5 जून 2026

46 मीठी मीठी जामुन खानेवाले हम बंदरों का कलेजा


बैतूल का हमारा वह खपरैल वाला मकान ठीक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इस कविता में बताये गए मकान की तरह ही नगर के अंतिम छोर पर था । आठ दस मकानों के बाद से ही रिंग रोड के उस पार से खेत शुरू हो जाते थे । 

नगर से दूर कुछ गाँव की-सी बस्ती एक 

हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम 

जहाँ पत्राजाल अंतराल से झलकते हैं 

लाल खपरैल श्वेत छज्जों के सँवारे धाम 

मुझे आश्चर्य होता था कि खपरैल वाले उस छोटे से मकान में इतने सारे लोग कैसे रह लेते थे । मुझे यह मकान जादूगर के उस छोटे से डिब्बे मैजिक बॉक्स की तरह मालूम होता था जिसमे से जादूगर जाने क्या क्या चीज़ें निकाल लेता है । हालाँकि यह मकान इतना छोटा भी नहीं था यह दुमजिला था और काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ था ।  

विश्वेश्वर प्रसाद जी तो काफी पहले गुजर गए थे लेकिन उनके बड़े बेटे  बाबूलाल जी अपने छोटे भाइयों बृजलाल,कुन्दनलाल, सुन्दरलाल, चन्दनलाल और उनके बाल बच्चों के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे ।

सबसे छोटे चन्दन लाल का निधन अल्पायु में सन पचास से पूर्व ही हो चुका था । उनकी पत्नी रामदुलारी यानि छोटी काकी अपनी एक बेटी उषा तथा बेटे किशन के साथ वहाँ रहती थीं । बड़ी बेटी आशा का विवाह बाबूजी के विवाह के कुछ समय पश्चात ही नागपुर में रतनलाल शर्मा जी के साथ हो चुका था । उनकी सुभाष, मालती, रेखा,रजनी व रानी नामक पांच संतानें थीं । छोटी बेटी उषा का विवाह कुछ समय बाद  मुंबई में विजय कुमार शर्मा जी के साथ हुआ । उनके अखिलेश,निखिलेश,विमलेश व अमित चार बेटे हुए ।

सुन्दरलाल दादा जी नि:संतान थे और उस पुराने कच्चे मकान के दक्षिणी भाग में फर्नीचर कारखाने के पीछे की ओर रहा करते थे । बैतूल में वे काफी रुतबे वाले व्यक्ति थे । वे समाज सेवी थे तथा एक समय नगर परिषद बैतूल में पार्षद भी रह चुके थे । उनकी पत्नी यानि हमारी दादी रतनबाई धार्मिक कर्मकांडों के अलावा छुआ-छूत भी बहुत मानती थीं। उनके वाले हिस्से के पीछे के आंगन में एक बड़ा सा कुआँ था जिसके कारण उन्हें सब ‘कुएँ वाली काकी’ कहते थे । 

इस गोल घेरे के भीतर था कुआँ 

दादी  तड़के ही स्नान कर लेतीं और पूजा - पाठ के बाद गीले वस्त्रों में रसोई बनाती थीं । उन्होंने पहले से ही अपनी रसोई अलग कर रखी थी । हम बच्चों को उनके यहाँ जाने में बहुत डर लगता था। जून के माह में जब उनके पिछवाड़े के आंगन में जामुन के पेड़ पर मीठी मीठी जामुन लगती थीं, हम बच्चे उन्हें तोड़ने पहुँच जाते थे और दोपहर के सुनसान में पत्थर की आवाज़ से दादी की नींद में ख़लल डालने के आरोप में उनकी डांट खाते थे । शाम को दादी हम बच्चों को खुद ही बुलाती थीं और मीठे मीठे जामुन खाने के लिए दिया करतीं थीं । दादा दादी तो नहीं रहे लेकिन यह जामुन का पेड़ आज भी उसी जगह है ।

आज भी है जामुन का पेड़ 

बृजलाल दादा उन दिनों हम बच्चों को एक कहानी सुनाया करते थे जिसमे नदी किनारे जामुन के पेड़ पर रहने वाले बन्दर की एक मगरमच्छ से दोस्ती हो जाती है। एक दिन मगरमच्छ उस बन्दर को अपनी पीठ पर बिठाकर अपने घर ले जाता है और रास्ते में बताता है कि उसकी पत्नी ने कहा है जो बन्दर रोज मीठी जामुन खाता है उसका कलेजा कितना मीठा होगा । बन्दर बुद्धि से काम लेता है और कहता है कि “मित्र कलेजा तो मैं पेड़ पर ही भूल गया हूँ, एक बार वापस ले चलो ताकि भाभी की इच्छा पूरी कर सकूँ ।“ बस फिर क्या था बन्दर पेड़ पर गया सो गया । यह कहानी सुनकर हम बच्चे उन दिनों यही सोचते थे कि जामुन खाने से हमारा कलेजा भी खूब मीठा हो गया होगा, अब कोई हमसे कलेजा मांगेगा तब भी नहीं देंगे ।

सुन्दरलाल दादा से बड़े कुन्दनलाल दादा थे । वे रेलवे की नौकरी से अवकाश लेकर बैतूल आ गए थे । दादीजी का नाम चंपा देवी था और उन्हें किताबें पढ़ने का बहुत शौक था । कहानी,उपन्यास और पत्रिकाएँ पढ़ें बगैर उन्हें नींद नहीं आती थी । जासूसी उपन्यास वे बहुत चाव से पढ़ती थीं । कुंदनलाल जी के बेटों में सबसे बड़े मनोहर बैंगलोर में एच एम टी घड़ी कंपनी कार्य करने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र  में नौकरी के लिए  आ गए थे । बचपन में ही अपने नाना के पास जबलपुर चले गए थे । सुशीला चाची मेरी माँ शीला की हमनाम हैं  । 

मनोहर चाचा सुशीला चाची गोपाल ममता 

उनके बच्चों के नाम हैं सरिता, गोपाल, मंजू, ममता और संजय । यह सारे बच्चे बैतूल की हमारी ग्रीष्मकालीन आयुवर्गानुसार बनाई धमाचौकड़ी टीम में शामिल हुआ करते थे । बाद में सरिता जीजी का विवाह भिलाई में सुरेश चन्द्र शर्मा से, मंजू का बिलासपुर में सुन्दर लाल विश्वकर्मा से और ममता का नागपुर में शैलेश माहुले से हुआ । 

 उस समय मनोहर चाचा से छोटे वीरेंद्र चाचा कॉलेज में पढ़ रहे थे । वीरेंद्र चाचा लकड़ी के फर्नीचर का काम बहुत अच्छी तरह जानते थे लेकिन वे बहुत महत्वाकांक्षी थे । वे बाबूजी से बहुत प्रेरित रहे इसलिए बैतूल में रहते हुए ही उन्होंने नौकरी के लिए आवेदन किया और मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में वे रेलवे में फायरमैन की नौकरी करने के लिए भावनगर गुजरात चले गए । फिर वे वेस्टर्न रेलवे में पदोन्नत होकर सन पचहत्तर में मुंबई आ गए और फिर वहीं  प्रभादेवी में सेटल हो गए ।

वीरेंद्र चाचा देवकी चाची मनीष आशीष निधीश अनिषा 

उनका विवाह मुंबई में ही मुन्नीलाल जी की बेटी देवकी से हुआ था । उनके बच्चों के नाम हैं, मनीष, अनिषा, आशीष और निधीश । अनिषा का विवाह शशांक जी केनी से हुआ है और वह वर्तमान में अमेरिका में सेटल है । बाक़ी सभी भाई अपने परिवार सहित मुंबई में हैं । 

 कुंदनलाल दादा के अन्य दो पुत्र उपेन्द्र और सुरेन्द्र है । सुरेन्द्र उर्फ़ मुन्ना कक्कू लगभग मेरी उम्र के ही हैं । उपेन्द्र काका भी छात्र जीवन में मेधावी रहे, उन्होंने बाद में  चिकित्सा विभाग में नौकरी ज्वाइन कर ली लेकिन अपने भाइयों व भाभियों के लाख समझाने के बावजूद उन्होंने विवाह नहीं किया । विवाह न करने हेतु उनके अपने तर्क हुआ करते थे । फिर मुन्ना कक्कू ने भी न विवाह न कहीं नौकरी की, लेकिन खेतीबाड़ी करते रहे । यह दोनों चाचा अभी भी अविवाहित ही हैं और उनका अपना जीवन दर्शन अटल है । 

कुंदनलाल जी की बेटियों में उस समय सिर्फ सरोज वहाँ थीं । बेटियों में कुसुम का विवाह वर्धा में सुग्रीवन से और ध्यान का विवाह जबलपुर में शम्भु रतन से हो चुका था । सरोज का विवाह बाद में बिलासपुर के कन्हैया लाल जी विश्वकर्मा से हुआ जिनसे उनकी संतानें हुई रीतेश, एकता और राहुल । ध्यान बुआ के बच्चों में राजू मेरा हमउम्र था और योगेश व स्वर्णा छोटे थे । कुसुम बुआ के सभी बच्चे आशीष,सुदीप,अनूप,संदीप,रेखा,जयवंती और रमा मुझसे बहुत छोटे थे । कुंदनलाल दादा जी की सबसे बड़ी बेटी ज्ञानवती का निधन बचपन में ही हो गया था । 

इन दिनों यह बात बहुत आश्चर्य जनक लगती है लेकिन हम लोगों को बताया गया था कि कुंदनलाल दादाजी की कुल मिलाकर उनकी चौदह संताने हुई थीं जिनमे से सात का उनकी शैशवावस्था में ही उनका निधन हो गया था इसलिए वे परिवार की क्रोनोलॉजी में शामिल ही नहीं हो पाई । 

शरद कोकास 

45.बैतूल के हमारे घर में पिछवाड़े सुनाई आते थे सिनेमा के डायलाग

बैतूल का मेरा जन्मगृह 

छत्तीसगढ़ के एक छोटे से जनपद बागबाहरा में रहने वाले युवा कवि रजत कृष्ण की एक कविता है 

छतीस जनों वाला /

हमारा घर/ 

नब्बे वर्षीय दादी की / 

साँसों से लेकर / 

डेढ़ वर्षीय बिटिया / ‘

ख़ुशी’ की आँखों में बसता / 

और खुश होता है / 

कि यहाँ आने जाने को / 

एक नहीं, दो नहीं /  

तीन नहीं / 

चार दरवाज़े हैं.. / 

और एक घर का एक छोर / 

एक रास्ते पर / 

तो दूसरा / 

दूसरे रास्ते पर खुलता है 

  बैतूल का हमारा घर भी कुछ ऐसा ही था । सामने का मुख्य दरवाज़ा इतवारी बाज़ार वाली सड़क पर खुलता था । एक दरवाज़ा बीच के आंगन से निकलने वाली गली से होता हुआ सामने वाली उसी सड़क पर निकलता था। वह गाय और बकरियों के आने जाने का रास्ता था हालाँकि मनुष्य भी उससे आना जाना कर सकते थे । 

एक दरवाज़ा  कुंदनलाल दादाजी की कोठरी से बाहर की ओर इसी सड़क पर निकलता था । इसी सड़क पर एक दरवाज़ा और था जो गाय के गोठे से आगे सुन्दरलाल दादा वाले हिस्से से बाहर की ओर फर्नीचर की दुकान में निकलता था और फिर वहाँ से बाहर उसी सड़क पर । इस तरह हमारे घर में सामने की ओर से इन चार दरवाज़ों से आया जाया सकता था । 


मकान के पीछे की ओर सिर्फ एक बड़ा दरवाज़ा था जो एक बड़े से आंगन में खुलता था । उसके बाद एक छोटी सी बाड़ी थी जिसमे मक्के या गन्ने की खेती होती थी । आंगन के एक सिरे पर चार शौचालय थे और उसके बाद था रघुबीर टाकीज़ का परिसर । सुरेश काका शौचालय को सुविधा कक्ष कहा करते थे । 

शौचालय वाला हिस्सा सिनेमा के परदे के पीछे वाले हिस्से से लगभग सटा हुआ ही था इसलिए वहाँ सिनेमा के संवाद साफ़ साफ़ सुनाई देते थे । शाम के समय इस सुविधा का लाभ लेने वाले भीतर जाने के बाद अक्सर भूल जाते थे कि वे किस काम से आये हैं । वह तो अच्छा था कि उन दिनों सुबह का शो नहीं हुआ करता था वर्ना दरवाज़ा पीट पीट कर लोगों को बाहर निकालना पड़ता । 

एक शौचालय में भीतर से साँकल नहीं थी, वह सुन्दरलाल दादाजी के लिए आरक्षित था । वे जितनी देर भीतर रहते थे, वहाँ से पहले जोर लगाने की ऊं..ऊं... की आवाज़ आती फिर फारिग होते ही राम राम राम राम ... की आवाज़ सुनाई देती । हम लोग जान जाते थे कि दादाजी का त्याग कार्यक्रम संपन्न हो चुका है  ।

हमारा परदादा विश्वेश्वर प्रसाद जी का यह परिवार अपने आप में एक बहुत बड़ा कुनबा था जिसमें  हर उम्र के सदस्य हुआ करते थे । गाय बांधने के दो गोठों, दो रसोईघर, चार चूल्हों, दो स्नानगृह और चार शौचालयों वाले इस मकान में मेरे दादा  बाबूलाल तथा दादी राजरानी उर्फ़ सुन्दरबाई के परिवार के अलावा दादाजी के चार छोटे भाइयों ब्रजलाल, कुंदनलाल, सुन्दरलाल और चंदनलाल का परिवार भी रहा करता था । 

बाबूलाल जी को चार पुत्र और चार पुत्रियों का आशीर्वाद मिला था । बेटों में सबसे बड़े मनमोहन उनसे छोटे मदनमोहन फिर मेरे पिता जगमोहन और सबसे छोटे श्याममोहन । फिर चार बेटियाँ विद्या,दया,पुष्पा और प्रकाश । बेटियों की शादी हो चुकी थी जो सपरिवार छुट्टियों में आया करती थीं । उनकी तरह बाबूजी की उपस्थिति भी बस छुट्टियों में ही दर्ज होती थी । 

बाबूलाल जी की सबसे बड़ी बेटी विद्यावती का विवाह नागपुर में शिवनाथ जी कोकास के साथ हुआ था । वे नागपुर के सुप्रसिद्ध अखबार ‘हितवाद’ में कार्यरत थे और धंतोली में अपने अन्य तीन भाइयों के साथ रहा करते थे।


उनकी वह स्ट्रीट ही ‘कोकास स्ट्रीट’ कहलाती थी । उन्ही के सरनेम से यह सरनेम हमारे परिवार में आया था । बाबूलाल जी और उनके भाइयों का कोई सरनेम नहीं था । बाबूलाल जी मुनि समाज के अध्यक्ष थे और पेशे से वैद्य थे इसलिए उनका नाम लिखा जाता था मुनि बाबूलाल जी वैद्य । वैसे भी उन दिनों नाम के साथ पिता का नाम और पेशा लगाना काफी होता था ।

 शिवनाथ फूफाजी और विद्या बुआ के बच्चों के नाम हैं जगदीश, श्यामा, रमा, सतीश यानि बच्चन भैया, निर्मल, प्रमिला, प्रदीप यानि कंचन भैया  और सबसे छोटे दीपक जो मुझसे भी छोटे हैं रमा जीजी का विवाह बरेली में भगवान दास जी से ,निर्मल जीजी का दिल्ली में त्रिभुवन जी से और प्रमिला जीजी का सागर में प्रहलाद जी शर्मा के साथ हुआ था । श्यामा जीजी का विवाह नागपुर में ही हीरालाल जी के साथ हुआ था । । जगदीश भैया श्यामा व रमा जीजी तो अब नहीं रहे ।

बाबूलाल जी की दूसरी और तीसरी बेटी दयावती और पुष्पावती का विवाह होशंगाबाद में बड़े भाई और छोटे भाई के नाम से प्रसिद्ध दो सगे भाइयों नन्द किशोर शर्मा और ब्रजकिशोर शर्मा से हुआ था । बड़े भाई पत्रकार थे और छोटे भाई का गेहूँ से भूसा अलग करने वाली मशीन अर्थात ‘उड़ावनी मशीन’ बनाने का कारखाना था । उनके बच्चोंके नाम हैं  संतोष, नीलम, पूनम, शबनम, रेशम । फिर आशुतोष, इन्दर,विकी, शैल और लवी भी हुए । बड़े फूफाजी के एक ही पुत्र है ललित । 

दया बुआ का निधन बेटे को जन्म देने के कुछ समय पश्चात ही हो गया था । बाबूलाल दादा जी की सबसे छोटी बेटी प्रकाशवती का विवाह नागपुर में रामदास जी शर्मा के साथ हुआ था जो इनकम टैक्स विभाग में कार्यरत थे और बाद में आगे चलकर इनकम टैक्स कमिश्नर बने । उनके बच्चों के नाम हैं राजेंद्र, रजनी और राकेश ।

बैतूल में उन दिनों मुझसे उम्र में बड़े मेरे दो भाई थे, मदन मोहन ताउजी के बेटे विजय उर्फ़ मुल्लू भैया और विनय यानि बिन्नू भैया । मधु जीजी भी मुझसे उम्र में बड़ी हैं । मनमोहन ताउजी के दो विवाह पूर्व में हो चुके थे लेकिन उन्हें भार्या सुख प्राप्त नहीं हुआ था अतः उनका तीसरा विवाह कामठी की हेमलता देवी से सन सत्तावन में हुआ । फिर उनकी संतानें हुईं भारती,मनोज, सुधीर,पवन और भावना । 

मदनमोहन ताउजी और बड़ी माँ यानि कमला देवी की अन्य संतानों के नाम थे संजय, संदीप और सूरज । श्याममोहन चाचा जी का विवाह जबलपुर में दुर्गा देवी से हुआ था और उनकी संतानों के नाम थे राकेश , अलका, अनीता और सन्देश । 

यह वह दौर था जब लोगों के सामाजिक जीवन में परिवार शब्द अपनी परिभाषा के बाहर भी उपस्थित था । परिवार नियोजन जैसा शब्द बमुश्किल उनके शब्दकोश में शामिल किया जा रहा था । आपसी प्रेम,भाईचारा, सौहार्द्र जैसे बहुत से अलिखित शब्द अपने आप घटित होते थे ।  बाबुलालजी अपने भाइयों में सबसे बड़े थे इसलिए उनकी संताने भी अपने चचेरे भाई बहनों में बड़ी थीं लेकिन अब उनकी पीढी में मौसम बदल रहा था और बसंत अपनी नई पीढ़ी में मेरे पिता की पीढ़ी में आ गया था ।  

शरद कोकास 

44. छुक छुक रेल में पांढुरना मुलताई आमला बैतूल

 की यात्रा करते हुए चलते हैं आपने बचपन के दिनों की ओर लेकिन उससे पहले बात करते हैं शरद बिल्लौरे  की 

 उन दिनों कवि,लेखकों,बुद्धिजीवियों की ख़ास पहचान हुआ करती थी खादी का कुरता, कन्धे पर झोला ,बढ़ी हुई दाढ़ी,बेतरतीब बाल और मुँह में सुलगती बीड़ी । 


हिन्दी के भूले बिसरे कवि शरद बिल्लौरे की पसंद थी तीस छाप बीड़ी जिसे वे कभी कभी विल्स थर्टी कहा करते थे । स्टूडेंट लाइफ में वैसे भी जेब में पैसे कहाँ होते थे लेकिन जब भी कुछ पैसे होते तो वे सिगरेट ख़रीद लेते । जाने कितनी कविताएँ उन्होंने सिगरेट पर लिखीं, कुछ गंभीर, कुछ व्यंग्य । दुबले पतले तो थे ही उस पर से बीड़ी सिगरेट । टी बी हुई और उससे लड़कर वे ठीक भी हो गये और सिगरेट छूट गई । टी बी की बीमारी के दिनों में उन्होंने एक कविता लिखी थी । 

वह टी.बी.का मरीज़ /

रात साढ़े ग्यारह बजे/

टी.बी. हॉस्पिटल के सामने से /

सिगरेट पीता गुजरता है /

सिगरेट रात भर उसके खोखले सीने में लगातार जलती है /

सुबह/

वह फिर सिगरेट पीता है/

खाँसता है/

गोली खाता है/ 

उसे यह सब /

 प्यार करने जैसा लगता है ।

शरद बिल्लौरे का गाँव रहटगांव मध्यप्रदेश के इटारसी शहर के निकट था । वे चाहते थे घर के आसपास रहना लेकिन उन्हें नौकरी मिली घर से बहुत दूर अरुणाचल प्रदेश में । घर की याद वे अक्सर किया करते जो शब्द बनकर उनकी कविताओं में उतर आती । 

हम दूर देश की यात्रा पर निकलते हैं/

घूमने नहीं/

नौकरी करने/

हम निकलते हैं /

पने शहर से बाहर /

और/ 

किसी की पूरी ज़िंदगी से बाहर निकल जाते हैं/ 

एकदम जीवित/ 

कल/ 

जब हमें अपने शहर में नौकरी मिल जायेगी/ 

हम लौटेंगे/ 

छुट्टियाँ बिताने नहीं/ 

शहर में हमेशा हमेशा को बस जाने के लिए/ 

तब/ क्या हम उस संसार में/ 

उतने ही जीवित लौट पाएंगे/ 

जहाँ से एक दिन हम/ 

दूर देश की यात्रा पर निकले थे/ 

नौकरी करने के लिए भी/ 

और अपने शहर/ 

हमेशा हमेशा को लौटने के लिए भी 

शरद बिल्लौरे लेकिन कभी अपने शहर नहीं लौट पाए । उनका घर इतनी दूर था कि गर्मी की छुट्टियों से पहले वे आ नहीं सकते थे । उस साल  गर्मी की छुट्टियों में जब वे अरुणाचल प्रदेश से अपने शहर लौट रहे थे रास्ते में उन्हें लू लग गई और उनके निधन हो गया । 

घर से दूर रहकर नौकरी करने वाले लोगों की यही त्रासदी है । बाबूजी भी घर से दूर नहीं जाना चाहते थे लेकिन रोजी रोटी की मज़बूरी उन्हें घर से दूर ले गई । वे बेसब्री से  गर्मी की  दो माह की छुट्टियों की राह देखा करते थे । उनका जन्मस्थल  बैतूल उन्हें आवाज़ देता था । 

छुट्टियाँ प्रारंभ होने से पूर्व ही हमारे यहाँ ‘घर की ओर प्रयाण’ नामक उत्सव प्रारंभ हो जाता था  । बाहर बिखरा सब सामान भीतर रखना होता था । आँगन से जुड़ी हुई छपरी थी जिसमे कोई दरवाज़ा नहीं था इसलिए वहाँ रखा हुआ सारा सामान भीतर के कमरे में रखने की मज़बूरी थी । सागौन की दोनों कुर्सियां, टेबल, स्टूल और दीवार पर लगी फ्रेम की हुई तस्वीरें सभी भीतर के कमरे में रखना होता था । बाबूजी यह काम बहुत धैर्य पूर्वक दो तीन दिनों में पूरा कर लेते  । 

यात्रा के दिन घर जाने का उत्साह सुबह से ही हम लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाता ,सामान पैक करवाता, ताले लगवाता । भंडारा से बैतूल के लिए कोई सीधी रेल नहीं थी ।


नागपुर से शाम छह बजे करीब नागपुर झाँसी पैसेंजर निकलती थी जो रात एक बजे करीब बैतूल पहुँचती थी । उसीसे हम लोग यात्रा करते थे । उसके लिए हम लोग दोपहर में बस से भंडारा से निकलते दो घंटे में नागपुर पहुँच जाते । स्टेशन के सामने ही बस रुकती थी । हम लोग ट्रेन की राह देखते हुए दरी बिछाकर प्लेटफ़ॉर्म पर बैठ जाते । मुझे टीन की पेटी पर बैठना अच्छा लगता था । इतने देर में बाबूजी टिकट खरीद लाते, वाटर बैग में पानी भर लाते । ट्रेन आने से पहले स्टेशन की चाय के आनंद से भी हम लोग सराबोर हो जाते ।

ट्रेन में उन दिनों थर्ड क्लास का डिब्बा हुआ करता था जिसे हम लोग गाँधी क्लास कहते थे । जैसे ही ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर लगती, बाबूजी दौड़कर भीतर जाते और गमछा बिछाकर जगह पर कब्ज़ा कर लेते । उन दिनों पैसेंजर ट्रेन में आरक्षण करने का यही तरीका था । उसके बाद हम लोग शान से भीतर प्रवेश करते । भक भक करते हुए कोयले के इंजन वाली ट्रेन धीरे धीरे रेंगते हुए नागपुर के प्लेटफ़ॉर्म से रवाना होती । आज हम लोग एक्सप्रेस ट्रेनों से यात्राये करते हैं इसलिए राह में आनेवाले पैसेंजर ट्रेनों के स्टेशन और उनके नाम हमें पता नहीं होते हैं, एक्सप्रेस गाड़ियाँ वहाँ ठहरती भी नहीं, लेकिन उन दिनों हमारी छुक छुक गाडी हर स्टेशन पर रुकती थी और हम उसका मज़ा लेते थे ।

सबस पहले आता था गोधनी, फिर कलमेश्वर,


जिसके बारे में मैं बहुत दिनों तक यह सोचता  रहा कि यह हिन्दी के कथाकार कमलेश्वर के नाम पर रहा होगा जो किसी की गलती से उल्टा लिखा गया होगा ।  

उसके बाद आता था मेटपांजरा और काटोल, फिर कलम्भा, तिनखेड़ा और नरखेड, फिर दरीमेटा, पांढुरना और तीगांव । 

तीगांव के बाद चढ़ाई प्रारंभ होती थी सो धक्का देने के लिए एक अतिरिक्त स्टीम इंजन रेल के पीछे भी लगता था । फिर चिचोंडा और मुलताई के बाद  जौलखेड़ा आता था । 

जौलखेड़ा हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले का गाँव है यहीं उनका जन्म हुआ था । 

उसके बाद आता आमला स्टेशन जो एयर फ़ोर्स के कारण प्रसिद्ध था, फिर एक छोटा सा स्टेशन  बरसाली और फिर बैतूल ।

रात के लगभग एक बजे यह ट्रेन बैतूल पहुँचती ।


बाहर तांगेवाले खड़े इंतजार करते हुए मिलते । बाबूजी हम लोगों को लेकर बाहर निकलते और तांगा करते । गर्मी के दिनों में भी बैतूल में रात में ठंडी हवाएं बहती थीं। “कहाँ जाओगे बाबूजी ?’ तांगेवाला पूछता ।

बाबूजी जवाब देते “इतवारी बाज़ार, बाबूलालजी वैद्य के यहाँ ।“ उसके बैठिये कहते ही हम लोग तांगे में बैठ जाते । उन दिनों सवारी द्वारा गंतव्य तक का किराया पूछने का चलन नहीं था न ही कोई तांगेवाला ‘बेलापुर का दो रुपया और रामगढ़ का डेढ़ रुपया’ की शैली में किराया बताता था । अगर कोई पूछता तो कहा जाता “जो देना हो दे देना बाबूजी।”

ठीक से बैठ जाने के बाद घोड़ा हम लोगों के और सामान के वज़न के साथ एडजस्ट करता हुआ दौड़ लगा देता । गंज से होकर कालापाठा के घने पेड़ों के बीच की कोलतार की निर्जन सड़क से गुजरते हुए रात के सुनसान में केवल घोड़े की टापों की टप टप की आवाज़ आती थी । 

बाबूजी का सम्वाद तांगे वाले से मौसम के हाल पूछने के साथ शुरू होता “ दिन में तो गर्मी होती होगी यहाँ ? “ तांगेवाला जवाब देता “ हाँ बाबूजी, अभी तक तो उतनी नहीं होती, लेकिन ऐसे ही अगर जंगल कटते रहे तो पता नहीं आगे क्या होगा । “ 

उसके बाद दीपचंद गोठी, गोवेर्धन खंडेलवाल,डागा जी आदि नेताओं के बारे में बात होती । कांग्रेस के गोठी जी ने बासठ में और जनसंघ के खंडेलवाल जी ने सडसठ में बैतूल से विधायक का चुनाव जीता था  । हर साल बाबूजी नेताओं को लेकर बात जरुर करते थे नेताओं के नाम ज़रूर बदल जाते थे । घर पहुँचने तक खेतीबाड़ी से लेकर रघुवीर टाकीज और ज्योति टाकीज में कौन कौन सी फिल्म लगी है यहाँ तक सारे समाचार जान लिए जाते । 

रात की उस नीरवता में तांगा जैसे ही घर के सामने नीम के पेड़ के नीचे तक पहुँचता घोड़े के पाँव थम जाते मानो उसे पता हो कि उसे यहीं रुकना है ।


दादी माँ तो जैसे बाट ही जोह रही होती थी कि उनका पोता आएगा बस तांगे की आहट सुनकर वे जाग जाती । बाहर खटिया पर सो रहे ताऊजी और ब्रजलाल दादा की भी आंख खुल जाती, बाबूजी माँ उनके पाँव छूते । रात दो बजे इससे आगे का दृश्य देखने लायक उर्जा मुझमे शेष नहीं होती थी सो मैं झट दादी माँ के बिस्तर में घुसता और सो जाता । दादी माँ कुछ देर बाद आती और मुझे अपने अंक में समेट लेती ।

मौसम के अनुसार बदलते  हुए दृश्यों के साथ सालों साल यह सिलसिला चलता रहा । गर्मी की और  दीवाली की छुट्टियाँ हम बच्चों के लिए वरदान बनकर आती रहीं । सभी चाचाओं और बुआओं के बच्चों के साथ प्रेम बढ़ता रहा । शादियों में अलग से आना होता ही था । बैतूल में बिताई यह छुट्टियाँ हम बच्चों के भीतर साल भर के लिए उर्जा, उत्साह और उमंग भर देती थीं । 

शरद कोकास 


2 जून 2026

43 A आइए देखते हैं कौन कौन से छाप की बीड़ियाँ बनती थी उन दिनों

 उस पर वैधानिक चेतावनी भी नहीं होती थी की बीडी पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है 


कितने तरह की बीड़ीयाँ होती थी , रंग बिरंगे उनके लेबल होते थे कैसे चिपकाए जाते थे 

मज़ा आएगा आपको जानने में 

आइए देखते हैं कौन कौन से छाप की बीड़ियाँ बनती थी उन दिनों

उन दिनों बीडी के नंबर भी हुआ करते थे यह रही 716 नंबर सितारा छाप बीडी 


महादेव शंकर अप्पा की घोड़ा छाप बीड़ी 

दमोह की जसवंत छाप स्पेशल टेलीफोन बीडी 
बेगुसराय बिहार की दुर्गा छाप बीडी 

गैरत गंज एम् पी  की मोर छाप बीडी 


43.एक बीड़ी रात भर सीने में सुलगती है


इस देश के पहले बीड़ी मजदूर आन्दोलन की कथा 

 वह उन्नीस सौ तीस के नवम्बर माह की नौ तारीख की एक सुबह थी । सारे बीड़ी कामगार अपने परिवारों सहित तिरोड़ा के इस कारखाने के द्वार पर इकठ्ठा होने लगे । इनमे अधिकांश महिलाएँ थीं जो अपनी गोद में दुधमुँहे शिशुओं को लेकर आईं थीं । 

उनकी बहुत साधारण सी मांगें थी कि हमें काम का उचित मुआवजा दिया जाए, हमारे द्वारा बनाई गई बीडियों को जानबूझकर रिजेक्ट न किया जाये, हमारे काम के घंटे तय किये जाएँ, हमारा मानसिक व शारीरिक शोषण समाप्त किया जाए तथा हमारे बच्चों के लिखने पढ़ने की उचित व्यवस्था की जाये । 

रोज सुबह बासी खाकर और चावल का पेज पीकर वे कारखाने के दरवाजे पर इकठ्ठा हो जाते थे ताकि नारे लगाने लायक ताकत उनमे पैदा हो जाये । बच्चों को वे घर पर नहीं छोड़ सकते थे इसलिए कि वे घर में रहकर भी क्या करते । आखिर मजदूर तो बच्चे भी थे । 

हाड़ कंपा देने वाली सर्दियों के दिन भी उन्होंने कारखाने के बाहर लगे पंडाल के नीचे गुजार दिए । वहीं वे चूल्हे जला लेते औ हँड़िया में भात पका लेते । सर्दियों में ठिठुरते हुए इन मजदूरों के पास आस के अलाव से आग लेने के सिवा कोई चारा नहीं था । 

कारखानेदारों के पास इतना पैसा था कि महीनों कारखाना बंद रहने के बाद भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था । उन्हें पता था कई तूतियां मिलकर भी उनके नक्कारखाने में बज रहे दमन के नगाड़े की आवाज़ को दबा नहीं सकतीं । सत्ता उनके साथ थी, व्यवस्था उनके साथ थी ।

हेमंत और शिशिर के बाद बसंत आकर भी चला गया और गर्मियां आ गईं । पंडाल के नीचे बैठे मजदूर अब कुछ नहीं कहते थे । उनकी खामोशी में उनकी विवशता थी । उनके पास का अनाज ख़त्म हो गया था,कपड़े फट चुके थे ,बर्तन भांडे तक गिरवी रखे जा चुके थे । अब उन्हें कोई उधार भी नहीं देता था । 

जब पेट में अन्न का दाना न हो तो चाहे कितना सुहावना मौसम हो,परिस्थितियाँ कितनी भी अनुकूल हों मुँह से आवाज़ नहीं निकलती है । हड्डियों का ढांचा बने यह मजदूर बेचारे क्या करते । वे इंसान थे और उन्हें जीने के लिए दो समय का खाना ज़रूरी था । 

आखिर भूखे बच्चों के गड्ढे बनते हुए पेट उनसे नहीं देखे गए और छह माह बाद उन्होंने अपनी हड़ताल वापस ले ली । 

कारखानेदारों और उनके द्वारा पोषित लोगों के चेहरों पर क्रूरता की परत और घनी हो गई । अर्थसत्ता और राजसत्ता के ऊँचे ऊँचे मंचो पर मानो कोई नाटक चल रहा था जिसमे क्रूर तानाशाह के अट्टहास गूँज रहे थे । मेसोपोटामिया के हम्मुराबी द्वारा प्रजा को डराने के लिए की जाने वाली मुनादियों से लेकर रोम, फ़्रांस अमेरिका, रूस के खेतों, कारखानों में किसी दौर में सुनाई देने वाली चेतावनियाँ यहाँ भी सुनाई दे रही थीं   ..

” सुनो मजदूरों ध्यान से सुनो .. जब तुम लोग घर बैठे भूखों मर रहे थे, हमने तुम्हे काम दिया, वह भी इतना आसान काम जिसके लिए न धूप में पसीना बहाना है ना हाड़ तोड़ मेहनत करना है उसके बाद भी तुम्हे नखरे आते हैं ? ध्यान रखो ग़रीबी और भुखमरी से हमारे सिवा तुम्हे कोई नहीं बचा सकता, हम ही हैं जो तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं , हम ही तुम्हारे मालिक हैं , हम ही तुम्हारे ईश्वर हैं , हमारी शरण में आने के अलावा तुम्हारे पास और कोई चारा नहीं है ।

मजदूरों की आस टूट गई थी । वे जानते थे मालिकों द्वारा कही गई एक एक बात सच है । इस काम के अलावा उनके पास और कोई काम नहीं है, न कहीं उन्हें काम मिलने वाला है । उन्होंने काम पर वापस आने का निर्णय कर लिया । लेकिन मालिक लोग इतनी सी बात पर खुश होने वाले नहीं थे एक नया फरमान जारी हुआ 

“ छह माह तक तुमने काम न करके हमारा नुकसान किया है, इसकी सज़ा मिलेगी, बराबर मिलेगी ।“ और ठीक अगले ही दिन से बीड़ी कामगारों की मजदूरी चार आने प्रति हज़ार की जगह दो आने प्रति हज़ार कर दी गई । 

कहाँ कुछ बदला है ? आज भी इसी तरह हमारे ईश्वर बने कुछ लोग हमें बरगला रहे हैं, हम उनके लिए रात दिन मेहनत कर रहे हैं, उन्हें मुनाफ़ा कमा कर दे रहे हैं और वे हमें मेहनत और मेहनताने का गणित समझा रहे हैं । हम इतने नासमझ भी नहीं कि यह न समझ सकें कि हम जितनी मेहनत करते हैं उतना  मेहनताना हमें आज भी नहीं मिलता है । अगर सही सही मेहनताना मिलता तो आज हम झोपड़ियों में नहीं रहते बल्कि सेठों की तरह हमारे पास भी महल होते । “ 

छह माह तक हड़ताल करने,सब कुछ गँवाने के बाद भी हल निकलना तो दूर उलटे उनकी मजदूरी भी आधी कर दी गई । अँधेरा तो पहले ही छाया हुआ था इन की बस्तियों में, यह अँधेरा और गहरा  गया । लेकिन जो चिंगारी उन्होंने जलाई थी वह व्यर्थ नहीं गई । 

उनकी आवाज़ भंडारा ज़िले के बीड़ी कामगारों के अलावा कामठी, नागपुर के मजदूरों तक पहुँच चुकी थी । सुख सबके भले अलग अलग हों लेकिन दुःख एक होते हैं । अलग अलग जगहों पर रहने के कारण भले वे एक साथ नहीं रह सकते थे लेकिन दुःख एक थे और वे अपने जैसे दुखों के साथ मिलकर अपना संगठन बना रहे थे ।

उन दिनों कामठी के बाबू लक्ष्मण नगरारे हरदास सेन्ट्रल प्रोविंस एंड बेरार असेम्बली के विधायक थे । 

बाबू एल एन हरदास स्वयं इसी पृष्ठभूमि से आये थे इसलिए बीड़ी कामगारों का दुःख जानते थे । तिरोडा के बीड़ी कामगारों की हड़ताल के वे प्रत्यक्ष गवाह थे । उन्होंने इस आन्दोलन में शामिल लोगों की मीटिंग लेना प्रारम्भ की । फिर उनके नेतृत्व में कामठी और आसपास के क्षेत्रों के बीड़ी कामगार एकत्र होना शुरू हुए और उन्नीस सौ इकतीस की पहली जनवरी को उनके द्वारा एक संगठन की स्थापना की गई । इस संगठन का नाम था ‘

मध्यप्रांत बीड़ी कामगार संगठन’ । 

यह एक ऐसी चिंगारी थी जो लगातार बढ़ती जा रही थी । बीड़ी कामगार अपने हक़ ले लिए लड़ रहे थे, जेल जा रहे थे । यह लड़ाई आगे के अनेक दशकों तक चलती रही । मेरे बचपन के मित्र भगवान रहाटे बताते हैं कि साठ के दशक में जब बीड़ी कामगारों को आन्दोलन के दौरान गिरफ्तार कर जेल ले जाया जाता था बहुत सी माताओं के साथ उनके बच्चे भी जेल चले जाते थे । उन्हें भी इसी तरह अपनी माँ के साथ बचपन में ही जेल जाने का अवसर मिला था । 

हालाँकि एक दिन में ही उन मजदूरों  छोड़ दिया जाता था । 

आग की लपटों को कैद करके रखना वैसे भी मुश्किल काम था । 

लोगों में चेतना जागृत हो रही थी बाबासाहेब का घोषवाक्य ‘शिक्षित हो संगठित हो और संघर्ष करो’ हवाओं में गूँज रहा था । बीड़ी कामगारों के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर नाम कमा रहे थे । लेकिन अभी भी एक बहुत बड़ा तबका था जिनके लिए आजीविका का साधन बीड़ी बनाना ही था ।

इसके आगे की कथा बहुत संक्षेप में है । 

आगे चलकर महाराष्ट्र की रिपब्लिकन पार्टी के प्रसिद्ध नेता राज्यसभा सदस्य एडवोकेट ना. ह. कुंभारे के प्रयासों से महाराष्ट्र सरकार द्वारा बीड़ी मजदूर कानून बनाया गया । यह पिछले दौर में बने, न्यूनतम मजदूरी एक्ट, औद्योगिक विवाद कानून,बाम्बे इंडस्ट्रियल एक्ट के तारतम्य में ही था। इस कानून ने बीड़ी मजदूरों को अनेक अधिकार दिए । कारखानेदारों द्वारा अब उन्हें न्यूनतम मजदूरी देना अनिवार्य कर दिया गया था । उनके लिए एक कल्याण फंड की स्थापना भी की गई । इस फंड में उन्हें दिए जा रहे पारिश्रमिक से ही पैसा काटकर जमा किया जाता था । यद्यपि सरकार को उसका हिसाब देते समय कुछ गोलमाल भी होता था । लेकिन कुल मिलाकर मजदूरों के बेहतर दिन आने लगे थे ।

लेकिन पूंजीवाद कभी हार नहीं मानता है । 

मजदूरों को फांसने के लिए उसके पास नए नए जाल होते हैं । ऐसा कहते हैं कि एक समय जब पचास के दशक में भंडारा ज़िले में लौह अयस्क की उपलब्धता को देखते हुए नेहरु द्वारा सोवियत संघ के सहयोग से स्टील प्लांट के स्थापना की बात चल रही थी यहाँ के कतिपय बीड़ी कारखानेदारों ने उसके लिए मना कर दिया । 

उन्हें डर था कि उनके सारे मजदूर अच्छे मेहनताने के लालच में  स्टील प्लांट में चले जायेंगे और उनके बीड़ी कारखाने बंद हो जायेंगे, इसलिए वह प्रस्ताव रद्द हो गया । खैर जो भी हुआ हो बाद में भंडारा से दो सौ किलोमीटर पूर्व में भिलाई में उसकी स्थापना हुई । 

लेकिन मुनाफे का खेल बहुत ख़तरनाक होता है । मजदूरों के शिक्षित और संगठित हो जाने तथा महाराष्ट्र सरकार द्वारा बीड़ी कामगार एक्ट बना दिए जाने के कारण इन कारखानेदारों को अब उतना मुनाफ़ा नहीं हो रहा था जितना कि पहले हुआ करता था । ज़माना बदल गया था, राज्य सरकार के अलावा केंद्र सरकार में भी उन्ही के बीच से ऐसे अनेक लोग  पहुँच चुके थे जो मजदूरों के हिमायती थे । इसलिए पूँजीवाद अब शोषण के नए रास्ते तलाश करने लगा । 

सन सत्तर के बाद धीरे धीरे यह बीड़ी कारखाने बंद होने लगे । लेकिन वस्तुतः यह कारखाने बंद नहीं हो रहे थे बल्कि महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश शिफ्ट किये जा रहे थे । बीड़ी उद्योग के लिए बाज़ार तलाशने की ज़रूरत नहीं थी वह तो पूरे देश में बन ही चुका था, हर उद्योग की तरह अब उसे भी सस्ते मजदूरों की जरुरत थी । वैसे भी जागरूक जनता के बीच अब उनकी दाल नहीं गलने वाली थी इसलिए वे उन क्षेत्रों की खोज में लग गए जहाँ के लोगों को गुलाम बनाये जाने की सम्भावना अधिक थी । 


आज भंडारा की गलियों से गुजरते हुए तम्बाखू और तेंदू पत्ते की वह कुंवारी महक नहीं आती कोई सुभद्रा बाई ,जानकी बाई और यसोदा अपनी गोद में तम्बाकू की ट्रे यानि पत्तर लिए बैठी नहीं दिखाई देती । अब यह दृश्य , बुंदेलखंड, बंगाल, आँध्रप्रदेश में देखने को मिलते हैं । 

देश में ग़रीबी इतनी है कि कारखानेदारों को कामगार तो कहीं भी मिल जायेंगे लेकिन यह तय है  कि भंडारा के बीड़ी कामगारों जैसे मेहनतकश और कुशल कामगार उन्हें कहीं नहीं मिलने वाले । 

यह वे लोग थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी बीड़ी के धुएँ में होम कर दी, जिनके बच्चों  का भविष्य ज़हरीली तम्बाकू के साथ बीड़ी के पत्तों में लपेट दिया गया, जिन्होंने अपनी इच्छाओं और सपनो को विवशता की लोहे की पट्टी से कोंच कोंच कर अपने मन के भीतर ही रख दिया और बाहर नहीं आने दिया, ज़िन्दगी की काली अंधेरी रात में  इच्छाओं की एक बीड़ी रात भर उनके सीने में सुलगती रही और अपने हक़ की हवा न मिलने के कारण अंत तक पहुँचने से पहले ही बुझ गई । 


सलाम ऐसे बीड़ी कामगारों को जिन्होंने अपनी कई पीढियां सिर्फ इसलिए कुर्बान कर दीं कि उनकी झोपड़ियों में जलती मिट्टी की तेल की ढिबरियां भले बुझ जाएँ लेकिन उनके मालिकों के महलों झाड़ फानूस सदा जगमगाते रहें । 


24 मई 2026

42.जैसे कसाई जानवर को टटोलकर उसके भीतर का मांस देखता है


पिछले एपिसोड मे आपने पढ़ा कि बीड़ी किस तरह से बनाई जाती है , कैसे सामान का वितरण होता है और उसके बाद फिर एक व्यक्ति घर घर पहुंचता है बीड़ी के बंडल इकट्ठा करने के लिए । 

यहाँ से प्रारंभ होती है बीड़ी कामगार के शोषण की अनकही गाथा । 

बीड़ी के बण्डल जमा करने वाला दीवान या मुनीम नामक व्यक्ति मजदूर से सीधे सीधे बण्डल नहीं लेता था पहले वह जाँच करता था कि बीड़ी ठीक से बने गई है या नहीं इस प्रक्रिया को छंटनी कहते थे । वह हर बण्डल की बीड़ियाँ गिनकर उसे खोलता फिर यह देखने के लिए कि बीड़ी में तम्बाकू निर्धारित मात्र में भरा गया है या नहीं, 

वह हर बीड़ी को उसी तरह टटोलकर देखता है जैसे कसाई जानवर को टटोलकर उसके भीतर का मांस देखता है । 

फिर वह उंगली से बीड़ी की लम्बाई नापता कि वह स्टैण्डर्ड साइज़ से छोटी या बड़ी तो नहीं बनी है । यह भी देखना होता था कि धागा ठीक से लपेटा गया है या नहीं, या बीड़ी का मुँह ठीक से बंद है या नहीं । छंटाई करने वाला यह व्यक्ति इन मापदंडों पर खरी न उतरने वाली बीड़ीयों को बेरहमी से एक ओर फेंकता जाता था । 

मजदूर फेंकी हुई उन बीड़ियों की ओर इस तरह देखते जैसे सरकारी कारिंदे द्वारा उनकी झोपडी से सामान निकालकर फेंका जा रहा हो । हर बीड़ी के साथ उनके मेहनत, उनकी खुशी और मेहनत से कमाई उनके बच्चों की रोटी भी घूरे के ढेर पर फेंक दी जाती । 

देखने में यह क्वालिटी कंट्रोल की एक सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया लगती है लेकिन इसमें कई पेंच हैं। इन दरोगाओं के पास शोषण के अलिखित कानून थे । इन्हीमे एक व्यक्ति वह होता जो दी गई तम्बाकू और बनाई गई बीड़ी के अनुपात को परखता था और मजदूर पर इलज़ाम लगा देता कि तुम्हे तो इतनी तम्बाकू दी गई थी फिर इतनी कम बीड़ियाँ कैसे बनी ? 

मजदूर के पास कोई जवाब नहीं होता था । वह तो ठीक से देखकर, तुलवाकर तम्बाकू और पत्ते ले गया था फिर कम कैसे पड़ गया ? हालाँकि बाद में उसे यह बात समझ में आने लगी  कि कहीं कुछ गड़बड़ हुई है । ज़ाहिर है एक हज़ार बीड़ी के लिए लगने वाला आठ सौ ग्राम तेंदू पत्ता और साढ़े तीन सौ ग्राम तम्बाकू वितरण करने वाले द्वारा उसे ठीक से तौलकर नहीं दिया गया था ।  

मजदूर को दी जानेवाली तम्बाकू को कम तौलकर अपना फायदे के लिए चोरी करने वाला  यह व्यक्ति इस सत्य को जानता था कि ऊपर से कोई भगवान उसकी यह बदमाशी नहीं देख रहा है इसलिए वह धड़ल्ले से चोरी करता था लेकिन मारा जाता था ग़रीब मजदूर । 

बीच का यह व्यक्ति कई बार उन्ही के बीच का व्यक्ति होता था लेकिन हम जानते हैं कि लोभ,लालच और परपीड़क प्रवृत्ति कुछ लोगों में होती ही है, वे लाभ के लिए अपने पराये जैसी धारणा में विश्वास नहीं करते । तत्कालीन अंग्रेज़ शासक राज करने के लिए मनुष्य के इस स्वभाव का कैसा उपयोग कर रहे थे  सब बेहतर जानते हैं ।

मेहनतकश बीड़ी कामगार ग़रीब अवश्य थे लेकिन वे बेइमान नहीं थे । वे अभावग्रस्त अवश्य थे लेकिन चोर नहीं थे । वे इतने अनुभवी थे कि जानते थे, तम्बाकू की कितनी मात्रा में कितनी बीड़ियाँ बनती हैं । लेकिन सब जानते बूझते भी वे कुछ नहीं कर सकते थे । कभी कभी वे कम मात्रा में दी गई तम्बाकू में ही तय संख्या में बीड़ियाँ बनाने का प्रयास करते परिणाम स्वरूप हर बीड़ी में तम्बाकू की मात्रा कुछ कम हो जाती । इस अपराध में उनकी बनाई हुई तमाम बीड़ियाँ न केवल रिजेक्ट कर दी जातीं बल्कि तम्बाकू और पत्ते के नुकसान का पैसा भी उनकी मजदूरी से काट  लिया जाता । 

जबकि वे अच्छी तरह जानते थे कि इतने मामूली नुक्स के लिए इतनी बीड़ियाँ रिजेक्ट नहीं की जा सकतीं । 

वे जानते थे कि उनकी ज़रा सी नज़र चूकते ही मामूली नुक्स वाली बीडियों के साथ सही सही बीड़ियाँ भी अलग कर दी गई हैं । वे यह भी जानते थे कि उनके चले जाने के बाद अलग की गई अधिकांश  बीड़ियाँ बण्डल में बाँध कर भट्टी में पकाने के लिए भेज दी जायेंगी और कागज़ के खूबसूरत पैकेटों में लपेटकर  उन्हें बाज़ारों में भेज दिया जायेगा । बस उन पर उनके हाथों का श्रम दर्ज नहीं होगा और इसलिए उनका मेहनताना भी उन्हें नहीं मिलेगा । यह सारा अधिशेष मूल्य उन दारोगाओं की अतिरिक्त कमाई अथवा उनके मालिकों के मुनाफ़े में शामिल हो जायेगा ।

मजदूरी के भुगतान वाली खिड़की से अपनी मजदूरी का भुगतान लेते हुए रुख्मनी बाई फटे आंचल से अपना सर ढंकती है, लक्ष्मी आने वाली है ना घर में । 

वह जानती है कि रोज़ खाना पकाने, घर की साफ़ सफाई करने, बच्चों की और बुजुर्गों की देखभाल करने जैसे ढेरों कामों के साथ साथ इतनी  मेहनत से बनाई गई हज़ार बीडियों में से चार सौ से अधिक बीड़ियाँ रिजेक्ट कर दी गईं हैं । उसे पता है कि अपनी रातों की नींदें कुर्बान कर देने के बाद बनाई गई इन हज़ार बीड़ियों पर जो चार आने मेहनताना उसे मिलना था वह अब केवल ढाई आना ही मिलेगा । उसे यह भी पता है कि ढाई आने में इतना चावल बिलकुल नहीं आएगा जिससे वह अपने बच्चों का पेट भर सके ।

बरसों बरस यह सिलसिला चलता रहा, मजदूर ग़रीब से और ज़्यादा ग़रीब होते गए । वहीं कारखानों के मालिक और उनके कारिंदे संपन्न हो रहे थे । 

एक स्वाभाविक सा प्रश्न मन में उठता है , तो क्या रुख्मनी बाई को और उसके जैसी तमाम महिलाओं को अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध कभी विद्रोह करने का ख्याल नहीं आया ? ऐसा हुआ, लेकिन उसके लिए समय लगा । इसे जानने के लिए हमें भंडारा, नागपुर और आसपास के क्षेत्रों के बीड़ी उद्योग की पृष्ठभूमि को संक्षेप में समझना होगा ।  अब यह कारखानेदार द्वारा मजदूरों को काम देकर उन पर अहसान करने जैसी कोई बात नहीं रह गई थी । देश धीरे धीरे आज़ाद होने की ओर बढ़ रहा था और जन मानस भी । गाँधी, नेहरू, डॉ.आंबेडकर जैसे लोग देशवासियों की गरिमा और उनके उत्थान के लिए प्रयत्नशील थे । 

भंडारा ज़िले में बीड़ी निर्माण की शुरुआत बहुत मामूली स्तर पर सन उन्नीस सौ बीस के आसपास हुई थी । भंडारा वन सम्पदा से समृद्ध था और जंगल तेंदू के वृक्षों से भरे पड़े थे । तेंदू पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने के लिए हो सकता है यह हिकमत आदिम जनजातियों को ज्ञात थी । 

अमेरिका की कुछ जनजातियाँ भी तम्बाकू को पत्ते में लपेटकर पीने की कला जानती थीं । इंग्लैण्ड में यह तम्बाकू सिगरेट के रूप में कागज़ में लपेटा जाता था अथवा पाइप के माध्यम से पिया जाता था । सिगार भी तम्बाकू के सूखे या किण्वित पत्ते को ही कसकर लपेटकर बनाया जाता था । 

तेंदू पत्ते में तम्बाकू लपेटकर पीने का यह हुनर देखने के बाद, भारत में तेंदू पत्ते व तम्बाकू की उपलब्धता के आधार पर अंग्रेज़ों द्वारा इस उद्योग में मामूली रूचि ली गई । तम्बाकू व बीड़ी का उत्पादन उनके लिए भी मुनाफ़े की चीज़ था लेकिन उससे ज़्यादा मुनाफ़े के कम उनके पास पहले से थे इसलिए भंडारा ज़िले में सदी के प्रारंभ में गुजरात से आये अधिकांश व्यवसाइयों ने यह व्यवसाय संभाला । 

बीड़ी बनने की यह प्रक्रिया तेंदू पत्ते की तुड़ाई से प्रारंभ होती है । 

जंगल के आदिवासी हरे  तेंदू पत्ते तोड़ते थे, उन्हें सुखाते थे और बीड़ी बनवाने वाले ठेकेदारों को बेच देते थे । अप्रेल माह से तेंदू पत्ता तोड़ने का यह कार्य प्रारंभ हो जाता जो सारी गर्मियों तक चलता । गर्मी के दिनों में यह काम बहुत तेज़ी से होता था इसलिए कि धूप में तेंदू पत्ता जल्दी सूखता है  । बाद में जंगल ठेके से दिए जाने लगे और आदिवासियों को तेंदू पत्ता तोड़ने के बदले मजदूरी का भुगतान किया जाने लगा । 

आदिवासी अब उन जंगलों के मालिक नहीं थे । 

धीरे धीरे यह एक उद्योग का रूप लेता गया । उस समय तक अन्य उद्योगों में भी मशीनों का अविर्भाव नहीं हुआ था । तेंदू पत्ता तोड़ने से लेकर बीड़ी बनाने तक यह काम मनुष्य ही कर सकते थे और इसके लिए बहुत सस्ती मजदूरी पर लोग उपलब्ध थे । 

भंडारा ज़िले में अधिकांश अनुसूचित जाति के बीड़ी कामगारों द्वारा बीड़ी बनाना शुरू किया गया । अनुसूचित जातियों के अंतर्गत भी अनेक जातियां और उपजातियां आती थीं जिनके सदियों से चले आ रहे उनके अपने घरेलू उद्योग और व्यवसाय थे जिनमे चर्मोद्योग, वाद्ययंत्र निर्माण एवं वादन और मांस का उत्पादन तथा व्यवसाय प्रमुख था, यद्यपि इनकी संख्या बहुत कम होती थी लेकिन गाँव की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त होती थी ।

ग्रामीण क्षेत्रों में एक वृहत समाज ऐसा भी था जिनके पास छोटी मोटी कास्तकारी या कृषि कार्य  जैसा भी कोई काम नहीं था । वे ज़मींदारों अथवा सवर्णों के यहाँ बेगारी करते, उनके खेतों में मजदूरी करते और उसके बदले जो कुछ भी उन्हें मिल जाता स्वीकार कर लेते । यहाँ न केवल उनके श्रम का शोषण होता था अपितु जाति के नाम पर भी उनके साथ पशुवत व्यवहार भी होता था । ऐसे लोगों के लिए बीड़ी उद्योग का खुलना एक राहत थी । सबसे पहले स्थानीय स्तर पर बीड़ी बनाने का काम इन्ही लोगों द्वारा प्रारंभ किया गया ।

इसी बीच भंडारा और आसपास के क्षेत्रों यथा कामठी, तिरोडा,तुमसर, आमगाँव, सालेकसा, गोंदिया आदि स्थानों पर बीड़ी कारखाने खुलने लगे । मालिकों को मजदूरी की सस्ती दर पर कामगार चाहिए थे और इन बेरोजगारों को काम । ऐसे समय बीड़ी बनाने का काम इन असहाय लोगों के जीवन में एक वरदान की तरह उपस्थित हुआ । 

इस कार्य में विशेष बात यह थी कि न केवल पुरुष या महिलाएँ बल्कि थोड़े से प्रयास से घर के बच्चे भी बीड़ी बनाने का काम कर सकते थे । 

इस तरह थोड़ी ही सही घर चलाने लायक आमदनी तो हो ही जाती थी । बीड़ी कारखानेदारों  द्वारा उन्हें रोजगार देकर इस स्थिति से उबारा गया यह अच्छी बात थी लेकिन आगे चलकर उनकी यही विवशता उनके शोषण का मुख्य कारण बन गई । वे इतने मजबूर थे कि काम बंद करने या काम छोड़ देने की धमकी भी नहीं दे सकते थे । बीड़ी कारखाने वालों का अत्याचार इतना बढ़ गया कि वे उनकी पूरी की पूरी बीड़ियाँ रिजेक्ट कर देते थे और कई बार अपनी दिन भर की मेहनत ठेकेदारों या मालिकों को सौंप  देने के बाद भी उन्हें कारखाने से खाली हाथ लौटना पड़ जाता था । 

जुर्माने के बदले उन्हें अगली बार मुफ़्त में काम करके देना होता था ।

फिर केवल आर्थिक शोषण होता तो बात और थी । इन बीड़ी कामगारों, स्त्रियों और बच्चों से यह कारखानेदार,ठेकेदार अपनी हवेलियों में बेगार भी करवाते थे । उन्हें ज़रा सी ग़लती के लिए पीटा जाता था , भोजन की व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी होती थी, अगर उन्हें भोजन दिया भी जाता तो केवल इतना ही कि वे जीवित रह सकें । वे अपने बच्चों के पढ़ने लिखने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे । जिन नन्हे हाथों में अभी  ढंग से भात का कौर पकड़ने की क़ाबलियत नहीं थी उनमे जबरन बीड़ी के पत्ते और तम्बाकू थमा दिया जाता था । 

कारखानों के भीतर बसे बागीचों के सूनेपन में देर रात तक बहने वाली गर्म हवायें किसी मासूम के मुँह  से निकली बेबस चीखों की गवाह बन जाती थीं लेकिन वे खुद खामोश होती थीं । इंसान के मुखौटे में कौनसा दरिंदा कहाँ विचरण कर रहा है कुछ पता नहीं चलता था ।  

हल्का सा विरोध करने वाले का पता ही नहीं चलता था कि वह कहाँ गया । कारखानेदारों की शह पाकर उनके यहाँ उच्च पदों पर काम करने वाले उनके मुलाजिम इस काम में पीछे नहीं थे । 

भविष्य की हिंदी फिल्मों में आनेवाले ‘मजदूरी के पैसे लेने के लिए लाइन में खड़ी युवा मजदूर स्त्री को मजदूरी का भुगतान करते समय वासना भरी निगाहों से चश्मे के ऊपर से घूरता हुआ मुनीम’ जैसे दृश्य का आधार यहाँ तैयार हो रहा था । 

लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब पानी सर से ऊपर हो गया । 

दमन की चक्की जो इन विवश इंसानों की पीस रही थी उसके पाटों को इन ग़रीब कामगारों के मजबूत हाथों ने रोक दिया । उनमे इतनी चेतना आ गई थी कि वे अपने शोषण को जान रहे थे । 

अब्राहम लिंकन ने कहा है कि गुलाम को उसकी गुलामी का अहसास दिला दो तो वह बाग़ी हो जाता है । स्पार्टकस हर युग में हर कौम में जन्म लेते हैं । 

लगभग दस पंद्रह साल तक अपनी पीठ पर अत्याचार के कोड़ों की मार झेलने के पश्चात आखिर सन उन्नीस सौ तीस में बीड़ी कामगारों ने विद्रोह का बिगुल फूंका और प्रथम बीड़ी कामगार आन्दोलन की शुरुआत हुई । इस विद्रोह की शुरुआत करने का श्रेय भंडारा के निकट तिरोडा नामक स्थान के गोरेगाँव के बीड़ी कामगारों को दिया जाता है । यहाँ मूलजी भाई का बीड़ी कारखाना था । 

यह मूलजी भाई वही थे जो उन्नीस सौ बावन के भंडारा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से चुनाव जीतने वाले चतुर्भुज जसानी के साथी थे । जसानी इसी बीड़ी कंपनी में भागीदार थे और कंपनी की बीड़ियों की भारतीय सेना में आपूर्ति के कारण भारी मुनाफ़ा कमा रहे थे । 

भंडारा के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं कि इसी आधार पर उनकी शिकायत की गई थी और कोर्ट ने वह चुनाव रद्द कर दिया था जिसकी वज़ह से भंडारा में उन्नीस सौ चौवन में उपचुनाव करवाने की नौबत आई थी । यह वही चुनाव था जिसमे बाबासाहेब कांग्रेस के प्रत्याशी से हार गए थे । बीड़ी कारखानेदारों उनके चाटुकारों और राजनीतिज्ञों के गठबंधन का इतिहास भंडारा ज़िले में बहुत पुराना है । लेकिन उससे भी अधिक पुराना इतिहास विश्व में मनुष्य के शोषण और उसके प्रतिकार का है । 

शरद कोकास 

22 मई 2026

41.मुक्तिबोध जिनकी बनाई हुई बीड़ी पीते थे

रात का गहन अन्धकार, सूनी बावड़ी, खोह से झाँकता ब्रह्मराक्षस का भय, तालाब के किनारे खड़े पीपल और बरगद के आदिम वृक्षों की डालियों से टकराकर सांय सांय करती हवाएँ, निस्तब्धता में सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट,  पुराने महल के परकोटे के द्वार के ऊपर बने निवास में एक चक्करदार सीढ़ी, माचिस की तीली जलने की फिस्स सी आवाज़, सुलगती हुई बीड़ी और बीड़ी के सिरे पर दहकता हुआ अंगारा, धुंध के साथ एकाकार होता हुआ बीड़ी का गाढ़ा धुआं । 

यह कोई स्वप्न दृश्य नहीं है । हिन्दी कविता के हमारे सुधी पाठक प्रारंभ की आधी पंक्ति से ही जान गए होंगे कि इन पंक्तियों में हिंदी के हमारे पुरखे कवि मुक्तिबोध की स्मृति है ।

मुक्तिबोध का एक प्रसिद्ध चित्र है जिसमे वे बीड़ी सुलगा रहे हैं । भीतर धँसे हुए गालों की गहराई में उभरते उनके होठों के बीच एक बीड़ी है जिसे उन्होंने बाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच पकड़ रखा है । दायें हाथ में माचिस की जलती हुई एक तीली है जिसकी लौ बीड़ी की नोक से स्पर्श कर रही है । उनकी पलकें नीचे की ओर झुकी हैं और वे उस लौ में मनुष्य द्वारा पहली बार चकमक पत्थर से जलाई गई आग का अक्स देख रहे हैं । 

कला एवं साहित्य के मित्रों को यह चित्र कुछ रूमानियत से भरा हुआ लग सकता है लेकिन जब भी मैं बीड़ी पीते हुए मुक्तिबोध के इस चित्र को देखता हूँ तो मुझे बचपन के दिनों में भंडारा के अपने पड़ोस के घर में रहने वाले बुध्या की माँ और दादी की याद आ जाती है, याद आती हैं कंदील की मद्धम रौशनी में  बीड़ी बनाते हुए झुकी हुई उनकी पीठ और तेंदू पत्ते व तम्बाकू से भरी ट्रे में गुम हो चुकी उनकी ऑंखें । मोहल्ले की अनेक महिलाओं की तरह पांडुरंग ठाकरे के घर में उनकी पत्नी और माँ बीड़ी बनाया करती थीं । मैं अक्सर उनके पास बैठकर उनका बीड़ी बनाना देखा करता था । 

वे टीन से बनी एक ट्रे में तम्बाकू, धागा और पत्तों को रखतीं । इस तरह की चौकोर या सूप के आकार की ट्रे महाराष्ट्र में ‘पत्तर’ कहलाती है । पत्तर सज जाने के बाद वे फिर पत्तों को पान काटने वाली एक कैंची से सिगरेट के पैकेट से कुछ छोटे आकार में काटतीं, एक ओर थोड़ा अधिक चौड़ा व दूसरी ओर उससे कुछ कम । फिर बीड़ी के एक बण्डल लायक पत्ते गिनकर उनकी गड्डी बनातीं । यह पत्ते नर्म रहें इसलिए जूट की बोरी के एक टुकड़े जिसे ‘फारी’ कहते थे उसे गीला कर उसमे पत्ते लपेटकर रखतीं । 

बीड़ी बनाने की शुरुआत करते हुए सर्वप्रथम वे उस गड्डी से एक आयताकार पत्ता लेकर उसपर बीच में थोड़ी सी तम्बाकू भरतीं और एक कोने से सामने के विकर्ण कोने तक तिरछे चलते हुए,तम्बाकू को थोड़ा थोड़ा सिरों की ओर फैलाते हुए  उँगलियों के एक निश्चित दबाव के साथ उसे गोल गोल लपेट देतीं । तम्बाकू भरकर पत्ते को लपेटते हुए इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी होता था कि बीड़ी का जो सिरा होठों के भीतर होता है उसे थोड़ा सा दबाकर चपटा कर दिया जाए । फिर उसे धागे से बांधना भी ज़रूरी होता है ताकि वह खुल न जाये । फिर लोहे की तीन इंच लम्बी आधा इंच चौड़ी पतली सी एक आयताकार पट्टी की नोक से बीड़ी के जलाये जाने वाले सिरे को भीतर की ओर दबाते हुए कोंच कोंच कर उसका मुँह बन्द कर देतीं ताकि तम्बाकू वहाँ से बाहर न निकले ।  इस तरह चोवीस या पच्चीस बीड़ियाँ हो जाने पर वे उसका एक बण्डल बना देतीं । 

मुझे तम्बाकू और तेंदू पत्ते की कुँवारी गंध बहुत अच्छी लगती थी । बीड़ी बनाने की कला भी मेरे लिए किसी सृजनात्मक कला से कम नहीं थी । एक दिन मैंने उनसे कहा “मुझे भी बीड़ी बनाना सिखा दो न काकी “ वे बहुत देर तक हँसती रहीं और कहा ..”तू बड़े घर का लड़का है, तू क्या करेगा बीड़ी बनाना सीख कर, तू तो साहेब बनेगा साहेब । ” मुझे उस उम्र में उनकी बात समझ में नहीं आई थी कि किराये के छोटे से घर में रहने वाला मैं, बड़े घर का लड़का कैसे हो गया और इसका बीड़ी बनाना सीखने से क्या सम्बन्ध है ।

बीड़ी बनाने के बाद काकी उन बंडलों को एक टोकनी में रखकर, सर पर लादकर, बीड़ी कारखाने तक पहुँचाने जाती थी । उनका कोई ख़ास कारखाना रहा होगा लेकिन मुझे याद नहीं । वैसे भंडारा में उन दिनों अनेक बीड़ी कारखाने थे जिनमे बड़े बाज़ार में दादा धोटे उर्फ़ बारा भाई के घर के पास स्थित छोटाभाई जेठाभाई बीड़ी कारखाना सबसे मशहूर था । यह सन दो हज़ार चार में केंद्र सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री रह चुके कांग्रेस के लोकप्रिय नेता प्रफुल्ल पटेल के दादा और भंडारा ज़िले के शैक्षणिक विकास के प्रणेता मनोहर भाई पटेल के पिताजी का कारखाना था । यह लोग बंदरी बीड़ी बनाया करते थे जो बाद में मनोहर बीड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई । स्टेशन जाने वाली रोड पर दिनकर राव रहाटे के घर के दाहिनी ओर खण्डहर सी दिखाई देने वाली अधूरी बनी एक इमारत में सेठ रावजी भाई अम्बालाल का बीड़ी कारखाना था जो ठक्कर अम्बालाल कारखाने के नाम से प्रसिद्ध था । इसका बड़ा सा खुला दरवाज़ा था जिस पर प्लास्टर नहीं था । कहते हैं कि वहाँ किसी ब्रह्मराक्षस का शाप था जिसकी वज़ह से इमारत का निर्माण कार्य कभी पूरा नहीं हो पाता था ।अंततः वह इमारत ढहा दी गई , वहां अब जो है उसे आप इस चित्र में देख सकते हैं । 

उस समय बीड़ी का कारोबार अधिकतर गुजरातियों के हाथ में था । उन्हीं में से एक मूलजी भाई का कारखाना था जो राममंदिर के पीछे कोष्टी मोहल्ले में था । एक बीड़ी कंपनी सी पी कंपनी के नाम से भी मशहूर थी । अनेक छोटे मोटे कारखानों के अलावा राजा गणपतराव पाण्डे के महल वाली सड़क पर उनके हाथीखाने  के सामने हरगोविंद लाल मोहन लाल का बीड़ी कारखाना था । यह कारखाना बहुत बड़े एक परिसर में था जहाँ खूब सारे आम के पेड़ थे । मेरे साथ मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले दोस्त रूपचंद ज्ञानी के पिता इस कारखाने में मुनीम थे । हाथीखाने के पीछे ही गाँधी विद्यालय था । मैं अक्सर दोपहर की लंच की छुट्टी में रूपचंद के साथ कारखाने चला जाया करता था और वहाँ मजदूरों को बीड़ी बनाते हुए देखने के अलावा अन्य गतिविधियाँ भी देखा करता था ।  इस चित्र मे जो गेट है उसके भीतर था यह कारखाना । 

कारखाने की इमारत में बीचों बीच एक बड़ा हाल था जो पुरुष मजदूरों के लिए था और एक छोटा हाल महिला कामगारों के लिए था । वे सुबह सुबह कारखाने आते एक वितरण खिड़की से अपनी ट्रे यानि पत्तर , तम्बाकू ,पत्ते, धागा और पट्टी लेते और हाल में बिछी दरी पर एक जगह पालथी मारकर बैठ जाते । हर कारखाने में बीड़ी में प्रयुक्त की जाने वाली तम्बाकू की किस्म अलग अलग होती थी । इसके अलावा अलग अलग कंपनियों का धागा भी अलग होता था । लाल,पीले,हरे,नारंगी आदि रंगों के धागों से ही अलग अलग कंपनियों की बीड़ियाँ पहचानी जाती थीं । जिन लोगों को कारखाने में बैठकर काम नहीं करना होता था वे अपना तम्बाकू,धागा और पत्ते आदि लेकर घर चले जाते थे । इनमें अधिकांश महिलाएँ होती थीं इसलिए कि उन्हें बीड़ी निर्माण के अलावा घर के काम भी करने होते थे । यह उन दिनों के वर्क फ्रॉम होम का प्रारंभिक संस्करण था । बीड़ी तैयार होने के बाद उसका बण्डल बनाया जाता और उसे कारखाने में उसी दिन या अगले दिन जमा किया जाता । 

शहरों की तरह गांवों में भी बड़े कारखानों की छोटी छोटी इकाइयाँ थीं । यहाँ एक दीवान जी नामक शख्स के माध्यम से सारा काम होता था । यह दीवान या उनका आदमी शहर के कारखाने से तेंदू पत्ता,तम्बाकू,धागा आदि लेकर आता और उसे हिसाब से गाँव के बीड़ी मजदूरों में बाँट देता । फिर बीड़ियाँ बन जाने के बाद एक बाँस के बने एक बड़े से टोकरे में जिसे ‘हारा’ या ‘झाल’ कहते थे उन बंडलों को इकठ्ठा किया जाता और दीवान या उनका आदमी उन्हें  भरकर शहर के बड़े कारखाने में पहुँचा देता था । 

फिर दीवान सप्ताह में एक बार शहर के कारखाने जाता और वहाँ उन बंडलों के एवज  में प्राप्त भुगतान राशि लेकर गाँव आता और उन्हें मजदूरों में बाँट देता था । मजदूरी का भुगतान सप्ताह में एक बार ही किया जाता था । मजदूर लगभग रोज ही उनके द्वारा बनाई हुई बीडियों के बण्डल  दीवान के पास जमा करते और नए बण्डल बनाने के लिए अगले लाट का सामान ले जाते । हर मजदूर को दी गई तम्बाकू, तेंदू पत्ते की मात्रा का हिसाब बराबर रखा जाता । उसके ऐवज में प्राप्त बनी हुई बीडियों के बण्डल और उसे किये गए साप्ताहिक भुगतान का हिसाब भी एक कॉपी में लिखा जाता था । ऊपर से देखने में ऐसा ही लगेगा कि यह कितनी बढ़िया व्यवस्था है, कारखाने से कच्चा माल लो, आराम से घर बैठकर बीड़ियाँ बनाओ, उन्हें कारखाने में जमा  कर अपना मेहनताना वसूल करो और ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिताओ । लेकिन ऐसे दृश्य केवल गाँव का सेट बनाकर गाँव का सुखी जीवन  दिखाने वाली हिंदी फिल्मों में मिलते हैं, वास्तविकता इसके बिलकुल विपरीत होती है  । 

शरद कोकास