालाँकि यह मकान इतना छोटा भी नहीं था यह दुमजिला था और काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था ।
विश्वेश्वर प्रसाद जी तो काफी पहले गुजर गए थे लेकिन उनके बड़े बेटे बाबूलाल जी अपने छोटे भाइयों बृजलाल,कुन्दनलाल, सुन्दरलाल, चन्दनलाल और उनके बाल बच्चों के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे ।
सबसे छोटे चन्दन लाल का निधन अल्पायु में सन पचास से पूर्व ही हो चुका था । उनकी पत्नी रामदुलारी यानि छोटी काकी अपनी एक बेटी उषा तथा बेटे किशन के साथ वहाँ रहती थीं । बड़ी बेटी आशा का विवाह बाबूजी के विवाह के कुछ समय पश्चात ही नागपुर में रतनलाल शर्मा जी के साथ हो चुका था । उनकी सुभाष, मालती, रेखा,रजनी व रानी नामक पांच संतानें थीं । छोटी बेटी उषा का विवाह कुछ समय बाद मुंबई में विजय कुमार शर्मा जी के साथ हुआ । उनके अखिलेश,निखिलेश,विमलेश व अमित चार बेटे हुए ।सुन्दरलाल दादा जी नि:संतान थे और उस पुराने कच्चे मकान के दक्षिणी भाग में फर्नीचर कारखाने के पीछे की ओर रहा करते थे । बैतूल में वे काफी रुतबे वाले व्यक्ति थे । वे समाज सेवी थे तथा एक समय नगर परिषद बैतूल में पार्षद भी रह चुके थे । उनकी पत्नी यानि हमारी दादी रतनबाई धार्मिक कर्मकांडों के अलावा छुआ-छूत भी बहुत मानती थीं। उनके वाले हिस्से के पीछे के आंगन में एक बड़ा सा कुआँ था जिसके कारण उन्हें सब ‘कुएँ वाली काकी’ कहते थे ।
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| इस गोल घेरे के भीतर था कुआँ |
दादी तड़के ही स्नान कर लेतीं और पूजा - पाठ के बाद गीले वस्त्रों में रसोई बनाती थीं । उन्होंने पहले से ही अपनी रसोई अलग कर रखी थी । हम बच्चों को उनके यहाँ जाने में बहुत डर लगता था। जून के माह में जब उनके पिछवाड़े के आंगन में जामुन के पेड़ पर मीठी मीठी जामुन लगती थीं, हम बच्चे उन्हें तोड़ने पहुँच जाते थे और दोपहर के सुनसान में पत्थर की आवाज़ से दादी की नींद में ख़लल डालने के आरोप में उनकी डांट खाते थे । शाम को दादी हम बच्चों को खुद ही बुलाती थीं और मीठे मीठे जामुन खाने के लिए दिया करतीं थीं । दादा दादी तो नहीं रहे लेकिन यह जामुन का पेड़ आज भी उसी जगह है ।
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| आज भी है जामुन का पेड़ |
बृजलाल दादा उन दिनों हम बच्चों को एक कहानी सुनाया करते थे जिसमे नदी किनारे जामुन के पेड़ पर रहने वाले बन्दर की एक मगरमच्छ से दोस्ती हो जाती है। एक दिन मगरमच्छ उस बन्दर को अपनी पीठ पर बिठाकर अपने घर ले जाता है और रास्ते में बताता है कि उसकी पत्नी ने कहा है जो बन्दर रोज मीठी जामुन खाता है उसका कलेजा कितना मीठा होगा । बन्दर बुद्धि से काम लेता है और कहता है कि “मित्र कलेजा तो मैं पेड़ पर ही भूल गया हूँ, एक बार वापस ले चलो ताकि भाभी की इच्छा पूरी कर सकूँ ।“ बस फिर क्या था बन्दर पेड़ पर गया सो गया । यह कहानी सुनकर हम बच्चे उन दिनों यही सोचते थे कि जामुन खाने से हमारा कलेजा भी खूब मीठा हो गया होगा, अब कोई हमसे कलेजा मांगेगा तब भी नहीं देंगे ।
सुन्दरलाल दादा से बड़े कुन्दनलाल दादा थे । वे रेलवे की नौकरी से अवकाश लेकर बैतूल आ गए थे । दादीजी का नाम चंपा देवी था और उन्हें किताबें पढ़ने का बहुत शौक था । कहानी,उपन्यास और पत्रिकाएँ पढ़ें बगैर उन्हें नींद नहीं आती थी । जासूसी उपन्यास वे बहुत चाव से पढ़ती थीं । कुंदनलाल जी के बेटों में सबसे बड़े मनोहर बैंगलोर में एच एम टी घड़ी कंपनी कार्य करने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी के लिए आ गए थे । बचपन में ही अपने नाना के पास जबलपुर चले गए थे । सुशीला चाची मेरी माँ शीला की हमनाम हैं ।
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| मनोहर चाचा सुशीला चाची गोपाल ममता |
उनके बच्चों के नाम हैं सरिता, गोपाल, मंजू, ममता और संजय । यह सारे बच्चे बैतूल की हमारी ग्रीष्मकालीन आयुवर्गानुसार बनाई धमाचौकड़ी टीम में शामिल हुआ करते थे । बाद में सरिता जीजी का विवाह भिलाई में सुरेश चन्द्र शर्मा से, मंजू का बिलासपुर में सुन्दर लाल विश्वकर्मा से और ममता का नागपुर में शैलेश माहुले से हुआ ।
उस समय मनोहर चाचा से छोटे वीरेंद्र चाचा कॉलेज में पढ़ रहे थे । वीरेंद्र चाचा लकड़ी के फर्नीचर का काम बहुत अच्छी तरह जानते थे लेकिन वे बहुत महत्वाकांक्षी थे । वे बाबूजी से बहुत प्रेरित रहे इसलिए बैतूल में रहते हुए ही उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन किया और मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में वे रेलवे में फायरमैन की नौकरी करने के लिए भावनगर गुजरात चले गए । फिर वे वेस्टर्न रेलवे में पदोन्नत होकर सन पचहत्तर में मुंबई आ गए और फिर वहीं प्रभादेवी में सेटल हो गए ।
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| वीरेंद्र चाचा देवकी चाची मनीष आशीष निधीश अनिषा |
उनका विवाह मुंबई में ही मुन्नीलाल जी की बेटी देवकी से हुआ था । उनके बच्चों के नाम हैं, मनीष, अनिषा, आशीष और निधीश । अनिषा का विवाह शशांक जी केनी से हुआ है और वह वर्तमान में अमेरिका में सेटल है । बाक़ी सभी भाई अपने परिवार सहित मुंबई में हैं ।
कुंदनलाल दादा के अन्य दो पुत्र उपेन्द्र और सुरेन्द्र है । सुरेन्द्र उर्फ़ मुन्ना कक्कू लगभग मेरी उम्र के ही हैं । उपेन्द्र काका भी छात्र जीवन में मेधावी रहे, उन्होंने बाद में चिकित्सा विभाग में नौकरी ज्वाइन कर ली लेकिन अपने भाइयों व भाभियों के लाख समझाने के बावजूद उन्होंने विवाह नहीं किया । विवाह न करने हेतु उनके अपने तर्क हुआ करते थे । फिर मुन्ना कक्कू ने भी न विवाह न कहीं नौकरी की, लेकिन खेतीबाड़ी करते रहे । यह दोनों चाचा अभी भी अविवाहित ही हैं और उनका अपना जीवन दर्शन अटल है ।
कुंदनलाल जी की बेटियों में उस समय सिर्फ सरोज वहाँ थीं । बेटियों में कुसुम का विवाह वर्धा में सुग्रीवन से और ध्यान का विवाह जबलपुर में शम्भु रतन से हो चुका था । सरोज का विवाह बाद में बिलासपुर के कन्हैया लाल जी विश्वकर्मा से हुआ जिनसे उनकी संतानें हुई रीतेश, एकता और राहुल । ध्यान बुआ के बच्चों में राजू मेरा हमउम्र था और योगेश व स्वर्णा छोटे थे । कुसुम बुआ के सभी बच्चे आशीष,सुदीप,अनूप,संदीप,रेखा,जयवंती और रमा मुझसे बहुत छोटे थे । कुंदनलाल दादा जी की सबसे बड़ी बेटी ज्ञानवती का निधन बचपन में ही हो गया था ।
इन दिनों यह बात बहुत आश्चर्य जनक लगती है लेकिन हम लोगों को बताया गया था कि कुंदनलाल दादाजी की कुल मिलाकर उनकी चौदह संताने हुई थीं जिनमे से सात का उनकी शैशवावस्था में ही उनका निधन हो गया था इसलिए वे परिवार की क्रोनोलॉजी में शामिल ही नहीं हो पाई ।
शरद कोकास












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