
नागपुर का पंचशील टाकीज चौक
जीवन में ऐसी अनेक बातें होती हैं जो बचपन में निरर्थक लगती हैं लेकिन बड़े होने के बाद उनके बारे में सोचकर देखें तो लगता है उनमे भी कुछ न कुछ अर्थ निहित होता ही होता था ।
मौसी और बुआ इनमे बड़ा कौन होता है ?
नागपुर स्टेशन पर उतरने के बाद बाबूजी कभी हम लोगों को सीधे मौसी के यहाँ इतवारी नहीं ले गए । वे हमेशा हम लोगों को बड़ी बुआ के यहाँ धंतोली ही ले जाते थे । माँ ने कभी इस बात को लेकर न कोई ज़िद की न कोई झगड़ा किया कि उन्हें पहले अपनी बहन के यहाँ जाना है । वैसे वे चाहतीं तो कह सकती थीं कि “पहले मेरी बहन के यहाँ चलो” और बाबूजी को इसमें कोई हर्ज भी न होता क्योंकि माँ के बहनोई बाबूजी के चचेरे भाई भी तो थे ।
मामा और चाचा इनमे बड़ा कौन होता है
हालाँकि मुंबई की यात्राओं में बाबूजी स्टेशन से सीधे दयानंद मामाजी के यहाँ माटुँगा जाते थे जबकि मुंबई में प्रभादेवी में उनके चचेरे भाई वीरेंद्र कोकाश रहते थे । हाँ अगले दिन वे हम सब लोगों को वहाँ अवश्य ले जाते । मुझे लगता था कि नागपुर यात्रा में माँ की अनकही शिकायत वे मुंबई यात्रा में दूर कर देते थे । वैसे यह सिलसिला वीरेंद्र चाचाजी के मुंबई आने के बाद यानि सन पचहत्तर के बाद ही शुरू हुआ । उससे पहले तो मुंबई केवल मेरे मामा का गाँव था ।
बड़े होने के बाद मैंने इस बात पर विचार किया तो मुझे कुछ सूक्ष्म कारण नज़र आये । नागपुर में स्टेशन या बस स्टैंड से सीधे बड़ी बुआ के यहाँ धन्तोली जाने की वज़ह यह थी कि स्टेशन और बस स्टैंड सीताबर्डी क्षेत्र में आता था और धन्तोली उससे काफी करीब था । जबकि इतवारी की दूरी उसके दुगुने से भी अधिक थी । ज़ाहिर है वहाँ सामान सहित जाने में रिक्शा भाड़ा अधिक लगता । पहले के लोगों के मन में भाई बहनों के प्रति प्रेम की कोई कमी नहीं थी लेकिन जेब में पैसे कम हुआ करते थे, इसलिए व्यावहारिकता को प्रसन्न करने के लिए भावुकता और प्रेम की बलि चढ़ानी पड़ती थी ।
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| आनंद टाकीज नागपुर |
नागपुर स्टेशन से धन्तोली की ओर बढ़ते हुए साइकिल रिक्शे वाला बस कुछ ही पायडल मारता और फिर एक लम्बी साँस खींचकर रिक्शे की सीट पर बैठ जाता । सीधी ढलान से ढुलकता हुआ रिक्शा टेकड़ी वाले गणेश मंदिर के सामने से होते हुए लोहा पुल तक पहुंचता । फिर शनि मंदिर के बाद दाहिना मोड़ आते ही आनंद टाकीज़ आ जाती थी । बाबूजी आनंद टाकीज के सामने साईकिल की एक दुकान की ओर उंगली उठाकर कहते वहाँ शम्भुदयाल जीजा की दुकान है । शम्भुदयाल कोकास शिवनाथ फूफाजी के भाई थे और उन्होंने उस ज़माने में जुगाड़ कर तीन गियर वाली एक साइकिल बनाई थी ।
उन्ही की दुकान से लगी गली से तेलीपुरा मोहल्ले की शुरुआत होती है । इस गली में बड़े होने के बाद भी काफी समय आना जाना हुआ । यहाँ छोटेलाल जी का घर है जिनकी पुत्री उषा से ब्याह रचाने हेतु प्रदीप भैया बारात लेकर गए थे और अपने टेप रिकार्डर के साथ विवाह की लाइव ऑडियो रिकार्डिंग करने के लिए मैं भी उस बारात में शामिल हुआ था । इसी मोहल्ले में आजकल रीजनल कॉलेज भोपाल की मेरी क्लासमेट अर्चना श्रीवास्तव रहती हैं जो फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा के लिए एक ‘उपाय’ नमक एक संस्था चलाती हैं । अर्चना के पिता बिहारीलाल जी श्रीवास्तव हिंदी भाषी संघ विद्यालय में शिक्षक थे साथ ही शैक्षणिक पुस्तकों के प्रकाशक भी थे ।
आनंद टाकीज़ अब बंद पड़ी है और किसी विवाद की वज़ह से वह अपने पुराने रूप में सुरक्षित है साथ ही उसी लाइन में श्याम होटल की इमारत है डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर जब भी नागपुर आते थे वे इसी होटल में ठहरते थे इसलिए इस इमारत को उनके स्मृतिचिन्ह के रूप में सुरक्षित करने की मांग की जा रही है ।
रिक्शा आगे बढ़ता जाता था और बाबूजी दृष्टि के दायरे में आनेवाली उन जगहों के बारे में बताते जाते थे । तेलीपुरा की इस गली के बाद कुछ तंग सी गलियाँ और थीं जिनके नाम मोदी नंबर एक, मोदी नंबर दो, मोदी नंबर तीन कुछ इस प्रकार के थे । मोदी यह नाम पहली बार मैंने इसी सिलसिले में सुना था । मुझे पता नहीं था बाद में यह नाम सिर्फ गली तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि देश से जुड़ जायेगा और देश के लोगों की दिमाग की गलियाँ भी इसी नाम की हो जाएँगी ।
आनंद टाकीज के बाद उसी मार्ग पर श्री टाकीज़ आती थी, आजकल जहाँ बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र का चौक है , फिर एक बायाँ मोड़ और नाग नदी का पुल पार करते ही मेहाड़िया चौक । नाग नदी जिसके नाम पर नागपुर शहर का नाम पड़ा था उस समय भी शहर भर की गन्दगी अपने भीतर समेटे हुए एक नाले की तरह दिखाई देती थी । इस नदी का अस्तित्व उस माँ की तरह है जो बच्चों का बचा हुआ और फेंका हुआ जूठन खुद खा जाती है और अंततः फूड पायज़निंग का शिकार होकर मर जाती है ।
मेहाड़िया चौक से धन्तोली एरिया शुरू हो जाता है । आज यहाँ विश्वविख्यात यशवंत स्टेडियम है जो उन दिनों नहीं था । मैं यहाँ से रिक्शे से उचक उचक कर देखना शुरू कर देता जैसे बुआ का घर मुझे दिखाई दे जायेगा । रिक्शेवाले के कुछ पायडल मारते ही फिर अगले चौक पर आनन्दाश्रम होटल के निकट धन्तोली पार्क का पश्चिम की ओर का गेट दिखाई दे जाता और मैं समझ जाता बस अगले चौक पर पार्क के कोने से दाहिने मुड़ना है फिर पूर्व की ओर का गेट आयेगा उसके सामने पार्क एवेन्यू स्ट्रीट और उसमे दाहिनी ओर शिवनाथ फूफाजी का मकान ‘359 पार्क एवेन्यू’ । यह नाम मुझे किसी कहानी उपन्यास या फिल्म के नाम की तरह लगता था । बाद में आई शशिकपूर की फिल्म ’36 चौरंगी लेन ‘ मैंने इसी वज़ह से देखी थी ।
यह घर फिल्मों में दिखाए घर की तरह ही खूबसूरत था, जैसे बचपन के उन दिनों में मेरे सपनों की एक जगह । फूफाजी का दुमंजिला मकान पुराने वास्तुशिल्प के अनुसार से बना था जिनमे दरवाज़ों और मेहराबों पर लकड़ी की नक्काशी हुआ करती थी । खिड़कियों के पल्लों में छोटे छोटे चौकोर लाल,पीले,नीले और हरे काँच जड़े हुए थे । सामने धनवटे कॉलेज के परिसर में लगे दरख्तों को पारकर सुबह की धूप गैलरी में आती और फिर इन रंगबिरंगे कांचों से छनकर ऊपर के हाल में इंद्रधनुषी वातावरण का निर्माण कर देती थी ।
निचली मंजिल में सामने दालान, फिर एक बड़ा सा हाल उसके पीछे स्पेस । यहाँ से लकड़ी की सीढियाँ शुरू होती थीं जो बीच में एक लैंडिंग से मुड़कर ऊपर हाल तक पहुँचती थीं । इन सीढ़ियों पर कालीन नहीं बिछा था लेकिन इन पर पाँव रखते हुए किसी राजमहल की सीढियाँ चढ़ने का आभास होता था । पुरानी फिल्मों में एक बड़े से हाल से ऊपर की ओर जाती हुई सीढियां आपने देखी होंगी कुछ इसी तरह की थी यह सीढियां जिन पर चलते हुए धम्म धम्म की आवाज़ होती थी, आनेवाला किस मूड में है यह उसके सीढ़ियों पर चढ़ने के अंदाज़ से ही पता चल जाता था ।
स्पेस के बाद पीछे की ओर आँगन से लगा हुआ एक बड़ा सा रसोई घर, उसके बाद आंगन में बंधी हुई गाय, उसके बाद स्नान घर और लगभग पचास मीटर दूर शौचालय । नागपुर जैसे शहर के हृदयस्थल में गाँव की हवेली का आभास देते हुए फूफाजी के इस मकान के बाईं और दो ब्लॉक और थे जिन्हें उन्होंने किराये से दिया हुआ था । उनका पीछे का खाली हिस्सा भी इसी दूरी में शामिल था । अब यह तीनो मकान अपने नए आधुनिक रूप में तीनों भाइयों और उनके परिवार का आशियाना हैं
फूफाजी की माताजी गंगा भागीरथी फूलदुलारी देवी अपने अच्छे दिनों में रोज़ रसोईघर गोबर से लीपती थीं । वे शुद्धता का बहुत ध्यान रखती थीं और बहुत से नियमो को मानने वाली थीं । किसीका भी बिना नहाये रसोई में प्रवेश करना उन्हें गवारा न था । वे सफ़ेद वस्त्र धारण करतीं और माथे पर चन्दन का गोल टीका लगातीं । यद्यपि बाद में उन्होंने अपना साम्राज्य अपनी बहू यानि हमारी विद्या बुआ को सौंप दिया था लेकिन उनकी ठसक कम नहीं हुई थी । उनके भोजन करते समय उनके आसपास हम बच्चे तो दूर एक मक्खी तक नहीं मंडरा सकती थी । प्यास के आवेदन पर गलती से कोई रसोईघर में घुसा और छह फिट दूरी पर भी यदि पानी का कोई छींटा उन्हें दिखाई दे गया तो वे थाली से उठ जाती थीं । फिर बुआजी उन्हें मनाकर दूसरी थाली परोसकर देती थीं ।
जीवन भर रसोईघर में इस सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने वाली दादी माँ अपने अंतिम समय में पक्षाघात से पीड़ित रहीं । सन इकहत्तर में वे सब दीन धरम, नियम करम छोड़कर विदा हो गईं । उनके अंतिम समय तक शिवनाथ फूफाजी और विद्या बुआ ने तन मन धन से उनकी सेवा की और उनके मन को किसी प्रकार का आघात नहीं लगने दिया ।
दादी कर्मकांडी थीं लेकिन फूफाजी आस्थावान होते हुए भी काफी प्रगतिशील थे । आवास के परिसर में ही उन्होंने एक छोटा सा शिवमंदिर बनाया हुआ था जहाँ प्रतिदिन वे शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे । दादी के निधन के पश्चात फूफाजी ने विधिवत अंतिम संस्कार के सभी कार्यक्रम किये लेकिन तेरहवीं पर ब्राह्मण भोज के लिए मना कर दिया । उनका कहना था कि मृतक की आत्मा की शांति के नाम पर पंडितों को भोजन करवाने की बजाय क्यों न ज़रूरत मंदों को भोजन करवाया जाए । तेरहवीं के दिन वे पास ही के अंध विद्यालय गए और वहाँ के छात्रावास से पंद्रह बीस दृष्टि बाधित बच्चों को ले आए । फिर उन्हें भरपेट भोजन करवाया तथा धन, वस्त्र और आवश्यकता की कुछ वस्तुएं देकर विदा किया । ज़ाहिर है कि इन बच्चों में सभी जाति और धर्म के लोग थे । उनके इस अनूठे कार्य का कुछ ऐसा प्रभाव हुआ कि अनेक लोगों ने फिर इसका अनुकरण करना प्रारंभ किया ।
बुआजी फूफाजी का परिवार मेरे लिए आज भी एक आदर्श परिवार की तरह है । उन दिनों बुआजी फूफाजी के इस परिवार में बड़ी बेटी श्यामा थीं जिनका विवाह नागपुर में ही हीरालाल जी से हुआ था और वे वहीं जरीपटका में रहते थे । उनके बाद रमा, निर्मला, प्रमिला तीन बेटियाँ और सतीश, प्रदीप, दीपक तीन बेटे । फूफाजी के बड़े बेटे जगदीश का सन इकसठ में ही एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था ।
मेरे ताउजी मनमोहन कोकाश जिनकी ससुराल निकट ही कामठी में है बताते थे कि वे अपने साले साहब के साथ नागपुर अपनी बहन के यहाँ आ रहे थे कि रास्ते में उन्हें भीड़ दिखी, पता चला कि कोई नवयुवक सड़क दुर्घटना में घायल हो गया है । सहज मानवीय स्वभाव में या जल्दबाज़ी में ‘होगा कोई’ यह सोचकर वे वहाँ रुके नहीं । घर लौटने के कुछ समय बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि वह तो उन्ही का भांजा जगदीश था । फिर यह घटना उनके जीवन भर के लिए सबक बन गई, वैसे भी उन्हें अपना यह भांजा सबसे प्यारा था । बचपन में सुनी इस घटना का असर मुझ पर कुछ ऐसा हुआ कि मैं आज भी कहीं भीड़ देखकर रुक जाता हूँ और लोगों से घटना के बारे में पूछता हूँ यह सोचकर कि इस दुर्घटना का शिकार कहीं कोई अपना तो नहीं है ।
फूफाजी के दुःख के बारे में क्या कहूँ । सन पचहत्तर में जब ‘शोले’ आई थी । उसमे एक दृश्य था जिसमे गब्बर सिंह रहीम चाचा के बेटे अहमद को मारकर घोड़े की पीठ पर उसे लादकर रामगढ़ भेज देता है । इस दृश्य में रहीम चाचा बने हंगल साहब का एक डॉयलाग था “जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा बोझ क्या होता है ...बाप के कन्धों पर बेटे का जनाज़ा, इससे भारी बोझ कोई नहीं है।“
यह फिल्म देखने के बाद पहला ख्याल यही मन में आया कि शिवनाथ फूफाजी ने जब अपने युवा बेटे जगदीश की अर्थी अपने कन्धों पर उठाई होगी तब अपने आँसू भीतर ही भीतर जज़्ब करते हुए, बुआ को दिलासा देते हुए, क्या उन्होंने ऐसा ही कुछ नहीं सोचा होगा ?
स्मृतियों की इस यात्रा में फ़िलहाल नागपुर में मैं उतनी देर ही रुका हूँ जितनी देर दो स्टेशनों के बीच चलने वाली ट्रेन किसी बीच के स्टेशन पर ठहरती है । नागपुर मेरे भीतर किस तरह बसा है और आशा-निराशा, खुशी,रुमान,घुटन,विद्रोह जैसे कितने ही भावों के प्रथम प्रतिबिम्ब के जनक के रूप में मेरे भीतर इस शहर की उपस्थिति है इसका ज़िक्र शायद आगे के पन्नों में आये ।











