8 जून 2026

60.नागपुर एक : दुःख ही जिनके जीवन की कथा रही

अगले पाँच एपिसोड मे पढिए शहर नागपूर के अनकहे किस्से 

नागपूर रेलवे स्टेशन 
ऐसी कोई सड़क जिस पर आप अपने बचपन में चला करते थे, जो आपके स्कूल या किसी दोस्त के घर या बाज़ार जाती थी, बड़े होने के बाद उस पर कभी चलकर देखिएगा । 

बचपन के दिनों में जो सड़कें बहुत बहुत लम्बी लगती थीं वे अचानक छोटी लगने लगेंगी । 

जिन रास्तों को तय करने में पहले अधिक समय लगता था वे जल्दी तय हो जायेंगे । एकबारगी यह सवाल मन में आएगा .. कहीं सड़कें छोटी तो नहीं हो गईं ? लेकिन सड़कें कहाँ छोटी होती हैं,  दरअसल हमारे पाँव ही लम्बे हो जाते हैं । 

फिर ऐसे ही किसी दिन बचपन की उन सड़कों पर चलते हुए, आसपास की चीजों के आद्य रुप को याद  करते हुए अपने बचपन में लौटने की कोशिश कीजियेगा, आपको ऐसे कई लम्हे मिलेंगे जिनसे गले मिले बगैर आप जीवन यात्रा में आगे बढ़ गए थे । कुछ देर उनके साथ रहिएगा और उनके हाल पूछियेगा ..आपको ज़िंदगी में मज़ा आने लगेगा । हाँ इतना ध्यान रहे कि यह सफ़र लम्बे कदमों  के साथ नहीं बल्कि बचपन के अपने उन्ही नन्हे नन्हे पांवों के साथ होना चाहिए । साथ में बचपन के साथी हों तो और भी अच्छा ।

घर से स्कूल तक जाने वाली उस सड़क के अलावा एक और लम्बी सड़क थी मेरे बचपन में जो भंडारा से बैतूल तक जाती थी । कभी वह सड़क रेल की पटरी भी हो जाती थी । घर के पास ही भंडारा रोड स्टेशन से जवाहर नगर आर्डिनेंस फैक्टरी को जोड़ने वाली एक ऐसी रेल पटरी थी जिस पर से कभी कभार  ही कोई रेल गुजरती थी । अक्सर दोस्तों के साथ घूमते हुए मैं उस ओर चला जाता था । हम लोग पटरी  पर कान लगाकर कुछ सुनने की कोशिश करते, दोस्त कहते इससे पता चलता है ट्रेन कितनी दूर है । 

मुझे पटरी से आनेवाली उस आवाज़ में जाने कितने शहरों की आवाजें सुनाई देती थी । दोस्त कहते “ऐसा भी कहीं होता है ?” मैं कहता “ क्यों नहीं, आखिर देश की सारी पटरियां कहीं न कहीं तो एक दूसरे से मिलती ही होंगी तभी तो हम रेल से हर शहर तक जा सकते हैं । “ 

फिर एक दिन मैंने सोचा काश हम मनुष्य भी इन पटरियों की तरह होते तो हम में इतना भेदभाव तो न होता और हम एक दूसरे के दुःख सुन सकते । 

 भंडारा से बैतूल जाने के लिए भंडारा रोड स्टेशन जाने की अनिवार्यता थी । यह स्टेशन शहर से ग्यारह किलोमीटर दूर स्थित है इसलिए इसका नाम ‘भंडारा रोड’ पड़ा । जो स्टेशन शहर से दूर होते हैं उनके नाम के साथ ‘रोड’ जुड़ा होता है । स्टेशन के आसपास की बस्ती वरठी गाँव कहलाती है । भंडारा से बैतूल के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं थी । पहले ट्रेन या बस से नागपुर जाना पड़ता था फिर वहाँ से बैतूल । 

नागपूर रेल्वे  स्टेशन बाहर का दृश्य 

वैसे तो हम लोग ट्रेन से पहले नागपुर जाते फिर ट्रेन बदलकर बैतूल लेकिन जब भी कुछ अतिरिक्त समय होता हम लोग बस से नागपुर जाते और वहाँ एक दो रोज़ ठहरकर बैतूल । नागपुर में बाबूजी की बड़ी बहन विद्यावती और छोटी बहन प्रकाशवती का निवास था । माँ की छोटी बहन बहन लीला भी नागपुर में ही थीं जो बाबूजी के चचेरे भाई रमेश चन्द्र को ब्याही थीं । इस तरह वहाँ दोहरा रिश्ता था । 

विद्या बुआ बाबूजी के सभी भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं । हमारे फूफाजी शिवनाथ कोकास अंग्रेज़ी अखबार हितवाद में काम करते थे और अपने परिवार के साथ धन्तोली में रहा करते थे ।



उनकी संतानों में  सबसे बड़ी श्यामा जीजी, उनके बाद रमा जीजी, सतीश  भैया, निर्मला जीजी, प्रदीप भैया, प्रमिला जीजी और सबसे छोटे दीपक । बड़े बेटे  जगदीश का सन साठ में एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था ।

वहीं मोतीबाग रेलवे कॉलोनी में छोटी बुआ यानि प्रकाश बुआ की ससुराल थी ।


फूफाजी की इंकमटैक्स विभाग में नौकरी के कारण वे लोग कभी जबलपुर कभी नागपुर रहा करते थे । उनके बड़े बेटे राजेंद्र का जन्म हो चुका था । कालांतर में बिटिया रजनी और  छोटे बेटे राकेश का जन्म हुआ । बाद में सन अडसठ के करीब वे लोग गोकुलपेठ  स्थित अपने नए निवास में आ गए । 

इतवारी में रमेश चाचा और लीला मौसी अपने बच्चों के साथ रहा करते थे ।


चाचा जी रेल्वे में टी टी ई थे, उनके बड़े बेटे हैं प्रभात उससे छोटी सन्ध्या, फिर निशा । प्रणय का जन्म बाद में हुआ था ।

सन्ध्या के जीवन की कथा भी बहुत दुखद रही ।

विवाह के प्रारम्भिक वर्षों में ही उसका विवाह विच्छेद हो गया था, बिटिया कोमल को लेकर वह मायके आ गई । इस आघात ने जैसे उसके मन पर असर किया वैसे ही देह पर भी, इसलिए  अल्पायु में ही उसे दुनिया छोड़कर जाना पड़ा । 

मौसी और दोनों मामाओं  ने कोमल को पढ़ाया लिखाया, पाल पोस कर बड़ा किया और उसका विवाह किया । सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन दुख तो जैसे घात लगाये बैठा था । वर्ष दो हज़ार इक्कीस में आनेवाली कोविड  की दूसरी लहर कोमल को हम सबसे छीन कर ले गई । अभी मात्र चौंतीस साल की ही तो थी वह और चार साल पहले बजी शहनाइयों के स्वर भी नहीं भूल पाई थी ।

निराला ने कभी लिखा था “दुख ही जीवन की कथा रही , क्या कहूँ आज जो नहीं कही ।” कविता में औरों के दुख पढ़ना अलग बात होती है , लेकिन क्या सचमुच में हमें  ज्ञात होता है कि दुख ही जिनके जीवन की कथा होती है उन पर क्या बीतती है ? 

शरद कोकास 


59.धनक धन का धनक ती ती धुन पर नाचते शेर

बैतूल मे हर साल नाचने वाले शेरों का किस्सा पढिए इस एपिसोड मे 
“बेटा,तूने अपने ऊपे के बाल नहीं निकाले ठीक से ,अब मुझे प्राइमर लगाने में दिक्कत हो रई है ना “गुलज़ार पेंटर ने शेर के लिए बॉडी पेंट किये जाने वाले लड़के से कहा ..लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा “ तो क्या हुआ चच्चा, शेर के शरीर पर भी तो बाल होते हैं ना । “ गुलज़ार चाचा ने कहा “ तू नहीं समझेगा प्यारेलाल “ फिर वे धीरे धीरे बुदबुदाने लगे .... “ये आजकल के लौंडे भी ना .. इनसे तो बात करना ही बेकार है।” धीमे धीमे बुदबुदाते हुए वे जल्दी जल्दी ब्रश का हाथ चलाने लगे । 

शेर का बॉडी पेंट  करते हुए 

साठ के दशक के किसी साल में मुहर्रम माह की यह एक सुबह थी । बैतूल के आज़ाद वार्ड स्थित गुलज़ार पेंटर के घर में शेर बनने के लिए अपना शरीर रंगवाने वाले युवाओं और बच्चों की भीड़ लगी हुई थी । कुछ बच्चे जांघिया पहने हुए नंगे बदन देह पर पीला सफ़ेद प्राइमर लगाये बैठे थे और आगे की पेंटिंग के लिए इंतज़ार कर रहे  थे । गुलज़ार चचा के असिस्टेंट विभिन्न डिब्बों में पेंट के मिश्रण तैयार कर रहे थे और मिट्टी के तेल से ब्रश धोकर उन्हें पोछ रहे थे ।

गुलज़ार पेंटर शरीर पर शेर का पेंट करने के लिए इतने मशहूर थे कि बैतूल ही नहीं आसपास के जिलों से भी लोग उनके यहाँ पेंट करवाने आते थे,  यहाँ तक कि कई दिनों पहले से उनसे अपॉइंटमेंट लेना पड़ता था। सबसे अधिक भीड़ मुहर्रम के माह में होती थी ।
मोहर्रम की कहानी 

मोहर्रम के दिनों में शेर बनकर नाचने का यह सिलसिला कबसे शुरू हुआ यह तो पता नहीं लेकिन इसके पीछे 61 हिजरी यानी सन 680 मे घटी एक कहानी है । मोहम्मद साहब के निधन के पश्चात सन 656 ईसवी में उनके दामाद हज़रत अली चौथे  खलीफ़ा बने । उसके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र हसन को खलीफ़ा बनना था लेकिन इधर उनकी आँख मुंदी उधर उमय्यद वंश के मुआविया ने अपना दावा पेश कर दिया ।  हसन और मुआविया में यह समझौता हुआ कि ठीक है फ़िलहाल तो मुआविया सीरिया के राजा का पद संभाल ले लेकिन मुआविया की मृत्यु के पश्चात हसन के छोटे भाई हुसैन को खिलाफ़त की गद्दी दी जायेगी । लेकिन मुआविया ने राजा बनते ही षडयंत्र पूर्वक  ज़हर देकर हसन की हत्या करवा दी । 

मुआविया की मृत्यु के बाद उसके पुत्र यजीद ने खिलाफ़त हथिया ली और ख़ुद खलीफ़ा बन गया । हज़रत अली के छोटे बेटे हुसैन ने समझौते की याद दिलाई तो उल्टे यजीद ने हुसैन से अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा । लेकिन हज़रत हुसैन ने स्पष्ट मना कर दिया और पुनः अपने अधिकार की मांग की । मांग पूरी करना तो दूर यजीद की विशाल सेना ने उन्हें धोखे से करबला में घेर लिया, उनकी पेय जल  की आपूर्ती रुकवा दी और उन पर हमला कर दिया ।

दस अक्तूबर छह सौ अस्सी ईस्वी को हुए इस युद्ध या कहें  कि नर संहार में हज़रत इमाम हुसैन  अपने परिवार के छोटे बड़े बहत्तर सदस्यों के साथ शहीद हो गए । 

इस्लामिक कैलेण्डर के अनुसार हज़रत इमाम हुसैन की मृत्यु हिजरी वर्ष इकसठ यानी 680 में मोहरम मास की दसवी तारीख को हुई थी अतः उनकी स्मृति में इस मास में मुहर्रम या मोहरम नामक यह शोक पर्व मनाया जाता है । इस्लाम में विशेषकर हज़रत साहब के परिवार की परम्परा को मानने वाले शिया समुदाय में हज़रत हुसैन को ‘शेरे ख़ुदा’ का दर्जा दिया गया है इसलिए उनकी स्मृति में शेर बनने की परम्परा है । लोग इस अवसर पर मन्नत मानते हैं और मन्नत पूरी होने पर या पूरी होने से पहले अपने परिवार के बच्चों को शेर बनाते हैं । जिसे शेर बनाया जाता है उसे अपने शरीर को शेर जैसा रंग कर लोगों के बीच जाकर नाचना पड़ता है और अपने लिए दुआएँ मांगनी होती हैं ।

ऐसा नहीं है कि बैतूल में केवल मुहर्रम में ही शेर दिखाई देते थे । मुहर्रम के अलावा गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव में भी शेरों  का जलवा बना रहता था  । वैसे भी जिन्हें शेर बनकर नाचने का शौक हो तो उनके लिए शेर बनना केवल मुहर्रम तक क्यों सीमित रहे । वैसे भी हिन्दू परम्परा में शेर का पौराणिक महत्व है । यहाँ  दुर्गा देवी का वाहन शेर  है वहीं विष्णु के नरसिंह अवतार में भी सिंह या शेर है । इसलिए गुलज़ार चचा के पास गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में भी काम की कमी नहीं रहती थी । उनके लिए देह पर शेर पेंट करना ही धर्म था फिर वह देह चाहे हिन्दू की हो या मुसलमान की । हाँ इतना अवश्य था कि वे कभी कभी मुसलमान शेर के सर पर उसकी इच्छानुसार हरा कपडा पहना देते थे । हिन्दू शेर या तो नंगे सर रहता था या उस पर भी वे एक भगवा कपड़ा डाल देते थे । वैसे भी शेर बनने के बाद वह उस्मान है या उत्तम कौन जान सकता था । 

अब कुछ बातें गुलज़ार चचा द्वारा किये जाने वाले शेर के  बॉडी पेंट की तकनीक पर भी हो जाएँ । पेंटर गुलज़ार सबसे पहले ब्रश से पूरे शरीर पर पीला और सफ़ेद प्राइमर लगाते थे । प्राइमर सूख जाने के बाद धीरे धीरे ब्रश चलाते हुए काले भूरे रंग से शेर के शरीर पर धारियाँ बनाते । पूरा शरीर रंग जाने के बाद चेहरा रंगा जाता । रंग लगाने के बाद वे कभी कभी मुखौटे भी पहनाते थे । वे गत्ते से तरह तरह के मुखौटे बनाते और उस पर पेंट कर उसे शेर के चेहरे का आकार देते थे । 

गुलज़ार भाई के पास शेर की मूँछ बनाने के लिए एक हुनर था । वे आम की गुठली में छेद करते और उसमे मुर्गी के पंख फँसाते जाते । दाढ़ी मूँछ  बनाने के लिए भी वे आम की गुठली के रेशों का प्रयोग करते थे । इसके लिए वे गर्मी के दिनों में ही कई बोरे आम की गुठली इकठ्ठा कर लिया करते थे । जूट से शेर के बाल बनाए जाते और रस्सी की पूँछ बन जाती । यह वही पूँछ होती जो रामलीला के समय वानरों की कमर पर पहनाई जाती थी । उसके बाद नकली दांत लगाए जाते जिसमे बाहर की ओर निकली हुई लाल रंग की एक लम्बी जीभ होती । शेर के नाख़ून भी बनाए जाते और उन्हें बघनखा जैसी एक चीज पहनाई जाती । चेहरे का पूरा श्रंगार होता । बाल वाले बिना बाल वाले , डरावने, सौम्य जाने  कितने तरह के शेर उनकी पेंटिंग वर्कशॉप में तैयार होते थे ।


इधर शेर बनकर तैयार होता उधर  बाजे वाले भी अपने ढोल ड्रम , क्लेरेनेट, सेक्सोफोन , घुंघरू आदि लेकर तैयार हो जाते । शेर के पूर्णरूपेण तैयार होने के पश्चात उसे एक शिष्य की भांति बतौर ट्रायल सबसे पहला नाच गुलज़ार पेंटर के सामने करना होता था उसके बाद उस शेर को बाहर जाने के लिए अनुमति मिल जाती ।

बैतूल शहर में वैसे तो बाजे वाले अलग अलग अवसरों पर किसिम किसिम की धुन बजाते थे लेकिन शेर का बाजा सब बाजों से अलग बजाया जाता था । यहाँ बाजे वाले जो धुन बजाते हैं उसमे लगातार ‘धनक धन का धनक तीती, धनक धन का धनक तीती’ यह धुन सुनाई देती हैं । यह ऐसी धुन है जिसे सुनते हुए पाँव अपने आप थिरकने लगते हैं ।

मोहर्रम, गणेश व दुर्गा उत्सव में गुलज़ार चचा के पास इतना काम रहता था कि संभाले नहीं संभलता था इसलिए कुछ और पेंटर भी उनके शागिर्द बन गए थे जिनमे एक सद्दू मिस्त्री भी थे जो शौकिया पेंट करते थे। सद्दू मिस्त्री वैसे मूल रूप से हमारे घर के फर्नीचर कारखाने में मिस्त्री का काम करते थे । सद्दू मिस्त्री  आदिवासी क्षेत्र से आते थे । गणेश दुर्गा के दिनों में वे हमारे घर के पास स्थित बजरंग व्यायामशाला में अपनी पेंटिंग का वर्कशॉप  खोल लेते और पूरे नवरात्र में शेर पेंट किया करते । 

दशहरे के दिन जुलुस में उनके बनाये शेर के अलावा वानर, राक्षस और रामायण के विभिन्न पात्र भी दिखाई देते थे ।


मुझे याद है श्यामबिहारी चौरसिया को वे दशरथ बनाते  थे । मदन मोहन ताउजी को देवी का रूप देने और दिनकर राव वाघ को राक्षस का रूप देने का कार्य भी उन्होंने किया था । दुर्गा मंदिर और व्यायामशाला मंडल के इन लोगों की एक पूरी टीम थी जिनमे रूपनारायण चौरसिया यानी रुप्पन काका, मुन्नू तिवारी, बाबा वाघ, नागोराव कावले , सद्दू मिस्त्री,शांतिलाल तातेड, विनोद डागा तथा  दुर्गा मंदिर निर्माण के ठेकेदार उस्मान भाई जैसे लोग शामिल थे । यह सब लोग अखाड़े से भी जुड़े थे । 

गुलज़ार चचा को अपना और अपने परिवार का पेट भी पालना था इसलिए मुहर्रम , गणेश और दुर्गा उत्सव के बाद बाक़ी दिनों में वे टाकीज के सामने लगाए जाने वाले सिनेमा के बड़े व छोटे बोर्ड भी बनाते थे और अपने ब्रश के कमाल से दिलीपकुमार देवानंद , राजकपूर , आशा पारेख , मीनाकुमारी सबके चेहरे वे हूबहू बना देते थे ।


गुलज़ार चचा सन नब्बे तक जीवित रहे । अंतिम दिनों में वे यद्यपि काम करने में असमर्थ हो गए थे लेकिन उनके बेटे सत्तार ने इस परंपरा को जारी रखा । यद्यपि अब शेर बनाने की ओर उनका  रुझान कम हो गया है इसलिए कि अब शेर बनने का यह सिलसिला भी ख़त्म होता जा रहा है । वैसे भी अब जो शेर बनते हैं उन्हें बनाने में न मेहनत है न कला, न किसी तरह की आत्म संतुष्टि । बस शरीर पर छापे  रखो और भांति भांति के रंग स्प्रे पेंट गन से स्प्रे कर दो । फिर झबरे बालों वाला विग पहना दो । विग, दाढ़ी, मूँछ सब कुछ बाज़ार में रेडीमेड मिलता है । 

बचपन की मेरी स्मृतियों में पिता के चचेरे भाई यानि हमारे किसन काका का शेर बनना अच्छी तरह याद है । वे मोहरम के समय वे अपने शरीर पर पेंट करवाते थे और बाजे वालों द्वारा बजायी गई ‘ धनक धन का धनक तीती ‘धुन पर घंटों शेर का नाच नाचते थे । बाद में किसन काका का दिमाग पूरी तरह चल गया था । वे बाज़ार के दिन बाज़ार उठ जाने के बाद कचरे में जाने क्या क्या ढूँढा करते थे  और सड़े गले फल,संतरे, मिर्ची के डंठल आदि उठा लाया करते थे और उनका रस निकाल कर पी जाते थे । 

एक दिन इसी चक्कर में उन्होंने कोई ज़हरीली वस्तु खा ली जिसके फलस्वरूप उनका निधन हो गया । लेकिन वे अपने शेर नाच के लिए पूरे बैतूल में वे मशहूर थे । बाद में जब उनका दिमाग उनके वश में नहीं रहा, वे कभी कभी माथे पर साइकल का ट्यूब बान्धकर उसमें दो जलती हुई अगरबत्तियाँ खोंसकर बाज़ार में निकल जाते थे और ‘बम्बई दन्न ‘ का नारा लगाते थे । उनका यह नारा पूरे बैतूल में प्रसिद्ध था । लेकिन कभी किसी ने उनका अपमान नहीं किया न मज़ाक उड़ाया या किसी प्रकार की चोट पहुँचाई । छोटे शहर में इंसान को पहले इंसान समझा जाता था । 

बैतूल में ही नहीं बल्कि सभी छोटे शहरों में आपस के सारे भेदभाव भूलकर पूरे शहर के एक संयुक्त परिवार की तरह से रहने के यह दृश्य अब  सामजिक पटल से लुप्त हो गए हैं । जीवन यापन हेतु अब बाहर जाकर काम करना विवशता है सो घर के लड़के बाहर निकलते हैं और वहीं बस जाते हैं । संयुक्त परिवार में एक छत के नीचे  भी सबके चूल्हे अलग - अलग हो गए हैं । सुख सुविधा की आकांक्षा और समय की मांग ने अब इन जीवंत दृश्यों को ऐसे  अतीत में बदल दिया है जिसे सिर्फ किताबों में या मुझ जैसे कुछ संवेदनशील लोगों की स्मृतियों में पढ़ा जा सकता है । अब लोग शेर नहीं बनते लेकिन कुछ लोग अपने ही घर में शेर हैं ।

शरद कोकास 

58.भाग भाग राक्षस तलवार लेकर देवी आई


“भैया, आपने तो समझो मेरा वध ही कर दिया था उस दिन ।“ सद्दू नाई  ने चाय की चुस्की लेते हुए मदन मोहन ताऊजी से कहा । 

ताऊजी हँसने लगे, “भाई, अब देवी माता है तो वह राक्षस का वध करेगी ही, यह समझ लो कि तुम्हारी किस्मत अच्छी थी इसलिए बच गए तुम उस दिन । “ 

“बच तो आप भी गए भैया ।” बाबा वाघ ने हँसते हुए कहा “वर्ना देवीजी पर राक्षस का मर्डर करने के आरोप में धारा 302 लगना तो पक्का था ।“  

ताऊजी ने एक ठहाका लगाया और सरौते से कतरी हुई सुपारी सद्दू  की ओर बढ़ाते हुए कहा “और क्या, सरकार के रिकार्ड में देवी और राक्षस थोड़े ही होते हम लोग ।“ 

ताऊजी और सद्दू  उन दिनों को याद कर रहे थे जब नवरात्र के बाद दुर्गा मंदिर के प्रतिमा विसर्जन के जुलूस में वे देवी बनते थे और बाबा वाघ राक्षस । 

बैतूल में इसी तरह कुछ कुछ नया घटित होता रहता था । यद्यपि यह शहर विकास की दौड़ में खरगोश कभी नहीं रहा, उसे अपनी कछुए की मंथर गति ही पसंद थी । अब एक छोटे से कस्बे में जीवन की इससे तेज़ गति हो भी क्या सकती थी । लोग अपनी छोटी छोटी खुशियों में मस्त थे । 

मनोरंजन के नाम पर दो सिनेमाघर रघुबीर और ज्योति टाकीज़, कभी कभार रामलीला और अन्य धार्मिक कार्यक्रम । फिर रामजन्मोत्सव, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव तो धूम धाम से मनाये जाते थे, ईद और क्रिसमस पर भी काफी चहल पहल रहती थी । बैतूल के लोग सांप्रदायिक सौहार्द्र जैसे शब्द को शब्दकोश या सरकारी विज्ञप्ति की वज़ह से नहीं जानते थे वह उनकी जीवन चर्या में गेहूं में ग्लूकोज़ की तरह शामिल था ।  

कृष्ण मंदिर और दुर्गा मंदिर में प्रतिदिन होने वाली शाम की आरती में हम बच्चों के शामिल होने का उद्देश्य भक्ति भाव से अधिक प्रसाद के लिए होता था । तीज त्योहारों का सिलसिला बरसात के दिनों से ही प्रारंभ हो जाता था लेकिन दशहरे और दुर्गा पूजा का यहाँ ख़ास महत्त्व था । यह समय शहर के वातावरण में अलग आनंद घोल देता था । घंटों की आवाज़ और सुबह शाम की आरती से मोहल्ला गूंजता रहता । अंतिम दिन यानि विसर्जन के दिन सुबह से ही तैयारी शुरू हो जाती । 

मदन मोहन ताऊजी दोपहर तक देवी काली की भूमिका में सज जाते थे, देह पर कालिख,पीली धोती, माथे पर मुकुट , सर पर लम्बे बालों का विग, स्त्रियोचित श्रृंगार, गले में नारियल के खाली कोटरों से बनी मुंड माला और एक लम्बी सी लाल रंग की नकली जीभ । उनके एक हाथ में लाल रंग से रंगा खप्पर होता और दूसरे हाथ में लोहे की भारी तलवार । 

वहीं सद्दू  राक्षस के मेकअप में आ जाते थे । रंग तो वैसे ही उनका गहरा था इसलिए काला रंग लगाने की उतनी ज़रूरत नहीं होती थी फिर भी राक्षस जैसा दिखने के लिए वे कालिख पोत लेते । कभी कभार वे राक्षस का मुखौटा भी लगा लेते थे और कमर में अधोवस्त्र के नाम पर एक काला कपडा लपेट लेते थे । कमर में बंधे उनके पटके में एक कटार भी खुसी होती थी और मुँह में बाहर की ओर निकले राक्षस जैसे नकली दांत वाला सेट ।

पुराण कथाओं में वर्णित पात्रों को जीवित रूप में देखने की लालसा हर श्रद्धालु व्यक्ति के मन में होती है इसलिए हमें पौराणिक फिल्मे, नाटक और धारावाहिक अच्छे लगते हैं । बैतूल के इस दशहरे के जुलूस के विशेष आकर्षण होते थे देवी और राक्षस । लगभग शाम के समय जुलूस प्रारंभ होता था । 

जुलुस में सबसे आगे बैंड बाजे वाले होते थे, उसके बाद एक ठेला होता था जिस पर बैटरी से चलने वाला एम्प्लीफायर और लाउड स्पीकर रखा होता था । एम्प्लीफायर से निकले तार के अंतिम सिरे पर होता एक माइक जिसे थामे होता झूम झूम कर जस गीत गाने वाली मंडली का मुख्य गायक ।  उसके बाद ढोल और नगाड़े वाले आते थे । फिर उसके बाद देवी बने ताऊजी और उनके आगे पीछे घूमते हुए  राक्षस बने सददु नाई । ताउजी हवा में अपनी तलवार लहराते और उसे आड़ा तिरछा घुमाते हुए राक्षस के आगे नृत्य की मुद्रा में गोल गोल घूमने लगते । राक्षस भी कुछ इस तरह अभिनय करता जैसे वह तलवार के वार से बचने की कोशिश कर रहा हो । जनता के आकर्षण का यह दृश्य पूरे जुलूस में विद्यमान रहता । अंततः प्रतिमा विसर्जन स्थल पर पहुंचकर जुलूस की समाप्ति हो जाती ।

जुलूस का दृश्य 
अपने जीवन में सबसे पहला जुलूस मैंने यही प्रतिमा विसर्जन का देखा था । उसके बाद देखी संघ की प्रभातफेरी, गणतंत्र दिवस का जुलूस,इंदिरा गांधी का जुलूस और आन्दोलनकारियों का जुलूस । फिर मुक्तिबोध की लम्बी कविता ‘अँधेरे में’ पढ़ने के बाद समझ में आया कि एक ऐसा भी जुलूस होता है जिसमे आलोचक,विचारक,कवि मंत्री उद्योगपति के साथ कुख्यात हत्यारा डोमाजी उस्ताद भी शामिल है, साथ ही काले घोड़ों पर सवार खाकी पोशाक में वे सैनिक हैं जिनके चेहरे का आधा भाग सिंदूरी और आधा गेरुआ है। 

“यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच काय /भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब / साफ़ उभर आया है/ “

मैं जब भी आधे सिंदूरी, आधे गेरुए में रंगे सैनिक का ख्याल करता उसमे मंत्री के साथ हत्यारे डोमाजी का चेहरा भी मिल जाता और अंत में वह चेहरा देवी बने ताऊजी और राक्षस बने बाबा वाघ के चेहरे में बदल जाता । अवचेतन के यह सब खेल खेलने में मुझे बहुत आनंद आता है । स्वप्नों में हम रोज़ यही खेल तो खेलते हैं कहीं का व्यक्ति कहीं , किसी का चेहरा किसी का धड़ , अनजान अनचीन्ही जगहें, अनजान लोग । हालाँकि जो भी हम देखते हैं उसके बारे में या उससे मिलते जुलते दृश्य,व्यक्ति या स्थान के बारे में हमने पढ़ा हुआ या सुना हुआ होता है ।

उस साल ऐसा क्या हुआ कि फिर यह जुलूस कभी नहीं निकला 

बैतूल की सडकों पर दशहरे का वह जुलूस हर साल की तरह ही निकला था लेकिन उस साल जुलूस के इस मूल दृश्य में अचानक एक परिवर्तन उपस्थित हो गया ।उस दिन ढोल वाले कुछ अतिरिक्त उत्साह से ढोल बजा रहे थे । देवी बने ताऊजी कुछ देर तक तो राक्षस के साथ आमोद-प्रमोद की मुद्रा में तलवार लहराकर युद्ध का अभिनय करते हुए जुलुस के साथ चलते रहे, फिर अचानक एक स्थान पर खड़े हो गए । उन्होंने सर झटककर अपने लम्बे बाल आगे किये और आँखे बंद कर झूमना प्रारंभ कर दिया । जुलूस में शामिल लोगों के लिए यह कोई असामान्य बात नहीं थी । ढोल की ढम्म ढम्म की आवाज़ उनके अवचेतन में दाखिल हो रही थी और संगीत का प्रभाव जैसा कि आम लोगों पर होता है उन पर भी हो रहा था ।

अचानक भीड़ में से एक आवाज़ आई ...”भागो रे.. देवी आ गई , देवी आ गई ..”अवचेतन के शून्य हो जाने की स्थिति में यह सजेशन उनके लिए काफी था । यह आवाज़ सुनकर वे सीधे ट्रांस की स्थिति में पहुँच गए और हेल्युसिनेशन में अपने आप को सचमुच की देवी समझने लगे । ढोल नगाड़े वालों को भी यह देखकर आनंद आ गया कि उनका बजाना सार्थक हो गया है । वे उत्साह में और ज़ोर से बाजा बजाने लगे । ताउजी काफी देर तक आँखें बंद किये झूमते रहे फिर अचानक उन्होंने एक झटके से आँखे खोली ।

राक्षस बने सद्दू  अब तक तो उनकी इस स्थिति का आनंद ले रहे थे क्योंकि प्रति वर्ष की भांति यह दृश्य भी उनके लिए यह सामान्य बात  थी । लेकिन इस बार जैसे ही उन्होंने देवी बने ताऊजी की ऊपर की ओर चढी हुई लाल लाल ऑंखें देखीं  वे सहम गए । एक क्षण में वे जान गए कि ताउजी देवी  का अभिनय नहीं कर रहे हैं । इससे पहले कि  वे कुछ सोच पाते ताउजी ने हवा में अपनी तलवार लहराई और राक्षस बने बाबा वाघ की ओर दौड़ गए  । सद्दू ने तुरंत निर्णय लिया और सड़क पर दौड़ लगा दी । 

यह दृश्य जुलूस  में शामिल सभी लोगों के लिए अप्रत्याशित था, आगे आगे राक्षस और पीछे पीछे  देवी । एक जगह तो वे सामने ही आ गए । देवी ने तलवार लहराई और राक्षस पर वार किया राक्षस ने टेढ़े होकर तलवार का वार बचाया और  दौड़ लगा दी और एक गली में घुस गया । इस बीच लोगों को भी स्थिति की गंभीरता समझ में आ गई थी, लोग दौड़े और उन्होंने देवी बने मदन मोहन ताऊजी को पकड़ लिया । यद्यपि उन्हें संभाल पाना चार पांच लोगों के लिए भी मुश्किल था । जैस तैसे लोग उन्हें पकड़कर घर ले आये और कुर्सी पर बिठाकर उन पर बाल्टियों से पानी डालना शुरू किया .. इतने में किसी ने कहा “होश में आओ मदन.. तुम मदन हो देवी मैया नहीं हो । “ बस इतना सुनते ही वे सामान्य स्थिति में आ गए । फिर उन्होंने कपडे बदले और भीतर जाकर चुपचाप सो गए । 

वह उनके देवी बनने का अंतिम साल था । अगले साल उन्होंने साफ़ मना कर दिया । सददु  भी फिर राक्षस नहीं बने । मदन भैया पर देवी कैसे आई इसका विश्लेषण श्रद्धालु लोग भले अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार करें लेकिन वास्तविकता यह थी कि अवचेतन द्वारा सूचना स्वीकार करने की स्थिति में आते ही वे ट्रांस की स्थिति में आ गए थे ।

इस घटना का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण 

मनोविज्ञान में हिप्नोटिज्म या सम्मोहन एक शाखा है जिसमे इस तरह के केसेस का विश्लेषण किया जाता है । अक्सर ढोल नगाड़े की आवाज़ सुनते हुए हमारा अवचेतन उस आवाज़ पर केन्द्रित हो जाता है । टीवी पर ध्यान से सीरियल या फिल्म देखते समय, नाटक देखते समय, एकाग्र होकर संगीत सुनते समय, किसी का व्याख्यान सुनते समय या कविता पाठ सुनते हुए भी अक्सर ऐसा  होता है । ऐसे समय यदि कोई सजेशन आप को दे तो वह कानों  से होता हुआ सीधे अवचेतन में दाखिल हो जाता है । ऐसे समय हमारा मस्तिष्क तर्क नहीं करता । आपने भूत उतारने वाले केन्द्रों में यह देखा होगा कि वहाँ तेज़ आवाज़ में ढोल बजाये जाते हैं । फिर जिस व्यक्ति को भूत बाधा से ग्रसित माना जा रहा है उसे यदि कोई मान्त्रिक या बैगा सजेशन दे कि “तुम्हारे शरीर में फला फला भूत है तो वह उसे बिना तर्क के स्वीकार लेता है ।  शरीर में देवी देवता भी इसी तरह सजेशन से आते हैं ।

ताऊजी के साथ भी यही हुआ था । ढोल नगाड़ों की आवाज़  के साथ जैसे ही उनका अवचेतन तरल अवस्था में पहुंचा, लोगों ने चिल्लाना शुरू किया ‘देवी आ गई  देवी आ गई ‘ और वे यह सूचना ग्रहण कर अपने आपको देवी का अवतार समझने लगे । आज न मदन मोहन ताउजी हैं न सद्दू  लेकिन मेरे अवचेतन में आज भी उनके देवी और राक्षस वाले बिम्ब विद्यमान हैं  ।

शरद कोकास 

7 जून 2026

57. गू - गोबर छोड़कर सब खाना है

शीर्षक पढ़कर नाक -भौं  न सिकोड़ें , पढिए आगे आपको बहुत मज़ा आएगा । 

बाबूलाल जी और राजरानी देवी 
बैतूल के हमारे पुराने घर जितने ही बुज़ुर्ग थे दादाजी यानी बाबूलाल जी वैद्य । वे जब दूध में मिस कर रोटी खाते थे तो दूध उनकी मूंछों की सफ़ेदी में इस तरह मिल जाता था कि पता ही नहीं चलता था दूध की वज़ह से मूंछे सफ़ेद हुई हैं या मूंछों की वज़ह से दूध इतना सफ़ेद दिखाई दे रहा है । 

दादाजी उस ज़माने के मल्टीटेलेंटेड व्यक्ति थे । खेती किसानी और फर्नीचर का काम करते हुए उन्होंने आयुर्वेद चिकित्सा का डिप्लोमा भी ले लिया था और गोंड आदिवासियों का निशुल्क उपचार करना प्रारंभ करना शुरू कर दिया था । प्राकृतिक चिकित्सा और जड़ी बूटियों में उनकी काफी दिलचस्पी थी । अक्सर वे जंगलों की ओर निकल जाते और आदिवासियों के बीच प्रचलित जड़ी बूटियाँ ढूंढकर ले आते ।

खेतीबाड़ी और दुकान का काम उनके भाईयों और बेटों ने संभाल ही लिया था इसलिए वे निश्चिन्त होकर  पूरी तरह चिकित्सा सेवा के कार्य में लग गए । उनकी इच्छा हुई कि लोगों की चिकित्सा के लिए एक दवाखाना खोला जाए । पुराने घर के सामने ही सड़क के उस पार उन्होंने ज़मीन ली और एक नए भवन का निर्माण प्रारम्भ किया ।

‘कोकास भवन’ को अंतिम रूप देते हुए उन्नीस सौ सत्तावन की गर्मियों में राज मिस्त्री एच के आकार में दिखाई देने वाली इस इमारत की एक दीवार पर एक चक्र के भीतर उकेर  रहे थे “मुनि बाबूलालजी वैद्य औषधालय’ । दादाजी उस समय ‘मुनि समाज’ के अध्यक्ष भी थे सो अपने नाम के साथ मुनि लिखते थे ।

दवाखाने के सामने खड़ा नीम का पेड़ जो अब तक केवल राहगीरों को छाँव देता था दूर गांवों से आनेवाले मरीजों की बैलगाड़ियों और उनके बैलों को भी छाँव देने लगा ।  मरीज़ों के लिए पीछे की ओर बनाये गए कमरों से उनकी कराहों के साथ साथ उनके घरवालों की प्रार्थनाओं के स्वर भी सुनाई देने लगे । 

नीम के पेड़ और नीम के धोखे में लगाये गए बकायन के पेड के नीचे ईट पत्थरों से बने टेम्पररी चूल्हे दिखाई देने लगे जिन पर रखे तवों पर मरीज के रिश्तेदार मक्के और ज्वार की रोटियाँ थाप कर पकाते हुए नज़र आने लगे ।

गर्मियों की दोपहर में हवाएँ खामोश हो जाती थीं । उस खामोशी में गूंजती थी लोहे के खलबत्ते में जड़ी बूटियाँ कूटने की धम्म धम्म की आवाज़ । वह घर के पुरुष की तरह बिना आवाज़ किये कोई काम कर ही नहीं सकता था वहीं उसके बरअक्स संगमरमर की खरल घर की सुघड़ स्त्री की तरह धीमे धीमे शांत स्वरों में जड़ी बूटियों को पीसती और औषधि हेतु उपयुक्त उनका चूर्ण बना देती ।

दादाजी ने दान-पुण्य और समाज सेवा किस्से कहानियों और पुराणों से नहीं सीखी थी, वे एक मनुष्य के रूप में वे अपना कर्तव्य जानते थे । उस ज़माने के अपने इस नर्सिंग होम में  दादाजी निर्धन मरीज़ों की न केवल निशुल्क सेवा किया करते अपितु उनके रहने खाने का प्रबंध भी कर देते थे । बाक़ी आय उनकी यही थी कि जो स्वेच्छा से जो कुछ भी दे दे वह ठीक ।

मुनि बाबूलाल जी वैद्य का यह दवाखाना अपने आप में एक अनुसंधान केंद्र भी था । वे प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेदिक पद्धति से मरीज़ों की चिकित्सा करते थे और नित नये नुस्खों की खोज कर अपने अनुसंधानों को एक रजिस्टर में लिखते रहते थे । उनके निधन के बरसों बाद एक दिन मैंने वह रजिस्टर देखा था, उसमे कैंसर तक का इलाज़ लिखा हुआ था । 

दादाजी की ओपीडी दालान में और उसके बाईं और स्थित कमरे में थी। एक बड़ी सी टेबल के पीछे कुर्सी पर उनका आसन था । दीवार पर उनका आयुर्वेदाचार्य का प्रमाणपत्र और धन्वन्तरी की एक तस्वीर । टेबल पर औषधि की कुछ डिब्बियां, स्टेथोस्कोप,रजिस्टर कलम, दवात और बिजली की मशीन ।

बाबूलाल जी वैद्य 
बिजली की यह मशीन भी गज़ब की चीज़ थी । यह लकड़ी के एक छोटे से बॉक्स में स्थित थी जो दो बैटरियों से चलती थी । उसमें धातु की दो छड़ थीं जिनकी मूठ लकड़ी की बनी थी, एक का रंग हरा था और दूसरी का लाल । इनमे से एक छड़ वे घुटना दर्द , गठिया या वात के मरीज़ के हाथ में पकड़ा देते थे और दूसरा हिस्सा मूठ की ओर से स्वयं पकड़े रहते, फिर प्रभावित स्थान पर गीला कपड़ा रखते और सेल लगाकर बटन ऑन करते । किर्र किर्र की आवाज़ के साथ वह मशीन चालू हो जाती । 

किर्र की यह आवाज़ जैसे ही बच्चों के कानों तक पहुँचती वे दवाखाने की ओर दौड़ लगा देते थे क्योंकि इसके बाद का दृश्य देखने लायक होता था । जैसे ही दादाजी अपने हाथ की छड़ का लोहे वाला हिस्सा उस गीले कपड़े पर रखते मरीज़ को बिजली का हल्का सा झटका लगता और वह ज़ोर से उछलता । अपने हाथ में पकड़ी लोहे की छड़ वह छोड़ने की कोशिश करता लेकिन छोड़ नहीं पाता । दादाजी रॉड से हल्का हल्का स्पर्श दर्द वाली जगह पर करते और हँसते हुए कहते “ कोई बात नहीं, यह मामूली दर्द  सह लो फिर तुम्हारा गठिया का दर्द हमेशा के लिए गायब हो जायेगा ।“

ऐसा दृश्य रोज़ नहीं घटित होता था लेकिन जब भी होता कोई न कोई हम बच्चों तक यह खबर पहुँचा ही देता था कि ‘बिजली की पेटी’ निकाली जा रही है । हम लोग दौड़कर वहाँ पहुँच जाते । मरीज़ों को चिल्लाते हुए ,उछल कूद करते हुए और दादाजी को उन्हें डाँटते देखकर हम बच्चों को बड़ा मज़ा आता था । हमें हँसता देख कभी कभी मरीज़ भी अपना दर्द भूलकर हँसने लगता । 

यह मशीन दरअसल TENS (Transcutaneous Electrical Nerve Stimulation) या Muscle Stimulator (इलेक्ट्रोथेरेपी मशीन) है। गठिया और मांसपेशियों के दर्द से राहत के लिए इन मशीनों के जरिए नसों को हल्का करंट (इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन) दिया जाता है। 
ये मशीनें दो तरह से काम करती हैं:
  • पेन इलेक्ट्रोड (Pen Electrode): आप जिन दो हैंडल्स (या पेन जैसी रॉड) की बात कर रहे हैं, उनका उपयोग चिकित्सक एक्यूप्रेशर या एक्यूपंक्चर पॉइंट्स पर सीधा दबाव और करंट देने के लिए करते थे। 
  • इलेक्ट्रोड पैड्स (Electrode Pads): आधुनिक TENS मशीनों में हैंडल्स की जगह त्वचा पर चिपकाने वाले पैड (इलेक्ट्रोड) होते हैं, जिनसे सुन्न करने वाली हल्की झनझनाहट पैदा होती है। यह तंत्रिका संकेतों को अवरुद्ध करके दर्द को रोकता है। 

बाबूलालजी को लोग सम्मान से बापू कहते थे । उनके के बारे में यह बात मशहूर थी कि जिस मरीज़ को जिला अस्पताल वाले वापस कर देते थे उसे भी बापू अपनी चिकित्सा से ठीक कर देते थे । यह बैतूल के विकास का प्रारम्भिक समय था और जिस तरह सम्पूर्ण देश में चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव था उसी तरह बैतूल में भी यह सुविधायें अपर्याप्त थी फिर भी इस तरह के वैद्य और हकीम आदि अपने ज्ञान और अध्ययन के आधार पर जनता की सेवा करने में लगे थे ।

अब पढिए बाबूलाल जी  के मित्र डॉ जौहरी का किस्सा  

अब बापू के दवाखाने के साथ यदि डॉ. वी एम जौहरी के दवाखाने का उल्लेख न आये तो बात अधूरी रह जाएगी । घर के निकट  ही देवी मन्दिर के पीछे मेन रोड पर डॉ. जौहरी  का दवाखाना था ।

इसी कॉर्नर पर था डॉ जौहरी का दवाखाना 

वे भी आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज़ करते थे लेकिन आवश्यक एलोपेथी औषधियाँ भी उनके पास रहती थीं । उन्हीके सामने कांतिलाल एण्ड ब्रदर्स की मशहूर दवा की दूकान भी थी ।  

कांतिलाल एंड ब्रदर्स की दवा  की दुकान 
उन्नीस सौ पैंसठ में बापू के निधन के बाद उनका दवाखाना श्याममोहन  चाचाजी ने संभाल लिया था लेकिन उन्नीस सौ सतत्तर में उनकी असामयिक मृत्यु के पश्चात यह दवाखाना भी बंद हो गया । उनके बाद किसी के पास न योग्यता थी न किसी को इस  काम में रूचि थी, अतः  हमारे घर से चिकित्सा सेवा का यह कार्य हमेशा के लिए बंद हो गया । 

बैतूल शहर में चिकित्सकीय व्यवसाय मगर पनपता रहा । नए नए चिकित्सक आते गए साथ ही डॉ. जौहरी का दवाखाना भी बाकायदा चलता रहा। डॉक्टर जौहरी अपने चिकित्सकीय ज्ञान के अलावा अपनी स्पष्टवादिता और तीखी ज़ुबान के लिए भी मशहूर थे । वैसे तो उनके कई किस्से मशहूर थे लेकिन एक किस्सा मुझे याद आ रहा है । 

डॉ.जौहरी अपने मरीज़ों की दवा के साथ साथ उनके पथ्य परहेज़ पर भी ज़ोर देते थे । एक दिन दवा के साथ पथ्य परहेज़ संबंधी हिदायतें प्राप्त कर जैसे ही एक मरीज़ चलने के लिए तत्पर हुआ उसने पूछा

 “डॉक्टर साहब, वो..क्या क्या नहीं खाना है ?” डॉ. साहब ने उसे बता दिया । 

गेट पर खड़े होकर उसने फिर पूछा “डॉक्टर साहब, भूल गया एक बार और बता दीजिये क्या क्या नहीं खाना है ?”

 डॉ. जौहरी तब तक अगले मरीज़ में व्यस्त हो चुके थे फिर भी उन्होंने सहजता से बता दिया । 

चप्पल पहन कर वह मरीज़ जैसे ही सड़क पर उतरा वह ठिठक गया और पलटकर उसने फिर पूछा ..” डॉक्टर साहब क्या क्या नहीं खाना ....” 

उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ कि डॉक्टर साहब को गुस्सा आ गया और वे उसे डाँटते हुए बोले .. “गू गोबर छोड़कर सब खाना है.. चल भाग यहाँ से । 

बात मज़ाक में कही गई थी लेकिन चिकित्सा हेतु गोबर का उपयोग उस समय भी मना था । इसे विगत दिनों कोरोना काल में कतिपय लोगों के गोबर से स्नान द्वारा इलाज के सन्दर्भ में देखा जाए, साथ ही सर्प दंश से मृत्यु, बिजली गिरने से मृत्यु आदि में मरीज को गोबर में गले तक गाड़ दिए जाने जैसे समाचारों पर गौर किया जाए तो लगता है अगर लोगों ने बाबूलाल जी वैद्य और डॉक्टर जौहरी जैसे सुयोग्य चिकित्सकों की सलाह मानी होती तो उन्हें इस तरह के अंधविश्वासों का शिकार होकर अपनी जान तो न गंवाना पड़ता ।


56 .बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं पुराने मकान

मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । छप्पर की कमर झुक जाती है, दीवारों के पलस्तर में बेशुमार झुर्रियाँ दिखाई देने लगती हैं, बरसातों में  नज़ले ज़ुकाम की तरह टूटे खपरैल से होता हुआ पानी भीतर टपकने लगता है, उनकी त्वचा पर पड़े सीलन के धब्बे किसी चर्म रोग की तरह दिखाई देने लगते हैं , वे बमुश्किल साँस ले पाते हैं और देर रात तक खाँसते हैं । 

गर्मियों में अक्सर उनकी नींद सुबह जल्दी उचट जाती है और वे अपने आसपास बने युवा मकानों को एसी और कूलर की लोरी में गहरी नींद में सोता हुआ देखते हैं ।


सर्दियों में वे कानों में मफ़लर लपेटने के बावजूद कभी भी ढह जाने का अंदेशा लिए काँपते हैं । बेमौसम बारिश में अपने आँगन में पानी से भरे डबरे में अपना अक्स देखते हुए वे सोचते हैं कि वे भी कभी जवान थे ।

मेरा बचपन बैतूल के इस पुराने मकान की जवानी का गवाह है ।


हम बच्चे  खेलकर आते थे और दालान से होते हुए बीच का कमरा और आंगन पार कर सीधे रसोईघर में प्रवेश करते थे । दालान के बाद  बीच में एक बड़ा कमरा था । इसकी छत बांस और मिटटी से बनी थी जो ऊपर वाले कमरे का मिट्टी का फर्श थी ।
दालान के बाद बीच के कमरे में सीमा 

बीच के कमरे के बाद छपरी से बाहर 
यहाँ से लकड़ी के पटियों से बनी दस पायदान वाली सीढ़ियाँ ऊपर की ओर जाती थीं । बिनाका गीतमाला में जब अमीन सयानी साहब ‘पायदान’ शब्द कहते थे तो हमारे जेहन में इन्ही सीढ़ियों का अक्स उभरता था ।
लकड़ी की सीढ़ियों पर सुभाष बाबू 
हम लोग सीढ़ियों से चढकर ऊपर जाते लेकिन उतरते वक़्त छत से बाहर निकले बाँस के दो टुकड़ों से किसी जिमनास्ट की भांति लटककर नीचे आ जाते  । सीढ़ियों से ऊपर पहुँचते ही दाहिनी ओर मदन मोहन ताउजी का एक कमरा था जहाँ हम बच्चे इनडोर गेम्स खेल खेला करते थे ।
मदन मोहन ताउजी का कमरा 
बीच में एक बड़ा हाल नुमा कमरा जिसमें बाहर झाँकती छोटी छोटी दो खिड़कियाँ थीं, फिर मनमोहन ताउजी यानि दादाभैया का कमरा । 
मनमोहन ताउजी का कमरा 
दिवाली के दिन यह कमरा लक्ष्मी जी को आवंटित हो जाता था । लक्ष्मी पूजन हेतु सारे लोग इस कमरे में जुटते । दादाभैया लक्ष्मीजी की प्रतिमा की स्थापना करते और स्थल सजावट करते । हम सब श्रमजीवी थे इसलिए प्रतिमा के साथ कुदाल, फावड़े, आरी,बसूला, हथौड़ी,खुरपी आदि औजार रखे जाते । पूजन का प्रोटोकाल बिलकुल तय था, सबसे पहले दादाजी और उनके भाई, फिर दोनों ताउजी, फिर बाबूजी, फिर सभी  चाचा लोग  और उसके बाद तीसरी पीढी में हम बच्चों का नंबर आता था । तब तक हम लोग इतने ऊब जाते कि नीचे जाकर पटाखे जलाने में व्यस्त हो जाते । उसके बाद तो लक्ष्मी जी खुद कह देती थीं ..जाओ बच्चों , खेलो कूदो, मेरी इबादत बड़े होने के बाद कर लेना ।

पुराने मकान की एक मिनट की सैर के लिए यहाँ पर क्लिक करें  

नीचे बीच वाले कमरे के बाद एक छपरी थी जिसमे जाली लगी थी,


उसके बाद जच्चाघर जैसा एक कमरा जिसे हम ‘माँ की कोठरी’ कहते थे । मेरे बड़े भाइयों और मेरे अलावा अनेक बच्चों ने आँखे खोलते ही सबसे पहले इसी कोठरी की दीवारें देखी थीं और खिड़की से आती सुबह की धूप की पहली उष्मा महसूस की थी । माँ की यह कोठरी बिना अवकाश लिए नवजात शिशुओं के आगमन से सदा प्रफुल्लित रहती थी । वैसे यह एरिया छोटी दादी के अंडर में आता था ।
इस खिड़की से पहली बार मैंने दुनिया देखी थी 
इस छपरी को पार करने के बाद बीच में एक बड़ा सा आंगन था जो हमारा डायनिंग लॉन था ।

आंगन पार करते ही उस पार  रसोई घर व भंडार घर के कमरे, स्नानगृह आदि । रसोई में दादियाँ,दोनों बड़ी माताएँ  , व चाची खाना बनाया करती थीं । माँ का आगमन चूँकी छुट्टियों में मेहमानों की तरह होता था इसलिये उन्हें  सुबह शाम चूल्हा जलाकर चाय का अदहन चढ़ाकर सबको चाय पिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाती थी । हालाँकि यह कार्य भी आसान नहीं था, पच्चीस तीस सदस्यों को जिनका जागने का समय अलग अलग था, चाय पिलाते पिलाते दो घंटे का समय तो उन्हें लग ही जाता था, यही क्रम शाम को भी जारी रहता । 

बाबा नागार्जुन की कविता में आंगन से ऊपर उठता धुआं भले कई दिनों के बाद दिखाई देता हो लेकिन हमारे घर में प्रतिदिन शाम को धुआं उठने का यह दृश्य अनिवार्य था । इस धुएँ में शामिल छौंकी हुई दाल की गंध,फूलगोभी की सब्ज़ी की महक, कच्ची कैरी की चटनी में शामिल पुदीने की ख़ुशबू जैसे ही हम लोगों के नासापुटों तक पहुँचती हम लोग थाली लिए बड़ी माँ के सामने खड़े हो जाते । थाली में दाल,रोटी, सब्ज़ी, चटनी प्याज़, आदि लेकर हम लोग आंगन में आ जाते और पसरकर बैठ जाते । 


उन दिनों एक थाली में अकेले बैठकर खाने जितने हम लोग सभ्य नहीं हुए थे । अक्सर यह होता था कि दो बच्चे एक बड़ी सी थाली में खाना शुरू करते और फिर एक एक कर बच्चे उनके साथ शामिल हो जाते । ओपनिंग बैट्समैन के आउट होने के बाद भी लास्ट विकेट तक भोजन का यह सिलसिला उसी पिच पर जारी रहता, साथ ही रसोईघर से मांग और पूर्ति के नियमानुसार रोटियों और सब्जियों की आपूर्ति जारी रहती।


  इस भोजन सत्र में सबसे अधिक आकर्षण मदन मोहन ताउजी के बेटे यानि हमारे मुल्लू भैया और होशंगाबाद वाली पुष्पा बुआ के बेटे संतोष भैया का एक साथ भोजन करना था । वे उम्र में बड़े थे सो उनकी पार्टी अलग थी । उनके साथ थाली में भोजन का दुस्साहस करने वाले बच्चे जल्दी ही आउट हो जाते लेकिन मुल्लू भैया और संतोष भैया पिच पर लगभग डेढ़-दो घंटे डटे रहते।  दोनों ही अखाड़े में वर्जिश करते थे इसलिए उनकी खुराक काफी तगड़ी थी । 


दोनों भाइयों में कभी कभी मिर्ची खाने की प्रतियोगिता भी होती थी जिसका समापन तीखेपन को न सह पाने के कारण हिचकी, आँखों से पानी आने जैसी क्रियाओं पर ही होता था । पुरस्कार स्वरूप उन्हें एक गगरी पानी और मुठ्ठी भर गुड़ प्रदान किया जाता था । वैसे भोजन में ज़्यादातर रोटी, सब्ज़ी ,प्याज़ और चटनी हुआ करती थी, दाल का कोटा ज़रा कम था । गेहू तो खेत में ही होता था सो बहुतायत में उपलब्ध था लेकिन चावल एक विलासिता की वस्तु थी इसलिए कभी कभार ही पकता था । 


हम लोगों के भोजन सत्र इतने मनोरंजक होते थे कि भोजन संपन्न होने के पश्चात भी किसी के उठने का मन नहीं करता था । इन सत्रों में विगत में संपन्न शादी ब्याह और बारातों के किस्से, फूफाओं और जीजाओं के साथ की गई शरारतों के किस्से बहुत चाव से सुने सुनाये जाते । बड़े भाइयों और चाचाओं द्वारा सुनाये गए उन किस्सों में हम बच्चों को कहानी सुनने का मज़ा आता था । 


मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । वे भले ही किसी काम के न हों लेकिन उनके हमारे आसपास बने रहने से रौनक बनी रहती हैं उनकी उपस्थिति हमें न केवल अपने बल्कि मनुष्य जाति के बचपन की याद दिलाती हैं ।