बचपन के शब्दकोष में पर्व का अर्थ है नए कपड़े और मिठाई, जिसके विस्तार में दिवाली और ईद आते हैं । रोचक कथाओं के आलंबन में तीज त्योहारों का उत्साह जन्म लेता है और राष्ट्रीय पर्वों के मनाये जाने की कथा बिना चीनी की दूध रोटी की तरह बेस्वाद लगती है ।
गुरूजी की बेंत के आतंक में होमवर्क की तरह जन गण मन रट लेने की विवशता बचपन में ही प्रश्न करने की आकुलता की हत्या कर देती है । फिर हम जीवन भर तिरंगे के सामने अगरबत्ती लगाकर और नारियल फोड़कर उसे सलाम करते हुए धूप में खड़े खड़े गाने का अभिनय करते हैं और कोई नहीं पूछता था कि इसमें जो लिखा है उसका मतलब क्या है ? न हम सवाल पूछते हैं न रघुवीर सहाय की यह पंक्तियाँ पढ़ते हैं ..
राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है
मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चंवर के साथ
तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर
जय-जय कौन कराता है
मैंने भी बड़े होने तक यह सवाल किसी से नहीं पूछा । पंद्रह अगस्त से दो दिन पूर्व ही दूसरी तीसरी कक्षा के बच्चों ने बता दिया था कि यह आज़ादी का दिन है, इस दिन सबको सुबह नहा धोकर झंडा फहराने स्कूल आना है , झंडा फहराने के बाद मिठाई मिलेगी । सुबह सुबह नहाने का आज़ादी से क्या सम्बन्ध है यह मुझे समझ में नहीं आया, रोज़ तो हम स्कूल से आने के बाद नहाते थे । जैनेन्द्र जितेन्द्र ने प्रस्ताव रखा कि रात में सब मिलकर उनके घर पर पढ़ाई करेंगे और सुबह तैयार होकर वहीं से स्कूल चले जायेंगे, नहाये हैं या नहीं नहाये हैं किसे पता चलता है । मैं खुशी खुशी तैयार हो गया । स्वतंत्रता दिवस से मेरा कोई लेना देना नहीं था लेकिन मुफ़्त में मिलने वाली मिठाई मैं छोड़ नहीं सकता था ।
घर में खाना खिलाकर बाबूजी ने मुझे जैनेन्द्र जितेन्द्र के यहाँ पहुँचा दिया । कुछ देर पढ़ाई का अभिनय करने के पश्चात हम लोग सोने चले गए । जैनेन्द्र जितेन्द्र की माँ ने हम सब बच्चों के लिए बीच के कमरे में ज़मीन पर बिस्तर लगा दिया था । बातें करते हुए सब लोग सो गए, लेकिन मेरी आँखों से नींद नदारद । कुछ देर बाद मुझे कारण समझ में आया कि मुझे बगैर तकिये के नींद नहीं आ रही है । उनके यहाँ किसी की तकिया लगाने की आदत नहीं थी सो मुझे भी तकिया नहीं मिली थी । दरअसल तकिया उनके यहाँ था ही नहीं ।
अनिद्रा की इस स्थिति में मुझे घर की याद सताने लगी और मैंने सुबकना शुरू कर दिया । मेरे रोने से उनके पिताजी की नींद खुल गई । मैंने उन्हें कारण बताया तो उन्होंने समझाने की कोशिश की, तकिये का विकल्प भी रखा लेकिन मेरी एक ही रट थी …घर जाऊँगा । फिर वे उठे चप्पलें पहनी और मुझे घर तक छोड़ने आये । बाबूजी आश्चर्य से गुजरकर गुस्से तक पहुँचे, इससे पहले कि वे मुझे डाँटते मैं गहरी नींद में सो चुका था ।
बड़े होने के बाद एक दिन मैंने उस घटना का विश्लेषण किया कि उस दिन घर जाने की ज़िद के पीछे असल कारण क्या था,घर की याद या तकिया न होना । मुझे तकिये का सम्बन्ध सुविधा की अपेक्षा आदत के अधिक निकट लगा । उस उम्र में इतना विवेक मुझमें नहीं था कि आदतों के साथ समझौता कैसे किया जाता है । कुछ लोगों के भीतर बड़े होने के बाद भी यह विवेक उत्पन्न नहीं होता । मुझे लगता है अगर उस दिन बिना तकिये के नीन्द आ जाती तो शायद घर की याद नहीं आती ।
अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को उनके बचपन से ही सुविधाजीवी बना देते हैं । बच्चों की हर वैध अवैध मांग पूर्ण करना माँ-बाप अपना कर्तव्य समझते हैं । बच्चे भी उस सुविधा को अपना अधिकार समझने लगते हैं और जब उन्हें यह सुविधा प्राप्त नहीं होती है तो वे विद्रोह कर बैठते हैं । बचपन में उनकी इच्छाएं पूरी करना माँ-बाप के लिए आसान होता है किन्तु जब उनकी इच्छाएँ बढ़ने लगती हैं तब एक सीमित आय के व्यक्ति के लिए उन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं होता । बचपन में अपराध की ओर प्रवृत होने के पीछे यह एक प्रमुख कारण है । बड़े होने के बाद हम सुविधा को आदत करार देते हुए उसे हासिल करने के लिए बहुत सारे अवांछित कार्य भी करते हैं |
विगत सदी के उत्तरार्ध में जन्म लेने वाले बच्चों की इच्छाएँ इतनी बड़ी नहीं हुआ करती थीं जिन्हें पूरा करना मध्यवर्गीय माता - पिता के लिए मुश्किल होता । बच्चों के लिए सबसे महंगा शौक उन दिनों सिनेमा देखना होता था और देर सवेर,रोते झींकते उनकी यह इच्छा पूरी हो ही जाती थी । बच्चों को महंगी या सस्ती ड्रेस का अंतर पता नहीं था फिर रेडीमेड कपड़ों का चलन भी नहीं के बराबर था । माँ बाप द्वारा दिलवाए गये साल के दो ड्रेस काफी थे । घर से बाहर किसी होटल में खाने का चलन भी नहीं था जलेबी,बूंदी,बालूशाही,भजिये ,आलूबोंड़े बेसन और रवे के लड्डू घर में ही बन जाते थे या कभी कभार साप्ताहिक बाज़ार के दिन जो भी सस्ती मिठाई घर में आ जाती थी उसीमे संतोष हो जाता था ।
पंद्रह अगस्त की सुबह जैनेन्द्र जितेन्द्र मुझे लेने घर आ गये । मेरी आँखों में पिछली रात का कोई अपराध बोध नहीं था । रोज़ की तरह हम लोग स्कूल के लिए रवाना हो गए । हमारे प्रधान अध्यापक शिवहरे जी यानि बड़े गुरुजी ने झंडा फहराया । जन गण मन,वन्दे मातरम से लेकर विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा तक सारे गीत हमने गाए । सिनेमा के गानों से कुछ अलग इन गीतों को गाने का मेरा यह पहला अवसर था । अगली छब्बीस जनवरी तक मैंने सब गीत रट लिए थे ।
मेरी नज़रें मिठाई की तलाश कर रही थीं । मैंने जितेन्द्र से पूछा तो पता चला कि ध्वजारोहण के बाद सब बच्चों को गांधी चौक ले जाया जायेगा । वहाँ से आने के बाद घर जाने से पहले मिठाई मिलेगी । बहुत कठिन शर्त थी इसलिए कुछ बच्चे वहीं से वापस घर चले गए । हम बचे हुए बच्चे जुलूस की शक्ल में गाँधी चौक पहुँचे । वहाँ सफ़ेद कुरता पजामा और गाँधी टोपी पहने एक व्यक्ति द्वारा झंडा फहराया गया । पूछने पर पता चला कि उन्हें नेताजी कहते हैं । ‘अच्छा तो नेता ऐसा दिखाई देता है’ , यह किसी नेता के बारे में मेरे अवचेतन का पहला बिम्ब था । उन दिनों महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी का शासन था और कांग्रेस के नेताओं की यह प्रिय वेशभूषा हुआ कराती थी । वे शायद नगर पालिका के अध्यक्ष या कोई विधान सभा सदस्य रहे होंगे । ‘नेताजी’ इस विशेषण में सुभाषचंद्र बोस का बिम्ब मेरे अवचेतन में स्थापित होने से पूर्व भंडारा के उन्ही नेताजी का बिम्ब था ।
नेताजी ने अपने भाषण में बताया कि आज के दिन हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था इसलिए हम आज स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं । घर आकर मैंने बाबूजी से पूछा “अंग्रेज कैसे दिखाई देते हैं ?” उन्होंने धर्मयुग में छपी एक तस्वीर मुझे दिखाई जिसमे नेहरू जी और लार्ड माउंटबेटन साथ साथ थे । मैंने रट लिया सैनिक टोपी वाले अंग्रेज माउंटबेटन और गाँधी टोपी वाले नेहरू जी । बाबूजी ने संक्षेप में आज़ादी की लड़ाई और इतिहास से भी मेरा परिचय कराया था और नागपुर में नेहरूजी से उनकी मुलाकात की घटना भी सुनाई थी । आज़ादी के इतिहास के बारे में यह मेरा पहला पाठ था ।
असली बात तो रह ही गई, स्कूल लौटने के बाद हम भाषण सुनने वाले बच्चों को कांच के एक ग्लास मे चार गुलाब जामुन मिले । पहले वाले बच्चों को सांत्वना पुरस्कार की तरह बूंदी पर ही टरका दिया गया था । कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस का सार यही था ।



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