गर्मियों में अक्सर उनकी नींद सुबह जल्दी उचट जाती है और वे अपने आसपास बने युवा मकानों को एसी और कूलर की लोरी में गहरी नींद में सोता हुआ देखते हैं ।
सर्दियों में वे कानों में मफ़लर लपेटने के बावजूद कभी भी ढह जाने का अंदेशा लिए काँपते हैं । बेमौसम बारिश में अपने आँगन में पानी से भरे डबरे में अपना अक्स देखते हुए वे सोचते हैं कि वे भी कभी जवान थे ।
मेरा बचपन बैतूल के इस पुराने मकान की जवानी का गवाह है ।
हम बच्चे खेलकर आते थे और दालान से होते हुए बीच का कमरा और आंगन पार कर सीधे रसोईघर में प्रवेश करते थे । दालान के बाद बीच में एक बड़ा कमरा था । इसकी छत बांस और मिटटी से बनी थी जो ऊपर वाले कमरे का मिट्टी का फर्श थी ।
| दालान के बाद बीच के कमरे में सीमा |
| बीच के कमरे के बाद छपरी से बाहर |
| लकड़ी की सीढ़ियों पर सुभाष बाबू |
| मदन मोहन ताउजी का कमरा |
| मनमोहन ताउजी का कमरा |
नीचे बीच वाले कमरे के बाद एक छपरी थी जिसमे जाली लगी थी,
उसके बाद जच्चाघर जैसा एक कमरा जिसे हम ‘माँ की कोठरी’ कहते थे । मेरे बड़े भाइयों और मेरे अलावा अनेक बच्चों ने आँखे खोलते ही सबसे पहले इसी कोठरी की दीवारें देखी थीं और खिड़की से आती सुबह की धूप की पहली उष्मा महसूस की थी । माँ की यह कोठरी बिना अवकाश लिए नवजात शिशुओं के आगमन से सदा प्रफुल्लित रहती थी । वैसे यह एरिया छोटी दादी के अंडर में आता था ।
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| इस खिड़की से पहली बार मैंने दुनिया देखी थी |
आंगन पार करते ही उस पार रसोई घर व भंडार घर के कमरे, स्नानगृह आदि । रसोई में दादियाँ,दोनों बड़ी माताएँ , व चाची खाना बनाया करती थीं । माँ का आगमन चूँकी छुट्टियों में मेहमानों की तरह होता था इसलिये उन्हें सुबह शाम चूल्हा जलाकर चाय का अदहन चढ़ाकर सबको चाय पिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाती थी । हालाँकि यह कार्य भी आसान नहीं था, पच्चीस तीस सदस्यों को जिनका जागने का समय अलग अलग था, चाय पिलाते पिलाते दो घंटे का समय तो उन्हें लग ही जाता था, यही क्रम शाम को भी जारी रहता ।
बाबा नागार्जुन की कविता में आंगन से ऊपर उठता धुआं भले कई दिनों के बाद दिखाई देता हो लेकिन हमारे घर में प्रतिदिन शाम को धुआं उठने का यह दृश्य अनिवार्य था । इस धुएँ में शामिल छौंकी हुई दाल की गंध,फूलगोभी की सब्ज़ी की महक, कच्ची कैरी की चटनी में शामिल पुदीने की ख़ुशबू जैसे ही हम लोगों के नासापुटों तक पहुँचती हम लोग थाली लिए बड़ी माँ के सामने खड़े हो जाते । थाली में दाल,रोटी, सब्ज़ी, चटनी प्याज़, आदि लेकर हम लोग आंगन में आ जाते और पसरकर बैठ जाते ।
उन दिनों एक थाली में अकेले बैठकर खाने जितने हम लोग सभ्य नहीं हुए थे । अक्सर यह होता था कि दो बच्चे एक बड़ी सी थाली में खाना शुरू करते और फिर एक एक कर बच्चे उनके साथ शामिल हो जाते । ओपनिंग बैट्समैन के आउट होने के बाद भी लास्ट विकेट तक भोजन का यह सिलसिला उसी पिच पर जारी रहता, साथ ही रसोईघर से मांग और पूर्ति के नियमानुसार रोटियों और सब्जियों की आपूर्ति जारी रहती।
इस भोजन सत्र में सबसे अधिक आकर्षण मदन मोहन ताउजी के बेटे यानि हमारे मुल्लू भैया और होशंगाबाद वाली पुष्पा बुआ के बेटे संतोष भैया का एक साथ भोजन करना था । वे उम्र में बड़े थे सो उनकी पार्टी अलग थी । उनके साथ थाली में भोजन का दुस्साहस करने वाले बच्चे जल्दी ही आउट हो जाते लेकिन मुल्लू भैया और संतोष भैया पिच पर लगभग डेढ़-दो घंटे डटे रहते। दोनों ही अखाड़े में वर्जिश करते थे इसलिए उनकी खुराक काफी तगड़ी थी ।
दोनों भाइयों में कभी कभी मिर्ची खाने की प्रतियोगिता भी होती थी जिसका समापन तीखेपन को न सह पाने के कारण हिचकी, आँखों से पानी आने जैसी क्रियाओं पर ही होता था । पुरस्कार स्वरूप उन्हें एक गगरी पानी और मुठ्ठी भर गुड़ प्रदान किया जाता था । वैसे भोजन में ज़्यादातर रोटी, सब्ज़ी ,प्याज़ और चटनी हुआ करती थी, दाल का कोटा ज़रा कम था । गेहू तो खेत में ही होता था सो बहुतायत में उपलब्ध था लेकिन चावल एक विलासिता की वस्तु थी इसलिए कभी कभार ही पकता था ।
हम लोगों के भोजन सत्र इतने मनोरंजक होते थे कि भोजन संपन्न होने के पश्चात भी किसी के उठने का मन नहीं करता था । इन सत्रों में विगत में संपन्न शादी ब्याह और बारातों के किस्से, फूफाओं और जीजाओं के साथ की गई शरारतों के किस्से बहुत चाव से सुने सुनाये जाते । बड़े भाइयों और चाचाओं द्वारा सुनाये गए उन किस्सों में हम बच्चों को कहानी सुनने का मज़ा आता था ।
मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । वे भले ही किसी काम के न हों लेकिन उनके हमारे आसपास बने रहने से रौनक बनी रहती हैं उनकी उपस्थिति हमें न केवल अपने बल्कि मनुष्य जाति के बचपन की याद दिलाती हैं ।

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