11 जून 2026

165 मेरे काका लीलाधर वसाणी , पानसे काका , हंडियेकर सर , देशपांडे काका , नान्दूरकर काका



90.6 देशपांडे और नान्दूरकर काका - बाबूजी के साथ देशपांडे काका और नान्दूरकर काका उनके कलीग थे । देशपांडे काका की दो बेटियाँ थीं और नान्दूरकर काका के एक बेटा व तीन बेटियाँ । उनका बेटा श्रीकांत यानि राजा मेरा मित्र था । हम लोग कभी कभी उनके घर जाया करते थे और वे लोग भी हमारे घर आया करते थे ।

90.7 हंडियेकर सर – बाबूजी के एक मित्र और थे जिनका नाम था विठ्ठल नागेश हंडियेकर । वे इन्दौर के रहने वाले थे और भंडारा के जे एम पटेल कॉलेज में इतिहास के व्याख्याता थे । उनकी पत्नी जकातदार कन्या शाला में पढ़ाती थीं । बाबूजी ने भी इतिहास में एम ए किया था इस नाते उनकी मुलाकातें होती रहती थीं । बचपन के उन दिनों में मेरा तो उनसे अधिक सम्पर्क नहीं हुआ लेकिन मेरे कॉलेज जाने के बाद मेरे जीवन में उनका महत्वपूर्ण रोल रहा । उन्हीं के कहने पर बाबूजी ने मुझे पोस्ट ग्रेजुएशन के लिये उज्जैन भेजा था ।


और भी बहुत से लोग थे भंडारा में जैसे डॉ.सुधाकर जोशी और उनकी पत्नी कुछ समय बाद वे हमारे फैमिली डॉक्टर हो गए थे। हमारे आसपास रहने वालों में जिनके नाम मुझे याद आते हैं वे हैं  डॉ.हरदास, श्री तेजनाथ दलाल, श्री अशोक भिवगड़े,श्री शांडिल्य,देव मास्टर,श्री निखार, श्री खंडालकर, पी सी रहांगडाले, श्री पानसे, श्री बापट, श्री हार्डीकर,राम हेडाऊ, श्री गोविन्द असोलकर, डॉ.रामकुमार सिंह, श्री हरिमोहन कौल और श्रीमती कुसुमताई गोंडनाले जिनके बेटे किशोर से बाद में बहन सीमा का विवाह हुआ ।   


164 व्यवहारे डॉक्टर , , ,

डॉक्टर के बारे में मैं जब भी सोचता तो यह बात मन में जरुर आती कि इन्सान को पहली बार किसी दोक्टोत की जरुरत पड़ी होगी तो वह किसके पास गया होगा ज़ाहिर है उस समय बहुत से गुणी बैगा ओझा आदि हुआ करते थे जिनके पास अह जात था जो जड़ी बूटियों आदि से इलाज करते थे फिर यही लोग वैद्य बन गए प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति फिर आयुर्वेद होमियोपैथी आदि का चलन हुआ और उसके बाद मेडिकल साइंस ने एलोपैथी की खोज की पुरानी पद्धतियाँ कहीं पर ठहर गईं और एलोपैथी अपना विकास करती रही  उन दिनों गांवों में अमूमन सभी प्रकार के चिकित्सक हुआ करते थे आयुवेद पर लोगोंका विश्वास था और होमियोपैथी में पैसे कम लगते थे लेकिन इमरजेंसी में तो एलोपैथिक डॉक्टर की शरण में ही जाना पड़ता था 


मेरे दादाजी आयुर्वेदिक वैद्य थे , बाबूजी को भी चिकित्सा में काफी रूचि थी और वे होमियोपैथी का अध्ययन किया करते थे उनके पास एक किताब थी जिसका शीर्षक था डॉ शुश्लर की बारह दवाइयां डॉक्टर शिष्लर होमियोपैथ थे जर्मनी के बाबूजी के पास एक बक्सा था लकड़ी का जिसमे होमियोपैथी की गोलियां रहती थीं लेकिन उन्ही दिनों बाबूजी की भंडारा के डॉक्टर व्यवहरे से मुलाकात हुई और उन्होंने उनके यहाँ जान शुरू किया डॉक्टर व्यवहारे का खाम्तालाव जाने वाले रोड पर एक दवाखाना था डॉक्टर व्यहारे एक कड़वी सी दावा दिया करते कांच की शीशी में जसपर एक कागज की पत्ती लगी रहती जिसमे कोर्नेअर एरो जैसे बने होते उसका अर्थ था कि एक खुराक यहाँ तक लेनी है  किसी मरीज की बीमारी की गंभीरता को देखते हुए वे कहते इसे सुई लगानी पड़ेगी  सुई से मुझे बहुत दर लगता था स्कुल में जब टीके लगाये जाते तो मुझे देख देखकर ही दहशत होने लगती थी उन दिनों डॉक्टर के यहाँ एक कम्पौन्दर हुआ करता था जो छोटो मोटो सर्जरी में भी एक्सपर्ट होता था मरहम पट्टी से लेकर दवाओं के नाम पता नहीं रहते थे बस लाल दवा पीली दावा नीली दवा जैसे शब्द प्रचलित थे  डॉक्टर चाहे होमियोपैथ हों या एलोपैथ स्ठेठेस्कोप के आलावा नाडी भी चेक करते थे , जीभ दिकना पड़ता पेट को दबा दबा कर दखते कल क्या खाया पूछने पर कुछ बता नहीं पाते  डॉक्टर हँसते कहते बच्चे क्या बताएँगे फिर वे बाबूजी से पूरी जानकारी ले लेते 


 90 .5 व्यवहारे डॉक्टर -  गुर्जर  चौक से बाज़ार की ओर जाते हुए व्यवहारे डॉक्टर का दवाखाना पड़ता था । वैसे तो बाबूजी को डॉक्टर की ज़रूरत बहुत कम पड़ती थी इसलिये कि वे खुद होमियोपैथी के ज्ञाता थे और छोटी मोटी तकलीफों का खुद इलाज़ कर लिया करते थे । एक बक्सा था उनके पास जिसमें तरह तरह की दवाइयाँ हुआ करती थीं । लेकिन कभी कभी डॉ. के यहाँ जाने की नौबत आ ही जाती थी । एक बार ऐसा हुआ कि बाबूजी मुझे आवाज़ दे रहे थे और मैं अनसुना कर गया । बाबूजी ने पूछा ..क्यों ठीक से सुनाई नहीं देता क्या ? “ मैंने जवाब दिया “ हाँ । “ बाबूजी ने कहा “ ठीक है तुम्हे डॉक्टर व्यवहारे को दिखा देते हैं । “ अगले दिन वे मुझे डॉक्टर व्यवहारे के यहाँ ले गये । डॉक्टर ने मेरे कान में झाँकर देखा , फिर उन्होंने अपने माथे पर एक बेल्ट बान्धा उसमे एक लेंस लगा था । फिर वे मुझे धूप में ले गये और रोशनी को मेरे कान के भीतर केन्द्रित किया और एक उपकरण से मेरे कान के भीतर से ढेर सारा मैल निकाला और कहा “ इसकी वज़ह से ठीक से सुनाई नहीं दे रहा होगा । “ 


163 सूर्यवंशी टेलर



इंसान को कपड़ों की ज़रूरत अपनी लाज ढँकने के लिए नहीं पड़ी उस आदिम इन्सान को तो पता ही नहीं था कि लज्जा किसे कहते हैं नैसर्गिक आवश्यकता में कपड़ों की कोई अहमियत नहीं थी लेकिन शरीर तो एक जैविक पिंड था , उसे ठण्ड लगती थी गर्मी भी लगती थी ,बारिश में वह भीग जाता था तो पहले वस्त्र बने पेड़ के पत्ते , छाल और जानवर की खाल , फिर उसने हड्डी की सुई और पेड़ के रेशों और लताओं से उसे सीना प्रारंभ किया ,फिर जूट के रेशों से कपड़ा बनाना सीखा , उसे सीना भी आ गया 


सदियाँ बीतती गई लोहे की खोज हुई तो हड्डी की सुई लोहे की सुई में बदल गई , हाथों का काम मशीने करने लगीं और इस विशिष्ट काम को करने वाली एक विशिष्ट वर्ग का जन हुआ जिसे दरजी नाम दिया गया . उन दिनों गाँव में कोई एक दरजी हुआ करता था जो लोगों के कपडे सिलता था जैसे जैसे कपड़ों की जरुरत बढ़ी दर्जियों की संख्या भी बढ़ती गई रेडीमेड कपड़ों का चलन बहुत कम होता था अमूमन दरजी ही सबके कपडे सिलते थे त्योहारों पर शदी ब्याह के समय उनके पास काम बहुत बढ़ जाता था 


मेरे जीवन के पहले दरजी थे भंडारा के सूर्यवंशी टेलर । जैसे बाबूजी के दुकानदार तय थे वैसे ही उनके कारीगर भी तय थे । कपड़े सिलवाने के लिये वे सूर्यवंशी टेलर के पास जाते थे । टेलर शब्द सुनते ही एक छवि मन में उभरती है नाक पर चढ़ा हुआ चश्मा जिससे ऊपर हर आने जाने वाली की और झाँकती आँखें गले में लटका इंच टेप सूर्यवंशी टेलर फटाफट कमर छाती और बाँह का नाप लेते और एक रजिस्टर में नोट कर लेते उस समय टाइट कम मोहरी वाली पेंट का फैशन था बाबूजी पहले ही हिदायत देते ज्यादा टाईट नहीं बनाना है हम धीरे से टेलर मास्टर को इशारा कर देते मोहरी कम रखना है लेकिन टेलर मास्टर धीरे से कह देते नहीं गुरूजी नाराज होंगे आखिर पैसा तो उन्हें बाबूजी से ही मिलना था 


सूर्यवंशी टेलर बाबूजी को इसलिए भी पसंद थे कि उन दिनों के आम चलन की तरह वे कपड़ा नहीं चुराते थे बल्कि बचा हुआ कपड़ा ईमानदारी से वापस कर देते  । एक बार बाबूजी दिल्ले से एक गर्म कोट का कपड़ा लाये थे उसमें से कुछ कपड़ा शेष रह गया । बाबूजी ने टेलर से कहा कि वह मेरे लिये एक जैकेट सिल दे । उन दिनों कमर से कुछ नीचे तक की जैकेट पहनने का फैशन था लेकिन सूर्यवंशी टेलर ने जो जैकेट सिली थी वह बमुश्किल मेरी कमर तक आता था । मैंने वह जैकेट पहन तो ली लेकिन उसे पहनकर स्कूल जाते हुए मुझे बहुत शर्म आती थी । बाद में जब उस जैकेट के दिन पूरे हो गये थे कमर तक पहनने वाली जैकेट का फैशन आ गया था ।


कुछ बड़े हुए थे फिर बाबूजी के बताये टेलर की बजाय दोस्तों के बताये हुए टेलर से कपडा सिलवाना शुरू किया किसी दोस्त को बढ़िया पेंट शर्ट पहने देखा तो पूछा “ कहाँ से सिलवाया यार ?” उसने फ्रेंड्स टेलर का नाम बताया बस फिर क्या था वहाँ बाबूजी का कोई दखल नहीं था हम अपने दोस्तों की सलाह के आधार पर उन्हें हिदायत देते , कालर में मोती वाली बकरम लगाना है , बुल डॉग कलर रखना है पॉकेट दोनों तरह होना चाहिए उस पर फ्लैप भी चाहिए , पेंट में नीचे फोल्ड नहीं होना और देवानंद के पेंट की तरह तीन चार प्लेट वाली पेंट बिलकुल नहीं चलेगी पेंट की मोहरी पर काफी डिस्कशन होता और तय किया जाता कि इन दिनों जितनी मोहरी का फैशन चल रहा है उतनी ही रखी जाए पॉकेट सीधे वाले चाहिए या कट वाले , बैक पॉकेट में फ्लैप रखा जाए या नहीं उसमे बटन लगाये या नहीं , शर्त की बटन कौनसे कलर की हो , उस पर ढँकने वाली कपड़े की पट्टी होनी चाहिए या नहीं इन तमाम बातों पर विस्तार से चर्चा की जाती 


लेकिन इन सबके बीच मोहल्ले के मेश्राम टेलर का उल्लेख न आये यह कैसे हो सकता था मेश्राम टेलर की रिंग रोड पर टिन शेड वाली एक छोटी सी दुकान थी अन्य टेलरों की तरह उनकी दुकान पर सूट विशेषज्ञ जैसा कुछ लिखा हुआ कोई बोर्ड भी नहीं था । वे एक ही मशीन जिस पर वे स्त्री पुरुष सभी के कपडे सिया करते बाबूजी ने उनसे कभे कपड़े तो नहीं सिलवाए लेकिन हमारे घर के परदे सोफे के कवर आदि उन्ही के यहाँ सिलते थे । 


यह वह दौर था जब स्त्रियों के कपड़े अधिकांश स्त्रियाँ ही सिलती थी अगर पुरुष टेलर भी थे जो स्त्रियों के कपडे बेहतरीन सिलते थे मेरे मन में यह बात हमेशा रहती थी की वे स्त्रियों का नाप कैसे लेते होंगे लेकिन महिलाएँ उन्हें पहले से सिला हुआ अपना ब्लाउज दे दिया करती जिससे नाप लेकर वे नया ब्लाउज सिल देते फिर पहला कपड़ा शायद किसी स्त्री के द्वारा ही सिला जाता होगा 



162 शोले वाले हरीराम से अच्छे एक्टर थे फत्तूजी



आप लोगों ने जादूगर का वह शो देखा होगा जिसमे वह टेबल पर एक छोटा सा गोल बक्सा रखता है और दिखाता है कि वह खाली है फिर उस खाली डिब्बे में से जाने कितने लम्बे लम्बे रिबन, एक के साथ एक बंधे रुमाल , माचिस, लाइटर जाने क्या क्या निकालता है और फिर अंत में एक कबूतर निकाल देता है । चीता वह निकाल नहीं सकता क्योंकि उसका साइज़ डिब्बे से बड़ा होता है । 


फत्तू जी की हजामत की पेटी भी हमें जादूगर के डिब्बे से कम नहीं लगती थी । वे जब हम लोगों के बाल काटने के लिए हमारे घर आते तो अपने साथ अपनी एल्यूमिनियम की पेटी लाया करते थे । उनकी इस पेटी में कब्जे वाले दो ढक्कन थे, एक बाईं ओर खुलता था और एक दाईं ओर । फत्तूजी के पहुँचते ही बाबूजी ज़मीन  पर बोरा बिछा कर पालथी मारकर बैठ जाते । फत्तूजी भी उनके सामने बैठ जाते और अपनी जादू की पेटी खोलते । सबसे पहले खुलता दाहिनी ओर का ढक्कन और ऊपर ही दिखाई देता तह किया हुआ एक साफ़ सुथरा सफ़ेद कपड़ा जिसे निकालकर वे बाबूजी की गर्दन पर बाँध देते । इसी ओर से निकलती एक कटोरी जिसमे वे मग्गे में लाया हुआ ठंडा पानी भर देते । 


‘खुल जा सिम सिम’ वाली कहानी की तरह अब खुलता दूसरी ओर का  ढक्कन और उसमे से सबसे पहले निकलती एक कैंची । फिर तो जादूगर की तरह फतूजी एक के बाद एक चीजें निकालना प्रारंभ कर देते, एक बड़ी कैंची, एक छोटी कैंची, बड़े दांतों वाली कंघी,  छोटे दांतों वाली कंघी , एक ऐसी कंघी जिसके एक ओर बड़े दांते और दूसरी और छोटे दांते होते थे, इसके अलावा बारीक दांतों वाली एक कंघी और । 

अभी इस जादू की पेटी से सामान निकलना बंद नहीं हुआ है , अब देखिए और क्या क्या निकल रहा है एक खच खच करने वाली लोहे की ट्रिमिंग मशीन, हजामत का उस्तरा, धार बनाने के लिए चमड़े का एक पट्टा या पत्थर , फिर शेविंग करने वाले साबुन की गोल गोल बट्टी , हजामत बनाने का ब्रश , और एक नहन्नी ।


इसके बाद फत्तूजी का केश कर्तन का कार्यक्रम प्रारंभ होता । वे सबसे पहले बालों में पानी लगाकर उन्हें सीधा करते फिर कंघी से खींच खींच कर देखते कि कौनसे बाल लम्बे हैं और कौनसे छोटे । फिर वे कंघे के पिछले हिस्से से गीले बालों को दबाते और बढ़े हुए लम्बे बालों को एक सीध में कैंची से काट देते । 


इसके बाद वे सर के टॉप फ्लोर पर  आते । मोटे दांतों वाली कंघी से बालों को ऊपर की ओर उठाते और दांतों से बाहर आने वाले बालों को कैंची से खच खच काटते जाते । इस बीच उनकी और बाबूजी की गपशप जारी रहती थी । बातें करते करते वे दुनिया जहान की बातें बता डालते । भंडारा की गलियों और नालियों से उनकी बात शुरू होती और राशन दुकान  में अमेरिका से आई लाल ज्वारी की खेप तक पहुँचती । उनके एनसायक्लोपीडिया में भंडारा शहर के अशोक भिवगड़े होते , विदर्भवीर जाम्बुवंत राव धोटे भी । फिर बाबासाहेब आंबेडकर , नेहरू , लाल बहादुर शास्त्री से होते हुए वे कैनेडी तक पहुँचते । जाने कब झुमरी तलैया से बात शुरू करते और जोहान्सबर्ग तक पहुँच  जाते ।


मज़े की बात यह कि बाबूजी को वे बोलने का मौका कम ही देते थे । बाबूजी अगर बीच में कुछ कहना भी चाहते तो उन्हें कहते “गुरूजी सर थोडा दाहिनी तरफ” , ऐसे ही कभी बाईं तरफ झुकवाते । किसी के आगे सर न झुकाने वाले बाबूजी चुपचाप उनके आगे सर झुका देते । वैसे भी मुंह में बाल न चले जाएँ इस डर से बाबूजी मुंह ज़रा कम ही खोलते थे । कैंची का उपयोग हो जाने के पश्चात वे अपनी हाथ से चलने वाली ट्रिमिंग मशीन निकालते ।   


बाबूजी की कटिंग होने के बाद मेरा नम्बर आता था । फत्तूजी कसकर मेरी नन्ही गर्दन पकड़ लेते और मेरे रोने चीखने के बावजूद मेरे बाल काट ही देते थे । कुछ देर बाद मेरा रोना तो बंद हो जाता लेकिन आईने में अपनी सूरत देखकर फिर रोना आने लगता । जब वे मेरी गर्दन के बालों को काटने के लिए  ट्रिमिंग मशीन चलाते तो मुझे बहुत गुदगुदी होने लगती  । बाल काटने के बाद वे अपनी नहन्नी से हाथ और पैर के नाखून भी काटते थे । वह भी मुझे बहुत अच्छा लगता था । नेलकटर से अपने नाखून काटने वाले लोग नहन्नी से नाखून कटवाने का आनंद नहीं जान सकते ।


फत्तूजी का एक वाकया मुझे याद है । सन बहत्तर में मेरी फुफेरी बहन डॉ.नीलम शर्मा का विवाह भंडारा से ही हुआ था । फत्तूजी बिलकुल घर की शादी की तरह बारातियों की सेवा में तैनात  । दूल्हे के जीजाजी  ने कहा कि ठण्ड काफी है , वह बिस्तर से बाहर नहीं निकलना चाहते इसलिये लेटे लेटे ही उनकी हजामत बनाई जाये । फत्तूजी ने अपनी धोती समेटते हुए कहा “चिंता न करें मैं आपकी छाती पर चढ़कर बैठ जाता हूँ, आप लेटे रहिये ।“ फत्तूजी अच्छे लम्बे चौड़े थे । फत्तूजी का डील डौल देखकर वे घबरा गए  और तुरंत उठकर बैठ गए और कहने लगे  “ नहीं,नहीं कोई बात नहीं मैं बैठ ही जाता हूँ ।“ 


फत्तूजी के पास न केवल मजेदार किस्से थे बल्कि छोटी मोटी बीमारियों के भी बहुत से नुस्खे थे । एक बार बाबूजी की पीठ पर एक मस्सा हो गया था । फत्तूजी उसे  काटने के लिये कहीं से घोड़े का एक बाल लेकर आये और कहा “ गुरूजी इससे काट देता हूँ, पता भी नहीं चलेगा । लेकिन जैसे ही उन्होंने बाल से मस्सा काटा,अचानक तेज़ी से खून बहने लगा । फत्तूजी ने तुरंत पान के डिब्बे से चूना निकाला और कटे हुए स्थान पर लगा दिया यह कहकर कि इससे खून बहना बंद हो जायेगा और इन्फेक्शन भी नहीं होगा । इस तरह उनकी सर्जरी संपन्न हुई ।


यह वह दौर था जब आज  के दिनों की तरह आधुनिक सुविधाओं से युक्त सेलून नहीं होते थे । अधिकांश केश कर्तन कलाकार लोगों के घर जाकर उनकी कटिंग बनाया करते थे । या फिर कहीं किसी को पेड़ के नीचे जगह मिल जाती तो वहीं अपनी दुकान खोल लेता । फिर धीरे धीरे समय बदलने लगा  और भंडारा में भी हेयर कटिंग सेलून के बोर्ड दिखाई देने लगे । हम लोगों की पीढ़ी घर में बाल कटवाने की बजाय सैलून जाना अधिक पसंद करने लगी । 


फत्तूजी ने भी अपने घर के सामने वाले कमरे के एक कोने में एक कुर्सी लगाकर सैलून नुमा व्यवस्था कर ली । मैंने भी फत्तूजी से कटिंग बनवाना छोड़कर एक आधुनिक सैलून में अपना खाता खोल लिया । लेकिन फत्तूजी के भीतर जब तक शक्ति रही उन्होंने लोगों के घर जाकर उनकी सेवा करने का क्रम नहीं छोड़ा । आज न बाबूजी हैं न फत्तूजी, लेकिन मुझे वह दृश्य अच्छी तरह याद है जब फत्तूजी बाबूजी को डांटकर कहते थे “ गुरूजी सर सीधा रखो नहीं तो कैंची लग जाएगी ।“ 



10 जून 2026

161 उसकी आँखों के आगे गहराता अँधेरा



बैतूल से आनेवाली झाँसी नागपुर पैसेंजर सुबह सुबह ही हमें नागपुर स्टेशन पर उतार देती थी । वहाँ से भंडारा आने के लिए लगी लगाई ट्रेन मिलती जो एक घंटे में भंडारा रोड स्टेशन पर उतार देती । वहाँ से  स्टेट ट्रांसपोर्ट की  बस पकड़कर हम लोग भंडारा शहर आ जाते । गांधी चौक से हमारा घर पास ही था इसलिए हम लोग बस स्टैंड जाने की बजाय वहीं उतर जाते ।


बाबूजी को बस से उतरता देखकर वह तुरंत लपक कर आता और बाबूजी को “आइये गुरूजी” कहकर अभिवादन करता । टीन की पेटी वह अपने दोनों बलिष्ठ हाथों में उठा लेता और अपने रिक्शे तक ले जाता । फिर रिक्शे के फर्श पर पेटी जमा देता और थैलियाँ रिक्शे की फ्रेम में लगी खूंटियों पर टांग देता । फिर वह मुझे गोद में उठा  लेता और जैसे ही माँ बाबूजी रिक्शे में बैठते वह मुझे माँ की गोद में थमा देता ।


बाबूजी उसके चेहरे की बेचारगी पढ़ लेते थे “ क्यों सहदेव, लगता है तुम्हे आज सुबह से कोई सवारी नहीं मिली ?” “कहाँ गुरूजी, बस आप ही से बोहनी कर रहा हूँ ।“ बाबूजी उससे कभी मोल भाव नहीं करते थे, वे जानते थे यह गरीब रिक्शेवाला उनसे अधिक पैसे नहीं लेगा । कभी पूछते तो कहता “ जो मन हो वो दे देना गुरूजी , आपका ही रिक्शा है ।“


भंडारा में उन दिनों साइकल रिक्शे का चलन था और बस स्टैंड के अलावा गांधी चौक पर उनका अड्डा हुआ करता था । रेल्वे स्टेशन से आनेवाली बस मुसाफिरों को मनरो स्कूल चौक ,गांधी चौक या बस स्टैंड पर छोड़ देती थी । वहाँ से शहर के भीतरी हिस्सों में जाने के लिये रिक्शा ही एक मात्र साधन था । इसके अलावा भी लोग शहर के भीतर एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले जाने के लिए रिक्शों का ही उपयोग करते थे ।


“और सुनाओ, भंडारा के क्या हालचाल हैं ? बाबूजी का पहला सवाल होता । सहदेव रिक्शे पर पाईडल मारते हुए कहता “सब ठीक चल रहा है  गुरूजी । इस साल तो गर्मी बहुत थी हालत ख़राब हो गई , नल में पानी भी बहुत मुश्किल से आता था, बाकी तो सब ठीक है ।“ 


“अच्छा” बाबूजी कहते “और ?” और क्या गुरूजी इस बार डिलेवरी के टाइम घरवाली की तबियत बहुत ख़राब हो गई थी, सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाए थे, मरते मरते बची ..और बाकी तो सब ठीक है । ऐसे ही बाकी तो सब ठीक है, कहते हुए वह भंडारा के हाल सुना देता, किसके घर में बच्चे का जन्म हुआ, किसके यहाँ किसकी मृत्यु हुई, आदर्श और श्रीकृष्ण टाकीज में कौन कौन सी पिक्चर लगी, कौनसी उसे अच्छी लगी कौनसी ख़राब ऐसी जाने कितनी बातें ।


इतने में पोस्ट ऑफिस से पहले वाला चढ़ाव आ जाता । चढ़ाव पर रिक्शा बहुत मुश्किल से खिंचता था । सहदेव पूरा जोर लगाकर जैसे ही पाईडल पर खड़ा होता, बाबूजी कहते “रुको रुको” और तुरंत रिक्शे से उतर जाते और रिक्शे के पीछे जाकर धक्का लगाने लगते । बाबूजी इस बात के सख्त खिलाफ थे कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को ढोकर ले जाये । लेकिन मजबूरी थी, इसके अलावा वहाँ कोई और साधन न था । इसलिये कई बार वे सामान के साथ  हम लोगों को बिठा देते और पूरे रास्ते पैदल ही चलते थे ।


सहदेव हमारे घर के पास ही रहता था और बुलाने पर तुरंत ही आ जाता था । इसलिए कई बार मुझे बालक मंदिर ले जाने वाले श्रावण के न आने पर वह मुझे बालक मंदिर भी छोड़ आता था और पैसे भी नहीं लेता था। वह कहता “बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं, मेरे रिक्शे में भगवान बैठ गए और मुझे क्या चाहिए ।“ 


मैं धीरे धीरे बड़ा होता गया । सहदेव अब बूढ़ा होने लगा था । जब मैं भंडारा से बाहर पढ़ने गया तो छुट्टियों में घर लौटता था । बस स्टैंड पर मेरी आँखे सहदेव की तलाश करती थीं लेकिन वह जाने कहाँ होता । वैसे भी उन दिनों ऑटोरिक्शा चलने लगे थे और रिक्शे का चलन कम हो गया था। 


बरसों बाद मेरे विवाह के पश्चात एक बार जब मैं भंडारा गया तो उससे मुलाकात हुई थी । वह बूढ़ा हो चुका था । मुझे और लता को उसने रिक्शे में बैठाया । उसके मुँह से शराब की तेज़ गन्ध आ रही थी । स्टेट बैंक कॉलोनी स्थित हमारे मकान तक पहुँचने के पहले वह एक स्थान पर रुका और ‘ अभी आता हूँ। ’ कहकर एक गली में चला गया । पाँच मिनट में ही वह वापस आ गया । मैं समझ गया वह गली में देसी शराब पीने गया था ।


लौटकर उसने मुझे देखा और कहा .. “क्या करूँ बाबा, अब तो यह चोबीस घंटे की साथी है, बिना इसके रिक्शा खींच ही नहीं पाता । “ मुझे उसकी हालत देखकर तकलीफ़ हुई । मैंने उसे कहा ... “ छोड़ दो सहदेव इसे, यह तुम्हारी जान ले लेगी। “


 “जानता हूँ बाबा .. लेकिन क्या करूँ छूटती ही नहीं, अब तो आखिरी समय तक यह साथ ही रहेगी। उसके बाद काफी देर तक हम लोगों के बीच एक मौन पसरा रहा । मुझे बार बार लग रहा था शायद यह अंतिम बार है जब मैं इसके रिक्शे में बैठ रहा हूँ । घर पहुँच कर रिक्शे से उतरते हुए मैंने सहदेव से कहा “जो भी हो यह अच्छी चीज़ नहीं है इसे छोड़ दो “ उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया । चुपचाप जेब में पैसे रखे और रिक्शा मोड़कर चला गया ।


बरसों बाद मैंने सहदेव पर एक कविता लिखी 


उसके पाँवों में इकठ्ठा ताकत 

शाम को रोटी बन जायेगी 

माथे से टपकता पसीना 

नन्हे बच्चे के लिये दूध 

आँखों के आगे गहराता 

नसों से निकलता अन्धेरा 

गवाह रहेगा 

आनेवाली खुशहाल सुबह का 


रिक्शे की गुदगुदी सीट पर 

बैठने का सामर्थ्य रखने वाले लोग 

राह चलते रोएँगे 

खाली जेबों का रोना 

समय काटू बातों के बीच 

पूछेंगे शहर के मौसम 

और सिनेमा हॉल में लगी 

नई फिल्म के बारे में 

खस्ताहाल सड़कों को लेकर 

शासन को गालियाँ देते हुए 

उतरते वक़्त थमा देंगे 

रेज़गारी के साथ 

उसके लुटेरे होने का प्रमाणपत्र 


वह जानता है 

इन थुलथुल व्यक्तियों के पास 

लिजलिजी दया के अलावा 

और कुछ नहीं है ।



160 भट्टी की आग में जलता हुआ कोयला हूँ




महादेव कलई वाला – मेरा बचपन महाराष्ट के भंडारा नामक शहर में बीता है । भंडारा यद्यपि उन दिनों ज़िला बन चुका था लेकिन वह एक बड़े कसबे की तरह ही था । उन दिनों स्टील के बर्तन चलन में आ चुके थे लेकिन भंडारा में पीतल के बर्तन बनाने का गृहउद्योग था इसलिए पीतल के बर्तन अपेक्षाकृत सस्ते थे । तमाम घरों में पीतल के गंज ,गुंडी ,थाली ,लोटे और गिलास का उपयोग होता था । लेकिन पीतल के बर्तन में एक असुविधा यह थी कि खाना पकाने के उनमे कल करवाना ज़रूरी होता था बगैर कलई किये खाना या दूध खराब हो जाने की संभावना रहती थी । दुकान से जब लोग बर्तन खरीदते थे तो उसमे कलई नहीं होती थी वह करवानी पड़ती थी ।उन दिनों भंडारा में एक ही व्यक्ति था जो कलई  किया करता था  उसका नाम महादेव था ।


हमारे यहाँ भी महादेव आता था और एक रुपये में सोलह बर्तनों में कलई करता था । अक्सर हमारे घर के आंगन में ही अपनी भट्टी लगाता था । सबसे पहले वह ज़मीन को पानी से गीला करता और उसमे एक छोटा सा गढ्ढा खोदता फिर उसमें एक धौंकनी का पाइप नुमा मुँह घुसा  देता और उसी गढ्ढे से निकली हुई मिट्टी को गीली कर उस मुंह को दबा देता । जहाँ धौंकनी का मुँह खुलता था वहाँ वह लकड़ी का कोयला रखता था । 


कोयले की तरह काले रंग का महादेव सफ़ेद टोपी पहने जब अपने थैले से कोयले निकालता तो हम उसके चेहरे की ओर देखते और कोयले के रंग से उसकी तुलना करते । महादेव हमारे मन के भाव समझ जाता और हंसकर कहता ..”बच्चों भट्टी की इस आग में जलकर मैं भी कोयला हो गया हूँ .. एक दिन राख भी हो जाऊँगा ।“ हम बच्चे एक श्रमिक का यह जीवन दर्शन कहाँ समझ सकते थे। 


महादेव हँसता फिर थोड़े से कपास में माचिस से आग लगाकर उस कोयले पर रख देता । जैसे ही वह धौंकनी का पहिया घुमाता पाइप से हवा निकल कर कोयले तक पहुँच जाती और कोयले पहले थोड़ा सा धुआं देते फिर आग पकड़ लेते । बरसों बाद जब मैंने पहली बार दुष्यंत का यह शेर पढ़ा ..” इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो , जब तलक खिलते नहीं यह कोयले देंगे धुंआ “सच कहूँ तो मुझे उस वक्त महादेव कलई वाले की वह धौंकनी ही याद आई 


महादेव कलई वाल फिर उन धधकते हुए कोयलों पर एक एक कर थाली, लोटा,गिलास,गंजी या उस बर्तन को औन्धा करके रखता जिस में कलई करना होता । जैसे ही वह बर्तन भीतर से गरम होता उसके भीतर उगते सूरज की रक्तिम आभा दिखाई देने लगती । फिर वह उसे संसी से पकड़कर उठाता और उसमें नौसादर का सफेद पाउडर छिड़कता जिसके छिड़कते ही धुएं का एक बादल भीतर से बाहर निकल आता । फिर वह  अपने झोले से निकेल का एक चमकीला तार निकालता और उसका एक सिरा उस बर्तन के भीतरी भाग पर रगड़ता जिससे थोड़ा सा निकेल पिघलकर उस बर्तन में लग जाता । हमें यह दृश्य काले आसमान में बिजली चमकने की तरह दिखाई देता । 


इसके बाद  महादेव अपने झोले से काली सफ़ेद रूई का एक पुलिंदा निकालता और उसे हाथ से पकड़कर उस पिघले हुए निकेल को नौसादर पाउडर के साथ बर्तन के भीतरी हिस्से में तेजी से फैला देता । फिर वह उस गर्म बर्तन को पानी से भरी बाल्टी में डुबो देता जिसके डूबते ही छन्न से आवाज़ आती और ढेर सारी खुशबूदार भाफ निकलती । फिर वह बर्तन हमें दिखाता ,उसकी भीतरी चमक देखकर हम लोगों के चेहरे पर  भी चमक आ जाती । अंत में वह उसे उठाकर अलग रख देता और फिर दूसरा बर्तन उठा लेता । हमें यह सब कुछ किसी जादू की तरह लगता था ।


इस तरह वह एक एक कर सारे बरतनों में कलई करता था । महादेव मोहल्ले में सिर्फ हमारे आँगन में ही अपनी भठ्ठी लगाता था इसलिए मोहल्ले के अन्य लोग भी अपने अपने बर्तन कलई के लिये वहाँ ले आते थे और लगभग तीन -  चार घंटे का कार्यक्रम हमारे यहाँ हो जाता था । महादेव के जाने के बाद हम उसके द्वारा छोड़ी हुई मिट्टी और राख में निकेल के पिघले हुए गोल गोल छर्रे ढूंढते थे । गर्म बर्तन में नौसादर छिड़कते हुए जो भाफ उठती थी उसमें एक अजीब सी गन्ध होती थी और उस वक़्त महादेव का चेहरा बिगड़ जाता था ।

उसका वह चेहरा अब भी मुझे किसी न किसी मजदूर के चेहरे में दिखाई दे जाता है ।


159 . माता पिता जैसे ही होते हैं दोस्तों के माता पिता


 

बचपन मे अपने क्लासमेट्स के पिता अक्सर हमे अपने पिता से अधिक अच्छे लगते हैं ? शायद इसलिए कि वे हमारे सामने अपने बेटे को कभी डाँटते नहीं । हमारे पिता भी तो हमारे दोस्तों के सामने हमे नहीं डाँटते। फिर कभी किसी दिन अपने पिताजी से डांट खाने के बाद जब हम दोस्त के सामने उसके पिता की प्रशंसा करते हैं तो वह कहता है .. “रहने दे यार.. तेरे सामने भर नहीं डाँटते, वर्ना वैसे तो मेरी खटिया खड़े किये रहते हैं ।“ हम कहते हैं “ हाँ यार , मेरे पिताजी भी ऐसे ही ...। ” मतलब कुल मिलाकर पापा लोगों का इम्प्रेशन समाप्त  । 


वैसे हमारे ज़माने में ऐसा बहुत कम होता था । बहुत कम पिता ऐसे होते थे जो अपने बेटे के दोस्त के सामने संयम रख पाते थे । हालाँकि उनके डांटने में उतनी तीव्रता नहीं होती थी । अब जरा उस ज़माने के पिता लोगों के संवाद सुनिए “ देखो, तुम्हारे दोस्त को, कितना बढ़िया है पढ़ने लिखने में, और एक तुम हो फिसड्डी ,कुछ सीखो अपने दोस्त से। “ लो हो गई न इज्जत की किरकिरी ।


वहीं कुछ पिता बेटे के दोस्त से मिलने पर डाँटते नहीं थे बस अपने पराक्रम गिनवाया करते थे “अभी नई ड्रेस लेकर दी है इसे , साइकिल भी खरीदी है , इसने कहा ट्यूशन लगवा दो तो वो भी लगवा दी है और क्या चाहिए ।“ हो गया आपका काम । अब ग़लती से कहीं आपने अपने पिता के सामने दोस्त के पिता के पराक्रम की तारीफ कर दी तो सुन लीजिये अपने पिता से व्याख्यान “ अरे, उसके फादर को जानता हूँ मैं , सरकारी विभाग में है, खूब ऊपर का पैसा आता है, मेरे पास तुम्हारे ऊपर खर्च करने के लिए फालतू का पैसा नहीं है ।“


कुछ दोस्तों के पिता जो मजदूर हुआ करते थे, कहीं कारपेंटर, कहीं मोटर मेकैनिक, तो उन्हें चिंता ही नहीं होती थी अपने बच्चों के कैरियर की । बच्चे अपने दोस्तों का परिचय पिता से करवाते तो वे एक उचटती हुई निगाह उन पर डालते और अपने काम में लग जाते  ।


मुझे अपने जिन दोस्तों के पिताओं की याद है उनमे सबसे पहले है नानकचंद पंजाबी , जिसके पिता की भंडारा में मेन रोड पर किराने की दुकान थी । दुकान के ऊपर ही उनका निवास था । वे सफ़ेद पायजामा कमीज़ पहनते थे और गद्दी पर बैठे रहते थे । उनकी दुकान पर मेरी निगाह उनकी ओर कम और कांच के बरनी में रखी चॉकलेट की ओर अधिक रहती थी । वे नानक को जाने क्या इशारा करते, नानक बर्नी में से चार चॉकलेट निकालता और एक मुझे थमाकर एक खुद खाता और दो जेब में रख लेता । अगर बच गई तो वह हमारे अगले दिन के लंच टाइम में काम आती । ऊपर जाने पर नानक की माँ से भी मुलाकात होती ।


सुरेन्द्र के पिता मंगलदास जी चड्ढा को जब मैंने देखा तो वे पीतल के बर्तन बनाने की फैकट्री में दहकती हुई भठ्ठी के सामने खड़े थे । बस उनसे नमस्ते हुई लेकिन बातें कभी नहीं हुई । हाँ सुरेन्द्र की माताजी से मैं जरुर बात करता था।  वे लोग मेटल वर्क्स के परिसर में ही बने एक क्वार्टर में रहते थे । बाद में सुरेन्द्र के पिताजी ने साझेदारी में स्वयं का व्यवसाय शुरू किया और वे मजदूर से मालिक हो गए । लेकिन उनका वह मेहनत कश वाला रूप मैं कभी नहीं भूलता । केदारनाथ अग्रवाल की कविता “मैंने उसको /जब जब देखा /लोहा देखा /लोहे जैसा /तपते देखा /गलते देखा /ढलते देखा” पढ़ता हूँ तो मुझे मंगलदास चाचा की ही याद आती है ।


रूपचंद के पिता ज्ञानचंद जी उन दिनों भंडारा के छोटा भाई जेठाभाई बीड़ी कारखाने में मुनीम थे । यह कारखाना स्कूल के पास ही था । रूपचंद के साथ लंच टाइम में मैं अक्सर उनसे मिलने जाया करता था । अब वहाँ चॉकलेट तो होती नहीं थी और बीड़ी पीने की उम्र तक हम लोग पहुंचे नहीं थे इसलिए रूपचंद के पिता अपनी जेब से एक चवन्नी निकालकर हमें देते जिसका उपयोग हम लोग स्कूल के लंच टाइम में उबले हुए बेर, मुरमुरे के गुड़ वाले लड्डू जैसी चीजें खरीदने में करते ।


इशुप्रकाश स्कॉट के पिताजी मुझे फ़िल्मी दुनिया के ओमप्रकाश की तरह लगते थे । बाद में जब ‘जूली’ फिल्म देखी तो उनकी बड़ी याद आई । जब भी बड़े बाज़ार स्थित  उनके घर जाता वे ईसामसीह की तस्वीर के सामने मोमबत्ती लगाते हुए मिलते और मेरे लौटते समय बाइबिल की कहानी वाला एक रंगीन पिक्चर कार्ड मुझे थमा देते ।


अमर सिंह खत्री के पिताजी की बेकरी थी । उनके घर जाने पर भठ्ठी से आती हुई सिंकती हुई डबलरोटी की वह गंध मुझे बहुत अच्छी लगती थी । अमर की माताजी एक सीधी सादी पंजाबी घरेलू महिला थीं । वे मुझे झट से बरनी से उनकी बेकरी में बने कुरकुरे बिस्कुट निकालकर देतीं ।  आज भी किसी बेकरी के पास से  गुजरते हुए वहाँ से आती सोंधी गंध में मैं उन्हें याद करता हूँ । 


घनश्याम के पिता हेमनदास जी कौरानी की सिंधी कॉलोनी में राशन की दुकान थी । उनसे भी बस मुलाक़ात थी लेकिन बातें कभी नहीं हो पाई । हेमनदास जी के पिता का परिवार भी बहुत सारे सिन्धी और पंजाबी परिवारों की तरह विभाजन के समय भारत आ गया था । सभी सिंधी परिवारों को भंडारा में शहर से बाहर एक कॉलोनी में बसाया गया था । यह कॉलोनी मेरे घर से बहुत दूर थी इसलिए वहाँ जाना बहुत कम होता था ।

 

सबसे अधिक मेरा सामना नईम के पिता जी से हुआ । नईम के पिता जनाब मुनीर खान महाराष्ट्र शासन के लोक निर्माण विभाग में कार्यरत थे । कद में काफी ऊँचे पूरे । स्कूल से घर आते हुए मैं अक्सर उनके यहाँ रुक जाता था । वे हमसे हमारी पढ़ाई के बारे में और टीचर्स के बारे में पूछा करते । बाद में उन्होंने एक लकड़ी टाल भी डाली थी जहाँ मैं और नईम  बैठकर पढाई किया करते । हर ईद को उनके घर जाना तय था । बाबूजी से भी उनकी मुलाकात थी और जब भी उनके यहाँ जाता वे उनके हालचाल जरुर पूछते । बाद में जब स्टेट बैंक कालोनी में बाबूजी ने अपना मकान बनाया तो दोनों ने पास पास ही प्लाट लिया । नईम की माँ बचपन में ही गुजर गई थीं इसलिए वे अपने तीनो बेटों नईम,अलताफ़, सैफ़ और बिटिया शाहीन का बहुत ख्याल रखते थे । उन्होंने बच्चों को कभी माँ की कमी महसूस नहीं होने दी ।


भगवान रहाटे मेरे साथ स्कूल में नहीं पढ़ता था लेकिन पड़ोस में ही उसका घर था इसलिए उसके यहाँ जाना बहुत होता था ।भगवान के पिता दयाराम जी उसके बचपन में ही गुजर गए थे और उसकी माँ बीड़ी बनाकर अपने तीनो बच्चों को पाल रही थी । उनका घर खपरैल वाला एक कच्चा घर था । भगवान के घर पहुँचते ही सबसे पहले दीवार पर टंगी गौतम बुद्ध और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की तस्वीर दिखाई देती । भगवान की माँ जिन्हें मैं मावशी कहता था मुझे बहुत चाहती थीं और जब भी मैं  उनके घर जाता वे बिना कुछ खिलाये मुझे जाने नहीं देती थीं । उनके घर की भाखरी और चटनी का स्वाद अभी भी जिव्हा पर है ।


यह वह ज़माना था जब क्लास के लड़कों के पिताओं से तो उनके घर जाने पर मुलाकात हो जाती थी लेकिन लड़कियों के पिताओं से मिलने का मौका बहुत कम आता था । आज बच्चे क्लासमेट्स पहले होते हैं और लड़का लड़की बाद में, लेकिन उस समय यह इतना आसान नहीं होता था । यह लड़का घर क्यों आया था ? इतनी देर क्यों रुका था ? कॉपी के लिए कोई दूसरा दोस्त नहीं मिला क्या ? यहीं सबके सामने बैठकर बात क्यों नहीं करता ? जैसे ढेरों प्रश्न ।


ग़नीमत कि पिताओं की ऐसी परम्परा होने के बावजूद मुझे अपनी क्लासमेट्स के ऐसे पिताओं से सामना नहीं करना पड़ा । ज़्यादातर छात्राओं के भाई हमारे साथ स्कूल में पढ़ा करते थे, भले ही वे अन्य क्लास में हों । अमरसिंह की बहन शांता हमारी क्लास में ही थी और नानक की बहन हर्ष बाला भी । विनोद का छोटा भाई एक दो क्लास पीछे था और अर्चना का भाई विनय भी ।


इनमें सबसे अधिक मेरा जाना अर्चना के घर ही हुआ । अर्चना जब पहली बार हमारे घर आई उसने मेरी माँ को मौसी कहकर पुकारा । मैं भी उसकी माँ को मौसी कहने लगा । इस तरह एक पारिवारिक रिश्ता कायम हो गया । अर्चना के पिता श्री मधुसूदन लाल जी श्रीवास्तव भंडारा में नायब तहसीलदार के पद पर कार्यरत थे । वे बहुत रौबीले दिखाई देते थे और मुझे उनका सामना करते हुए कुछ झिझक सी होती थी । हालाँकि ऐसा बहुत कम होता था कि मैं उनके घर जाऊँ और उनसे मुलाकात हो जाये । उनके घर जाने पर कभी कभी वे आंगन में बैठे मिलते थे । मैं उनसे नमस्ते करता था और झट घर के भीतर चला जाता । उनसे मेरा सम्वाद लगभग नहीं के बराबर था इसलिये उनसे थोड़ा डर भी लगता था । फिर अनेक बार उनसे मुलाकात हुई लेकिन संवाद बस उतने ही रहे जितने थे यानि कि बस 'नमस्ते' ।


हाँ, अर्चना की माँ जिन्हें मैं मौसी कहता था और उनकी बड़ी बहन इंदिरा जिन्हें मैं दीदी कहता था उनसे मेरी बहुत पटती थी । इन्ना दीदी बहुत सुन्दर थीं लेकिन बचपन से ही पोलियोग्रस्त थीं । मैं जब भी उनसे मिलता तो वे अपना सारा स्नेह मुझ पर उंडेल दिया करती थीं । मौसाजी यानि मधुसूदन लाल श्रीवास्तव जी का निधन सन 1994  में गोंदिया में हुआ । उनकी तेरहवीं की सूचना मिलते ही मैं  गोंदिया गया था । अर्चना के पुराने मकान में बीच के कमरे में उनकी तस्वीर रखी थी । उन्हें देख कर मुझे लगा अरे.. वे तो कितने सौम्य थे । मैं व्यर्थ ही उनसे खौफ़ खाता रहा । अर्चना का भाई विनय हम लोगों से दो साल पीछे गाँधी विद्यालय का ही छात्र था । विनय से छोटे भाई का नाम अभय है । 


आज इनमे से किसी दोस्त के माता पिता अब इस दुनिया में मौजूद नहीं हैं, और तो और घनश्याम,नानक और इशुप्रकाश भी अब दुनिया में नहीं हैं उनका असामयिक निधन हो गया । भंडारा के दोस्तों में सबसे बराबर संपर्क बना रहा अमर,नईम और अर्चना से अब भी मुलाक़ात होती है । बचपन में अर्चना और मैं  अपने  अपने नोट्स शेयर करते थे और कोशिश करते थे कि दोनों ही क्लास में सबसे आगे रहें । एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा के अलावा हम लोग यह भी पता लगाया करते थे कि कौन कितनी पढ़ाई कर रहा है । इस तरह से हम दोनों का एक गुट बन गया था । वैसे कक्षा में हम चार पाँच छात्र छात्राओं के बीच ही यह प्रतिस्पर्धा होती थी मैं ,अर्चना ,नईम, इशरत सुल्ताना और ज़ोहरा अंजुम । पढ़ाई के अलावा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों , भाषण स्पर्धा आदि में भी हम लोग भाग लेते थे । 


स्कूल के दिनों में बने रिश्ते इस उम्र तक बने रहें ऐसा बहुत कम होता है । हमारा रहन सहन, जीवन शैली, पारिवारिक स्थिति, विचारधारा सब कुछ बदल जाता है । माता पिता केवल स्मृतियों में शेष रहते हैं और शेष रहता है बचपन का वह प्रेम, वह सहजता, वह भोलापन, वह सच्चाई, जिसके संस्कार हमें अपने माता पिता से मिले होते हैं ।


ऐसे सभी माता पिता को मेरा सादर नमन ।



158 . जीवन के रंग लिट्टी चोखा के संग



‘खइके पान बनारस वाला’ गाते हुए, गंगा किनारे वाले छोरे के संग घुटन्नी धोती और कुर्ता पहने, ढोलक बजा कर मुंबई की एक पुरानी बस्ती में किसी चाल के परिसर में ठंडाई की तरंग में नाचते हुए लोग आपको याद होंगे । महाराष्ट्र की मुंबई नगरी आज़ादी के काफी पहले से ही उत्तर भारत के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी । बनारस और पटना से आने वाली ट्रेने मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पर जैसे ही ठहरती सर पर गठरी लादे, अपनी धोती कमीज सहेजते, लोगों का झुण्ड रेल से उतरता । स्टेशन के बाहर काली पीली टैक्सी चलाते हुए उन्हें अपने ही गाँव जवार के लोग मिल जाते । यह टैक्सीयां उन्हें उन बस्तियों की ओर ले जातीं जहाँ कोयले की आँच में लिट्टी सिंक रही होती और आलू के चोखे और बैंगन के भरते की गंध वातावरण में विद्यमान होती । 


मुंबई के जी पी ओ से रोज़ ढेरों पोस्टकार्ड निकलते जिनमे इनके दुःख सुख के समाचारों  के साथ मुंबई शहर की चकाचौंध और रोजगार के अवसरों का वर्णन होता जिन्हें पढ़कर फिर उनके बन्धु बांधव भी इन्ही ट्रेनों में सवार होते और मुंबई पहुँच जाते । मुंबई शहर तो जैसे माँ की गोद था जहाँ उन्हें पनाह मिलती, ढेर सारी कपड़ा मिलों, रसायनों और फूड प्रोडक्ट्स के कारखानों के मस्टर रोल में मजदूरों की सूची में उनका नाम लिख लिया जाता और फिर यह सिलसिला चलता रहता । 


यह केवल मुंबई शहर में ही नहीं हो रहा था मध्य प्रान्त के बड़े शहरों और मंझोले शहरों और कस्बों में भी यू पी बिहार के लोग आ रहे थे । इनमे बिना पढ़े लिखे लोगों से लेकर अच्छे पढ़े लिखे लोग भी शामिल थे । और केवल यू पी बिहार के ही नहीं राजस्थान , पंजाब, हरियाणा, के लोग भी काफी संख्या में यहाँ आ आकर बस रहे थे जिनमे हिन्दू भी थे मुसलमान भी, सवर्ण भी और दलित भी । यह लोग मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे थे जो आगे चलकर इसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए दुनिया में अपना स्थान बनाने वाला था ।


दरअसल यह दुनिया भी ऐसे ही बसी थी । लाखों साल पहले जब इन्सान ने इस धरती पर जन्म लिया वह एक जगह ठहरा ही कहाँ । समुद्र जब आपस में जुड़े थे और उनके पैदल चलने के लिए रास्ते ही रास्ते थे । कहीं भी जन्म लेने वाला इंसान कहीं भी जा सकता था, न उसे पासपोर्ट की जरुरत थी न वीज़ा की ।


लेकिन यह दौर अधिक समय तक नहीं चला । हम धीरे धीरे सभ्य होते गए । धीरे धीरे हमने इस धरती को बाँट लिया । धीरे धीरे हम अपनी संकुचित जगहों में और संकुचित दिमागों में सिमटते गए । हमने अपने आप ही तय कर लिया कि यह हमारा देश, यह हमारे लोग, हम यहाँ के मूल निवासी, यह हमारा धर्म और फिर एक दिन हमने एक फरमान जारी कर दिया.. हमारे अलावा बाकी के सब लोग यहाँ से चले जाएँ यह सिर्फ और सिर्फ हमारा देश है। 


हँसिये मत,  यह सिलसिला अभी थमा नहीं है , ‘यह हमारा देश’ अब धीरे धीरे ‘यह हमारा राज्य’ में बदलने लगा है । इसे ‘यह हमारा शहर’, ‘यह हमारा गाँव’ ,‘यह हमारा मोहल्ला’ में बदलने में देर नहीं लगेगी ।  और जिस दिन ‘यह हमारा घर’ में तब्दील हो जायेगा, दम तोड़ती मानवता उसी दिन आत्महत्या कर लेगी ।  


दरअसल मैं भंडारा के डॉ. रामकुमार सिंह के बारे में लिखना चाहता था और इतना सब लिख गया । रामकुमार चाचा बिहार से भंडारा आए थे पचास के दशक में स्थानीय जे एम पटेल कॉलेज में नौकरी करने । वे हिन्दी के प्राध्यापक थे । अपने रिटायर होने की उम्र तक वे भंडारा में एक कमरा लेकर रहे, खुद ही खाना पकाते थे और कपड़े धोते थे ।  वे अक्सर हमारे घर आ जाया करते और बाबूजी के साथ हिन्दी साहित्य पर चर्चा करते फिर जाने कब बातें करते करते उत्तर प्रदेश और बिहार पहुँच जाते । लिट्टी चोखा के बारे में पहली बार उन्ही से सुना था । 


शुरू शुरू में बाबूजी ने उनसे कहा भी कि “सिंह साहब अपने परिवार को यहाँ ले आइये ।“ वे हंसकर कहते “कहाँ कोकास साहब हम तो परदेसी हैं, नौकरी करेंगे और फिर अपने घर लौट जायेंगे ।“ बाबूजी कहते “ऐसा कोई जरुरी थोड़े ही है । देखिये हमारे दादा यू पी से मध्यप्रदेश आये थे और बैतूल में बस गए, हम महाराष्ट्र आ गये और यही भंडारा में बस जायेंगे ।“


परदेस यह शब्द मैंने पहली बार रामकुमार चाचा के मुँह से ही सुना था । मुझे आश्चर्य हुआ यह जानकर कि देश में भी कोई परदेश होता है । रामकुमार चाचा अक्सर कहते  .. “अरे हम कहाँ बसेंगे यहाँ । हमारे बच्चों को अपना गाँव छोड़कर बाहर अच्छा ही नहीं लगता।“ बाबूजी कहते “अरे लेकर तो आइये, यहाँ रहने लगेंगे तो अच्छा लगने लगेगा । “ लेकिन रामकुमार चाचा बाबूजी की बात  हंसकर टाल  देते ।


रामकुमार सिंह चाचा साल में दो बार अपने गाँव जाते थे और लौटते समय वे वहां से ढेर सारा सत्तू और अचार लेकर आते । कभी कभी वे थोड़ा सा सत्तू हम लोगों के लिए भी लाया करते । ऐसे ही दिन बीत गए रामकुमार चाचा की नौकरी समाप्त हुई और वे अपने गाँव लौट गए । फिर उसके बाद उनकी कोई खबर नहीं मिली ।  


157 गया गया गया .. लेकिन क्यों गया ?



“यार यह डॉक्टर हैं फिर भी स्कूल में पढ़ाते हैं ?” मैंने स्कॉट से पूछा  “ अरे वो मेडिकल वाले डॉक्टर थोड़े ही हैं.. पी एच डी हैं । पी एच डी नहीं जानते ?” “जानता हूँ भाई, अच्छी तरह से जानता हूँ , पी एच डी यानी डॉक्टर ऑफ़ फिलोसोफी ।“ स्कॉट को पता नहीं था मेरा आई क्यू और जी के उससे अधिक है । 


“मैं तो इसलिए पूछ रहा हूँ कि हिन्दी में पी एच डी होने के होने के बावजूद  डॉ. नरेशचन्द्र पशीने सर स्कूल में पढ़ाते हैं ,उन्हें तो कॉलेज में हिन्दी के प्रोफ़ेसर की नौकरी मिल सकती है ?“ “अब यह तो नहीं पता भाई .. यह उनका प्राइवेट मैटर है।“ स्कॉट ने अनभिज्ञ बनते हुए कहा । 


उन दिनों पी एच डी होना बहुत बड़ी बात थी । पूरे शहर में मुश्किल से किसी विषय में दो-तीन पी एच डी ही मिलते थे और वे भी महाविद्यालय में अच्छे अच्छे पदों पर पदस्थ होते थे । ऐसे में मुझे पशीने सर का भंडारा जैसे छोटे शहर के नगर पालिका के हाई स्कूल में टीचर की नौकरी करना बहुत अजीब लगता था । सोचता था, कभी उनसे पूछूँगा कि उन्होंने भंडारा के एकमात्र आर्ट्स कॉलेज में नौकरी क्यों नहीं की ? लेकिन कभी उनसे यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई । स्कॉट की बात याद आ जाती थी ..यह उनका प्राइवेट मैटर है ।


गोरा रंग , कंजी कंजी आँखें, घुंघराले बाल, सफ़ेद कुर्ता और पायजामा, पांवों में कोल्हापुरी चप्पल,  पूरा सुदर्शन व्यक्तित्व था पशीने सर का । वे  अक्सर पैदल ही स्कूल आया करते थे , कभी कभार पेंट शर्ट पहनकर साईकिल पर पैडल मारते हुए भी दिखाई देते । अब भंडारा शहर था ही कितना बड़ा । चलना शुरू करते ही  ख़त्म हो जाता था । 


उस समय पशीने सर की उम्र पैंतीस- चालीस के आसपास रही होगी । एक दिन मुझे पता चला कि उन्होंने विवाह नहीं किया है । इस उम्र तक किसी पुरुष का विवाह न करना भी उन दिनों अजीब बात थी । उनकी पहले वाली अजीब बात में यह बात भी जुड़ गई । पहली बात की तरह यह भी उनसे पूछना आसान नहीं था उनके अविवाहित रहने की बात तो बिलकुल भी नहीं । वैसे भी हम लोग बच्चे थे हमें इन बातों से कोई मतलब नहीं होता था । 


लेकिन हमारी क्लास के बड़ी उम्र के लड़के उनकी इसी बात को लेकर पीठ पीछे उनका मजाक उड़ाया करते। कोई कहता किसी ने उन्हें प्रेम में धोखा दिया है । कोई कहता अब तो उनकी उम्र भी निकल गई, अब विवाह करके भी क्या करेंगे । मुझे पशीने सर इतने अच्छे लगते थे कि मैं लड़कों से उनके लिए झगड़ लेता, लेकिन फिर लड़के मेरा ही मजाक उड़ाने लगते .. “ लगा रह , तुझे ही गोद ले लेंगे वो एक दिन ।“ मेरी हिंदी उन लोगों से कहीं ज्यादा अच्छी थी मुझे पता था सब मुझसे जलते थे इसलिए ऐसा कहते थे ।


एक दिन पशीने सर क्लास में आये और आते ही उन्होंने बोर्ड पर लिखा ‘ गया गया गया ‘ टेबल पर चॉक रखी और सबसे कहा चलो इसका मतलब बताओ । एक लड़का खड़ा हुआ .. “ सर यह तो क्रिया है, गया लेकिन आपने इसे तीन बार लिखा है ।“ पशीने सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ बैठ जाओ” फिर मेरी और इशारा करके कहा “अच्छा शरद तुम बताओ ।“ इतनी देर में मेरा दिमाग काम कर गया था । मैंने कहा “ गया नामका लड़का गया नामके शहर में गया ।“ पशीने सर ने कहा “शाब्बास बिलकुल सही ।“ लेकिन मैंने उनके ‘बैठ जाओ’ कहने से पहले ही मैंने पूछ लिया “सर लेकिन गया क्यों गया था ?”  पशीने सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ गया कोई किसलिए जाता है ..गया होगा भाई किसीका पिंडदान करने ।“फिर कहा “तुममे लेखक बनने के पूरे गुण हैं।“उन्हें पता था मैं बच्चों के पन्ने पर अखबार में एक कहानी लिख चुका हूँ।  


यह वे दिन थे जब स्कूलों में जादू का खेल दिखाने वाले, गाना गाकर भीख मांगने वाले, बच्चों की कॉपी किताब, या खिलौने बेचने वाले निसंकोच आ जाया करते थे । एक दिन जब क्लास चल रही थी एक बारह तेरह साल की सांवली सी लड़की एक फटी पुरानी फ्रॉक पहने दरवाज़े पर आ खड़ी हुई । पशीने सर ने उससे पूछा “क्या बात है?” उस लड़की ने कुछ नहीं कहा, उसके पास रंगीन कागज के छपे हुए कुछ पैम्पलेट्स थे, उसने एक पर्चा सर के सामने रख दिया । सर ने उसे सस्वर पढ़ना शुरू किया .. “आई एम अ पुअर गर्ल, आई हैव कम फ्रॉम असाम, आवर हाउस हैस बीन वाश्ड अवे इन फ्लड, वी हैव नथिंग टू ईट, प्लीज़ हेल्प अस ।“ 


परचा पढ़ कर सर ने कहा “बट यू डज़न्ट सीम टू बी फ्रॉम आसाम । मराठी आती है ?” लड़की ने एक बार ‘हाँ’ में फिर तुरंत ‘ना’ में सर हिलाया । सर ने उसे परचा लौटाते हुए कहा “मुझे पता है तुम यहीं की हो ..खैर अब जाओ । तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा ।“ फिर हम लोगों से मुखातिब होकर उन्होंने कहा “यू नो, बेगरी इस ऐन आर्ट इन इण्डिया, सच पीपल आर ओफेन फाउंड इन ट्रेन्स, आल दोज़ पीपल आर फ्रॉड ” हम बच्चे हिन्दी पढ़ाने वाले पशीने सर को इस तरह अंग्रेज़ी बोलते देखकर अभिभूत हो रहे थे । 


महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद,माखनलाल चतुर्वेदी, सुमित्रानंदन पन्त, अज्ञेय, सुभद्राकुमारी चौहान ,जैसे हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों के नामों से मेरा परिचय तो बाबूजी ने घर में ही करवा दिया था लेकिन उनकी रचनाओं से परिचय पशीने सर ने करवाया । सर किसी भी पद्यांश को इतनी अच्छी तरह हमें समझाते थे कि सम्पूर्ण दृश्य आँखों के सामने साकार हो उठता था ।


पशीने सर कभी कभार हमारे घर भी आया करते थे । बाबूजी उनके हमउम्र थे और हिंदी साहित्य में परास्नातक होने के कारण उनके साहित्यिक मित्र भी । दोनों काफी देर बैठकर साहित्य चर्चा किया करते थे । मैं चुपचाप कहीं आसपास बैठ जाया करता और ‘बड़ों के बीच नहीं बैठते’ जैसे वर्जित कामों के संस्कार के बावजूद उन लोगों की बातें सुना करता । बड़े यदि सार्थक चर्चा कर रहे हों तो उनकी बातें सुनने से ज्ञान प्राप्त होता है यह ज्ञान मुझे बचपन में ही प्राप्त हो गया था । कभी कभी पशीने सर बाबूजी को ‘तू’ कहकर संबोधित करते थे । मुझे यह बड़ा अटपटा सा लगता इसलिए कि इस तरह बाबूजी को संबोधित करते मैंने किसी को नहीं सुना था, उनके बड़े भाई भी उन्हें तुम कहते थे । 

    


156 हिस्ट्री ज्याग्रफी बड़ी बेवफ़ा रात को रटो दिन को सफा



हफ़ीज़ खान मास्साब कहते थे “हिस्ट्री ज्याग्रफी बड़ी बेवफ़ा रात को रटो दिन को सफा। ” स्कूल के उन दिनों में हम इतने बड़े तो हो गए थे कि वफ़ा और बेवफ़ा का फर्क हमें मालूम था । वैसे भी मुकेश का गाया गीत “वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए” उन दिनों रेडियो पर खूब बजता था, तो हमने सोचा कि बेवफ़ा से क्या दिल लगाना सो हम कुछ छात्रों ने  हाईस्कूल में आर्ट्स के बदले साइंस ले लिया ।


हालाँकि साइंस की क्लास में हम लोग अल्पसंख्यक थे । पहले ही दिन जब फिजिक्स केमेस्ट्री मैथ्स की क्लास में एक भी लड़की नहीं दिखाई दी तो क्षण भर के लिए लगा कि कहीं गलत डिसीजन तो नहीं ले लिया? लेकिन फिर अपना विशिष्टता बोध उस भाव पर हावी हो गया कि साइंस तो दिमाग वाले लोग पढ़ते हैं । वैसे भी भाषा की क्लासेस तो सबकी साथ ही होती थी ।


पहले ही दिन ढगे सर की फिज़िक्स की क्लास थी । ढगे सर सीधे सादे से थे । दुबली पतली काया, एक ढीली ढाली शर्ट और पैरों में चमड़े की चप्पलें , लेकिन बहुत बढ़िया पढ़ाते थे । पहले ही दिन उन्होंने कहा आज हम फिजिक्स का इतिहास पढेंगे । ओ माँ... यहाँ भी इतिहास पढ़ना है । लेकिन साइंटिस्ट का इतिहास राजाओं के इतिहास से बेहतर था । राजाओं का इतिहास पढने से भले राजा बनने की प्रेरणा न मिले लेकिन वैज्ञानिकों का इतिहास वैज्ञानिक बनने के लिए प्रेरित करता था । धीरे धीरे थोडा थोडा इंटरेस्ट आने लगा ।


केमिस्ट्री के ढवले सर अच्छे ऊंचे पूरे थे और धोती कमीज पहनकर साइकिल चलाते हुए स्कूल आया करते थे। उनके पास एक झोला रहता था जिसमे केमिस्ट्री की एक फटी पुरानी किताब होती थी । वे हफीज खान सर के बिलकुल विपरीत थे, हफीज खान सर को किताबों की जरुरत नहीं पड़ती थी और ढवले सर बिना किताब के पढ़ा ही नहीं सकते थे ।


यह रहस्य हमें तब पता चला जब एक दिन वे अपना झोला लेकर नहीं आये । हमारी कक्षा के खुराफाती छात्रों को आईडिया मिल गया । जिस दिन हमे केमिस्ट्री पढ़ने की इच्छा नहीं होती हम उनका झोला लैब में कहीं छुपा देते । बस वे पूरे टाइम अपना झोला ढूँढते रहते और हम लोगों की छुट्टी हो जाती । लेकिन एक दिन हम लोगों की पोल खुल गई फिर तो ऐसी डांट  पडी कि पढाई और मस्ती के सारे समीकरण बिगड़ गए ।

 

गणित वाले उके सर बहुत टिपटॉप रहते थे । बाकायदा आयरन की गई शर्ट और क्रीज वाली पेंट । वे एक हाथ पीछे पीठ की ओर रख लेते और बोर्ड पर गणित का सवाल हल कर देते । फिर कहते  अच्छा तो यह तुम लोगों की समझ में आ गया होगा, इसे कॉपी में उतार  लो । उनके इन दोनों वाक्यों के बीच में कोई गैप नहीं रहता था सो हम लोग भी बिना गणित समझे गुरु की आज्ञा मानकर चुपचाप सवाल कॉपी में उतार लेते ।

 

लेकिन इन सब मस्तियों, और अरुचि का असर यह हुआ कि हम लोग सभी विषयों में कमजोर रह गए । आगे चलकर जिसकी परिणति कई छात्रों द्वारा साइंस से आर्ट ले लेने में हुई । मेरा हाल मत पूछो , जिसे मैं बेवफा समझता था उसी हिस्ट्री ने पोस्ट ग्रेजुएशन लेवल तक मेरा साथ निभाया और आज भी निभा रही है । 


जीवन में तरह तरह के गुरु मिलते हैं जिनके तरह तरह के छात्र होते हैं । मेरे लिए  आज उन गुरुजनों को याद करना इसलिये जरुरी है कि विज्ञान पढ़ाने के बहाने उन्होंने मुझमे वैज्ञानिक चेतना का बीजारोपण किया । 


लेकिन इस बारे में मेरा अपना मत है कि केवल विज्ञान पढ़ लेने से हम में वैज्ञानिक  चेतना नहीं आ जाती  उसे सायास अपने भीतर लाना होता है । वर्ना हम सारी जिन्दगी एक और विज्ञान को मानते हैं , विज्ञान  के प्रयोग करते रहते हैं ,नए नए वैज्ञानिक अविष्कार करते हैं दूसरी ओर अंधविश्वासों में घिरे रहते हैं । हमारे मस्तिष्क में यह दोहरी प्रणाली किस तरह चलती है इस पर बात फिर कभी ।   



155 मेरे हाइस्कूल के शिक्षक : हफ़ीज़ खान मास्साब



“अपनी ग्रामर की किताब कौन कौन नहीं लेकर आया है ?” हफ़ीज़ खान मास्साब की कड़कती हुई आवाज़ क्लास में गूँज रही थी । अब छात्रों में इतनी शर्म तो बाकी थी कि वे हाथ खड़ा कर खीसे निपोरकर नहीं कह सकते थे कि सर ,मैं नहीं लाया हूँ । मास्साब का अगला फरमान था  “ठीक है  जो लोग अपनी किताब लेकर नहीं आए हैं वे क्लास से बाहर चले जाएँ और अगली बार किताब लेकर ही क्लास में एंटर करें ।“


उसके बाद उन्होंने कहा “अब अपनी किताब खोलें और पेज नंबर फलां फलां निकाले ।“ सब ने अपनी किताब खोलकर डेस्क पर फैला ली । “ठीक है पहले बेंच से शुरू करें एक्टिव वौइस् पैसिव वौइस् ।“ पहला नंबर मेरा ही होता था मैंने शुरू किया कोलम्बस  डिस्कवर्ड अमेरिका , अमेरिका वाज़ डिस्कवर्ड बाय कोलम्बस ।“ “ वैरी गुड सर ने कहा “नेक्स्ट ।” मेरे साथ वाला छात्र अनुपस्थित था ज़ाहिर है मुझसे पीछे वाले का नंबर था वह थोड़ा असावधान था या फिर उसका ध्यान कहीं भटक गया था वह हड़बड़ी में पन्ने पलटाने लगा और इधर उधर देखने लगा । मास्साब ने कहा “ यहाँ वहाँ क्या देख रहे हो ? पेज नंबर फलां फलां ऊपर से सेवंथ रो ।


वैसे यह एक कक्षा का सामान्य दृश्य हो सकता है फिर इस क्लास में ऐसी क्या विशेषता थी ? विशेषता यह थी कि सबको अपनी अपनी किताब लाने का हुक्म देने वाले हफ़ीज़ खान मास्साब की टेबल पर कोई किताब नहीं थी और इसके ज़रूरत भी नहीं थी इसलिए कि उन्हें रेन और मार्टिन की पूरी ग्रामर पेज दर पेज लाइन दर लाइन याद थी और वे अपनी याददाश्त से बता रहे थे फलां पेज पर फलां लाइन देखो ।   


उम्रदराज़ हफ़ीज़ खान मास्साब बरसों से गाँधी विद्यालय भंडारा में इंग्लिश पढ़ाते आ रहे थे होमवर्क करके न लाने पर वे सीधे सीधे कहते “ दुनिया में काम प्यारा होता है चाम नहीं “ । भंडारा में हिंदी उर्दू मीडियम का एकमात्र स्कूल होने के कारण वे सभी छात्र जिनकी मातृभाषा मराठी नहीं थी इसी स्कूल में पढ़ते थे और यहाँ को एजुकेशन था 


हफ़ीज़ खान मास्साब उस ज़माने में भी बहुत प्रोग्रेसिव थे और लड़कियों की शिक्षा पर बहुत ध्यान देते थे । उनकी नज़र में लडके लडकियाँ सब बराबर थे । “अच्छा तो क्या नाम है आपका ?” उनका डायलाग कुछ इस तरह शुरू होता ..बिलकिस बेगम... बेगम मतलब जिसे कोई ग़म नहीं । पढ़ाई लिखाई में कमज़ोर हैं लेकिन कोई ग़म नहीं ।“ बेगम का यह मतलब पहली बार सुना था हम लोगों ने 


हफ़ीज़ खान मास्साब की हमेशा की एक ही वेशभूषा थी उनका रहन सहन बहुत सादा था वे छत्तीस इंच मोहरी का एक पायजामा और उस पर एक लम्बी घुटनों तक आनेवाली क़मीज़ । पैंट शर्ट में हमने उन्हे बस एकाध बार ही देखा है ।


एक दिन लंच टाइम में क्लास के उधमी छात्रों ने शरारतन बेंचों को लात मार मार कर टेढ़ा कर दिया जस्ट उसके बाद हफ़ीज़ खान सर की क्लास थी । “ ये बेंचे किसने टेढ़ी की हैं ? क्लास में प्रवेश करते ही हफीज़ खान सर की गरजती हुई आवाज़ क्लास में गूंजी । सारे छात्र व छात्रायें सर झुकाकर खड़े थे लेकिन किसीकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि कोई कुछ कहे ।  वे एक एक कर सभी के पास गये और बहुत प्यार से पूछा “ बेटा यह बेंचे किसने गिराई हैं ?” लेकिन सबके सब चुप । 


मास्साब मुस्कुराने लगे “ अच्छा इतनी एकता है तुम लोगों में कि गुनहगारों का नाम भी नहीं बताओगे । ठीक है फिर सभी को सज़ा मिलेगी । सब गुनाह में बराबर के शरीक हैं चलो लड़कियों के अलावा बाकी सब लोग बेंच पर खड़े हो जाओ । “ हफीज़ खान सर ने आदेश दिया । सभी बच्चे बेंच पर खड़े हो गये लेकिन मैं अपने स्थान पर ही खड़ा रहा । वे मेरे पास आये और कहने लगे ..” क्यों भाई क्या आप लोकमान्य तिलक हैं या गान्धीजी हैं जो गुनाह में अपने आप को शरीक नहीं मान रहे हैं ।“


“ठीक है अपने साथियों के नाम बताइये ।“ सर ने धीरे से कहा । मैंने पढ़ रखा था कि लोकमान्य तिलक के साथ भी उनके बचपन में ऐसा ही वाकया हुआ था, जब उन्हें क्लास में मूंगफल्ली के छिलके फ़ैलाने के लिए डांट पडी थी तब उन्होंने कहा था “ न मैं अपने साथियों के नाम बताउंगा न ही सज़ा भोगूंगा क्योंकि यह कचरा मैंने नहीं फैलाया है ।“


मैंने उसी तर्ज पर कहा “ यह बेंचे मैंने टेढ़ी नहीं की हैं ।“ “ ठीक है सच कहने की हिम्मत है तुममें । “ सर ने  कहा लेकिन  बाकी लोग खड़े रहें ।“ मुझे लगा सर लोकमान्य तिलक की कहानी भूल गए हैं  क्योंकि उस कहानी मे ऐसा नहीं हुआ था बल्कि उनके टीचर ने सभीको माफ़ कर दिया था ।


लेकिन हफ़ीज़ खान सर को भी शीघ्र ही इस बात का अहसास हुआ और उन्होंने अगली बार ऐसा न हो इस हिदायत के साथ सब छात्रों को बेंच से नीचे उतरने का आदेश दिया । यह कहने की ज़रूरत नहीं कि दो मिनट में हम लोगों ने क्लासरूम यथावत कर दिया । “  


हफ़ीज़ खान मास्साब उसी साल रिटायर हो गए थे । बरसों बाद एक दिन मैं उनसे मिलने उनके घर गया अस्सी से ऊपर उम्र थी वे बूढ़े और कमज़ोर दिखाई से रहे थे और उन्हें आँखों से भी कम दिखाई देने लगा था मैंने उन्हें अपना नाम बताया तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा “बेटा तुम्हे देख तो नहीं सकता लेकिन महसूस कर सकता हूँ । खूब खुश रहो ।“


हफ़ीज़ खान मास्साब से स्कूल लाइफ में जितने भी डायलाग्स हम बच्चों ने सुने थे उनसे यह डायलाग बहुत अलग था । वे सब तो हम एक कान  से सुनकर दूसरे से निकाल देते थे लेकिन यह डायलाग मन के भीतर तक पहुँच गया । आज हफ़ीज़ खान मास्साब दुनिया में नहीं हैं लेकिन उन्हें मैं महसूस कर सकता हूँ ।  



154 भगवान की माँ उन्हें कौनसी कहानी सुनाती थी



चिकित्सा विज्ञान आज बहुत आगे बढ़ चुका है हर मर्ज के लिए किसिम किसिम की दवाएँ मौजूद हैं लेकिन आज तक नींद की गोलियाँ बनाने वाली दवा कम्पनियाँ ऐसी दवा नहीं बना सकी जिसमे बिस्तर पर लेटकर माँ से कहानी सुनकर सुला देने जैसी तासीर हो ।


बचपन के उन बिस्तरों पर तकिया पर सर रखने के बावजूद तब तक नींद नहीं आती थी जब तक माँ कोई कहानी नहीं सुना देती थी । जाने कितनी पुराण कथाएँ कितने किस्से माँ को याद थे । दिवाली के बाद जब ठण्ड आने लगती, एकादशी के दिन से विवाह प्रारम्भ हो जाने की घोषणा के साथ माँ कहती अब चार महीने की नींद के बाद ग्यारस के दिन भगवान जागेंगे और तुलसी विवाह के साथ शादी ब्याह शुरू हो जायेंगे । 


मैंने माँ से कहा माँ,तुम हमें कहानी सुनाती हो तो हम रात भर के लिए सो जाते हैं और सुबह जाग जाते हैं, भगवान की माँ उन्हें ऐसी कौनसी कहानी सुनाती है जिसे सुनकर वे चार महीने के लिये सो जाते हैं ? और यह कहानी कब सुनाती है ? 


माँ हँसकर कहती “ जैसे ही बरसात शुरू होती है देवशयनी एकादशी आती है भगवान की माँ उन्हें इसी दिन कहानी सुनाती है, जिसे सुनकर वे चार महीने के लिए सो जाते हैं ।“ “लेकिन वह कहानी है कौनसी ?“ माँ जानती थी, बच्चा ज़िद्दी है मानेगा नहीं । 


माँ ने कहा “अब यह तो पता नहीं कि वे उन्हें कौनसी कहानी सुनाती है लेकिन मैं तुम्हे तुलसी विवाह की कहानी सुनाती हूँ । “


“हाँ सुनाओ ना माँ “ इतना कहकर मैंने माँ की गोद में अपना सर रख दिया । माँ ने प्यार से मेरे बालों में उंगलियाँ घुमाई और कहा “तो सुनो । जालंधर नाम का एक राक्षस था जिसे शिवजी से वरदान प्राप्त था । उसका विवाह वृंदा से हुआ था । एक बार वह शिवाजी के कैलाश पर्वत पर पहुँच गया और उसने पार्वती देवी पर बुरी नजर डाली ।“


“बुरी नज़र माने ?” मैंने उचक कर सवाल पूछा ।माँ थोड़ा हिचकिचाई “मतलब वो माता पार्वती को परेशान करना चाहता था । अच्छा सुनो बीच में मत बोलो नहीं तो हम भूल जायेंगे ।“ मुझे पता था माँ भूलेगी बिलकुल नहीं फिर भी मैं चुप रहा । 


माँ ने मुस्कुराकर कहा “फिर शिवजी को गुस्सा आया । वे उसे भस्म कर देना चाहते थे लेकिन उन्हें पता चला कि  वृंदा अपने पति की इतनी भक्ति करती है कि कोई उसके पति का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्होंने विष्णु जी से सलाह की । विष्णु जी को एक उपाय सूझा, वे ऋषि का वेष धारण कर वृंदा के पास गए और उससे कहा कि जालंधर की शिवजी से लड़ाई हो गई है और वह मारा गया है , यह सुनकर वृंदा मूर्छित हो गई । लेकिन जैसे ही उसे होश आया उसने ऋषि से प्रार्थना की कि  वे उसके पति को जीवित कर दे ।“  


मुझे टेक्निकली कहानी समझने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी फिर भी मैं चुप रहा । माँ ने कहना जारी रखा “विष्णु जी ने फिर जालंधर का रूप धर लिया । वृंदा ने जैसे ही जालंधर बने विष्णु को अपना पति माना उसकी पवित्रता नष्ट हो गई और उधर सचमुच का जालंधर मारा गया । लेकिन जैसे ही वृंदा को असलियत मालूम पडी कि यह उसका पति नहीं बल्कि विष्णु है उसने विष्णु को शाप दे दिया कि तुम पत्थर बन जाओगे और मेरे पैरों के पास पड़े रहोगे । फिर उसने खुद को भी नष्ट कर दिया और वह खुद एक पौधा हो गयी और तुलसी कहलाई । इसीलिए तुलसी के पास जो गोल गोल पत्थर या शालिग्राम पड़ा रहता है वह विष्णु ही है । इसीलिए हर साल एकादशी पर तुलसी का विवाह विष्णु से करवाया जाता है ।


सवाली राम के दिमाग में सवाल आया “ लेकिन माँ ,उसका पति तो जालंधर था ना फिर उसका विवाह जालंधर से क्यों नहीं करते ? विष्णु ने तो उसे धोखा दिया था ?” माँ ने कहा “ अरे वह राक्षस था न , दोबारा उसका विवाह राक्षस से क्यों करते और विष्णु जी तो भगवान थे इसलिए उसका विवाह भगवान के साथ करते हैं ।“


कहानी बहुत ऊबाऊ थी और पेचीदा भी, लेकिन अपनी विधा में थी तो कहानी ही और फिर माँ ने सुनाई थी, और कोई सुनाता था बहस कर लेता अब माँ से क्या बहस करना यह सोचकर चुपचाप सो गया । 


वे बचपन के दिन थे उन दिनों सूनी गई कहानियों में रोचकता प्रमुख तत्व होता था , अचानक इंसान की जगह बन्दर का प्रकट होना, धड का सर से जुड़ जाना, रूप बदलकर इंसान से गधा हो जाना  जैसे चमत्कारों की बातें सुनाने में मजा आता था । हालाँकि बच्चे सवाल पूछते हैं लेकिन माँ बाप उनके सही सही जवाब कहाँ देते हैं । बड़े होकर बच्चे सवाल पूछना भूल जाते हैं और फिर अपने बच्चों को वही काल्पनिक कथाएं सुनाते हैं । वे भी अपने बच्चों को उनके सवालों के सही जवाब नहीं देते । ऐसा पीढी दर पीढी चलता रहता है ।


मैं भी सवाल पूछना छोड़कर तुलसी विवाह वाले दिन की राह देखने लगता । उस दिन बाबूजी बाजार से गन्ने लेकर आते तुलसी वाले गमले के चारों ओर उन्हें खड़ा कर विवाह मंडप बनाया जाता, फिर श्लोक पढ़कर उनकी शादी की जाती । महाराष्ट में यह शादी बिलकुल पारम्परिक तरीके से होती है उसी तरीके से जैसे वर वधु का विवाह होता है । वर शालिग्राम और वधु तुलसी के पौधे के बीच एक वस्त्र जिसे अंतरपट कहते हैं रखा जाता और फिर मंगलाष्टक गाये जाते हैं । पाँच मंगलाष्टक के पश्चात ‘कुर्यात सदा मंगलम’ कहकर विवाह सम्पन्न हुआ ऐसा माना जाता । मुझे मंगलाष्टक गाने में बहुत मज़ा आता था इसलिए तुलसी विवाह के दिन मेरी काफी डिमांड होती थी ।


बचपन में माँ से जिन सवालों को पूछने का मौका नहीं मिला वे सवाल मैंने बड़े होकर अपने गुरूजी से पूछे,  जैसे इन कहानियों में राक्षस हमेशा बुरे क्यों होते हैं ? ऐसा क्यों कहा जाता है की वे देवियों पर बुरी नजर डालते हैं ? जब वे इतने ख़राब है तो फिर देवता उन्हें कभी न मरने का वरदान क्यों देते हैं ? और फिर उसके बाद षड्यंत्र करके उन्हें क्यों मार देते हैं ? ऐसा है तो वरदान देना ही नहीं चाहिए था ना ? फिर देवता ऐसे क्यों होते हैं कि  वे किसी के साथ भी कुछ भी कर सकते हैं ? विष्णुजी  को क्या और कोई तरीका नहीं आता था जालंधर को मारने का ? 


गुरूजी ध्यान से मेरे सवाल सुनते और कहते “बेटा यह सब कहानियां है, इन्हें कहानियों की तरह ही देखो, श्रद्धापूर्वक इनमे विश्वास करो और खुश रहो । “ खैर, मैंने उस समय भी गुरूजी की बात नहीं मानी और अपने सवालों के जवाब ढूँढता रहा । यह क्रम आज भी जारी है ।    


ऐसे ही दिवाली का त्योहार होता था । शुरू शुरू में तो हम लोग हर दिवाली पर बैतूल पहुंच जाया करते थे । लेकिन बाद में हम लोगों की और बाबूजी की छुट्टियों में तालमेल न होने के कारण बैतूल जाना बन्द हो गया । हालाँकि बैतूल की दिवाली में ज़्यादा मज़ा आता था । वहाँ पुराने घर में दादाभैया के कमरे में यह पूजा होती थी । सबसे पहले बापू , फिर उनके छोटे भाई , फिर दादा भैया , फिर उनके छोटे भाई और फिर हम लोगों की पीढ़ी के बच्चे । इस तरह सीनियरटी के अनुसार सबको पूजा करते देखने का भी अपना अलग आनन्द था । उसके बादा पटाखे , धूम्धाम खाना पीना आदि । वैसे ही उसके बाद गोवर्धन पूजा का भी आनंद आता था ।


 



153 घर घर में दिवाली मेरे घर में अँधेरा




वह अक्तूबर का उतार था । बाबूजी ने आंगन में निवार का पलंग बिछाया और माँ ने टीन की पेटी से गर्म कपड़े निकालकर उन्हें धूप दिखाने के लिए उस पर डाल  दिया । नीले, पीले, हरे स्वेटरों,शाल,मफलर आदि  के बीच से मेरा पूरी बांह वाला लाल रंग का स्वेटर झाँक रहा था और मुझे ललचा रहा था । मेरा मन हुआ उसे एक बार पहनकर देखूँ । माँ ने कहा “अभी नहीं, शाम तक उसे पूरी धूप लग जाने दो, उसमे बसी बरसात की सीलन उड़ जाये तब पहनना ।


अपने प्रिय लाल स्वेटर में मैं कैसा दिखूंगा इस खयाल के साथ मैं दिन भर उस स्वेटर के साथ बाकी गर्म कपड़ों को भी उलटता पलटता रहा ताकि कमबख्त सीलन अच्छे से निकल जाए । जब से मैंने होश संभाला तब से मेरा यह कोई तीसरा या चौथा स्वेटर रहा होगा । मैंने धूप को जल्दी जल्दी विदा किया और  शाम ढलने से पहले उस स्वेटर को उठाकर अपनी बाहें उसमे डाल दीं । लेकिन यह क्या, मेरा शरीर उस स्वेटर के भीतर जाने को राजी ही नहीं हो रहा था । जैसे तैसे मैंने अपने आप को उसके भीतर घुसाया । बाहें कलाई से कुछ ऊपर आकर ठहर गई और कमर ने निचले हिस्से को  प्यार से अपने पास ही बिठा लिया ।


दिन भर से जमा की गई मेरी खुशी में थोड़ी उदासी घुल गई थी । मैंने माँ से कहा  “देखो ना माँ , स्वेटर छोटा हो गया है ।“ माँ ने मुस्कुराते हुए कहा “स्वेटर छोटा नहीं हुआ, तुम थोड़े बड़े हो गए हो ।“ फिर प्यार से मेरे गाल पर हल्का सा दुलार किया और कहा “कोई बात नहीं, अभी रोज रोज पहनोगे तो थोड़ा ढीला हो जायेगा । इस साल इसी स्वेटर के साथ निकाल लो, अगले साल के लिए एक नया स्वेटर बुन दूंगी।“ 


माँ की बात सुनकर न मैं ठीक से दुखी हो पाया न ही मुस्कुरा पाया ।  लेकिन अगले साल की नौबत नहीं आई । माँ ने अगले ही सप्ताह फेरीवाले से ऊन खरीदा और मेरे नाप का एक स्वेटर बुनना शुरू कर दिया । माँ जैसे ही कहती “पीछे मुड़ो नाप लेना है ।” मैं पीठ पर माँ  की हथेलियों के स्पर्श के साथ उस स्वेटर की गर्माहट भी महसूस करने लगता । रोज रोज थोड़ा थोड़ा स्वेटर बनते हुए देखने का सुख भी अजीब होता है , बड़े बड़े मॉल्स और ऑनलाइन स्टोर्स से स्वेटर खरीदने वाले इस सुख से हमेशा वंचित रहते हैं ।


दिवाली अपने आगमन का संकेत दे रही थी । ठंडी हवाएँ रोज सुबह मेरी रंगोली देखने आ जातीं और गुदगुदाते हुए देह में हल्की सी झुरझुरी भर देतीं । घरों में खिड़की दरवाज़ों और दीवारों का मेकअप शुरू हो गया था । रजाइयों को भी धूप दिखाई जा चुकी थी और वे गद्दों के संग अपनी टीम बना चुकी थीं । हर रात उसके  आगोश में समाते हुए मैं ठण्ड से कांपते हुए कुछ देर घोड़े की तरह हिनहिनाता फिर उसकी गर्मी में गुम हो जाता  । कम्बल मुझे शुरू से ही पसंद नहीं था,रजाई के भार के नीचे दबकर सुख प्राप्त करने का जो अनिर्वचनीय आनंद है वह कम्बल में कहाँ ।


दिवाली के पांच दिनों को मैंने अपनी सुविधा के अनुसार नाम दिए थे, धनतेरस यानी पटाखे खरीदने का दिन, नरक चतुर्दशी उबटन से नहाने और फुलझड़ी जलाने का दिन, लक्ष्मीपूजन नए कपड़े पहनने और पटाखे छुड़ाने का दिन,बलि प्रतिपदा सुर्री पटाखे बटोरने का दिन और भाई दूज बचा खुचा स्टॉक खत्म करने का दिन । थोड़ी सी फुलझड़ी, छोटे वाले लक्ष्मी बम, टिकिया वाला सांप, महताब वाली माचिस और टिकली की डिब्बियों का एक पैकेट बस इससे अधिक की न चाहत थी न गुंजाईश । राजेश फटाका दुकान पर बाबूजी की जेब इससे अधिक की इजाज़त भी नहीं देती थी । लक्ष्मी पूजन वाले दिन बाबूजी सुबह सुबह लक्ष्मी जी की वही पुरानी मिट्टी की मूरत लेकर निकालते  और  गांधी चौक वाले पेंटर से उसे रीपेंट करवाकर ले आते  । साथ में लाते  सिंघाड़े, खील बताशे और पूजा की सामग्री । 


हम लोग आम की पत्तियों का तोरण बनाते और उसे दरवाज़े पर टांग देते । तोरण के बीच बीच में गेंदे के फूल की छोटी छोटी लड़ियाँ । नए कपड़े पहनने की इच्छा भी शाम को जल्दी बुला नहीं सकती थी सो इंतजार करते ।  बाबूजी की वेशभूषा में शामिल होता हर साल पहना जाने वाला कोसे का कुरता और माँ की वेशभूषा में अपनी सबसे अच्छी साड़ी । इधर पीतल की परात में दिये सजाकर रख दिए जाते । पटाखों की राशनिंग के अनुसार मैं कुछ पटाखे निकालता और राह देखता कब ओम  जय जगदीश हरे का हूटर बजे  और मैं धड़ाम धुडूम शुरू करूँ । 


लक्ष्मी पूजन और आतिशबाजी के बाद हर साल की तरह उस साल भी बाबूजी ने कहा “चलो शहर की रौशनी देखकर आते हैं ।“  वैसे भी हमारे पटाखे चुक गए थे और टाइम पास नहीं हो रहा था । दूसरों को पटाखे छुडाते देखना भी उतना ही आनंददायक होता है जितना खुद छुड़ाना, राजनेताओं की जनता का  मन बहलाने वाली बात की तरह यह बात भी बचपन से ही हमारे भेजे में डाल दी गई थी ।


हम अपनी गली से निकले और गलियाँ पार करते हुए मेन रोड पर पहुँचे । जैसे जैसे हम बड़ी सड़क पर आ रहे थे आतिशबाजी और सजावट का वर्गभेद स्पष्ट होता जा रहा था । फिर भी हम बच्चों को रंगोली देखने और दूसरों को पटाखे छुड़ाते देखने में आनंद आ रहा था । हमारा गंतव्य था मेन रोड पर दो मारवाड़ी व्यवसाइयों की इमारतें जिनके आंगन में उनके घर की बेटियाँ बड़ी सी रंगोली डालतीं और उसे खूब सजातीं थीं ।


इन इमारतों पर  बिजली के नन्हे बल्बों से सजावट भी की जाती थी । हम मिट्टी के दिए वालों के लिए ,बिजली के छोटे छोटे बल्बों की यह सीरीज भी खुश होने का एक सबब था । रोशनी, नये कपड़े, पटाखे ,मिठाई और रंगोली के अलावा लोगों को खुश होते देखना भी हमें  अच्छा लग रहा था । दूसरों के सुख में सुखी होने का भाव कुछ तरह जन्मा था कि ऐसा लगने लगा था कि इस दिन संसार में शायद ही कोई दुखी रहता होगा । लेकिन उस साल  मेरा यह भ्रम टूट गया । 


गांधी चौक से आगे शहर की जगमगाती सड़क हम बड़े बाज़ार की ओर बढ़ ही रहे थे की पटेल मेडिकल स्टोर्स के पास अचानक एक भिखारी सामने आ गया । जीर्ण शीर्ण वस्त्र पहने हाथ में कटोरा लिये वह धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था । मैंने देखा कि वह देख नहीं सकता है । मैंने ध्यान देकर सुना तो वह एक गाना गा रहा था .. घर घर में दिवाली है मेरे घर में अन्धेरा...।” भिखारी का दिखाई देना तो आम बात थी लेकिन उस वक़्त उसका दिखाई देना मुझे उदास कर गया । 


हम लोग आगे बढ़ाते हुए सारडा  बिल्डिंग तक आ गए थे । बहन सीमा ने रंगोली  की ओर इशारा किया “ भैया देखो कितनी अच्छी रंगोली  है । “ मैं बार बार पीछे मुड़कर देख रहा था, वह नेत्रहीन भिखारी दूर जा चुका था लेकिन मेरा ध्यान उस की ओर ही लगा था । मुझसे रहा नहीं गया और मैंने बाबूजी से पूछा “ बाबूजी यह दिवाली के दिन भी भीख मांग रहा है ? “ बाबूजी ने कहा ...” हाँ बेटा, वह भीख नहीं मांगेगा तो उसके घर चूल्हा कैसे जलेगा । “ “ तो “ मैंने कहा वह दिवाली कब मनायेगा ? “ बाबूजी ने कहा “ वह नेत्रहीन है ,उसके लिये क्या दिवाली क्या ईद । “ 


बचपन का वह लाल स्वेटर जाने कहाँ चला गया, माँ बाबूजी भी दुनिया से चले गए, कितनी दीवालियों में कितने दीप जले और बुझ गए । पटाखे छुड़ाना तो कबका बंद हो गया । दिवाली अब भी हर बरस आती है , मैं भी बाबूजी की परम्परा का निर्वाह करते हुए बिटिया को लेकर उसे शहर की रौशनी दिखाने ले जाता हूँ । लेकिन आज भी मेरी निगाहें उस नेत्रहीन भिखारी को ढूँढती हैं । वह तो शायद अब इस दुनिया में नहीं होगा लेकिन उस जैसे लाखों करोड़ों लोग अब भी हैं जो अपनी सूनी आँखों में भयावह अन्धेरे का चित्र लिये आँख वालों की इस दुनिया में मुश्किलों से भरी अपनी ज़िन्दगी जीने  को अभिशप्त हैं । जब भी आप दिये की ज्योत जलाएँ तो ऐसे लोगों को याद अवश्य कीजियेगा जिनकी आँखों की ज्योत बुझ चुकी है ।



152 अठरा ते अठरा टिम्बा ची रांगोली




बरसात की अंतिम बूँदें जब बाय बाय कह कर चली जातीं पंछी निश्चिन्त हो जाते कि अब उनके घोसलों की छत नहीं टपकेगी । इधर आँगन अपनी बदसूरती पर हाय तौबा मचाने लगता कि ‘भैया मेरा तो सारा मेकअप ही धुल गया है, कुछ करो ।‘ आंगन की गुहार पर माँ आदेश देती “जा कहीं से गोबर ढूंढकर ला, आंगन में छड़ा डालना है ।“ हम एक छोटी टुटही बाल्टी लेकर गायों के शौचालय की तलाश में निकल पड़ते और जोगीतालाव के मैदान से पवित्र गोबर ढूंढ लाते । उसके बाद शुरू होता आंगन लीपने का काम । 


छड़ा या सड़ा डालने के लिए एक बाल्टी पानी में गोबर का संपृक्त घोल बनाया जाता और उसे धीरे धीरे पूरे आंगन में छिडक दिया जाता। तत्पश्चात  ताड़ के पत्ते वाली झाड़ू से उसे समतल कर दिया जाता । दो तीन दिनों में आँगन का रूप इतना बदल जाता कि वह आईना मांगने लगता । शुरू शुरू में तो यह काम माँ ही करती थी लेकिन बाद में यह काम मुझे इतना अच्छा लगने लगा कि मैंने यह चार्ज माँ से ले लिया । 


इसके बाद प्रारंभ होता रंगोली  की डिज़ाइन ढूँढने का अभियान । इस अभियान की शुरुआत हम बच्चों की टीम लीडर लीला ताई के घर से होती । पूरे मोहल्ले में  लीला ताई  की रंगोली  की कॉपी सबसे ज़्यादा अपडेट रहती थी और उसमें नित नई रांगोलियों की डिज़ाइनों  का समावेश होता रहता था । हालाँकि नई डिज़ाइन  पर वह अपना कॉपीराइट समझती थी और हमें उतारने नहीं देती थी । 


मैं उसे एक नई डिज़ाइन लाकर देने  का प्रलोभन देता और एक घंटे के लिए कॉपी मांग लाता फिर  फुर्ती से उसकी सारी डिज़ाइनें  पेन से अपनी कॉपी में उतार लेता  । इनमे होतीं छह बिंदु आड़े और छह बिंदु खड़े वाली वर्गाकार रंगोली  यानी सहा ते सहा, ऐसे ही ऊपर की लाइन में पंद्रह बिंदु फिर उससे नीचे घटते क्रम में चौदह ,तेरह, बारह होते हुए एक तक पहुँचने वाली तिकोनी रंगोली  यानी पंदरा ते एक वाली डिज़ाइन। इसके अलावा उस कॉपी में होती कुछ बेल बूटे, मोर और चिड़िया की आकृतियाँ, साथ ही तिकोनी,चौकोनी शटकोणी  आकार की छोटी बड़ी अनेक डिज़ाइनें  । 


कॉपी में लगभग पचास डिज़ाइनें हो जाने के बाद अगला कदम होता बाज़ार से सफ़ेद और रंगीन रंगोली  पाउडर लाना । सफ़ेद रंगोली  पायली के भाव से मिलती थी और सस्ती भी होती थी जबकि रंगीन रंगोली  अपेक्षाकृत महंगी । हम सफ़ेद रंग की रंगोली  एक थाली में लेते और होली के बचे हुए रंग ,कुछ  नीली और लाल स्याही के साथ उसे मिलाकर उसे ज़िंदगी की तरह रंगीन बना देते । शेष रंग बाज़ार से ले आते ।


दशहरे के आठ दस दिन पहले हमारा यह रंगोली  बनाओ अभियान प्रारंभ होता । मैं माँ के साथ ही सुबह जल्दी जाग जाता और जोगी तलाव से काऊफ्रेश गोबर ढूंढ लाता । टीन के डिब्बे में गोबर का घोल भरकर उसके मुँह पर चारों उंगलियां लगाकर छड़ा डालने या छिड़काव करने की टेक्नीक में मैं कुछ ही दिनों में सिद्धहस्त हो गया था । इस बीच बाबूजी चाय बनाकर आवाज़ देते । चाय के उपरांत अपनी रंगोली  किट लेकर मैं आँगन में पहुँच जाता और अपना मोर्चा संभाल लेता ।


रंगोली  की किताब के पन्ने पलटकर सबसे पहले यह तय किया जाता कि आज कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली  डालनी है । फिर बिंदु डाले जाते और सफ़ेद रंगोली  से आड़ी तिरछी खड़ी रेखाएँ खींच कर उसका क्राफ्ट तैयार कर लिया जाता । अब समस्या यह कि कौनसा रंग भरना है । मध्यवर्गीय अवचेतन में यह बात बराबर बनी रहती कि अपने पास जो रंग मात्रा में कम है अथवा महंगा है उसका इस्तेमाल कम करना है और जो बहुतायत में है उसका उपयोग ज़्यादा । यह भी ध्यान रखना पड़ता कि कोई रंग आधे में ही न समाप्त हो जाए वर्ना पड़ोस की लड़कियों द्वारा मज़ाक उडाये जाने की पूरी सम्भावना होती । अतः इस योजना के क्रियान्वयन हेतु माँ की मदद लेनी पड़ती ।


पूरी रंगोली  बन जाने के बाद विभिन्न कोणों से उसका परीक्षण किया जाता, कहीं कोई लाइन छोटी बड़ी तो नहीं हो गई, रंग कहीं गहरा या हल्का तो नहीं हो गया । माँ उत्तर प्रदेश की थीं उन्हें रंगोली  डालने की प्रैक्टिस नहीं थी लेकिन रंगों के बारे में उनका ज्ञान अद्भुत था । माँ द्वारा अपनी बनाई हुई रंगोली  पास किये जाने और इनाम में एक चुम्मी मिलने के बाद अपना भ्रमण कार्यक्रम प्रारंभ होता । 


सामने वाली ठाकरे की बेबी, बाजू के घर की मंगला, बेदरे काका की लता, कलकोटवार की माधुरी, हलमारे के यहाँ की रंजू और अंत में हमारी लीला ताई सबके घर की विज़िट होने के बाद शुरू होता आत्मालोचना का दौर । सबकी बनाई रंगोलियों के साथ अपनी रंगोली की तुलना करते हुए मन ही मन अपनी गलतियाँ काऊंट कर ली जातीं जिन्हें अगली सुबह ठीक करने का वादा भी अपने आप से कर लिया जाता ।


माँ को मेरी बनाई हुई रंगोली  बहुत अच्छी लगती थी । एक दिन मैंने माँ से कहा “माँ तुम भी रंगोली  बनाना सीख लो न । तुम्हारे यहाँ झाँसी में रंगोली  नहीं बनाते थे क्या ?”  माँ ने मुस्कुराते हुए कहा “ बनाते थे ना, हम आटे से रंगोली  बनाते थे । वहाँ इसे चौक पूरना कहते हैं ।“ मुझे जानकर आश्चर्य हुआ “ मतलब महाराष्ट्र अभी सबसे एडवांस है ?”  


बाबूजी अपने बेटे का गुरुर बढ़ता हुआ देख रहे थे ।उन्होंने हमारे माँ बेटे के वार्तालाप में हस्तक्षेप करते हुए कहा “ ऐसा बिलकुल भी नहीं है कि महाराष्ट्र सबसे आगे है, रंगोली  सभी प्रान्तों में बनाई जाती है लेकिन उन्हें अलग अलग नामों से जाना जाता है, महाराष्ट्र में जो रंगोली  है वह यू पी में चौक है । राजस्थान में इसे मांडना कहते हैं तो बिहार में अरिपन । वहीं कर्णाटक में यह रंगवल्ली कहलाती है, तमिलनाडु में कोल्लम, आंध्र में मुग्गालू, हिमाचल में अदूपन । केरल में ओणम के अवसर पर फूलों की रंगोली बनाते हैं, तो कहीं चावल के आटे से । बंगाल में पिसे चावल के  घोल से अल्पना बनाते हैं । कहीं कहीं हल्दी से और गेरू से भी बनाते हैं। 


अपना एटिकेट फिर भी बरक़रार था “फिर भी इसकी शुरुआत तो महाराष्ट्र से ही हुई होगी न?” बाबूजी ने सोचा लड़के का घमंड जरा चूर किया जाये,  बोले “ऐसा बिलकुल नहीं है । इसकी शुरुआत तो आदिम काल से हुई है जब मनुष्य ने गुफाओं में चित्र बनाना सीखा । फिर हड़प्पा में भी इसके संकेत मिलते हैं । हमारी पुराण कथाओं में भी इसका उल्लेख है कि ब्रह्मा ने सबसे पहले उर्वशी का चित्र बनाया था फिर उसमे जान डाल दी ।


मैंने सोचा काश ऐसे ही ब्रह्मा जी मेरी रंगोली  के साथ भी करते तो कितना अच्छा होता, मेरे बनाये बेल बूटे जीवंत हो जाते, पौधे लहलहाने लगते, कुओं में पानी भर जाता, नदियाँ अपने आप बहने लगतीं, एक चाँद मेरे आंगन में भी जगमगाने लगता । बाबूजी की बातों से मेरा दर्प चकनाचूर हो चुका था लेकिन मेरा रंगोली  बनाना बंद नहीं हुआ । बहन सीमा के कुछ बड़े हो जाने के बाद उसने भी मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया ।


बचपन में शुरू हुआ रंगोली  बनाने का यह सिलसिला आज भी जारी है । अब तो बिटिया कोपल भी मेरा साथ देने लगी है । आसपास देखता हूँ तो पता चलता है रंगोली  की यह कला अब प्रोफेशनल रूप ले चुकी है। कला के इस क्षेत्र में बड़े बड़े कलाकार आ गए हैं, कोई बीस फीट की रंगोली  बनाता है तो कोई चालीस फीट की, कोई ज़मीन पर बनाता है तो कोई पानी पर चारकोल बुरादा या तेल छिड़ककर । नए नए रिकॉर्ड ।


हमारे समय की तरह सफ़ेद रंगोली में स्याही मिलाकर  नया रंग बनाने की अब जरूरत नहीं, अब तो बाजार में कई रंग मौजूद हैं । अलावा इसके कोई फूलो की रंगोली बना रहा है तो कोई बुरादे से या चारकोल से । अब आंगन लीपकर सतह बनाने की भी जरुरत नहीं, इसके लिए सुन्दर ड्राइंग बोर्ड और ग्लास व प्लास्टिक शीट्स आ गई हैं  । इसके अलावा जाने कितने तरह के सांचे और पॉट,रेडीमेड स्टीकर्स  । रंगोली  अब कपड़ों पर भी बनाई जाने लगी है ।


बचपन की मेरी रंगोली की किताब समय के साथ गुम हो गई और हाथ से कॉपी में उतारने का चलन भी ख़त्म हो गया , लेकिन नन्ही नन्ही बच्चियों को दिवाली के आसपास प्रिंटेड किताबों का सहारा लेकर रंगोली  बनाते देखता हूँ तो मन प्रसन्न हो जाता है । किसी घर के सामने से गुजरते हुए, रंगोली  बनाते हुए बच्चों को देखकर पल भर ठहरता हूँ और सोचता हूँ यह कितने से कितने बिंदु वाली रंगोली होगी । 


रंगोली जैसे मेरा जीवन दर्शन है और बार बार मिटाने और बनाने की मेरी रचना प्रक्रिया का उत्स । यह जानते हुए भी कि कल इसे धोकर, झाड़ू लगाकर फिर नई रंगोली  बनानी  होगी हर बच्चा हर दिन उसी तन्मयता के साथ  रंगोली  बनाता है । मुझे कभी कभी रंगोली  जीवन  की तरह लगती है, यह जानते हुए भी कि जीवन एक दिन ख़त्म हो जाना है हम जीना नहीं छोड़ते बल्कि हर दिन नए उत्साह और कभी न ख़त्म होने वाली जिजीविषा के साथ जीते हैं ।


151 किल्ला नहीं इसे किला कहते हैं





हमारे देश के ज़्यादातर लोग इतिहास, इतिहास की किताबों में  नहीं पढ़ते बल्कि किस्से कहानियों में पढ़ते हैं । हालाँकि उनका उद्देश्य मनोरंजन होता है, लेकिन इतिहास ज्ञान साइड इफेक्ट की तरह चला आता है । कला का बाज़ार जनता की यह कमज़ोरी जानता है, और किस्से कहानियों और फिल्मों के माध्यम से उसके सामने एक ऐसा इतिहास परोस देता है जिसके सच में झूठ कितना मिला है जानना मुश्किल होता है । अब तक कथा, कहानी, उपन्यास और फिल्मो को इतिहास कहने की कोशिश भी नहीं की गई थी और इनके लिए ‘ऐतिहासिक’ इस विशेषण का प्रयोग ही पर्याप्त  था लेकिन  अब व्यवस्था इस गोरखधंधे में धंधे में शामिल हो गई है और विशुद्ध मनोरंजन के लिए प्रस्तुत इन विधाओं को इतिहास कह कर जनता के अवचेतन से खिलवाड़ करने लगी है । समझदार जनता उसके बहकावे में नहीं आती है और ऐसी रचनाओं के गर्भ में छुपे इतिहास और कथा तत्व में अंतर करना जानती है ।


इतिहास को किस्सों में पढ़ने की इस परम्परा में बचपन में पाठय पुस्तकों में पढ़ा गया एक किस्सा याद आता है, शिवाजी और तानाजी मालसुरे का किस्सा । महाराष्ट्र के बच्चों को सिंहगढ़ के किले की कहानी घूटी में पिलाई जाती है, जिसका की वर्ड होता है ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’  यानी किला तो मिल गया लेकिन किले को जीतने वाला हमारा शेर चल गया ।  इसी घटना की स्मृति में बच्चे हर साल दिवाली के अवसर पर अपने आँगन में मिटटी का किला बनाते हैं और उसे सजाते हैं । इससे पहले कि मैं आपको किला बनाने की प्रक्रिया बताऊँ इस घटना का हम संक्षिप्त पुनर्पाठ कर लेते हैं, वैसे संभव है यह विवरण पढ़कर आपको हाल ही में बनी फिल्म ‘तानाजी’ की याद आई होगी जो इसी घटना पर आधारित है ।


पुणे शहर से तीस किलोमीटर दूर सह्याद्री पर्वत श्रंखला की एक पहाड़ी पर बने सिंहगढ़ किले का इतिहास सन तेरह सौ अठ्ठाइस से प्रारंभ होता है जब यह किला मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा आदिवासी कबीलों के सरदार नाग नाइक से हस्तगत कर लिया गया था । कौडिन्य ऋषि के बनाये प्राचीन मंदिर के नाम पर इस किले का नाम कोंढाणा किला था । तुगलक वंश से होता हुआ यह किला मराठों के पास आया लेकिन सन सोलह सौ पैंसठ में पुरंदर की संधि के तहत यह किला अन्य तेईस किलों सहित शिवाजी द्वारा औरंगजेब को दे दिया गया ।


किन्तु आगरा में छल द्वारा हत्या का षड़यंत्र रचे जाने पर शिवाजी क्षुब्ध हो गए और उन्होंने संधि भंग कर अपने किले वापस लेने की मुहीम प्रारंभ कर दी । फरवरी सोलह सौ सत्तर में यह अभियान प्रारंभ हुआ और उसके लिए योग्य सेनापति तलाशा जाने लगा । तानाजी मालसुरे ने अपने बेटे रायबा के विवाह की तैयारियों में व्यस्तता के बावजूद यह ज़िम्मेदारी ग्रहण कर ली । उन्होंने कहा “आधी लगीन  कोंढाण्याचे मग रायबा चे” अर्थात पहले लगन किले का बाद में बेटे का  । ‘आधी लगीन  कोंढाण्याचे’ यह उक्ति मुहावरे की भांति महाराष्ट्र में आज भी प्राथमिकता के पर्याय में उपयोग में लाई जाती है ।


फिर सोलह फरवरी का दिन आया । तानाजी ने अपने भाई सूर्याजी और पांच सौ मावले सैनिकों के साथ किले पर अधिकार कर लिया लेकिन किले के अभिभावक उदयभान से लड़ते हुए वे  वीरगति को प्राप्त हुए । जब शिवाजी तक यह ख़बर पहुँची तब उनके मुंह से निकला ‘ अरे गढ़ आ गया लेकिन हमारा शेर चला गया’ तानाजी की स्मृति में इस किले का नाम उन्होंने सिंहगढ़ रखा ।


हमारा राजनीतिक इतिहास ऐसे ही युद्धों का इतिहास है जहाँ सत्ता के लिए राजाओं के बीच युद्ध होते हैं । यहाँ साम्राज्य विस्तार प्रमुख होता है और राज्यधर्म का विस्तार गौण । इतिहास के विश्लेषण में यह सुविधा होती है कि घटना को किसी भी बिंदु पर रोक कर हम उसे अपनी इच्छानुसार रूप दे सकते हैं । इसीलिए किसीको यह नहीं पता चला कि उसके बाद सिंहगढ़ का किला पुनः औरंगजेब द्वारा हस्तगत कर लिया गया जिसे दोबारा तानाजी की तरह बाल कावले ने जीता । कुछ समय बाद फिर उसे मुगलों द्वारा छीन लिया गया जिसे महारानी ताराबाई ने वापस लिया । अंग्रेजों के तोपों की धमक सुनता हुआ अब यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पास है । किस्सों में पढ़े गए इतिहास के अंतर्गत हमने तानाजी पर इतिहास को विराम लगा दिया और बाल कावले और ताराबाई अनचीन्हे रह गए  ।


अवचेतन में बिम्ब आरोपित करने की उस उम्र में जब मुझे न इतिहास से कोई सरोकार था न राजनीति से मैंने पहली बार इस किले की कहानी के आलोक में  गुद्दू वानखेड़े को अपने आंगन में मिट्टी का किला बनाते हुए देखा । “क्या बना रहे हो गुद्दू “ पूछने पर उसने कहा “यह दिवाली का किल्ला है ।“ मैंने प्रतिवाद किया “किल्ला नहीं इसे किला कहते हैं ।“  उसकी भाषाई अनभिज्ञता में दृढ़ता थी “ नहीं, यह रायगढ़ का किल्ला है, पिछले साल  मैंने सिंहगढ़ का किल्ला बनाया था । चलो साथ मिलकर बनाते हैं ।“


मैंने उसका साथ देते हुए ध्यान से किला बनाने की पूरी प्रक्रिया देखी और अगले साल दिवाली  पर स्वतन्त्र रूप से  किला बनाने की शुरुआत की । सबसे पहले जगह का चयन ज़रूरी  था । आँगन के  एक कोने में अमरुद के पेड़ के नीचे मुझे उपयुक्त जगह दिखाई दी । सबसे पहला काम था पास के जोगीतालाव मैदान से दो तसले मिटटी खोद कर लाना । मैं जैसे ही तसले लेकर मैदान पहुँचा मोहल्ले के बड़े भैया लोग खुदाई करते दिखे , मेरे दुबले पतले हाथ पांव देखकर उन्हें दया आ गई और उन्होंने दो तसले मिटटी मुझे गिफ्ट कर दी ।


अब इसके बाद आवश्यक सामग्री का जुगाड़ करना था, दो तीन फटे पुराने बोरे, टीन  के पुराने पीपे और ईटें, पानी,रस्सी  इत्यादी  फिर उसे सजाने के लिए छोटे छोटे सैनिक मिट्टी के खिलौने आदि आदि । सजावट का काम तो बाद का था पहले निर्माण जरुरी था । मैंने बीचोबीच टीन का पीपा रखा और आसपास ईटें जमा दी । यह किले का बेस था । फिर बाल्टी में मिटटी घोलकर उसमे बोरा डुबोया और उसे पीपे के आसपास ईट और लकड़ी टिकाकर बिछाते हुए एक पहाड़ी का रूप दिया । फिर पीपे और ईटों पर मिट्टी के लोंदे जमाते हुए दीवारें बनाई लकड़ी का पटिया रखकर छत बनाई और पानी लगाकर उसे चिकनाया ।


अब पहाड़ी की बारी थी । जहाँ जहाँ गैप दिखी वहाँ मिट्टी से गुफाएँ बनाई । किले तक पहुँचने के लिए स्लोप बनाया और माचिस की तीलियों से रेलिंग के खम्भे बनाए । फिर धागे को स्याही से रंगकर उसकी रेलिंग बना दी । अगले चरण में  पहाड़ी पर जगह जगह ढेर सारी मिटटी बिछाई और वहाँ राई के दाने बिखेर दिए । 


अब पहाड़ी है तो झील भी जरुरी है ना  इसके लिए मुझे पहाड़ी की तलहटी में उपयुक्त जगह दिखाई दी  । मैंने एक बड़ा सा पॉलिथीन लिया और उसे नीचे बिछाकर आसपास मिट्टी की मेढ़ बना दी ताकि पानी बाहर न बहे , आसपास कुछ चमकीले पत्थर भी रख दिए जो चट्टानों का आभास दे रहे थे ।


अगले दिन जब मिट्टी कुछ सूख गई तो मैंने एक बर्तन में गेरू घोला और दूसरे  में चूना जिससे मैंने गुफाओं के प्रवेश द्वार और किले की दीवारों पर कलाकारी की । घर में थोड़ा सा लकड़ी का बुरादा पड़ा था, होली के बचे हुए हरे रंग से जिसे रंगकर मैंने किले के रास्ते पर घास की तरह बिछा दिया । पिछली बार दशहरे के मेले से मिटटी के सैनिक खरीदकर लाया था उन्हें किले के द्वार पर तैनात कर दिया, मिट्टी के शेर गुफ़ा के पास रख दिए और मोर को जंगल में जगह दे दी ।  अब मेरा किला लगभग तैयार था ।


अगले चार पांच दिनों तक मैं उन जगहों पर हल्का हल्का पानी छिड़कता रहा जहाँ मैंने राई बोई थी।  चौथे पाँचवे दिन जब राई से अंकुर निकलने लगे और मेरी पहाड़ी हरी भरी दिखाई देने लगी । हरियाली देखकर मेरा उत्साह बढ़ गया । अब दीवाली तक उसे सजाने का काम  ही शेष था  और रात में दिए जलाकर रौशनी की व्यवस्था भी करनी थी ।


जब मेरा किला पूर्ण हो गया और प्रदर्शन के लिए तैयार हो गया तो मै जाकर गुद्दू को बुला लाया और कहा “देख मेरा सिंह गढ़ का किला बन गया ।“ गुद्दू मेरा किला देखकर बहुत खुश हुआ  और तालियाँ बजाकर कहने लगा “वा कितना अच्छा किल्ला बनाया है । “ मैंने चीखकर कहा .. “ किल्ला नहीं, यह किला है ।“ 



150 इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ




एक दिन बीच वाले कमरे की खिड़की से बाहर झाँका तो देखा शरद का चाँद खुले आसमान में अपनी मसें भीगने की उम्र तक आ चुका है और ओस में नहाती हुई चाँदनी को छुप छुप कर देख रहा है । मैंने मेले से लाये अपने कागज़ के साँप से कहा ‘जा, चाँदनी की देह से लिपट जा, चंदन की खुशबू तो उसकी देह से भी आ रही है ।‘ साँप ने कहा ‘ना, वह तो मस्तमगन के फूल की खुशबू है, जो बाबूजी कल किसी के घर से लाए हैं ।‘


मेरे यथार्थ के धरातल पर पहुँचते ही  मेले से लाए खिलौनों के साथ लाई गई भुलोबा और भुलाबाई की मिट्टी की मूरत बोल उठी “ओ सांप वाले बाबू ..हमें कब बिठाओगे ?” “ओह, मैं तो भूल ही गया था ।“ मैंने मन ही मन कहा और फटाफट तैयारी करने लगा ।पहले  टेबल पर एक कपड़ा बिछाया, माँ और छोटी बहन सीमा मेरी मदद के लिए आ गई और हमने उस पर भुलाबाई और भुलोबा की स्थापना कर दी ।


आप सोच रहे होंगे कौन है यह भुलाबाई और भुलोबा ? अरे, यह कोई और नहीं अपने शंकर पार्वती हैं। जैसे कि हर साल बेटियाँ अपने मायके आती हैं वैसे ही लोक परम्पराओं की हमारी यह भुलाबाई अर्थात गौरी भी अनंत चतुर्दशी से अपने मायके आई हुई है और भुलोबा यानि अपने शंकर जी दशहरे के दिन उसे लेने आये हैं। अब वे ठाठ से अगले पाँच दिन यानी शरद पूर्णिमा तक अपनी ससुराल में रहेंगे और फिर अपनी पार्वती को लेकर वापस चले जाएंगे । 


पुराणों में वर्णित गौरी के अपने पीहर आने का यह मिथक महाराष्ट्र में एक पर्व के रूप में मनाया जाता है जिसमें लड़कियां दशहरे के दिन अपने घर में भुलाबाई की स्थापना करती हैं । पांच दिनों तक हर शाम दिया बाती के बाद लड़कियों की टोली निकलती है, वे बारी बारी से अपनी सखियों के घर जाती हैं और उनके घर बिठाई गई भुलाबाई की पूजा कर बहुत सुन्दर गीत गाती हैं, फिर प्रसाद खाती हैं और घर लौट आती हैं ।  


मुझे बचपन से ही हम बच्चों की टीम लीडर लीलाताई की टीम में शामिल होकर सखियों के घर जाने और भुलाबाई के गाने गाने का मौका मिल गया था । हर साल गाते रहने के कारण पांच छह साल की उम्र तक तो पूरे गाने याद हो गए थे  जो आज भी याद हैं । जनपदीय मराठी भाषा में गाए जाने वाले भुलाबाई के यह गीत वस्तुतः हमारे लोक जीवन में  गाये जाने वाले लोकगीत ही हैं जिनके शब्दों में तत्कालीन संस्कृति की झलक दिखाई देती है । एक बानगी देखिए ..


भाद्रपदे च महिना आला आम्हा मुलींना आनंद झाला 

पार्वती म्हणे शंकराला चला हो माझ्या माहेराला 

गेल्या बरोबर पाट बसायला विनंती करू यशोदेला 

सर्व मुली गोळा झाल्या टिपर्‍या मध्ये गुंग झाल्या 

गाणे गायिले खेळ केला  प्रसाद घेऊनि घरी गेल्या ।


इसका आशय कुछ इस प्रकार है  कि भाद्रपद का महीना आ गया है और पार्वती शंकर से कह रही हैं “ए, चलो न मेरे पीहर, वहां तुम्हे पाटे पर बैठाया जायेगा और खेलते हुए , तालियों से स्वागत किया जायेगा। मेरी सखियाँ तुम्हारी राह देख रही हैं, वे तुम्हारे स्वागत में गीत गायेंगी और प्रसाद खाकर घर जायेंगी ।


विशेष बात यह है कि इन गीतों में शिव पार्वती कोई देवता नहीं हैं । यहाँ  वे सामान्य लोगों की भांति ही आचरण करते हैं, कहीं कहीं उन्हें भील भीलनी भी माना जाता है । यद्यपि इसके पीछे भी एक कथा है कि एक बार द्यूतक्रीड़ा में पार्वती से सब कुछ हार जाने के पश्चात शिवजी जंगल की ओर निकल गए और अपना देवत्व भूल कर भुलोबा नामक भील बन गए ।  तब पार्वती उन्हें मनाने के लिए भीलनी का रूप धारण कर उन्हें मनाने गईं।  इसलिए उनके स्वागत में गाये इन गीतों में भी भजन या आरती जैसा कोई भाव नहीं है ।


विशेष बात यह कि यह भक्ति गीत नहीं हैं, इन लोकगीतों में स्त्री की व्यथा है , परदेस में ब्याही गई बेटी के सुख दुःख के समाचार हैं । वह इन गीतों के माध्यम से अपने उन दुखों का बखान  करती है जो उसे ससुराल में मिले होते हैं । प्रसव पीड़ा के समय उसे क्या महसूस होता है , पति,सास,ससुर द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर वह कैसा महसूस करती है इन बातों का सूक्ष्म चित्रण इन गीतों में है । 


इन गीतों को सुनते हुए इस बात का अनुभव होता है कि अपने दुखों को अभिव्यक्त करने के लिए मनुष्य सदा गीतों का सहारा लेता रहा है । स्त्रियों के पास भी अपने शोषण और उत्पीडन को दर्ज करने के लिए इसी लोक का आलम्बन है । दुःख तो दुःख है, एक दिन फूट पड़ेगा, चाहे आंसुओं में ,चाहे गीतों या कविताओं में और जब दुःख की इन्तहा हो जाएगी वह आक्रोश बन जायेगा, प्रतिरोध के लिए ताकत बन जायेगा ।


एक गीत है जिसमे भुलाबाई गर्भवती है, वह मायके जाना चाहती है और सास से कहती है “सासूबाई सासूबाई मला मूळ आल आता तरी धाडाना धाडाना “ लेकिन उसकी सास उसे जाने नहीं दे रही है । वह बहाना बनाते हुए उससे कहती है “ऐसा करो पहले बाड़ी में करेले के बीज बो दो तब चले जाना।“ बहू बीज बो देती है । फिर सास कहती है “ऐसा करो उसकी बेल उग जाने दो फिर अपने मायके चले जाना । “ जब बेल बढ़ जाती है तो कहती है अब उसमे फूल आने दो, फिर कहती है बेल में करेले लग जाने दो। अंततः जब तक बहू करेले की सब्जी बनाकर सास को खिला नहीं देती और जूठन समेट  नहीं लेती, उसे मायके जाने की अनुमति नहीं प्राप्त होती । 


फिर कुछ गीतों में मायके में उसके सहेलियों के साथ खेले गए खेल और शरारतों का वर्णन है । भुलाबाई यहाँ प्रसव के लिए आई है । अभी अभी उसे संतान प्राप्ति हुई है । यह संतान बेटा भी हो सकता है और बेटी भी, समस्या तो यह है कि उसका नाम क्या रखा जाए । लड़कियाँ गाती हैं ..


इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ खिड़कित होता बत्ता 

भुलोजी ला मुलगा झाला नाव ठेवा दत्ता 


मतलब हमारे सामने नाम रखने की समस्या थी तो यूँही सोचते सोचते हम खिड़की के पास चले  गए, वहां एक बत्ता रखा था, वही खलबत्ते वाला बत्ता, तो बस बत्ता की तुकबंदी में हमें नाम मिल गया ‘दत्ता’ । अब मान लो अगर लड़की हुई हो तो उसके लिए फिर गाना है 


इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ  खिड़कित होती वांगी 

भुलोजी ला मुलगी झाली नाव ठेवा हिमांगी  


यानी इस बार जब हम खिड़की के निकट गए  तो वहां वांगी यानी बैंगन रखे थे बस वांगी की तुक में हमें नाम मिल गया हिमांगी । लड़कियां ऐसे ही ‘इड़कित जाऊ खिड़कित जाऊ’ गाती जातीं और गागर की तुक में सागर, धोती की तुक में मोती, डोरी की तुक में गौरी, झाकन की तुक में माखन जैसे नाम रखती जातीं । ( आप भी सोचिये कि अगर आप का नाम भी ऐसे ही रखा जाता तो खिड़की में क्या रखा मिलता ?)


सबसे ज़्यादा मुश्किल तो तब होती है जब मायके आई हुई ससुराल वालों द्वारा सताई हुई भुलाबाई अपनी ससुराल जाने से मना कर देती है । अब बड़ी मुश्किल है, उसे वापस ससुराल जाने के लिए मनाये कैसे ? ससुराल के लोग एक के बाद उसे मनाने के लिए उसके पीहर  जाते हैं और उसे भांति भांति के प्रलोभन देते हैं । सबसे पहले सास जाती है अपनी सून यानी बहू को समझाने .. 


सासू गेली समजावयाला 

चला चला सुनबाई अपुल्या घराला 

पाटल्याचा च जोड़ देते तुम्हाला 


यानी, ओ बहूरानी अपने घर चलो न, तुम्हे चाँदी की एक जोड़ पायल दूंगी । लेकिन बहू साफ मना कर देती है “पाटल्या च जोड़ नको आम्हाला, मी नाही यायची तुमच्या घरा ला “ .. ना ना सासू माँ, अपनी पायलें अपने पास रखो, मैं नहीं आनेवाली तुम्हारे घर ।


फिर तो ननद आती है, जेठ आते हैं, देवर आते हैं और जरी की साड़ी, चांदी के  कमरबंद से लेकर घर की चाबियों तक का प्रलोभन देते है लेकिन बहू जाने को तैयार नहीं है । अंत में जब पति आते  हैं और कहते हैं तुझे खूब सारा प्यार दूंगा और अपना प्रिय लाल चाबुक भी दूंगा । तब वह झट जाने को तैयार हो जाती है । ध्यातव्य है कि लाल चाबुक यहाँ सम्पूर्ण अधिकार का प्रतीक है ।


अब इधर भुलाबाई मायके आई है तो वहां उसकी भाभी भी है और भाई के बच्चे भी । इन गीतों में ननद भौजी की चुहल भी है, जैसे एक गीत में भौजाई सींके पर रखा हुआ मक्खन चुराकर खा जाती है  तब ननद कहती है .. “तुम अपने आप को भैया के इतना करीब मत समझो, अभी मेरे भैया आयेंगे तो उनकी गोद में बैठकर तुम्हारी चुगली करूंगी .. कहूंगी “दादा तुमची बायको चोट्टी चोट्टी”   दादा यानी भाई और बायको यानी पत्नी । भाभी कहती है “नहीं नहीं, ऐसा मत कहना ।“ फिर धीरे से भाभी उसे प्यार से मना भी लेती है ।


भुलाबाई के सारे गीत सुनने के बाद आप महसूस करेंगे कि इन गीतों में केवल घर परिवार की  ही नहीं तत्कालीन ग्रामीण संस्कृति की झलक भी है, जैसे कृषि के कार्यों और पशुपालन में एक स्त्री की भूमिका, महाजन द्वारा सताए जाने पर उपजी मानसिक स्थिति, पति के पास काम न होने पर अभावों का जीवन , अन्य तीज त्यौहार और पर्वों का आनंद, सब कुछ । 


महाराष्ट्र में सावित्रीबाई फुले जैसी शिक्षिका रही हैं जिन्होंने सन अठारह सौ बावन में देश के सर्वप्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना की थी । उसीका परिणाम है कि महाराष्ट्र की स्त्रियाँ स्त्री स्वातंत्र्य, स्वावलंबन और अध्ययन में बहुत आगे हैं । भुलाबाई उत्सव पर गाए गीत उनके संस्कारों में हैं जो उनके भीतर अपने शोषण के प्रतिकार की ताकत पैदा करते हैं ।


लड़कियों के साथ घर घर जाकर भुलाबाई के गीत गाने और प्रसाद खाने का बचपन का वह दौर बीत गया लेकिन आज भी मेरी स्मृतियों में सब कुछ जस का तस है, ताली बजाकर झूम झूम कर गाना और गाने का हमारा टाइम श्येडूल समाप्त के बाद घोषणा करना ..


बाना बाई बाणा सुरेख बाणा 

गाने संपले खिरापत आणा 


मतलब अब गाने ख़त्म हो गए जल्दी से प्रसाद लाओ , अगले घर भी जाना है । इतना सुनते ही उस घर की बिटिया एक बंद डिब्बे में प्रसाद लेकर आती और डिब्बे को हिलाकर सब सखियों से पूछती “ ओळखा काय ?” यानी बूझो क्या ? फिर सब बच्चे उस ध्वनि को सुनकर अपनी अक्ल भिड़ाते और प्रसाद का नाम बताते , चना मुर्रा, फल्ली दाना, चिरौंजी दाना, गुड़ पट्टी ऐसा ही कुछ , फिर उसे खाते हुए अगले घर के लिए रवाना हो जाते । इस तरह यह सिलसिला कोजागरी यानी शरद पूर्णिमा तक चलता रहता । शरद पूर्णिमा के दिन भुलाबाई भुलोजी अपने घर, हम अपने घर। 


आप लोग देख क्या रहे हैं ? भुलाबाई के गाने की कहानी समाप्त हो गई है । अब आपको  अगली पोस्ट पर भी तो जाना होगा ना ? हाँ यह पोस्ट आपको कैसी लगी और खिड़की में आपके नाम के तुक वाली कौनसी वस्तु होना चाहिए यह बताना मत भूलियेगा, आपके कमेन्ट की प्रतीक्षा रहेगी ।