19 जून 2021

5.सतपुड़ा के घने जंगल

यह सोचना भी बहुत मज़ेदार लगता है कि एक समय ऐसा भी था जब ज़मीन के टुकड़े भी यात्राएँ करते थे लेकिन यह सच है कि करोड़ों वर्ष पहले इस पृथ्वी के भूभाग अपनी जगह से सरक कर दूसरी जगह चले जाते थे फिर एक दिन वे यात्राएँ करते करते  ऊब गए और स्वयं पर स्थित समुद्रों ,पहाड़ों, नदियों, झीलों और चट्टानों सहित एक स्थाई पते पर रहने लगे वे तो वहीं रहे लेकिन उन पर शासन करने वाली सत्ताओं का पता बदलता गया इमारतें वही रहीं, उन पर लगे ध्वज बदलते गए नियम बदलते गए, कानून बदलते गए, नगरों के नाम बदलते गए, महलों में लगे राजाओं के लम्बे चौड़े तैलचित्र बदलते गए बदलने का यह सिलसिला पूरी दुनिया में चार-पांच साल के अंतराल पर आज भी बदस्तूर जारी है 

जंगलों,पहाड़ों, नदियों और सागरों ने उस वक़्त तो चैन की साँस ले ली थी कि उन पर कोई अपना हक़ नहीं जता रहा है लेकिन आगे चलकर जैसे जैसे वे विभिन्न राज्यों की सीमा के अंतर्गत आते गए वे भी मनुष्यों की तरह उनके अधीन होते गए शासकों ने उन्हें अपने अपने तरीके से नाम दिए और उनसे होने वाली कमाई पर अपना हक़ जताया अब तो जंगलों और पहाड़ों के गुलाम होने का यह चलन अपने चरम पर है

 जंगलों के बारे में जब भी सोचता हूँ तो मुझे अपने जन्मस्थल बैतूल के आसपास के जंगल याद आते हैं “सतपुड़ा के घने जंगल ऊँघते अनमने जंगल ..” कवि भवानी प्रसाद मिश्र की यह पंक्तियाँ पढ़ते ही मध्यभारत में स्थित ग्रेनाईट और बेसाल्ट पत्थरों से निर्मित सतपुड़ा पर्वत श्रंखला और वहाँ के घने जंगल उन पंक्तियों में साकार हो जाते हैं तत्कालीन मध्यप्रांत के दक्षिणी भाग के आदिवासी बहुल ज़िले  बैतूल के मुलताई क्षेत्र से निकली ताप्ती नदी और अमरकंटक से निकली नर्मदा की धाराएँ उनमे मचलने लगती हैं इन नदियों की उपत्यकाओं में बसे मूल निवासियों के सुख-दुःख, उनकी बोली, उनकी भाखा कविता में मुखर होने लगती है  

 अतीत के पन्ने पलटते हुए हम कुछ पीछे चलते हैं यह सन चौदह सौ के आसपास की बात है जंगली हवाओं में घुली आदिम गंध, सागौन वनों की नमी, और ठण्ड से ठिठुरते पात गात बैतूल को उसकी  आदिम पहचान प्रदान कर रहे थे खेड़ला, देवगढ़, गढ़ा मंडला, चांदा सिरपुर , जैसे गोंड राज्यों का यह क्षेत्र अपने वर्तमान रूप में एक खुशहाल प्रदेश था यहाँ के गोंड राजा अपने जंगलों के सान्निध्य में, अपनी नदियों के साथ, अपनी प्रजा के संगी साथी बनकर खुशनुमा जीवन व्यतीत कर रहे थे 

गोंडवाना साम्राज्य के संस्थापक शासक नरसिंह राय अपनी प्रजा के चहेते राजा थे और वर्तमान बैतूल शहर से छह किलोमीटर दूर स्थित खेड़ला के किले से खेड़ला राज्य का संचालन करते थे 

लेकिन समय को करवट लिए बिना चैन कहाँ सन चौदह सौ अठारह में मालवा के सुलतान होशंगशाह अपना रथ दौड़ाते हुए यहाँ तक आ गये और उन्होंने गोंड राजाओं के तमाम क्षेत्र में अपने राज्य की पताका लहरा दी फिर बस कुछ ही वर्षों बाद , चौदह सौ सड़सठ में बहमनी शासक फ़िरोज शाह यहाँ पहुँच गए कालांतर में यह प्रदेश पूर्णतः दक्षिण के बहमनी शासकों के अधीन आ गया और अंततः राघोजी भोंसले के जयघोष के साथ यहाँ मराठों  का साम्राज्य स्थापित हो गया संस्कृति के गौरवशाली अध्यायों में भारतीय कहलाने वाले यह अंतिम राजा थे

उस समय तक ईस्ट इण्डिया कंपनी अपना रबर का तम्बू धीरे धीरे पूरे महादेश में फैलाने लगी थी  सन अठारह सौ अठारह आते आते ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीति के तहत यह प्रदेश ईस्ट इण्डिया कंपनी के अधीन आ गया यहाँ की ठंडी जलवायु के कारण गर्मी से परेशान होने वाले अंग्रेज़ों को यह प्रदेश बहुत पसंद आया लेकिन व्यापारी अंग्रेज़ों को इस जगह से कोई विशेष लाभ नहीं था अर्थात इस जगह से उन्हें कोई आमदनी नहीं थी क्योंकि यह बे तूल था बे यानि बिना और तूल यानि कपास , अर्थात यहाँ कपास नहीं होता था फिर बचे हुए गोंड राजाओं के वंशज भी खेड़ला सरकार के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए थे गोंडों को अंग्रेज़ी नहीं आती थी और अंग्रेज़ों को गोंडी से कुछ लेना देना नहीं था इसलिए यह प्रदेश उपेक्षित ही रह गया

 बीसवीं शताब्दी आते आते यह सम्पूर्ण प्रदेश सेन्ट्रल प्रोविंस के अंतर्गत आ गया और इसे ‘सी पी एंड बेरार’ या ‘मध्य प्रांत और बरार’ का नाम दिया गया  इसे नर्मदा सम्भाग के अंतर्गत ही माना जाता था मनुष्य यहाँ कम आये थे इसलिए पेड़ों को जीने का अवसर मिल गया और धीरे धीरे पूरा प्रदेश वनों से आच्छादित हो गया पहले बैतूल को ‘बदनूर’  कहा जाता था लेकिन बाद में यहाँ के वर्तमान मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर स्थित ‘बैतूल बाज़ार’ के नाम पर इसका नाम बैतूल हो गया बैतूल बाज़ार तत्कालीन गोंड राजाओं का मूल शहर था

 सन उन्नीस सौ के आसपास मेरे परदादा विश्वेश्वर प्रसाद जी लाऊ पाठक का पुरवा जिला रायबरेली से काम धंधे की तलाश में बैतूल आ गए थे यहाँ उन्होंने लकड़ी के व्यवसाय के लिए जंगलों का ठेका लेना शुरू किया उसके बाद अपना फर्नीचर का काम भी प्रारम्भ किया उनकी दस संतानें हुईं, पांच बेटियाँ और पांच बेटे बेटियों के शादी ब्याह हो गए और बेटे जंगल के ठेके व फर्नीचर के काम में लग गए उनमे एक दो कुछ समय के लिए नौकरी धंधे के सिलसिले में बाहर भी चले गए फिर लौट आये इसी बैतूल में विश्वेश्वर प्रसाद जी के बड़े बेटे बाबूलाल जी के घर में तीसरे दशक के अंत में एक बेटी व दो बेटों के बाद चौथी संतान के रूप में मेरे पिता श्री जगमोहन कोकास का जन्म हुआ था ।  


शरद कोकास 

 

14 जून 2021

4. व्वा रे शेर ! आ गया शेर!


महाराष्ट्र निर्माण के प्रारम्भ में यह स्थितियाँ नहीं थीं लेकिन कुछ ही दिनों बाद प्रांत की सीमाओं पर रहने वाले लोग विशेषकर तेज़ी से महानगर बनते हुए नागपुर और आसपास के लोगों ने यह महसूस किया कि उनकी कहीं न कहीं उपेक्षा हो रही है वे प्रशासन की मुख्यधारा से स्वयं को अलग थलग महसूस कर रहे थे । वैसे भी महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई वहाँ से काफी दूर थी और प्रत्येक कार्य हेतु राजधानी का मुँह ताकना होगा इस बात को लेकर सामान्य जनों में निराशा व्याप्त थी । वे अपनी निर्धनता, विपन्नता, समाज में व्याप्त असमानता और अन्याय के लिये इस तरह के प्रांतविभाजन को दोषी ठहरा रहे थे और उनकी इस असहाय स्थिति  में एक आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी ।

 तात्कालिकता के दबाव में उन्हें एक ही उपाय सूझ रहा था कि विदर्भ को शेष महाराष्ट्र से अलग कर दिया जाये । उनकी स्मृति में  राज्य पुनर्गठन आयोग की विदर्भ को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने की अनुशंसा और राज्यों के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली जन समिति महाविदर्भ समिति द्वारा बैतूल, खंडवा, छिंदवाडा और बालाघाट  को भी विदर्भ राज्य में शामिल किये जाने की अनुशंसा शामिल थी

         आम जनों की इस दुखती रग पर विदर्भ के ही एक सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ता  जाम्बुवंत राव धोटे ने अपना हाथ रखा और उनके नेतृत्व में राज्य निर्माण के प्रारम्भिक दिनों से ही पृथक विदर्भ हेतु आन्दोलन प्रारम्भ हो गया । जाम्बुवंत राव धोटे विदर्भ के बहुत लोकप्रिय नेता थे और जनता द्वारा ‘विदर्भ वीर’ तथा ‘विदर्भ का शेर’ जैसे विशेषणों से विभूषित किये जाते रहे वे पांच बार महाराष्ट्र विधानसभा के विधायक निर्वाचित हुए मुझे याद है बचपन में जब उनकी सभाएँ होती थीं उनमे बेतहाशा भीड़ उमड़ती थी और लोग नारे लगाते थे ‘ व्वा रे शेर , आ गया शेर

  विदर्भ वीर जाम्बुवंत राव धोटे ने सर्वप्रथम उन्नीस सौ बासठ में फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी से विदर्भ की यवतमाल सीट से महाराष्ट्र विधानसभा के विधायक पद के लिए चुनाव लड़ा और विजयी हुए फिर वहीं से सडसठ में विधानसभा के लिए चुनाव लड़ा और उन्नीस सौ इकहत्तर में कांग्रेस को हराकर नागपुर से पांचवीं लोकसभा के सांसद बने उन्नीस सौ अठहत्तर में जब इंदिरा गाँधी ने इंदिरा कांग्रेस का निर्माण किया उन्होंने इंदिरा कांग्रेस ज्वाइन कर ली और नागपुर से ही उन्नीस सौ अस्सी में सातवीं लोकसभा के लिए सांसद का चुनाव जीता लेकिन बाद में उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया और सन दो हज़ार दो में उन्होंने विदर्भ जनता कांग्रेस नाम से नई पार्टी बना ली जिसका उद्देश्य पृथक विदर्भ निर्माण था

 विदर्भ वीर जाम्बुवंत राव धोटे का यह आन्दोलन काफी समय तक चलता रहा लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में इस आन्दोलन का भी वही हश्र हुआ जो ऐसे आन्दोलनों का होता है । उन्होंने अपनी और से भरसक प्रयास किया और लोगों के बीच एक राजनैतिक चेतना का निर्माण किया अंततः  दो हज़ार सत्रह में इस विदर्भ वीर का निधन हो गया

 पृथक विदर्भ के निर्माण में प्रारंभ से ही अनेक अडचनें रही हैं राजनेताओं के सामने अन्य समस्याएँ इससे बड़ी थीं इनके अलावा  प्रांत की सीमाओं पर रहने वाले तथा सुदूर वनांचलों में रहने वाले लोगों की भी अनेक समस्याएँ थी जिनका समाधान नहीं हो रहा था  । आज वे समस्याएँ विकराल रूप धारण कर चुकी हैं । पूरे देश के साथ महाराष्ट्र भी वर्तमान में अपनी सीमा पर नक्सल समस्या से जूझ रहा है । दरअसल इसकी जड़ें उन दिनों की परिस्थितियों में है जिनकी ओर सत्ता का ध्यान कभी नहीं गया । आज हम आये दिन विदर्भ के किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने की खबरें सुनते हैं । अन्य कारणों के अलावा इनके पीछे एक अप्रकट कारण आज़ादी के बाद राजनैतिक सत्ता द्वारा तत्कालीन विदर्भ की उपेक्षा भी हो सकती है ।  

शरद कोकास 

 

13 जून 2021

3.गाँव से आती पकते धान की महक और पीतल के बर्तन पीटे जाने का शोर


महाराष्ट्र प्रांत अपनी अंतिम सीमाओं को तय करते हुए जहाँ पूर्व और उत्तर में मध्यप्रदेश की सीमाओं को छूता है वहीं बसा है ज़िला भंडारा भंडारा का नक्शा देखो तो ऐसा लगता है जैसे वह मध्यप्रदेश की दहलीज़ पर खड़ा उसके घर में झांक रहा हो यद्यपि विगत एक नवम्बर दो हज़ार से पूर्व की ओर का मध्यप्रदेश अब छत्तीसगढ़ राज्य कहलाने लगा है भंडारा एक पड़ोसी की तरह दोनों के बीच में खड़ा हुआ है उसे लगता है जैसे बाप ने बेटे के बड़े होने के बाद उससे कहा हो कि जाओ अब अलग घर में जाकर रहो

 

मेरे बचपन के दिनों में जिला मुख्यालय भंडारा एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण शहर था जिसे हम एक बड़ा क़स्बा भी कह सकते थे । भंडारा चावल की विभिन्न जातियों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था उसे चावल का भंडार भी कहते थे वहीं भंडारा की गलियों में पीतल के बर्तनों के निर्माण के छोटे छोटे कारखाने थे जिनके सामने से गुजरते हुए पीतल के बर्तनों चमकाने और आकार देने के लिए उन्हें पीटने के दृश्य आम थे ऐसा कहते थे कि बर्तनों से आती भंडर भंडर आवाज़ की वज़ह से शहर का नाम भंडारा हो गया था

         भंडारा ज़िला अपने आप में बहुत सारे गांवों को समेटे हुए था जब भी गाँवो की ओर से हवाएँ बहकर भंडारा शहर की ओर आतीं उनमे पकते हुए धान की महक होती तब धीरे धीरे शहर होता हुआ भंडारा भी गाँव लगने लगता उन दिनों शहरी संस्कृति ग्रामीण संस्कृति के बहुत करीब थी यदि हम इतिहास के पन्ने पलटें तो देखते हैं कि हमारे देश में ग्रामीण समुदाय कभी भी शहरी समुदाय पर आश्रित नहीं रहा । हड़प्पा और मोहंजोदड़ो संस्कृति में भी गाँवों तथा शहरों का सह अस्तित्व रहा है ।


 आज गाँव और आधुनिक शहर के बीच भले ही अंतर दिखाई दे लेकिन बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यह अंतर न्यूनतम था । भंडारा शहर उन दिनों गाँव से शहर बनता हुआ एक ऐसा कस्बा था जहाँ मूल खेतीहर मानव समुदाय अपनी संस्कृति और परम्पराओं का पालन करता हुआ शहरी संस्कृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास कर रहा था । तत्कालीन स्थितियों में नये राज्यों में राज्य सरकार द्वारा नगरीय व ग्रामीण क्षेत्रों का निर्धारण किया जा रहा था । इन क्षेत्रों में स्थानीय शासन हेतु नगरपालिका जैसी इकाइयों का गठन किया जा रहा था । लेकिन नवनिर्माण की यह गति बहुत धीमी थी


शरद कोकास 

11 जून 2021

2.राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र




चलिए प्रयास करता हूँ कि अपने बचपन की बातों के बहाने तत्कालीन मध्यभारत की राजनैतिक और सामाजिक स्थितियों पर कुछ बातें कह सकूँ वैसे भी सिर्फ मेरी कहानी में आपकी क्या रूचि हो सकती है आप लोगों में कई लोग सकारात्मक ढंग से यह अवश्य सोच रहे होंगे कि अगर इस बहाने कुछ ज्ञानप्राप्ति हो जाए तब ही इसे पढने में कुछ लाभ है चलिए आपकी यह इच्छा पूर्ण करने का प्रयास करता हूँ

 

कृष्ण चंदर ने अपने एक उपन्यास की शुरुआत करते हुए लिखा था कि जिस देश में दस के एक मामूली से नोट पर सत्रह भाषाओं में ‘दस रूपया’ लिखा होता है वहाँ  एकता कैसे हो सकती है आज़ादी के समय भारत में यही स्थिति थी कि बहुत कम राज्यों का निर्माण हुआ था बहुत सारी रियासतें और राजवंश अपनी सत्ता के मद में मग्न थे आज़ादी प्राप्त होने के तुरंत बाद  भी भारत में कमोबेश यही स्थिति थी यहाँ कोई संगठित राजनैतिक सत्ता नहीं थी । यह अनेक रियासतों का एक संघ था । यहाँ सामाजिक व्यवहार,रहन सहन, खानपान ,संस्कृति आदि में विभिन्नताएँ तो थी हीं लेकिन एक संगठित सर्वमान्य सत्ता का भी अभाव था ।

 मध्यभारत देश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था सन अठारह सौ इकसठ से इस क्षेत्र को सेंट्रल प्रोविंस या मध्य प्रान्त कहा जाने लगा था सन उन्नीस सौ तीन में इसमें बरार के चार ज़िले और शामिल किये गए तथा यह सी पी एण्ड बेरार कहलाने लगा आज़ादी के बाद सन उन्नीस सौ पचास में यह क्षेत्र मध्यप्रदेश कहलाने लगा सी पी एंड बेरार में महाकोशल और बुंदेलखंड का क्षेत्र भी शामिल था इसकी राजधानी नागपुर थी और पंडित रविशंकर शुक्ल यहाँ के मुख्यमंत्री थे उस समय यहाँ कुशल राजनीतिज्ञ थे जो राजनीतिक चेतना से लैस थे

 

भारतीय गणराज्य के अस्तित्व में आने के बाद से ही उन्नीस सौ त्रेपन में जस्टिस फज़ल अली की अध्यक्षता में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा भाषावार राज्यों के गठन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई थी यद्यपि उनका कहना था कि देश की मिली जुली संस्कृति और भौगोलिकता को देखते हुए भाषा एवं संस्कृति के आधार पर राज्यों का गठन बहुत कठिन कार्य है ।

लेकिन उन्हें दायित्व ही यह सौंपा गया था फलस्वरूप इसी क्रम में एक नवम्बर उन्नीस सौ छप्पन को मध्यप्रांत की अनेक रियासतों को मिलाकर नये मध्यप्रदेश का गठन किया गया ।  इसमें मध्यभारत और विंध्यप्रदेश को भी शामिल किया गया उस समय महाराष्ट्र का गठन नहीं हुआ था और महाराष्ट्र का अधिकांश क्षेत्र बॉम्बे प्रेसिडेंसी या मुंबई राज्य के अंतर्गत आता था मध्यप्रदेश के दक्षिण में स्थित भंडारा के अलावा नागपुर, अकोला अमरावती, वर्धा, चंद्रपुर बुलढाना और अमरावती इन आठ ज़िलों को भौगोलिकता के आधार पर विदर्भ कहा जाता था राज्य गठन आयोग द्वारा यह सिफारिश भी की गई थी कि विदर्भ के आठ जिलों को मध्यप्रदेश और मुंबई प्रान्त से अलग कर पृथक राज्य बनाया जाए लेकिन उस अनुशंसा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया राज्यों के गठन के दौरान राजनैतिक सत्ता सदैव से राज्य के निवासियों की उपेक्षा करती आई है । आज भी निवासियों से उनकी इच्छा पूछी नहीं जाती और उन पर अपनी इच्छा लाद दी जाती है यद्यपि उनका दावा होता है कि ऐसा वे आम जन के हित में कर रहे हैं ।

 इन्हीं नीतियों फलस्वरूप एक मई उन्नीस सौ साठ को महाराष्ट्र राज्य का निर्माण हुआ और विदर्भ के आठ जिलों सहित भंडारा भी महाराष्ट्र में शामिल हो गया । यहाँ राजकाज की भाषा मराठी निर्धारित की गई । यद्यपि भाषा और संस्कृति में यह क्षेत्र हिन्दी प्रदेश के बहुत करीब था । लेकिन इसके दूरगामी परिणामों से राज्यसत्ता नावाकिफ थी । उन्हें यह सत्य ज्ञात नहीं था कि मराठी का जातिगत अभिमान पालने वाले लोग इन्हें पूर्णत: कभी स्वीकार नहीं करेंगे


शरद कोकास 


10 जून 2021

1.आप को अपने बचपन की याद किस उम्र से है

सामान्यत: अतीत को याद करने का कोई सर्वमान्य कारण नहीं होता । हम अपने वर्तमान के सापेक्ष प्रतिदिन ऐसा अनेक बार करते हैं
प्रत्येक व्यक्ति जो अतीतजीविता से घृणा करता है किन्हीं क्षणों में अपने अतीत को याद करता ही है ..हाँ उसमें स्थायित्व नहीं होता । वस्तुतः अतीतजीविता और अतीत को याद करने में मूल अंतर यह है कि अतीत का याद करना क्षणिक होता है जबकि अतीत में ही हमेशा जीना अतीतजीविता
 

अतीत को याद करते हुए कभी कभी हमारे भीतर ऐसा कोई गुमान होता है कि हम उस उम्र में सर्वश्रेष्ठ थे और वर्तमान पीढ़ी अपने बचपन में उस श्रेष्ठता को नहीं पा सकती इसके विपरीत अतीत का स्मरण आत्महीनता का अहसास भी कराता है, लेकिन उससे उबरना होता है, सामंजस्य या विद्रोह यह दोनों ही उपाय हो सकते हैं कुछ लोगों के लिए यह स्मरण इसलिए भी आवश्यक होता है कि अतीत की स्मृति के बिना उनके लिए जीना कठिन होता है

 वस्तुतः स्मृति मनुष्य की परम्परा है और वर्तमान में अर्जित ज्ञान का मूल स्त्रोत है । हमारे अवचेतन में स्मृति व्यक्तिगत होते हुए भी वह सामूहिक स्मृति होती है मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग ने इसी को सामूहिक अवचेतन कहा है इसलिये अपने बचपन को याद करना केवल आत्मपरकता नहीं है इसलिए कि इन स्मृतियों में  तत्कालीन समाज और  स्थान विशेष की स्मृतियाँ भी शामिल होती हैं

     सवाल अजीब सा है लेकिन  किसी से पूछकर देखिये  …आप को अपने बचपन की याद कब से है ? उम्र के एक साल से ? दो साल से ?  या तीन साल से ? क्या ऐसा भी कोई व्यक्ति हो सकता है जिसे अपने जन्म की घटना याद हो ? जैविक रूप से ऐसा हो पाना असम्भव है ।

 फ्राइड ने कहा था कि मनुष्य के लिये छह साल से पहले की आयु को याद करना  कठिन है इसलिये कि वे स्मृतियाँ अप्रिय होती हैं लेकिन मनुष्य का निर्माण भी इसी उम्र में होता है ।  यद्यपि वर्तमान में मनोवैज्ञानिकों ने अनेक पुरानी अवधारणाओं को झुठला दिया है और नई खोजों में लगे हैं । इस प्रश्न का जवाब देना आसान नहीं है कि हम घटनाओं को सिलसिलेवार याद क्यों नहीं रख पाते और हमारी तारतम्यता क्यों गड़बड़ा जाती है , हालाँकि हम ऐसा प्रयास करते हैं ।

 अपनी उम्र के चौदहवें-पन्द्रहवें वर्ष में एक दिन यह विचार मेरे मन में आया कि इससे पहले कि अपने बचपन या होश सम्भालने की घटनाओं की बारीकियाँ मैं भूल जाऊँ, क्यों न मैं उन्हें लिख कर रख लूँ । उन दिनों मैं भोपाल के रीजनल कॉलेज ऑफ एजुकेशन में प्रथम वर्ष का छात्र था और जैसा कि पहली बार अपने घर से बाहर निकलने वाले बच्चों के साथ होता है मुझ पर भी अक्सर  नॉस्टेल्ज़िया का दौरा पड़ता रहता था । घर से पहली बार निकला था और जाने किस किस बात पर होमसिक फील करता था ।

वह बरसात की एक शाम थी विद्या निकेतन हॉस्टल के कमरा नंबर दस की खिड़की से न्यू मार्केट की ओर झाँकते हुए, श्यामला हिल्स पर बहते पानी को देखते हुए मुझे  बचपन के अपने शहर की बारिश का ख्याल आया । और यह दृश्य संयोजन कुछ ऐसा हुआ कि मैंने एक नोटबुक में बचपन की कुछ घटनाओं को दर्ज करना शुरू कर दिया यह सोचकर कि कहीं ऐसा न हो कि  बड़ा होकर मैं अपने बचपन की बातों को भूल जाऊँ ।

 यद्यपि मेरा भय निर्मूल था इसलिये कि सामान्यत: बचपन की अधिकांश घटनायें तो मनुष्य बुढ़ापे तक याद रखता है और वह भी इस तरह जैसे कल ही की बात हो । यहाँ तक कि बचपन की किसी घटना का ज़िक्र करते हुए वह यह तक बता देता है कि फलाँ दिन उसने कौनसे कपड़े पहने थे और क्या क्या खाया था जबकि कई बार कुछ देर पहले तक की बात याद नहीं रहती मनोविज्ञान में इन स्मृतियों को स्थायी स्मृति और क्षणिक स्मृति कहते हैं । वैसे तो मुझे अधिकांश घटनाओं को याद रखने की आवश्यकता नहीं थी किन्तु मन में यह बात थी कि आगे चलकर मुझे लेखक बनना है और यह सब स्मृतियाँ लेखन में मेरे काम आयेंगी इसी बात ने सब कुछ याद रखने की मेरी ख्वाहिश को जन्म दिया । वैसे उन दिनों के वर्तमान को मैंने अपनी डायरी में सुरक्षित करना भी प्रारम्भ कर दिया था ।

     आज उसी नोटबुक का सहारा लेकर अपने बचपन की हार्ड डिस्क खंगाल रहा  हूँ और कोशिश कर रहा हूँ अपनी पहली स्मृति से लेकर चौदह साल की उम्र तक के दिनों को याद करने की । वैसे देखा जाए तो मेरे बचपन में ऐसा कुछ भी खास नहीं है जिसका बखान किया जाए ,  न मुझे अधिक अभावों में जीना पड़ा , न मैंने कभी भीख माँगी, न बाल मजदूरी की, न कभी भूखे सोना पड़ा, न ही मैंने कभी कोई एडवेंचरस काम किये । एक मध्यवर्गीय शिक्षक का बेटा आखिर अपने बचपन में अपने संस्कारों की ज़द में रहकर और क्या कर सकता है । ऐसा भी नहीं कि मुझे ढेर सारे दुख मिले हों और मेरे बचपन की यह कथा किसी के मन में दारुण दुख उपजा सके । बुद्ध की तरह मैंने अपने बचपन में मृत या बीमार या दुखी व्यक्ति भी उस तरह नहीं देखे और वैराग्य का कोई ख्याल भी मेरे मन में नहीं आया । मेरी पारिवारिक स्थिति भी ठीक ठाक ही रही और थोड़े बहुत अभावों के अलावा विशेष कुछ उल्लेखनीय भी नहीं रहा

     जब मैं लिखने बैठा तो मुझे लगा कि मैं एक था बचपन इस शीर्षक के अंतर्गत अपने बचपन के अलावा और कुछ नहीं लिख पाउंगा लेकिन मेरी कलम चलती गई और उसमें मेरे बचपन के साथ साथ शामिल होता गया उन तमाम मित्रों का बचपन जिनके जीवन में आज तक कुछ भी उल्लेखनीय नहीं घटा । वे साधारण ही पैदा हुए और अपने उम्र के अंतिम पड़ाव तक साधारण ही रह गये । लेकिन जब उनकी साधारणता को मैंने निकट से देखा तो मुझे कई ऐसी बातें मालूम पड़ीं जिनके बारे में मुझे लगा कि इन्हें दुनिया के सामने रखना चाहिये । इस बात को भी मैंने महसूस किया कि एक व्यक्ति के असाधारण बनने में अनेक साधारण व्यक्तियों का योगदान होता है । इसके अलावा और भी कई ऐसी बातें मसलन एक विशेष काल खंड में एक छोटे शहर का जीवन, भाषावार प्रांत विभाजन में अन्य भाषा के लोगों की स्थिति । लोगों के धार्मिक कर्मकाण्ड, उनकी जीवन शैली, उनकी छोटी छोटी खुशियाँ, छोटे छोटे दुख । दरअसल मेरा बचपन सिर्फ मेरा नहीं है वह आप सब का बचपन है । तो लीजिये मेरे बचपन के बहाने आप अपने बचपन के समन्दर में गोते लगाइए ।

 फिर भी मन में एक शंका है । आप लोग बड़े बड़े महान लोगों की जीवनी पढ़ते हैं , उनसे प्रेरणा लेते हैं । मेरे पास तो आपको प्रेरित करने लायक ऐसा कुछ भी नहीं है । एक साधारण इंसान के जीवन के बारे में जानना आपको अरुचिकर तो नहीं लगेगा ? अगर आपको यह अरुचिकर लगे तो यहीं पढ़ना बंद कर दीजिये । आगे चलकर आप मुझे इस बात के लिए कोसेंगे तो नहीं कि भारत के एक सामान्य इंसान के जीवन के बारे में बताकर हमारा समय बर्बाद कर दिया ।

 शरद कोकास 

0.हम अपना बचपन क्यों याद करते हैं


मेरे एक मित्र अक्सर अपने बचपन के किस्से सुनाया करते
जिनमे कभी खुशियाँ होतीं थीं कभी दुःख
उनकी शुरुआत कुछ इस तरह से होती थी  “बचपन में जब मैं छोटा था तब ऐसा हुआ कि ...” इस पर हम लोग जोर से हँसते और उन्हें टोकते हुए कहते “ भैया बचपन में तो सब छोटे ही होते हैं ..आप थे तो इसमें कौनसी बड़ी बात है ?” वे हमारी बात को अनसुना कर देते और गंभीरता से कहते “ देखो, जब भी किसी के बचपन की बातें सुनो ध्यान से सुनो, हो सकता है उसमे कोई ऐसी बात हो जिसे सुनकर हमारे जीवन में परिवर्तन आ जाए और हमारा न केवल आज बल्कि कल भी सुधर जाए, और खुद के बचपन को तो हमेशा याद करना चाहिए इसलिए कि हमारी आज की बहुत सारी समस्याओं की जड़ें बचपन में ही होती है।“

 मनोविज्ञान और सम्मोहन के विषय में पढ़ते हुए मुझे इसका अहसास हुआ कि वे मित्र एक मनोवैज्ञानिक की भांति कितनी  गंभीर बात कहते थे वस्तुतः हमारे मस्तिष्क का प्रारंभिक प्रशिक्षण द्वारा हमारे बचपन में ही सम्पन्न होता है
बचपन में ही यह निश्चित हो जाता है कि भविष्य में हमारे व्यक्तित्व का निर्माण किस तरह होगा, हमारा स्वभाव किस प्रकार का होगा और हम किस तरह के मनुष्य बनेंगे

यह बात आपको अजीब लगेगी लेकिन यह तय है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी नकारात्मक है उसे सकारात्मकता में परिवर्तित करने हेतु  हमें बचपन की स्मृतियों में जाना आवश्यक होता है जैसे हर व्यक्ति के जीवन में मृत्युभय एक सामान्य बात है हम मृत्यु से डरते हैं लेकिन हम यह कभी नहीं जान पाते कि उनका मूल हमारे बचपन की किसी घटना में निहित है , संभव है जिसे हम भूल गए हों   इसके अलावा बचपन में ऐसे अनेक भयप्रद प्रसंग या ट्रॉमेटिक एक्सपीरियंस होते हैं जिनके कारण हम जीवन भर किसी वस्तु से, किसी बात से, किसी व्यक्ति से अथवा किसी विचार से डरते रहते हैं

इन सब नकारात्मक बातों को अवचेतन में स्थित  बचपन की अपनी स्मृतियों में जाकर ही दूर किया जा सकता है। कभी कभी हम स्वयं ही अपने बचपन की स्मृतियों में नहीं पहुँच पाते लेकिन अन्य किसी के बचपन के बारे में पढ़ते या सुनते हुए हमें अचानक अपने बचपन की अनेक घटनाएँ याद आ जाती है और फिर हम उस आधार पर स्वयं के व्यक्तित्व और जीवन में सुधार ला सकते हैं

मुझे हमारे मित्र की यह बात अच्छी लगती थी कि वे अपने बचपन के किस्से कुछ इस तरह सुनाते थे जैसे अभी कल ही सब कुछ घटित हुआ हो उनकी तरह मुझे भी अपने बचपन को याद करना अच्छा लगता है शायद आप सभी को लगता हो यह बात और है कि इस स्मृति में सुख अधिक शामिल है या दुःख यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपने वर्तमान की तुलना हमेशा अतीत से करता है इसी स्मृति भाव से गुजरते हुए एक दिन यह विचार मन में आया कि क्यों न अपने बचपन की एक एक घटना को लिख लिया जाए

अपने बचपन को याद करते हुए जब मैंने लिखना प्रारम्भ किया तो अनेक प्रश्न मेरे मानस में मंडराने लगे । क्या यह स्मरण वस्तुत: अतीत के प्रति सम्मोहन है या व्यतीत किये हुए जीवन  को फिर से जीने की व्यर्थ या अपूर्ण रहने वाली इच्छा ? क्या यह अतीत के अपने व्यक्तित्व को लेकर  आत्ममुग्धता है या विगत के आधार पर वर्तमान की समीक्षा ? क्या यह स्मृतियों का पुनरावलोकन है या बढ़ती हुई उम्र में अपनी स्मरणशक्ति की परीक्षा ?  अतीत को याद करना और फिर उसे अन्य लोगों के समक्ष वर्तमान में प्रस्तुत करना क्या अपने अतीत के गौरव का बखान करना है या अपने प्रति उपजने वाली आत्मदया ?

शरद कोकास 

11 जून 2020

बैतूल बज़रिये शरद कोकास- डॉ. सुधीर सक्सेना

मुझे विश्वास है यह लेख पढ़कर आपको अपने बचपन का शहर याद आएगा . एक दिन दुनिया इन दिनों पत्रिका के संपादक सुविख्यात कवि डॉ सुधीर सक्सेना मेरे घर आये और मुझसे मेरे जन्म के शहर बैतूल के बारे में ढेर सारी बातें कीं . उन्हींकी कलम से शहर बैतूल की यह दास्तान पढ़िए ..........

बैतूल का रेलवे स्टेशन 
बहुत दिलचस्प है किसी के ज़रिये किसी जगह को जानना। कुछेक यात्राओं से आप किसी शहर को कितना जानते हैं। शहर की पंखुरियां बहुत आहिस्ता-आहिस्ता खुलती हैं। शहर बेसब्र नहीं होते। वे आपके सब्र का इम्तेहान लेते हैं। उसमें क़ामयाब होने पर वे आपको अपने आगोश में ले लेते हैं। बहुधा ऐसा होता है कि एकबारगी आगोश में लेने के उपरांत वे अपनी बांहें इतनी ढीली 
नहीं करते कि आप उसकी गिरफ़्त से छूट जाएं। बल्कि होता यह है कि आगोश में होने का यह अहसास ताउम्र बना रहता है। ठौर-ठिकाना बदलने के बाद भी, चीज़ों के बदलने के बाद भी, शहर से नास्टैल्जिक रिश्ता बना रहता है...

बैतूल से शरद कोकास का रिश्ता कुछ ऐसा ही है। बैतूल से शरद का रिश्ता दरअसल पैदाइशी है। यह छठवें दशक के उत्तरार्द्ध की बात है। आज़ादी के बाद का दशक। उम्मीदों का दशक। बैतूल तब बदनूर भी कहलाता था। गांवों के बीच कस्बाई चीख का बैतूल उभर रहा था। आहिस्ता-आहिस्ता। गोंड राजाओं का किला खेरला में था। वहीं देवी का मंदिर भी था। मंदिर  दण्ड का भी स्थान था। अपराधियों की नाक काट दी जाती थी। नकटापन किये गये गुनाहों की चुगली करता रहता था। कोठी (इतवारी ) बाज़ार में हाट भरता था। बिला नागा | इतवार के इतवार | इसी से नाम हुआ इतवारी बाज़ार । शहर के बगल से होकर नदी बहती थी। अभी भी बहती है। माचना नदी | राजधानी भोपाल में शिवाजी नगर के पड़ोस में सम्भ्रांत कॉलोनी है माचना कॉलोनी | माचना नाम इसी से गृहीत है।

शरद कोकास का जन्मगृह ,इतवारी बाज़ार 
 बदनूर का वह वक़्त शरद के ज़ेहन में आज भी है।   अपने पूरे नूर के साथ। जब घर की नींव की खुदाई  हुई तो मिट्टी की पर्तों में हड्डियाँ निकली थीं। थोड़ी  दूरी पर तालाब था।तालाब के पास मुसलमानी  मोहल्ला। मुसलमानी मोहल्ले के पास ज्योति  टॉकीज। दूसरीटॉकीज खुली रघुवीर टॉकीज। शरद के घर के नगीच। इतनी नज़दीक कि फिल्मों के डायलॉग और गाने साफ़ सुनायी दें। बल्कि शरद को कई धांसू डायलॉग और सुरीले गाने कंठस्थ हो गये।

बदनूर के इर्द-गिर्द गोंडों की बस्तियां थीं। वे बैतूल बाज़ार भी आते थे। झुण्ड के झुण्ड | जिंस बेचने । महुआ, चार जैसी वनोपज लाते और सौन्दर्य व श्रृंगार प्रसाधन लेकर सांझ ढलने के पूर्व लौट जाते। वैसे ही जैसे परिन्दों अपने नीड़ों में लौट जाते हैं। बदनूर में तब गोदने वाले भी खूब आते थे। गोदने का क्रेज था। लोकमान्यता थी कि परिधान अलंकरण सबं छूट जाते हैं। बस, गोदना परलोक में साथ जाता है।

 बाज़ार के छोर पर मिर्ची बाज़ार था। मिर्ची की धांस उड़ती तो छीकों का बाज़ार गरम हो जाता। मिर्ची की इसी तासीर के चलते मिर्ची बाज़ार बिल्कुल अंत में था। बाज़ार सचमुच दिलचस्प ठिकाना था। वहां मिठाइयां भी बिकती थीं और फिल्‍मी गानों की किताबें भी। मुरमुरे और घाना के लड्डू। ये लड्डू इत्ते कड़े होते थे कि उन्हें दांतों के बीच रखकर जोर आज़माइश करनी पड़ती थी। सिनेमाघर की टॉकीज़ टिन की थी। दो आने की टिकट का मतलब था ज़मीन पर आलथी-पालथी मारकर फिल्म देखनी है। उसके पीछे बेंचों की कतार थी और पीछे कुछ ऊंचाई पर बाल्कनी। दिन भर में दो ही खेल (शो) होते थे। फिल्म बीच में रुक जाती थी। मशीन पर रील चढ़ाई जाती तो फिर फिल्म शुरू होती। यह अंतराल चाय-पानी और लघुशंका निवारण के लिए उपयुक्त था। टॉकीज में ऑपरेटर, मैनेजर, गेटकीपर शहर के लिए परिचित चेहरे थे। नायडू नामक दक्षिण भारतीय सज्जन वहां बरसों ऑपरेटर रहे। शरद ने वहां बचपने में खूब फिल्में देखीं। चलचित्र यूं तो आधुनिक श्रव्य-दृश्य माध्यम था। अलबत्ता, कस्बे के लिए वह अनुष्ठान था, लिहाजा फिल्म शुरू होने के पहले आरती होती। जय हो, जय गणेश की आरती के बाद शो शुरू होता। अब रघुवीर टॉकीज़ नहीं रही। वहां शादीघर खुला। वह भी नहीं चला।

रघुवीर फ़िर  प्रभात टाकीज़ अब बंद 

बैतूल कभी एक रोड का शहर हुआ करता था। सड़क के दोनों ओर मकान थे। दुकानें थीं। सांझ तक बाज़ार में चहल-पहल रहती | सूरज डूबता तो रौनक सिमट जाती | सन्नाटा पसर जाता | कोठी बज़ार में गूजरी को सब जानते थे। वहां सन्‌ 1942 में 'भारत छोड़ो आंदोलन' में तिरंगा फ़हराया गया था। तिरंगा झण्डा मात्र न था। वह देशभक्ति की उद्दाम आकांक्षा की अभिव्यक्ति था। इकलौती सड़क कमानिया गेट से सदर की तरफ़ जाती थी और लल्ली  चौक पर जाकर ख़त्म हो जाती थी। यह सीमेंटेड सड़क बैतूल की शान थी। वहीं लल्ली चौक पर लल्ली होटल था। होटल की जलेबी, समोसा और आलूबोंडा प्रसिद्ध थे। इसी के थोड़ा आगे टाउन हॉल था | इमारत पुरानी थी। आगे तालाब था। उतनी दूर ज्योति टॉकीज थी।

तब की ज्योति टॉकीज की धज न पूछिये। बहुत जतन से पुराने गोदाम को सिनेमाघर में तब्दील कर दिया गया था। सिनेमाघर का फ़र्श सड़क के तल से नीचे था। दर्शक सीढ़ियां उतरकर सिनेमा हॉल में पहुंचते थे और पर्दे पर उभरती सचल सवाक्‌ छवियों को बहुत चाव से देखते थे।

लल्ली चौक में गाजरया आम का ठेला 

इसी ज्योति टॉकीज के थोड़ा आगे जाकर बस स्टैंड था। बसें बैतूल को बाहर की दुनिया से जोड़ती थीं। रेलगाड़ी सिर्फ़ दो दिशाओं में जाती थी, जबकि बसें कई दिशाओं में । आवागमन की दुनिया में नये साधन पैठ रहे थे। घोड़े हाशिये में जा रहे थे और बैलगाड़ियां भी दायरे में सिमटकर रही थीं। बिजली के लट्टुओं ने बैतूल को रोशन कर दिया था। रोशनी अब ढिबरी, लालटेन और लैम्प के वृत्तों तक सीमित न थी। यह बात कम लोगों को ज्ञात होगी कि फलों की दुनिया में बैतूल आमों के लिए भी जाना गया। यहां के आमों की गाजरया  प्रजाति मशहूर थी। गाजरया आमों से गाजर की महक आती थी। स्वाद आम का, मगर महक गाजर की |

 सन्‌ 70 के दशक में बहुत कुछ हुआ। यह दशक बैतूल में नया दौर लाया। नेहरू उद्यान बना। उद्यान में पं. नेहरू की प्रतिमा लगी। भूमि पर भारत का मानचित्र उकेरा गया। नक़्शा ऐसा कि नदियों को पनालियों से दर्शाया गया। इन पनालियों में पानी बहता तो मानचित्र दर्शनीय हो उठता। बच्चों के लिए आकर्षण के साथ ही ज्ञानवर्द्धक भी।

 बैतूल में सदर चिकित्सालय काफ़ी पहले अस्तित्व में आ चुका था। उससे अलग दो ख्यातनाम चिकित्सक थे। डॉ. वी एम जौहरी और मुनि बाबूलाल वैद्य। दोनों के दवाखाने खूब चलते थे। मुनि बाबूलाल का औषधालय सन्‌ 1957 में खुला था। सामने अस्पताल था और पीछे रिहायशी कमरे। जड़ी-बूटियों से उपचार होता था और वहां नेति, जलोपचार आदि की व्यवस्था थी। इलाज प्रायः निशुल्क होता था। और तो और वैद्य साहब बहिरागत रोगियों को पकाने-खाने के लिए अनाज भी दिया करते थे। वे बापू कहलाते थे। सम्मान की कोख से उपजा था यह सम्बोधन। सन्‌ 1965 में बापू का देहान्त हुआ। 31  जनवरी, 1965 को अंत्येष्टि में लोग उमड़ पड़े। अंतिम संस्कार - तेरहवीं आदि पर कोई व्यय नहीं हुआ। सारा सामान मुफ़्त में आ गया।

बाबुलालजी वैद्य का औषधालय 

शरद के लिए ये सब अब अतीत के चलचित्र हैं। इसके लिए किसी प्रोजेक्टर या पर्दे की ज़रूरत नहीं। बैतूल में तब और भी बहुत कुछ खास, दर्शनीय और क़ाबिले-ज़िक्र था। छोटे शहरों-कस्बों में प्रायः पान की गुमटियां होती हैं, मगर बैतूल में रूपनारायण की पान की भव्य दुकान थी। दुकान के मध्य में पीतल के पतरे पर दो पनवाड़ी बैठे पान लगाते रहते थे। वहां दो बड़े सारस

चित्रित थे, जो दुकान को अलग पहचान और आकर्षण देते थे। कोठी बाज़ार में यह पुरानी दुकानें अभी भी हैं। अब वहां नयी पीढ़ी के दीपक चौरसिया बैठते हैं |

 शरद के मुताबिक बैतूल के बाज़ार की एक खूबी थी कि वहां व्यापारी आदिवासियों से वनोपज औने-पौने दामों पर नहीं, बल्कि वाजिब कीमतों पर खरीदते थे। बाजार में डंडीमारों का भी अस्तित्व न था। आदिवासी उम्मीद से आते और खुशी-खुशी जाते। घर में चौपाल थी और चौपाल में रोजाना बिला नागा मानस का पाठ होता था। शरद बताते हैं, “दादा सुन्दरलाल कोकास की यह परम्परा ताऊ मदनमोहन ने जारी रखी। उत्तर प्रदेश से रामलीला मंडली आती थी। आखिरी दिन भव्य शोभायात्रा निकलती थी। ताऊजी देवी (काली माई ) का रूप धरते थे। बाबा (वाघ) राक्षस बनते थे। 

मोहर्रम में शेर नाच देखते ही बनता था। किशन काका शेर बनते थे। धनक धनका, धनक तीती... की धुन पर रंग पोते पूंछ और मूंछ लगाये शेर ठुमकता तो समां बंध जाता ।' कमर में साइकिल का रबड़ ट्यूब बांध अगरबत्ती लगा काका का पूरे बैतूल में घूमने का दृश्य शरद को आज भी याद है। उसे न जाने कितने चेहरे याद हैं... कृष्णकुमार चौबे, डागा जी... कांतिलाल...। अंग्रेजी के प्रोफेसर कृष्णकुमार म्यूजिक के शौक़ीन थे। शहर के पहले आर्केस्ट्रा का श्रेय इन्हीं प्रोफेसर साहब को है। अशोक निनावे और जोसेफ़ इसी आर्केस्ट्रा में थे। शहर में पहला मेडिकल स्टोर कांतिलाल ने खोला था और पहली ज्वेलरी शॉप डागा जी ने।

सोनाघाटी का हनुमान मंदिर 

 बदनूर में तब राममंदिर था और कृष्णमंदिर भी | दोनों मंदिर स्वच्छता की मिसाल थे। सोनाघाटी में रामभक्त हनुमान मंदिर भी था ।मंदिर की दीवारों पर सम्पूर्ण हनुमान चालीसा पेन्ट थी। कालापाठा में तब जंगल हुआ करता था। गंज में गला मंडी थी। वहीं गैरेज थे । बाहर से आया सामान वहीं अनलोड होता था। सदर किंचित्‌ फ़ासले पर था। मगर अब यह सब एक बड़े विस्तार में समाहित है। टाउन हॉल और कमानिया गेट ब्रिटिश क़ालीन थे। गंज से कोठी बाज़ार तक का रास्ता तब निर्जन था। अब वह जनसंकुल है। सन्‌ 70 के ही दशक में पुराने बस स्टैंड के सामने क्रिश्चन ईएलसी होस्टल बना। नौ किमी दूर स्थापित पाढर अस्पताल की ख्याति दूर तलक थी। 

मालवीय प्रिंटिंग प्रेस बैतूल का पहला छापाखाना था। गौस मोहम्मद की सिलाई मशहूर थी। शहर के लिए वे गौसू टेलर थे। मार्के की फिटिंग और उम्दा सिलाई । किशन श्रीवास थे तो नाई, लेकिन कहलाते तो किशन काका थे। करीने से केश काटते और हजामत बनाते। वे पेटी लेकर घर-घर जाते और छोटे-बड़ों का हुलिया संवारते। जो ग्वालिन दूध देने आती उसका नाम था गोविन्दी। वह गोविन्दी बुआ कहलाती थी। कोई काका, कोई बुआ... आत्मीयता और सम्मान के संबोधनों की यह परम्परा अब लुप्त हो चली है। कभी निम्नवर्गीय टिकारी बस्ती में कुम्हार गधे बहुतायात सें पालते थे। गधे परिवहन और ढुलाई का बड़ा साधन थे। वे दिन आज हवा हुए। बिला नागा मद्यपान करने वालों की आज बैतूल में कमी नहीं है, लेकिन उस ज़माने का मद्यप गुच्ची की बात ही निराली थी। वह बैतूल का 'टुंगरूस' था।

शहर से बाहर एक मधुशाला 

बैतूल अब वह बैतूल नहीं रहा। शरद कहते हैं, शहर ने गंध और दृश्य ही नहीं, सम्वेदनाएं भी खोयी हैं और अपनत्व भी। बैतूल निजत्व भी खो रहा है। वहां कभी जंगल की मादक गंध आती थी। जलेबी और गुड़ की महक बैतूल की हवा में तैरती थी। बैतूल में अब गोदना गुदाने का भी रिवाज़ पहले-सा न रहा। बैतूल अपनी आदिम गंध खो रहा है, जो इसकी खूबी थी और खूबसूरती भी |

मित्रो, क्या आपके शहर में भी वैसा ही कुछ तो नही हो रहा है ? जो मित्र शरद कोकास के अपने शहर बदनूर यानी बैतूल में हुआ है।

(दुनिया इन दिनों, 6 से 30 अप्रैल, 2017)

 शरद कोकास 

 


 


 

14 अगस्त 2017

नथमल शर्मा के काव्य संग्रह "उसकी आंखों में समुद्र ढूंढता रहा है" पर एकाग्र संगोष्ठी का आयोजन

बिलासपुर । प्रगतिशील लेखक संघ एवं बिलासपुर प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में पत्रकार कवि नथमल शर्मा के काव्य संग्रह "उसकी आंखों में समुद्र ढूंढता रहा है" पर एकाग्र संगोष्ठी का आयोजन आज यहां किया गया ।


काव्यपाठ करते हुए नथमल शर्मा 
कार्यक्रम के प्रारंभ में नथमल शर्मा ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया । कविता संग्रह पर केन्द्रित अपनी टिप्पणी में पत्रकार बरूण श्रीवास्तव "सखाजी " ने कहा कि सरस,महसूसियत पर सवार होकर नजीरें पेश करता यह संग्रह कहीं कहीं कविताएँ  बोता भी है । फिर थोड़ी ही देर बाद आगे से मुड़ते हैं तो वही बोया बीज अंकुरित नज़र आता है । यूँ तो विषय कोई छूटा नहीं पर खासतौर से  रिश्ते,अनुभव,बातचीत और खुद के साथ हिसाब सा करती कविताएँ कई बार मारक जान पड़ती हैं । 

कविता संकलन पर एकाग्र अपने आलेख का पाठ करते हुए अंबिकापुर से आए विजय गुप्त ने कहा कि नथमल शर्मा की कविता में वैविध्य है । स्त्री,पुरूष,प्रकृति,संघर्ष, प्रेम,आवेग,उम्मीद,हताशा,वक्तव्य,विचार धारा, सबकुछ अपने कच्चे पक्के रूप में मौजूद है ।वह जनपक्षधर कवि हैं और अपनी राजनीतिक और सामाजिक प्रतिबद्धताओं के प्रति चौकन्ने है व राजनीतिक सवालों से कतराते नहीं है और न ही अपनी जन प्रतिबद्धता छोड़ते हैं । विविध अनुभवों और स्थितियों पर लिखी कविताएँ पाठकों को आह्लाद का एक नया धरातल देती है ।


संग्रह पर चर्चा की शुरुआत करते हुए नमिता घोष ने कहा कि कवि ने जीवन के भोगे हुए यथार्थ और सहज अनुभूतियों को रंगों में ढालते हुए एक कैनवास की रचना की। वे सामूहिक चेतना और प्रतिबद्धता युक्त मुखर कविताएँ हैं । चर्चा को आगे बढ़ाते हुए रफीक खान ने कहा कि ये कविताएं अपने आस-पास के परिवेश को मानवीय बनाने का रचनात्मक संकल्प है । कविताएं कवि की मानवीय समझ है।इनमें मानवीय चिंताओं का सकारात्मक रूपांतरण हुआ है । चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अजय पाठक ने कुछ कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन कविताओं का सरोकार संवेदना से है । ये मुक्तिबोधीय चेतना से युक्त कविताएँ हैं । ये आम फहम शब्दों में व्यक्त की गई है और इनमें अतिरिक्त पांडित्य दिखाने का प्रयास नहीं किया गया है ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बिलासपुर के कमिश्नर त्रिलोक महावर ने कहा कि सरल सहज शब्दों में अपनी बात कहने में कवि नथमल शर्मा पूरी तरह सफल हुए हैं । उन्होंने बहुत सारी चीजों को पूरी संजीदगी से अपनी कविताओं में पिरोया है । विकास की यात्रा सतत जारी रहती है । कविता संग्रह "उसकी आंखों में समुद्र ढूंढता रहा " के संदर्भ में उन्होंने कहा कि हम बहुत कुछ खोते है उसके बाद ही कुछ पाते हैं । यह हमारे जीवन का यथार्थ है ।ढूँढने का काम जीवन भर अनवरत चलता है । खोए हुए को ढूढना बहुत मुश्किल काम है ।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कवि रामकुमार तिवारी ने कहा कि कविता भाषा का मानवीय करण करती है । हम भाषा को दूषित करते हैं । कवि की राजनीतिक चेतना की कविता-कविता की शर्तों पर राजनीति की बात करती है । नथमल शर्मा लोक संवेदन के कवि हैं । उनमें परंपरा बोध है वे कविता में विजुअल इफेक्ट पैदा करते हैं । उनकी कविताओं मे पत्रकार और कवि का द्वंद्व है ।

कार्यक्रम में हरीश केडिया,राजेश्वर सक्सेना,डाक्टर आर ए शर्मा, कालीचरण यादव, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल,भारती भट्टाचार्य, रंजना चतुर्वेदी,कैलाश गुप्ता,सविता प्रथमेश मिश्रा, कपूर वासनिक,हबीब खान,सत्यभामा अवस्थी,पवन शर्मा, शाकिर अली,  रूद्र अवस्थी,  सुनील चिथड़े, पी.आर.यादव, राजेश दुआ, दिनेश ठक्कर, नीलिमा मोइत्रा के साथ ही नगर के  पत्रकार, साहित्यकार बड़ी संख्या में उपस्थित रहे । कार्यक्रम का संचालन प्रेस क्लब के सचिव विश्वेष ठाकरे ने एवं आभार प्रदर्शन क्लब के अध्यक्ष तिलकराज सलूजा ने किया ।

26 सितंबर 2016

ईश्वरचंद्र विद्यासागर

जन्मतिथि पर विशेष 

ईश्वर  चन्द्र  विद्यासागर     का नाम आपने सुना होगा  | उनका मूल नाम ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय था  बंगाल के पुनर्जागरण के काल में जिन व्यक्तियों का नाम प्रसिद्ध हुआ उनमे ईश्वरचंद्र का भी नाम था । इनका जन्म 26 सितम्बर 1820 को  पश्चिम बंगाल में हुआ था और करमाटांड़ इनकी कर्मभूमि रही  वे उच्चकोटि के विद्वान थे। उनकी विद्वता के कारण ही उन्हें विद्दासागर की उपाधि दी गई थी ।उन दिनों जब स्त्री का पढ़ना अच्छा नहीं माना जाता था उन्होंने नारी शिक्षा के लिए प्रयास किये जिस तरह नारी शिक्षा के क्षेत्र में महाराष्ट्र में सावित्री बाई फुले का नाम लिया जाता है उसी तरह बंगाल में उन्हें जाना जाता है  वे नारी शिक्षा के समर्थक थे।

हिन्दू समाज में विधवाओं की स्थिति हमेशा से दुखद रही है । उन्होनें विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए जनमत तैयार किया । । उन्होंने जनता को अपने साथ लेकर  विधवा पुनर्विवाह के लिए आंदोलन किया और अठारह सौ छप्पन में इस आशय का अधिनियम पारित कराया । सन अठारह सौ छप्पन से साथ के बीच उन्होंने अनेक विधवाओ का पुनर्विवाह कराया । यही नहीं उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया । बाल विवाह का भी वे सदा विरोध करते रहे ।

विद्यासागर जी को सुधारक और समाज सेवी के रूप में राजा राममोहन राय का उत्तराधिकारी माना जाता हैं विद्यासागर एक प्रसिद्ध दार्शनिक और समाज सेवी के अलावा शिक्षा विशेषज्ञ , लेखक , प्रकाशक , मुद्रक  और सुधारक थे उनका दृष्टिकोण मानवतावादी था । बांगला भाषा उस समय बहुत कठिन मानी जाती थी सो उन्होंने बांगला भाषा के गद्य को सरल  एवं आधुनिक बनाने का कार्य भी किया । उन्होने बांग्ला लिपि की वर्णमाला को भी सरल एवं तर्कसम्मत बनाया। बांगला के अध्ययन हेतु उन्होंने अनेक  विद्दालय स्थापित किए तथा रात्रि पाठशालाओं में लोगों के पढ़ने की व्यवस्था की। यही नहीं उन्होंने संस्कृत  भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए भी प्रयास किया। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन भी प्रारंभ करवाया ।विद्यासागर जी का जन्म 26 सितम्बर 1820 को हुआ था उनका निधन 29 जुलाई 1891 में हुआ   

29 अगस्त 2016

मेरे साथ रहती हैं मेरे माता-पिता की अस्थियाँ



देह का अंतिम हश्र यही होता  है 

आज मेरे पिता स्मृतिशेष जगमोहन का स्मृति दिवस है । माता स्मृतिशेष शीला देवी का निधन 8 अगस्त 2001 को हुआ था और पिता का ठीक उनसे  दो वर्ष बाद 28 अगस्त 2003 को । तेरह वर्ष हो गए पिता को गुज़रे हुए । उनके संघर्ष से हमने संस्कार पाए ,उनकी आदतों को हमने अपने भीतर ढाला ,उनकी सामाजिक सेवा और साहित्यानुराग से प्रेरित हुए ।

मैं आत्मा ,मोक्ष , पिंडदान, स्वर्ग-नरक,पुनर्जन्म  किसी में विश्वास नहीं रखता पिता भी नहीं रखते थे । मुझे पता है मरने के बाद आदमी का कुछ भी शेष नहीं रह जाता ,देह भस्म हो जाती है ,ख़ाक हो जाती है । माता- पिता के अग्निसंस्कार के पश्चात उनकी अस्थियाँ नदी में प्रवाहित करते समय मैंने कुछ अस्थियाँ  अपने पास रख ली थीं जो अभी भी मेरे पास हैं । मैं जब भी उन्हें छूता हूँ तो महसूस करता हूँ कि यह कभी उनकी देह में रही होंगी । लोग कहते हैं  ..अस्थियाँ घर में नहीं रखनी चाहिए .. । मैं जानता हूँ देह जब तक जीवित रहती है प्रिय होती है, लेकिन मृत देह को लोग नष्ट कर देते हैं , यह ज़रूरी भी है , आखिर उस रूप में देह नहीं रह सकती हमारे साथ, लेकिन क्षरण होने तक अस्थियाँ तो रह सकती हैं । मुझे तो अगर दुनिया के पहले मनुष्य की अस्थियाँ मिल जाएँ तो मैं उन्हें भी रख लूँ , आखिर वे भी तो हमारे पूर्वज थे ।

पुरातत्व के मेरे गुरु डॉ. वाकणकर जी  कहते थे .. "कंकाल से क्या डरना ,डर तो ज़िन्दा आदमी से होता है , मैं तो तम्बुओं में कई बार कंकालों की बगल में सोया हूँ . ।


आज पिता को याद करते हुए अस्थियों की यह तस्वीर ...

शरद कोकास 

13 जनवरी 2012

सूपा , हंडी और धनुष से बना वाद्य यंत्र - सुमिन बाई का धनकुल


13 वें "रामचन्द्र देशमुख बहुमत सम्मान का आमंत्रण जब बहुमत पत्रिका के सम्पादक विनोद मिश्र जी ने भेजा तो सबसे पहले यह जानने की उत्सुकता हुई कि इस बार यह सम्मान किसे दिया जा रहा है । कार्ड खोलकर देखा तो एक नितांत अपरिचित नाम .. सुमिन बाई बिसेन । मुझे याद ही नहीं आया कि इनका कभी नाम सुना हो । फिर जब सुमिन बाई की विधा पर नज़र डाली तो और भी अधिक आश्चर्य हुआ । सुमिन बाई धनकुल नाम का एक वाद्य का वादन करती है और साथ ही गायन भी करती हैं ।
जब इस वाद्य के बारे में पढ़ा तो और भी अधिक आश्चर्य हुआ । सुमिन बाई चावल फटकने वाले एक सूपे , एक हंडी और एक धनुष को बाँस की किमची से बजाती हैं । इतना पढ़कर उत्सुकता और बढ़ गई और मैं कार्यक्रम की राह देखने लगा ।
आज 12 जनवरी 2012 को सुमिन बाई को यह सम्मान प्रदान किया गया । इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति श्री सच्चिदनन्द जोशी । अध्यक्षता कर रहे थे छत्तीसगढ़ शासन के संसदीय सचिव श्री विजय बघेल । मुख्य वक्तव्य दिया सुप्रसिद्ध पत्रकार और हिन्दी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष श्री रमेश नैयर । आलोचक जयप्रकाश व कलासमीक्षक राजेश गनोदवाले ने धनकुल परम्परा पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की ।
इसके बाद वह क्षण आया जिसकी मुझे प्रतीक्षा थी । बहुत ही सादे वस्त्रों में उपस्थित सुमिन बाई अपने दो सहयोगियों के साथ और अपने वाद्य यंत्र के साथ मंच पर आई । उन्होंने सर्वप्रथम एक हंडी को रखा , उस पर अनाज फटकने का एक सूपा रखा फिर उस पर धनुष की प्रत्यंचा टिका दी । उनके हाथ में बाँस की एक कमची थी । उस कमची को उन्होंने प्रत्यंचा पर रगड़ना शुरु किया और एक अद्भुत ध्वनि उत्पन्न हुई । फिर उन्होंने गायन प्रारम्भ कर दिया ।
तिजा जगार , चारखा गीत , शिव पार्वती प्रसंग ,एक एक कर वे सुनाती गईं और लोग सुनते गये । कई लोग बार बार मंच के पास आकर उनके इस वाद्य यंत्र को देख रहे थे , उन्हे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी मामूली वस्तुओं से भी ऐसी ध्वनि निकल सकती है ।
बाँये से ऋषि गजपाल , शरद कोकास , सुमिन बाई व सहयोगी
जोशी जी ने बताया कि बरसों पहले ऐसे ही एक कलाकार कश्मीर से आया था और उसने अपने वाद्ययंत्र की प्रस्तुति दिल्ली आल इंडिया रेडियो पर देनी चाही थी लेकिन रेडियो वालों ने कहा कि यह वाद्ययंत्र उनके यहाँ लिस्टेड नहीं है सो वे कोई और कार्यक्रम प्रस्तुत करें । वे कलाकार थे पं.शिवकुमार शर्मा और उनका वाद्ययंत्र था सरोद ।
गनीमत है कि इस वाद्ययंत्र को यहाँ पहचाना जा चुका है और सुमिन बाई मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद तथा छत्तीसगढ़ शासन के अनेक कार्यक्रमों में यह प्रतुति दे चुकी हैं ।
लेकिन ऐसी कला को विलुप्त होने में क्या देर लगती है ? आज जहाँ कम्प्यूटर से संगीत उत्पन्न किया जा रहा है वहाँ सूपे , हंडी और धनुष की क्या बिसात ?
जोशी जी का किस्सा सुनते हुए मुझे याद आया ऐसे ही हम लोग हॉस्टेल में जाने क्या क्या बजाया करते थे । एक दिन हमारे सीनियर और वर्तमान में प्रसिद्ध कवि और आलोचक श्री लीलाधर मंडलोई ने हम लोगों का संगीत सुना और वे हमे आकाशवाणी ले गये थे युववाणी में प्रस्तुत करने के लिये । बहरहाल वह किस्सा फिर कभी ।
आज आप धनकुल नामक इस अद्भुत वाद्य का चित्र देखिये और बधाई दीजिये लोक कलाकार सुमिन बाई बिसेन को ।


sharad kokas