24 मई 2026

42.जैसे कसाई जानवर को टटोलकर उसके भीतर का मांस देखता है


पिछले एपिसोड मे आपने पढ़ा कि बीड़ी किस तरह से बनाई जाती है , कैसे सामान का वितरण होता है और उसके बाद फिर एक व्यक्ति घर घर पहुंचता है बीड़ी के बंडल इकट्ठा करने के लिए । 

यहाँ से प्रारंभ होती है बीड़ी कामगार के शोषण की अनकही गाथा । 

बीड़ी के बण्डल जमा करने वाला दीवान या मुनीम नामक व्यक्ति मजदूर से सीधे सीधे बण्डल नहीं लेता था पहले वह जाँच करता था कि बीड़ी ठीक से बने गई है या नहीं इस प्रक्रिया को छंटनी कहते थे । वह हर बण्डल की बीड़ियाँ गिनकर उसे खोलता फिर यह देखने के लिए कि बीड़ी में तम्बाकू निर्धारित मात्र में भरा गया है या नहीं, 

वह हर बीड़ी को उसी तरह टटोलकर देखता है जैसे कसाई जानवर को टटोलकर उसके भीतर का मांस देखता है । 

फिर वह उंगली से बीड़ी की लम्बाई नापता कि वह स्टैण्डर्ड साइज़ से छोटी या बड़ी तो नहीं बनी है । यह भी देखना होता था कि धागा ठीक से लपेटा गया है या नहीं, या बीड़ी का मुँह ठीक से बंद है या नहीं । छंटाई करने वाला यह व्यक्ति इन मापदंडों पर खरी न उतरने वाली बीड़ीयों को बेरहमी से एक ओर फेंकता जाता था । 

मजदूर फेंकी हुई उन बीड़ियों की ओर इस तरह देखते जैसे सरकारी कारिंदे द्वारा उनकी झोपडी से सामान निकालकर फेंका जा रहा हो । हर बीड़ी के साथ उनके मेहनत, उनकी खुशी और मेहनत से कमाई उनके बच्चों की रोटी भी घूरे के ढेर पर फेंक दी जाती । 

देखने में यह क्वालिटी कंट्रोल की एक सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया लगती है लेकिन इसमें कई पेंच हैं। इन दरोगाओं के पास शोषण के अलिखित कानून थे । इन्हीमे एक व्यक्ति वह होता जो दी गई तम्बाकू और बनाई गई बीड़ी के अनुपात को परखता था और मजदूर पर इलज़ाम लगा देता कि तुम्हे तो इतनी तम्बाकू दी गई थी फिर इतनी कम बीड़ियाँ कैसे बनी ? 

मजदूर के पास कोई जवाब नहीं होता था । वह तो ठीक से देखकर, तुलवाकर तम्बाकू और पत्ते ले गया था फिर कम कैसे पड़ गया ? हालाँकि बाद में उसे यह बात समझ में आने लगी  कि कहीं कुछ गड़बड़ हुई है । ज़ाहिर है एक हज़ार बीड़ी के लिए लगने वाला आठ सौ ग्राम तेंदू पत्ता और साढ़े तीन सौ ग्राम तम्बाकू वितरण करने वाले द्वारा उसे ठीक से तौलकर नहीं दिया गया था ।  

मजदूर को दी जानेवाली तम्बाकू को कम तौलकर अपना फायदे के लिए चोरी करने वाला  यह व्यक्ति इस सत्य को जानता था कि ऊपर से कोई भगवान उसकी यह बदमाशी नहीं देख रहा है इसलिए वह धड़ल्ले से चोरी करता था लेकिन मारा जाता था ग़रीब मजदूर । 

बीच का यह व्यक्ति कई बार उन्ही के बीच का व्यक्ति होता था लेकिन हम जानते हैं कि लोभ,लालच और परपीड़क प्रवृत्ति कुछ लोगों में होती ही है, वे लाभ के लिए अपने पराये जैसी धारणा में विश्वास नहीं करते । तत्कालीन अंग्रेज़ शासक राज करने के लिए मनुष्य के इस स्वभाव का कैसा उपयोग कर रहे थे  सब बेहतर जानते हैं ।

मेहनतकश बीड़ी कामगार ग़रीब अवश्य थे लेकिन वे बेइमान नहीं थे । वे अभावग्रस्त अवश्य थे लेकिन चोर नहीं थे । वे इतने अनुभवी थे कि जानते थे, तम्बाकू की कितनी मात्रा में कितनी बीड़ियाँ बनती हैं । लेकिन सब जानते बूझते भी वे कुछ नहीं कर सकते थे । कभी कभी वे कम मात्रा में दी गई तम्बाकू में ही तय संख्या में बीड़ियाँ बनाने का प्रयास करते परिणाम स्वरूप हर बीड़ी में तम्बाकू की मात्रा कुछ कम हो जाती । इस अपराध में उनकी बनाई हुई तमाम बीड़ियाँ न केवल रिजेक्ट कर दी जातीं बल्कि तम्बाकू और पत्ते के नुकसान का पैसा भी उनकी मजदूरी से काट  लिया जाता । 

जबकि वे अच्छी तरह जानते थे कि इतने मामूली नुक्स के लिए इतनी बीड़ियाँ रिजेक्ट नहीं की जा सकतीं । 

वे जानते थे कि उनकी ज़रा सी नज़र चूकते ही मामूली नुक्स वाली बीडियों के साथ सही सही बीड़ियाँ भी अलग कर दी गई हैं । वे यह भी जानते थे कि उनके चले जाने के बाद अलग की गई अधिकांश  बीड़ियाँ बण्डल में बाँध कर भट्टी में पकाने के लिए भेज दी जायेंगी और कागज़ के खूबसूरत पैकेटों में लपेटकर  उन्हें बाज़ारों में भेज दिया जायेगा । बस उन पर उनके हाथों का श्रम दर्ज नहीं होगा और इसलिए उनका मेहनताना भी उन्हें नहीं मिलेगा । यह सारा अधिशेष मूल्य उन दारोगाओं की अतिरिक्त कमाई अथवा उनके मालिकों के मुनाफ़े में शामिल हो जायेगा ।

मजदूरी के भुगतान वाली खिड़की से अपनी मजदूरी का भुगतान लेते हुए रुख्मनी बाई फटे आंचल से अपना सर ढंकती है, लक्ष्मी आने वाली है ना घर में । 

वह जानती है कि रोज़ खाना पकाने, घर की साफ़ सफाई करने, बच्चों की और बुजुर्गों की देखभाल करने जैसे ढेरों कामों के साथ साथ इतनी  मेहनत से बनाई गई हज़ार बीडियों में से चार सौ से अधिक बीड़ियाँ रिजेक्ट कर दी गईं हैं । उसे पता है कि अपनी रातों की नींदें कुर्बान कर देने के बाद बनाई गई इन हज़ार बीड़ियों पर जो चार आने मेहनताना उसे मिलना था वह अब केवल ढाई आना ही मिलेगा । उसे यह भी पता है कि ढाई आने में इतना चावल बिलकुल नहीं आएगा जिससे वह अपने बच्चों का पेट भर सके ।

बरसों बरस यह सिलसिला चलता रहा, मजदूर ग़रीब से और ज़्यादा ग़रीब होते गए । वहीं कारखानों के मालिक और उनके कारिंदे संपन्न हो रहे थे । 

एक स्वाभाविक सा प्रश्न मन में उठता है , तो क्या रुख्मनी बाई को और उसके जैसी तमाम महिलाओं को अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध कभी विद्रोह करने का ख्याल नहीं आया ? ऐसा हुआ, लेकिन उसके लिए समय लगा । इसे जानने के लिए हमें भंडारा, नागपुर और आसपास के क्षेत्रों के बीड़ी उद्योग की पृष्ठभूमि को संक्षेप में समझना होगा ।  अब यह कारखानेदार द्वारा मजदूरों को काम देकर उन पर अहसान करने जैसी कोई बात नहीं रह गई थी । देश धीरे धीरे आज़ाद होने की ओर बढ़ रहा था और जन मानस भी । गाँधी, नेहरू, डॉ.आंबेडकर जैसे लोग देशवासियों की गरिमा और उनके उत्थान के लिए प्रयत्नशील थे । 

भंडारा ज़िले में बीड़ी निर्माण की शुरुआत बहुत मामूली स्तर पर सन उन्नीस सौ बीस के आसपास हुई थी । भंडारा वन सम्पदा से समृद्ध था और जंगल तेंदू के वृक्षों से भरे पड़े थे । तेंदू पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने के लिए हो सकता है यह हिकमत आदिम जनजातियों को ज्ञात थी । 

अमेरिका की कुछ जनजातियाँ भी तम्बाकू को पत्ते में लपेटकर पीने की कला जानती थीं । इंग्लैण्ड में यह तम्बाकू सिगरेट के रूप में कागज़ में लपेटा जाता था अथवा पाइप के माध्यम से पिया जाता था । सिगार भी तम्बाकू के सूखे या किण्वित पत्ते को ही कसकर लपेटकर बनाया जाता था । 

तेंदू पत्ते में तम्बाकू लपेटकर पीने का यह हुनर देखने के बाद, भारत में तेंदू पत्ते व तम्बाकू की उपलब्धता के आधार पर अंग्रेज़ों द्वारा इस उद्योग में मामूली रूचि ली गई । तम्बाकू व बीड़ी का उत्पादन उनके लिए भी मुनाफ़े की चीज़ था लेकिन उससे ज़्यादा मुनाफ़े के कम उनके पास पहले से थे इसलिए भंडारा ज़िले में सदी के प्रारंभ में गुजरात से आये अधिकांश व्यवसाइयों ने यह व्यवसाय संभाला । 

बीड़ी बनने की यह प्रक्रिया तेंदू पत्ते की तुड़ाई से प्रारंभ होती है । 

जंगल के आदिवासी हरे  तेंदू पत्ते तोड़ते थे, उन्हें सुखाते थे और बीड़ी बनवाने वाले ठेकेदारों को बेच देते थे । अप्रेल माह से तेंदू पत्ता तोड़ने का यह कार्य प्रारंभ हो जाता जो सारी गर्मियों तक चलता । गर्मी के दिनों में यह काम बहुत तेज़ी से होता था इसलिए कि धूप में तेंदू पत्ता जल्दी सूखता है  । बाद में जंगल ठेके से दिए जाने लगे और आदिवासियों को तेंदू पत्ता तोड़ने के बदले मजदूरी का भुगतान किया जाने लगा । 

आदिवासी अब उन जंगलों के मालिक नहीं थे । 

धीरे धीरे यह एक उद्योग का रूप लेता गया । उस समय तक अन्य उद्योगों में भी मशीनों का अविर्भाव नहीं हुआ था । तेंदू पत्ता तोड़ने से लेकर बीड़ी बनाने तक यह काम मनुष्य ही कर सकते थे और इसके लिए बहुत सस्ती मजदूरी पर लोग उपलब्ध थे । 

भंडारा ज़िले में अधिकांश अनुसूचित जाति के बीड़ी कामगारों द्वारा बीड़ी बनाना शुरू किया गया । अनुसूचित जातियों के अंतर्गत भी अनेक जातियां और उपजातियां आती थीं जिनके सदियों से चले आ रहे उनके अपने घरेलू उद्योग और व्यवसाय थे जिनमे चर्मोद्योग, वाद्ययंत्र निर्माण एवं वादन और मांस का उत्पादन तथा व्यवसाय प्रमुख था, यद्यपि इनकी संख्या बहुत कम होती थी लेकिन गाँव की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त होती थी ।

ग्रामीण क्षेत्रों में एक वृहत समाज ऐसा भी था जिनके पास छोटी मोटी कास्तकारी या कृषि कार्य  जैसा भी कोई काम नहीं था । वे ज़मींदारों अथवा सवर्णों के यहाँ बेगारी करते, उनके खेतों में मजदूरी करते और उसके बदले जो कुछ भी उन्हें मिल जाता स्वीकार कर लेते । यहाँ न केवल उनके श्रम का शोषण होता था अपितु जाति के नाम पर भी उनके साथ पशुवत व्यवहार भी होता था । ऐसे लोगों के लिए बीड़ी उद्योग का खुलना एक राहत थी । सबसे पहले स्थानीय स्तर पर बीड़ी बनाने का काम इन्ही लोगों द्वारा प्रारंभ किया गया ।

इसी बीच भंडारा और आसपास के क्षेत्रों यथा कामठी, तिरोडा,तुमसर, आमगाँव, सालेकसा, गोंदिया आदि स्थानों पर बीड़ी कारखाने खुलने लगे । मालिकों को मजदूरी की सस्ती दर पर कामगार चाहिए थे और इन बेरोजगारों को काम । ऐसे समय बीड़ी बनाने का काम इन असहाय लोगों के जीवन में एक वरदान की तरह उपस्थित हुआ । 

इस कार्य में विशेष बात यह थी कि न केवल पुरुष या महिलाएँ बल्कि थोड़े से प्रयास से घर के बच्चे भी बीड़ी बनाने का काम कर सकते थे । 

इस तरह थोड़ी ही सही घर चलाने लायक आमदनी तो हो ही जाती थी । बीड़ी कारखानेदारों  द्वारा उन्हें रोजगार देकर इस स्थिति से उबारा गया यह अच्छी बात थी लेकिन आगे चलकर उनकी यही विवशता उनके शोषण का मुख्य कारण बन गई । वे इतने मजबूर थे कि काम बंद करने या काम छोड़ देने की धमकी भी नहीं दे सकते थे । बीड़ी कारखाने वालों का अत्याचार इतना बढ़ गया कि वे उनकी पूरी की पूरी बीड़ियाँ रिजेक्ट कर देते थे और कई बार अपनी दिन भर की मेहनत ठेकेदारों या मालिकों को सौंप  देने के बाद भी उन्हें कारखाने से खाली हाथ लौटना पड़ जाता था । 

जुर्माने के बदले उन्हें अगली बार मुफ़्त में काम करके देना होता था ।

फिर केवल आर्थिक शोषण होता तो बात और थी । इन बीड़ी कामगारों, स्त्रियों और बच्चों से यह कारखानेदार,ठेकेदार अपनी हवेलियों में बेगार भी करवाते थे । उन्हें ज़रा सी ग़लती के लिए पीटा जाता था , भोजन की व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी होती थी, अगर उन्हें भोजन दिया भी जाता तो केवल इतना ही कि वे जीवित रह सकें । वे अपने बच्चों के पढ़ने लिखने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे । जिन नन्हे हाथों में अभी  ढंग से भात का कौर पकड़ने की क़ाबलियत नहीं थी उनमे जबरन बीड़ी के पत्ते और तम्बाकू थमा दिया जाता था । 

कारखानों के भीतर बसे बागीचों के सूनेपन में देर रात तक बहने वाली गर्म हवायें किसी मासूम के मुँह  से निकली बेबस चीखों की गवाह बन जाती थीं लेकिन वे खुद खामोश होती थीं । इंसान के मुखौटे में कौनसा दरिंदा कहाँ विचरण कर रहा है कुछ पता नहीं चलता था ।  

हल्का सा विरोध करने वाले का पता ही नहीं चलता था कि वह कहाँ गया । कारखानेदारों की शह पाकर उनके यहाँ उच्च पदों पर काम करने वाले उनके मुलाजिम इस काम में पीछे नहीं थे । 

भविष्य की हिंदी फिल्मों में आनेवाले ‘मजदूरी के पैसे लेने के लिए लाइन में खड़ी युवा मजदूर स्त्री को मजदूरी का भुगतान करते समय वासना भरी निगाहों से चश्मे के ऊपर से घूरता हुआ मुनीम’ जैसे दृश्य का आधार यहाँ तैयार हो रहा था । 

लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब पानी सर से ऊपर हो गया । 

दमन की चक्की जो इन विवश इंसानों की पीस रही थी उसके पाटों को इन ग़रीब कामगारों के मजबूत हाथों ने रोक दिया । उनमे इतनी चेतना आ गई थी कि वे अपने शोषण को जान रहे थे । 

अब्राहम लिंकन ने कहा है कि गुलाम को उसकी गुलामी का अहसास दिला दो तो वह बाग़ी हो जाता है । स्पार्टकस हर युग में हर कौम में जन्म लेते हैं । 

लगभग दस पंद्रह साल तक अपनी पीठ पर अत्याचार के कोड़ों की मार झेलने के पश्चात आखिर सन उन्नीस सौ तीस में बीड़ी कामगारों ने विद्रोह का बिगुल फूंका और प्रथम बीड़ी कामगार आन्दोलन की शुरुआत हुई । इस विद्रोह की शुरुआत करने का श्रेय भंडारा के निकट तिरोडा नामक स्थान के गोरेगाँव के बीड़ी कामगारों को दिया जाता है । यहाँ मूलजी भाई का बीड़ी कारखाना था । 

यह मूलजी भाई वही थे जो उन्नीस सौ बावन के भंडारा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से चुनाव जीतने वाले चतुर्भुज जसानी के साथी थे । जसानी इसी बीड़ी कंपनी में भागीदार थे और कंपनी की बीड़ियों की भारतीय सेना में आपूर्ति के कारण भारी मुनाफ़ा कमा रहे थे । 

भंडारा के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं कि इसी आधार पर उनकी शिकायत की गई थी और कोर्ट ने वह चुनाव रद्द कर दिया था जिसकी वज़ह से भंडारा में उन्नीस सौ चौवन में उपचुनाव करवाने की नौबत आई थी । यह वही चुनाव था जिसमे बाबासाहेब कांग्रेस के प्रत्याशी से हार गए थे । बीड़ी कारखानेदारों उनके चाटुकारों और राजनीतिज्ञों के गठबंधन का इतिहास भंडारा ज़िले में बहुत पुराना है । लेकिन उससे भी अधिक पुराना इतिहास विश्व में मनुष्य के शोषण और उसके प्रतिकार का है । 

शरद कोकास 

22 मई 2026

41.मुक्तिबोध जिनकी बनाई हुई बीड़ी पीते थे

रात का गहन अन्धकार, सूनी बावड़ी, खोह से झाँकता ब्रह्मराक्षस का भय, तालाब के किनारे खड़े पीपल और बरगद के आदिम वृक्षों की डालियों से टकराकर सांय सांय करती हवाएँ, निस्तब्धता में सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट,  पुराने महल के परकोटे के द्वार के ऊपर बने निवास में एक चक्करदार सीढ़ी, माचिस की तीली जलने की फिस्स सी आवाज़, सुलगती हुई बीड़ी और बीड़ी के सिरे पर दहकता हुआ अंगारा, धुंध के साथ एकाकार होता हुआ बीड़ी का गाढ़ा धुआं । 

यह कोई स्वप्न दृश्य नहीं है । हिन्दी कविता के हमारे सुधी पाठक प्रारंभ की आधी पंक्ति से ही जान गए होंगे कि इन पंक्तियों में हिंदी के हमारे पुरखे कवि मुक्तिबोध की स्मृति है ।

मुक्तिबोध का एक प्रसिद्ध चित्र है जिसमे वे बीड़ी सुलगा रहे हैं । भीतर धँसे हुए गालों की गहराई में उभरते उनके होठों के बीच एक बीड़ी है जिसे उन्होंने बाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच पकड़ रखा है । दायें हाथ में माचिस की जलती हुई एक तीली है जिसकी लौ बीड़ी की नोक से स्पर्श कर रही है । उनकी पलकें नीचे की ओर झुकी हैं और वे उस लौ में मनुष्य द्वारा पहली बार चकमक पत्थर से जलाई गई आग का अक्स देख रहे हैं । 

कला एवं साहित्य के मित्रों को यह चित्र कुछ रूमानियत से भरा हुआ लग सकता है लेकिन जब भी मैं बीड़ी पीते हुए मुक्तिबोध के इस चित्र को देखता हूँ तो मुझे बचपन के दिनों में भंडारा के अपने पड़ोस के घर में रहने वाले बुध्या की माँ और दादी की याद आ जाती है, याद आती हैं कंदील की मद्धम रौशनी में  बीड़ी बनाते हुए झुकी हुई उनकी पीठ और तेंदू पत्ते व तम्बाकू से भरी ट्रे में गुम हो चुकी उनकी ऑंखें । मोहल्ले की अनेक महिलाओं की तरह पांडुरंग ठाकरे के घर में उनकी पत्नी और माँ बीड़ी बनाया करती थीं । मैं अक्सर उनके पास बैठकर उनका बीड़ी बनाना देखा करता था । 

वे टीन से बनी एक ट्रे में तम्बाकू, धागा और पत्तों को रखतीं । इस तरह की चौकोर या सूप के आकार की ट्रे महाराष्ट्र में ‘पत्तर’ कहलाती है । पत्तर सज जाने के बाद वे फिर पत्तों को पान काटने वाली एक कैंची से सिगरेट के पैकेट से कुछ छोटे आकार में काटतीं, एक ओर थोड़ा अधिक चौड़ा व दूसरी ओर उससे कुछ कम । फिर बीड़ी के एक बण्डल लायक पत्ते गिनकर उनकी गड्डी बनातीं । यह पत्ते नर्म रहें इसलिए जूट की बोरी के एक टुकड़े जिसे ‘फारी’ कहते थे उसे गीला कर उसमे पत्ते लपेटकर रखतीं । 

बीड़ी बनाने की शुरुआत करते हुए सर्वप्रथम वे उस गड्डी से एक आयताकार पत्ता लेकर उसपर बीच में थोड़ी सी तम्बाकू भरतीं और एक कोने से सामने के विकर्ण कोने तक तिरछे चलते हुए,तम्बाकू को थोड़ा थोड़ा सिरों की ओर फैलाते हुए  उँगलियों के एक निश्चित दबाव के साथ उसे गोल गोल लपेट देतीं । तम्बाकू भरकर पत्ते को लपेटते हुए इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी होता था कि बीड़ी का जो सिरा होठों के भीतर होता है उसे थोड़ा सा दबाकर चपटा कर दिया जाए । फिर उसे धागे से बांधना भी ज़रूरी होता है ताकि वह खुल न जाये । फिर लोहे की तीन इंच लम्बी आधा इंच चौड़ी पतली सी एक आयताकार पट्टी की नोक से बीड़ी के जलाये जाने वाले सिरे को भीतर की ओर दबाते हुए कोंच कोंच कर उसका मुँह बन्द कर देतीं ताकि तम्बाकू वहाँ से बाहर न निकले ।  इस तरह चोवीस या पच्चीस बीड़ियाँ हो जाने पर वे उसका एक बण्डल बना देतीं । 

मुझे तम्बाकू और तेंदू पत्ते की कुँवारी गंध बहुत अच्छी लगती थी । बीड़ी बनाने की कला भी मेरे लिए किसी सृजनात्मक कला से कम नहीं थी । एक दिन मैंने उनसे कहा “मुझे भी बीड़ी बनाना सिखा दो न काकी “ वे बहुत देर तक हँसती रहीं और कहा ..”तू बड़े घर का लड़का है, तू क्या करेगा बीड़ी बनाना सीख कर, तू तो साहेब बनेगा साहेब । ” मुझे उस उम्र में उनकी बात समझ में नहीं आई थी कि किराये के छोटे से घर में रहने वाला मैं, बड़े घर का लड़का कैसे हो गया और इसका बीड़ी बनाना सीखने से क्या सम्बन्ध है ।

बीड़ी बनाने के बाद काकी उन बंडलों को एक टोकनी में रखकर, सर पर लादकर, बीड़ी कारखाने तक पहुँचाने जाती थी । उनका कोई ख़ास कारखाना रहा होगा लेकिन मुझे याद नहीं । वैसे भंडारा में उन दिनों अनेक बीड़ी कारखाने थे जिनमे बड़े बाज़ार में दादा धोटे उर्फ़ बारा भाई के घर के पास स्थित छोटाभाई जेठाभाई बीड़ी कारखाना सबसे मशहूर था । यह सन दो हज़ार चार में केंद्र सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री रह चुके कांग्रेस के लोकप्रिय नेता प्रफुल्ल पटेल के दादा और भंडारा ज़िले के शैक्षणिक विकास के प्रणेता मनोहर भाई पटेल के पिताजी का कारखाना था । यह लोग बंदरी बीड़ी बनाया करते थे जो बाद में मनोहर बीड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई । स्टेशन जाने वाली रोड पर दिनकर राव रहाटे के घर के दाहिनी ओर खण्डहर सी दिखाई देने वाली अधूरी बनी एक इमारत में सेठ रावजी भाई अम्बालाल का बीड़ी कारखाना था जो ठक्कर अम्बालाल कारखाने के नाम से प्रसिद्ध था । इसका बड़ा सा खुला दरवाज़ा था जिस पर प्लास्टर नहीं था । कहते हैं कि वहाँ किसी ब्रह्मराक्षस का शाप था जिसकी वज़ह से इमारत का निर्माण कार्य कभी पूरा नहीं हो पाता था ।अंततः वह इमारत ढहा दी गई , वहां अब जो है उसे आप इस चित्र में देख सकते हैं । 

उस समय बीड़ी का कारोबार अधिकतर गुजरातियों के हाथ में था । उन्हीं में से एक मूलजी भाई का कारखाना था जो राममंदिर के पीछे कोष्टी मोहल्ले में था । एक बीड़ी कंपनी सी पी कंपनी के नाम से भी मशहूर थी । अनेक छोटे मोटे कारखानों के अलावा राजा गणपतराव पाण्डे के महल वाली सड़क पर उनके हाथीखाने  के सामने हरगोविंद लाल मोहन लाल का बीड़ी कारखाना था । यह कारखाना बहुत बड़े एक परिसर में था जहाँ खूब सारे आम के पेड़ थे । मेरे साथ मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले दोस्त रूपचंद ज्ञानी के पिता इस कारखाने में मुनीम थे । हाथीखाने के पीछे ही गाँधी विद्यालय था । मैं अक्सर दोपहर की लंच की छुट्टी में रूपचंद के साथ कारखाने चला जाया करता था और वहाँ मजदूरों को बीड़ी बनाते हुए देखने के अलावा अन्य गतिविधियाँ भी देखा करता था ।  इस चित्र मे जो गेट है उसके भीतर था यह कारखाना । 

कारखाने की इमारत में बीचों बीच एक बड़ा हाल था जो पुरुष मजदूरों के लिए था और एक छोटा हाल महिला कामगारों के लिए था । वे सुबह सुबह कारखाने आते एक वितरण खिड़की से अपनी ट्रे यानि पत्तर , तम्बाकू ,पत्ते, धागा और पट्टी लेते और हाल में बिछी दरी पर एक जगह पालथी मारकर बैठ जाते । हर कारखाने में बीड़ी में प्रयुक्त की जाने वाली तम्बाकू की किस्म अलग अलग होती थी । इसके अलावा अलग अलग कंपनियों का धागा भी अलग होता था । लाल,पीले,हरे,नारंगी आदि रंगों के धागों से ही अलग अलग कंपनियों की बीड़ियाँ पहचानी जाती थीं । जिन लोगों को कारखाने में बैठकर काम नहीं करना होता था वे अपना तम्बाकू,धागा और पत्ते आदि लेकर घर चले जाते थे । इनमें अधिकांश महिलाएँ होती थीं इसलिए कि उन्हें बीड़ी निर्माण के अलावा घर के काम भी करने होते थे । यह उन दिनों के वर्क फ्रॉम होम का प्रारंभिक संस्करण था । बीड़ी तैयार होने के बाद उसका बण्डल बनाया जाता और उसे कारखाने में उसी दिन या अगले दिन जमा किया जाता । 

शहरों की तरह गांवों में भी बड़े कारखानों की छोटी छोटी इकाइयाँ थीं । यहाँ एक दीवान जी नामक शख्स के माध्यम से सारा काम होता था । यह दीवान या उनका आदमी शहर के कारखाने से तेंदू पत्ता,तम्बाकू,धागा आदि लेकर आता और उसे हिसाब से गाँव के बीड़ी मजदूरों में बाँट देता । फिर बीड़ियाँ बन जाने के बाद एक बाँस के बने एक बड़े से टोकरे में जिसे ‘हारा’ या ‘झाल’ कहते थे उन बंडलों को इकठ्ठा किया जाता और दीवान या उनका आदमी उन्हें  भरकर शहर के बड़े कारखाने में पहुँचा देता था । 

फिर दीवान सप्ताह में एक बार शहर के कारखाने जाता और वहाँ उन बंडलों के एवज  में प्राप्त भुगतान राशि लेकर गाँव आता और उन्हें मजदूरों में बाँट देता था । मजदूरी का भुगतान सप्ताह में एक बार ही किया जाता था । मजदूर लगभग रोज ही उनके द्वारा बनाई हुई बीडियों के बण्डल  दीवान के पास जमा करते और नए बण्डल बनाने के लिए अगले लाट का सामान ले जाते । हर मजदूर को दी गई तम्बाकू, तेंदू पत्ते की मात्रा का हिसाब बराबर रखा जाता । उसके ऐवज में प्राप्त बनी हुई बीडियों के बण्डल और उसे किये गए साप्ताहिक भुगतान का हिसाब भी एक कॉपी में लिखा जाता था । ऊपर से देखने में ऐसा ही लगेगा कि यह कितनी बढ़िया व्यवस्था है, कारखाने से कच्चा माल लो, आराम से घर बैठकर बीड़ियाँ बनाओ, उन्हें कारखाने में जमा  कर अपना मेहनताना वसूल करो और ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिताओ । लेकिन ऐसे दृश्य केवल गाँव का सेट बनाकर गाँव का सुखी जीवन  दिखाने वाली हिंदी फिल्मों में मिलते हैं, वास्तविकता इसके बिलकुल विपरीत होती है  । 

शरद कोकास 


40.उन लकीरों के जाल में निःशब्द अक्षर सो गए


हिन्दी साहित्य के इतिहास की एक प्रमुख घटना है नयी कविता आन्दोलन के प्रमुख कवियों द्वारा सन  उन्नीस सौ चौवन में इलाहाबाद से अर्ध वार्षिक पत्रिका ‘नयी कविता’ का प्रकाशन । इसकी योजना डॉ.धर्मवीर भारती, रघुवंश, ब्रजेश्वर वर्मा, विजय देव नारायण साही ने बनाई थी ।  ‘नयी कविता’ के प्रारम्भिक अंकों में जब अज्ञेय,कीर्ति चौधरी, कुँवर नारायण, जानकी वल्लभ शास्त्री, गिरिजा कुमार माथुर, शमशेर, पन्त, भवानी प्रसाद मिश्र, परमानन्द श्रीवास्तव, अजित कुमार, भारत भूषण अग्रवाल, साही जैसे कवियों की पारम्परिक शिल्प और प्रयोगवादी कविताओं से अलग नये शिल्प में नयी कविताएँ प्रकाशित हुईं तो साहित्य जगत में अनेक प्रकार की सकारात्मक व नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ हुईं । यद्यपि आठ अंकों के बाद नयी कविता का प्रकाशन बंद हो गया लेकिन इस पत्रिका ने एक नयी क्रांति का सूत्रपात किया । ‘नयी कविता’ इस पत्रिका के प्रारम्भिक अंकों के संपादक थे रामस्वरूप चतुर्वेदी और जगदीश गुप्त । जगदीश गुप्त स्वयं नयी कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं ।

मैं जब भी मनुष्य द्वारा भाषा की खोज के पश्चात गीली मिट्टी की पाटी पर सरकंडे की कलम से आकृतियों के माध्यम से अक्षर उकेरने के उसके प्रयास के बारे में सोचता हूँ तो मुझे जगदीश गुप्त की एक कविता ‘अक्षर और आकृति’ याद आ जाती है  ... 

क्षणभर रुका पेन / और फिर कुछ अधबने अक्षर सँवारे / पाइयों के शीश को ऊपर उठाया / मात्राओं के अनुपूर चरण अनुरंजित किये / नूपुर पिन्हाए / सभी सीमाएँ मिलाईं / नई रेखाएं बनाईं / यहाँ तक / वे नाम सारे खो गए/ 

मनुष्यता के विकास के सोपान चढ़ते हुए हम होमोसेपियंस सरकंडे की कलम से आगे बढ़ते हुए फाउंटेन पेन तक आ पहुँचे थे । उन दिनों स्याही वाला पेन बच्चों को तुरत फुरत में नहीं मिल जाता था । शुरुआत तो स्लेट पर खड़िया से लिखने से होती थी । शाम को दिया बाती के उपरांत  माँ मेरे हाथों में खड़िया की कलम पकड़ा देती और मेरा हाथ पकड़कर स्लेट पर लिखना सिखाती थी “ अच्छा अब ‘अ’ लिखो सबसे पहले ऊपर एक चूल्हा, उसके नीचे दूसरा चूल्हा फिर दोनों के बीच से एक आड़ी डंडी जो खड़ी डंडी के पेट तक पहुँचती है, फिर ऊपर टोपी पहनाना है । “ लिपि में पेट और चूल्हे का अंतर्संबंध मुझे माँ द्वारा अक्षर ज्ञान करवाए जाने के दौरान हुआ । आश्चर्य यह कि माँ ‘अ’ कुछ अलग ढंग से लिखती थी, जिसमे ‘प’ अक्षर से बाहर की ओर जाती तीन डंडियाँ होती थीं ।


खड़िया कलम के बाद अगली पायदान पर पीतल की निब वाला होल्डर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था । शिवहरे गुरूजी सारे बच्चों की हैण्ड राइटिंग पर बहुत ध्यान देते थे । उनका कहना था कि होल्डर से थोड़ा ठहर ठहर कर लिखने  से राइटिंग अच्छी आती है । होल्डर लकड़ी का बना हुआ एक कलम होता था जिसमें अलग से निब और जीभ लगाई जाती थी फिर उसे स्याही की दवात में डुबो डुबो कर लिखा जाता था । फाउंटेन पेन इसी होल्डर का विकसित स्वरूप है । घर से आते जाते बस्ते में स्याही की दवात उलट न जाए इसका भी एक हल उन्होंने निकाल रखा था । घर जाते हुए हम सब अपनी अपनी दवातें उनकी आलमारी में अपने नाम की चिट लगाकर रख देते थे और सुबह आकर निकाल लेते थे । घर के लिये अलग दवात थी जो  घर में ही रहती थी ।  

भंडारा में मेन रोड पर उन दिनों स्टेशनरी की एक प्रसिद्ध दुकान थी विजय बुक डेपो, जिसके संचालक थे गभने गुरूजी । स्याही बनाने के लिये गभने गुरूजी की स्टेशनरी की दुकान में नीली व लाल स्याही की गोल गोल टिकिया मिलती थी जिसे पानी में घोलकर हम लोग स्याही बनाते थे । 


जगदीश गुप्त की कविता की तरह हम लोग कॉपी पर अधबने अक्षर संवारते, पाइयों के सर ऊपर उठाते और मात्राओं के चरणों में नुपुर पहनाते । आज सोचता हूँ गुरूजी ने होल्डर पकड़ाकर अच्छा ही किया वर्ना इतनी अच्छी राइटिंग हम लोगों की नहीं होती । वैसे बाबूजी की भी हैंडराइटिंग बहुत अच्छी थी और उन्होंने भी मुझे इस दिशा में काफी प्रोत्साहित किया । वे मेरे शुद्धलेखन पर भी ध्यान दिया करते थे और अक्सर ‘धर्मयुग’ या ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’  का कोई पन्ना मुझे कागज़ पर उतारने के लिये दे दिया करते थे , बाद में जिसे चेक कर वे मेरी ग़लतियाँ बताया करते थे । 

मुझे भी उन दिनों अख़बारों से ‘अनमोल वचन’ और ‘दादी माँ के नुस्खे या ‘फ़कीरी नुस्खे’ उतारने का शौक लगा था जिन्हें मैं बाकायदा अलग अलग कॉपी में उतारता था । अनमोल वचन वाली मेरी कॉपी तो गुम हो गई लेकिन फ़कीरी नुस्खे वाली कॉपी अभी भी मेरे पास है । उन दिनों प्रायमरी स्कूल में शुद्धलेखन का भी एक पीरियड हुआ करता था जिसमें शिक्षक मुँह से बोलकर कोई गद्यांश लिखवाया करते थे और बाद में उसे जाँचकर वर्तनी की शुद्धता पर  नम्बर दिया करते । कलम दवात की यह जुगलबंदी चौथी प्रायमरी तक ही चली, पाँचवी कक्षा में पहुँचते ही बाबूजी ने मुझे एक डेल्टा पेन खरीदकर दे दिया ।


आजकल शुद्धलेखन और मनगणित जैसी प्रथाएँ लुप्तप्राय हैं । हैण्ड राइटिंग अच्छी होने का भी अब कोई महत्त्व नहीं है । अब सब कुछ कंप्यूटर या मोबाइल पर सीधे टाइप किया जाता है । लेकिन मुझे कागज़ पर कलम से लिखना हमेशा अच्छा लगता रहा । स्याही की गंध मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती है । अभी कुछ साल पहले तक मैं अपनी तमाम कविताएँ  हाथ से लिख कर ही संपादकों को भेजा करता था । कविताओं की पांच छः ड्राफ्टिंग होने के बाद ही वह फाइनल होती है । हाथ से लिखने के शौक की वज़ह से मैं तरह तरह के फाउंटेन पेन खरीदता रहा । कुछ साल पहले जब मैं चेन्नई गया था तो वहाँ  से एक जम्बो फाउंटेन पेन खरीदकर लाया था जिसमे अन्य पेन की अपेक्षा दुगनी स्याही आती थी । यह पेन अभी तक मेरे पास चालू हालत में है और मेरी अधिकांश कविताएँ  इसी पेन से लिखी गई हैं । आज मैं अपने आप को शिवहरे गुरुजी का कृतज्ञ पाता हूँ । अच्छी राइटिंग का होना मेरे भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न करता है ।


पहली कक्षा की तिमाही परीक्षा में कक्षा में मेरा पहला नम्बर आया था । वैसे भी सारी पुस्तकें मेरी रटी हुई थीं । मेरी पहली कक्षा की पढ़ाई के दौरान बाबूजी ने शिवहरे जी के साथ मिलकर विचार किया कि मुझे साथ साथ दूसरी कक्षा की भी तैयारी करनी चाहिये । बाबूजी का कहना था कि मैं पढ़ने- लिखने में बहुत होशियार हूँ इसलिये मुझे और लोगों से आगे होना चाहिये । सो स्कूल में पहली की पढ़ाई और घर पर दूसरी कक्षा की पढ़ाई प्रारंभ हो गई । बाबूजी घर में मुझे दूसरी कक्षा की किताबें पढ़ाते थे । मार्च अप्रेल में मैने पहले पहली की परीक्षा दी और फिर दूसरी की । परीक्षाफल आया तो मैं दोनों कक्षाओं में प्रथम था । हालाँकि यह सुविधा सिर्फ मुझे ही मिल पाई थी जिसकी वज़ह शिवहरे गुरूजी और बाबूजी की मित्रता थी । अन्य पालकों के लिए  इतना काफी था कि उनके बच्चे स्कूल में जा रहे हैं । फिर हमारे हिंदी मीडियम के स्कूल में अधिकतर व्यवसायियों के बच्चे थे जिन्हें बड़ा होकर अपना पैतृक व्यवसाय संभालना था । जबकि नौकरी पेशा पिताओं के बच्चों को यह बात बचपन से मालूम थी कि उन्हें रोजी रोटी का कोई काम विरासत में नहीं मिलेगा और उन्हें भी अपने पिता की तरह नौकरी करनी होगी, इसलिए वे अन्य बच्चों की तुलना में पढाई में भी गंभीर होते थे l अब जाकर  यह स्थिति बदल रही है और व्यवसायियों के बच्चों में से भी कुछ बच्चे डॉक्टर ,इंजिनीयर ,प्रोफ़ेसर आदि बन रहे हैं ।

शरद कोकास 



19 मई 2026

39. सुबह सुबह नहाने का आज़ादी से सम्बन्ध

 

बचपन के शब्दकोष में पर्व का अर्थ है नए कपड़े और मिठाई, जिसके विस्तार में दिवाली और ईद आते हैं । रोचक कथाओं के आलंबन में तीज त्योहारों का उत्साह जन्म लेता है और राष्ट्रीय पर्वों के मनाये जाने की कथा बिना चीनी की दूध रोटी की तरह बेस्वाद लगती है । 

गुरूजी की बेंत के आतंक में होमवर्क की तरह जन गण मन रट लेने की विवशता बचपन में ही प्रश्न करने की आकुलता की हत्या कर देती है । फिर हम जीवन भर तिरंगे के सामने अगरबत्ती लगाकर और नारियल फोड़कर उसे सलाम करते हुए धूप में खड़े खड़े गाने का अभिनय करते हैं और कोई नहीं पूछता था कि इसमें जो लिखा है उसका मतलब क्या है  ? न हम सवाल पूछते हैं न रघुवीर सहाय  की यह पंक्तियाँ पढ़ते हैं .. 

राष्ट्रगीत में भला कौन वह 

भारत-भाग्य विधाता है 

फटा सुथन्ना पहने जिसका  

गुन हरचरना गाता है 

मखमल टमटम बल्लम तुरही 

पगड़ी छत्र चंवर के साथ 

तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर 

जय-जय कौन कराता है 

मैंने भी बड़े होने तक यह सवाल किसी से नहीं पूछा । पंद्रह अगस्त से दो दिन पूर्व ही दूसरी तीसरी कक्षा के बच्चों ने बता दिया था कि यह आज़ादी का दिन है, इस दिन सबको सुबह नहा धोकर झंडा फहराने स्कूल आना है , झंडा फहराने के बाद मिठाई मिलेगी । सुबह सुबह नहाने का आज़ादी से क्या सम्बन्ध है यह मुझे समझ में नहीं आया, रोज़ तो हम स्कूल से आने के बाद नहाते थे । जैनेन्द्र जितेन्द्र ने प्रस्ताव रखा कि रात में सब मिलकर उनके घर पर पढ़ाई करेंगे और सुबह तैयार होकर वहीं से स्कूल चले जायेंगे, नहाये हैं या नहीं नहाये हैं किसे पता चलता है । मैं खुशी खुशी तैयार हो गया । स्वतंत्रता दिवस से मेरा कोई लेना देना नहीं था लेकिन मुफ़्त में मिलने वाली मिठाई मैं छोड़ नहीं सकता था । 

जैनेन्द्र और जितेन्द्र दोनों जुड़वाँ भाइयों के पिता भगत साहब किसी सरकारी विभाग में थे । दोनों से बड़े उनके एक भाई थे जिन्हें बाबा कहकर बुलाते थे । उनसे छोटे दोनों भाइयों के नाम थे  पप्पू  यानि योगेश और संतोष l वे उस समय पुराणकर वकील के यहाँ किराये से रहते थे । बहुत छोटा सा मकान था उनका  एक सामने का कमरा एक बीच का और एक रसोई । इतने छोटे मकान में इतने सारे लोग । लेकिन यह उन दिनों आम बात थी । नए प्रांत में ज़िलों के गठन के बाद बहुत सारे लोग नौकरी के सिलसिले में गांवों से शहर आये थे और उन्हें इसी तरह के छोटे छोटे दड़बे नुमा मकानों में जगह मिली थी । उस समय तनख्वाह भी इतनी नहीं होती थी कि बड़े मकान किराये से लेकर रह सकें । हाँ, जो  लोग वहाँ के स्थाई निवासी थे और संपन्न थे या जिनके पैतृक मकान थे वे अपेक्षाकृत बड़े घरों में रहते थे ।

घर में खाना खिलाकर बाबूजी ने मुझे जैनेन्द्र जितेन्द्र के यहाँ पहुँचा दिया । कुछ देर पढ़ाई का अभिनय करने के पश्चात हम लोग सोने चले गए । जैनेन्द्र जितेन्द्र की माँ ने हम सब बच्चों के लिए बीच के कमरे में ज़मीन पर बिस्तर लगा दिया था । बातें करते हुए सब लोग सो गए, लेकिन मेरी आँखों से नींद नदारद । कुछ देर बाद मुझे कारण समझ में आया कि मुझे बगैर तकिये के नींद नहीं आ रही है । उनके यहाँ किसी की तकिया लगाने की आदत नहीं थी सो मुझे भी तकिया नहीं मिली थी । दरअसल तकिया उनके यहाँ था ही नहीं । 

अनिद्रा की इस स्थिति में मुझे घर की याद सताने लगी और मैंने सुबकना शुरू कर दिया । मेरे रोने से उनके पिताजी की नींद खुल गई । मैंने उन्हें कारण बताया तो उन्होंने समझाने की कोशिश की, तकिये का विकल्प भी रखा लेकिन मेरी एक ही रट थी …घर जाऊँगा । फिर वे उठे चप्पलें पहनी और मुझे घर तक छोड़ने आये । बाबूजी आश्चर्य से गुजरकर गुस्से तक पहुँचे, इससे पहले कि वे मुझे डाँटते मैं गहरी नींद में सो चुका था । 

बड़े होने के बाद एक दिन मैंने उस घटना का विश्लेषण किया कि उस दिन घर जाने की ज़िद के पीछे असल कारण क्या था,घर की याद या तकिया न होना । मुझे तकिये का सम्बन्ध सुविधा की अपेक्षा आदत के अधिक निकट लगा । उस उम्र में इतना विवेक मुझमें नहीं था कि आदतों के साथ समझौता कैसे किया जाता है । कुछ लोगों के भीतर बड़े होने के बाद भी यह विवेक उत्पन्न नहीं होता । मुझे लगता है अगर उस दिन बिना तकिये  के नीन्द आ जाती तो शायद घर की याद नहीं आती ।

अक्सर माता-पिता अपने बच्चों को उनके बचपन से ही सुविधाजीवी बना देते हैं । बच्चों की हर वैध अवैध मांग पूर्ण करना माँ-बाप अपना कर्तव्य समझते हैं । बच्चे भी उस सुविधा को अपना अधिकार समझने लगते हैं और जब उन्हें यह सुविधा प्राप्त नहीं होती  है तो वे विद्रोह कर बैठते हैं । बचपन में उनकी इच्छाएं  पूरी करना माँ-बाप के लिए आसान होता है किन्तु जब उनकी इच्छाएँ बढ़ने लगती हैं तब एक सीमित आय के व्यक्ति के लिए उन्हें पूरा कर पाना आसान नहीं होता । बचपन में अपराध की ओर प्रवृत होने के पीछे यह एक प्रमुख कारण है । बड़े होने के बाद हम सुविधा को आदत करार देते हुए उसे हासिल करने के लिए बहुत सारे अवांछित कार्य भी करते हैं |

विगत सदी के उत्तरार्ध में जन्म लेने वाले बच्चों की इच्छाएँ इतनी बड़ी नहीं हुआ करती थीं जिन्हें पूरा करना मध्यवर्गीय माता - पिता के लिए मुश्किल होता । बच्चों के लिए सबसे महंगा शौक उन दिनों सिनेमा देखना होता था और देर सवेर,रोते झींकते उनकी यह इच्छा पूरी हो ही जाती थी । बच्चों को महंगी या सस्ती ड्रेस का अंतर पता नहीं था फिर रेडीमेड कपड़ों का चलन भी नहीं के बराबर था । माँ बाप द्वारा दिलवाए गये साल के दो ड्रेस काफी थे । घर से बाहर किसी होटल में खाने का चलन भी नहीं था जलेबी,बूंदी,बालूशाही,भजिये ,आलूबोंड़े बेसन और रवे के लड्डू घर में ही बन जाते थे या कभी कभार साप्ताहिक बाज़ार के दिन जो भी सस्ती मिठाई घर में आ जाती थी उसीमे संतोष हो जाता था । 

पंद्रह अगस्त की सुबह जैनेन्द्र जितेन्द्र मुझे लेने घर आ गये । मेरी आँखों में पिछली रात का कोई अपराध बोध नहीं था । रोज़ की तरह हम लोग स्कूल के लिए रवाना हो गए । हमारे प्रधान अध्यापक शिवहरे जी यानि बड़े गुरुजी ने झंडा फहराया । जन गण मन,वन्दे मातरम  से लेकर विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा तक सारे गीत हमने गाए । सिनेमा के गानों से कुछ अलग इन गीतों को गाने का मेरा यह पहला अवसर था । अगली छब्बीस जनवरी तक मैंने सब गीत रट लिए थे । 

मेरी नज़रें मिठाई की तलाश कर रही थीं । मैंने जितेन्द्र से पूछा तो पता चला कि ध्वजारोहण के बाद सब बच्चों को गांधी चौक ले जाया जायेगा । वहाँ से आने के बाद घर जाने से पहले मिठाई मिलेगी । बहुत कठिन शर्त थी इसलिए कुछ बच्चे वहीं से वापस घर चले गए । हम बचे हुए बच्चे जुलूस की शक्ल में गाँधी चौक पहुँचे । वहाँ सफ़ेद कुरता पजामा और गाँधी टोपी पहने एक व्यक्ति द्वारा झंडा फहराया गया । पूछने पर पता चला कि उन्हें नेताजी कहते हैं । ‘अच्छा तो नेता ऐसा दिखाई देता है’ , यह किसी नेता के बारे में मेरे अवचेतन का पहला बिम्ब था । उन दिनों महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी का शासन था और कांग्रेस के नेताओं की यह प्रिय वेशभूषा हुआ कराती थी । वे शायद नगर पालिका के अध्यक्ष या कोई विधान सभा सदस्य रहे होंगे ।  ‘नेताजी’ इस विशेषण में सुभाषचंद्र बोस का बिम्ब मेरे अवचेतन में स्थापित होने से पूर्व भंडारा के उन्ही नेताजी का बिम्ब था ।

नेताजी ने  अपने भाषण में बताया कि आज के दिन हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था इसलिए हम आज स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं । घर आकर मैंने बाबूजी से पूछा “अंग्रेज कैसे दिखाई देते हैं ?” उन्होंने धर्मयुग में छपी एक तस्वीर मुझे दिखाई जिसमे  नेहरू जी और लार्ड माउंटबेटन साथ साथ थे । मैंने रट लिया सैनिक  टोपी वाले अंग्रेज माउंटबेटन और गाँधी टोपी वाले नेहरू जी । बाबूजी ने संक्षेप में आज़ादी की लड़ाई और इतिहास से भी मेरा परिचय कराया था और नागपुर में नेहरूजी से उनकी मुलाकात की घटना भी सुनाई थी । आज़ादी के इतिहास के बारे में यह मेरा पहला पाठ था । 

असली बात तो रह ही गई, स्कूल लौटने के बाद हम भाषण सुनने वाले बच्चों को कांच के एक ग्लास मे चार गुलाब जामुन मिले । पहले वाले बच्चों को सांत्वना पुरस्कार की तरह बूंदी पर ही टरका दिया गया था । कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस का सार यही था ।



17 मई 2026

38.हिंदी प्राथमिक शाला में पढ़ाई की है हमने

हिन्दी प्राथमिक शाला  जो अब नहीं है 
आपने अगर की होगी तो हिंदी के बारे में अवश्य सोचते होंगे । मैं हिन्दी  के बारे में जब भी सोचता हूँ तो हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि केदार नाथ सिंह की  कविता ‘मेरी भाषा के लोग’ मेरे जेहन में गूँजने लगती है ... 

पिछली रात मैंने एक सपना देखा 

कि दुनिया के सारे लोग एक बस में बैठे हैं 

और हिन्दी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ मेरी हिन्दी 

जो अंतिम सिक्के की तरह 

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में   

मेरे बाबूजी श्री जगमोहन कोकास हमेशा के लिए मध्यप्रदेश छोड़कर महाराष्ट्र आ गए थे । उनके पास भी केवल उनकी हिन्दी बच गई थी । हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के अलावा वे प्रयाग से हिन्दी साहित्य रत्न की उपाधि भी प्राप्त कर चुके थे । उनकी कोशिश थी कि उनकी मातृभाषा हिन्दी उनकी अगली पीढ़ी में भी बची रहे इसलिए वे मुझे हिंदी माध्यम की शाला में प्रवेश दिलवाना चाहते थे । मेरे पाँव भी इतने लम्बे हो चुके थे कि अब मैं उन्हें बालक मंदिर की बजाय प्राथमिक शाला  की सीढ़ियों पर रख सकता था ।  

बाबूजी के अलावा भंडारा में ऐसे अनेक लोग थे जिनके पास उनकी हिन्दी बची हुई थी । मध्यप्रदेश की सीमा से लगे होने के कारण शुरू से ही भंडारा में हिंदी भाषियों की संख्या काफी थी । विभाजन के आसपास पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों के पुनर्वास हेतु नगर के अंतिम छोर पर सिन्धी कॉलोनी भी बसाई गई थी । व्यवसायी वर्ग की सिन्धी,पंजाबी,गुजराती आबादी के अलावा यहाँ दो मोहल्ले मुस्लिम बहुल आबादी के भी थे । इन में बहुसंख्य परिवारों के बच्चे मराठी की बजाय हिन्दी उर्दू माध्यम से ही पढाई कर रहे थे । उस समय भंडारा शहर में नगर परिषद गाँधी विद्यालय एकमात्र ऐसा विद्यालय था जहाँ  हिन्दी,मराठी व उर्दू तीनों माध्यमों से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्रदान की जाती थी । 

उन दिनों इस तरह होता था एडमिशन 

बाबूजी ने मेरा दाखिला हिन्दी प्राथमिक शाला में करवा दिया । उन दिनों जन्म प्रमाणपत्र चलन में नहीं थे । यदि कोई बालक या बालिका दायाँ हाथ सर के ऊपर से घुमाकर बायाँ कान पकड़ ले तो उसे प्रवेश का पात्र मान  लिया जाता था । बाबूजी इस शाला में बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज के छात्रों का अभ्यास शिक्षण पाठ देखने जाया करते थे । प्रधान अध्यापक शिवहरे गुरूजी से उनकी अच्छी पहचान थी अतः मुझे यह प्रवेश परीक्षा नहीं देनी पड़ी वर्ना मैं उसमे फेल हो जाता क्योंकि मेरे हाथ कान तक पहुंचते ही नहीं ।  

कक्षा में यस सर कह कर हाजरी देने वाले बच्चों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक ज़माने में ऐसे स्कूल होते थे जहाँ नाम पुकारने पर ‘जी हाजिर गुरूजी’ कहना पड़ता था । हिन्दी मीडियम के यह गुरूजी चौड़े पायचे वाले पायजामे पहनते थे और खादी का कुरता धारण करते थे ।  यद्यपि मेरे प्रायमरी स्कूल में दाखिला लेते समय अनेक गुरूजी पायजामा त्यागकर पैंट शर्ट पहनने लगे थे और उन्हें सर कहलाना अच्छा लगने लगा था ।

यह पुरानी तस्वीर है अब यह इमारत नहीं है 
प्राथमिक शाला की यह तिमंजिली इमारत ब्रिटिश वास्तुशिल्प के अनुसार बनी थी, बीच में एक भव्य हाल,एक मंच और चारों ओर बड़े बड़े कमरे जिनमे कक्षाएँ लगती थीं । यह बीच मे जो दो बड़े द्वार देख रहे हैं इनके ठीक सामने हाल था  और चारों ओर कमरे । 
पानी की टंकी यानी ढोला 1900 मे बना हुआ 
स्कूल के सामने पानी की एक टंकी थी जिसकी दीवार पर संगमरमर का एक पत्थर लगा था । उस पर टंकी के निर्माण वर्ष उन्नीस सौ के उल्लेख के साथ लिखा था यशवंत राव रिज़र्वोयर भंडारा वाटर वर्क्स । इसकी ढोल जैसी आकृति के कारण सब इसे ‘ढोला’ कहते थे इसीलिए हमारा स्कूल भी ‘ढोला स्कूल’ कहलाता था । निचले तल पर मशीनें थीं और ऊपर इस्पात का एक विशाल टैंक जिसकी बाहरी दीवार पर मधुमक्खियों के ढेर सारे छत्ते थे । इन्हें पत्थर मार कर छेड़ने या नीचे आग जलाने की सख्त मनाही थी । 
यह टंकी उपयोग मे नहीं है लेकिन आज भी खड़ी है 2025
टंकी की इमारत के परिसर में एक नल लगा था जिससे चोवीसों घंटे पानी आता था । हम लोग बीच की छुट्टी में पानी पीने यहीं आते थे । स्कूल के सामने ‘उजड़ा चमन’ सा एक गार्डन था जिसमें हिन्दी मीडियम के बदमाश बच्चे छुप छुप कर बीड़ी पिया करते थे । इसी बगीचे में उगी  बेशरम की टहनी गुरूजी की बेंत बनाने के काम आती थी । 

ऊपर की मंज़िल मे एक भूत रहता था  

यद्यपि यह तिमजली इमारत थी लेकिन हम लोगों को केवल दूसरी मंज़िल तक जाने की इज़ाज़त थी । तीसरी मंज़िल के बारे में कहा जाता था कि वहाँ भूख और ग़रीबी से तंग आकर फांसी लगा लेने वाले किसी शिक्षक का भूत रहता है । मेरी भूत देखने की बहुत इच्छा थी लेकिन मेरा कोई दोस्त मेरे साथ वहाँ जाने के लिये तैयार नहीं होता था । हालाँकि बाद में मैंने अपने जैसे कुछ जिज्ञासु बच्चों के साथ  ऊपर जाकर वह मंजिल देख ली थी । पुराने टूटे हुए फर्नीचर के अलावा वहाँ कुछ नहीं था । अंत में सर्वसम्मति से हमने तय किया कि यहाँ कोई भूत नहीं रहता है  । बाद में वैज्ञानिक सोच के एक गुरूजी ने बताया कि बच्चे ऊपर न जाएँ और कोई दुर्घटना न घटित हो इसलिए ऐसी अफवाह फैलाई गई थी । 

बालक मंदिर के दिनों में मोहल्ले के किसी मित्र से भूत यह शब्द सुनकर मैंने बाबूजी से पूछा था “बाबूजी, भूत क्या होता है ?” उन्होंने जवाब दिया था कि “भूत-प्रेत,चुड़ैल जैसा कुछ नहीं होता है , यह केवल मन का वहम है, कल्पना है जो किस्से कहानी में होता है ।“ उस दिन के बाद से मेरे मन में भूत का ख़याल कभी नहीं आया । 

यह वह उम्र होती है जिसमें बच्चे तर्क नहीं करते । उनके अवचेतन में जो बात डाल दी जाए वह जीवन भर स्थायी रहती है जब तक कि सायास उसे हटाने का प्रयास न किया जाए । घृणा, प्रेम, अन्धविश्वास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण , जाति, धर्म की अवधारणा सब इसी उम्र में दिमाग में दाखिल होता है । बड़े होने के बाद हमें चयन करना होता है कौनसी बात हमारे लिए सकारात्मक है और कौनसी नकारात्मक । 

अब स्कूल की इमारत की जगह यह पानी की टंकी है 
ढोला स्कूल की यह इमारत अंग्रेजों द्वारा बनाये गये टाउन हाल का बड़ा रूप थी । अब इस इमारत की जगह पनि कि एक टंकी है जिसका चित्र आप देख सकते हैं ।  वैसे टाउन हाल की इमारत शहर के बीचों बीच थी जिसमें नगर पालिका का दफ़्तर था । अंग्रेज़ों द्वारा निर्मित एक और शाला भंडारा में थी जिसका नाम लॉर्ड मनरो के नाम पर मनरो स्कूल था, जिसे आज़ादी के काफी सालों बाद बदल कर लालबहादुर शास्त्री  विद्यालय कर दिया गया था । यह ईटों से बनी लाल गेरुए रंग की एक इमारत थी ।


मनरो हाईस्कूल अब लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय 
इसी वास्तुशिल्प पर अंग्रेज़ों ने तत्कालीन मध्यप्रांत में अनेक शाला भवनों का निर्माण किया था । शाला भवन के पास अनिवार्य रूप से दो कमरों का एक पुस्तकालय हुआ करता था  । ठीक इसी पैटर्न पर बैतूल में भी शाला भवन और पुस्तकालय एक साथ थे । आश्चर्य यह कि जब मैं नौकरी करने के लिये दुर्ग आया तो मैंने यहाँ  भी इसी तरह अंग्रेज़ों द्वारा एक साथ निर्मित शाला भवन और पुस्तकालय देखे । अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई इमारतों में से आज भी कई इमारतें विद्यमान हैं जो हमारे देश के भृष्ट अधिकारियों व ठेकेदारों के संयुक्त तत्वावधान में बनाई गई इमारतों से कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं ।

जिला ग्रंथालय भंडारा 
प्रायमरी स्कूल का पहला दिन कक्षा के दो जुड़वा भाइयों जैनेन्द्र व जितेन्द्र भगत से दोस्ती का दिन था । दोनों भाई हमारे पड़ोस में ही रहते थे । पहले ही दिन मैंने इस तथ्य को आत्मसात कर लिया कि जैनेन्द्र जितेन्द्र से पाँच मिनट पहले इस दुनिया में आया है इसलिये वह उम्र में बड़ा है , हालाँकि उस वक़्त मुझे यह बिलकुल नहीं पता था कि बच्चे दुनिया में कैसे आते हैं। हमारे समय में इसका अधिकृत उत्तर था “बच्चे भगवान के घर से आते हैं ।“ भगवान का घर पूछने पर हमेशा ऊपर की ओर इशारा कर दिया जाता था । इस सस्पेंस की वज़ह से मैं बहुत दिनों तक आसमान की ओर देखकर सर खुजाता रहा । 
गेट के पीछे यहीं मैदान था जहां अब कमरे बने हैं 
पहले ही दिन स्कूल से लौटते हुए मैंने उन्हें अपना घर दिखा दिया था । उन्होंने कहा कि वे लोग शाम को मुझे लेने आएंगे और अपने घर ले चलेंगे । उनके घर के सामने एक मराठी प्राथमिक शाला थी जिससे लगे मैदान के अंत में एक कच्ची नाली थी जो कीचड़ से लबालब भरी थी । हम लोग मैदान में कुलाटी मारने का खेल खेल रहे थे । मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मैदान में घास की सीमा कहाँ तक है । अंतिम कुलाटी में मैं उस नाली में पहुँच गया और सर से पाँव तक कीचड़ में सराबोर हो गया ।  
इस घर मे रहते थे जैनेन्द्र जितेंद्र 
मेरा वह कीचड़ावतार देखकर सब लोगों ने मेरी हँसी उड़ानी शुरू कर दी । मैं घबरा गया था और मुझे शर्म भी आ रही थी लेकिन कीचड़ के मेकअप के कारण किसी को दिखाई नहीं दे रही थी अतः मैंने ज़ोरों से रोना शुरू कर दिया । रोते हुए ही मैं घर आया । माँ ने कई बाल्टी पानी से रगड़ रगड़ कर मुझे नहलाया और खाना खिलाकर सुला दिया । 

घटना बहुत छोटी सी थी लेकिन इतना सबक मुझे मिल गया था कि यदि हम अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं रखेंगे तो लुढ़ककर कीचड़ में गिर जाने से हमें कोई नहीं बचा सकेगा । यह अनुभव जीवन भर मुझे झूठ,फरेब,धोखे,बेईमानी और अनैतिकता के दलदल में गिरने से बचाता रहा । 

आपका 

शरद कोकास 

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37. धान से लाई ,पोहा और मुरमुरा कैसे बनता है

भंडारा ज़िला ओरायज़ा सैटीवा की खेती के लिए बहुत मशहूर है । आप सोच रहे होंगे यह कौनसी विदेशी फ़सल है । आश्चर्य न करें यह हमारे जाने पहचाने पैडी या एशियाई धान का वानस्पतिक नाम है । धान से बनता है चावल और चावल से जाने कितने व्यंजन बनते हैं ।

धान को भट्टी पर चढ़े कढ़ाव में रेत के संग भून कर भी अनेक खाद्य पदार्थ बनते  हैं जिनमे मुझे सबसे अधिक पसंद है लाई,लावा या खील । बालकमन्दिर से लौटने के बाद शाम को मेरा प्रिय नाश्ता होता था दूध और धान की लाई । भंडारा में धान की खेती होती थी इसलिए चावल सस्ता  था । धान से लाई, मुरमुरा और पोहा बनाने का गृह उद्योग तो सदियों से ग्रामीण संस्कृति का अंग रहा है ।

उन दिनों भंडारा में गाँधी चौक के आगे मेन रोड पर गुप्ता जी की एक दुकान हुआ करती थी जिसमे फुटाणा यानि फूटा हुआ चना, मुरमुरा,लाई, भुनी मूंगफल्ली,भुना मक्का , रेवड़ी आदि मिलते थे । गुप्ता जी उत्तर प्रदेश  के रहने वाले थे और अपने पूरे परिवार के साथ वहीं दुकान के पिछवाड़े रहते थे । उनके घर के पीछे आदर्श टाकीज से लगी हुई गली थी । गुप्ता जी बाबूजी का बहुत सम्मान करते थे इसलिए कि हमारे पुरखे भी यू पी के रहने वाले थे । वे अक्सर कहते “ गुरूजी तो हमारे देस वाले हैं ।“

गुप्ता जी की दुकान में सामने की ओर ढाबे वाली स्टाइल में एक भट्टी बनी थी जिस पर एक बड़ा सा कढ़ाव हल्का सा टेढ़ा कर फिक्स कर दिया गया था । इस में रेत गर्म की जाती थी । धान को भिगोकर सुखाकर फिर गर्म रेत में भूना जाता था जिससे धान खिल जाता और उसके भीतर का चावल का दाना लाई बनकर फूट पड़ता ।

 फिर उसे छान कर रेत से अलग कर लिया जाता । उसी तरह मुरमुरा बनाने के लिए उसना चावल पहले भिगोया जाता फिर उसमे नमक मिलाकर जैसे ही उसे भट्टी की कढ़ाई की गर्म रेत में डाला जाता वह नर्म नाज़ुक कुरकुरा सा मुरमुरा बन जाता । 

धान से पोहा बनाने के लिए उसे साफ किया जाता, फिर पंद्रह सोलह घंटे भिगोकर रखने के बाद भूना जाता । इस भुने हुए धान को लकड़ी के मूसल से कूटने पर पोहा अलग हो जाता था और धान अलग । उस समय तक भंडारा में पोहा मिले स्थापित हो चुकी थीं, वहाँ हाथ से कूटने की बजाय भुने धान से प्रेस मशीन द्वारा पोहा अलग किया जाता था । लेकिन गुप्ता जी के यहाँ हाथ कुटाई वाला पोहा ही मिलता था जो मशीन वाले पोहे की तुलना में अधिक स्वादिष्ट होता था । 

इसी मोटे पोहे को फिर से गर्म रेत में डाल दिया जाता तो उसके फूटने से सकुचाई शरमाई सी चिवड़ी बन जाता । इसी चिवड़ी को तेल में तलकर अन्य वस्तुओं व मसालों के साथ मिलाया जाता तो वह अपना लिंग परिवर्तन कर बाज़ार में मिलने वाला नमकीन चिवड़ा बन जाता । 

गुप्ता जी धान को भिगोने, छाँटने आदि के बाद रोज़ सुबह भट्टी सुलगा देते थे । रेत गर्म होते ही उसमे वे धान डालते,  एक तेज़ लपट धुएँ के साथ ऊपर उठती, गुप्ता जी हाथ में एक बड़ी से छन्नी होती थी जिससे वे गर्म गर्म रेत में फूटते हुए लावे को छानकर निकालते । बाद में मुझे पता चला कि यही भट्टी भाड़ कहलाती है और इस पर धान से लाई या मक्के से पॉप कॉर्न निकालने वाले को भड़भून्जा कहते हैं । भाड़ झोंकना या भाड़ में जाना जैसे मुहावरे  भी इसी भाड़ से बने हैं । 

लाई और दूध के नाश्ते में दूसरा हिस्सा था दूध का । दूध पांढराबोड़ी गाँव के श्री राजाराम गभने लेकर आते थे । राजाराम बाबूजी के प्रिय पात्र थे और जब से बाबूजी भंडारा आये थे दूध देने वही आते थे  । धमनियों में खून की तरह हम लोगों की अंतड़ियों में उन्हीके यहाँ की भैंसों का दूध बहता था । बाबूजी उन्हें बहुत चाहते थे, यहाँ तक कि जब वे अपने स्टूडेंट्स के साथ बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज की शैक्षणिक यात्रा पर भारत भ्रमण के लिये निकले  तब वे राजाराम जी को भी अपने साथ ले गये थे । 

राजाराम जी दूध में चाहे जितना पानी मिलाते , बाबूजी स्नेहवश उन्हें कुछ नहीं कहते थे । अनेक वर्षों बाद माँ के लगातार कहते रहने के बाद उनसे दूध लेना बन्द किया गया । माँ बार बार यही कहती थी कि दूधवाले और सोने के गहने बनाने वाले का कोई भरोसा नहीं होता, वे मिलावट करते ही हैं ।लेकिन बाबूजी माँ की बात पर ध्यान न देकर राजाराम जी पर ही ज़्यादा भरोसा करते थे, समय समय पर उन्हें दूध की कीमत भी बढाकर दिया करते थे । पैसे बढ़ने के बाद राजाराम जी कुछ दिनों तक तो शुद्ध दूध लाते फिर वही ढाक के तीन पात ।  भैंस ज़्यादा पानी पी लेती है इसलिए दूध पतला देती है यह वैज्ञानिक रिसर्च उन्हीके पुरखों ने की थी ।  

हमारे यहाँ दूध का उपयोग चाय बनाने के लिए अधिक होता था । कभी कभार ही हम बच्चों को दूध रोटी या दूध लाई खाने को मिलती थी इसलिए हम लोगों की हड्डियों में कैल्शियम की कमी हमेशा बनी रही । फिर भी हम लोग उन कुपोषित बच्चों से बहुत बेहतर थे जिन्हें दूध पीने को क्या देखने तक को नहीं मिलता था । आज भी देश में बहुत बेहतर स्थिति नहीं है, बल्कि स्थिति पहले से ज़्यादा ख़राब है । शासन की पोषण आहार योजना का सच सबके सामने है । इस योजना के अंतर्गत बच्चों को मिड डे मील के नाम पर केवल खाना पूर्ति की जाती है । इस मिड डे मील में भी क्या मिलता है, सब जानते हैं ।

आपका 

शरद कोकास 


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16 मई 2026

36.उन दिनों बच्चो की खिलौना कार टीन की होती थी


बच्चों की कल्पना की दुनिया में उन दिनों आज की तरह सुपरमन, बैट्समैन, स्पाइडरमैन नहीं हुआ करते थे, ना ही रिमोट कंट्रोल से चलने वाली कार या ड्रोन जैसे आधुनिक खिलौने । हम लोग हड़प्पा मोहनजोदड़ो के बच्चों की परंपरा में मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे और बड़े घर के बच्चों को प्लास्टिक की नन्ही नन्ही कारों और विमानों से खेलता देखकर उनसे रश्क़ करते थे ।

हमसे पहले के बच्चों को तो शायद यह भी नसीब नहीं होता था इसीलिए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में बच्चा अपनी माँ से कहता है 

“ ले देती यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली,
किसी तरह नीचे हो जाती यह कदम्ब की डाली “ 

अच्छा लगता है यह सोचकर कि उन दिनों बांस की बाँसुरी दो पैसे मे आ जाती थी ।  वैसे ध्यान से देखिए इस कविता में प्रयुक्त यह ‘यदि’ शब्द उस समय के मनुष्य की आर्थिक सीमाओं को ,उनकी विवशता को प्रकट करता है । आज का बच्चा होता तो सीधे सीधे कहता ‘ मम्मी,मुझे बाँसुरी ले दो । ‘वैसे इन दिनों के बच्चे बाँसुरी से खेलते कहाँ हैं , उन्हे तो मोबाईल से खेलना अच्छा लगता है । 

उन दिनों मध्यवर्गीय और निमनवर्गीय घरों के बच्चों को महंगे खिलौने नसीब नहीं होते थे । हाँ आज के प्ले स्कूल यानी उन दिनों के बालमन्दिर मे इस तरह थोड़े बहुत खिलौने मिल जाते थे लेकिन कितने बच्चों को बाल मंदिर की यह सुविधा मिलती थी यह बात अलग है । 

बाबूजी कहते थे “घर हमारे निजी संस्कारों की प्रथम पाठशाला है और सामाजिक संस्कारों की प्रथम पाठशाला है हमारा स्कूल ।“ उन दिनों इस विचार का प्रसार कम था इसलिए प्री प्रायमरी ,किंडरगार्टन या बालमंदिर जैसे संस्थान बहुत कम थे । 

फिर आम जनता की जेब में इतने पैसे ही कहाँ होते थे । बमुश्किल वे बच्चों को सरकारी स्कूल में भेज पाते थे जहाँ खेलने के लिए स्याही की दवात और कलम होती थी, जिससे खेलने की सज़ा होती थी,स्कूल में गुरूजी की बेंत और घर में माँ की डांट ।

फिर मुझे इतना महंगा खिलौना कैसे मिला 

एक बार बाबूजी अपने कॉलेज की ट्रिप लेकर कोलकाता गए वहाँ उन्हे पायडल से चलने वाली टीन की एक छोटी सी मोटर कार पसंद आ गई ।  । उन दिनों जब एक मामूली शिक्षक की तनख्वाह ही दो ढाई सौ रुपये हुआ करती थी उस मोटर की कीमत थी तीस रुपये । उच्च मध्यवर्गीय परिवारों के माँ बाप अधिक से अधिक अपने बच्चों को तीन चक्के वाली छोटी साइकल दिलवा दिया करते थे , ऐसी मोटर कार तो कोई नहीं दिलवाता था ऐसे मे बाबूजी मेरे लिए यह खिलौना लेकर आए उस समय तो मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है बाबूजी ने मेरे लिए वाकई यह बहुत बाद काम किया था ,मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी सौगात थी । 
इस कार को पाकर मैं अपने आप को दुनिया का सबसे अमीर बच्चा समझने लगा था । लेकिन मैं जानता था कि मेरे आसपास सब गरीब बच्चे रहते हैं और वे इस तरह की कार ख्वाब मे भी नहीं देख सकते थे इसलिए मैं उन्हे खुशी से यह कार चलाने देता था । मोहल्ले के सारे नन्हे बच्चे ‘ ए चलाने दो ना ‘ की रिक्वेस्ट के साथ कभी मुफ़्त और कभी चॉकलेट या पिपरमिंट की गोली के एवज में इस कार को चलाने का आनंद ले ही लेते थे । एक बार बैतूल से बिन्नू भैया आए तो कुछ समय के लिए कार का मालिकाना हक उन्हे मिल गया ।

मेरी मोटर ज़रा स्पेशल थी । कुछ समय बाद योगेश काले मामा ने उसे खूबसूरती से पेंट कर दिया , दरवाज़े की साइड में एक गोले के भीतर लिखा SJK यानि शरद जगमोहन कोकास और दूसरी ओर ‘शरद ट्रांसपोर्ट’ । उन दिनों इस तरह की मोटर का चलन नहीं था, फिर भंडारा जैसी छोटी जगह में तो यह और भी दुर्लभ वस्तु थी, सो मेरी मोटर भी लोगों के लिये आकर्षण का केन्द्र बन गई थी । काले मामा ने इस कार के साथ मेरी फ़ोटो भी बहुत खींची 
कार में लगा रबर का भोंपू बजाते हुए, पायडल से कार चलते हुए मैं सारे शहर में घूमता था । बच्चे तो बच्चे बड़े भी उसे एक अजूबे की तरह देखा करते थे । सपाट सड़क पर तो यह मोटर अच्छी चलती थी लेकिन चक्के के गड्ढे में पहुँच जाने के बाद उसे उतरकर धक्का देना पड़ता था । हाँ कभी कभी सांड या कोई गाय उसकी खच खच की आवाज़ से आकर्षित होकर शरारत की निगाहों से उसे देखने लगते तब उन्हें भगाने के लिए किसी न किसी को आवाज़ देनी पड़ती थी ।

इस मोटर की सवारी मैंने बस उतने ही दिनों तक की जब तक मेरे पांव छोटे रहे , पांवों की लम्बाई बढ़ते ही मोटर ने मुझे उसमे बैठने से मना कर दिया ।वैसे भी तब तक मेरे छोटे बहन भाई उसका मालिकाना हक़ लेने के लिए तैयार हो चुके थे । आश्चर्य की बात यही कि इतने बरसों में फिर कभी मैंने किसी बच्चे के पास उस तरह की टीन की मोटर कार नहीं देखी । हालांकि अब ऐसी कारें आने लगी हैं लेकिन वे पायडल से नहीं बल्कि बैटरी से या इलेक्ट्रिक से चलती हैं ऐसी ही एक कार का चित्र देखिए 

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