17 मई 2026

38.हिंदी प्राथमिक शाला में पढ़ाई की है हमने

हिन्दी प्राथमिक शाला  जो अब नहीं है 
आपने अगर की होगी तो हिंदी के बारे में अवश्य सोचते होंगे । मैं हिन्दी  के बारे में जब भी सोचता हूँ तो हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि केदार नाथ सिंह की  कविता ‘मेरी भाषा के लोग’ मेरे जेहन में गूँजने लगती है ... 

पिछली रात मैंने एक सपना देखा 

कि दुनिया के सारे लोग एक बस में बैठे हैं 

और हिन्दी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस हवा में गायब हो गई

और मेरे पास बच गई सिर्फ मेरी हिन्दी 

जो अंतिम सिक्के की तरह 

हमेशा बच जाती है मेरे पास

हर मुश्किल में   

मेरे बाबूजी श्री जगमोहन कोकास हमेशा के लिए मध्यप्रदेश छोड़कर महाराष्ट्र आ गए थे । उनके पास भी केवल उनकी हिन्दी बच गई थी । हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर के अलावा वे प्रयाग से हिन्दी साहित्य रत्न की उपाधि भी प्राप्त कर चुके थे । उनकी कोशिश थी कि उनकी मातृभाषा हिन्दी उनकी अगली पीढ़ी में भी बची रहे इसलिए वे मुझे हिंदी माध्यम की शाला में प्रवेश दिलवाना चाहते थे । मेरे पाँव भी इतने लम्बे हो चुके थे कि अब मैं उन्हें बालक मंदिर की बजाय प्राथमिक शाला  की सीढ़ियों पर रख सकता था ।  

बाबूजी के अलावा भंडारा में ऐसे अनेक लोग थे जिनके पास उनकी हिन्दी बची हुई थी । मध्यप्रदेश की सीमा से लगे होने के कारण शुरू से ही भंडारा में हिंदी भाषियों की संख्या काफी थी । विभाजन के आसपास पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों के पुनर्वास हेतु नगर के अंतिम छोर पर सिन्धी कॉलोनी भी बसाई गई थी । व्यवसायी वर्ग की सिन्धी,पंजाबी,गुजराती आबादी के अलावा यहाँ दो मोहल्ले मुस्लिम बहुल आबादी के भी थे । इन में बहुसंख्य परिवारों के बच्चे मराठी की बजाय हिन्दी उर्दू माध्यम से ही पढाई कर रहे थे । उस समय भंडारा शहर में नगर परिषद गाँधी विद्यालय एकमात्र ऐसा विद्यालय था जहाँ  हिन्दी,मराठी व उर्दू तीनों माध्यमों से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्रदान की जाती थी । 

उन दिनों इस तरह होता था एडमिशन 

बाबूजी ने मेरा दाखिला हिन्दी प्राथमिक शाला में करवा दिया । उन दिनों जन्म प्रमाणपत्र चलन में नहीं थे । यदि कोई बालक या बालिका दायाँ हाथ सर के ऊपर से घुमाकर बायाँ कान पकड़ ले तो उसे प्रवेश का पात्र मान  लिया जाता था । बाबूजी इस शाला में बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज के छात्रों का अभ्यास शिक्षण पाठ देखने जाया करते थे । प्रधान अध्यापक शिवहरे गुरूजी से उनकी अच्छी पहचान थी अतः मुझे यह प्रवेश परीक्षा नहीं देनी पड़ी वर्ना मैं उसमे फेल हो जाता क्योंकि मेरे हाथ कान तक पहुंचते ही नहीं ।  

कक्षा में यस सर कह कर हाजरी देने वाले बच्चों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक ज़माने में ऐसे स्कूल होते थे जहाँ नाम पुकारने पर ‘जी हाजिर गुरूजी’ कहना पड़ता था । हिन्दी मीडियम के यह गुरूजी चौड़े पायचे वाले पायजामे पहनते थे और खादी का कुरता धारण करते थे ।  यद्यपि मेरे प्रायमरी स्कूल में दाखिला लेते समय अनेक गुरूजी पायजामा त्यागकर पैंट शर्ट पहनने लगे थे और उन्हें सर कहलाना अच्छा लगने लगा था ।

यह पुरानी तस्वीर है अब यह इमारत नहीं है 
प्राथमिक शाला की यह तिमंजिली इमारत ब्रिटिश वास्तुशिल्प के अनुसार बनी थी, बीच में एक भव्य हाल,एक मंच और चारों ओर बड़े बड़े कमरे जिनमे कक्षाएँ लगती थीं । यह बीच मे जो दो बड़े द्वार देख रहे हैं इनके ठीक सामने हाल था  और चारों ओर कमरे । 
पानी की टंकी यानी ढोला 1900 मे बना हुआ 
स्कूल के सामने पानी की एक टंकी थी जिसकी दीवार पर संगमरमर का एक पत्थर लगा था । उस पर टंकी के निर्माण वर्ष उन्नीस सौ के उल्लेख के साथ लिखा था यशवंत राव रिज़र्वोयर भंडारा वाटर वर्क्स । इसकी ढोल जैसी आकृति के कारण सब इसे ‘ढोला’ कहते थे इसीलिए हमारा स्कूल भी ‘ढोला स्कूल’ कहलाता था । निचले तल पर मशीनें थीं और ऊपर इस्पात का एक विशाल टैंक जिसकी बाहरी दीवार पर मधुमक्खियों के ढेर सारे छत्ते थे । इन्हें पत्थर मार कर छेड़ने या नीचे आग जलाने की सख्त मनाही थी । 
यह टंकी उपयोग मे नहीं है लेकिन आज भी खड़ी है 2025
टंकी की इमारत के परिसर में एक नल लगा था जिससे चोवीसों घंटे पानी आता था । हम लोग बीच की छुट्टी में पानी पीने यहीं आते थे । स्कूल के सामने ‘उजड़ा चमन’ सा एक गार्डन था जिसमें हिन्दी मीडियम के बदमाश बच्चे छुप छुप कर बीड़ी पिया करते थे । इसी बगीचे में उगी  बेशरम की टहनी गुरूजी की बेंत बनाने के काम आती थी । 

ऊपर की मंज़िल मे एक भूत रहता था  

यद्यपि यह तिमजली इमारत थी लेकिन हम लोगों को केवल दूसरी मंज़िल तक जाने की इज़ाज़त थी । तीसरी मंज़िल के बारे में कहा जाता था कि वहाँ भूख और ग़रीबी से तंग आकर फांसी लगा लेने वाले किसी शिक्षक का भूत रहता है । मेरी भूत देखने की बहुत इच्छा थी लेकिन मेरा कोई दोस्त मेरे साथ वहाँ जाने के लिये तैयार नहीं होता था । हालाँकि बाद में मैंने अपने जैसे कुछ जिज्ञासु बच्चों के साथ  ऊपर जाकर वह मंजिल देख ली थी । पुराने टूटे हुए फर्नीचर के अलावा वहाँ कुछ नहीं था । अंत में सर्वसम्मति से हमने तय किया कि यहाँ कोई भूत नहीं रहता है  । बाद में वैज्ञानिक सोच के एक गुरूजी ने बताया कि बच्चे ऊपर न जाएँ और कोई दुर्घटना न घटित हो इसलिए ऐसी अफवाह फैलाई गई थी । 

बालक मंदिर के दिनों में मोहल्ले के किसी मित्र से भूत यह शब्द सुनकर मैंने बाबूजी से पूछा था “बाबूजी, भूत क्या होता है ?” उन्होंने जवाब दिया था कि “भूत-प्रेत,चुड़ैल जैसा कुछ नहीं होता है , यह केवल मन का वहम है, कल्पना है जो किस्से कहानी में होता है ।“ उस दिन के बाद से मेरे मन में भूत का ख़याल कभी नहीं आया । 

यह वह उम्र होती है जिसमें बच्चे तर्क नहीं करते । उनके अवचेतन में जो बात डाल दी जाए वह जीवन भर स्थायी रहती है जब तक कि सायास उसे हटाने का प्रयास न किया जाए । घृणा, प्रेम, अन्धविश्वास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण , जाति, धर्म की अवधारणा सब इसी उम्र में दिमाग में दाखिल होता है । बड़े होने के बाद हमें चयन करना होता है कौनसी बात हमारे लिए सकारात्मक है और कौनसी नकारात्मक । 

अब स्कूल की इमारत की जगह यह पानी की टंकी है 
ढोला स्कूल की यह इमारत अंग्रेजों द्वारा बनाये गये टाउन हाल का बड़ा रूप थी । अब इस इमारत की जगह पनि कि एक टंकी है जिसका चित्र आप देख सकते हैं ।  वैसे टाउन हाल की इमारत शहर के बीचों बीच थी जिसमें नगर पालिका का दफ़्तर था । अंग्रेज़ों द्वारा निर्मित एक और शाला भंडारा में थी जिसका नाम लॉर्ड मनरो के नाम पर मनरो स्कूल था, जिसे आज़ादी के काफी सालों बाद बदल कर लालबहादुर शास्त्री  विद्यालय कर दिया गया था । यह ईटों से बनी लाल गेरुए रंग की एक इमारत थी ।


मनरो हाईस्कूल अब लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय 
इसी वास्तुशिल्प पर अंग्रेज़ों ने तत्कालीन मध्यप्रांत में अनेक शाला भवनों का निर्माण किया था । शाला भवन के पास अनिवार्य रूप से दो कमरों का एक पुस्तकालय हुआ करता था  । ठीक इसी पैटर्न पर बैतूल में भी शाला भवन और पुस्तकालय एक साथ थे । आश्चर्य यह कि जब मैं नौकरी करने के लिये दुर्ग आया तो मैंने यहाँ  भी इसी तरह अंग्रेज़ों द्वारा एक साथ निर्मित शाला भवन और पुस्तकालय देखे । अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गई इमारतों में से आज भी कई इमारतें विद्यमान हैं जो हमारे देश के भृष्ट अधिकारियों व ठेकेदारों के संयुक्त तत्वावधान में बनाई गई इमारतों से कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं ।

जिला ग्रंथालय भंडारा 
प्रायमरी स्कूल का पहला दिन कक्षा के दो जुड़वा भाइयों जैनेन्द्र व जितेन्द्र भगत से दोस्ती का दिन था । दोनों भाई हमारे पड़ोस में ही रहते थे । पहले ही दिन मैंने इस तथ्य को आत्मसात कर लिया कि जैनेन्द्र जितेन्द्र से पाँच मिनट पहले इस दुनिया में आया है इसलिये वह उम्र में बड़ा है , हालाँकि उस वक़्त मुझे यह बिलकुल नहीं पता था कि बच्चे दुनिया में कैसे आते हैं। हमारे समय में इसका अधिकृत उत्तर था “बच्चे भगवान के घर से आते हैं ।“ भगवान का घर पूछने पर हमेशा ऊपर की ओर इशारा कर दिया जाता था । इस सस्पेंस की वज़ह से मैं बहुत दिनों तक आसमान की ओर देखकर सर खुजाता रहा । 
गेट के पीछे यहीं मैदान था जहां अब कमरे बने हैं 
पहले ही दिन स्कूल से लौटते हुए मैंने उन्हें अपना घर दिखा दिया था । उन्होंने कहा कि वे लोग शाम को मुझे लेने आएंगे और अपने घर ले चलेंगे । उनके घर के सामने एक मराठी प्राथमिक शाला थी जिससे लगे मैदान के अंत में एक कच्ची नाली थी जो कीचड़ से लबालब भरी थी । हम लोग मैदान में कुलाटी मारने का खेल खेल रहे थे । मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मैदान में घास की सीमा कहाँ तक है । अंतिम कुलाटी में मैं उस नाली में पहुँच गया और सर से पाँव तक कीचड़ में सराबोर हो गया ।  
इस घर मे रहते थे जैनेन्द्र जितेंद्र 
मेरा वह कीचड़ावतार देखकर सब लोगों ने मेरी हँसी उड़ानी शुरू कर दी । मैं घबरा गया था और मुझे शर्म भी आ रही थी लेकिन कीचड़ के मेकअप के कारण किसी को दिखाई नहीं दे रही थी अतः मैंने ज़ोरों से रोना शुरू कर दिया । रोते हुए ही मैं घर आया । माँ ने कई बाल्टी पानी से रगड़ रगड़ कर मुझे नहलाया और खाना खिलाकर सुला दिया । 

घटना बहुत छोटी सी थी लेकिन इतना सबक मुझे मिल गया था कि यदि हम अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं रखेंगे तो लुढ़ककर कीचड़ में गिर जाने से हमें कोई नहीं बचा सकेगा । यह अनुभव जीवन भर मुझे झूठ,फरेब,धोखे,बेईमानी और अनैतिकता के दलदल में गिरने से बचाता रहा । 

आपका 

शरद कोकास 

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37. धान से लाई ,पोहा और मुरमुरा कैसे बनता है

भंडारा ज़िला ओरायज़ा सैटीवा की खेती के लिए बहुत मशहूर है । आप सोच रहे होंगे यह कौनसी विदेशी फ़सल है । आश्चर्य न करें यह हमारे जाने पहचाने पैडी या एशियाई धान का वानस्पतिक नाम है । धान से बनता है चावल और चावल से जाने कितने व्यंजन बनते हैं ।

धान को भट्टी पर चढ़े कढ़ाव में रेत के संग भून कर भी अनेक खाद्य पदार्थ बनते  हैं जिनमे मुझे सबसे अधिक पसंद है लाई,लावा या खील । बालकमन्दिर से लौटने के बाद शाम को मेरा प्रिय नाश्ता होता था दूध और धान की लाई । भंडारा में धान की खेती होती थी इसलिए चावल सस्ता  था । धान से लाई, मुरमुरा और पोहा बनाने का गृह उद्योग तो सदियों से ग्रामीण संस्कृति का अंग रहा है ।

उन दिनों भंडारा में गाँधी चौक के आगे मेन रोड पर गुप्ता जी की एक दुकान हुआ करती थी जिसमे फुटाणा यानि फूटा हुआ चना, मुरमुरा,लाई, भुनी मूंगफल्ली,भुना मक्का , रेवड़ी आदि मिलते थे । गुप्ता जी उत्तर प्रदेश  के रहने वाले थे और अपने पूरे परिवार के साथ वहीं दुकान के पिछवाड़े रहते थे । उनके घर के पीछे आदर्श टाकीज से लगी हुई गली थी । गुप्ता जी बाबूजी का बहुत सम्मान करते थे इसलिए कि हमारे पुरखे भी यू पी के रहने वाले थे । वे अक्सर कहते “ गुरूजी तो हमारे देस वाले हैं ।“

गुप्ता जी की दुकान में सामने की ओर ढाबे वाली स्टाइल में एक भट्टी बनी थी जिस पर एक बड़ा सा कढ़ाव हल्का सा टेढ़ा कर फिक्स कर दिया गया था । इस में रेत गर्म की जाती थी । धान को भिगोकर सुखाकर फिर गर्म रेत में भूना जाता था जिससे धान खिल जाता और उसके भीतर का चावल का दाना लाई बनकर फूट पड़ता ।

 फिर उसे छान कर रेत से अलग कर लिया जाता । उसी तरह मुरमुरा बनाने के लिए उसना चावल पहले भिगोया जाता फिर उसमे नमक मिलाकर जैसे ही उसे भट्टी की कढ़ाई की गर्म रेत में डाला जाता वह नर्म नाज़ुक कुरकुरा सा मुरमुरा बन जाता । 

धान से पोहा बनाने के लिए उसे साफ किया जाता, फिर पंद्रह सोलह घंटे भिगोकर रखने के बाद भूना जाता । इस भुने हुए धान को लकड़ी के मूसल से कूटने पर पोहा अलग हो जाता था और धान अलग । उस समय तक भंडारा में पोहा मिले स्थापित हो चुकी थीं, वहाँ हाथ से कूटने की बजाय भुने धान से प्रेस मशीन द्वारा पोहा अलग किया जाता था । लेकिन गुप्ता जी के यहाँ हाथ कुटाई वाला पोहा ही मिलता था जो मशीन वाले पोहे की तुलना में अधिक स्वादिष्ट होता था । 

इसी मोटे पोहे को फिर से गर्म रेत में डाल दिया जाता तो उसके फूटने से सकुचाई शरमाई सी चिवड़ी बन जाता । इसी चिवड़ी को तेल में तलकर अन्य वस्तुओं व मसालों के साथ मिलाया जाता तो वह अपना लिंग परिवर्तन कर बाज़ार में मिलने वाला नमकीन चिवड़ा बन जाता । 

गुप्ता जी धान को भिगोने, छाँटने आदि के बाद रोज़ सुबह भट्टी सुलगा देते थे । रेत गर्म होते ही उसमे वे धान डालते,  एक तेज़ लपट धुएँ के साथ ऊपर उठती, गुप्ता जी हाथ में एक बड़ी से छन्नी होती थी जिससे वे गर्म गर्म रेत में फूटते हुए लावे को छानकर निकालते । बाद में मुझे पता चला कि यही भट्टी भाड़ कहलाती है और इस पर धान से लाई या मक्के से पॉप कॉर्न निकालने वाले को भड़भून्जा कहते हैं । भाड़ झोंकना या भाड़ में जाना जैसे मुहावरे  भी इसी भाड़ से बने हैं । 

लाई और दूध के नाश्ते में दूसरा हिस्सा था दूध का । दूध पांढराबोड़ी गाँव के श्री राजाराम गभने लेकर आते थे । राजाराम बाबूजी के प्रिय पात्र थे और जब से बाबूजी भंडारा आये थे दूध देने वही आते थे  । धमनियों में खून की तरह हम लोगों की अंतड़ियों में उन्हीके यहाँ की भैंसों का दूध बहता था । बाबूजी उन्हें बहुत चाहते थे, यहाँ तक कि जब वे अपने स्टूडेंट्स के साथ बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज की शैक्षणिक यात्रा पर भारत भ्रमण के लिये निकले  तब वे राजाराम जी को भी अपने साथ ले गये थे । 

राजाराम जी दूध में चाहे जितना पानी मिलाते , बाबूजी स्नेहवश उन्हें कुछ नहीं कहते थे । अनेक वर्षों बाद माँ के लगातार कहते रहने के बाद उनसे दूध लेना बन्द किया गया । माँ बार बार यही कहती थी कि दूधवाले और सोने के गहने बनाने वाले का कोई भरोसा नहीं होता, वे मिलावट करते ही हैं ।लेकिन बाबूजी माँ की बात पर ध्यान न देकर राजाराम जी पर ही ज़्यादा भरोसा करते थे, समय समय पर उन्हें दूध की कीमत भी बढाकर दिया करते थे । पैसे बढ़ने के बाद राजाराम जी कुछ दिनों तक तो शुद्ध दूध लाते फिर वही ढाक के तीन पात ।  भैंस ज़्यादा पानी पी लेती है इसलिए दूध पतला देती है यह वैज्ञानिक रिसर्च उन्हीके पुरखों ने की थी ।  

हमारे यहाँ दूध का उपयोग चाय बनाने के लिए अधिक होता था । कभी कभार ही हम बच्चों को दूध रोटी या दूध लाई खाने को मिलती थी इसलिए हम लोगों की हड्डियों में कैल्शियम की कमी हमेशा बनी रही । फिर भी हम लोग उन कुपोषित बच्चों से बहुत बेहतर थे जिन्हें दूध पीने को क्या देखने तक को नहीं मिलता था । आज भी देश में बहुत बेहतर स्थिति नहीं है, बल्कि स्थिति पहले से ज़्यादा ख़राब है । शासन की पोषण आहार योजना का सच सबके सामने है । इस योजना के अंतर्गत बच्चों को मिड डे मील के नाम पर केवल खाना पूर्ति की जाती है । इस मिड डे मील में भी क्या मिलता है, सब जानते हैं ।

आपका 

शरद कोकास 


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16 मई 2026

36.उन दिनों बच्चो की खिलौना कार टीन की होती थी


बच्चों की कल्पना की दुनिया में उन दिनों आज की तरह सुपरमन, बैट्समैन, स्पाइडरमैन नहीं हुआ करते थे, ना ही रिमोट कंट्रोल से चलने वाली कार या ड्रोन जैसे आधुनिक खिलौने । हम लोग हड़प्पा मोहनजोदड़ो के बच्चों की परंपरा में मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे और बड़े घर के बच्चों को प्लास्टिक की नन्ही नन्ही कारों और विमानों से खेलता देखकर उनसे रश्क़ करते थे ।

हमसे पहले के बच्चों को तो शायद यह भी नसीब नहीं होता था इसीलिए सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता में बच्चा अपनी माँ से कहता है 

“ ले देती यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली,
किसी तरह नीचे हो जाती यह कदम्ब की डाली “ 

अच्छा लगता है यह सोचकर कि उन दिनों बांस की बाँसुरी दो पैसे मे आ जाती थी ।  वैसे ध्यान से देखिए इस कविता में प्रयुक्त यह ‘यदि’ शब्द उस समय के मनुष्य की आर्थिक सीमाओं को ,उनकी विवशता को प्रकट करता है । आज का बच्चा होता तो सीधे सीधे कहता ‘ मम्मी,मुझे बाँसुरी ले दो । ‘वैसे इन दिनों के बच्चे बाँसुरी से खेलते कहाँ हैं , उन्हे तो मोबाईल से खेलना अच्छा लगता है । 

उन दिनों मध्यवर्गीय और निमनवर्गीय घरों के बच्चों को महंगे खिलौने नसीब नहीं होते थे । हाँ आज के प्ले स्कूल यानी उन दिनों के बालमन्दिर मे इस तरह थोड़े बहुत खिलौने मिल जाते थे लेकिन कितने बच्चों को बाल मंदिर की यह सुविधा मिलती थी यह बात अलग है । 

बाबूजी कहते थे “घर हमारे निजी संस्कारों की प्रथम पाठशाला है और सामाजिक संस्कारों की प्रथम पाठशाला है हमारा स्कूल ।“ उन दिनों इस विचार का प्रसार कम था इसलिए प्री प्रायमरी ,किंडरगार्टन या बालमंदिर जैसे संस्थान बहुत कम थे । 

फिर आम जनता की जेब में इतने पैसे ही कहाँ होते थे । बमुश्किल वे बच्चों को सरकारी स्कूल में भेज पाते थे जहाँ खेलने के लिए स्याही की दवात और कलम होती थी, जिससे खेलने की सज़ा होती थी,स्कूल में गुरूजी की बेंत और घर में माँ की डांट ।

फिर मुझे इतना महंगा खिलौना कैसे मिला 

एक बार बाबूजी अपने कॉलेज की ट्रिप लेकर कोलकाता गए वहाँ उन्हे पायडल से चलने वाली टीन की एक छोटी सी मोटर कार पसंद आ गई ।  । उन दिनों जब एक मामूली शिक्षक की तनख्वाह ही दो ढाई सौ रुपये हुआ करती थी उस मोटर की कीमत थी तीस रुपये । उच्च मध्यवर्गीय परिवारों के माँ बाप अधिक से अधिक अपने बच्चों को तीन चक्के वाली छोटी साइकल दिलवा दिया करते थे , ऐसी मोटर कार तो कोई नहीं दिलवाता था ऐसे मे बाबूजी मेरे लिए यह खिलौना लेकर आए उस समय तो मुझे ऐसा कुछ नहीं लगा लेकिन आज सोचता हूँ तो लगता है बाबूजी ने मेरे लिए वाकई यह बहुत बाद काम किया था ,मेरे लिए तो यह बहुत बड़ी सौगात थी । 
इस कार को पाकर मैं अपने आप को दुनिया का सबसे अमीर बच्चा समझने लगा था । लेकिन मैं जानता था कि मेरे आसपास सब गरीब बच्चे रहते हैं और वे इस तरह की कार ख्वाब मे भी नहीं देख सकते थे इसलिए मैं उन्हे खुशी से यह कार चलाने देता था । मोहल्ले के सारे नन्हे बच्चे ‘ ए चलाने दो ना ‘ की रिक्वेस्ट के साथ कभी मुफ़्त और कभी चॉकलेट या पिपरमिंट की गोली के एवज में इस कार को चलाने का आनंद ले ही लेते थे । एक बार बैतूल से बिन्नू भैया आए तो कुछ समय के लिए कार का मालिकाना हक उन्हे मिल गया ।

मेरी मोटर ज़रा स्पेशल थी । कुछ समय बाद योगेश काले मामा ने उसे खूबसूरती से पेंट कर दिया , दरवाज़े की साइड में एक गोले के भीतर लिखा SJK यानि शरद जगमोहन कोकास और दूसरी ओर ‘शरद ट्रांसपोर्ट’ । उन दिनों इस तरह की मोटर का चलन नहीं था, फिर भंडारा जैसी छोटी जगह में तो यह और भी दुर्लभ वस्तु थी, सो मेरी मोटर भी लोगों के लिये आकर्षण का केन्द्र बन गई थी । काले मामा ने इस कार के साथ मेरी फ़ोटो भी बहुत खींची 
कार में लगा रबर का भोंपू बजाते हुए, पायडल से कार चलते हुए मैं सारे शहर में घूमता था । बच्चे तो बच्चे बड़े भी उसे एक अजूबे की तरह देखा करते थे । सपाट सड़क पर तो यह मोटर अच्छी चलती थी लेकिन चक्के के गड्ढे में पहुँच जाने के बाद उसे उतरकर धक्का देना पड़ता था । हाँ कभी कभी सांड या कोई गाय उसकी खच खच की आवाज़ से आकर्षित होकर शरारत की निगाहों से उसे देखने लगते तब उन्हें भगाने के लिए किसी न किसी को आवाज़ देनी पड़ती थी ।

इस मोटर की सवारी मैंने बस उतने ही दिनों तक की जब तक मेरे पांव छोटे रहे , पांवों की लम्बाई बढ़ते ही मोटर ने मुझे उसमे बैठने से मना कर दिया ।वैसे भी तब तक मेरे छोटे बहन भाई उसका मालिकाना हक़ लेने के लिए तैयार हो चुके थे । आश्चर्य की बात यही कि इतने बरसों में फिर कभी मैंने किसी बच्चे के पास उस तरह की टीन की मोटर कार नहीं देखी । हालांकि अब ऐसी कारें आने लगी हैं लेकिन वे पायडल से नहीं बल्कि बैटरी से या इलेक्ट्रिक से चलती हैं ऐसी ही एक कार का चित्र देखिए 

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13 मई 2026

35.एक हाथ से रोटी का कौर तोड़ने का हुनर

बच्चों के स्कूल में दाखिले के लिए उन दिनों आज के समान माँ बाप का इंटरव्यू नहीं लिया जाता था बल्कि बच्चे से कहा जाता था कि वह अपने दाहिने हाथ को सर के ऊपर से ले जाकर बायाँ कान पकड़कर दिखाए । वैसे तो दाखिले की उम्र पांच-छह साल होती थी लेकिन सारे माँ बाप एक दो साल पहले की जन्मतिथि बताकर बच्चों का दाखिला करवा देते थे । उस समय किंडरगार्टन या प्री प्रायमरी जैसा कोई कांसेप्ट नहीं था फिर भी भंडारा की शिक्षित महिलाओं की एक संस्था ‘महिला समाज’ द्वारा एक ‘बालक मंदिर’ का सञ्चालन किया जा रहा था ।

बाबूजी ने लगभग दो ढाई साल की उम्र में ही मेरा दाखिला इस बालक मंदिर में करवा दिया । उन दिनों भारी भरकम बस्तों से लदे फदे बच्चों को ढोकर स्कूल ले जाने वाले रिक्शों का चलन प्रारम्भ नहीं हुआ था ।

इस बालक मंदिर में श्रवण नामका एक चपरासी था जो मुझे अन्य बच्चों के साथ जोगीतलाव के मैदान के रास्ते से पैदल ही बाल मंदिर ले जाता था । घर से यह बालक मंदिर बमुश्किल आधा किलोमीटर रहा होगा । मैं सभी बच्चों में छोटा था इसलिये श्रवण के कन्धे पर बैठ कर बाल मंदिर जाने की विशेष सुविधा मुझे प्राप्त थी । श्रवण रोज़ सुबह दस बजे आता, कपड़े के झोले में रखा मेरा टिफ़िन बाँह में लटकाता और मुझे बालकमंदिर ले जाता । जी भरकर खेलने कूदने के बाद एक बजे हम लोग टिफिन खोलते थे ।

यह टिफिन बॉक्स पीतल का एक सामान्य सा डिब्बा होता था जिसके ढक्कन में एक गोल कड़ी लगी होती थी । उसमें ऊपर की ओर एक मुड़ी हुई कटोरी रहती थी जो डिब्बे के ऊपरी हिस्से में अटक जाती थी । यह कटोरी सब्ज़ी रखने के काम आती थी, इसके नीचे रोटी रहती थी । बायें हाथ से डिब्बे का निचला हिस्सा पकड़कर, छल्ले में तर्जनी फँसाकर जैसे ही खींचते थे यह डिब्बा खुल जाता था । उस समय स्टेनलेस स्टील प्रचलन में आ चुका था लेकिन भंडारा में पीतल का गृहउद्योग होने के कारण पीतल के बर्तन वहाँ अपेक्षाकृत सस्ते मिलते थे । इन बर्तनों में भीतर से कलई की जाती थी । इस तरह के टिफिन अब चलन में नहीं हैं ।
बालक मंदिर में लंच के समय सब बच्चों को एक कतार में टाट पट्टी पर बैठाया जाता था । बच्चों के सामने स्कूल द्वारा प्रदान की गई छोटी छोटी स्टील की थाली और ग्लास रखे जाते । फिर सब बच्चे खुद या शिक्षिकाओं की सहायता से अपना टिफिन खोलते थे । टिफिन खोलने से पूर्व एक कविता पढ़ी जाती थी जिसकी एक पंक्ति मुझे याद है ... “प्रथम कवळ घेता नाम घ्या श्री हरि चे ...” अर्थात “पहले कौर के साथ ईश्वर का नाम लो ।“ लगभग सभी धर्मों में रोटी को ईश्वर के साथ जोड़ा गया है । इसाईयत में खाने से पहले आज की रोटी प्रदान करने के लिए प्रभु को धन्यवाद दिया जाता है ।

बालक मंदिर का वह पहला ही दिन था । शांता मावशी ने मेरा कड़ी वाला पीतल का डिब्बा खोलकर छोटी सी रोटी और दूध मलाई, शक्कर स्टील की थाली पर रख दी थी । मैंने बाएँ हाथ से रोटी पकड़ी और जैसे ही अपना दाहिना हाथ कौर तोड़ने के लिए रोटी पर रखा शांता मावशी ने कहा “ ऐसे नहीं, एक हाथ से ही कौर तोड़ना है । दूसरा हाथ दूर रखो ।“

यह मेरे लिए किसी चैलेंज से कम नहीं था मैंने बहुत कोशिश की लेकिन मेरी नन्ही उँगलियाँ रोटी पकड़ ही नहीं पा रही थीं । रोटी थी कि किसी अवसर की तरह बार बार हाथ से फिसल जाती । मैं बस रोने ही वाला था कि मावशी ने कहा “रुको, मैं एक तरीका बताती हूँ । दाहिने हाथ की उंगलियों से रोटी पकड़ो और बायें हाथ को कंधे के समानांतर रखो ।“ उन्होंने रोटी पकड़ने में मेरी मदद की ।

“अब बाएँ हाथ की तर्जनी को सामने रखो जैसे कहीं कोई संकेत कर रहे हो । उनका अगला निर्देश था ।“ मैंने वैसा ही किया । फिर उन्होंने कहा “अब इस बाएँ हाथ की तर्जनी को तानो ।“ मैंने उसे तानना शुरू किया “ और जोर से,और जोर से,और जमके ..” वे कहती रहीं और मैं बाएँ हाथ की वह उंगली तानता रहा । आश्चर्य कि रोटी का कौर मेरे दाहिने हाथ में था । यह मनोवैज्ञानिक प्रोसेस थी । इसमें बाएँ हाथ की तर्जनी उंगली को कन्धे के समानांतर रख कर इतनी ज़ोर से ताना जाता था कि दायें हाथ की उंगली व अंगूठे में अपने आप तनाव उत्पन्न होता था और रोटी का कौर टूटकर हाथ में आ जाता था ।

भंडारा का यह बाल मंदिर आज की मोंटेसरी और किंडर गार्टन स्कूल का आद्य रूप था । आज बच्चों को पहले दिन से ही अंग्रेजी के अल्फाबेट सिखाये जाते हैं लेकिन उन दिनों ऐसा कोई आग्रह नहीं था । हिंदी या मराठी की बाराखड़ी सिखाने की बजाय बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर अधिक जोर दिया जाता था । तरह तरह के खेल हम लोगों को सिखाये जाते थे । बस्ता जैसी कोई चीज़ नहीं थी और जो किताबें दी जाती थीं वे बालक मंदिर में ही मिल जाया करती थीं l उनमे चित्रात्मक पुस्तकें सबसे ज़्यादा थीं । गिनती सिखाने के लिए एक एबेकस भी था । ऐसा ही एक एबेकस हमारे घर में भी था जिसमे रंग बिरंगी लकड़ी की सौ गोलियाँ थी, इसे हम लोग ‘गोलीयंत्र’ कहते थे ।

इस बालक मंदिर में शिक्षिकाओं को मिस ,मैडम या टीचर या बहनजी कहने का चलन नहीं था । उन्हें हम लोग ‘मावशी‘ कहते थे । ‘मावशी‘ का अर्थ होता है ‘मौसी’ । वहाँ तीन या चार शिक्षिकाएँ थीं । शांता मावशी इन सब की मुखिया थीं अर्थात प्रमुख शिक्षिका । सभी शिक्षिकाएँ इस बात पर ध्यान देती थीं कि बच्चे अपना काम खुद करना सीखें । खाने से पहले व बाद में साबुन से हाथ धोना, चप्पलें बाहर उतारना, छींकते समय मुँह पर रुमाल रखना, मूत्र विसर्जन के पश्चात पानी डालना जैसे कितने ही काम मैंने वहाँ सीखे । पढ़ाई लिखाई व खेल कूद के बाद खाना होता था और खाने के बाद सबकी छुट्टी हो जाती थी । छुट्टी होते ही श्रवण दादा हमें घर पहुँचा देता था, कभी कभी बाबूजी या माँ भी लेने आ जाते थे ।

उस वक़्त मेरी उम्र बहुत कम थी फिर भी बाल मंदिर जाने में मुझे बहुत आनंद आता था लेकिन पड़ोस के अपने हमउम्र मित्रों को बालमंदिर न जाते हुए देख मुझे अच्छा नहीं लगता था । एक दिन मैंने माँ से पूछा “माँ यह रामकिशन और बुद्ध्या बालक मंदिर क्यों नहीं जाते ?“ माँ कुछ देर चुप रही, फिर उन्होंने कहा …” बेटा उनके माता- पिता ग़रीब हैं ना वे उन्हें बालकमंदिर नहीं भेज सकते ।
‘ग़रीब‘ शब्द से यह मेरा पहला परिचय था । मैंने माँ से पूछा “माँ ग़रीब याने क्या होता है ?” माँ ने मुझे ग़रीब की परिभाषा नहीं बताई लेकिन मेरा आशय समझकर कहा “ बेटा, उनके पास पैसे नहीं हैं ना, बच्चों को बालक मंदिर भेजने के लिए पैसे तो चाहिए।“ मेरी समझ की सीमा यहीं तक थी । हालाँकि यह बात मुझे अजीब सी लगी इसलिए कि वे भी हमारी तरह खाना खाते थे, कपड़े पहनते थे और ख़ुद के घरों में रहते थे जबकि हम लोगों का घर किराए का था फिर वे ग़रीब कैसे हुए । यह बात मुझे बाद में समझ आई कि गरीबी का ताल्लुक घर के मुखिया की आमदनी से होता है । मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे, उनकी एक निश्चित आमदनी थी इसलिए वे ग़रीब की श्रेणी में नहीं आते थे । उन बच्चों के माता-पिता मजदूर थे और उनकी कोई निश्चित आमदनी नहीं थी । बच्चों के बालक मंदिर की फीस देना तो दूर कभी कभी उनके घरों में ऐसे भी दिन आते थे जब खाने के लिए भी कुछ नहीं होता था ।

मैंने अपने माँ बाप से कभी ऐसी कोई मूर्खतापूर्ण ज़िद नहीं की कि उन बच्चों को भी मेरी तरह बालमंदिर भेजना चाहिए या जब तक वे मेरे साथ नहीं जायेंगे मैं बालक मंदिर नहीं जाउँगा या उनके माँ बाप को पैसे दे दो ताकि वे भी अपने बच्चों को बालक मंदिर में प्रवेश दिलवा सकें । यह सब बातें बड़े लोगों के बचपन की कथा में घटित होती हैं ।
इन किस्सों को विस्तार से जानने के लिए मेरी किताब बैतूल से भंडारा :एक जन इतिहास अवश्य पढ़ें । पुस्तक ऐमज़ान पर उपलब्ध है इस लिंक पर क्लिक करें और ऑर्डर करें 

आपका 

शरद कोकास 



12 मई 2026

34. बाबासाहेब के बाद महाराष्ट्र

बाबासाहेब आम्बेडकर छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को ही संसार से विदा लेकर जा चुके थे । उनके लाखों अनुयायी नई उर्जा से लैस होकर महाराष्ट्र में शिक्षा के विकास पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे थे ।

बजबजाती नालियों की बदबू से भरी गलियाँ जस की तस थीं । इन गलियों में रहने वाले कभी अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए अपनी कमर में झाड़ू बांधकर चला करते थे ताकि किसी सवर्ण का पैर उन पर न पड़े और इस अपराध का जवाब उन्हें अपनी पीठ पर कोड़े खाकर न देना पड़े । सड़क पर थूकने की भी जिन्हें इज़ाज़त नहीं थी जो थूक इकठ्ठा करने के लिए गले में मटकी बांधे हुए चलते थे, उन्होंने अब अपनी मटकियाँ फोड़ दी थीं । इन बस्तियों में अब बाबासाहेब का नारा गूँज रहा था “शिक्षित हो,संगठित हो, संघर्ष करो ।“ अपने जीवनकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही वे जान गए थे कि इस देश के निवासियों की पहली ज़रूरत है शिक्षा । असहयोग के आवरण में लिपटे विरोध के बावजूद इसका सूत्रपात हो चुका था ।
लेकिन यह पहला शंखनाद नहीं था । उनसे भी पहले सन अठारह सौ अड़तालीस में ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने महाराष्ट्र में स्त्री शिक्षा की शुरुआत कर दी थी l पुणे जैसे शहर में स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए एक स्कूल खोलना अपने आप में एक विद्रोह था । उस समय स्त्री शिक्षा का अधिकार जैसी कोई बात किसी की कल्पना में भी नहीं थी । पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उकसाना भी एक तरह का सामाजिक अपराध था ।

सावित्री बाई जब अपने घर से निकलकर लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं तो स्त्री शिक्षा के विरोधी सड़क के दोनों ओर खड़े हो जाते थे । वे केवल शब्दों में लिपटी हुई गन्दगी ही नहीं बल्कि गोबर, कीचड़ और मैला जैसी गन्दगी भी उन पर फेंकते थे । सावित्रीबाई उन्हें कोई जवाब नहीं देतीं । वे अपने साथ एक थैली में धुली हुई एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थीं । स्कूल पहुंचकर पहले वे अपनी साड़ी बदलतीं और कक्षा में जाकर पितृसत्ता द्वारा शोषित उन स्त्रियों के मस्तिष्क में शिक्षा के बीज बोतीं । उन्हें ज्ञात था कि उनका लगाया हुआ यह पौधा एक दिन महाविशाल वृक्ष बनेगा । इस बात में कोई दो राय नहीं कि महाराष्ट्र के इस समाज ने स्त्री शिक्षा के लिए संघर्ष किया है इसीलिए आज स्त्री शिक्षा के मामले में महाराष्ट्र अग्रणी है ।

महाराष्ट्र का निर्माण यद्यपि एक मई उन्नीस सौ साठ को हुआ लेकिन उससे पूर्व ही गांवों में शिक्षा संस्थानों का खुलना प्रारंभ हो चुका था । ब्रिटिश काल से चली आ रही शिक्षा प्रणाली में देशकालानुसार परिवर्तन कर उसे लागू करने का ज़िम्मा राजनीतिक इच्छा शक्ति पर निर्भर करता था । मराठा साम्राज्यों के समय प्रारंभ की गई मराठी शालाएँ भी चल रही थीं । शिक्षा के स्तर तथा मानकों की कोई बात ही नहीं थी , औसत दर्जे की शिक्षा मिल जाए इतना ही काफी था । निजी स्कूल न के बराबर थे और शिक्षा को मूलभूत अधिकारों में शामिल करने की संवैधानिक व्यवस्था पर अनेक मत मतांतर थे । फिर भी महाराष्ट्र अपनी प्रगतिशील सोच के कारण शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तरक्की कर रहा था ।

स्त्री शिक्षा की स्थिति में भी परिवर्तन आ चुका था लेकिन पितृसत्तात्मक विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया था । धर्म परिवर्तन का अर्थ सब कुछ त्याग देना नहीं था, पत्थर,मिट्टी और पीतल के बने देवी देवता पूजाघरों में विद्यमान थे बस उनके साथ आंबेडकर और बुद्ध की प्रतिमाएँ और जुड़ गई थीं । मस्तिष्क में वैचारिक परिवर्तन नहीं हुआ था इसलिए अवैज्ञानिक विचार अभी जीवन से चिपके हुए थे ।

साड़ी में सजी धजी लडकियाँ अपनी लाल पीले रिबन से बंधी अपनी चोटियाँ लहराते हुए स्कूल जाने लगी थीं और विद्यार्थिनी कहलाने लगी थीं । लेकिन स्कूल से आने के बाद वे फिर छात्रा से बेटी और बहन बन जाती थीं और पिताओं,भाईयों और धर्मगुरुओं के बनाये समाज के नियमों से संचालित होने लगती थीं । समय अपनी क्रूर हँसी हँस रहा था ..वह जानता था कि समाज उससे अधिक तेज़ गति से चलकर उससे आगे नहीं हो सकता ।

भंडारा में अभी इतनी बरसात नहीं हुई थी शहर की दीवारों पर चुनाव के दौरान नील से लिखी गई प्रत्याशियों को वोट देने की अपीलें और चुनाव चिन्ह के रेखांकन धुल जाएँ । आज़ादी के समय ख़रीदी गई लोगों की छतरियों में अनगिनत छेद हो चुके थे, अभावों का आसमान अपनी बुलंदी में उन छेदों से झाँक रहा था और उनकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ा रहा था । कपसीले बादलों में दिल्ली के लाल किले से की गई घोषणाओं और विकास के वादों का अस्पष्ट सा अक्स था ।

जिससे तारीख का एक पन्ना रोज़ फाड़ दिया जाता है ऐसे टीन पर छपे लक्ष्मी गणेश की फोटो वाले वाल कैलेण्डर से सन छप्पन का इकतीस दिसंबर वाला आख़िरी पन्ना फाड़ा जा चुका था । गाँवों में बरगद के नीचे चौपाल पर रेडिओ बज रहे थे । समाचारों में बताया जा रहा था कि आल इंडिया रेडिओ अब आकाशवाणी है । प्रथम पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य आत्मनिर्भरता, कृषि का विकास, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण तथा शरणार्थियों की व्यवस्था आदि अब पूर्ण हो चुका है ।

दूसरी पंचवर्षीय योजना प्रारंभ हो चुकी थी और नेहरू जी के कोट में लगे लाल गुलाब की खुशबू औद्योगिक विकास, घरेलु उत्पादन जैसे शब्दों के साथ घर घर तक पहुँच रही थी । भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला जैसे इस्पात संयंत्रों की ताज़ा ताज़ा बनी पहली ब्लास्ट फर्नेस काला धुआं उगलने लगी थी ।









11 मई 2026

33.आंबेडकर की पराजय सदी का एक आश्चर्य

सन उन्नीस सौ चौवन के मई माह की दो तारीख का वह रविवार फुर्सत के साथ अपना ताल मेल नहीं बिठा पा रहा था । यह मतदान का दिन था जो भंडारा के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था । भंडारा संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में मतदान के लिए  दो मई और सात मई यह दो तिथियाँ निर्धारित की गई थीं । चुनाव की व्यवस्था हेतु  समस्त शासकीय अमला तत्पर था, पोलिंग पार्टियाँ दूरस्थ इलाकों की ओर रवाना हो चुकी थीं । पुरानी डॉज गाड़ियों और बैलगाड़ियों से चुनाव सामग्री पहुँचाई जा  चुकी थीं । जंगलों के भीतर बसे वे गाँव जहाँ रास्ते रास्ते में ही दम तोड़ देते थे वहाँ भी चुनाव संपन्न करवाने वाले कर्मचारी अपने सर पर भी लोहे की पेटियां लादकर पहुँच चुके थे  । कठिनाइयों और असुविधाओं के बीच भी शासकीय अमले के यह लोग बहुत उत्साहित और निश्चिन्त थे, आखिर एक चुनाव संपन्न करवाने का अनुभव उनके पास था ।

चुनाव के दिन लोगों का उत्साह आसमान छू रहा था । ढाई साल बाद ही जनता को पुनः वोट डालने का अवसर प्राप्त हुआ था । दोनों तिथियों में सम्पूर्ण संसदीय क्षेत्र में आशा के विपरीत मतदान हुआ और मुहर लगे हुए बैलेट पेपर लोहे की मजबूत मतपेटियों में बंद हो गए । एक सप्ताह बाद भंडारा मुख्यालय में मतगणना प्रारंभ हुई । फिर आई मई माह की पंद्रह तारीख । मतगणना स्थल के बाहर दूर दूर तक लाउडस्पीकर लगे थे जिनसे हर राउंड के बाद घोषणा की जा रही थी । दूरस्थ गांवों में चौपालों पर भीड़ इकठ्ठा थी और लोग आल इंडिया रेडियो के नागपुर केंद्र से आती हवा में घुली ध्वनि तरंगों को ताम्बे के एरियल से जुड़े वाल्व वाले रेडियो सेट में पकड़कर सुनने की कोशिश कर रहे थे । जहाँ यह सुविधा नहीं थी वहाँ अगले दिन आने वाले अखबार या किसी हरकारे की राह देखी जा रही थी ।

अंततः चुनाव परिणाम की अंतिम घोषणा हुई । कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव कार्यालयों में लक्ष्मी बम फोड़े जाने लगे, पेढ़े बाँटे जाने लगे  । यहाँ हवा में उड़ता हुआ गुलाल रौशनियों को गुलाबी आभा प्रदान कर रहा था लेकिन वहीं कहीं सदियों से पीड़ित शोषित जनता की अँधेरी बस्तियों में छाया अँधेरा और गहरा गया था । उनके उजाले की एकमात्र आस बाबासाहेब डॉ.भीमराव आम्बेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से चुनाव हार गए थे ।

ज़िला कार्यालय की इमारत पर लगे लाउड स्पीकर से उस दिन की सबसे दुखद ख़बर गूँज रही थी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के प्रत्याशी डॉ.बी. आर.आंबेडकर अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के प्रत्याशी भाऊराव बोरकर से आठ हज़ार वोटों से चुनाव हार चुके हैं यह चुनाव परिणाम सबकी आशाओं के विपरीत था आरक्षित सीट से कांग्रेस के भाऊराव बोरकर को एक लाख इकतालीस हज़ार एक सौ चौसठ वोट मिले थे वहीं बाबासाहेब के वोटों की संख्या थी एक लाख बतीस हज़ार चार सौ त्र्यासी । मात्र आठ हज़ार छह सौ इक्यासी वोटों से उनकी हार हुई थी । जिन मतपत्रों पर उनके नाम के आगे मुहर नहीं लगी थे वे मतपत्र किनके थे इस बात को सब जानते थे ।

वहीं सामान्य सीट के परिणाम भी घोषित हो चुके थे । यहाँ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता एक लाख उनन्चास हज़ार छह सौ छत्तीस वोट पाकर अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के पूनमचंद राका पर विजय प्राप्त कर चुके थे । राका को एक लाख चोवीस हज़ार दो सौ सडसठ मत प्राप्त हुए थे । इस तरह अशोक मेहता पच्चीस हज़ार वोटो से यह चुनाव जीत गए थे । अपने प्रतीक रूप में झोपड़ी जीत गई थी लेकिन झोपड़ियों में रहने वाले दबे,कुचले,उपेक्षित लोग हार गए थे । 

भंडारा के निवासियों के लिए बाबासाहेब आंबेडकर के हार जाने की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन सत्य सर्वविदित था । दिनकर राव के घर में सारे कार्यकर्त्ता इकठ्ठे हुए और बाबासाहेब की हार के कारणों का विश्लेषण किया गया जैसा कि भंडारा के वरिष्ठ कवि पत्रकार अमृत बंसोड और दिनकर राव के पुत्र सुमंत बताते हैं बाबासाहेब के साथ धोखा हुआ था मुंबई की कहानी फिर यहाँ दोहराइ गई थी । बाबासाहेब ने मनरो स्कूल के मैदान में अपने सहयोगियों से एक वोट अशोक मेहता को देने की सार्वजानिक अपील की थी,उनके आग्रह पर  मतदाताओं ने ऐसा किया भी इसलिए उन्हें डेढ़ लाख वोट मिले लेकिन अशोक मेहता के सपोर्टर्स ने सामान्य सीट के लिए एक वोट तो अशोक मेहता को दिया लेकिन आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब को अपना वोट नहीं दिया । फलस्वरूप कांग्रेस के उम्मीदवार भाऊराव बोरकर चुनकर आ गए अन्यथा बाबासाहेब यह चुनाव अवश्य जीत जाते आखिर आठ  हज़ार वोटों का अंतर क्या मायने रखता है कांग्रेस के बोरकर भी एस सी कम्युनिटी से आते थे , इस आधार पर भी बहुत से वोट उन्हें मिले ।

मध्यप्रांत के इस महत्वपूर्ण ज़िले भंडारा की राजनीति में अगले कुछ सालों में अनेक परिवर्तन हुए बाबासाहेब के साथी नाशिक राव तिरपुडे जो दलित वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ते हुए सन अड़तालीस में जेल गए थे,बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए आचार्य कृपलानी के सहयोगी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव अशोक मेहता भी समाजवादी से कांग्रेसी हो गए और दो बैलों की  जोड़ी चुनाव चिन्ह पर उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर भंडारा से ही आगामी चुनाव लड़ा बाबासाहेब के सिपहसालार दिनकर राव रहाटे अपना सब कुछ त्यागकर अंत तक  पीड़ित शोषित वर्ग की सेवा में लगे रहे, साहूकार के पास घर गिरवी रखकर कर्ज लेकर बच्चों का पालन पोषण करते रहे उनकी आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि वे कर्ज पटा पाते , अतः उन्नीस सौ पचहत्तर में उनका वह घर भी कर्ज की भेंट चढ़ गया

भाऊराव बोरकर भी सत्ता का सुख अधिक दिनों तक नहीं भोग सके और छह माह पश्चात एक विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया उसके एक साल बाद उन्नीस सौ पचपन में भंडारा में पुनः उपचुनाव हुआ जिसमे सहानुभूति लहर के कारण भाऊराव बोरकर की पत्नी, कांग्रेस की प्रत्याशी अनुसूया बोरकर विजयी रही बाबासाहेब तब तक अपने नए मिशन में लग चुके थे और जातिवादी ताकतों के खिलाफ़ दलित पीड़ित शोषित जनता को लामबंद कर रहे थे अंततः उन्नीस सौ छप्पन के अक्तूबर माह की चौदह  तारीख को अपने सात लाख अनुयायियों के साथ नागपुर की दीक्षा भूमि पर एक भव्य समारोह में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया  

अक्टूबर 56 मे नागपूर मे बाबासाहेब 

स्वास्थ्य उनका ठीक नहीं चल रहा था, जीवन भर के संघर्ष को कहीं न कहीं विराम लगना ही था । दो माह पश्चात ही छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को उनकी अंतिम सांस के साथ उनके जीवन का यह सफ़र समाप्त हुआ   

चैत्य भूमि नागपूर 

बाबासाहेब और भंडारा का यह सम्बन्ध बहुत कम लोगों को ज्ञात है लेकिन एक समय था जब भंडारा इसी बात के लिए प्रसिद्ध हुआ था जब लोग चेहरे पर आश्चर्य का भाव लाकर पूछते थे “अरे ! क्या यह वही भंडारा है जिसकी जनता ने बाबासाहेब को चुनाव में हरा दिया था ?”  लेकिन वास्तविकता यह है कि बाबासाहेब को जनता ने नहीं इस राजनीति की कुटिल चालों ने हराया था भंडारा में वे मात्र आठ हज़ार वोटो से हारे थे जबकि उनके अपने कार्यक्षेत्र मुंबई में यह संख्या साढ़े चौदह हज़ार थी । यह तथ्य ध्यान में रखा जाना चाहिए । चुनाव के बाद बाबासाहेब ने सभी कार्यकर्ताओं का धन्यवाद दिया और मुंबई के लिए रवाना हो गए

 

बाबासाहेब का समाधि स्थल मुंबई 

भंडारा से विदा लेते हुए बाबासाहेब ने उन्हें दोनों समय खाने का डबा,चाय नाश्ता पहुँचाने वाली युवती मालती बाई मेंढे के घर के सामने कार रुकवाई मालती अपनी आँखों में आँसू लिए हाथ जोड़े चुपचाप खड़ी थी बाबासाहेब कार से उतरे और मालती के सर पर हाथ रखकर कहा “ बेटी, तुमने मेरा बहुत ख्याल रखा, तुम जीवन में जो कुछ भी बनना चाहती हो मुझे बताओ, मैं तुम्हारी मदद करूँगा ?” मालती बाई ने कहा “ डॉक्टर बनना चाहती हूँ बाबासाहेब   डॉ आंबेडकर ने उन्हें मदद का आश्वासन दिया और विदा ली आगामी वर्षों में उनके सहयोग से मालती बाई ने मेडिकल की उच्च शिक्षा ग्रहण की बाद में दिनकर राव रहाटे के परिवार में ही उनके छोटे भाई से उनका विवाह संपन्न हुआ और वे महाराष्ट्र में डॉक्टर मालती ताई रहाटे के रूप में प्रसिद्ध हुईं

 साभार - मित्र सुमंत रहाटे और नागपूर के पत्रकार अमृत बनसोड जी 

शरद कोकास 

10 मई 2026

32.बाबासाहेब ने किसके लिए कहा था "यह अशोक नहीं सम्राट अशोक हैं"



भाषण देते हुए डॉ आंबेडकर 

कल मैंने आपको बताया था कि मुंबई से चुनाव हार जाने के पश्चात किस तरह बाबासाहेब अम्बेडकर को 1954 मे पुनः भंडारा लोकसभा से उपचुनाव मे शामिल होकर दिल्ली मे लोकसभा मे जाने का अवसर मिला। चुनाव के पहले भंडारा मे किस तरह उनके चुनाव प्रचार की तैयारी चल रही थी , कहाँ दफ्तर बनाया गया था , कहाँ चुनावी सभा हुई थी , इस बात को जानिए विस्तार से इस पोस्ट मे । 
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता 
भंडारा के नौतलाव मैदान मे मंच सज चुका था , हजारों लोगों की भीड़ बाबासाहेब को सुनने , उन्हे देखने के लिए आई थी । आखिर वे उस दौर के नायक थे जिन्होंने लाखों लोगों को जाति के आधार पर होने वाले शोषण से मुक्त किया था , जिन्होंने संविधान निर्माण मे अपनी महती भूमिका निभाई थी 

बाबासाहेब बोलने के लिए खड़े हुए । करतल ध्वनि से उनका स्वागत हुआ । उन्होंने जनता का अभिवादन स्वीकार किया । वे जनता के मन की बात जानते थे । भंडारा के इतिहास से भी वे वाकिफ़ थे । जनता के दुखों पर मरहम लगाते हुए उन्होंने अपनी बात सबके सामने रखी । 

उन्होंने स्पष्ट किया शिड्फेयूल कास्डट फेडरेशन का एक ही उद्देश्य है जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त करना, युवाओं के लिए रोजगार की और आम जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का समुचित प्रबंध करना ।यद्यपि उन  दिनों सभी पार्टियों के घोषणा पत्र में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ यही बातें हुआ करती थीं । 

देखिए कितने उदारमना थे बाबासाहेब 

मुख्य मुख्य बातें कहने के बाद उन्होंने जनता के मन में गाँठ की तरह बंधी हुई वोट के बहिष्कार की बात को ध्यान में रखते हुए कहा 

“यद्यपि मुंबई में हमने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से धोखा खाया है लेकिन हम किसी को धोखा देने के बारे में सोच भी नहीं सकते ।“ 

लोगों के अशोक मेहता को वोट न देने की बात पर उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो कुछ नहीं कहा लेकिन परोक्ष रूप से इतना अवश्य कहा कि “हमने संविधान में जनतांत्रिक चुनाव की यह व्यवस्था की है । यह भी कहा है कि हमारा वोट बहुत महत्वपूर्ण है, यह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए ।“ 

भंडारा की जनता उनकी अपनी थी, यह उनका अपना परिवार था, उनके दुःख उनके अपने थे । उनके पूर्वजों ने भी वही अपमान और पीड़ा सही थी । जनता उनकी बात के स्थूल अर्थ को समझ नहीं पाई अतः अवसर देखकर उन्होंने पत्र का उल्लेख करना आवश्यक समझा “ मुझे सुचेता कृपलानी का पत्र प्राप्त हुआ है जिसमे उन्होंने भंडारा की जनता से सहयोग की अपेक्षा की है ।“ 

सुचेता कृपलानी 
बाबासाहेब स्वयं विद्वान थे और अशोक मेहता की विद्वता का सम्मान करते थे । वे जानते थे कि सम्प्रति सामान्य सीट से भंडारा से चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस के उम्मीदवार पूनमचंद राका से अशोक मेहता कहीं बेहतर हैं । उन्होंने भरी सभा में एक रूपक गढ़ते हुए कहा कि 

“भंडारा की इस सामान्य सीट से चुनाव लड़ने वाले अशोक समझ लीजिये हमारे लिए सम्राट अशोक हैं । बेहतर होगा कि हम अपना एक वोट व्यर्थ न गवाएँ ।“ 

महाराष्ट्र के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं उस समय नागपुर से निकलने वाले प्रमुख अखबार ‘तरुण भारत‘ ने इक्कीस अप्रेल चौवन की इस सभा में दिया गया बाबासाहेब का यह व्याख्यान विस्तार से  प्रकाशित किया था । 

अब जानिए उन अनजान लोगों के नाम जिन्होंने बाबासाहेब को चुनाव मे प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग दिया ( यह जानकारी मुझे बाबासाहेब के चुनाव प्रभारी दीनदयाल रहाटे के पुत्र और मेरे मित्र सुमंत रहाटे,अमृत बंसोड, और भंडारा के अन्य वरिष्ठ लोगों  से प्राप्त हुई है )

बाबासाहेब का यह व्याख्यान भंडारा में उनके पक्ष में वातावरण निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था  ৷ फेडरेशन के अध्यक्ष दिनकर राव के मित्र भानुदास बंसोड़  उनके सक्रिय सहयोगी थे । हुसैन रामटेके उनकी रोज़ के मंडली के सदस्य थे । हुसैन रामटेके सिर्फ नाम से ही हुसैन थे लेकिन  मुस्लिम समुदाय के दलित समाज में भी उनकी काफी पैठ थी ৷ 

भोजराज रामटेके सी पी आई के कार्यकर्त्ता थे और गोंदिया में रहते थे लेकिन वे भी बाबासाहेब का चुनाव प्रचार करने के लिए आ गए थे ৷ 

भंडारा में ही शुक्रवारी मोहल्ले में रहने वाले मेंढे पहलवान अपने अखाड़े के साथियों के साथ उनका सहयोग करने आ गए थे ৷ 

स्टेशन के निकट वरठी के रहने वाले नारायण राव फुले उनके सहयोगी थे वहीं भंडारा के श्यामचरण नंदागौली ने युवाओं की एक टीम खड़ी कर ली थी ৷ 

अ.शि. रंगारी और करडी के रहने वाले शेंडे बाबू भी दल बल के साथ उपस्थित हो गए ৷ 

यह ऐसा उपचुनाव था जिसमे जवाहर लाल नेहरू को भी आना पड़ा 

सामान्य सीट के लिए यहीं पर कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रचार भी ज़ोरों पर था । देश के प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की थी अतः वह चाहती थी कि भंडारा से उनकी सीट बरकरार रहे फिर इस बार तो आम्बेडकर यहाँ से चुनाव लड़ रहे थे । कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरु को भी यहाँ आना पड़ा । आंबेडकर की सभा की तरह भंडारा के निकट गोंदिया में नेहरू की विशाल सभा हुई जिसमे देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना का क्रियान्वयन और कृषि, औद्योगिक व वाणिज्यिक विकास के मुद्दे दोहराए गए । 

हाथी चुनाव चिन्ह बाबासाहेब को सबसे पहली बार मिला था 

बाबासाहेब का चुनाव चिन्ह ‘हाथी’ भंडारा की दीवारों पर दिखाई देने लगा था ৷ बच्चे अपनी कमीज़ की जेब पर हाथी छाप,बैल जोड़ी छाप,झोपडी छाप के बिल्ले  लगाकर लाउड स्पीकर लगे रिक्शों के पीछे दौड़ते और फेंके गए बिल्ले और पर्चे बटोरते ৷ आज की तारीख  में हाथी यह चुनाव चिन्ह बाबासाहेब के आदर्शों पर चलने वाली  बहुजन समाज पार्टी के पास है । यह चुनाव चिन्ह उस समय उन दलित, शोषित, पीड़ित लोगों को उनकी ताकत का अहसास दिलाता था । 

कांग्रेस का चुनाव चिन्ह उन दिनों दो बैलों की जोड़ी था जिस पर 1952 से 1969 तक कॉंग्रेस चुनाव लड़ती रही जो विभाजन के बाद 1977 मे बाद में गाय बछड़ा हुआ और 1977 मे हाथ या पंजे पर आकर स्थिर हो गया । 

इस चुनाव चिन्ह पर कांग्रेस के दो उम्मीदवार दो वर्ग एक सामान्य एक आरक्षित से चुनाव लड़ रहे थे । सामान्य वर्ग से अशोक मेहता की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को झोपड़ी निशान मिला था । 

बाबासाहेब के भंडारा के कार्यकर्ताओं की जन सभाओं में भीड़ उमड़ने लगी थी ৷ वे सभी आसपास के क्षेत्रों में दौरा करने लगे । भंडारा के मेरे मित्र और दिनकर राव के भतीजे भगवान रहाटे बताते हैं कि उनकी माँ सुभद्रा बाई अपनी तमाम सखी सहेलियों  के साथ उनके भाषण सुनने जाती थी ৷ भगवान उस समय माँ के पेट में थे और दिनकर राव के बेटे सुमंत का जन्म नहीं हुआ था ৷ पूरे भंडारा संसदीय क्षेत्र में जाने कितने स्थानों पर सभाएँ हुई और लोगों ने संकल्प लिया, चाहे जो हो इस बार बाबासाहेब को जिताना ही है । यह चुनाव उनके लिए आत्मसम्मान के प्रश्न के अलावा एक चुनौती भी था ।

लेकिन बाबासाहेब के दुश्मन यहाँ भी थे 

भंडारा के लोग जात पात,भेदभाव, ऊँच नीच सब भूलकर बाबासाहेब का तन मन धन से साथ दे रहे थे । लेकिन भंडारा का एक बहुत बड़ा भद्र वर्ग उनके साथ नहीं था ৷ यह वह वर्ग था जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही अपने आपको अंग्रेजों का उत्तराधिकारी घोषित कर चुका था ৷ जाति और वर्ण के संस्कार जिसकी नसों में ज़हर की तरह फ़ैल चुके थे जो अब भी बाहरी इलाके में बनी इन बस्तियों में रहने वालों को हिकारत की नज़रों से देखता था ৷ बाबासाहेब की असली लड़ाई व्यवस्था के साथ साथ इन लोगों से भी थी ৷ लेकिन वे संवैधानिक रूप से चुनाव जीतकर एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी यह लड़ाई लड़ना चाहते थे ৷ आखिर संविधान में यह व्यवस्था उन्होंने ही तो की थी ৷ 

इसके अतिरिक्त भंडारा में अपने आप को परंपरागत कांग्रेसी मानने वाला भी एक वर्ग था जो सैद्धांतिक रूप से बाबासाहेब को पसंद करता था, उनकी विद्वता का सम्मान करता था और स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये गए उनके कार्यों की सराहना भी करता था । इनमे गाँधी और नेहरू के अनुयायियों के साथ साथ अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे । 

यह सभी कांग्रेसजन बाबासाहेब को चाहते थे लेकिन उनका कहना यही था कि अगर वे कांग्रेस से चुनाव लड़ते तो वे उनका साथ अवश्य देते ।

विशेष बात यह कि कॉंग्रेस का विरोधी होने के कारण इस चुनाव मे भारतीय जनसंघ भी उनका सहयोगी था । 

यह एक ऐसा स्वप्न था जिसके घटित होने की संभावना प्रारंभ में ही दम तोड़ चुकी थी ।

( शेष अगले अंक मे, यह इतिहास आपको कैसा लगा अवश्य बताएं  )

आपका 

शरद कोकास 


8 मई 2026

31.नौतलाव में बाबासाहेब का भाषण

आपने नहीं सुना होगा नौतलाव मैदान का नाम चलिए आज आपको बताते हैं भंडारा के उस मैदान के बारे में जहाँ डॉ आंबेडकर ने अपना चुनावी भाषण दिया था 
पूर्व का नौतलाव आज का दशेरा मैदान  और कब्रस्तान 
भंडारा शहर के अंतिम छोर पर जहाँ लार्ड मनरो के नाम पर बना मनरो स्कूल था वहीं कब्रस्तान भी था । उससे आगे मुश्ताक़ पटेल की ज़मीन थी जहाँ ढेर सारी अमराइयों के बीच ईदगाह थी जो ईद के रोज़ गुलज़ार दिखाई देती थी । 
तालाब से लगी ईदगाह , मेरे घर के सामने ( सन 2000)
पटेल मियाँ के घर के पास एक मस्जिद भी थी जहाँ आम के पेड़ों पर कूकती हुई कोयल अज़ान के सुर में सुर मिलाकर आगंतुकों का स्वागत करती थी ।
पटेल जी का मकान 
अब यहाँ रावण जलाया जाता है 
उस ज़माने में यहाँ नौ तालाब हुआ करते थे । इनसे लगा ग्राउंड नौतालाब या नउतलाव मैदान कहलाता था । इस मैदान को हम लोगों ने बाद में मनरो स्कूल ग्राउंड, फिर शास्त्री स्कूल के ग्राउंड के रूप में जाना । आज की पीढी इसे दशहरा मैदान के रूप में जानती है इसलिए कि यहाँ दशहरे के दिन रावण जलाया जाता है । अमराइयाँ अब ख़त्म हो चली हैं, नौ तालाब भी अब एक तालाब में सिमट गए हैं ।
हरी हरी काई में सिमटता तालाब 
तालाबों के शहर भंडारा में आपका स्वागत है । 

यह वाक्य अब केवल भंडारा रोड स्टेशन पर सुमधुर स्वर में किये जा रहे अनाउंसमेंट में सुनाई देता है । कभी अपने जल के साथ अठखेलियाँ करने वाली नर्म ज़मीन प्लाटों में बंटकर बड़े बड़े मकानों की नींव के नीचे दफ्न होती जा रही है । ईदगाह आज भी वहीं पर है । 

आपको पता है आपके शहर से कितने तालाब गायब हो गए और उन्हें पाट कर वहाँ इमारतें खड़ी कर दी गईं ?

२१ अप्रेल १९५४ के दिन ऐसा क्या हुआ था ?

वह बुधवार का दिन था । तारीख इक्कीस माह अप्रेल सन उन्नीस सौ चौवन । नउतलाव मैदान भीड़ से खचाखच भरा हुआ था । भंडारा के इतिहास में वह एक अभूतपूर्व दिन था उस दिन यहाँ बाबासाहेब आम्बेडकर की जंगी चुनावी सभा होने वाली थी । भंडारा शहर के आसपास के सैकड़ों गांवों से जाने कितने लोग पैदल पैदल, साइकिलों से या बैलगाड़ियों से आये थे । इन्ही में एक थे ग्राम माडगी में रहने वाले कृषक और बीड़ी कामगार प्रह्लाद गोस्वामी जो बाईस किलोमीटर दूर से अपनी पत्नी प्रमिला के साथ पैदल चलकर बाबासाहेब की बात सुनने आये थे । (गोस्वामी जी के पुत्र श्री एस पी गोस्वामी अभी फेसबुक पर हैं और मेरे मित्र हैं )

बाबासाहेब आंबेडकर इस चुनाव में शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की और से प्रत्याशी थे । फेडरेशन के कार्यकर्ताओं ने तम्बुओं में और घरों में सभी के ठहरने और भोजन की व्यवस्था की थी । वहाँ का नज़ारा किसी मेले से कम नहीं था हालाँकि वह महज मेला नहीं था ।

बाबासाहेब के अलावा अन्य प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार भी ज़ोरों से चल रहा था । भंडारा निर्वाचन क्षेत्र से भी दो सांसद चुने जाने थे एक सामान्य वर्ग से एक आरक्षित वर्ग से । प्रत्येक मतदाता को दो वोट देने का अधिकार था इसलिए उनकी ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गई थी । बाबासाहेब आंबेडकर भंडारा की आरक्षित सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं यह बात पूरे देश में फ़ैल चुकी थी । देश के सभी बड़े बड़े नेताओं की निगाह इस चुनाव पर थी ।

अब देखिये इस चुनाव में मुकाबला कैसा था


आरक्षित सीट
 
शिड्यूल कास्ट फेडरेशन से डॉ.भीमराव आंबेडकर

विरुद्ध

कांग्रेस पार्टी से अम्बाडी गाँव के भाउराव बोरकर

सामान्य सीट
 
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता

विरुद्ध

कांग्रेस पार्टी के पूनमचंद राका

देखिये पॉलिटिक्स कैसी होती है

भंडारा आने से पूर्व बाबासाहेब को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की वरिष्ठ सदस्य सुचेता कृपलानी का पत्र मिला था जिसमे उन्होंने मुंबई के चुनावों में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी द्वारा उन्हें पूर्ण सहयोग दिए जाने के बावजूद उनकी विजय न होने पर खेद व्यक्त किया था । पत्र का आशय यह था कि मुंबई में जो हुआ सो हुआ लेकिन भंडारा में अशोक मेहता जैसे विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजसेवी व्यक्ति उनकी पार्टी से खड़े हैं । उनके विरुद्ध पूनमचंद राका नामक उम्मीदवार हैं जिनकी छवि जनता के बीच किसी समाजसेवक या राजनैतिक कार्यकर्त्ता के रूप में मेहता जी से कम है । यदि बाबासाहेब के सहयोग से एक सीट अशोक मेहता जीत जाते हैं तो भंडारा के लिए वे एक अच्छे सांसद साबित होंगे तथा अपनी विद्वता,ज्ञान और समझ से वे भंडारा की स्थिति को लेकर संसद में उचित प्रश्न भी रख सकेंगे ।

बाबासाहेब इस सत्य से अवगत हो चुके थे कि मुंबई के प्रथम लोकसभा चुनावों (1951-52) में उनकी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को बहुत सहयोग दिया था किन्तु प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स की ओर से उन्हें यथेष्ट सहयोग नहीं मिला था । उनकी हार के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था । वहीं कहीं सुचेता कृपलानी की अपील भी उनके मन में उमड़ घुमड़ रही थी

लेकिन जनता के मन में क्या था देखिये

भंडारा की जनता की राजनीतिक समझ कहीं बेहतर थी । जनता इस सत्य से भलीभांति वाकिफ़ थी कि उन्नीस सौ बावन के चुनावों में बाबासाहेब को मुंबई में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के वोटर्स के वोट नहीं मिले थे । इस वज़ह से उनके मन में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के प्रति गुस्सा भी था । 

भीतर ही भीतर संक्रमण की तरह यह बात भी फ़ैल चुकी थी कि हम आरक्षित सीट से बाबासाहेब को तो वोट देंगे लेकिन सामान्य सीट वाला दूसरा वोट किसी को नहीं देंगे, भले ही वह व्यर्थ चला जाए ।

इसके बाद क्या हुआ ,सभा में बाबासाहेब ने क्या कहा और चुनाव में क्या हुआ यह अगली किश्तों में पढ़िए


आपका

शरद कोकास