10 जून 2026

96 खड़ा तमाशा में सिनेमा से जास्ती मजा है



वह साठ का दशक था ৷ देश आज़ाद हुए बीस साल से भी अधिक समय हो चुका था । भारत का मध्य प्रान्त अब मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे दो राज्यों में बंट चुका था । हिन्दी मध्यप्रदेश की और मराठी महाराष्ट्र की कामकाज की भाषा घोषित की जा चुकी थी । नागपुर,भंडारा, अकोला, अमरावती,बुलढाना जैसे वैदर्भीय शहरों का जन्म तो काफी पहले हो चुका था लेकिन अब वे प्रजातांत्रिक तरीके से विस्तार ले रहे थे । आज़ाद भारत में जन्म लेने वाली पीढ़ी अब जवान हो चुकी थी । इस कटु सत्य से वह वाकिफ़ थी कि आज़ादी की बातों से पेट भरने वाला नहीं है, ज़िन्दा रहने के लिए रोज़गार ज़रुरी है और बेहतर रोज़गार के लिए शहर की ओर  कदम रखना ज़रूरी है । 


अपनी साँसों में जंगल की शुद्ध हवा भरकर, कोशिकाओं  में नदियों व झरनों का मीठा जल बसाकर और मांसपेशियों में खेतों में उगे पौष्टिक अनाज से मिली ताकत लेकर यह सीधे सादे नौजवान अपने बढ़ते हुए परिवार के लिए रोजी-रोटी की तलाश में शहर आने लगे ৷ वैसे तो शहर में जगह की कमी नहीं थी  लेकिन शहरी कहलाने वाले तथाकथित सभ्य और धनाढ्य लोगों के दिलों में उनके लिए जगह ज़रा कम थी । 


गाँव से शहर आए इन युवाओं ने अपने पाँवों में पड़ने वाले छालों की परवाह नहीं की और अपनी गठरियाँ पीठ पर लादे शहर की बाहरी सीमा पर बसी बस्तियों की ओर चले गए जहाँ पहले से उनके जैसे इंसान रहते थे । मिट्टी, लकड़ी, टीन और तार्पोलीन जैसी मामूली चीज़ों ने उनका साथ दिया और उनके लिए झोपड़ियाँ बना दीं । इन बस्तियों ने शहर के उन मेहनतकशों को न केवल पनाह दी बल्कि शहरी लोगों के घर दूध पहुँचाने से लेकर बनते हुए मकानों में मजदूरी करने का अपने हिस्से का काम भी दिया ৷ उनकी औरतों को भी बच्चे संभालने से लेकर बर्तन कपड़ा धोने जैसे काम मिल गए ।


दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद अपना पसीना सुखाते हुए जब शाम को वे घर लौटते और हाथ मुंह धोकर अपने दड़बे से बाहर निकलते उन्हें हवाओं में गाँव की चौपाल पर बजती ढोलकी की थाप सुनाई देती थी , किसी कीर्तनिया का आलाप और बजती हुई बंसी की धुन भी । लेकिन थोड़ी देर बाद ही उन्हें समझ में आ जाता कि यह केवल उनके मन का भ्रम है । 


वे जानते थे मनोरंजन मनुष्य का आदिम अधिकार है और इस शहरी जीवन में बच्चों के सो जाने के बाद ढिबरी बुझाकर किया जाने वाला मनोरंजन काफी नहीं है । शहर के सिनेमा,नाटक,ऑर्केस्ट्रा आदि लोक में पगे उनके मन के भीतर जगह नहीं पा सकते  थे ৷ उनके अंतर की यह वेदना राजी ख़ुशी के समाचारों  से भरे पोस्टकार्डों के किसी कोने में जगह पाकर गाँव पहुँच गयी और फिर डफ,ढोल, मंजीरे, बाँसुरी तक भी जा पहुँची । इन वाद्ययंत्रों और उनके बजाने वालों ने उनके दर्द को समझा और एक दिन अपना तामझाम लेकर शहर की इन बस्तियों में उनके मेहमान बनकर आ गए । 


फिर तो अक्सर यह होने लगा कि अचानक किसी सुबह एक रंगबिरंगी मिनी बस नुमा गाड़ी इनकी बस्ती में आकर रुकती और उससे कुछ कलाकार उतरते, एक शाहिर, साज बजाने वाले कुछ साजिन्दे, और नृत्य व अभिनय करने वाले कुछ कलाकार ৷ गाड़ी के कैरियर से परदे, बांस बल्लियाँ, लकड़ी के पटिये, लाउड स्पीकर, बैटरी, माइक आदि उतारे जाते और शाम तक स्टेज बन जाता, परदे लग जाते, स्टेज पर एक पट्टी लगाकर उसमे तीन चार माइक लटका दिए जाते , मंच के बगल में एक ग्रीन रूम बन जाता और बस्ती में ऐलान कर दिया जाता ....”बंधू आणि भगिनिन्नों ..ऐका हो एका.. आज रात को यहाँ शाहीर बाबूराव एंड कंपनी का ‘खड़ा तमाशा’ होने वाला है ৷” 


बस फिर क्या था ,अपने खून पसीने से शहर का विकास करने वाले उन मेहनतकशों की तो मानो मुराद ही पूरी हो जाती थी । शाम को मजदूर घर लौटते तो एक अनोखे उत्साह से भरे होते आखिर उनका गाँव उनके शहर आया हुआ है । खा पीकर वे मंच के सामने बैठ जाते । कुछ लोग तो शाम से ही बोरा, चटाई आदि बिछाकर अपनी सीट रिजर्व कर लेते । फिर रात दस बजे करीब खड़ा तमाशा प्रारम्भ होता । 


इससे पहले कि मैं आपको खड़ा तमाशा घटित होने के बारे में विस्तार से बताऊँ ‘खड़ा तमाशा’ इस शब्द से आपका परिचय कराना चाहूँगा । वैसे तमाशा इस शब्द से तो आप वाकिफ होंगे, हमारे यहाँ सड़क से लेकर संसद तक यह होता ही रहता है। लेकिन यहाँ ‘खड़ा तमाशा’ महाराष्ट्र की एक समृद्ध लोक परम्परा है ৷ पूर्वी विदर्भ में इसे ‘खड़ी गम्मत’ कहते हैं । यह मूलतः एक लोकनाट्य होता है जो लगभग पूरी रात मंच पर चलता है ৷ इसमें पात्र खड़े होकर अभिनय करते हैं इसलिये इसे ‘खड़ा तमाशा’ कहते हैं । यह बिना किसी मंच के खुले में भी प्रस्तुत किया जा सकता है ।  ‘खड़ी गम्मत’ के  पात्र ग्रामीण वेशभूषा में मंच पर आते हैं और छोटे छोटे नाटकों ,नृत्य आदि से जनता का मनोरंजन करते हैं ৷ 


यूँ तो इसका इतिहास बहुत पुराना है । पौराणिक गाथाओं और भजन कीर्तन की परम्परा तो लोक में जाने कब से व्याप्त थी । तमाशा के अंतर्गत पौराणिक कथाओं, महाभारत व रामायण के दृश्यों को ग्रामीण बोली में नाटक के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता था  । कहते हैं एक बार औरंगजेब की सेना दक्षिण अभियान पर आई तो उन्होंने किसी गाँव में डेरा डाला । उनके मनोरंजन के लिए गाँव वालों ने नाटक शुरू किया  औरंगजेब के मुँह से निकला ‘वाह यह तो बढ़िया तमाशा है’ और बस इसका नाम ‘खड़ा तमाशा’ हो गया । 


तो लीजिये अब गाँव से आई हमारी मंडली का खड़ा तमाशा प्रारम्भ होता है । सारे पात्र मंच पर आ चुके हैं और गणेश वंदना प्रारंभ हो रही है । मंच पर एक वादक व गायक मंडली भी विद्यमान है  । वाद्य यंत्रों में मंजीरा, तुनतुनी, ढोलक, डफ, घुंघरू  और हारमोनियम जैसे पारंपरिक वाद्य शामिल हैं । 


अब दो पात्र मंच पर आते हैं इनमे एक पत्नी है और एक पति । पति कहता है “शहर जा रहा हूँ कुछ मंगाना तो नहीं है ?” पत्नी कहती है “जा रहे हो तो वहां से सरप ले आना ।“ पति कहता है “ पागल हो गई है क्या ? सरप का क्या करेगी ?” पत्नी कहती है “ कपडे धोउंगी।“ पति चौंककर कहता है “ पागल हो गई है क्या सरप से भी कोई कपड़े धोता है और कहीं काट लिया तो ? “ पत्नी कहती है “ वो काटने वाला सरप नहीं है  और  कैसे काटेगा पकड़ के रखूँगी । “ इसके बाद गड़बड़ झाला वाले कई संवाद होते हैं और जनता हंस हंस कर लोटपोट हो जाती है । कुछ ही देर में लोगोंको समझ आ जाता है पत्नी  कपड़े धोने वाले सरफ की बात कह रही है पति उसे सर्प समझ रहा है ।


नाटक अब आगे बढ़ता है और एक के बाद एक बाद पात्रों का आगमन होता जाता है । अभी कुछ देर पहले पति पत्नी की नोकझोंक चल रही थी अब उसमे पड़ोसियों की तकरार भी शामिल हो गई है । कुछ देर में एक स्त्री और आती है जो एक सास के तरह दिखाई देती है । आप समझ जाइये अब सास बहू की लड़ाई का प्रसंग है । इसी बीच कहीं जीजा साली की आशनाई भी आ गई है । बीच बीच में  ग्राम प्रधान भी आते हैं जिनकी भुलक्कड़ी के प्रसंग जनता को हँसाते हैं , फिर गाँव के पटवारी, कोतवाल, लफूट लड़के मजदूर किसान सब इनमे शामिल हो जाते हैं । 


आप सोच रहे होंगे इतनी छोटी मंडली में इतने सारे पात्र कहाँ से आ गए जी नहीं पात्र तो लगभग पंद्रह बीस ही होते हैं बस वेशभूषा और मेकअप बदल बदल कर आते रहते हैं , यहाँ तक कि वे आवाज़ भी बदल लेते हैं और पत्नी का रोल करने वाला अभिनेता कॉलेज की युवा लड़की बन जाता है और अपने नए मेकअप में बूढ़ी सास भी ।


 आप सोच रहे होंगे मैंने अभिनेता शब्द ग़लती से तो नहीं लिख दिया या मुझे अभिनेत्री लिखना चाहिए था । जी नहीं वह अभिनेता ही है माने स्त्री के भेष में पुरुष अभिनेता ।  लेकिन इतना बढ़िया मेकअप , इतनी सुन्दर साड़ी, स्त्री की वजा बनाकर बोलने में ऐसे लटके झटके कि पूछो मत । खड़ी गम्मत में यही पात्र मनोरंजन की मुख्य धुरी होता है इसे ‘नाच्या’ कहते हैं  । लोक कला हो या शहरी क्षेत्र का रंगकर्म उन  दिनों  स्त्रियों का ऐसे सार्वजनिक प्रदर्शनों  में आना अच्छा नहीं माना जाता था लेकिन मंडली में स्त्री तो चाहिए ही थी वैसे भी हमारे देश में स्त्री के बगैर कोई मनोरंजन पूरा कहाँ होता है , इसलिए ऐसे पुरुषों की खोज की गई जो स्त्री का अभिनय करने में माहिर हो । 


बस उसके बाद पुरुष अभिनेता द्वारा स्त्री का रोल करने की परिपाटी बन गई । पार्टी के लिए भी यह अच्छा था, स्त्री होती तो उन्हें  उसके लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ती  और जनता के लिए भी अच्छा था,  स्त्री बने पुरुष  से शाब्दिक छेड़छाड़ करना भी आसान होता था । कहीं कहीं तो इस नाच्या का अभिनय इतना जीवंत होता कि गाँव के शोहदे उनसे शारीरिक छेड़छाड़ तक कर बैठते । वैसे पुरुष का स्त्री की भूमिका में आना हमारी नाट्य परम्परा में नया नहीं है और  अब तो इसका विस्तार आप टी वी पर आनेवाले बड़े बड़े कॉमेडी शोज में भी देख सकते हैं ।   


चलिए देखते हैं नाटक में इसके आगे क्या होता है ।  नाटक आगे बढ़ता है और खड़ा तमाशा के कलाकार हँसी मजाक के बीच जाने कब गंभीर विषय भी उनमे पिरो देते हैं पता ही नहीं चलता । विषयों की क्या कमी है हमारे देश में, गाँव की शाला की  समस्या अस्पताल की समस्या, छुआछूत की समस्या , अंधविश्वास की समस्या ,लोगों की दारू की आदत जैसी समस्या सब कुछ उसमे शामिल हो जाता है । खड़ा तमाशा के कलाकार लेकिन इन समस्याओं की बात भर नहीं करते अपने  स्थानीय नेता,पाटील,कारखानेदार जैसे ओहदेदारों को भी व्यंग्य बाणों का शिकार बनाते हैं जिसमे जनता को बहुत मज़ा आता है ।   


नाच्या अर्थात स्त्री बने पुरुष के अलावा खड़ा तमाशा में लोगों के हँसने का एक प्रमुख कारक  होता है उसमे प्रयुक्त द्वीअर्थी संवाद । आप चाहें तो ऐसे कुछ संवादों के उदाहरण मैं दे सकता हूँ लेकिन उदाहरण देने की क्या  आवश्यकता, मराठी फिल्मों के सुप्रसिद्ध हास्य कलाकार दादा कोंडके की हिन्दी फिल्म ‘अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ’ में के संवादों को याद करते हुए आप स्वयं ही कल्पना कर लें तो बेहतर होगा । 



तो इस तरह यह खड़ी गम्मत या खड़ा तमाशा का कार्यक्रम आगे बढ़ता है जनता लोटपोट होती रहती है , बच्चे या फिर जिन्हें नींद आती है वे आधी रात के बाद घर चले जाते हैं । जिन्हें आनंद आता है वे और कुछ ज़ोरदार आइटम की चाहत में वहीं डटे रहते हैं । कलाकार बिना थके पूरी रात तमाशा जारी रखते हैं और जब सुबह होने लगती है प्रातः वंदना या सूर्य की वंदना कर कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर अगले गाँव के लिए कूच कर देते हैं ।


खड़ा तमाशा अब भी महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में मनोरंजन की  मुख्य कला है । हाँ समय के साथ इनके विषय बदल गए हैं लेकिन अपने चुटीले संवाद, संवादों की अदायगी, गीत,संगीत, नृत्य  और गति की विशेषताओं के साथ इन्टरनेट ,सोशल मीडिया , गाँव की राजनीति, और वर्तमान  समस्याएँ भी अब इनमे शामिल हो गए हैं । हालाँकि मनोरंजन अब भी उनका मुख्य उद्देश्य है  । आखिर इसका नाम गम्मत है और सब जानते हैं ‘ गम्मत’ का अर्थ हँसी मज़ाक, खेल कूद,दिल्लगी या मनोरंजन होता है ।


बचपन के उन दिनों में जब भी मुझे मौका मिलता था मैं अपने मित्रों के साथ भंडारा की उन बस्तियों में या लगे हुए गाँवो पांढराबोड़ी,खोखुरला,टवेपार,कारधा आदि में खड़ा तमाशा देखने पहुँच जाता था ৷ वैसे हम लोगों की बस्ती भी गरीबों की ही बस्ती थी इसलिए यहाँ भी अक्सर  यह कार्यक्रम होते ही थे ৷  गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में तो यह कार्यक्रम अनिवार्य रूप से किये जाते थे । 


बाज़ार का क्षेत्र और संपन्न लोगों की बस्तियाँ भी हमारी बस्तियों से लगी हुई थीं ৷  शहरी सिनेमा के पोस्टर देख देख कर बड़ी होने वाली पीढी को शुरू शुरू में यह सब देहातीपन लगता था लेकिन जब हमारी बस्तियों से हवा के हेलिकॉप्टर पर सवार होकर तुनतुने और ढोलकी की आवाज़ उन तक पहुँचती , वे लोग भी अपने आपको रोक नहीं पाते और गरीबों की  बस्तियों में  खड़ा तमाशा देखने पहुँच जाते । तमाशा देखकर लौटते हुए उनमे से कोई न कोई यह ज़रूर कहता था  “ बावा..इस खड़ी गम्मत में ना..अपन को सिनेमा से जास्ती मजा आई ৷”  और उसका साथी कहता “हौ क्या, बरोब्बर बोला तू ।“



95 नाना रेटर की झगड़ने वाली बाई



नाना रेटर, जी हाँ आपने ठीक पढ़ा है, मैंने नाना रेटर ही लिखा है नाना पाटेकर नहीं ৷ जैसे आज हमारे प्रसिद्ध फिल्म कलाकार नाना पाटेकर हैं उसी तरह उन दिनों महाराष्ट्र में मंच के एक प्रसिद्ध कलाकार नाना रेटर हुआ करते थे जिन्हें महाराष्ट्र के विविध स्थानों पर अक्सर उनकी मशहूर कला ‘नक्कल’ के लिए आमंत्रित किया जाता था ৷ दुर्गा व गणेश उत्सव में तो उनकी बुकिंग फुल रहती थी ৷ नागपुर के रहने वाले नाना रेटर अपनी जिस विधा के लिए जाने जाते थे उसे मराठी में ‘नकला’ या ‘नक्कल’ कहते हैं ৷ 


‘नक्कल’ की यह कला हमारी प्राचीन कला परम्परा में किये जाने वाले ‘स्वांग’ की ही एक कड़ी है ৷ यह ऑर्केस्ट्रा के मंच पर की जाने वाली मिमिक्री या रिकार्डिंग डांस से बिलकुल अलग मनोरंजन की एक स्वस्थ्य परम्परा है  ৷ इसमें मुख्य कलाकार किसी प्रसिद्ध सामाजिक, राजनैतिक व्यक्ति का स्वांग भरता है अर्थात उसका अभिनय करता है  ৷


नाना रेटर की नकलों का कार्यक्रम देखने के लिए काफ़ी प्रतिष्ठित लोग आते थे ৷ इस कार्यक्रम में मंच सज्जा साधारण ही होती थी ৷ अमूमन मंच खाली होता था या प्रस्तुति के अनुसार टेबल कुर्सी या अन्य प्रॉप्स की व्यवस्था की जाती थी ৷ मंच पर एक स्टैंड माइक या हैंगिंग माइक लगा होता था ৷ नाटक की प्रकाश व्यवस्था की भांति इसमें भी स्पॉट लाइट की व्यवस्था होती थी ৷


हम लोग नाना रेटर की ‘नकला’ देखने के लिए सबसे पहली लाइन में जगह हथिया लेते थे ৷कार्यक्रम शुरू होते ही एक संचालक मंच पर आता था और अनाउंसमेट करता था “अब आपके सामने थोड़ी ही देर में पधारने वाले हैं, हमारे देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ৷” 


हम बच्चे सोच में पड़ जाते, नेहरु जी तो मर गए हैं वे कैसे आएँगे ? फिर थोड़ी देर में मंच पर नेहरूजी के गेट अप में नाना रेटर का प्रवेश होता, चूड़ीदार पायजामा, अचकन, जवाहर जैकेट, सर पर टोपी, कोट में लाल गुलाब और चेहरे पर वही मुस्कान ৷ वे लाल किले से भाषण देने के अंदाज़ में कहते ‘प्यारे देशवासियों..’ हम लोग चौंककर उनकी ओर देखते, गुड्डू वानखेड़े मुझे कोहनी मारता .. “देख तो शरद, एकदम डिट्टो.. नेहरू जी৷”   


फिर थोड़ी देर बाद मंच पर गान्धी भी आते, बिनोबा भावे भी ৷ सरदार पटेल,शहीद भगतसिंह और विवेकानन्द के चरित्रों को नाना रेटर वहाँ साकार करते  ৷ वे केवल प्रसिद्ध नेताओं की ही नहीं बल्कि सामान्य लोगों  की भी नक़ल उतारा करते थे जिनमे सिपाही, बस कंडक्टर,किसान, मजदूर, शिक्षक,चायवाला आदि शामिल होते थे ৷ 


नाना रेटर का एक प्रसिद्ध आइटम था ‘नल पर झगड़ने वाली बाई’৷ इस कैरेक्टर में वे मराठी नौवारी साड़ी यानी लुगड़ा पहनकर आते और फिर अभिनय और संवादों के माध्यम से सरकारी नल पर सुबह सुबह पानी के लिए झगड़ने वाली दो गृहणियों का दृश्य उपस्थित करते ৷ दोनों स्त्रियों की भूमिका वे स्वयं ही करते थे ৷ वे अपनी नौवारी साड़ी का ‘काष्टा’ खोंसकर देहाती मराठी में लड़ने के अंदाज़ में यह संवाद कहते...”आता सांग, तव्हा तू मले का मन्हालीस होती वो... “ यानी यहाँ एक स्त्री दूसरी से कह रही  है .. “अब बोल, तभी तूने क्या कहा था मुझसे ,बता तो ज़रा ? “ इसके बाद वे सीधे सार्वजनिक जल वितरण प्रणाली की कमियां गिनाते ৷ उनका यह अभिनय देखकर लोग हँसते हँसते लोटपोट हो जाते ৷ 


नाना रेटर अपनी अगली भूमिका प्रस्तुत करने से पूर्व  मेकअप और वेशभूषा हेतु ब्रेक लेते थे ৷ इस अंतराल में आयोजकों द्वारा फिलर के रूप में स्थानीय कलाकारों को अपनी कला की प्रस्तुति देने का अवसर प्रदान किया जाता ৷ यह वे युवा होते थे जिनकी महत्वाकांक्षा फ़िल्मी दुनिया में जाने की होती थी लेकिन उनकी यह महत्वाकांक्षा ऑर्केस्ट्रा पार्टी में गायक या रिकार्डिंग डांस में डांसर बनाने में तिरोहित हो जाती थी৷ उनमे से कभी कभार ही कोई मुंबई जाकर ‘एक्स्ट्रा’ बन पाता ৷ सही रूप में नाना रेटर की कला को कोई आत्मसात नहीं कर पाया ৷


नाना रेटर अपनी तरह के अनोखे कलाकार थे ৷ वे अपने आइटम की स्क्रिप्ट स्वयं लिखते थे जिसमे वे राजनीति  पर और शासन की शिक्षा,स्वास्थ्य आदि की कुव्यवस्थाओं पर करारा व्यंग्य करते थे ৷ उनके बाद अब ‘नक्कल’ नामक यह कला लुप्तप्रायः है ৷ यह अब स्टैंड अप कॉमेडी में बदल गई है जिसमे कलाकार का उद्देश्य केवल दर्शक को हँसाना होता है और इसके लिए वह अपनी फूहड़ता में और भाषा में किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकता है ৷ आश्चर्य यह कि अब यह सभ्य ऑडियंस की पसंद की चीज़ है ৷ सांस्कृतिक पतन किसका हुआ है आप बेहतर समझ सकते हैं ৷ 



94 मिस पिंकी का रेकॉर्डिंग डांस



मिस पिंकी को नहीं पहचानते आप ? फिर तो मिस रोज़ी, रेशमा और हसीना को भी नहीं पहचानते होंगे ? सिनेमा देखते हुए ध्यान से देखिएगा ,वह जो हीरो हीरोइन के साथ ग्रूप मे ढिंका चिका ढिंका चिका पर डांस करते हुए लड़कियाँ दिखाई देती हैं न , वही हैं यह । इनके कपड़ो पर मत जाइएगा , ये झोपड़ पट्टियों मे रहती हैं । इनका चेहरा भी मत देखिएगा , उस पर मेकअप है । हो सकता है अभी भी अपने बच्चों को दूध पिलाकर शूटिंग पर आई हों । 

जाने कितनी लड़कियाँ ख्वाब लिए मायानगरी मे पहुँचती हैं लेकिन फिल्मी दुनिया मे हर किसी का जाना संभव नहीं होता । फिर वे लड़कियाँ अपनी कला का प्रदर्शन कहाँ करती हैं ? ए बीड़ू.... ज़्यादा अपना पुरुषवादी दिमाग मत लगाओ ,सब लड़कियाँ वहाँ नहीं जातीं जहां तुम सोच रहे हो । 

बचपन मे मैंने सुना था कि ऐसी लड़कियाँ जिन्हे फिल्मी दुनिया मे काम नहीं मिलता छोटी मोटी ऑर्केस्ट्रा पार्टियों , रिकॉर्डिंग डांस पार्टियों मे शामिल हो जाती हैं और गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में ,प्रदर्शनी आदि मे अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं । 



गणेशोत्सव और दुर्गा उत्सव में भंडारा के दर्शकों के मनोरंजन के लिए ऑर्केस्ट्रा के अलावा फ़िल्मी गानों और नृत्य पर आधारित एक कार्यक्रम काफी प्रचलित था ৷ यह कार्यक्रम ‘रेकॉर्डिंग डांस’ कहलाता था ৷इस कार्यक्रम के लिए भी  मंच उसी तरह सजाया जाता जैसे कि ऑर्केस्ट्रा में होता था लेकिन यहाँ वाद्ययंत्र नहीं होते थे इसलिए मंच पूरी तरह खाली होता था ৷ 


‘रेकॉर्डिंग डांस’ के मंच पर पीछे की ओर एक बड़ा सा पर्दा लगा रहता था  जिस पर किसी बगीचे या बड़े शहर की बिल्डिंगों का दृश्य होता था ৷ जनता कुछ देर तक तो उस परदे को ध्यान से देखती थी फिर ऊबकर सीटियाँ बजाने लगती थी ৷ ऑर्केस्ट्रा के दर्शकों की तुलना में यहाँ कम पढ़े लिखे लोगों का बाहुल्य होता था ৷ महिलाएँ अमूमन रिकार्डिंग डांस नहीं देखती थीं इसलिए कि उसमें नर्तक नर्तकियों द्वारा अशोभनीय हाव भाव दर्शाए जाने की गुंजाईश होती थी ৷ घर का पुरुष वर्ग भी उन्हें यह देखने की अनुमति नहीं देता था इसलिए छतों पर भी उनका जमावड़ा नहीं होता था ৷ वैसे भी यह कम बजट वाला पुरुषवादी मनोरंजन कार्यक्रम का एक प्रकार था ৷


जब जनता की उत्कंठा काफी बढ़ जाती पार्श्व से अमीन सयानी के अंदाज़ की नक़ल करती हुई एक आवाज़ आती  “मेहरबान कदरदान साहेबान ৷” मुझे वह आवाज़ अमीन सयानी की बजाय उस रिक्शेवाले की आवाज़ की तरह लगती थी जो नई पिक्चर लगने पर सड़क पर मुनादी करता था .. ‘आदर्श टाकीज के रुपहले परदे पर देखिये , आज तीन खेलों में जेमिनी का महान शाहाकार ...महान सामाजिक महान पारिवारिक चित्र फलां फलां ৷’ दर्शकों की सीटियाँ कुछ समय के लिए ठहर जातीं ৷


फिर कुछ पल बाद परदे के पीछे से आवाज़ आती..” इंतज़ार की घड़ियाँ खतम...लीजिये अब आपके सामने हमारी कंपनी की फेमस डांसर मिस पिंकी प्रस्तुत करने जा रही हैं, प्रसिद्ध फिल्म ‘अनोखी रात’ का यह मशहूर गीत , गीत के बोल हैं ‘मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो कोई कांटा चुभ जायेगा’৷ बस इसके बाद लोग दिल थाम कर बैठ जाते ৷ इधर साइड में बैठा रिकॉर्ड बजाने वाला एच एम वी के चाबी वाले रिकॉर्ड प्लेयर पर गाने का रिकॉर्ड लगाता और जैसे ही बड़े बड़े लाउड स्पीकरों से आवाज़ बाहर आती मिस पिंकी अरुणा ईरानी के ग्रामीण बाला वाले गेट अप में मंच पर पहुँच जाती और आशा भोंसले की आवाज़ पर होठ हिलाते हुए गाने लगती.. ना ना ना ना ना ना मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो .. मेरी बेरी के बेर मत तोड़ो कोई काँटा .. हाय.. कांटा चुभ जायेगा ৷


जनता इस गीत का आनंद लेते हुए कुछ इस तरह प्रतिक्रिया प्रकट करती जैसे उन्हें सही में कांटा चुभ रहा हो ৷ इस प्रकार के नृत्य में हाव भाव किस तरह के होते थे और किस किस एक्शन पर जनता की सिसकारियाँ निकलती थीं यह आप न पूछें तो बेहतर होगा ৷ इसके लिए आप फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ पर बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ में वहीदा रहमान द्वारा नौटंकी में प्रस्तुत गीत ‘पान खाए सैंया हमारो ’ पर वहाँ उपस्थित ऑडियंस की प्रतिक्रिया का स्मरण कर सकते हैं ৷ कभी कभी कोई बेवड़ा अपनी जगह पर खड़े होकर एकाध ठुमका लगाता और फिर बैठ जाता ৷ वैसे भी वहाँ कोई अप्रिय घटना नहीं होती थी इसलिए कि उत्सव आयोजकों के ‘भाई लोग’ पूरे समय तैनात रहते थे ৷


इस तरह रेकॉर्डिंग डांस’ का प्रोग्राम जारी रहता ৷ फिर किसी युगल गीत का रिकॉर्ड बजता जिसमे कोई मास्टर कुमार आते, मिस रोज़ी के साथ, फिर मिस बॉबी आती, कोई मिमिक्री आर्टिस्ट आते, कोई चुटकुलेबाज़ आते, हरेक के आगमन पर सीटियाँ बजाने का क्रम बराबर जारी रहता ৷ कभी कभी रिकॉर्ड की सुई किसी जगह पर अटक जाती उस समय नर्तक या नर्तकी की स्थिति बहुत असमंजस पूर्ण हो जाती ৷ अगर रिकॉर्ड बजाने वाला कहीं हल्का भारी होने गया हो तो उनके लिए और भी मुश्किल हो जाती ৷ तब यह जनता सीटियाँ मारकर और चीख चीख कर उनका स्टेज पर खड़े रहना भी हराम कर देती ৷  पूरे कार्यक्रम में खुशियाँ और प्रतिक्रिया प्रकट करने का यही कल्चरल सिस्टम था ৷ 


93 कादर,ओ.पी.सिंह और ठक्कर का ऑर्केस्ट्रा




भंडारा की श्रीकृष्ण टाकीज की बगल वाले  खाली मैदान पर एक मंच बना हुआ है ৷ आज यहाँ दुर्गा उत्सव के अंतर्गत कादर ऑर्केस्ट्रा का प्रोग्राम है ৷ श्रीकृष्ण टाकीज के सेकण्ड शो में आज भीड़ बिलकुल नहीं है ,सिनेमा कौन देखेगा ..मुफ्त में ऑर्केस्ट्रा का प्रोग्राम जो देखने मिलने वाला है ৷ 


ऑर्केस्ट्रा वालों की बस नागपुर से आ चुकी है, तबला,हारमोनियम,गिटार, क्लोरोनेट, कांगो और बांगो ड्रम्स,अकोर्डियन,सेक्सोफोन आदि वाद्ययंत्र स्टेज पर सज चुके हैं ৷ गाने वालों और संचालक के लिए तीन स्टैंड माइक के अलावा हर वाद्ययंत्र के सामने भी एक एक माइक लगा है ৷ अब वादक गण धीरे धीरे मंच पर पधार रहे हैं ৷ सामने दरी पर, कुर्सियों पर, दुकानों के सामने पटियों पर बैठी जनता की उत्सुकता चरम पर पहुँच चुकी है ৷ आसपास के मकानों की छतों पर माताओं बहनों का साम्राज्य है ৷


 अब दाहिने हाथ में माइक लिए हुए और बाएँ हाथ में तार को समेटते हुए ऑर्केस्ट्रा का मुख्य पात्र यानी अनाउंसर उपस्थित होता है ৷ वह चकमक करती हुई ड्रेस पहने हुए है ৷ जनता की ओर देखकर वह अभिवादन करता है .. अमीन सयानी के अंदाज़ में एक आवाज़ गूंजती है.. मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, प्यारे दोस्तों, आज आपकी खिदमत में पेश है जनाब मोहम्मद कादर और उनकी पार्टी का मशहूर ऑर्केस्ट्रा ..৷ 


फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ के शम्मीकपूर की स्टाइल में ड्रम स्टैंड पर बैठा एक ड्रमर पीतल की चकती पर जोर से स्टिक पटकता है, वातावरण में झन्न की आवाज़ सुनाई देती है, साथ ही सारे साज बज उठते हैं ৷ जनता तालियाँ बजाती है ৷


अनाउंसर महोदय फिर माइक थाम लेते हैं ..लीजिये अब आपकी खिदमत में पेश है हमारे प्रोगराम की पहली पेशकश, फिल्म का नाम है ‘मेरे सनम’, मजरूह सुल्तानपुरी का कलाम,जिसे ओपी नय्यर की मौसीकी में गाया है आशा भोंसले ने  .. आपके सामने लेकर आ रही हैं  कादर ओर्केस्ट्रा पार्टी की सितारा कलाकार मिस जेनेट ...गीत के बोल हैं .. ‘ये है रेशमी ज़ुल्फों का अँधेरा न घबराइए .. जहाँ तक महक है मेरे गेसुओं की चले आइये ..’


फिर एक सिलसिला शुरू हो जाता है ৷ जेनेट के बाद कादर साहब आते हैं जो मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में गाने के लिए मशहूर हैं ৷ यह वह दौर था जब ‘जवानियाँ ये मस्त मस्त बिन पिए’, ‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे’, ‘आसमान से आया फ़रिश्ता’ ‘आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा’  जैसे मस्ती भरे गीतों से लेकर, ‘दिन ढल जाए तेरी याद सताए’ , ‘अकेले हैं चले आओ’ जैसे उदासी भरे गीत भी उनकी आवाज़ में हमने सुने ৷ मिस जेनेट जो लताजी और आशाजी की आवाज़ में खूब गाती थीं बाद में कादर साहब के साथ युगल गीत गाते हुए उनसे विवाह कर श्रीमती जीनत बन गई थीं ৷ 


उन दिनों भंडारा में कादर ऑर्केस्ट्रा के अलावा, ओ.पी. सिंह एंड पार्टी , योगेश ठक्कर का ऑर्केस्ट्रा ,महेश कुमार एंड पार्टी और ऐसे ही कई ऑर्केस्ट्रा बहुत मशहूर थे ৷ उन दिनों राजनांदगांव से राजभारती ऑर्केस्ट्रा भी भंडारा आया करता था जिसमे एक भाटिया जी थे जो किशोर कुमार की आवाज़ में बहुत मस्ती के साथ गीत गाते थे ৷ अब तो नागपुर में ही सौ से अधिक ऑर्केस्ट्रा पार्टी या बैण्ड हो गए हैं ৷ इन पुराने ऑर्केस्ट्रा समूह  में बीच बीच में वादकों को भी अपना फन दिखाने का अवसर मिलता था और वे फिल्म संगीत का कोई टुकड़ा जिसे वे म्यूजिक पीस कहते थे अवश्य सुनाते थे ৷ सेक्सोफोन वादक तो पूरा गीत ही पेश करते थे ৷ उन्नीस सौ सत्तर में आई फिल्म ‘ द ट्रेन’ का गाना गुलाबी ऑंखें जो तेरी देखीं शराबी ये दिल हो गया’ सेक्सोफोन वादकों का फेवरेट गाना रहा ৷


ऑर्केस्ट्रा में गायकों तथा वादकों के अलावा संचालक का सबसे अधिक महत्व होता था । वह गाये जाने वाले गीत का  विवरण प्रस्तुत करने के अलावा बीच बीच में चुटकुले भी सुनाता था और उस दौर के प्रतिष्ठित कलाकारों जैसे देवानन्द, दिलीप कुमार, ओमप्रकाश, जीवन, राधाकिशन,के.एन.सिंग, मनोज कुमार, मेहमूद,राजेश खन्ना,संजीव कुमार,अजीत,प्राण आदि की आवाज़ की मीमिक्री भी प्रस्तुत करता था । दर्शकों को बांधे रखने की कला में माहिर संचालक को देखकर मेरे मन में भी यह इच्छा उत्पन्न होती थी  कि मैं बड़ा होकर ऑर्केस्ट्रा संचालक बनूंगा । आगे जाकर मेरी यह इच्छा कुछ समय के लिये पूरी भी हुई । 


वे भी क्या दिन थे जब भंडारा के गांधी चौक, शहीद चौक,महल के सामने तिवारी ट्रांसपोर्ट के मैदान में,कॉलेज रोड पर पी डब्ल्यू डी ऑफिस के पास ,सिविल लाइन्स जैसी जगहों पर ऑर्केस्ट्रा संगीत का यह मेला लगता था ৷ नब्बे के दशक तक यह ऑर्केस्ट्रा प्रेम अपने चरम पर पहुँच चुका था फिर धीरे धीरे टेलीविज़न आता गया, दुर्गा गणेश मंडलियों के पास पैसे भी कम होते गए और आयोजक  लोगों ने ऑर्केस्ट्रा बुलाना बंद कर दिया৷ 


92 .बुद्धि के देवता गणेश और शक्ति की देवी दुर्गा



शिकार संग्रहण, पशुपालन और कृषि की अवस्था से होते हुए हम होमोसेपियंस आज की स्थिति तक पहुंचे हैं ৷ मनुष्य के जीवन में पेट भरने के बाद दिमाग़ की भूख का इंतज़ाम करने की स्थिति आती है और इनके समाधान के लिए उसके जीवन में मनोरंजन, युद्ध, धर्म आदि प्रवेश करते हैं ৷ सूक्ष्मता से देखा जाए तो हर सिलसिला मनुष्य की भूख तक ही पहुँचता है ৷ भोजन की तलाश में मनुष्य जंगलों और गुफाओं से निकलता है और  मैदानों में बस जाता है ৷  धीरे धीरे कबीले गाँवों में बदलते हैं और गाँव शहरों में ৷ फिर शहर वर्गों में बंट  जाते हैं ৷ कुछ मनुष्य अमीर हो जाते हैं और कुछ ग़रीब ही रह जाते है ৷


हमारे शहर भंडारा की यह गली भी एक तरह से गरीबों की ही बस्ती थी ৷ इस  गली में निम्न और निम्न मध्यवर्गीयों की बहुलता थी । मुख्य सड़क पर अधिकतर नौकरीपेशा लोग रहते थे ৷ यह सभी लोग साधारण मनुष्यों की तरह अपने दुखों का निवारण ईश्वर की आराधना  में ढूँढते थे इसलिये घरों के अलावा सामूहिक रूप से भी मोहल्ले में साल भर तरह तरह के धार्मिक आयोजन हुआ करते थे । इन सब आयोजनों में दुर्गा और गणेश उत्सव के आयोजन प्रमुख होते थे ৷ वर्षा ऋतु  की समाप्ति के पश्चात कृषक अपने कृषि कार्यों से निवृत हो जाते वहीं मौसम में भी तब्दीली आ जाती और सुहावनी शरद ऋतु का आगमन हो जाता ৷ यही समय ऐसे उत्सवों हेतु अनुकूल होता था ৷


महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की एक समृद्ध परंपरा है जिसकी शुरुआत लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ आम जनता को लामबंद करने हेतु की थी ৷ वे जनता को पूजा पाठ के बहाने एक स्थान पर एकत्रित करते और उनके कानों में आज़ादी का मन्त्र फूंकते ৷ अंग्रेज़ सरकार धार्मिक कार्य समझकर इसमें कोई दख़ल नहीं देती थी ৷ धीरे धीरे गणेश उत्सव के यह आयोजन पूरे महाराष्ट्र में होने लगे ৷ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी महाराष्ट्र में यह आयोजन चलते रहे ৷ यद्यपि बाद में इसका उद्देश्य पूजा पाठ और मनोरंजन तक सीमित रह गया ৷


जैसे जैसे प्रजा संपन्न होती गई और लोगों के पास पैसा आने लगा यह उत्सव और अधिक धूम धाम से मनाया जाने लगा ৷ पूजा और उत्सव प्रायोजित भी होने लगे ৷ भक्ति में धनाढ्यों के धन और उसके प्रदर्शन का यह समावेश अनायास और निरुद्देश्य नहीं था ৷ लेकिन जनता को इन बातों से कोई मतलब नहीं था ৷ उसके लिए यह उत्सव ही था और आज भी है ৷ बाद में उत्सव के अंतर्गत प्रतिमा स्थल को सजाने की भी होड़ लगने लगी, साथ ही दस दिनों तक विभिन्न मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित करने का भी सिलसिला प्रारंभ हुआ ৷ तिलक द्वारा शुरू किये गए बुद्धिजीवियों के व्याख्यानों और बौद्धिक कार्यक्रमों के स्थान पर ऑर्केस्ट्रा, फ़िल्मी नृत्य, यानी रेकॉर्डिंग डांस,नक्कल,जादू के प्रयोग जैसे मनोरंजन के कार्यक्रम होने लगे ৷ यद्यपि ग्रामीण क्षेत्रों में खड़ा तमाशा,लावणी,पोवाड़ा जैसी लोक कलाओं का बोलबाला रहा ৷


उत्सव के अंतर्गत स्थल सजावट की प्रतियोगिता भी प्रारंभ हुई और जिस तरह गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में राजपथ पर राष्ट्रीय महत्व के विषयों और राज्यों की उपलब्धियों पर झाँकियाँ दिखाई जाती हैं उसी तरह गणेशोत्सव में पौराणिक दृश्यों पर झाँकियाँ सजाई जाने लगीं ৷ विदर्भ में  उन दिनों गणेशोत्सव के अंतर्गत झाँकियों के लिये चालिसगाँव नाम की एक मशहूर जगह थी । भंडारा से लगभग तीस किलोमीटर दूर तुमसर के करीब स्थित चालिसगाँव गणेशोत्सव की अपनी झांकियों के लिये प्रसिद्ध था । यहाँ हरिश्चंद्र के पुत्र की मृत्यु, शिवजी का विवाह, सीताजी का अग्निप्रवेश, राजा शिवी का बाज को दिया गया अंग दान,जैसे अनेक पौराणिक दृश्यों को बिजली की मोटर से चलने वाले पुतलों के अंग संचालन द्वारा साकार किया जाता था ।

 

मुझे याद है उन्हीं दिनों हमारे देशबंधु वार्ड में  दुर्गा उत्सव मनाना प्रारम्भ किया गया । इसकी शुरुआत बच्चों ने की थी इसलिये इसका नाम बालपुरी नवदुर्गा उसव रखा गया । बाद में इस समिति में कई बड़े लोग भी शामिल हो गये । बाबूजी चूँकि मोहल्ले के एक वरिष्ठ और पढ़े लिखे व्यक्ति थे उन्हें भी समिति में रखा गया था । उत्सव हेतु चंदा जमा करने का कार्य काफी दिनों पूर्व ही प्रारंभ हो जाता था ৷ एक रसीद बुक बाबूजी को भी थमाई जाती ৷ मैं वह रसीद बुक लेकर  बाबूजी के कॉलेज के हॉस्टेल जाता था और चन्दा जमाकर ले आता था । 


यह गरीबों की बस्ती थी इसलिए अधिक चंदा जमा नहीं होता ৷ इसलिए ऑर्केस्ट्रा जैसे महंगे कार्यक्रम नहीं करवा सकते थे ৷अतः  दुर्गा उत्सव के इन  दस दिनों के आयोजन में अधिकतर भजन आदि के कार्यक्रम ही हुआ करते थे । अंतिम दिन बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे जिसमें मैं भी भाग लेता था । बच्चों को इनाम में पेन,स्केल,कम्पस बॉक्स,चाकलेट,जैसी वस्तुएँ मिलती थीं सार्वजनिक उत्सव के अलावा गणेश पक्ष में घर में गणपति और जन्माष्टमी पर घर में ‘कान्होबा’ रखने का चलन भी था ৷ सत्यनारायण की कथा तो आये दिन हर घर में होती ही रहती थी ৷


कुछ वर्षों बाद हमारे मोहल्ले की सार्वजनिक दुर्गा उत्सव की इस परम्परा में गणेशोत्सव और शारदोत्सव के आयोजन भी जुड़ गये । मोहल्ले के इन कार्यक्रमों में मैं पूरे उत्साह से भाग लेता था और उतने दिनों तक पढ़ाई ठप्प रहती थी । शहर में विभिन्न स्थानों पर गणेश और दुर्गा उत्सव के आयोजन होते थे ৷ रात्रि भोजन के उपरांत  मैं मोहल्ले के अपने मित्रों गुड्डू वानखेड़े,सुशील माहुले आदि के साथ शहर में निकल जाता था, जहाँ भी कोई अच्छा कार्यक्रम देखने को मिलता हम लोग देखते और फिर देर रात घर लौटकर चुपचाप सो जाते ।  इस तरह के आयोजनों में मेले जैसा माहौल होता था, चाट पकौड़ी की दुकानें लगती थीं , बच्चों के लिये तरह तरह के खिलौने मिलते थे इसलिए इन दिनों पूरे शहर के आकर्षण का केंद्र यही आयोजन होते थे और यहाँ शहर के ही नहीं आसपास के गाँवों से भी ग्रामीण जन,महिलाएँ बच्चे  पैदल चलकर शहर आते थे । 



91 .उस दिन ठण्ड का रंग गुलाबी था



आप ज़िंदगी भर देश विदेश की यात्राएँ करें लेकिन बचपन के दिनों में अपने क्लासमेट्स के साथ पहली पहली यात्रा या पिकनिक हमेशा याद रहती है ৷ वह दिन भी मेरे जीवन का एक ऐसा दिन था जो बरसों मेरी स्मृतियों में बसेरा करने वाला था ৷ उस दिन सुबह आठ बजे हम सभी बच्चे स्कूल के सामने एकत्रित हो गए । 


ठंड का कोई रंग मुझे दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन सब उसे गुलाबी ठण्ड कह रहे थे ৷ हम लोग जुलुस की शक्ल में पैदल पैदल ही ढोला स्कूल से निकले, फिर वहाँ से शीतला माता मंदिर पहुँचे और वहाँ से रिंग रोड से आगे बढ़ कर खामतालाव, शुक्रवारी, मनरो स्कूल चौक से होते हुए शहर से बाहर एक ईट भठ्ठे पर पहुँचे । यह ईट भठ्ठा हमारी कक्षा की एक पंजाबी लड़की विनोद मदान के पिता निहालचंद जी मदान का था । 


हमारा कोई तयशुदा पिकनिक स्पॉट नहीं था लेकिन हमें आगे सूर नदी के किनारे तक जाना था ৷ यह जगह हमें इतनी अच्छी लगी कि हमने कुछ देर यहीं रुकने का फैसला किया । अचानक देखा ईट भठ्ठे में काम करने वाली कुछ महिलाएँ अखबार के कागज़ पर गर्मागर्म पोहा लेकर चली आ रही हैं ৷  मदान अंकल ने हम लोगों के लिए नाश्ते में पोहे की व्यवस्था पहले ही कर रखी थी ৷ अनुमान ने आश्चर्य से कहा ‘घड़ोले सर पहले ही मदान साहब से मिलकर सब कुछ तय कर चुके हैं ৷’ 


यहाँ तक पहुंचते पहुंचते भूख तो लग ही गई थी सो जमकर पोहा खाया और उसके बाद मस्ती शुरू ৷ माँ कहती थी ‘ पेट में गया दाना, मुर्गी करे धिंगाना ‘ सही बात थी ৷ हमने देखा आसपास बेर के कई पेड़ थे । पेट भरा था फिर भी हम लोगों ने बेर तोड़ कर खानी शुरू कर दी । इसके बाद अंकल हम बच्चों को ईट भठ्ठे पर ले गए मिट्टी से किस तरह साँचे में ढलकर ईट बन जाती है , उसे किस तरह पकने के लिए भट्ठी में रखा जाता है यह सब हमने पहली बार देखा ৷ ईट भठ्ठे के मजदूरों से भी हमारा परिचय हुआ जो वहीं टिन शेड में घर बनाकर रह रहे थे ৷ 

 

हमारा अगला पड़ाव था सूर नदी ৷ तीन- चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम लोग थकावट महसूस कर रहे थे लेकिन नाश्ते ने हमारे लिए एनर्जी बूस्टर का काम किया था । नदी का बहता हुआ पानी देखकर सारी थकावट ग़ायब हो गई ৷ मैं नदी से कुछ दूर ही था लेकिन मुझे लगा नदी मुझे अपने पास बुला रही है ৷ इस निमंत्रण को मैं  कैसे अस्वीकार कर सकता था ৷ मैंने अपने मित्रों के साथ सर से अनुमति ली और नदी में छलांग लगा दी । कुछ सीनियर और अनुभवी छात्रों की सलाह पर हम लोग अंतर्वस्त्र,टावेल आदि साथ लेकर गए थे ৷ हालाँकि नदी में पानी कम और रेत अधिक थी इसलिए डुबकी लगाने के आनंद से हम लोग वंचित रहे ৷ मुझे याद है मेरे मित्र नरेश मदान की सैंडल उस रेत में फँस गई थी जिसे बहुत मुश्किल से हम लोगों ने निकाला । 


नहा धोकर फिर हम लोग आगे बढ़े और एक संतरे के बाग में पहुँचे । उसके निकट ही अमरुद का एक बाग़ भी था ৷ हम लोगों ने ईमानदारी से इन बागों से संतरे और अमरुद खरीदे । यद्यपि खरीदना सिर्फ नाम के लिए था, खरीदकर खाने से ज़्यादा आनंद चुराकर खाने में आया ৷ हालाँकि यह चोरी छुपी नहीं रही, बहरहाल संतरे और जाम इतने मीठे थे कि चौकीदार की  गालियाँ भी हमें मीठी लगीं । 


इस पिकनिक का सबसे ज़ोरदार आइटम था लड़कियों द्वारा सूजी का हलुआ बनाना ৷ हम लोग अपने साथ हलुआ बनाने का सामान भी ले गये थे ।  भोजन की अन्य सामग्री विनोद के पिताजी के सौजन्य से आई थी ৷  सबसे पहले हम लोगों ने एक पेड़  के नीचे ईटों का एक चूल्हा बनाया । फिर लकड़ियाँ इकठ्ठी की और आग जलाई ৷ आगे कढ़ाई चढ़ाने से लेकर  हलुआ बनाने तक का काम लड़कियों के ज़िम्मे था सो लड़के निश्चिन्त होकर खेलते रहे  । 


थोड़ी देर में आवाज़ आई, ‘हलुआ तैयार है’ । पेट तो वैसे ही सबके भरे हुए थे फिर भी सभी ने बहुत चटखारे लेकर हलुआ खाया । हालाँकि उसमे पानी की मात्रा अधिक हो जाने के कारण हलुआ थोड़ा सा पतला हो गया था । कुछ लड़कों ने मज़ाक में कहा कि अगर पतंग बनाने के ताव ( कागज़ ) ले आते तो इससे पतंग भी बना लेते । उसके बाद मनोरंजन कार्यक्रम शुरू हुआ । वैसे भी खाने के बाद गाना होना ही था ৷ किसीने गीत गाया, किसीने चुटकुला सुनाया । 


अर्चना ने अपने तैयार किये हुए दोनों गीत सुनाये । मैं तो शास्त्रीय संगीत वाला गायक था लेकिन मैंने उन दिनों चर्चित एक  गीत सुनाया ..”सुन ले बापू ये पैगाम मेरी चिठ्ठी तेरे नाम , चिठ्ठी में सबसे पहले लिखा तुझको राम राम ৷” इस गीत की यह पंक्तियाँ मुझे अब भी याद हैं .. “तेरी लकड़ी ठगों ने ठग ली तेरी बकरी ले गए चोर, साबरमती सिसकती तेरी तड़प रहा है सेवाग्राम ৷” मुझे क्या पता था कि अगले अनेक वर्षों तक इस परिदृश्य में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है ৷


खैर, नहाना-धोना, घूमना-फिरना, खाना-पीना,गाना - बजाना ख़त्म हुआ ৷ पिकनिक को परिभाषित करने वाले सभी कार्य संपन्न हुए ৷ ठण्ड के दिन थे इसलिए जल्द ही घर लौटना था ৷ जैसे गंजे का माथा कहाँ तक होता है पता नहीं चलता वैसे ही ठण्ड के दिनों में सुबह दोपहर के बीच कहाँ तक चली जाती है समझ में नहीं आता ৷ इधर शाम बिना ओवरटाइम किये जल्द ही घर लौट जाना चाहती है  ৷ हम लोगों को अँधेरा होने से पहले घर पहुंचना था इसलिए दोपहर की साँस टूटने से पहले ही हम लोग ईट भठ्ठे पर लौट आये । विनोद के पिताजी ने हम लोगों के लिये चाय बिस्कुट की व्यवस्था कर रखी थी ৷ अब हमें पैदल नहीं लौटना था, वापसी की यात्रा के लिए उन्होंने एक ट्रक की व्यवस्था भी कर दी थी । ट्रक के डाले में बैठकर हम लोग स्कूल के सामने तक आये और फिर वहाँ से सब बच्चे शाम ढलने से पूर्व ही अपने अपने घरों को लौट गए  ।   



90 .बड़े से दरवाज़े के पीछे छुपा एक तिलिस्म





बचपन के वे दिन बहुत खूबसूरत थे ৷ चिंताएं मानस की देहरी लांघने का प्रयास ही नहीं करती थीं ৷ मक्खन से नर्म उन दिनों में देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों के तिलिस्म थे, परियों की कहानियाँ और राजकुमारी को जादू के जोर से मेंढकी बना देने वाली जादूगरनी के किस्से थे, मृत्युंजय यानि फैंटम के कॉमिक्स थे ৷ रंगीन चित्रों वाली यह किताबें बार बार मुझे बुलाती थीं और मैं कोर्स की नीरस किताबों से बचता हुआ इनसे प्यार करने लगता था ৷ 


उन दिनों रेडियो पर एक गीत आया करता था “ सिकंदर ने पोरस से की थी लड़ाई ,जो की थी लड़ाई , तो मैं क्या करूँ ...?” इतिहास की किताब खोलकर मैं उसे सर पर रख लेता और महेंद्र कपूर की आवाज़ में सुर मिलकर ज़ोर से गाता “जो कौरव ने पांडव से की हाथापाई तो मैं क्या करूँ ৷” मुझे इतिहास में रूचि तो थी लेकिन राजाओं महाराजाओं का नहीं बल्कि अपने आसपास के लोगों का इतिहास जानने में ৷ पाठ्य पुस्तकों में पढाये जाने वाले इतिहास, भूगोल व नागरिक शास्त्र यह सभी विषय मुझे बेहद उबाऊ लगते और मैं हमेशा इन सबसे  पीछा छुड़ाने का प्रयास किया करता । 


स्कूल से घर लौटकर मैं लाख सबक  रटने की कोशिश करता लेकिन सबक था कि मुझे याद ही नहीं होता था ৷ उस समय मेरी एक मज़ेदार धारणा थी कि सर पर तेल ठोंकते हुए सबक याद करने से सबक जल्दी याद हो जाता है । मैं अक्सर ऐसा ही किया करता था और आश्चर्य कि सबक मुझे याद हो जाता ৷ फिर मैं अन्य मित्रों को भी यही टोटका आज़माने की सलाह दिया करता था । यह टोटका “ नदी का पानी नदी में जा, मेरी पट्टी सूख जा “ जैसे टोटके की श्रंखला का ही एक टोटका था ৷ बड़े होने के बाद मनोविज्ञान पढ़ते हुए मैंने जाना कि इस तरह स्वयं को दिए जाने वाले सुझाव सेल्फ सजेशन कहलाते हैं ৷


सातवीं कक्षा तक पहुँचते हुए बचपन की आवाज़ मैं पिछली गली में छोड़ आया था और किसी और ही आवाज़ में बोलने लगा था ৷ एक दिन आश्चर्य और भय के भँवर से बाहर निकालते हुए माँ ने मुझे बताया कि इसे ‘कंठ फूटना’ कहते हैं और अब आगे जीवन भर मेरी यही आवाज़ रहेगी ৷ अपनी देह में होने वाले परिवर्तनों को मैं संवेदनशीलता के साथ महसूस कर रहा था,  स्तनाग्रों में होने वाले दर्द के विषय में जब मैंने माँ से कहा तो उन्होंने कहा इस उम्र में लडके लड़कियों दोनों के लिए ऐसा होना स्वाभाविक है इसी बिंदु से बच्चे स्त्री और पुरुष होने की अलग अलग राह पकड़ते हैं ৷ 


मैं बचपन से ही को एजुकेशन में पढ़ रहा था, जननेन्द्रियों के अलावा शारीरिक तौर पर इस उम्र में लडके लड़कियों में कोई और फ़र्क होता है ऐसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था ৷ लेकिन अब बढ़ती हुई देह के बदलते अनुपात में मैं यह अंतर महसूस करने लगा था ৷ मेरे मन में लड़कियों के प्रति एक अंजान सा आकर्षण भी जन्म लेने लगा था और मैं सबकी नज़रें बचाकर उनकी ओर देखने भी लगा था ৷ 


कैलेण्डर में अक्तूबर का पन्ना कुलाटी खाकर सितम्बर के पीछे जा चुका था और खुली खिड़की से झाँकते हुए, कानो पर मफलर बांधे अगहन मुस्कुरा रहा था ৷ भंडारा शहर से लगे खेतों में तुअर और मटर की फल्लियाँ, मुली गाज़र जैसी वनस्पतियाँ और चौलाई,मेथी,पालक की ताज़ी हरी सब्जियाँ शीतल बयारों के साथ अठखेलियाँ कर रही थीं ৷ 


स्कूलों में यह शैक्षणिक सहल यानी पिकनिक का मौसम था ৷ एक दिन हमारे क्लास टीचर घड़ोले सर ने क्लास में घोषणा कर दी कि अगले रविवार को  सब लोग पिकनिक पर जायेंगे ৷ इस पिकनिक में विशेष हिदायत यह थी कि कोई टिफिन नहीं ले जायेगा बल्कि  खाना पकाने का सामान यहीं से ले जायेंगे और वहाँ जंगल में सूर नदी के किनारे खाना बनायेंगे । उन्होंने शाम को मुझे घर पर बुलाया और कुछ आवश्यक कामों की सूची बनाकर मुझे दे दी । 


घड़ोले सर मुझे बहुत अच्छे लगते थे ৷ वे बेहद सलीके से कपड़े पहनकर आया करते और काफी स्मार्ट दिखते थे ।  वे हमें इंग्लिश पढ़ाया करते थे । उनका न केवल पढ़ाने का ढंग अच्छा था बल्कि वे खुद भी एक बहुत अच्छे व्यक्ति थे और हम बच्चों को बहुत चाहते थे ৷ 


खाने पीने की व्यवस्था और सामान खरीदने की ज़िम्मेदारी घड़ोले सर की थी ৷ मुझसे उन्होंने कुछ गीत तैयार करने के लिये कहा और मुझे यह दायित्व सौंपा कि अन्य छात्र छात्राओं से भी गीत तैयार करवाऊँ । मैंने जब गाने वाले मित्रों के बारे में सोचना प्रारंभ किया तो मुझे सिवाय अर्चना के और किसी का नाम याद नहीं आया । मैंने सर से यह कहा तो उन्होंने आदेश दिया “कल छुट्टी है, कल अर्चना के घर जाओ और उससे कहो कि ‘मेरे रोम रोम में बसने वाले राम ‘ और ‘बच्चे मन के सच्चे “ यह दो गीत तैयार करे । 


अर्चना वहीं महल के निकट एक बाड़े में रहा करती थी । मैं अगले दिन दोपहर में अर्चना के घर पहुँचा । कक्षा की किसी भी लड़की के घर जाने का मेरा यह प्रथम अवसर था सो संकोच के अलावा थोड़ा डर भी लग रहा था । यह शंकर राव शेंडे का बाड़ा था ৷ बाड़े में प्रवेश के लिए एक बड़ा सा दरवाज़ा था जिसके भीतर किराये के अनेक मकान थे ৷ मैं कभी उस दरवाज़े के भीतर गया नहीं था इसलिए मुझे ठीक से पता नहीं था कि अर्चना किस मकान में रहती है ৷ बस यह पता था कि स्कूल से लौटते हुए वह उस बड़े से दरवाज़े के भीतर चली जाती है ৷ 


उस बड़े से दरवाज़े पर पहुँचकर मैं ठिठक गया ৷ मुझे वह एक तिलिस्म की तरह लगा ৷ भीतर एक बहुत बड़ा आँगन था जिसके आगे अनेक मकानों के दरवाज़े थे  ৷ मैं सोच ही रहा था कि किसीसे पता पूछूँ कि देखा दरवाज़े के ऊपर सड़क की ओर एक गैलरी है जिस पर एक महिला खड़ी हुई है ৷ मैंने थोड़ी हिम्मत जुटा कर उनसे पूछा “ वो..अर्चना .. अर्चना यहीं रहती है क्या ? “ 


उस महिला ने मुझसे तो कुछ नहीं कहा लेकिन पीछे पलटकर आवाज़ दी “ अर्चना, तुम्हारे यहाँ कोई आया है । “ अर्चना गैलरी में प्रकट हुई ৷ उसके बालों की  एक लट माथे पर झूल रही थी और दोनो हाथ बरी के पीठे से सने हुए थे ৷ शायद वह अपनी पड़ोस वाली आंटी की बरी डालने में मदद कर रही थी । “अरे ! तुम ?” उसे आश्चर्य हुआ ৷ बहरहाल, मैंने उसे आश्चर्य से उबरने का मौका दिए बगैर जल्दी जल्दी घड़ोले सर का सन्देश सुनाया और घर वापस आ गया । 


आप लोगों को फिल्म बॉबी का ऋषि कपूर और डिम्पल कपाड़िया की पहली मुलाकात वाला दृश्य याद आ रहा होगा ना ? माफ़ कीजिये, यहाँ ऐसा कुछ नहीं घटित हुआ ৷ सारे नाटकीय दृश्य फिल्मों में ही घटित होते हैं, ज़िंदगी तो जन्म से लेकर मृत्यु तक एक सपाट दृश्य के अंतर्गत ही घटित होती है ৷ 


यद्यपि इस पहली मुलाकात के बाद अर्चना के परिवार से हम लोगों के पारिवारिक सम्बन्ध स्थापित हुए ৷ हम लोगों का उनके यहाँ आना जाना प्रारंभ हुआ ৷ अर्चना ने हमारी माँ को मौसी कहना शुरू किया और उसकी माँ हम लोगों की मौसी हो गई  । अर्चना से बड़ी इन्ना दीदी, छोटे भाई विनय और अभय मेरे, सीमा और बबलू के भाई बहन हो गए ৷ यह मुलाकात ऐसे रिश्तों की गंगोत्री थी जिनसे निकली गंगा आज तक बह रही है ৷ 


89 दैविक शक्ति मुझे प्राप्त हो जाए





आरती के बाद हाथ जोड़कर खड़े होकर मन ही मन भगवान से कुछ माँगने की परम्परा हमारे यहाँ भी थी ৷ अन्य लोगों का तो मुझे पता नहीं लेकिन मैं भगवान से कहता ..” हे प्रभु, इस साल भी मुझे क्लास में पहला नम्बर दिलाना ।“ विद्या,बुद्धि प्रदान करना,धन धान्य से संपन्न करना जैसी व्यावसायिक शब्दावली मुझे उस समय भी नहीं आती थी ৷ मेरी प्रार्थना चौथी क्लास तक तो स्वीकार हुई अर्थात क्लास में मेरा पहला नंबर आया लेकिन पांचवीं में घनश्याम बाजी मार गया ৷ 


मैंने घनश्याम से पूछा “ तुम भी रोज भगवान से पहला नंबर मांगते हो क्या ?” वह हँसने लगा .. “ यह सब फालतू बात है ৷ “ मुझे पता था, वह उस साल क्लास टीचर सर के यहाँ ट्यूशन के लिए गया था और उसका पहला नंबर इसी वज़ह से आया था ৷ मेरा भ्रम उसी दिन टूट गया और मैं समझ गया कि पहला नम्बर शंकर जी नहीं दिलाते हैं बल्कि उसके लिये खुद ही मेहनत करनी होती है । उसके बाद दसवीं तक क्लास तक मैंने जमकर पढ़ाई की और हर साल मेरी पहली रैंक ही आती रही ৷ अपनी सफलताओं और असफलताओं के लिए भगवान को क्रेडिट देने या दोषी ठहराने जैसी बात मेरे दिमाग से बचपन में ही साफ़ हो चुकी थी  ৷


आरती के बाद माँ बाबूजी के चरण स्पर्श की परम्परा भी हमारे यहाँ थी । बाबूजी हम बच्चों को आशीर्वाद देते “खुश रहो, प्रसन्न रहों, स्वस्थ्य रहो, खूब नाम कमाओ ৷ “यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगता था । माँ के चरण स्पर्श करने पर माँ कभी कुछ नहीं कहती थी ৷ हम लोग उनसे कहते “माँ, तुम भी तो कभी कुछ कहा करो ।“ उत्तर में वे कुछ नहीं कहतीं  और ‘उंउं..’ कहकर मुस्कुरा देतीं । यह तो बड़े होने के बाद समझ में आया कि जब वे प्रभु के सामने हाथ जोड़कर खड़ी होती थीं तब भी वे हम बच्चों की सलामती के लिए ही प्रार्थना करती थीं ৷ धीरे धीरे यह भी जाना कि दुनिया की हर माँ ऐसी ही होती है ৷ वह अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगती और बच्चों के लिए भी उसका आशीष कभी शब्दों का मोहताज़ नहीं होता ৷ 


धूप,अगरबत्ती, कपूर की गंध में डूबी ऐसी सैकड़ों शामें हवा में उड़ गईं ৷ हर शाम आरती में खड़े होने का यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक मैं भंडारा से बाहर पढ़ने के लिये नहीं चला गया । बाद में सीमा ,बबलू भी अपने काम में व्यस्त हो गए ৷ माँ भी आरती के समय अपने काम में व्यस्त रहने लगी सो बाबूजी अकेले ही आरती करने लगे । उनका यह क्रम उनकी मृत्यु पर्यंत जारी रहा । यहाँ तक कि उन्होंने मेरे और लता दोनों का सहारा लेकर अपने अंतिम दिन तक खड़े होकर आरती की  ৷ 


आज मैं श्रद्धा, ईश्वर में आस्था, पाप पुण्य, स्वर्ग-नर्क , मोक्ष जैसे शब्दों का वास्तविक अर्थ और इन्हें गढ़ने वालों के निहित उद्देश्य भलीभांति समझने लगा हूँ, मान्यताओं और संस्कारों को लेकर तर्क करने लगा हूँ लेकिन उन दिनों यह सब सहज भाव से ग्रहण करता था ৷  एक बार बैतूल में एक बीर बहूटी मेरे पाँव से दबकर मर गई थी । मैं इस बात से बहुत डर गया था इसलिये कि साथ के बच्चों द्वारा मुझे ऐसा बताया गया कि किसी भी प्राणि की हत्या से पाप लगता है । 


मैं पाप का अर्थ नहीं जानता था लेकिन भंडारा लौटने पर प्रतिदिन आरती के समय इस ‘पाप’ से मुक्ति के लिये भगवान से प्रार्थना करता था ৷ एक दिन बाबूजी से मैंने पूछा “बाबूजी पाप क्या होता है ?” बाबूजी ने कहा “किसी निरपराध, निर्दोष पर दोष मढ़ना, किसी मज़लूम को तकलीफ़ देना, चोरी करना, झूठ बोलना जैसे बुरे काम करना पाप होता है ৷” मैंने उनसे बीर बहूटी वाली बात बताई तो उन्होंने कहा “ वह हत्या तुमसे अनजाने में हुई, उसका पाप नहीं लगेगा ৷ लेकिन जानबूझकर ऐसा कभी मत करना ৷“। मैंने फिर बाबूजी से पूछा “वह मटन बेचने वाला दयाराम कसाई तो रोज़ ही बकरे काटता है, उसे पाप नहीं लगता होगा?” बाबूजी ने कहा “ वह जानबूझकर ऐसा नहीं करता , यह तो उसकी आजीविका है ৷ “


कुछ साल बाद ही बाबूजी ने कवि वरवर राव की एक कविता The Butcher का ‘कसाई’ शीर्षक से अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया ৷ इस कविता में निज़ामाबाद की उस पुलिस का जिक्र है जिसने एक नौजवान को नृशंसता से पीट पीट कर मार डाला था ৷ कविता की कुछ पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं ....


रोज़ रोज़, हर रोज़ मैं इन्हीं हाथों से 

प्राणियों को हलाल करता हूँ 

खून ने कभी भी 

मेरे मन को स्पर्श नहीं किया 

पर उस दिन रक्त केवल रास्ते पर ही नहीं फैला 

वह तो मेरे मन पर बिखर गया 

क्या तुम उसे धो सकोगे ?

तुममें से कौन इंसानियत का हाथ बढ़ाएगा ?

और मेरे मन का बोझ हल्का करेगा 

उस दर्दनाक नज़ारे की भयानकता से 


आज उन्मादी भीड़ द्वारा जब किसी निर्दोष व्यक्ति को पीट पीट कर मार डालने की ख़बरें सुनता हूँ तो मुझे बाबूजी द्वारा अनुवाद की गई वरवर राव की इस कविता के भीतर का यह दृश्य और पाप की परिभाषा के सन्दर्भ में कही गई उनकी बातें याद आती हैं ৷  


बाबूजी एक धर्म परायण व्यक्ति थे लेकिन वे हर बात को धर्म से नहीं जोड़ते थे ৷ वे मेरे प्रश्नों का तर्क संगत समाधान प्रस्तुत करते हुए उनका उत्तर देते ৷ बाबूजी धार्मिक कर्मकांड और आडम्बरों के भी खिलाफ थे इसलिए भंडारा के उस घर में  इस आरती और बाबूजी द्वारा प्रतिदिन किये जाने वाले रामचरित मानस पाठ के अलावा कोई धार्मिक आयोजन कभी नहीं हुआ ৷ यद्यपि मोहल्ले के अन्य घरों में विशेष अवसरों पर सत्यनारायण की कथा हुआ करती थी जिनमे वे पड़ोसी धर्म का निर्वाह करने के लिए शामिल होते थे । मुझे सत्यनारायण भगवान से कुछ लेना देना नहीं था लेकिन प्रसाद की लालच में मैं अवश्य जाता था ৷


प्रतिदिन होने वाली आरती के बाद हम बच्चे पढ़ने बैठ जाते थे, फिर चौके में चूल्हे के पास बैठकर माँ के हाथों बने सुस्वादु भोजन का आनंद और फिर  नींद ৷ उन दिनों मेरी ज़्यादा देर तक जागने की आदत नहीं थी । साढ़े आठ बजे के लगभग भोजन हो जाता था फिर सवा नौ बजे विविध भारती से आने वाला रेडियो नाटक ‘ हवामहल ‘ सुनकर मैं साढ़े नौ बजे सोने चला जाता था । 


रेडियो नाटक में ध्वनियाँ उनके उतार चढ़ाव , संवाद अदायगी आदि सुनते हुए मैं अक्सर उस दृश्य की कल्पना किया करता था । इमेज करने की क्षमता मुझमें यहीं से उत्पन्न हुई । मैं हर दृश्य को बहुत गहराई से सोचता था, स्थान व पात्रों की कल्पना किया करता था । उन दिनों ज़िन्दगी बहुत मज़े से गुज़र रही थी, लेकिन कभी कभी भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती थी । कई बार यह मुझमें निराशा को जन्म देती थी और मैं दिवास्वप्नों में खो जाता था ৷ ऐसे समय मैं कामना करता काश कोई दैविक शक्ति मुझे प्राप्त हो जाए । यद्यपि बाद में मुझे पता चल गया कि दैविक शक्ति चमत्कारी शक्ति नाम की कोई चीज़ नहीं होती बल्कि जो कुछ होता है वह मनुष्य के मस्तिष्क द्वारा ही निर्मित होता है चाहे वह सत्य हो या भ्रम ৷ 


88 ‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती याद करने का नया तरीका





स्कूल शुरू होने के दिन बहुत रोमांच से भरे होते हैं, नई कक्षा, नए शिक्षक, नई ड्रेस, नया बस्ता, नई किताबें, और नई कापियाँ ৷ इस नयेपन की अजनबीयत में राहत की बात यह थी कि दोस्त पुराने ही होते थे ৷ उन दिनों अलार्म लगाने का चलन नहीं था फिर भी दिनचर्या बन्धी हुई होती थी । सुबह जल्दी जागना, फिर पढ़ाई, दोपहर में स्कूल ,शाम पाँच बजे स्कूल से आने के बाद  थोड़ा सा नाश्ता, चाय, फिर  लायब्रेरी या मोहल्ले के दोस्तों के साथ खेलकूद । 


वे सुरक्षा की उष्णता और वात्सल्य की नमीं से भीगे हुए दिन थे ৷ बरसात की उन शामों में बरसात भी हमें घर में रहने के लिए विवश नहीं कर सकती थी ৷ शाम को खेल के मैदान में जब झींगुरों के आगमन का समय हो जाता मैं  अपने कपड़ों में नम घास और गीले पत्तों की गंध लिए घर लौट आता ৷ शाम अन्धेरा घिरने से पहले घर वापस लौटने का एक अलिखित नियम था जिसे तोड़ने पर बाबूजी से डांट खाना तय था । 


घर आकर हाथ-मुँह धोकर सीधे पढ़ने बैठना होता था । लेकिन उससे पहले होने वाली शाम की आरती में उपस्थित रहना अनिवार्य था । वैसे भी मुझे आरती गाने में बहुत आनन्द आता था । मेरी आवाज़ अच्छी थी और मैं गायन का विद्यार्थी रह चुका था इसलिये इस बहाने गाने का अभ्यास भी हो जाया करता था । अगरबत्ती की सुगन्ध और जलते हुए  दीपक का प्रकाश मेरे लिए किसी स्वप्न दृश्य की तरह होते थे ৷ मूलगाँवकर के बनाये शिवजी के चित्र में नीले रंग के शिवजी मुझे दुनिया के सबसे सुन्दर मनुष्य के रूप में दिखाई देते ৷ आरती के बाद ईश्वर से कक्षा में प्रथम आने के लिए गुहार करना फिर माता पिता के चरण स्पर्श करना मुझे जीवन में एक सुख देने वाला कार्य लगता था ৷  


उन दिनों ओम जय जगदीश हरे यह आरती बहुत प्रचलित थी ৷बाबूजी ने बताया था कि इस आरती की रचना हिन्दी के कवि श्रद्धाराम फ़िल्लौरी ने की है  ৷ मेरी परेशानी यह थी कि जिस तरह ‘यह कदम का पेड़’, और ‘खूब लड़ी मर्दानी’ जैसी कविताएँ मुझे कंठस्थ थीं ‘ओम जय जगदीश हरे’ से आगे की पंक्तियाँ मुझे याद ही नहीं होती थीं  ৷ एक दिन बैठे बैठे मैंने दिमाग़ लगाया और आरती के विभिन्न पद  याद करने का एक तरीका ढूँढ निकाला ৷ इस तरीके में मैंने आरती के प्रत्येक पद  को सप्ताह के एक एक दिन से जोड़ दिया जैसे सोम ,मंगल , बुध , गुरु आदि । जैसे ही वह पद आता मैं उसे उसके की वर्ड से जोड़ देता ৷

 

जैसे सोमवार से पहला पद याद करता 

जो (सो) ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का

स्वामी दुख विनसे मन का

सुख सम्पति घर आवे

कष्ट मिटे तन का

ॐ जय जगदीश हरे


उसी तरह मंगलवार से मात (मंत) पिता तुम मेरे

शरण गहूं किसकी


बुधवार का की वर्ड था ‘बुम’ तुम (बुम) पूरण, परमात्मा

तुम अंतरियामी

स्वामी तुम अंतरियामी ( जी हाँ अन्तर्यामी को हम ऐसे ही गाते थे ) 


गुरुवार तो करुणा से गुरुणा हो जाता, तुम करुणा (गुरुणा ) के सागर तुम पालनकर्ता स्वामी तुम पालन करता ৷

शुक्रवार को तुम हो एक अगोचर इसमें अगोचर की जगह शुगोचार हो जाता और शनिवार को दीन बन्धु दुःख हर्ता को मैं याद करता शीन बन्धु दुःख हर्ता 


और अंतिम पद रविवार से याद किया जाता - विषय विकार ( रविवार) मिटाओ पाप हरो देवा



87 . अँधेरा होने से पहले घर लौटना ज़रूरी है




आप ने कभी शाम को  अस्त होते हुए सूरज  का चेहरा देखा है ? उस समय सूरज अक्सर दुखी रहता  है, लेकिन वह खुश भी होता है, काम से लौटते हुए मजदूरों और खेत से लौटते हुए किसानों को देखकर ৷सबसे ज़्यादा खुश होता है वह  खेल के मैदान से बच्चों को घर लौटता हुआ देखकर ৷ 


उन दिनों सारे ही बच्चे स्कूल से घर लौटते ही बस्ता पटककर,ड्रेस बदलकर सीधे खेल के मैदान पहुँच जाते थे ৷ ज़ाहिर है आज की तरह बच्चों को घर में रोकने के लिए टीवी या मोबाइल जैसे आकर्षण नहीं होते थे ना ही उनके माता –पिता “ पहले होमवर्क पूरा करो, फिर खेलने जाना” जैसे फरमान जारी करते थे ৷ खेल के मैदान पर सबसे पहले पहुँचने वाले बच्चे को जैसे दौड़ में प्रथम आने का अहसास होता था ৷ हम लोग भी उसी ज़माने के बच्चे थे ৷ हमारी टोली के सदस्य थे  मैं, शरद व प्रमोद भोयर, हमारे हमउम्र केशव  मामा , नरेश उर्फ़ गुल्लू और अनिल झाडे ৷ 


वैसे तो शरद भोयर के घर के पीछे का जोगी तलाव का मैदान हमारा परमानेंट प्ले ग्राउंड था लेकिन कभी कभी गलियों और दूर शुक्रवारी या, निर्माणाधीन सहकार नगर वाले एरिये तक उसका विस्तार हो जाता था ৷ 


एक दिन हमें पता चला कि घर के पास स्थित मराठी प्रायमरी स्कूल में शाम को एक शिक्षक आते हैं जो आसपास के बच्चों को एकत्रित कर वहाँ के प्रांगण में उन्हें तरह तरह के खेल खिलवाते हैं ৷  एक दिन मैं भी अपनी टोली के साथ जिज्ञासावश  वहाँ पहुँच गया । सचमुच एक शिक्षक वहाँ उपस्थित थे जो खाकी हाफ पैंट और सफ़ेद शर्ट पहने हुए थे तथा उनके सर पर एक काली टोपी थी ৷ अनेक बच्चे भी वहाँ दिखाई दिए लेकिन वे हमारे मोहल्ले के बच्चे नहीं थे ৷ उन्होंने कई तरह के खेल हमें खिलाये लेकिन वे भी हमारे रोज़मर्रा के खेल नहीं थे ৷ खेल समाप्त होने के पश्चात अन्धेरा घिरने से पहले सब लोग एक जगह एक भगवे ध्वज के सामने खड़े हो गए और “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे ..” यह प्रार्थना गाने लगे ৷ फिर सब लोग अपने घर चले गए  । मुझे यह सब कुछ बहुत अच्छा लगा ৷


घर लौटकर मैंने माँ से कहा “ माँ, वहाँ एक सर हैं जो बहुत अच्छे अच्छे खेल खिलवाते हैं, बहुत मज़ा आता है ৷” फिर तो यह हम लोगों का नित्य का क्रम हो गया ৷ एक दिन वहाँ से लौटने के पश्चात बाबूजी ने मुझे बुलाया और कहा “यह अच्छी बात है कि वहाँ खेलना तुम्हे अच्छा लगता है, लेकिन तुम्हे वहाँ नहीं जाना चाहिये । “ हमेशा की तरह मैंने पूछा “क्यों ?“ तो उन्होंने जवाब दिया कि वे एक सरकारी कर्मचारी हैं और सरकार द्वारा इस संगठन को मान्यता नहीं दी गई है । मुझे संगठन, मान्यता, जैसे भारी भरकम शब्द समझ में नहीं आये लेकिन प्रत्युत्तर में कुछ तो मुझे कहना ही था सो मैंने कहा “ लेकिन वहाँ तो अच्छे अच्छे खेल खिलाते हैं ? “ बाबूजी ने इससे आगे कुछ नहीं कहा । 


संयोगवश अगले ही दिन स्कूल में तिमाही परीक्षा का टाइम टेबल आ गया और  शाम को वहाँ जाना अपने आप बन्द हो गया । बाद में ज्ञात हुआ कि शरद और प्रमोद के यहाँ भी पिता पुत्र वाले इस नाटक का यह अंक घटित हुआ था ৷ वहाँ जाना तो बंद हो गया लेकिन अपनी टोली में, अपनी मर्ज़ी से,अपने जाने पहचाने खेल  खेलना तो जारी रहा ৷ 



86 कविता में अर्थ तक पहुँचने के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता




“ज़िंदगी की राहों में रंजो ग़म के मेले हैं, भीड़ है क़यामत की और हम अकेले हैं ৷” कव्वाली की उस रात को ‘हैरा’ साहब की आवाज़ में सुना ग़ज़ल का यह मिसरा आज भी मेरे जेहन में गूंजता रहता है ৷  हम लाख इंकार करें लेकिन हम जैसे लोग भीड़ में भी कभी कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं  ৷ 


घर से स्कूल जाने वाले पर रास्ते पर आप लोगों को अपने साथ ले चलते हुए मैं उस अतीत के भविष्य में ज़िंदगी की राह पर भी आगे बढ़ गया था और गुर्जर चौक से दायें बाएँ जाने वाले दो रास्तों और उनके किनारे के मकानों का ज़िक्र रह ही गया था ৷ दरअसल इन दो रास्तों पर मेरा जाना बहुत कम हुआ इसलिए कि यह दोनों रास्ते जहाँ पहुंचाते हैं वहाँ तक पहुँचने के लिए मेरे घर से अपेक्षाकृत कम दूरी के रास्ते भी हैं ৷ 


ऐसा ज़िंदगी में हमेशा होता है कि जब हमारे पास मंजिल तक पहुँचने के शार्टकट  रास्ते उपलब्ध हों तो हम लम्बे रास्तों से जाना पसंद नहीं करते ৷ हालाँकि कभी कभी शॉर्टकट रास्तों से जाने में नुकसान भी बहुत होता है ৷ कई बार कविता के अर्थ तक पहुँचने के लिए भी हम इसी तरह शॉर्टकट रास्तों से आगे बढ़ते हैं लेकिन पहुँच नहीं पाते ৷ किसीने पूछा था कभी कि आप लम्बी कविताएँ क्यों लिखते हैं ? मैंने जवाब दिया था कि मैं कविता के जिस संसार में आप लोगों को ले जाना चाहता हूँ वहाँ अपेक्षाकृत कम लम्बी कविता के माध्यम से नहीं पहुँचा जा सकता ৷  


गुर्जर चौक से एक रास्ता खाम तलाव की ओर जाता है और एक बाज़ार की ओर ৷ खामतालाव जाने वाले रास्ते पर दाहिनी ओर गुप्ते का बाड़ा है । बाड़ा यानी एक चारदीवारी के भीतर अनेक मकानों का समूह ৷ इस बाड़े में बाबूजी के बेला कॉलेज के सहकर्मी घटवई रहा करते थे और नीचे की ओर मनरो स्कूल के प्रिंसिपल बापट । बापट सर का बेटा शिरीष बालकमन्दिर में  मेरा बालसखा था । हम लोग एक बार घटवई काका के यहाँ गये थे और काकू ने हमें  बेसन से बना एक व्यंजन खिलाया था । उसके आकार की वज़ह से घर आकर हम लोगों ने उसका बहुत मज़ा लिया था ।  बाड़े के सामने की और बैस का मकान था , किशोर बीस वहाँ रहता था  । आगे यह रास्ता रिंग रोड से मिल जाता है जिसके आगे झाँसी की रानी की प्रतिमा  और शिवमंदिर है ৷


गुर्जर चौक से बाज़ार जाने वाले रास्ते पर व्यवहारे का दवाखाना है और उससे पहले खड़तकर का मकान । डॉक्टर व्यवहारे के दवाखाने के बाद एक गली आती है ৷ उसके बाद  वझलवार सर का मकान है जिनका बेटा मुकुन्द बालकमन्दिर में मेरे साथ था ।  इसी रोड पर आगे ‘शिंगणापुरकर की माड़ी’ है और ढगे सर का मकान भी । ‘शिंगणापुरकर की माड़ी’ यह वही मकान हैं जहाँ भंडारा आने के बाद बाबूजी को सबसे पहले ठिकाना मिला था ৷ मेरे जन्म के बाद मेरी पहली पहचान इसी मकान की दीवारों से हुई थी ৷  

     


85 .वो एक भोली सी लड़की है मैं जिससे प्यार करता हूँ




भंडारा के बस स्टैंड के सामने, पहलवान शाह बाबा की मज़ार पर चढ़ाई फूलों की चादर के क़रीब, लोभानदानी से उठता लोभान का धुआं, सड़क के किनारे जिलेटिन के ताव वाली हरी पन्नियाँ पहने हुए टयूबलाइटों की कतारें, ठंडी हवाओं की नमी में तैरती मज़मुआ इत्र की खुशबू, रात भर के इंतज़ाम के साथ अपने चाय के ठेले पर गंज में खौलती चाय से उठती हुई खुशबूदार भाफ़ का मज़ा लेते हुए हरिप्रसाद , ढेरों छेद वाले फटे पुराने स्वेटर में ठण्ड का मुकाबला करते, अभी अभी जलाये गए अलाव के सामने बैठकर, हर फ़िक्र को बीड़ी के धुएँ के छलों में उड़ाते हुए महमूद मियां ৷


आज यहाँ कव्वाली की रात है और यह रात रात भर चलने वाली है ৷ आज मज़ीद शोला और अब्दुर  रब चाउस ‘हैरा’ का कव्वाली का मुक़ाबला है ৷  मैं और नईम खाना खाकर यहाँ पहुँच चुके हैं और पहली लाइन में अपनी जगह पकड चुके हैं ৷ यह पहला मौका नहीं है जब हम कव्वाली सुनने आये हैं इससे पहले गांधी विद्यालय के सामने मुस्लिम लायब्रेरी में होनेवाली कव्वाली के प्रोग्राम का भी मज़ा हम ले चुके हैं । नईम के चचा जनाब बशीर पटेल मुस्लिम लायब्रेरी के संरक्षक हैं इसलिए वहाँ हम लोगों के लिए सबसे सामने की लाइन में दरी पर बैठने की सीट रिज़र्व रहती है ৷ 

 

अज़ीज़ नाज़ा,जानी बाबू,शकीला बानो भोपाली, अब्दुर रब चाउस,युसूफ आज़ाद, मज़ीद शोला...चचा बताते हैं कि देश के जितने मशहूर कव्वाल हैं सबसे पहले इसी मज़ार पर आकर अपना कव्वाली का प्रोग्राम पेश करते हैं उसके बाद ही वे अन्य स्थानों पर जाते हैं ৷ हज़रत पहलवान शाह बाबा की मज़ार पर अपनी पहली कव्वाली पेश करना एक तरह से उनका शगुन है ৷


वैसे भी कव्वाली मनोरंजन नहीं है, भजन,कीर्तन, प्रार्थना की भांति यह ईश्वर की इबादत की एक सांगीतिक परम्परा है ৷ आठवीं शताब्दी में ईरान और अफगानिस्तान में संत परम्परा के अंतर्गत सूफ़ियों ने इसकी शुरुआत की थी ৷ लगभग पांच शताब्दियों के बाद तेरह सौ के करीब संगीत की इस लोकप्रिय विधा का भारत में आगमन हुआ ৷ भारत में चिश्ती संत शेख निज़ामुद्दीन औलिया और उनके समकालीन अन्य सूफी संतों ने इसे संगीत के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताया वहीं कवि अमीर खुसरों ने भारतीय संगीत और लोक संगीत के साथ इसका तादाम्य स्थापित कर इसे जन जन तक पहुँचाया ৷ बुल्ले शाह , बाबा फरीद,ख्वाज़ा गुलाम फरीद, वारिस शाह इन्होने लोक भाषाओं में कव्वाली की परंपरा का विकास किया ৷ यह वही वारिस शाह थे जिनके लिए अमृता प्रीतम ने लिखा था “आज वारिस शाह से कहती हूँ, अपनी कब्र में से बोलो और इश्क़ की किताब का कोई नया वर्क खोलो “  


ईरान और अन्य मुस्लिम देशों में इस तरह की धार्मिक महफ़िलों का आयोजन ‘समां’ कहलाता था ৷ आज भी उर्स आदि में कव्वाली के आयोजन को ‘समां महफ़िल’ का ही नाम दिया जाता है ৷ कव्वाली की शुरुआत हम्द  और नात से होती है ৷ नात अर्थात हज़रत पैगम्बर की शान में पढ़ा जाने वाला कलाम और हम्द यानी ईश्वर की प्रार्थना ৷ कव्वाली की इस गायन पद्धति में कव्वाल एक आलाप के साथ पहला छंद ईश्वर की शान में सूफ़ियाना अंदाज़ में पढ़ते हैं जिसे उनके सहगायक दोहराते हैं , उसके बाद तो शब्द और संगीत का एक ऐसा सिलसिला जुड़ता है जिसमे श्रोता एक आध्यात्मिक समाधि में पहुँच जाते हैं ৷ 


हम तो उन दिनों बच्चे थे ৷ हमारे लिए अध्यात्म का रास्ता तो उस रास्ते की तरह था जिस पर टॉफ़ी, चाकलेट या खिलौनों की कोई दुकान न हो ৷ इसलिए हमें उस तरह की कव्वालियाँ पसंद आती थीं  जिनमे थोड़ी मस्ती, थोड़ी चुहल और मनोरंजन हो ৷ अज़ीज़ नाजा साहब ने जब ‘झूम बराबर झूम शराबी’ यह कव्वाली प्रस्तुत की तो न पीनेवाले भी इसे सुनकर झूम उठे ৷ जानी बाबू अपनी मशहूर कव्वाली “ वो एक भोली सी लड़की है मैं जिससे प्यार करता हूँ “ लेकर आये तो बवाल मच गया ৷


यह किस्सा जब तक पूरा न बता दूँ तो चैन नहीं पड़ेगा ৷ हुआ यह कि जानी बाबू ने शुरुआत तो कर दी “न हूरों की तमन्ना है न मैं परियों पे मरता हूँ ..वो एक भोली सी लड़की है मैं जिससे प्यार करता हूँ ৷” लोगों ने थोड़े नाक भौं सिकोड़े ..आध्यात्मिक कव्वाली के बीच यह इश्क़ मोहब्बत का किस्स्सा ? एक दो आवाज़ें भी उठीं लेकिन जानी बाबू आगे गाते गए .. “वो मुझे ख़त लिखती है के बाद , मैं सबके सामने उसको कलेजे से लगाता हूँ” कहते ही लम्बी लम्बी सफ़ेद दाढ़ी और लाल मेहंदी वाले बालों के बीच वाले चेहरों पर गुस्सा झलकने लगा .. “यह क्या वाहियातपना है ?”.. जानी बाबू ने खामोश रहने के इल्तज़ा की और जैसे ही वे आख़िरी में “वो लड़की कौन है” इस बात के रहस्योद्घाटन पर पहुंचे उनके मुँह से एक लाइन निकली “ वो मेरी ही बेटी है मैं जिससे प्यार करता हूँ ৷“ 


तने हुए चेहरे यकायक शांत हो गए ৷ अब लोगों ने गौर किया, पूरी नज़्म में एक भी शब्द ऐसा नहीं था जो बेटी के बजाय माशूका की ओर इशारा करता हो ৷ यह मेरे जीवन में ‘साहित्य और मनोविज्ञान का सम्बन्ध ’ इस विषय का पहला सबक था कि हम कविता सुनकर उसका अर्थ वही लगाते हैं जो पहले से हमारे मन में होता है ৷ कविता के ध्वन्यार्थ तक पहुँचने का हम प्रयास नहीं करते इसलिए कविता हमें कठिन लगती है ৷ वस्तुतः साहित्य का श्रोता या पाठक होना भी कठिन साधना करने की तरह होता है ৷ 


ओह, कव्वाली का इतिहास बताते हुए और जानी बाबू का किस्सा सुनाते हुए उस दिन के मज़ीद शोला और अब्दुल रब चाउस ‘हैरा’ के कव्वाली के मुक़ाबले की बात तो रह ही गई  ৷ उस रोज़ हुआ यह कि नागपुर के उस कव्वाल ने एक ऐसी ग़ज़ल पेश की जिसका काफ़िया मेले हैं, झेले हैं इस तरह का था ৷ उन दिनों मुकाबले में चैलेन्ज हुआ करते थे कि हमसे अच्छा गाकर दिखाओ तो जाने ৷ उस कव्वाल ने भी ‘हैरा’ साहब को चैलेन्ज किया कि वे इसी रदीफ़ और काफ़िये पर कुछ कहें ৷ 


बस, अब्दुल रब चाउस ‘हैरा’ साहब कागज़ और कलम लेकर बैठ गए और जितनी देर में उस कव्वाल ने अपनी प्रस्तुति दी उतनी देर में उन्होंने अपना कलाम तैयार कर लिया ৷ फिर तो कमाल हो गया ৷उनके मुख से निकली कव्वाली थी “ज़िंदगी की राहों में रंजो गम के मेले हैं, भीड़ है क़यामत की और हम अकेले हैं৷ आइने के सौ टुकड़े करके हमने देखे हैं, एक में भी तनहा थे सौ में भी अकेले हैं ৷” बाद के बरसों में यह कव्वाली अनेक कव्वालों द्वारा गाई गई ৷ 


फिर स्कूल की उम्र के बाद भी गुजिश्ता सालों में जाने कितने कव्वालों के प्रोग्राम अटेंड किये ৷ भारतीय कव्वाली जिस मयार पर पहुँची उसे तो सुन कर ही जाना जा सकता है৷ यद्यपि कव्वाली में जनता के मनोरंजन के लिए भी प्रयोग भी हुए जैसे युसूफ आज़ाद ने अपनी जीवन संगिनी के साथ कव्वाली गाई “कैसे बेशर्म आशिक हैं ये आज के इनको उंगली थमाना गज़ब हो गया “ और वह कव्वाली... “बड़ा लुत्फ़ था जब कुंवारे थे हम तुम “जो नौजवानों के बीच बड़ी लोकप्रिय रही ৷ वहीं “चढ़ता सूरज धीरे धीरे ढलता है ढल जायेगा “जैसी दार्शनिक कव्वालियाँ भी प्रसिद्ध हुईं ৷


कव्वालियां सुनते हुए भी मैं कभी अध्यात्म के रास्ते नहीं गया ৷ मेरा रास्ता तो मनुष्य से प्रेम का रास्ता था .. प्रेम के इस रास्ते पर जाने कितने लोग मिले ৷ साथ चलते हुए एक बार उसने कहा था “तुमने नुसरत फ़तेह अली खान को सुना है ? मैंने ना में सर हिलाया ৷ फिर उसने मुझे एक ऑडियो भेजा ..


दैर- ओ- हरम के झगड़े मिटाते नहीं हो तुम 

जो अस्ल बात है बताते नहीं हो तुम

हैरां हूँ मेरे दिल में समाये हो किस तरह

हालांके दो जहाँ में समाते नहीं हो तुम

हो भी नहीं और हर जा हो 

तुम एक गोरखधंधा हो .....   


मैं कभी भी उसके साथ रहते हुए “हैरां हूँ मेरे दिल में समाये हो किस तरह” इस लाइन से आगे नहीं बढ़ पाया ৷ प्रेम जैसे मेरे लिए उसकी तरह एक गोरखधंधा ही बना रहा ৷ 



84 . अंग्रेज़ों के ज़माने के कोई जेलर भी वहाँ नहीं थे


प्राइमरी स्कूल के उन दिनों में स्कूल जाते हुए हम बच्चों की पीठ बिलकुल सीधी हुआ करती थी और आज के बच्चों की तरह पीठ पर ढेर सारी कापियों,किताबों,लंच बॉक्स और पानी की बोतल से भरा बस्ता नहीं होता था ৷ चाय रोटी खाकर सुबह घर से निकलते और प्यास लगने पर सामने वाली बड़ी सी टंकी के नीचे लगे जल से अपनी प्यास बुझाते ৷ एक निगाह टंकी के ऊपरी हिस्से में लगे मधुमक्खियों के छत्ते की और भी रहती थी ৷ पानी की टंकी से ही लगा हुआ  जेल परिसर था, जिसके भीतर अक्सर मेरी निगाह चली जाती थी ৷ सुबह सुबह पुलिस कर्मियों के रिहायशी क्वार्टर्स के सामने सुलगती पत्थर के कोयले की अंगीठी से उठता धुआं, सामने खेलते हुए बच्चे और आंगन सींचती औरतें, मेरी नज़रों के कैनवास में रोज़ यही दृश्य होता 


जहाँ क्वार्टर ख़त्म होते थे वहाँ से शुरू होती थी एक बड़ी सी किलेनुमा दीवार जिसके बीचो बीच एक बुलंद दरवाज़ा था ৷ यह दीवार जेल की दीवार थी जो किसी किले की दीवार जैसी दिखाई देती थी ৷ एक दिन गुरूजी ने बताया कि दरअसल ज़िला जेल बनने से पहले यह एक किला ही था ৷ इसीलिए इसके चारों ओर  एक खाई खुदी हुई है ৷ कहते हैं, जब कोई दुश्मन किले पर आक्रमण करता था तो इस खाई को खौलते हुए पानी से भर दिया जाता था ताकि दुश्मन इसे पार कर किले की दीवार तक नहीं पहुँच सके ৷” मैंने गुरूजी से पूछा “ लेकिन इतना सारा पानी वे लोग खौलाते कैसे थे ?” इस पर उन्होंने ऐसे घूरकर मुझे देखा कि फिर जवाब मांगने की हिम्मत ही नहीं हुई ৷


 जेल की इस इमारत के भीतर का दृश्य कभी मेरी कल्पना में नहीं था । शुरू शुरू में जब भी मैं उस किलेनुमा इमारत के भीतर के दृश्य की कल्पना करता तो सोचता कि भीतर सिंदबाद के किस्सों में आने वाली घाटी की तरह कोई घाटी होगी, जहाँ बेशकीमती हीरे बिखरे होंगे, जिन पर यदि हम मांस का टुकड़ा फेकेंगे तो कोई हीरा भी उसमे चिपक जायेगा और फिर कोई चील उसे लेकर बाहर आ जायेगी ৷ कुछ बड़े होने पर मेरे सामान्य ज्ञान में वृद्धि हुई कि हीरे वाली घाटियाँ केवल कहानी में हुआ करती हैं ৷ इस चारदीवारी के भीतर दरअसल जो जगह है उसे जेल कहते  है और जो लोग चोरी, डकैती, हत्या जैसे अपराध करते हैं उन्हें कोर्ट से सज़ा मिलने पर इस चारदीवारी यानी जेल के भीतर डाल दिया जाता है ৷ फिर यहाँ से बाहर निकलने की कोई गुंजाईश नहीं होती ৷


 एक दिन बाबूजी से मैंने पूछा “ बाबूजी. भीतर जो कैदी रहते हैं उनके लिए वहाँ कोई बाज़ार भी है क्या ?” बाबूजी हँसने लगे  “नहीं, कैदियों को बाज़ार की क्या ज़रूरत, वे भीतर बनी हुई कोठरियों में रहते हैं और उन्हें खाना, कपड़ा सब  जेल के भीतर ही मिल जाता है ৷” मैंने फिर पूछा “ तो क्या उन्हें बिना कोई काम किये खाना मिल जाता है ? “ बाबूजी ने कहा “ बिना काम के खाना कैसे मिलेगा, सरकार उनसे काम करवाती है, तब न उन्हें खाना देती है ৷” मेरा अगला प्रश्न था “ लेकिन वे काम क्या करते होंगे, भीतर न कोई ऑफिस है, न स्कूल ,न कोई कारखाना ?” 


बाबूजी ने पलंग की निवार की ओर  ऊँगली दिखाते हुए कहा “ यह जो निवार है ना, यह कैदियों ने ही बनाई है ৷ इसे जेल ब्रांड निवार कहते हैं ৷ जेल के भीतर कैदी ऐसे ही बढ़ईगिरी,लुहारी जैसे छोटे मोटे काम करते हैं, जेल की ज़मीन पर अनाज और सब्जियाँ भी उगाते हैं ৷ इसके बदले उन्हें खाने कपडे के अलावा अलग से मजदूरी भी मिलती है ৷ हाँ बीड़ी,सिगरेट वगैरह उन्हें नहीं मिलता ৷“


एक दिन स्कूल से लौटते हुए मैं सीधे रास्ते की बजाय जेल के पीछे की ओर से एक  लम्बा चक्कर लगाकर रिंग रोड से घर की ओर लौटा । यह नागपुर से भंडारा रोड स्टेशन की ओर जाने वाला रास्ता था, इसे रिंग रोड कहते थे ৷ उस ओर जेल के पीछे का हिस्सा था जहाँ दीवार के बाहर जेल के ही खेत थे ৷ इन खेतों में कुछ कैदी काम करते हुए दिखाई दे रहे थे । बाबूजी बिलकुल सही कह रहे थे ৷


घर लौटकर मैंने बाबूजी से कहा  “ बाबूजी, आज मैंने देखा, सच्ची में जेल के पीछे वाले रोड पर वहाँ खेत में वो.. सफ़ेद ड्रेस पहने कैदी काम कर रहे थे ৷” इससे पहले कि बाबूजी कोई प्रतिक्रिया दे पाते, एक नया प्रश्न फिर उपस्थित था ৷ “ बाबूजी, जब इन कैदियों को खुले में काम करने का मौका मिला है तो  यह लोग भाग क्यों नहीं जाते ?” बाबूजी ने कहकहा लगाया “ लगता है तुमने उनके सर पर बन्दूक लिए किसी सिपाही को खड़े हुए नहीं देखा ৷ “बाबूजी एक पल के लिए रुके “लेकिन तुम उधर कहाँ चले गए थे  ? सीधे घर क्यों नहीं आये ? बाबूजी की इस भूमिका परिवर्तन के लिए मैं पहले से तैयार था उन्हें नहीं पता था कि टेढ़े मेढ़े रास्तों पर भटकने का साहसी काम तो मैं शुरू से करता आ रहा हूँ ৷ मैंने अपना मुँह खोला और कहा “वो शरद प्रमोद खेलने के लिए बुला रहे हैं “ इससे पहले कि बाबूजी मेरे जवाब का परीक्षण करते  मैं यह जा और वह जा ৷

 

जेल सम्बन्धी जिज्ञासा से उपजी मेरी प्रश्नावली को विराम तब मिला जब बाबूजी की एक छात्रा के पति वहाँ जेल अधिकारी बनकर आये और उनके सौजन्य से हमें सपरिवार भीतर जाने का अवसर प्राप्त हुआ । उस समय हम लोगों ने पहली बार जेल के भीतर की बैरकें और वहाँ का वातावरण देखा । वह सब कुछ वैसा ही था जैसा बाद में कभी फिल्मों में देखा ৷ हाँ कैदियों के बीच मारपीट वाला शॉट उस समय घटित नहीं हुआ था और अंग्रेज़ों के ज़माने के कोई जेलर भी वहाँ नहीं थे ৷



83 मस्जिद के पास मंडराती बत्तखें



सप्ताह में एक बार किसी शाम मुझे गेहूँ पिसवाने के लिए फाये की आटा चक्की जाना पड़ता था ৷ साइकिल के कैरियर पर गेहूँ का पीपा रखकर पैदल पैदल मैं चक्की तक जाता और एक पटिये पर लाइन में रखे  डिब्बों के पीछे अपना पीपा रखकर,  चावल से भूसा निकालने की विशालकाय मशीन के लिए लगी लकड़ी के पटिये वाली सीढ़ी पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करता ৷


फाये की यह आटा चक्की एक बड़े से हाल में थी जहाँ पीली मरियल रौशनी वाला एक बल्ब टिमटिमाता रहता था ৷ वह मरियल सी उदास रौशनी और चक्की के कैनवास के पट्टों से आती ‘फट फटा फट फट, फट फटा फट फट’ की मोनोटोनिक आवाज़ शाम को गहरी उदासी से भर देती ৷ मैं टाइम पास करने के लिए उस ‘फट फटा फट’ की लय में कोई भी गीत फिट करके मन ही मन उसे गुनगुनाता रहता ৷


जैसे ही चक्की की खड़ खड़ की आवाज़ में किंचित परिवर्तन होता मैं समझ जाता एक जन का गेहूं पिस गया है ৷ फिर जब मेरा नंबर आता मैं सीढ़ी से उतरकर नीचे आ जाता और फिर अपना पीपा उठाने से पहले  उड़ते हुए आटे से सनी भौंहे और बालों वाले फाये को गिनकर पैसे दे देता ৷ भरी जवानी में इस तरह सफ़ेद भौंहों और सफ़ेद बालों वाले फाये को देखकर मेरी ऊब पूरी तरह समाप्त हो जाती ৷ लौटते हुए पीपे को बहुत संभालकर लाना होता था ৷कैरियर पर पीपा रखकर दाहिने हाथ से पीपा और बाएँ हाथ से साइकिल का हैंडल पकड़कर पैदल चलते हुए साइकिल घर तक लाना बहुत कठिन काम होता था ৷ फिर लौटते समय पीपा भी बहुत गर्म रहता था जिसे न पूरी तरह पकड़ सकते थे न पूरी तरह छोड़ सकते थे ৷


आटा चक्की के बाद पनके का मकान आता है ৷ उसके बाद एक बाड़ा था जहाँ खड़तकर रहा करते थे ৷ मिसेस खड़तकर बाबूजी को भाई मानती थीं और उनके यहाँ हमारा आना जाना था ৷ यहीं वह चौराहा  आता है जिससे सीधे जाएँ तो हमारा स्कूल आता है ৷ चौराहे से दाहिनी ओर का रास्ता खामतालाव  जाता है और बाईं ओर का रास्ता गांधी चौक ৷


लेकिन अभी तो यह नन्हे पाँव स्कूल की ओर बढ़ रहे हैं ৷ इस चौक पर पेट्रोल पम्प वाले गुर्जर का मकान है इसलिये यह चौक ‘गुर्जर चौक’ भी कहलाता है । गुर्जर के घर के सामने की ओर लकड़ी की जालियां लगी थी जिसके पीछे शायद उनका ड्राइंग रूम था ৷ मेरे नन्हे पाँव उनके घर के पिछवाड़े पारिजात  के एक पेड़ के नीचे अक्सर ठहर जाते थे ৷ वैसे तो यह पेड़ उनके घर के भीतर आंगन में था लेकिन उसकी डालियाँ बाहर सड़क तक आ गई थीं ৷ शनिवार की सुबह स्कूल जाते हुए नीचे बिछे हुए नारंगी डंडी वाले सफ़ेद फूलों को चुनने का मोह मैं कभी नहीं त्याग पाया ৷ 


बरसों बाद मैंने दुष्यंत का एक शेर पढ़ा था “ तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा किया , पांवों की सब ज़मीन को फूलों से ढँक दिया “ आज भी जब मैं इस शेर को याद करता हूँ तो मुझे भंडारा के गुर्जर चौक पर गुर्जर  के मकान में लगे हरसिंगार के सड़क पर बिछे  हुए वे फूल याद आते हैं ৷ 


इस चौक के बाद अगला चौक बजरंग चौक है जहाँ पीपल का एक बड़ा सा पेड़ है और उसके नीचे गोल चबूतरा यह फुरसतिया लोगों का गप लड़ने का अड्डा है  । मेरे मन में चौपाल का बिम्ब इसी चबूतरे का बिम्ब है  ৷ बजरंग चौक से आगे बढ़ते ही दाहिनी ओर भँवरे सर का जाली वाला मकान मिलता था, भँवरे सर हमें हिन्दी पढ़ाते थे, साथ ही स्कूल में एन सी सी ऑफिसर भी थे ৷ उनकी बेटी का नाम रजनी था । 


बजरंग चौक के बाद मुस्लिम बस्ती शुरू हो जाती है  ৷ जहाँ बाईं ओर एक मस्जिद है और दाहिनी ओर अन्य मकानों के साथ पतंग वाले अब्बास मियाँ का मकान । अब्बास मियाँ पहलवान भी थे और पतंगबाज़ भी ৷ वे पतंग और मांझा बेचने का धंधा भी किया करते ৷ चौखाने वाला तहमत पहने अब्बास मियाँ मस्जिद के सामने वाले बिजली के दो खम्भों के बीच धागा बांधते और रंगीन लुगदी लगाकर मांझा सूतते थे । मैं अक्सर उनके पास रुक कर उनका मांझा सूतना देखा करता ৷


उस मोहल्ले में रहने वाले मेरे सहपाठी  बताते थे कि अब्बास मियाँ पके हुए चावल में अरारोट और रंग के अलावा काँच का महीन चूरा भी मिलाते हैं और फिर उससे पतंग के धागे को सूतते हैं । उनका दावा था कि उनके बनाये हुए मांझे को किसी का भी बनाया हुआ मांझा नहीं काट सकता । मेरे पास मांझा खरीदने के लिए कभी पैसे नहीं रहे ৷ हालाँकि अब्बास मिया से प्रेरित होकर मैंने  भी एक बार मांझा सूतने की कोशिश की थी लेकिन लुगदी बनाने के लिए काँच पीसने की कोशिश में पहले ही काँच से हाथ कट गया था ।  


अब्बास मियाँ के मकान में हरी चादर से ढकी हुई मज़ार की तरह दिखाई देने वाली किसी पीर बाबा की गद्दी भी है ৷ फिर  एक कच्चा सा मकान है जिसमें एक बड़ा सा दालान है ৷ इस दालान की छत बांस की बल्लियों पर टिकी हुई है । इस मकान के आंगन में जहाँ अमरुद का एक पेड़ है  वहाँ अक्सर एक साइकिल रिक्शा खड़ा रहता है  ৷ इस मकान के सामने से गुजरते हुए मैं हमेशा उस रिक्शे को देखा करता ৷ मस्जिद की चारदीवारी ठीक इसी मकान के सामने से शुरू होती है ৷ मस्जिद के मुख्य द्वार के सामने एक  गली है जिसमें स्कूल का मेरा दोस्त अशरफ रहा करता था । 


इस गली के बाद दाहिनी ओर मेरे मित्र नईम का मकान आता है  । पहले नईम के यहाँ जाने के लिये पीछे की गली से जाना होता था,बाद में नईम के अब्बा ने सामने की ओर एक लकड़ी की टाल डाल दी थी सो हम लोग वहीं से आना जाना करने लगे । नईम का मकान पार करते ही एक दो मकानों और सड़क की ढलान के बाद ढोला प्रायमरी स्कूल आ जाता है  । इस स्कूल के सामने जो बड़ी सी पानी की टंकी है उसकी वज़ह से इसे ढोला स्कूल कहा जाता था । वैसे इसका नाम विवेकानंद प्राइमरी स्कूल  था ৷इससे आगे बढ़ने पर नगर परिषद गांधी विद्यालय आता है लेकिन वहाँ तो हम बाद में जायेंगे ৷ अभी तो यहाँ नालियों के आसपास घूमती और क्वैक क्वैक  करती बत्तखों से थोडा बतिया लेते हैं ৷ तिथि दानी की कविता ‘प्रार्थनारत बत्तखें ’ पढ़ते हुए मुझे भंडारा की उस मस्जिद के पास मंडराती यही बत्तखें याद आती हैं ৷ 


82 नन्हे नन्हे पाँवों के रास्तों से पहचान के दिन





बचपन के वे दिन नन्हे नन्हे पाँवों के ज़मीन से पहचान के दिन थे ৷ स्कूल के सामने का बागीचा, सामने की मज़ार, जेल के पिछवाड़े के खजूर के पेड़, बाँस के झुरमुट, दुर्गा मंदिर के पीछे छतरियों के खँडहर, हाथीखाने के सामने बनी गलियां , चिचबन मैदान, खामतालाव के दूसरी ओर  का जंगल, पारस मेटल वर्क्स तक रेल की पटरियों वाला रास्ता ৷ नन्हे पाँव धीरे धीरे इन सबसे परिचय प्राप्त कर रहे थे ৷ था । सुबह घर से निकलकर स्कूल तक का रास्ता तो मैं सीधे ही तय करता था लेकिन लौटते हुए मानो पाँव आज़ाद हो जाते थे और सीधे न लौटकर अलग अलग रास्तों से भटकते हुए मुझे घर ले आते थे  । 


बचपन को मैंने इसी तरह रास्तों पर भटकते हुए ही जाना ৷ हमारी गली से निकल कर दाहिनी  ओर जाने वाला रास्ता सीधे स्कूल जाता था । लगभग डेढ़ किलोमीटर के उस रास्ते में आने वाले प्रत्येक मकान और दुकान को मैं ध्यान से देखा करता और कोशिश करता कि उनके भीतर चल रही ज़िंदगी का जायज़ा ले सकूँ । 


कस्बाई रिहायश में मकान सड़क से ही शुरू हो जाते थे वे ऐसे मकान नहीं होते थे कि बाहर  का दरवाज़ा बंद तो सबसे संपर्क समाप्त ৷ अधिकतर मकानों में आंगन थे और कोई बाउंड्रीवाल जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी ৷ सुबह खुलने वाले घर के दरवाज़े रात के पहले बंद नहीं होते थे इसलिए मेरा यह ताका झाँकी का काम जिसे सभ्य शब्दों में ऑब्जरवेशन कहते हैं भलीभांति संपन्न हो जाता था ৷


आज आप लोगों के साथ, अपने उन्ही नन्हे कदमों से, फिर एक बार बचपन के उसी रास्ते पर चलने का मन कर रहा है जिन रास्तों ने मेरे वज़ूद जो एक पहचान दी ৷ सोच रहा हूँ इस रास्ते पर आने वाले घरों और उन घरों में रहने वाले लोगों से भी आपका परिचय करवाता चलूँ ৷


 यह पहला घर भागवत जी का है जो हमारी गली से निकलकर मुख्य सड़क पर पहुँचते ही सबसे पहले दाहिनी ओर पड़ता है ৷ भागवत जी बच्चों पर बहुत चिल्लाया करते थे इसलिये बच्चों ने उनका नाम ‘ बोम्बल्या भागवत ’ रख दिया था । मराठी में बोम्बलने का अर्थ चिल्लाना होता है । भागवत जी बरसों यहाँ रहे बाद में उन्होंने यह मकान सम्पत्ति सम्बन्धी किसी विवाद के कारण खाली कर दिया था । 


चलिए अब हम सबसे पहले दाहिनी और रहने वालों से परिचय प्राप्त करते हैं ৷ भागवत के मकान के बाद एक बड़े से आंगन वाला मकान आता है जिसमें  दादा हलमारे के रिश्तेदार रहते थे । वह एक कच्चा झोपड़ीनुमा मकान था और उसमे एक बड़ा सा आंगन था । उसके बाद हलमारे का मकान था । मकान मालिक हलमारे जी जिन्हे सब दादा कहते थे ,शिक्षा विभाग में अधिकारी थे । उनका ड्राइंग रूम सुसज्जित था और मुझे बहुत अच्छा लगता था । उनके घर के सामने बैठने के लिए पत्थर की दो बेंचें बनी थीं ৷


उसके बाद एक केश कर्तनालय था जिसके मालिक को हम भैया कहते थे ৷ उससे अगले मकान में बहुत सारी गायें हुआ करती थीं । फिर ‘लोक वाणी ‘ के संपादक पंडितराव का मकान और उसके बाद बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज । फिर एक मन्दिर जिसे ‘नागठाना’ कहते थे ,उसके बाद भाट्या की किराने की दुकान जहाँ लगभग सभी वस्तुएँ मिल जाया करती थीं । 


उसके बाद पंडित लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला का मकान जहाँ मैं तीज के अवसर पर सीदा पहुँचाने जाया करता था । ‘ सीदा’ अर्थात पंडित को पूजा के एवज में दिया जाने वाला रसोई का सामान । माँ किसी किसी त्यौहार पर मुझे एक सूप में रखकर चावल, गेहूँ का आटा ,दाल , शक्कर और आलू देती थी उसे मैं पहुंचा आता था । पहले साल जब मैं सूप में यह सब लेकर गया तो मुझे बहुत शर्म आई सो अगले साल से माँ ने यह सब सामग्री पुड़िया में बान्धकर थैले में देना शुरू कर दिया । पंडित लछमन प्रसाद शुक्ल बहुत साफ हिन्दी बोलते थे और बहुत रोचक तरीके से सत्यनारायण की कथा सुनाते थे । बाद में नीलू जीजी का विवाह भी उन्होंने ही करवाया था ।  उसके एक दो मकान बाद एक माड़ी वाला मकान था जहाँ हमारे ही स्कूल की एक लड़की रहती थी । वह मुझसे सीनियर थी और उसका नाम सन्ध्या था । उसकी एक छोटी बहन और एक भाई था , बस इतना मुझे याद है । 



81 वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी



आप में से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने बचपन में बरसात के दिनों में बहते हुए पानी में कागज़ की नाव न चलाई हो  स्कूल शिक्षा को हमारे देश में तीन भागों में बाँटा गया है ,प्राइमरी,मिडिल और हाई स्कूल ৷ महाराष्ट्र में प्रायमरी स्कूल चौथी कक्षा तक ही होता है उसके बाद प्रारंभ होता है मिडिल स्कूल ৷ कुछ राज्यों में मिडिल स्कूल पाँचवी की बजाय  छठी कक्षा से प्रारंभ होता है ৷ महाराष्ट्र में एक साल पहले मिडिल में जाने का लाभ यह होता है कि हिंदी माध्यम वालों की अंग्रेजी की शिक्षा एक साल पहले ही प्रारंभ हो जाती है ৷


तीन साल में चार कक्षाएँ पास कर लेने के बाद पाँचवी कक्षा से मैं  ढोला स्कूल से निकलकर गांधी विद्यालय में आ गया था ৷ दो साल वहाँ बीत चुके थे ৷ सातवीं कक्षा से नया सत्र प्रारम्भ होने ही वाला था ৷ पहले ही दिन जब हम लोग स्कूल पहुँचे तो हमें फरमान सुनाया गया कि हमें फिर से ढोला स्कूल वाली इमारत में जाना है ৷ वैसे तो गाँधी विद्यालय की इमारत काफी बड़ी थी लेकिन शायद मराठी मीडियम की क्लासेस बढ़ जाने के कारण हाइस्कूल वाली इमारत में जगह की समस्या हो गई थी और हम लोगों को पुनः प्राथमिक शाला वाली इमारत में जाना था । यह दोनों इमारतें नगर निगम की ही थीं इसलिये वे अपनी इच्छानुसार ऐसा परिवर्तन कर सकते थे । 


इस इमारत में हमारा प्रवेश कुछ इस तरह से था जैसे एक बार किराये का कोई मकान खाली कर देने के बाद दुबारा उसी मकान में रहने जाना ৷वैसे भी हम लोग वहाँ अवांछित तत्व थे इसलिए हमें दूसरी मंज़िल पर एक जीर्ण शीर्ण कमरा मिला ৷ नीचे की मंजिल पर पहली से चौथी तक की कक्षाओं का अधिकार था ৷ खैर बेमन से ही सही पढ़ना तो वहीं था ৷ 


वह नये सत्र का पहला ही दिन था ৷ गुरूजी ने पढ़ाना प्रारम्भ ही किया था कि बादल गरजने लगे और ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई ৷ हम कानों की क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए गुरुजी की आवाज़  सुनने का प्रयास कर ही रहे थे कि अचानक छत टपकने लगी ৷ हम लोगों ने तुरंत आपदा प्रबंधन करते हुए अपने बस्ते उन डेस्कों पर जमाये जहाँ पानी नहीं टपक रहा था ৷ लेकिन न बारिश बंद हुई न छत से पानी का टपकना बंद हुआ ৷

जैसे ही कमरे की फर्श पर पानी भरना प्रारंभ हुआ  कक्षा के सारे बच्चे भागकर नीचे आ गए  । उस दिन तो हमें छुट्टी मिल गई लेकिन फिर ऐसा अक्सर होने लगा ৷ किसी दिन रात में तेज़ बारिश होती तो अगले दिन स्कूल पहुँचने पर कक्षा में चार चार इंच पानी भरा हुआ मिलता । उस समय मुझे कक्षा कप्तान नियुक्त किया गया था । मैंने बहुत कोशिश की कि हमें  दूसरा कमरा मिल जाए लेकिन आश्वासन के सिवाय हमें  कुछ नहीं मिला ।  


बारिश से हम लोग शुरू शुरू में परेशान अवश्य हुए लेकिन फिर उस बारिश को एंज्वॉय करने लगे ।  क्लास रूम में पानी भर जाने पर हम लोग उस पानी में कागज़ की नाव चलाते थे और शोर मचाते थे फलस्वरूप हमें दिन भर के लिये छुट्टी मिल जाती थी । वर्षा ऋतु के उपरांत यह समस्या खुद- ब-खुद हल हो गई और हमारी क्लास उसी कमरे में नियमित रूप से लगने लगी । 


80 ज़िंदगी और मौत के खौफ़ से बेखौफ़ रहने के दिन





बचपन के वे दिन ज़िंदगी और मौत के खौफ़ से बेख़ौफ़ रहने के दिन थे । स्नेह सम्मेलन के दौरान दिसंबर के उन दिनों में रोज़ रात दो बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे । वापसी में मैं अकेला ही घर लौटता था ৷ खामतालाव वार्ड की मस्जिद तक तो बहुत से लोगों का साथ रहता था लेकिन उसके आगे का लगभग एक किलोमीटर का रास्ता मुझे अकेले ही तय करना होता था । अन्धेरे में दूर दूर तक कोई नहीं दिखाई देता था ৷ कभी कभी तो मुझे अपनी ही पदचाप सुनकर ऐसा लगता जैसे कोई मेरे पीछे आ रहा है ৷ मैं ठहरता तो पदचाप बंद हो जाती ৷ मुझे लगता मुझे रुकता हुआ देखकर वह व्यक्ति भी रुक गया है ৷ फिर एक दो रोज़ बाद ही मुझे इसकी आदत हो गई और मेरा डर ख़त्म हो गया ৷ उसके बाद तो कुछ ऐसा हुआ कि रात के अँधेरे में अकेले भटकने में ही मज़ा आने लगा लेकिन वह बहुत बाद की बात है यानी कॉलेज के दिनों की । बचपन में दो बजे रात को घर लौटते हुए मुझे डर नहीं लगता था इस बात की डींग तो मैं अब भी हाँका करता हूँ ।


किसी प्रकार की भी चिंता से मुक्त बचपन के वे दिन कुछ इसी तरह बीत रहे थे ৷ बचपन अपने पूरे शबाब पर था । उन दिनों और बच्चों की तरह मुझे भी नये नये शौक लग गये थे , जैसे डाकटिकटें इकठ्ठा करना । यह शौक पूरा करने के लिये हम लोग जाने कहाँ कहाँ की खाक छानते थे, कभी कभी तो कूड़ाघर में भी लिफाफों को उलट-पलट कर देखते और जैसे ही उनपर कोई नया टिकट दिखता उसे उखाड़ लेते । मैंने एक एलबम भी बनाया था और हम दोस्त आपस में टिकटों की अदलाबदली भी करते थे । एक कॉपी और बनाई थी मैंने जिसमें मैं दादी माँ के नुस्खे जैसी चीज़ें लिखा करता था । 


इसके अलावा अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाले महापुरुषों के अनमोल वचन इकठ्ठा करने का भी मुझे शौक था । इन सूत्रवाक्यों को मैं एक नोटबुक में उतार लिया करता था । कभी कभी मुझे भी अपना कोई विचार पसन्द आता तो मैं उसे कॉपी में लिख लिया करता था । इस तरह मेरे लेखन की शुरुआत विचारों से ही हुई थी,जिसे बाद में मैंने निबन्ध के रूप में लिखना शुरू किया । कविता तो मैंने कॉलेज जाने के बाद ही लिखी । बचपन का लिखा हुआ वह सब कुछ जाने कहाँ चला गया । परीक्षा हो जाने के बाद पुरानी कॉपियों को घर के काम में  उपयोग में लाया जाता था, या माँ उन कागज़ों की लुगदी से टोकनी बना लेती थी । इसलिये मेरा लिखा हुआ कुछ भी शेष न रहा । जिन पन्नों में मेरे विचार इकठ्ठा होते थे उनकी लुगदी से बनी टोकरियों में चने, मूंगफल्ली के दाने इकठ्ठा होने लगे ৷   

 

मैं किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा था ৷ पाँचवी छठवीं के वे दिन मेरे अवचेतन में नए अनुभवों का समावेश कर रहे थे ৷ मैं अपने अलग अस्तित्व की पहचान कर उसे भलिभाँति समझने लगा था ৷अपने परिवेश और आसपास के वातावरण को जानने समझने लगा था ৷ दुनिया के रहस्य धीरे धीरे समझ में आ रहे थे  । यह वे दिन थे जब प्रेम, वात्सल्य,मित्रता,अपनापन,उत्साह,सपने,उमंग, सुख दुख,खुशी,परेशानी,चिंता,संघर्ष,जिज्ञासा, जैसी मनुष्य के जीवन की विभिन्न अवधारणाओं से मेरा परिचय हो रहा था । 


79 .किसी लड़की का नाम मोहम्मद अकरम कैसे हो सकता है




उन दिनों यह एक परंपरा थी कि अंतरशालेय क्रिड़ा प्रतियोगिता अर्थात डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट के अंतर्गत विभिन्न शालाओं के विद्यार्थियों के बीच रात्रि के समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिता भी होती थी  और उसमे  नृत्य,नाटक,इत्यादि प्रस्तुतियों के लिए अलग अलग स्कूलों को प्रथम द्वितीय,तृतीय पुरस्कार दिया जाता था ৷ मुझे खेल के मैदान की बजाय नाटक का मंच अधिक प्रिय था इसलिए टूर्नामेंट में बच्चों के साथ मैं केवल दर्शक की भूमिका में तालियाँ बजने के लिए उपस्थित रहता था ৷ उस वर्ष कुछ ऐसा संयोग हुआ कि  नाटक ‘भूख हड़ताल’ के बहाने हमारी टीम को टूर्नामेन्ट में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ ৷ यह टूर्नामेंट भंडारा शहर से बाईस किलोमीटर पर स्थित तुमसर नामक स्थान में आयोजित था ৷


 तुमसर मेरे लिए नई जगह थी इसलिए वैसे भी जाने का उत्साह बहुत था ৷ नियत तिथि पर हमारी डांस ड्रामा की कल्चरल टीम बस से वहाँ के लिए रवाना हुई ৷ लड़कियाँ और उनकी अभिभावक मैडम सुजाता रॉय तथा एक शिक्षक श्री हीरालाल फुलसुंघे पहले ही जीप में चले गये थे और हमें सीनियर छात्रों के साथ आने के लिए कहा गया था । वरिष्ठ छात्रों के साथ बस में स्कूल के शिक्षकों के विषय में ‘गुप्त ज्ञान’ की बातें सुनते हुए हम लोग दोपहर में ही तुमसर पहुँच गए ৷


अपने खिलाड़ी साथियों वाले कमरे में अपने कास्ट्यूम और मेकअप आदि का सामान रखकर सीनियर्स के साथ मैं और नानक शहर घूमने निकल पड़े ৷ शहर छोटा सा था लेकिन औद्योगिक केंद्र होने के कारण वहाँ मजदूरों की बस्तियां अधिक थीं ৷ लौटते हुए हमने देखा तुमसर के उस खेल के मैदान के बाहर एक बहुत बड़ा मंच बनाया गया था जहाँ सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न होने वाले थे  ৷ दिन में क्रिड़ा प्रतियोगिताएँ संपन्न होने के पश्चात रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ हुए ৷ 


हमारा नाटक विभिन्न कार्यक्रमों के अंत में होना था इसलिए हम लोग निश्चिन्त होकर परिसर में टहलते रहे ৷ मंच भी एक खुले स्थान पर बना था जहाँ बाहर की ओर मेला  जैसा लगा था ৷ यहाँ  अनेक प्रकार की दुकानें भी थीं ৷ वहाँ पहली बार मैंने ‘लौंग लता’ नामक एक मिठाई खाई थी । यह मिठाई मैदे की कई परतों की बनी होती थी जिसके बीचोबीच एक लौंग लगी होती थी इसे तेल में तलकर चाशनी में डुबो दिया जाता था । मैदे की अनेक परतों को देखते हुए हमारे एक सीनियर अहमद ने इस मिठाई का नाम ‘लौंग लपेटा’ रख दिया था । 

हम लोग एक के बाद एक विभिन्न शालाओं की प्रस्तुतियां देख रहे थे कि मंच पर अनाउंसमेंट हुआ “ अब प्रस्तुत है भंडारा के गाँधी विद्यालय की ओर  से एक नृत्य” ৷ यह प्रतियोगिता के अंतर्गत था इसलिए प्रस्तुति से पूर्व कलाकार का नाम नहीं लिया जाता था, केवल स्कूल का नाम घोषित होता था ৷ 


पर्दा उठा और मंच पर पहने एक नृत्यांगना ने प्रवेश किया ৷ उस समय की प्रसिद्ध फिल्म ‘ लव इन टोकियो ‘ का एक प्रसिद्ध गीत हवाओं में गूंजने लगा  .. ‘सायोनारा सायोनारा, वादा निभाउंगी सायोनारा’ । मैदान में बैठे शोहदों की सीटियों के आवाज़ के बीच उसने नृत्य शुरू किया .. इठलाती और बल खाती कल फिर आउंगी सायोनारा ৷


नृत्य के चलते अन्य जगहों से आये कुछ छात्र जो जानते थे कि हम गांधी विद्यालय भंडारा से आये हैं पूछने लगे कि यह खूबसूरत लड़की कौन है ? हम लोग उनका प्रश्न सुनकर केवल मुस्कुराते रहे ৷ हमें पता था कि    इस गीत में जापानी लड़की की वेशभूषा और मेकअप में, हाथ में पंखा लिए स्टेज पर उतरने वाली यह नृत्यांगना कौन है ৷ नृत्य समाप्त होने के बाद अनाउंस किया गया “ अभी आप गाँधी विद्यालय भंडारा की यह प्रस्तुति देख रहे थे , प्रस्तुत कर रहे थे मोहम्मद अकरम ৷ हमने देखा आश्चर्य से सबके मुँह खुले रह गए हैं ৷ ৷ सबके मुंह पर एक ही सवाल था ”इस सुन्दर लड़की का नाम मोहम्मद अकरम कैसे हो सकता  है ?” किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई लड़का लड़की बनकर इतना अच्छा नृत्य कैसे कर सकता है


मोहम्मद अकरम स्कूल में हमसे एक कक्षा आगे था । अकरम के पिता एक  पुलिस ऑफिसर थे । मुझे याद है सभ्रांत घरों के बच्चों की भांति अकरम बहुत अच्छे और महँगे कपड़े पहनकर स्कूल आता था । उसके पास एक ऐसा स्वेटर था जिसे भीतर बाहर दोनों ओर से  पहना जा सकता था, एक ओर से उसका  रंग गहरा लाल था और दूसरी ओर से गहरा नीला । अकरम दिखने में बहुत सुन्दर था, चेहरा बिलकुल लड़कियों की तरह  और रंग झक्क गोरा । उसकी आवाज़ भी लड़कियों जैसी ही पतली थी । उसकी इन विशेषताओं को देखते हुए स्कूल के स्नेह सम्मलेन में ‘बहादुर शाह ज़फर’ इस नाटक में उसे शाहज़फर की बेगम का रोल दिया गया था । 


अभिनय के अलावा अकरम नृत्य कला में भी माहिर था ৷ उन दिनों शास्त्रीय संगीत और नृत्यों का चलन तो था ही लेकिन फ़िल्मी गानों पर नृत्य का चलन आम था ৷ स्नेह सम्मलेन के अवसर पर सर ने अकरम से कुछ गीतों पर नृत्य भी तैयार करवाया था । नृत्य के बाद हम लोगों का नाटक हुआ स्कूल की धाक पहले ही जैम गई थी इसलिए लोगों ने बहुत ध्यान से नाटक देखा ৷ कहना न होगा कि नाटक बहुत बढ़िया रहा ৷ 


कार्यक्रम के बाद तुमसर से लौटते हुए काफी रात हो गई थी इसलिये मैं फुलसुंगे सर के घर रुक गया था । बड़े बाज़ार में उनका मकान था और उनका कमरा तीसरी मंज़िल पर था । वह कमरा मुझे अभी तक याद है इसलिए कि बहुत सुन्दर ढंग से उन्होंने उसे सजाया था । उनका कमरा देखकर उस समय मेरे मन में विचार आया था कि यदि बड़े होकर मुझे अलग कमरा मिला तो मैं उसे ऐसे ही सजाउंगा । मेरी यह इच्छा नौकरी लगने के बाद दुर्ग में बक्षी जी के मकान के किराये के कमरे में पूरी हुई । हालाँकि होस्टेल के कमरों को भी मैं इसी तरह सजाता था ।     


78 .धर्मयुग,साप्ताहिक हिन्दुस्तान,पराग,नंदन और भूख हड़ताल




जिस तरह उन दिनों बड़ों की पत्रिकाएँ ‘धर्मयुग’ और साप्ताहिक हिंदुस्तान’ थी उसी तरह  बच्चों की पत्रिकाओं के नाम पर ‘पराग’ और ‘नंदन’ यह दो मशहूर पत्रिकाएं प्रकशित हुआ करती थीं ৷ इन पत्रिकाओं में बच्चों के लिए कहानियाँ और कविताओं के अलावा कभी कभी नाटक भी प्रकाशित हुआ करते थे ৷ ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ तो बाबूजी कॉलेज से ले आया करते थे लेकिन पराग कभी कभी वे बस स्टैंड से ख़रीदकर लाते थे ৷ एक बार ‘पराग’ में ‘भूख हड़ताल’ नामक एक बाल नाटक छपा ৷ हमारे शिक्षक प्यारेलाल फुलसुंगे की नज़र उस नाटक पर गई । उन्होंने पत्रिका से वह स्क्रिप्ट कागज़ पर उतारी और हम बच्चों को बुलाकर कहा “हम लोग स्कूल के वार्षिकोत्सव के लिए यह ड्रामा तैयार करेंगे ।“


इस नाटक का कथानक बहुत मज़ेदार था ৷ इसमें दो बच्चे अपनी ज़िद पूरी करवाने के लिये अपने ही घर में झूठ मूठ की भूख हड़ताल का अभिनय करते हैं । माता पिता शुरू में तो उन पर ध्यान देते हैं लेकिन फिर यह सोचकर कि जब बच्चों को भूख लगेगी वे  स्वयं ही हड़ताल करना बंद कर देंगे, उन पर ध्यान देना बंद कर देते हैं । 


साहित्य के विषय में अक्सर एक वाक्य कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है  इस नाटक के कथानक में भी उस समय के मध्यवर्गीय परिवार की एक झलक मिलती है आज तो मध्यवर्गीय माता पिता किसी भी तरह अपने बच्चों की ज़िद पूरी करने को तत्पर रहते हैं लेकिन वह समय ही ऐसा था कि बच्चों की हर जिद पूरी नहीं की जाती थी ৷ 


ओह, मैं नाटक की बात कर रहा था ৷ इस नाटक में फिर कुछ ऐसा होता है कि यह झूठ मूठ की हड़ताल अचानक सच में बदल जाती है इसलिए कि माता पिता के बीच सांठगाँठ हो जाती है और उन बच्चों के लिए घर में खाना ही नहीं बनता ৷ अंत में जब  भूख के मारे बच्चों का दम निकलने लगता है वे इधर उधर से किचन से कुछ जुगाड़ करने का प्रयास करते हैं, बहन भी उन्हें दिखा दिखा कर कुछ खाती है और उन्हें ललचाती है ,  अंततः वे हार मान लेते हैं और इस तरह माँ-बाप के सामने उनके झूठ की पोल खुल जाती है । 


प्यारेलाल सर ने दोनो  बच्चों की भूमिका के लिए छठवीं कक्षा से दो बच्चों का चयन किया  एक मैं और एक मेरा दोस्त नानकचन्द । हमारी छोटी बहन का रोल किया था हमारी कक्षा की ही एक लड़की हर्षबाला ने जिसे हम लोग प्यार से गुड्डी कहते थे । माँ का रोल किया था यशोदा की भूमिका का निर्वाह करने वाली ललिता दीदी  ने और हम बच्चों के पिता का रोल किया था हमसे सीनियर छात्र विपिन भट्ट ने ।  


नाटक ‘भूख हड़ताल’ छोटा सा था लेकिन फुलसुंगे सर के निर्देशन में सभी ने इतना सधा हुआ अभिनय किया कि नाटक की धूम मच गई । एक दिन सर का आदेश हुआ कि यह नाटक तुम लोगों को  इंटर डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट में भंडारा से बाईस किलोमीटर दूर तुमसर नामक स्थान में भी करना है  । हमसे सीनियर छात्रों ने उस वर्ष के स्नेह सम्मेलन के लिये तीन फुल लेंथ ड्रामे भी तैयार  किये थे  एक था ‘ बहादुर शाहज़फर ‘एक ‘ खून की आवाज़ ‘ और तीसरे ड्रामे का नाम ‘मेरा वतन’ या ऐसा ही कुछ था  । लेकिन टूर्नामेंट के अंतर्गत सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए हमारे नाटक का ही चयन हुआ ,इसलिये कि वह एक छोटा ड्रामा था । 


हमारा  नाटक ‘ भूख हडताल ‘ के दो शो हो चुके थे ৷ यह नाटक इतना प्रसिद्ध हुआ कि बाबूजी ने बेला स्थित अपने बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में आयोजित स्नेहसम्मेलन में भी उस नाटक का मंचन करवाया । इस तरह इस नाटक का तीसरा मंचन भी हुआ ৷ उस नाटक के पारितोषक स्वरूप मुझे एक प्लास्टिक का नीले रंग का डिब्बा मिला था , जो बाद में बहुत दिनों तक बाबूजी के पान के डिबे के रूप में हमारे घर में मौज़ूद रहा । एक सात खंडों वाला लाल रंग का प्लास्टिक का डिब्बा और मिला था जिसमें माँ  सुई और धागे की रंगबिरंगी रीलें रखा करती थी , उस डिब्बे के ढक्कन पर मैंने सफेद पेंट से ‘ इन्द्रधनुष ‘ लिख दिया था ।


इंद्रधनुष्य के वे सात रंग आज भी मेरे अवचेतन में स्मृतियों के रूप में उपस्थित हैं