पिछले एपिसोड मे आपने पढ़ा कि बीड़ी किस तरह से बनाई जाती है , कैसे सामान का वितरण होता है और उसके बाद फिर एक व्यक्ति घर घर पहुंचता है बीड़ी के बंडल इकट्ठा करने के लिए ।
यहाँ से प्रारंभ होती है बीड़ी कामगार के शोषण की अनकही गाथा ।
बीड़ी के बण्डल जमा करने वाला दीवान या मुनीम नामक व्यक्ति मजदूर से सीधे सीधे बण्डल नहीं लेता था पहले वह जाँच करता था कि बीड़ी ठीक से बने गई है या नहीं इस प्रक्रिया को छंटनी कहते थे । वह हर बण्डल की बीड़ियाँ गिनकर उसे खोलता फिर यह देखने के लिए कि बीड़ी में तम्बाकू निर्धारित मात्र में भरा गया है या नहीं,
वह हर बीड़ी को उसी तरह टटोलकर देखता है जैसे कसाई जानवर को टटोलकर उसके भीतर का मांस देखता है ।
फिर वह उंगली से बीड़ी की लम्बाई नापता कि वह स्टैण्डर्ड साइज़ से छोटी या बड़ी तो नहीं बनी है । यह भी देखना होता था कि धागा ठीक से लपेटा गया है या नहीं, या बीड़ी का मुँह ठीक से बंद है या नहीं । छंटाई करने वाला यह व्यक्ति इन मापदंडों पर खरी न उतरने वाली बीड़ीयों को बेरहमी से एक ओर फेंकता जाता था ।
मजदूर फेंकी हुई उन बीड़ियों की ओर इस तरह देखते जैसे सरकारी कारिंदे द्वारा उनकी झोपडी से सामान निकालकर फेंका जा रहा हो । हर बीड़ी के साथ उनके मेहनत, उनकी खुशी और मेहनत से कमाई उनके बच्चों की रोटी भी घूरे के ढेर पर फेंक दी जाती ।
देखने में यह क्वालिटी कंट्रोल की एक सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया लगती है लेकिन इसमें कई पेंच हैं। इन दरोगाओं के पास शोषण के अलिखित कानून थे । इन्हीमे एक व्यक्ति वह होता जो दी गई तम्बाकू और बनाई गई बीड़ी के अनुपात को परखता था और मजदूर पर इलज़ाम लगा देता कि तुम्हे तो इतनी तम्बाकू दी गई थी फिर इतनी कम बीड़ियाँ कैसे बनी ?
मजदूर के पास कोई जवाब नहीं होता था । वह तो ठीक से देखकर, तुलवाकर तम्बाकू और पत्ते ले गया था फिर कम कैसे पड़ गया ? हालाँकि बाद में उसे यह बात समझ में आने लगी कि कहीं कुछ गड़बड़ हुई है । ज़ाहिर है एक हज़ार बीड़ी के लिए लगने वाला आठ सौ ग्राम तेंदू पत्ता और साढ़े तीन सौ ग्राम तम्बाकू वितरण करने वाले द्वारा उसे ठीक से तौलकर नहीं दिया गया था ।
मजदूर को दी जानेवाली तम्बाकू को कम तौलकर अपना फायदे के लिए चोरी करने वाला यह व्यक्ति इस सत्य को जानता था कि ऊपर से कोई भगवान उसकी यह बदमाशी नहीं देख रहा है इसलिए वह धड़ल्ले से चोरी करता था लेकिन मारा जाता था ग़रीब मजदूर ।
बीच का यह व्यक्ति कई बार उन्ही के बीच का व्यक्ति होता था लेकिन हम जानते हैं कि लोभ,लालच और परपीड़क प्रवृत्ति कुछ लोगों में होती ही है, वे लाभ के लिए अपने पराये जैसी धारणा में विश्वास नहीं करते । तत्कालीन अंग्रेज़ शासक राज करने के लिए मनुष्य के इस स्वभाव का कैसा उपयोग कर रहे थे सब बेहतर जानते हैं ।
मेहनतकश बीड़ी कामगार ग़रीब अवश्य थे लेकिन वे बेइमान नहीं थे । वे अभावग्रस्त अवश्य थे लेकिन चोर नहीं थे । वे इतने अनुभवी थे कि जानते थे, तम्बाकू की कितनी मात्रा में कितनी बीड़ियाँ बनती हैं । लेकिन सब जानते बूझते भी वे कुछ नहीं कर सकते थे । कभी कभी वे कम मात्रा में दी गई तम्बाकू में ही तय संख्या में बीड़ियाँ बनाने का प्रयास करते परिणाम स्वरूप हर बीड़ी में तम्बाकू की मात्रा कुछ कम हो जाती । इस अपराध में उनकी बनाई हुई तमाम बीड़ियाँ न केवल रिजेक्ट कर दी जातीं बल्कि तम्बाकू और पत्ते के नुकसान का पैसा भी उनकी मजदूरी से काट लिया जाता ।
जबकि वे अच्छी तरह जानते थे कि इतने मामूली नुक्स के लिए इतनी बीड़ियाँ रिजेक्ट नहीं की जा सकतीं ।
वे जानते थे कि उनकी ज़रा सी नज़र चूकते ही मामूली नुक्स वाली बीडियों के साथ सही सही बीड़ियाँ भी अलग कर दी गई हैं । वे यह भी जानते थे कि उनके चले जाने के बाद अलग की गई अधिकांश बीड़ियाँ बण्डल में बाँध कर भट्टी में पकाने के लिए भेज दी जायेंगी और कागज़ के खूबसूरत पैकेटों में लपेटकर उन्हें बाज़ारों में भेज दिया जायेगा । बस उन पर उनके हाथों का श्रम दर्ज नहीं होगा और इसलिए उनका मेहनताना भी उन्हें नहीं मिलेगा । यह सारा अधिशेष मूल्य उन दारोगाओं की अतिरिक्त कमाई अथवा उनके मालिकों के मुनाफ़े में शामिल हो जायेगा ।
मजदूरी के भुगतान वाली खिड़की से अपनी मजदूरी का भुगतान लेते हुए रुख्मनी बाई फटे आंचल से अपना सर ढंकती है, लक्ष्मी आने वाली है ना घर में ।
वह जानती है कि रोज़ खाना पकाने, घर की साफ़ सफाई करने, बच्चों की और बुजुर्गों की देखभाल करने जैसे ढेरों कामों के साथ साथ इतनी मेहनत से बनाई गई हज़ार बीडियों में से चार सौ से अधिक बीड़ियाँ रिजेक्ट कर दी गईं हैं । उसे पता है कि अपनी रातों की नींदें कुर्बान कर देने के बाद बनाई गई इन हज़ार बीड़ियों पर जो चार आने मेहनताना उसे मिलना था वह अब केवल ढाई आना ही मिलेगा । उसे यह भी पता है कि ढाई आने में इतना चावल बिलकुल नहीं आएगा जिससे वह अपने बच्चों का पेट भर सके ।
बरसों बरस यह सिलसिला चलता रहा, मजदूर ग़रीब से और ज़्यादा ग़रीब होते गए । वहीं कारखानों के मालिक और उनके कारिंदे संपन्न हो रहे थे ।
एक स्वाभाविक सा प्रश्न मन में उठता है , तो क्या रुख्मनी बाई को और उसके जैसी तमाम महिलाओं को अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध कभी विद्रोह करने का ख्याल नहीं आया ? ऐसा हुआ, लेकिन उसके लिए समय लगा । इसे जानने के लिए हमें भंडारा, नागपुर और आसपास के क्षेत्रों के बीड़ी उद्योग की पृष्ठभूमि को संक्षेप में समझना होगा । अब यह कारखानेदार द्वारा मजदूरों को काम देकर उन पर अहसान करने जैसी कोई बात नहीं रह गई थी । देश धीरे धीरे आज़ाद होने की ओर बढ़ रहा था और जन मानस भी । गाँधी, नेहरू, डॉ.आंबेडकर जैसे लोग देशवासियों की गरिमा और उनके उत्थान के लिए प्रयत्नशील थे ।
भंडारा ज़िले में बीड़ी निर्माण की शुरुआत बहुत मामूली स्तर पर सन उन्नीस सौ बीस के आसपास हुई थी । भंडारा वन सम्पदा से समृद्ध था और जंगल तेंदू के वृक्षों से भरे पड़े थे । तेंदू पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने के लिए हो सकता है यह हिकमत आदिम जनजातियों को ज्ञात थी ।
अमेरिका की कुछ जनजातियाँ भी तम्बाकू को पत्ते में लपेटकर पीने की कला जानती थीं । इंग्लैण्ड में यह तम्बाकू सिगरेट के रूप में कागज़ में लपेटा जाता था अथवा पाइप के माध्यम से पिया जाता था । सिगार भी तम्बाकू के सूखे या किण्वित पत्ते को ही कसकर लपेटकर बनाया जाता था ।
तेंदू पत्ते में तम्बाकू लपेटकर पीने का यह हुनर देखने के बाद, भारत में तेंदू पत्ते व तम्बाकू की उपलब्धता के आधार पर अंग्रेज़ों द्वारा इस उद्योग में मामूली रूचि ली गई । तम्बाकू व बीड़ी का उत्पादन उनके लिए भी मुनाफ़े की चीज़ था लेकिन उससे ज़्यादा मुनाफ़े के कम उनके पास पहले से थे इसलिए भंडारा ज़िले में सदी के प्रारंभ में गुजरात से आये अधिकांश व्यवसाइयों ने यह व्यवसाय संभाला ।
बीड़ी बनने की यह प्रक्रिया तेंदू पत्ते की तुड़ाई से प्रारंभ होती है ।
जंगल के आदिवासी हरे तेंदू पत्ते तोड़ते थे, उन्हें सुखाते थे और बीड़ी बनवाने वाले ठेकेदारों को बेच देते थे । अप्रेल माह से तेंदू पत्ता तोड़ने का यह कार्य प्रारंभ हो जाता जो सारी गर्मियों तक चलता । गर्मी के दिनों में यह काम बहुत तेज़ी से होता था इसलिए कि धूप में तेंदू पत्ता जल्दी सूखता है । बाद में जंगल ठेके से दिए जाने लगे और आदिवासियों को तेंदू पत्ता तोड़ने के बदले मजदूरी का भुगतान किया जाने लगा ।
आदिवासी अब उन जंगलों के मालिक नहीं थे ।
धीरे धीरे यह एक उद्योग का रूप लेता गया । उस समय तक अन्य उद्योगों में भी मशीनों का अविर्भाव नहीं हुआ था । तेंदू पत्ता तोड़ने से लेकर बीड़ी बनाने तक यह काम मनुष्य ही कर सकते थे और इसके लिए बहुत सस्ती मजदूरी पर लोग उपलब्ध थे ।
भंडारा ज़िले में अधिकांश अनुसूचित जाति के बीड़ी कामगारों द्वारा बीड़ी बनाना शुरू किया गया । अनुसूचित जातियों के अंतर्गत भी अनेक जातियां और उपजातियां आती थीं जिनके सदियों से चले आ रहे उनके अपने घरेलू उद्योग और व्यवसाय थे जिनमे चर्मोद्योग, वाद्ययंत्र निर्माण एवं वादन और मांस का उत्पादन तथा व्यवसाय प्रमुख था, यद्यपि इनकी संख्या बहुत कम होती थी लेकिन गाँव की आवश्यकता के अनुसार पर्याप्त होती थी ।
ग्रामीण क्षेत्रों में एक वृहत समाज ऐसा भी था जिनके पास छोटी मोटी कास्तकारी या कृषि कार्य जैसा भी कोई काम नहीं था । वे ज़मींदारों अथवा सवर्णों के यहाँ बेगारी करते, उनके खेतों में मजदूरी करते और उसके बदले जो कुछ भी उन्हें मिल जाता स्वीकार कर लेते । यहाँ न केवल उनके श्रम का शोषण होता था अपितु जाति के नाम पर भी उनके साथ पशुवत व्यवहार भी होता था । ऐसे लोगों के लिए बीड़ी उद्योग का खुलना एक राहत थी । सबसे पहले स्थानीय स्तर पर बीड़ी बनाने का काम इन्ही लोगों द्वारा प्रारंभ किया गया ।
इसी बीच भंडारा और आसपास के क्षेत्रों यथा कामठी, तिरोडा,तुमसर, आमगाँव, सालेकसा, गोंदिया आदि स्थानों पर बीड़ी कारखाने खुलने लगे । मालिकों को मजदूरी की सस्ती दर पर कामगार चाहिए थे और इन बेरोजगारों को काम । ऐसे समय बीड़ी बनाने का काम इन असहाय लोगों के जीवन में एक वरदान की तरह उपस्थित हुआ ।
इस कार्य में विशेष बात यह थी कि न केवल पुरुष या महिलाएँ बल्कि थोड़े से प्रयास से घर के बच्चे भी बीड़ी बनाने का काम कर सकते थे ।
इस तरह थोड़ी ही सही घर चलाने लायक आमदनी तो हो ही जाती थी । बीड़ी कारखानेदारों द्वारा उन्हें रोजगार देकर इस स्थिति से उबारा गया यह अच्छी बात थी लेकिन आगे चलकर उनकी यही विवशता उनके शोषण का मुख्य कारण बन गई । वे इतने मजबूर थे कि काम बंद करने या काम छोड़ देने की धमकी भी नहीं दे सकते थे । बीड़ी कारखाने वालों का अत्याचार इतना बढ़ गया कि वे उनकी पूरी की पूरी बीड़ियाँ रिजेक्ट कर देते थे और कई बार अपनी दिन भर की मेहनत ठेकेदारों या मालिकों को सौंप देने के बाद भी उन्हें कारखाने से खाली हाथ लौटना पड़ जाता था ।
जुर्माने के बदले उन्हें अगली बार मुफ़्त में काम करके देना होता था ।
फिर केवल आर्थिक शोषण होता तो बात और थी । इन बीड़ी कामगारों, स्त्रियों और बच्चों से यह कारखानेदार,ठेकेदार अपनी हवेलियों में बेगार भी करवाते थे । उन्हें ज़रा सी ग़लती के लिए पीटा जाता था , भोजन की व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी होती थी, अगर उन्हें भोजन दिया भी जाता तो केवल इतना ही कि वे जीवित रह सकें । वे अपने बच्चों के पढ़ने लिखने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे । जिन नन्हे हाथों में अभी ढंग से भात का कौर पकड़ने की क़ाबलियत नहीं थी उनमे जबरन बीड़ी के पत्ते और तम्बाकू थमा दिया जाता था ।
कारखानों के भीतर बसे बागीचों के सूनेपन में देर रात तक बहने वाली गर्म हवायें किसी मासूम के मुँह से निकली बेबस चीखों की गवाह बन जाती थीं लेकिन वे खुद खामोश होती थीं । इंसान के मुखौटे में कौनसा दरिंदा कहाँ विचरण कर रहा है कुछ पता नहीं चलता था ।
हल्का सा विरोध करने वाले का पता ही नहीं चलता था कि वह कहाँ गया । कारखानेदारों की शह पाकर उनके यहाँ उच्च पदों पर काम करने वाले उनके मुलाजिम इस काम में पीछे नहीं थे ।
भविष्य की हिंदी फिल्मों में आनेवाले ‘मजदूरी के पैसे लेने के लिए लाइन में खड़ी युवा मजदूर स्त्री को मजदूरी का भुगतान करते समय वासना भरी निगाहों से चश्मे के ऊपर से घूरता हुआ मुनीम’ जैसे दृश्य का आधार यहाँ तैयार हो रहा था ।
लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब पानी सर से ऊपर हो गया ।
दमन की चक्की जो इन विवश इंसानों की पीस रही थी उसके पाटों को इन ग़रीब कामगारों के मजबूत हाथों ने रोक दिया । उनमे इतनी चेतना आ गई थी कि वे अपने शोषण को जान रहे थे ।
अब्राहम लिंकन ने कहा है कि गुलाम को उसकी गुलामी का अहसास दिला दो तो वह बाग़ी हो जाता है । स्पार्टकस हर युग में हर कौम में जन्म लेते हैं ।
लगभग दस पंद्रह साल तक अपनी पीठ पर अत्याचार के कोड़ों की मार झेलने के पश्चात आखिर सन उन्नीस सौ तीस में बीड़ी कामगारों ने विद्रोह का बिगुल फूंका और प्रथम बीड़ी कामगार आन्दोलन की शुरुआत हुई । इस विद्रोह की शुरुआत करने का श्रेय भंडारा के निकट तिरोडा नामक स्थान के गोरेगाँव के बीड़ी कामगारों को दिया जाता है । यहाँ मूलजी भाई का बीड़ी कारखाना था ।
यह मूलजी भाई वही थे जो उन्नीस सौ बावन के भंडारा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से चुनाव जीतने वाले चतुर्भुज जसानी के साथी थे । जसानी इसी बीड़ी कंपनी में भागीदार थे और कंपनी की बीड़ियों की भारतीय सेना में आपूर्ति के कारण भारी मुनाफ़ा कमा रहे थे ।
भंडारा के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं कि इसी आधार पर उनकी शिकायत की गई थी और कोर्ट ने वह चुनाव रद्द कर दिया था जिसकी वज़ह से भंडारा में उन्नीस सौ चौवन में उपचुनाव करवाने की नौबत आई थी । यह वही चुनाव था जिसमे बाबासाहेब कांग्रेस के प्रत्याशी से हार गए थे । बीड़ी कारखानेदारों उनके चाटुकारों और राजनीतिज्ञों के गठबंधन का इतिहास भंडारा ज़िले में बहुत पुराना है । लेकिन उससे भी अधिक पुराना इतिहास विश्व में मनुष्य के शोषण और उसके प्रतिकार का है ।
शरद कोकास






















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