| टैटू बनवाते हुए शरद कोकास |
यह दृश्य विगत सदी में साठ के दशक में, मई माह के एक रविवार को, बैतूल नामक शहर के इतवारी बाज़ार नामक मोहल्ले में, दुर्गा मंदिर की बाईं ओर मोहनजोदाड़ो के टीले की तरह दिखाई देने वाले एक ऊँचे से टीले पर साप्ताहिक बाज़ार में लगने वाली गुदना गुदवाने की एक दुकान के सामने घटित हुआ था । यह टीला हमारे नए घर के पीछे के दरवाज़े के ठीक सामने की ओर था । इस दुकान में चान्दी के आभूषण पहने आदिवासी बालाएँ और महिलायें अपने हाथ, पांव, ठोड़ी आदि में गुदना गुदवाने के लिए बाकायदा अपॉइंटमेंट लेकर आती थीं । उधर उनके घर के लोग दुकानों से सामान खरीदते उतनी देर में यह बालाएँ गुदना गुदवा लेती । कभी कभी इनके साथ कुछ युवक भी होते थे ।
गुदना गोदने वाली स्त्री के पास मिटटी के एक दिये में काजल जैसी कोई चीज होती थी । वह बोतल से अरंडी का तेल निकालती, उसमे वह काजल घोलती फिर एक कपडे में लिपटी हुई छोटी छोटी सुइयां निकालती थी । जिस युवती को गुदना गुदवाना होता उसका हाथ अपने हाथ में लेकर सबसे पहले वह उस पर तेल लगाती, फिर गुदना गुदवाने वाली उस युवती से पूछती “ क्या गुदवाना है ? “ वह युवती अपनी रूचि के अनुसार कोई आकृति बताती जैसे सूर्य, चन्द्र ,तारे, फूल पत्ती, बिच्छू, या ऐसी ही कोई आकृति । फिर वह गोदने वाली कपड़े की थैली से उपयुक्त सुई निकालती और उसे काजल वाले तेल में डुबोकर धीरे धीरे उसके हाथ पर चुभोते हुए वह आकृति बना देती । सुई के चुभने से थोड़ा बहुत दर्द तो होता था लेकिन गुदना गोदने वाली उसे बातों में लगाये रहती । गुदना समाप्त होते ही उस पर हल्दी का लेप लगा दिया जाता ।
मैं और बिन्नू भैया अक्सर वहाँ खड़े हो जाते और गुदना गुदवाने का यह दृश्य देखते । गोदने वाली स्त्री जिसे गुदनारी कहते थे उसकी बातें भी बड़ी मज़ेदार होती थीं “ ठोड़ी में गुदवाओगी तो दांत मोती जैसे चमकते रहेंगे “ “ इतना सुन्दर गोदूंगी कि तुम्हारा प्रेमी देखता ही रह जायेगा । “ यदि कोई उम्रदराज़ गोंड स्त्री आती तो उससे कहती “ गुदना नहीं गुदवाओगी तो बूड़ा देव नाराज हो जायेंगे ।“
गुदनारी की बात सुनकर युवतियाँ हँस देतीं । उन्हें किसी देवी देवता के नाराज़ होने की चिंता नहीं होती थी ।वे केवल इतना चाहती थीं कि बस उनका प्रेमी खुश रहे । अक्सर वे श्रृंगार के रूप में गुदना गुदवाती थीं । कभी कभी उनके साथ आनेवाले युवक भी बिंदी, सितारा, फूल जैसी कोई आकृति गुदवा लेते । जब वे एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराते हुए गुदना गुदवाते थे उन्हें दर्द महसूस नहीं होता था । किसी ने सच कहा है जब मनुष्य प्रेम में होता है तो उसे किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं होता ।
अलग अलग स्थानों पर गोदे जाने वाले गुदने के नाम भी अलग अलग होते थे, जैसे ठोड़ी का गुदना मुटकी, नाक का फुल्ली और कान का गुदना झुमका कहलाता था । हाथों के अलावा यह स्त्रियाँ अपने माथे, कान, पिंडली, जांघ, आदि पर भी गुदना गुदवाती थीं । इन आदिवासी जनों के अलावा यहाँ पढ़े लिखे लोग भी आते थे यह लोग केवल हाथ पर नाम गुदवाते थे । कुछ लोग शरीर में कुछ जगहों पर राम नाम भी लिखवाते थे । कुछ लोग इसलिए गुदवाते थे कि उससे धार्मिक मान्यताएँ जुड़ी थीं जैसे कि गुदवाओगे नहीं तो स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी, मोक्ष नहीं मिलेगा,पितृ तर्पण नहीं होगा आदि आदि ।
गुदना गोदने वाली स्त्री गुदने से सम्बंधित अच्छी अच्छी कहानियाँ भी सुनाया करती थी । उस समय की कहानियाँ तो मुझे याद नहीं लेकिन बड़े होने के बाद मैंने उरांव आदिवासियों के बीच प्रचलित गुदने की एक कहानी सुनी थी ।
एक कहानी
ऐसा कहा जाता है की एक बार औरंगजेब की सेना ने पटना के निकट रोहतासगढ़ के किले पर आक्रमण कर दिया । उरांव राजा उरगन ठाकुर की सेना में बलशाली स्त्रियों की एक टुकड़ी थी जो पुरुषों की वेशभूषा में लड़ती थी। इस टुकड़ी ने तीन बार औरंगजेब की सेना को हराया । फिर किसी लुन्दरी ग्वालन नामक स्त्री ने मुगलों को यह रहस्य बता दिया कि यह योद्धा पुरुष नहीं हैं बल्कि पुरुष के रूप में लड़ने वाली यह स्त्रियाँ हैं । बस फिर क्या था ,पितृसत्ता के पोषक औरंगजेब के सैनिकों का मनोबल बढ़ गया और उन्होंने इन वीर स्त्रियों को येन केन हरा दिया । तीन बार मुगलों को मज़ा चखाने वाली इस घटना की याद में आज भी उरांव स्त्रियाँ अपने माथे पर तीन खड़ी डंडियाँ गुदवाती हैं ।
उन दिनों यह सब कुछ हमें बहुत रोमांचक लगता था । इसी रोमांचक अनुभव को प्राप्त करने के लिए एक दिन मैंने और बिन्नू भैया ने मिलकर विचार किया था कि हम दोनों अपने हाथ पर अपना नाम गुदवायेंगे । हम लोग गुदने वाले की दुकान पर अपना नम्बर लगाकर बैठे ही थे कि यह हादसा घटित हुआ और हमारा प्लान फेल हो गया ।
मुझे याद है ..श्याम काका ने कहा था कि अच्छे घरों के बच्चे गुदना नहीं गुदवाते हैं । आज जब मैं अच्छे घरों के बच्चों को बतौर फ़ैशन अपने जिस्म में यहाँ वहाँ टैटू लगाये देखता हूँ तो मुझे उस घटना की याद आती है । फिर हम लोग कभी गुदना नहीं गुदवा पाए और जीवन भर अच्छे घरों के बच्चे बने रहे ।
अब आदिवासी क्षेत्रों में ही गुदना अपने पारंपरिक रूप में शेष है हालाँकि अब उसका चलन भी कम होता जा रहा है । शहरों की युवा पीढी को टैटू लगाये हुए देखता हूँ तो सोचता हूँ यह विकास के द्वारा मानव को उपहार में मिला साम्यवाद है या नवीनता और परिवर्तन के प्रति मनुष्य का आकर्षण ..जो भी हो किसी का वह कथन सत्य लगता है कि विकास का चक्र आगे बढ़ने के क्रम में कुछ मामलों में खुद को दोहराता है ।







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