26 जुलाई 2021

13. दो रुपये किराये में शिंगणापुरकर की माड़ी


भंडारा में बाबूजी जब बेला के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में नौकरी करने के लिए आये तो शहर में नए आने वालों की तरह उनके सामने भी रहने की समस्या थी उन्हें शीघ्र ही रहने का एक ठिकाना मिल गया गान्धी चौक से खामतलाव जाने वाले मार्ग पर शिंगणापुरकर का मकान था जिसमे ऊपर की ओर बना एक बड़ा सा कमरा था बाबूजी बताते थे कि महंगाई के उन दिनों में भी इस कमरे का किराया दो रुपये था |

भंडारा में इस तरह ऊपर की ओर बने कमरे को माड़ी कहते हैं इस माड़ी के एक कोने में स्नानघर और दूसरे कोने में रसोई के लिए जगह थी बीच के हिस्से का उपयोग रात में बेड रूम की तरह और दिन में ड्राइंग रूम की तरह किया जा सकता था इस माड़ी की छत खपरैल की थी और सामने की ओर एक गैलरी थी मकान मालिक शिंगणापुरकर नीचे की ओर  रहते थे मकान में प्रवेश के लिए एक कॉमन गेट था जिससे भीतर प्रवेश करने के बाद बाजू में बनी सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर की ओर जाना पड़ता था

 वे माँ बाबूजी की युवावस्था के दिन थे एक कमरा उन दोनों के लिए काफी था वे लोग राजेश जोशी कि कविता ‘ शहद जब पकेगा’ की इन पंक्तियों को जी रहे थे.....

 


             अभी दूर हैं वे दिन

जब ज़रूरत होगी हमें

अलग अलग रजाई की

जब पृथ्वी हो जायेगा तुम्हारा पेट

जब आकाश के कान में फुसफुसायेगी  पृथ्वी

जब वृक्ष से आंख चुरा, तुम चुराओगी मिट्टी

 


संयुक्त परिवार से निकलकर अकेले रहने वाले विवाहित लोगों के लिए जहाँ ढेर सारी कठिनाइयाँ होती हैं वहीं मन मर्जी से जीने की स्वतंत्रता भी होती है शहर की सुविधाओं का वे भरपूर उपभोग कर रहे थे भंडारा में मनोरंजन के और कोई साधन तो थे नहीं बस एक सिनेमाघर था माँ बाबूजी दोनों को सिनेमा देखने का शौक था शहर में लगभग एक सप्ताह में फिल्म बदल ही जाती थी इसलिए फिल्म देखना यह उनका साप्ताहिक कार्यक्रम होता था इस मकान का पहला बिम्ब मेरे मन में इसी सिनेमा से जुड़ा हुआ है

 


मेरा जन्म तो बैतूल में हुआ था लेकिन भंडारा में मेरा प्रथम गृह प्रवेश इसी शिंगणापुरकर की माड़ी में हुआ भूले हुए स्वप्नों की तरह इस एक कमरे वाले घर की मेरी स्मृतियों में माता पिता की युवावस्था के बहुत खूबसूरत दृश्य हैं इनमे सबसे पहला दृश्य तो बखूबी याद है एक दिन माँ बाबूजी सिनेमा का शाम वाला शो देखकर लौट रहे थे उन दिनों मेरी उम्र चोवीस में से बारह घंटे सोने वाली थी अतः मैं सिनेमा देखते हुए ही सो गया था और लौटते वक़्त माँ की गोद में भरपूर नींद का सुख ले रहा था माँ ऊपर कमरे में जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ रही थी कि अचानक मेरी आँखें खुलीं मैंने नींद से जागकर क्षण भर के लिए आँखें खोलकर उस ‘माड़ी ‘ को  देखा था, मेरे अवचेतन में उस मकान का प्रथम चित्र वही है ।

 यह मनोविज्ञान का एक नियम है कि जिस समय हम नींद में जाने की तैयारी में होते हैं अथवा नींद से जागते हैं उस समय कुछ देर के लिए हमारा मस्तिष्क ट्रांस में चला जाता है यह एक हिप्नोटिक स्टेट होती है और इस स्थिति में अवचेतन द्वारा किसी भी तरह का दृश्य, आवाज़ , स्पर्श आदि ज्यों का त्यों ग्रहण किये जाने  की सबसे अधिक संभावना होती है इस समय अवचेतन पत्थर की एक स्लेट की तरह होता है, उस समय आँखे जो देखती हैं वह दृश्य या कानों सुनी आवाज़ उस पर हमेशा के लिए अंकित हो जाने की सम्भावना होती है


 बरसाती की तरह एक कमरे वाले मकान शिंगणापुरकर की माड़ी में बीते हुए शैशवावस्था के दिनों के ऐसी ही अनेक क्षणिक अनुभूतियों के बिम्ब  आज भी मेरे अवचेतन में उपस्थित हैं इनमें माँ के दूध की गंध के अलावा उनकी देह गंध है, उनके हाथों का ममता भरा स्पर्श है, तुलसी चौरे पर जलती अगरबत्ती की खुशबू है, उफनते हुए दूध की महक है, पके केले और धान की लाई का स्वाद है , रेडियो से आती किसी पुराने गाने की धुन  है, माँ बाबूजी के गुनगुनाये गीत हैं, रात्रि के किसी पहर में उनकी साँसों का आरोह अवरोह है और भी बहुत कुछ है जो मेरे भूले बिसरे स्वप्नों की तरह मेरी निजी अनुभूतियों के खाते में दर्ज  हैं

शरद कोकास 

 

16 जुलाई 2021

12.कट चाय,खर्रा और गाँधीजी का चश्मा

मध्य सदी का मध्य प्रांत : एक जन इतिहास- कड़ी क्रमांक 12 



भंडारा की गलियाँ और मोहल्ले तो अपने भीतरी गठन में किसी अर्ध शहरी और ग्रामीण क्षेत्र जैसे ही थे लेकिन एक जगह ऐसी थी जहाँ पहुँचकर लोग अपने शहरी होने होने का दावा कर सकते थे वह स्थान था भंडारा का प्रसिद्ध गाँधी चौक मेन रोड पर स्थित इस चौक में बापू की एक प्रस्तर प्रतिमा विद्यमान है महाराष्ट्र बनने के कुछ समय बाद यह प्रतिमा स्थापित की गई थी और उसके चारों ओर एक गोलाकार रेलिंग लगाई गई थी 

गान्धी जी की प्रस्तर प्रतिमा में शिल्पकार ने चश्मा नहीं बनाया था लेकिन हमारे कर्णधारों की ज़िद थी कि उन्हें चश्मा पहनायेंगे ही इसलिए उन्हें साल में दो बार दो अक्तूबर और तीस जनवरी के दिन  फूलों की माला के साथ चश्मे की फ्रेम भी पहनाई जाती थी   आश्चर्य की बात यह कि दो चार दिनों बाद वह फ्रेम वहाँ दिखाई नहीं देती थी बाद में ज्ञात होता था कि उसे कोई उतारकर ले जाता था निश्चित ही वह कोई  ज़रूरतमन्द होता होगा जिसे गाँधीजी से अधिक चश्मे की ज़रूरत रहती होगी । गाँधीजी के चश्मे की खाली गोल फ्रेम  उसके चश्मा बनाने के काम आ जाती होगी समय के साथ उस फ्रेम का चलन ख़त्म हो गया लेकिन अब वह फिर से लौटकर आ गई है और फैशन में है


 एक तरह से बाज़ार गाँधी चौक से ही शुरू होता था पर वैसे तो दिन भर ही लोगों का जमावड़ा रहता था लेकिन शाम के समय यहाँ भीड़ बढ़ जाती थी शहर के युवा और अधेड़ पुरुष टी स्टाल पर कप और बशी यानि प्लेट में मिलने वाली फुल चाय,कट चाय, हाफ चाय या बादशाही चाय की चुस्कियों के साथ अपनी शामें यहीं बिताते थे अमूमन दो व्यक्ति मिल कर एक फुल चाय लेते थे जो चीनी मिट्टी की कप बशी में दी जाती थी फिर उसमे से एक व्यक्ति आधी चाय बशी में उंडेल देता और सामने वाले को कप ऑफर करता बांटने वाले का खुद प्लेट में लेना अनिवार्य था यह एटिकेट्स और मैनर्स के तहत आता था विभाजन करने वाला ही अक्सर चाय का पैसा भी चुकाता था  चाय कप में मिले या प्लेट में विभाजित चाय का महत्व दोनों के लिए बराबर होता था आप चाहें तो इसका सम्बन्ध देश के विभाजन से भी जोड़कर देख सकते हैं

 


वैसे तो भंडारा के निवासी साल भर चाय पीते थे लेकिन गर्मी के दिनों में आदर्श टाकीज़ के गेट पर खड़े ठेले पर बिकने वाला ठण्डा लेमन सोडा पीकर अपनी प्यास बुझाते थे यह सोडा काँच की बोतल में मिलता था जिसके मुंह पर कार्बन डाई ऑक्साइड के दबाव से एक काँच की गोली अटकी होती थी जिसकी वज़ह से भीतर का सोडा बाहर नहीं आता था फिर ओपनर नुमा एक उपकरण से दबाव डालकर वह गोली भीतर सटकाई   जाती और पूरे प्रेशर से बाहर आने वाले सोडे को गटका जाता कभी कभी सोडे को ग्लास में निकालकर उसमे काला नमक और नीबू निचोड़कर उसे नया स्वाद भी दिया जाता उसके बाद चौक आने वाले पर्यटक टाइम पास के लिए वरहाड़ी, ठवकर या गोडबोले जर्दा का बना हुआ खर्रा तथा भरडा या चिकनी सुपारी युक्त चूने कत्थे वाले पान  खाकर अपने मुख की शोभा बढाते थे  यह पान भण्डार सिर्फ पान बेचने की दुकानें मात्र नहीं थे बल्कि यहाँ ग्राहकों के लिए बाकायदा बेंच आदि पर बैठने की व्यवस्था होती थी और फिर चौपाल की तरह मित्रों की गपशप चला करती थी बाद में पान ठेलों पर ज्यूक बॉक्स की तरह फरमाइश पर फ़िल्मी गानों के रिकॉर्ड भी बजाये जाने लगे थे

 


इसके अलावा भी उनके मनोरंजन के लिए गाँधी चौक पर और आसपास बहुत सारे आकर्षण के केंद्र थे जैसे सब्जी बाज़ार, नगरपालिका का भवन, एक सार्वजनिक पुस्तकालय, बुक स्टाल और आदर्श सिनेमाघर । किसी के घर गाँव से कोई आता तो उसे गाँधी चौक अवश्य लाया जाता यह जताने के लिए कि “देखो अब हम शहर में रहते हैं भंडारा के गाँधी चौक में आज भी यह दृश्य अपने आधुनिक रूप जैसे जूमो लाइट , बड़ी बड़ी इमारतों और जगमगाती दुकानों के साथ बढ़ते घनत्व में उपस्थित है  ।  

शरद कोकास 

                                                                                       

 

10 जुलाई 2021

11.शहर में आदमियों का बाड़ा


मध्य सदी में मध्य प्रान्त : एक जन इतिहास - कड़ी  क्र.11 
वह साठ का दशक था भंडारा शहर ज़िला मुख्यालय तो पहले से ही था लेकिन महाराष्ट्र निर्माण के बाद भंडारा के तो रंग ही बदल गए तेवर कुछ ऐसे बदले जैसे बूढ़े होते बाप ने घोषित कर दिया हो कि यह मेरा बड़ा बेटा है और अब से घर के बाक़ी लोग सिर्फ़ इसकी बात सुनेंगे भंडारा शहर में कलेक्टोरेट, तहसील कार्यालय, अन्य सरकारी दफ्तर, स्कूल, कॉलेज, कोर्ट, नगर पालिका, पानी की टंकी, ज़िला जेल, आदि पहले से ही थे लेकिन अब उनके अधिकार, दायित्व और प्रसार क्षेत्र आदि में वृद्धि हो गई कार्यालयों और विद्यालयों की संख्या बढ़ी तो धीरे धीरे आसपास के क्षेत्रों, अन्य ज़िलों और दक्षिण मध्यप्रदेश से भी लोग सरकारी नौकरियों में आने लगे शहर में नये आनेवालों की पहली ज़रूरत थी रहने के लिए मकान

भंडारा के गली मोहल्लों में पुश्तैनी रूप से रहने वाले संपन्न लोगों ने अपने अपने मकानों का कुछ हिस्सा किराये से देना शुरू किया कुछ ने अपने खुले खुले आंगनों में बहने वाली बयार की बलि चढ़ाकर उन में कमरे बनवा दिए कुछ ने मकान का उपरी हिस्सा जिसे माड़ी कहते थे जहाँ अमूमन एक कमरा होता था जिसकी छत खपरैल की होती थी किराये से दे दिया कुछ लोगों ने अपने बड़े बड़े मकानों को छोटे छोटे हिस्सों में बाँट कर उन्हें किराये से दे दिया और इस समूह को बाड़े का रूप दे डाला मराठी में बाड़े को वाड़ा कहते हैं सो मानापुरे का वाड़ा, जोशी का वाड़ा, दलाल का वाडा, गुप्ते का वाड़ा जैसे वाड़े मशहूर हो गए इनके प्रवेश द्वार लकड़ी के या टीन के हुआ करते थे स्नानगृह तो सबके अलग अलग थे लेकिन शौचालय अमूमन कॉमन हुआ करते थे या कम होते थे नल भी एक या दो ही होते थे यह वाड़े वर्तमान हाउसिंग सोसायटी का आद्य रूप थे उन दिनों मुंबई में इस तरह के मकान समूह चाल कहलाते थे  


शहर का अर्थतंत्र संभालने वाले सिंधी, पंजाबी, मारवाड़ी , साव आदि  कम्युनिटी के लोग पहले से वहाँ निवासरत थे और भंडारा शहर की मेन रोड पर उनकी पुरानी तरह की दुकानें थीं दुकानों में गद्दियाँ हुआ करती थीं जिन पर बिछी सफ़ेद चादरों पर मसनद से टिककर बैठने वाले दुकान मालिक सेठ कहलाते थे शहर बढ़ा तो उन बाज़ारों में भी रौनक बढ़ने लगी जहाँ कभी मक्खियाँ भगाई जाती थीं निवासियों की संख्या में वृद्धि हुई तो अनाज,किराना,स्टेशनरी जैसा ज़रूरी सामान बेचने वाली कुछ दुकाने गली मोहल्लों के भीतर भी खुलने लगीं कुछ लोगों ने अपने घर के बरामदे में ही लकड़ी के दरवाज़े और पट लगाकर दुकानें खोल लीं या किराये से दे दीं


किसी शहर को बढ़ते हुए देखना ठीक किसी बच्चे को बढ़ते हुए देखने की तरह होता है पहले वह पेट के बल घिसटता है, फिर घुटनों पर रेंगता है और एक दिन अपने पांवों पर खड़ा हो जाता है भंडारा शहर भी कुछ इसी तरह बढ़ रहा था गलियों में बने पीतल के बर्तनों के घरेलू उद्योग के छोटे- मोटे कारखानों, तेल पेरने की घानियों, लुहारों की भठ्ठीयों, बढई की दुकानों और अपने गाय ढोर तथा मवेशियों आदि के साथ भंडारा के लोगों को धीरे धीरे सीमित क्षेत्र में रहने की आदत पड़ने लगी थी अपनी ग्रामीण सांस्कृतिक परम्पराओं, रीति-रिवाज़ों, पारंपरिक मनोरंजन के साधनों के साथ आधुनिक व्यवस्थाओं और सुविधाओं की खिचड़ी पकाते हुए  शहर में जनसंख्या का घनत्व बढ़ता जा रहा था । 


शरद कोकास 

10.साइकिल के हैंडल पर बास्केट में सैर


पचास के दशक में बाबूजी भंडारा के गवर्नमेंट बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में शिक्षक की नौकरी के लिये आ गए थे । सरकार का शिक्षा का कांसेप्ट बदल रहा था और पारम्परिक गुरु शिष्य परंपरा से आगे अब शिक्षकों को प्रशिक्षण देना अनिवार्य महसूस हो रहा था इस कॉलेज में प्राइमरी और मिडिल स्कूल के शिक्षकों को अध्यापन की बेसिक ट्रेनिंग दी जाती थी इनमें अधिकांश छात्र वे होते थे जो पहले से ही कहीं न कहीं शिक्षक की नौकरी कर रहे होते थे उन्हें अपने स्कूल से डेप्युटेशन पर यहाँ भेजा जाता था यहाँ महाराष्ट्र के सुदूर क्षेत्रों से छात्र आते थे आजकल यह पाठ्यक्रम डी एड या डिप्लोमा इन एजुकेशन कहलाता है

भंडारा का यह शासकीय बुनियादी प्रशिक्षण महाविद्यालय भंडारा शहर से नागपुर जाने वाले सड़क मार्ग पर भंडारा से तीन मील अर्थात लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर बेला नामक गाँव के निकट अंग्रेज़ों के पुराने बंगले की तरह बनाई गई एक बड़ी सी इमारत में स्थित था यह इमारत मुख्य सड़क से कुछ भीतर की ओर घने वृक्षों से आच्छादित एक परिसर में थी यहाँ बहुत शांत वातावरण था पेड़ों पर कोयलें कूकती थीं और पंछियों की आवाज़ से परिसर गूंजता रहता था कुछ छात्रों के लिए हॉस्टल में रहने की सुविधा थी यह छात्रावास भी एक पुराने बंगले में था कुछ छात्र निकट के बेला नामक गाँव में भी किराये के मकानों में रहते थे कॉलेज में शिक्षा का माध्यम हिन्दी और मराठी था यहाँ छात्राएँ नहीं थीं और पुरुष छात्र बहुत संयम के साथ  अपना एक वर्षीय पाठ्यक्रम पूर्ण करते थे

बाबूजी प्रतिदिन साइकल से कॉलेज आना जाना करते थे उनके पास उन दिनों ‘रेले’ कंपनी की एक मजबूत सी साइकल थी कभी कभी मैं भी उनके साथ सामने हैंडल से लगी एक टोकरी में बैठकर और बाद में साइकल के डंडे पर बैठकर कॉलेज जाया करता था कभी कभार माँ भी बाबूजी के साथ साइकल के पीछे कैरियर पर बैठकर कॉलेज जाती थी अक्सर सोशल गैदरिंग या वार्षिक स्नेह  सम्मलेन के दिनों में बाबूजी हम लोगों को सांस्कृतिक कार्यक्रम नाटक आदि दिखाने ले जाते थे

मैं शिक्षक का बेटा था इसलिए मुझे भी दो तीन मिनट के लिए मंच पर कुछ कविता गीत आदि प्रस्तुत करने का मौका मिल जाता था जब मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था एक नाटक ‘भूख हड़ताल’ का भी मंचन हम लोगों ने किया था यह नाटक उन दिनों आनेवाली बच्चों की एक पत्रिका ‘ पराग’ में छपा था इस नाटक में दो बच्चे अपनी मांगे मनवाने के लिए माँ बाप के सामने भूख हड़ताल करते हैं दोनों बच्चों की भूमिका में मैं और नानकचंद पंजाबी थे, बहन की भूमिका में हर्षबाला, पिता की भूमिका बिपिन भट्ट ने और माँ की भूमिका ललिता उजवने ने की थी

वार्षिक कार्यक्रम के अलावा छात्रों के जीवन में ठण्ड के दिनों में यात्रा का भी प्रावधान था बाबूजी प्रतिवर्ष अपने कॉलेज के छात्रों को लेकर शैक्षणिक सहल यानि टूर पर निकलते थे उनके साथ अन्य अध्यापक भी होते थे जिनमे घटवाई , अम्बोकर, नानोटी और योगेश काले के नाम मुझे याद है इस तरह उन्होंने लगभा पूरा भारत घूम लिया था उनकी अधिकांश यात्रायें मेरे जन्म से पूर्व की हैं यात्रा से लौटने के पश्चात बाबूजी यात्रा में ली गई तस्वीरों को एक मोटे कागज़ पर चिपकाकर उनमे कैप्शन लिखते थे इस तरह उन्होंने एक सुन्दर सा एल्बम भी बनाया था उस एल्बम की सभी श्वेत श्याम तस्वीरें अब मेरे पास हैं     

शरद कोकास 

 

4 जुलाई 2021

9. जनम से बंजारा हूँ बन्धु


ओवरसीयर की नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद जगमोहन फर्नीचर की दुकान में जाकर बैठने लगे लेकिन वे अब पहले की तरह रंदा नहीं खिंचवाते थे उनके गुरुदेव भवानी प्रसाद मिश्र जी उस समय तक बैतूल से जा चुके थे इसलिए ऐसा कोई नहीं था जिनसे वे अपने मन की बातें कह सकें । हाँ उनके दो मित्र अवश्य थे कमल जायसवाल और मदन श्रीवास जो उनके बचपन के साथी थे मदन उस समय कलेक्टर कार्यालय में बाबू की नौकरी में लग चुके थे और कमल स्वयं का फोटोग्राफी का व्यवसाय शुरू कर चुके थे उन्होंने सलाह दी कि वहीं कोई छोटा मोटा काम ढूंढ लें घर के घर में रहेंगे लेकिन जगमोहन बाबू के सपनों का संसार इतना छोटा नहीं था फिर जिस शहर में ओवरसीयर रहे उसी शहर में किसी दफ्तर में क्लर्की करना उन्हें कैसे मंज़ूर होता

आसपास तमाम शुभचिंतक लोगों के होते हुए भी वे नितांत अकेले थे यह अकेलापन भौतिक नहीं था लेकिन भीतर ही भीतर वे अपने आप को बहुत अकेला महसूस कर रहे थे कहने को वे अर्हताप्राप्त इंजिनियर थे  लेकिन अब वे किसी ऐसे महकमे में नौकरी नहीं करना चाहते थे जहाँ घूसखोरी, बेईमानी और झूठ का साम्राज्य हो । खुद का व्यवसाय करने लायक पूंजी उनके पास थी नहीं और उन दिनों इस तरह के प्राइवेट संस्थान होते नहीं थे जहाँ उनके लायक कोई काम हो


बाबूलाल जी भी विवश थे आज़ादी के समय केवल राजनीतिक व्यवस्था में ही नहीं सामाजिक व्यवस्था में भी बहुत उथल पुथल हुई थी सरकारी व्यवस्थाएँ बदल चुकी थीं अंग्रेज़ अफसरों को फेयर वेल पार्टियाँ देकर उन्हें इंग्लैण्ड जाने वाले जहाज़ों में बिठाया जा चुका था और अब सरकारी महकमों में देशी अफसरों का साम्राज्य था  फर्नीचर बनाने का काम मिलना वैसे भी बहुत कम हो गया था बाबूलाल जी एक पादरी साहब के संपर्क में रहे थे और उनके प्रयासों से उनकी रूचि प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में बढ़ती जा रही थी बाबूलाल वैद्य नाम के एक प्रसिद्ध चिकित्सक का बनना अभी भविष्य की गर्त में छुपा था फिलहाल तो सीमित आमदनी में परिवार  का खर्च चलाना बहुत मुश्किल था इसलिए बेटे की कोई सहायता वे नहीं कर सकते थे

अपनी स्वीकार की हुई बेरोजगारी से शर्मसार होकर जगमोहन अख़बारों की काली सफ़ेद लाइनों के बीच अपने भविष्य की संभावनाएँ ढूंढ रहे थे अचानक एक दिन मध्य प्रांत के किसी अखबार में उन्होंने चांदूर बाज़ार नामक एक कस्बे में किसी स्कूल शिक्षक की आवश्यकता के विषय में पढ़ा इस नौकरी के लिए मैट्रिक की अर्हता पर्याप्त थी लेकिन शिक्षण क्षेत्र में जाने का अर्थ था फिर तीन साल पीछे लौट जाना शिक्षा के क्षेत्र में उनका इंजीनियरिंग डिप्लोमाधारी होना कोई मायने नहीं रखता था वैसे भी डिप्लोमा की अहमियत स्नातक की डिग्री जितनी तो होती नहीं है इसलिए इतने साल पढ़ लेने के बाद भी वे ग्रेजुएट नहीं कहला सकते थे । एकेडेमिक क्षेत्र में उनकी योग्यता मैट्रिक पास ही थी


समस्याएँ केवल वर्तमान के आईने की चमकने वाली सतह पर ही नहीं दिखाई दे रही थीं वे कहीं पीछे पुते हुए पारे में भी दर्ज थीं उन्हें हटाने के लिए उन्हें खुरचने का मतलब था आईने का बर्बाद हो जाना घर से बाहर जाने का अर्थ था, अकेले संघर्ष करना, अपने खर्चे सीमित करना, ख़ुद के आवास और भोजन की व्यवस्था करना और अपनों से दूर अपने लिए एक नई दुनिया निर्माण करना पढ़ने के लिए बाहर जाना और नौकरी के लिए बाहर जाना इन दोनों बातों में अंतर तो था वे एक ऐसे दोराहे पर खड़े थे जहाँ उन्हें यह तो ज्ञात था कि यह मार्ग कहाँ जाते हैं लेकिन मार्ग का चयन कर उस पर कदम रखने से पहले उन्हें गंभीरता से इस बारे में सोचना आवश्यक था कुछ दिनों तक मन बहलाने के लिए वे स्थानीय संस्थाओं में, दुकानों में नौकरी के लिए आवेदन देते हुए चप्पलें घिसते रहे फिर उन्होंने दृढ़ होकर निर्णय लिया और चांदूर रेलवे  के उस प्रायमरी स्कूल में नौकरी के लिए अर्जी दे दी कुछ ही समय में वहाँ से जवाब आ गया प्राथमिक शाला के शिक्षक पद के लिए वहाँ उनका चयन हो चुका था ।

बैतूल से लगभग सवा सौ  किलोमीटर दूर स्थित चांदूर रेलवे एक छोटा सा क़स्बा था लेकिन शैक्षणिक दृष्टिकोण से उसका विकास हो चुका था मध्यप्रांत जहाँ मूलतः हिंदी और मराठी भाषी लोग रहा करते थे धीरे धीरे विकास की गति पकड़ रहा था वर्तमान अमरावती ज़िले के अंतर्गत आने वाला यह क़स्बा राजनीतिक दृष्टि से काफ़ी सजग था


जगमोहन बाबू अब कोकास गुरूजी हो चुके थे स्थानीय निवासियों ने उनके भोजन और रहने की व्यवस्था कर दी गुरूजी हिन्दी के विशेषज्ञ थे और उस समय मराठी में पढ़ाने की कोई अनिवार्यता भी नहीं थी फिर भी उन्होंने तुरंत मराठी सीखनी प्रारंभ कर दी और कुछ ही समय में मराठी पर भी उनका अधिकार हो गया छुट्टियाँ होते ही वे बैतूल लौट जाते थे और फिर माता-पिता और काकाओं के सान्निध्य में रहकर अपने फेफड़ों में ढेर सारी प्राण वायु भरकर चांदूर आ जाते थे

चांदूर रेलवे उन्हें रास आ रहा था लेकिन वे जानते थे इस मैट्रिक पास योग्यता के साथ भविष्य के सुनहरे स्वप्न देखना शेखचिल्ली के ख़्वाब की तरह होगा नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद वे सागर यूनिवर्सिटी से बी ए प्रथम वर्ष की प्राइवेट परीक्षा का फॉर्म भर ही चुके थे अब उनकी दोहरी ज़िंदगी शुरू हो चुकी थी वे शिक्षक भी थे और छात्र भी ज़िंदगी करवट ले रही थी

अभावों से भरा यह जीवन उन्होंने खुद चुना था । अपने बड़े भाइयों की तरह वे किसान या बढ़ई नहीं होना चाहते थे । यद्यपि इसमें कोई बुराई नहीं थी लेकिन फिर उनकी तीन साल की पढ़ाई व्यर्थ हो जाती और उनके गुरुदेव भवानी दादा के स्वप्न भी मिटटी में मिल जाते इसलिये स्कूल में शिक्षक की नौकरी करते हुए अपने खर्च पर उन्होंने बी.ए. किया, फिर जबलपुर के प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय से बी.टी. किया, फिर हिन्दी साहित्य में एम ए किया, और प्रयाग से साहित्यरत्न की परीक्षा पास कर ली ।

जीवन पथ  पर आगे बढ़ते हुए वे अपने गुरु भवानी प्रसाद मिश्र जी के अहसान को कभी नहीं भूले । वे हमेशा कहते थे कि अगर सर नहीं होते तो शायद वे जीवन भर बैतूल में उसी फर्नीचर की दूकान में ही काम करते रहते भवानी प्रसाद मिश्र जी के बारे में बाते करते हुए वे गौरवान्वित हो उठते वे अक्सर कहते थे कि “एक कवि समाज की बेहतरी के लिए कविता लिखता है लेकिन वह जब तक समाज में दीन  दुखियों, गरीबों के उत्थान लिए वास्तविक रूप से कार्य नहीं करता है तब उसका लिखना सार्थक नहीं होता है ।“

एक बार मैंने बाबूजी से पूछा “आप हिन्दी के इतने बड़े कवि के शिष्य रहे , आपने कभी कोई कविता नहीं लिखी ? “ उन्होंने बताया कि स्कूल के दिनों में वे एक कविता लिख कर भवानी प्रसाद मिश्र जी के पास ले गए थे तब उन्होंने उनकी कविता की प्रशंसा की थी लेकिन उनसे यह भी कहा था कि तुम्हारा काम कविता लिखना नहीं है, तुम्हारा जन्म देश की सेवा करने के लिए और हिन्दी की सेवा करने के लिए हुआ है पहले दायित्व का निर्वाह तो उन्होंने बचपन से प्रारंभ कर दिया था आगे चल कर बाबूजी  महाराष्ट्र में हिन्दी के प्रचारक बने कविताएँ तो उन्होंने नहीं लिखीं लेकिन कुछ लेख अवश्य लिखे लेकिन वे जीवन भर भवानी भाई को याद करते रहे वे हमेशा कहते थे कि “मैं जो कुछ हूँ मिश्रा सर की वजह से हूँ

चांदूर रेलवे के बाद इस बीच वे कुछ समय के लिए अमरावती जिले की तहसील मोर्शी के अंतर्गत आनेवाले एक गाँव उमरखेड भी पहुँच गए वहाँ भी उन्हें शिक्षक की नौकरी मिली यह नौकरी चांदूर की नौकरी से कुछ बेहतर थी फिर वे अपने छात्र छात्राओं के बीच बहुत लोकप्रिय भी थे एक बार जब वे बैतूल लौटे तो बाबूलालजी ने उन्हें बताया कि वे झाँसी में रहने वाले दरोगा साहब दुर्गा प्रसाद शर्मा की बिटिया शीला से उनका रिश्ता तय कर चुके हैं और बस उन्हें बारात लेकर जाना है


मेरी माँ ‘झाँसी वाली दुल्हन‘ बनकर बैतूल के हमारे परिवार में आ गई उस समय बाबूजी उमरखेड में थे माँ कुछ समय के लिए उमरखेड पहुँची उत्तर प्रदेश की एक लड़की के लिए महाराष्ट्र का वह वातावरण बिलकुल ही नया था लेकिन उन्होंने धीरे धीरे उसे समझना प्रारम्भ किया उमरखेड के बारे में माँ एक किस्सा सुनाती थी

माँ उन दिनों बस उमरखेड आई ही थी कि एक दिन उनके घर में चोरी हो गई माँ सारे जेवर एक बड़ी सी टीन की पेटी में रखती थी एक दिन सुबह सुबह लगभग चार बजे किसी देहाती चोर ने घर में प्रवेश किया और चुपचाप वह पेटी उठाकर ले गया उसे पता था कि इस घर में नई दुल्हन आई है इसलिए अच्छे खासे जेवर तो यहाँ मिल ही जायेंगे पेटी में ताला लगा था इसलिए उसे तोड़ना ज़रूरी था घर में ही तोड़ता तो पकड़ा जाता इसलिए वह पेटी लेकर पास के खेत में चला गया इससे पहले कि वह पेटी का ताला तोड़ पाता सुबह सुबह लोटा लेकर जाने वाली महिलाओं के समूह ने उसे देख लिया उनके शोर मचाते ही वह भाग गया और पेटी सही सलामत घर में वापस आ गई



माँ का उमरखेड निवास बहुत अल्प समय के लिए रहा उसके बाद बाबूजी का चयन बी एड के लिए जबलपुर स्थित प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय में हो गया और वे साल भर के लिए वहाँ चले गए माँ का स्थायी ठिकाना एक वर्ष के लिए बैतूल में हो चुका था जबलपुर में एक वर्ष बिताने के पश्चात बाबूजी जैसे ही  वापस आये नागपुर के हिंदी भाषी संघ के विद्यालय में शिक्षक के पद के लिए उनका चयन हो गया शिक्षक के लिए अब वे पूरी तरह से क्वालिफाइड थे नागपुर शहर भी बड़ा था और बेहतर भविष्य के लिए यहाँ बहुत गुंजाइश थी नागपुर में रहते हुए ही उन्हें पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में इंस्ट्रक्टर के पद का ऑफर मिला और उन्होंने वह भी ज्वाइन कर लिया

नागपुर के इस पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में उनका रुतबा तो बहुत था लेकिन उन्हें बच्चों को पढ़ाने  में जो आनंद आता था वैसा आनंद बड़ी उम्र के पुलिस कर्मियों को मनोविज्ञान पढ़ाने में नहीं आता था इस बीच उन्होंने हिंदी साहित्य में एम ए भी कर लिया था और प्रयाग से हिंदी साहित्यरत्न की परीक्षा भी पास कर ली थी अब उनके पास अवसरों की कमी नहीं थी वे बेहतर नौकरी की तलाश में लगे थे और उन्हें यह अवसर मिला जब वे भंडारा के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में शिक्षक बनकर आये 

अपनी युवावस्था में ही बाबूजी ने यह तय कर लिया था कि भले ही वे सरकारी नौकरी में रहें या ना रहें लेकिन उन्हें जीवन भर दर दर  भटकना नहीं है इसलिए बैतूल से निकलकर चांदूर, उमरखेड,नागपुर होते हुए जब वे भंडारा आये तो यह छोटा सा शहर उन्हें पसंद आ गया यह उनके जन्मगृह बैतूल से अधिक दूर भी नहीं था फिर यही रहकर उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से इतिहास में एम ए किया और एम एड की परीक्षा पास की बरसों बरस किराये के मकान में रहने के बाद उन्होंने यहीं मकान बना लिया और जीवन के अंत तक वे यहीं रहे अब उनकी दो संतानें अर्थात मेरे छोटे भाई और बहन भंडारा में अपना घर बसा चुके हैं

 शरद कोकास 

 

1 जुलाई 2021

8 . ऐसी नौकरी से तो बेरोज़गारी अच्छी



यह वह दौर था जब कवि और लेखक मानवता, परोपकार,प्रेम, और भाईचारे की बात केवल अपनी रचना में ही नहीं करते थे बल्कि यह सब कुछ उनके जीवन, उनके आदर्शों एवं क्रियाकलाप में भी शामिल था उनकी रचना के सामाजिक सरोकार उनके जीवन में विद्यमान थे अपने प्रिय शिष्य जगमोहन के पॉलिटेक्निक कॉलेज नागपुर में एडमिशन हेतु भवानी प्रसाद मिश्र जी ने समस्त कार्यवाही संपन्न की और एक दिन कॉलेज से आया एक पत्र लेकर जगमोहन नागपुर पहुँच गए नागपुर शहर उनके लिए बिलकुल ही अनजान था यद्यपि अपनी बुआ, बड़ी बहन विद्यावती और जीजा शिवनाथ जी कोकास से उन्होंने नागपुर के बारे में सुन रखा था वे लोग नागपुर के एक संपन्न इलाके धंतोली में रहते थे


जगमोहन का एडमिशन करवाने के लिए उनके जीजा शिवनाथ जी उन्हें कॉलेज ले गए । प्रवेश हेतु फॉर्म भरते हुए मराठी भाषी क्लर्क ने उनका नाम पूछा “तुमचं नाव काय आहे ?” उन्होंने अपना नाम बता दिया फिर पूछा गया “वडिला चे नाव काय ?” यानि पिता का नाम क्या है ? उन्होंने कहा “बाबूलाल“ “अच्छा, आडनाव ?”  जगमोहन की समझ में नहीं आया कि वे क्या पूछ रहे हैं । यद्यपि एक समय मराठा राज्य के अंतर्गत आने के कारण बैतूल में मराठी भाषी अनेक लोग थे लेकिन हमारे घर के लोगों के भाषाई संस्कार हिन्दी के ही थे

उनके जीजा शिवनाथ जी ने बताया “ यह महोदय सरनेम पूछ रहे हैं ।“ उस समय तक सरनेम लिखने की कोई परंपरा हमारे घर में नहीं थी, बैतूल में शाला में दाखिले के समय जो नाम लिखाया जाता था उसमे जगमोहन वल्द बाबूलाल , रमेश वल्द बृजलाल, मनोहर वल्द कुंदनलाल इतना लिख देना ही पर्याप्त होता था । बहुत हुआ तो जाति भी साथ में लिख दी जाती थी उनकी मैट्रिक की अंक सूची में भी बस नाम और पिता का नाम ही था


लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा नहीं था यहाँ नाम के साथ केवल पिता का नाम ही नहीं बल्कि सरनेम लगाने की भी परंपरा थी । जगमोहन बाबू कुछ पसोपेश में पड़ गए क्लर्क ने रास्ता निकाला उसने साथ आये शिवनाथ जी से पूछा “ तुमचा आडनाव काय ?” यानि आपका सरनेम क्या है ? शिवनाथ जी ने कहा “कोकास ” बस क्लर्क ने नाम लिख लिया ‘जगमोहन बाबूलाल कोकास’, जो आगे चल कर उनकी डिग्रियों में भी लिखा गया और नौकरी में फिर यह जे. बी. कोकास हो गया इस तरह हमारे परिवार को एक उपनाम मिल गया । आने वाले समय में जब उनके छोटे भाइयों को सरनेम की आवश्यकता महसूस हुई यही सरनेम कोकास लिखा गया किन्तु फिर किसी लिपिकीय चूक अथवा उच्चारण दोष की वज़ह से ‘स’ के स्थान पर ‘श’ हो गया अब बैतूल की हमारे परिवार की पीढियां अपना सरनेम ‘कोकाश’ लिख रही हैं वहीं मेरे लकड़दादा बलदू प्रसाद जी के रायबरेली और फतेहपुर में रहने वाले वंशज अपना उपनाम ‘शर्मा’ लिख रहे हैं

धन्तोली में रहने वाले जीजा शिवनाथ जी कोकास, विद्या जीजी और बबूलखेड़ा में रहने वाली बुआ बिरजन बाई और फूफा महादेव प्रसाद के संरक्षण में जगमोहन के तीन वर्ष देखते देखते निकल गए कस्बे से बड़े शहर में आना एक तरह से सपनों के नये  संसार में प्रवेश करना था  पालीटेक्नीक से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त करने के पश्चात बाबूजी बैतूल आ गए । उस समय यह शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी । उन्हें तत्काल ही लोक निर्माण विभाग में ओवरसीयर नौकरी भी मिल गई । वैसे भी उस समय देश बस आज़ाद हुआ ही था और पढ़े लिखे लोगों के लिए नौकरी की कोई कमी नहीं थी । उन दिनों ओवरसीयर की यह नौकरी आज के जूनियर इंजिनियर के समकक्ष मानी जाती थी


जगमोहन की नौकरी की शुरुआत के वे दिन उनके जीवन में उत्सव के दिन थे माँ बाप का सान्निध्य और अपने ही शहर में इतनी बड़ी नौकरी, और क्या चाहिए लेकिन वे निश्चिन्त होकर बैठ जाने वाले व्यक्ति नहीं थे उन्होंने अपने ज्ञान और अध्ययन का उपयोग करना शुरू किया शुरुआत में उन्हें पी डब्ल्यू दी द्वारा बैतूल के खंजनपुर इलाके में बनाये जा रहे एक छोटे से पुल के निर्माण कार्य में वरिष्ठ अभियंता के सहायक के तौर पर नियुक्त किया गया छह माह के भीतर ही उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से सबका विश्वास जीत लिया

मुश्किलें यहीं से प्रारंभ हुई एक दिन उन्हें ऐसा काम सौंपा गया जिसमे एक ठेकेदार से मिलकर कुछ राशि की व्यवस्था करनी थी वे अपने पद की गरिमा जानते थे और उस ठेकेदार का वरिष्ठ अधिकारियों के साथ व्यवहार तथा अनुचित लाभ लेने का तरीका भी उन्हें यह काम कुछ उचित नहीं लगा इतने दिन महकमे में रहकर वे जान ही गए थे कि धन की यह व्यवस्था किसलिए की जानी है और इसका वितरण किन किन लोगों के बीच होना है सरकारी महकमों में देश के आज़ाद होते ही भ्रष्टाचार का घुन लग गया था । या कह सकते हैं कि अंग्रेज़ हमें विरासत में लोभ लालच की यह पुडिया दे गए थे पंचवर्षीय योजनाएँ बन रही थीं, काम की भी कमी नहीं थी लेकिन अंग्रेज़ों के जाते ही जैसे देसी अंग्रेज़ों को अचानक अमीर बनने का चस्का लग गया था

जगमोहन कोकास, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संवेदनशील कवि और ईमानदार शिक्षक के शिष्य थे । ईमानदारी उनके भीतर कूट कूट कर भरी थी । भ्रष्टाचार करना तो बहुत दूर की बात है वे भ्रष्टाचार होता हुआ भी नहीं देख सकते थे । मानसिक यंत्रणाओं से परेशान होकर एक दिन वे अपने पिता बाबूलाल जी के समक्ष उपस्थित हुए और उन्हें अपनी परेशानी बताते हुए कहा “ बापू, मुझसे यह नौकरी नहीं होगी “ बापू ने कहा “ तो फिर क्या करोगे ? “ उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया उन्हें इतना तो पता था कि वे अब दोबारा फर्नीचर के कारखाने में जाकर आरी बसूला नहीं चलाएंगे


“जैसी तुम्हारी मर्ज़ी ।“ बाबूलाल जी ने उन्हें खामोश देखकर कहा यह वो ज़माना था जब बच्चे अपने छोटे से छोटे निर्णय में वरिष्ठ जनों की अनुमति अवश्य लेते थे और वरिष्ठ जन भी उनके कामों में अनावश्यक दख़ल नहीं देते थे अगले ही दिन दफ्तर पहुँचकर उन्होंने घोषणा कर दी कि वे ऐसे भ्रष्ट,घूसखोर लोगों के साथ इस सरकारी विभाग में नौकरी नहीं कर सकते । उनके इस निर्णय को उनकी मूर्खता करार देकर लोगों ने उनकी हँसी उड़ाई और कहा “ भैया, हमरे देस में ऐसा कौनो सरकारी विभाग नहीं है जहाँ लेन देन नहीं चलता .. “ कुछ लोगों ने नेक सलाह भी दी  “भैया करो भले ही नहीं, बस जो हो रहा है उसकी ओर से आँख बंद कर लो ” वहीं कुछ मित्रों ने सब कुछ जानकर उन्ही से पूछा “अब क्या करोगे ? ”

जगमोहन दृढ़ प्रतिज्ञ थे उनके बाजुओं में ताकत और मन में हिम्मत थी वे जानते थे अब सब कुछ नए सिरे से शुरू करना होगा लेकिन वे  निराश नहीं थे उन्हें पता था ज़िंदगी ने उनके लिए अभी रास्ते बंद नहीं किये हैं, अभी बीजों में अंकुर आना बाक़ी है और उनका पेड़ बनना भी सुनिश्चित है उन्हें पता था हवाओं का रुख़ कोई अपनी मर्ज़ी से मोड़ नहीं सकता है न उन्हें कोई बहुत देर तक दीवारों के भीतर क़ैद करके रख सकता है फिर वे तो तूफ़ान थे, यह बात अलग थी कि इस वक़्त उन्हें अपने ही मन में उठ रहे तूफ़ान का सामना करना पड़ रहा था 

शरद कोकास 

-------  ------ तस्वीर बैतूल का पी डब्ल्यू डी ऑफिस ,  शिवनाथ कोकास और उनका नागपुर स्थित धंतोली का मकान बाबूलाल जी और उनके बेटे जगमोहन 

28 जून 2021

7 गुरु भवानी प्रसाद मिश्र के शिष्य जगमोहन


कवि भवानी प्रसाद मिश्र 
खेत से परिवार के गुजारे लायक गेहूँ कटकर आ चुका था    दादाजी ने सागौन का एक नया लाट ख़रीदा था और सरकारी   महकमों और बस्तियों में घूम घूम कर फर्नीचर के नये आर्डर   ले आये थे न्यू बैतूल हाईस्कूल के बच्चे परीक्षाएं समाप्त हो   जाने के बाद गिल्ली-डंडा,भौरा,कंचे और पतंगबाज़ी में व्यस्त   हो गए थे बाबूलाल जी और उनके भाइयों का यह संयुक्त   परिवार बढ़ रहा था लगभग हर साल ही घर में सोहर गाए   जाते थे और पड़ोसियों की देहरी पर पीले चावल रखकर छठी   बारसे के न्योते दिए जाते थे | 

यह वो दिन थे जब ‘जितने हाथ उतने रोजगार’ के सिद्धांत पर चलने वाले समस्त कस्बाई व ग्रामीण पिता अपने बच्चों को अधिक से अधिक मैट्रिक तक पढ़ने की अनुमति देते थे फिर उन्हें काम धंधे में झोंक देते थे वैसे भी बैतूल में आगे पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी कुछ धनाढ्य व्यवसायी लोगों के बच्चे शहरी रंग ढंग देखने के लिए उच्च शिक्षा के नाम पर किसी बड़े शहर अवश्य जाते थे लेकिन एक दो साल में लौटकर धन उगलने वाले अपने पैतृक व्यवसाय में लग जाते थे

वहीं छोटे शहर के ग़रीब महत्वाकांक्षी बालक अपने पहले और अंतिम स्वप्न में किसी तरह मैट्रिक के परीक्षाफल में सफल होने वालों की सूची में अपना नाम देखना चाहते थे इससे अधिक बड़े स्वप्न देखने की न उन्हें इज़ाज़त थी न उनकी इच्छा होती थी मैट्रिक के परीक्षा फल घोषित हो चुके थे और अपने स्वप्न का वांछित फल पा लेने के पश्चात शिक्षा व रोजगार के इस अलिखित संविधान के तहत जगमोहन बाबू घर में चल रही फर्नीचर की दुकान में पिता, चाचाओं  व बड़े भाइयों के साथ काम में हाथ बंटाने लगे थे ।

लेकिन उनके मन के किसी कोने में एक अनुत्तरित प्रश्न भी जन्म ले रहा था, गणित विज्ञान में उनकी प्रवीणता क्या केवल फर्नीचर का नाप लेने और खांचे बनाने के काम में नष्ट हो जायेगी ? क्रांतिकारियों के साये में रहकर उन्होंने आज़ादी के स्वप्न देखना सीखा था उनके बाजुओं में जोश था और ख्यालों में आज़ाद भारत के आज़ाद गगन में ऊँची परवाज़ की ख्वाहिश थी विदेश जाकर पढ़ने वाले नेहरु, गांधी, अम्बेडकर जैसे नेता उनके आदर्श थे

उन्होंने डरते डरते अपने पिता अर्थात मेरे  दादाजी बाबूलाल जी से आगे पढने की इच्छा ज़ाहिर की तो उन्हें दो टूक जवाब मिला “कुछ नहीं ..चुपचाप अपने बड़े भाइयों मनमोहन और मदन मोहन की तरह काम से लग जाओ, दुकान में काम करो या खेती के काम में हाथ बटाओ ।“ पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने कारखाने में सहायक का काम करना शुरू कर दिया और उच्च शिक्षा के स्वप्न को माचना नदी में तिरोहित कर आये।

 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कवि, भवानी प्रसाद मिश्र जो भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान गिरफ़्तार किये जाने के बाद सेन्ट्रल जेल नागपुर भेज दिए गए थे चव्वालीस पैंतालीस में रिहा होकर वापस आ गए थे और फिर से न्यू बैतूल हाईस्कूल में हेडमास्टरी करने लगे थे लेकिन उस समय तक तय हो चुका था कि एक आध साल में आज़ादी ही मिल जायेगी इसलिए उनकी बाहरी व्यस्तताएं बढ़ गई थीं उनका घर पड़ोस में ही था वे जब भी बैतूल में होते, अपने घर से निकलकर हमारे घर और कारखाने के सामने से होते ही हुए शहर की ओर जाते थे

एक दिन घर के सामने से गुजरते हुए जब उन्होंने अपने प्रिय छात्र जगमोहन को लकड़ी की दुकान में काम करते हुए देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि उनके स्कूल का मेधावी छात्र जगमोहन लकड़ी की दुकान में पसीना बहाते हुए रंदा खिंचवा रहा है । वे उनका हाथ पकड़कर उन्हें बाबूलाल जी के पास ले गए और उनसे कहा “ बाबूलाल जी, आपके इस बेटे का जन्म आरी बसूला चलाने या रंदा खींचने के लिए नहीं हुआ है, यह हमारा क्रांतिकारी वीर पढ़ने लिखने में भी होशियार है, इसका गणित भी बहुत अच्छा है । इसे आगे क्यों नहीं पढ़ा रहे हैं आप ?“  

बाबूलाल जी धर्म संकट में आ गए उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ख़ुद हेडमास्टर भवानी प्रसाद जी उनके बेटे की इस तरह सिफारिश करेंगे लेकिन वे अपनी सीमायें जानते थे उन्होंने बात टालनी चाही “ पढ़ लिख कर भी क्या करेगा पंडित जी, काम तो इसे खेतीबाड़ी का या फर्नीचर बनाने का ही करना है ।“ इससे पहले कि भवानी प्रसाद जी उनकी बात का जवाब देते उन्होंने दृढ़ होकर कहा “ पंडित जी, आपकी बात सही है लेकिन असल बात तो यह है कि हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि इसे किसी और शहर में कॉलेज की पढ़ाई के लिए भेजें ।“

भवानी प्रसाद जी इस घर में रहते थे बैतूल में 

  ध्यातव्य है कि उन दिनों बैतूल जैसे छोटे से कस्बे में और   आसपास कहीं कोई कॉलेज नहीं था और उच्च शिक्षा की   समस्त सुविधाएं निकटस्थ शहर नागपुर में उपलब्ध थीं ।   भवानी दादा ने बाबूलाल जी से कहा “ उसकी चिंता आप   न  करें, आप इसे नागपुर भेजने की तैयारी कीजिये, मैं   वहाँ   के पॉलिटेक्निक कॉलेज में इसके एडमिशन के बारे   में देखता हूँ ” “ लेकिन ..” बाबूलाल जी ने कुछ कहना     चाहा तो भवानी दादा ने कहा “ पैसे की चिंता न करें ,इसके   आगे की पढाई और रहने के खर्चे की व्यवस्था मैं करूँगा  

खैर, भवानी दादा का इतना कह देना ही काफ़ी था नागपुर में बाबूलाल जी की दो बहने ब्याही थीं उन्होंने अपने भतीजे की रहने की व्यवस्था कर दी
वैसे भी नागपुर में रहने की कोई दिक्कत नहीं थी । बहनों के अलवा कुछ समय पहले ही उनकी बड़ी बेटी विद्यावती का विवाह भी नागपुर में हुआ था और उनके दामाद शिवनाथ जी कोकास मध्य भारत के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी अखबार हितवाद में कार्यरत थे

शरद कोकास 

 




तस्वीर 1 भवानी प्रसाद 2 बाबूलाल जी जगमोहन 3 . भवानी प्रसाद का घर 4 इतवारी बाज़ार का पैनोरमा फोटो

22 जून 2021

6 अगर उन्हें गोली लग जाती तो

    

जगमोहन कोकास 


मेरे परदादा विश्वेश्वर प्रसाद जब बैतूल आये तो उन्होंने तालाब के पास मुसलमानी मोहल्ले में एक मकान किराये से ले लिया फिर कुछ वर्षों बाद इतवारी बाज़ार में अपना मकान बना लिया मकान से लगा हुआ लकड़ी का कारखाना था जैसे कि उन दिनों भी पढ़े लिखे माँ बाप अपने बच्चों को स्कूल भेजते थे बाबूलाल जी ने भी अपनी संतानों को स्कूल भेजना शुरू किया

 उन दिनों शहर में एक ही हाई स्कूल था जिसे मिश्रा हाई स्कूल कहते थे बाद में उसका नाम न्यू बैतूल हाई स्कूल हो गया छात्र जगमोहन पढ़ने में तो मेधावी थे ही लेकिन देशभक्ति की बातों में उनका मन अधिक लगता था “हवाओं में रहेंगी मेरे ख्यालों की बिजलियाँ” कहते हुए फांसी के फंदे पर लटक जाने वाले भगतसिंह को शहीद हुए एक दशक भी नहीं हुआ था और देश भर के बच्चे  उन बिजलियों की रौशनी में आज़ादी की ओर जाने वाला मार्ग तलाश रहे थे


यह संयोग की बात है कि सन चालीस के करीब हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र, मिश्रा हाईस्कूल में हेडमास्टर बन कर आ गये भवानी दादा उस समय युवा थे और गाँधीजी से बहुत प्रेरित थे उन्ही की प्रेरणा से स्कूल की गतिविधियों के साथ साथ वे स्वतंत्रता आन्दोलन में भी रूचि लेने लगे उन्होंने इतवारी बाज़ार बैतूल में एक मकान किराये से ले लिया और बैतूल के युवाओं और बच्चों को संगठित करने का काम शुरू कर दिया उनका यह मकान मेरे पैतृक मकान के बहुत ही करीब था


भवानी प्रसाद मिश्र जी ने अपने शिक्षक साथियों मदनलाल चौबे,रामस्वरूप बाजपेयी,शम्भू प्रधान,लघाटे मास्टर आदि को लेकर एक टीम तैयार की और विभिन्न गुप्त योजनाओं को अंजाम देने के काम में लग गए इन कामों में प्रमुख काम थे अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करना, जुलुस निकालना, जहाँ अन्याय दिखे उस अन्याय का विरोध करना और अंग्रेज अधिकारीयों के ख़िलाफ़ नारे लगाना एक टीम उन्होंने अपने स्कूल के छात्रों को लेकर भी बनाई थी जिसमे शामिल थे राममूर्ति चौबे, कोमल सिंह ,जगमोहन कोकास, रमेश कुमार बाजपेयी और उनके स्कूल के कई छात्र मेरे पिता जगमोहन तो उस समय सातवीं में थे और रमेश बाजपेयी यानि रम्मू चाचा पांचवीं में पढ़ते थे
जगमोहन व उनके मित्र 

यद्यपि यह बच्चे बहुत छोटे थे लेकिन उनमे जज़्बा ग़ज़ब  का था आन्दोलन शब्द के विषय में उन्हें भले पता न हो लेकिन गुलामी का अहसास अवश्य था वे अपने पिताओं,चाचाओं और घर के कामकाजी लोगों को अंग्रेज़ों के हंटर से पिटते हुए देखते थे तो उनका बाल मन उद्वेलित हो जाता था लगता था यह देशप्रेम का जज़्बा अनुभव से उपजा था ज़ाहिर हैं शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने की समझ पैदा करने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं होता

 यह बच्चे भवानी दादा और उनकी टीम के लगों के लिए प्रमुख रूप से सन्देश लाने ले जाने, सूचनाएँ और आन्दोलन सामग्री पहुँचाने का काम करते थे | बच्चों पर अंग्रेज़ों की नज़र ज़रा कम रहती थी इसलिए सारे काम आसानी से हो जाते थे 


बंगलुरु का जुलुस 
 फिर आई तारीख़ नौ अगस्त उन्नीस सौ बयालीस उस दिन गाँधीजी के आव्हान पर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ प्रदर्शन करने और जुलूस निकालने के अलावा कचहरी की बिल्डिंग पर तिरंगा फहराने की योजना बन चुकी थी उस दिन सुबह से ही जुलुसू की तैयारी होने लगी थी जुलुस के लिए इकठ्ठा

 होने की जगह ,प्रस्थान के समय की सूचनाएँ एक दिन पूर्व ही पहुँचाई जा चुकी थीं भवानी दादा के नेतृत्व में स्कूल के अनेक शिक्षकगण और शहर के देशप्रेमी लोग जुलुस में शामिल हो गए छोटे बच्चों को जुलूस में कोई अनहोनी होने आशंका की वज़ह से आने की मनाही थी लेकिन रक्त में मचलती भावनाओं को कौन रोक सकता है वैसे भी बच्चों को जुलुस में जो आनंद आता है वह सब जानते ही हैं

 जुलूस की शुरुआत न्यू बैतूल हाईस्कूल से हुई और कोठी बाज़ार मेन रोड, गुजरी से होता हुआ वह कचहरी की ओर बढ़ने लगा जैसा कि हम आज़ाद भारत में भी देखते आये हैं उस समय भी पुलिसवाले डंडे लिए जुलूस के साथ चल रहे थे बिना आदेश के उन्हें कुछ भी करने की मनाही थी जुलुस आगे बढ़ने लगा बंकिमचंद्र की कविता ‘वन्दे मातरम’ और बिस्मिल अज़ीमाबादी का गीत ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ फिज़ाओं में गूंजने लगे

 यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन जुलूस जैसे ही डिस्ट्रिक्ट जेल के पास पहुँचा गीत नारों में बदल गए .. अंग्रेज़ों भारत छोड़ो , अंग्रेज़ी हुकूमत मुर्दाबाद के तीखे स्वर जैसे ही सियासतदां लोगों के कानो में पड़े एक फ़रमान जारी हुआ .. लाठी चार्ज .. जुलूस में शामिल मदनलाल चौबे,रामस्वरूप बाजपेयी,शम्भू प्रधान ,लघाटे मास्साब ने देखा .. अरे यह तो अपने जानकी प्रसाद दुबे हैं पोलिस दरोगा जानकी प्रसाद के चेहरे पर कोई दुविधा नहीं थी वे उस समय अंग्रेज़ सरकार के मुलाजिम की भूमिका में थे

 फूटे हुए माथों से बहता हुआ खून मुँह में भर आता था लेकिन “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो“  की आवाज़ में वही जोश था, वही ताकत थी , वही प्रतिरोध जो बरसों ज़ुल्म सहने के बाद पैदा होता है लाठियाँ बच्चों पर भी पड़ रही थीं लेकिन उनका सर बचाया जा रहा था एक लाठी जांघ पर दस वर्ष के बालक रमेश बाजपेयी पर भी पड़ी बाकी बच्चों ने उन्हें कवर किया बस कुछ ही दूरी पर था वह खम्भा जिस पर यूनियन जैक लहरा रहा था क्रांतिकारियों ने अपने अपने पास रखे तिरंगों को हवा में लहराना शुरू किया उनका अगला लक्ष्य उस खम्भे पर झंडा फहराना था

अचानक एक बालक भगदड़ के बीच से निकला, उसके हाथ में एक तिरंगा था जिसमें एक लकड़ी लगी हुई थी लोगों ने देखा वह बालक तेज़ी से उस खम्भे की ओर बढ़ा जा रहा है “अरे जग्गू .. जगमोहन ..” जुलुस में शामिल वरिष्ठ लोगों ने आवाज़ दी लेकिन ग्यारह वर्षीय वह बालक रुका नहीं वह फुर्ती से खंभे की ओर बढ़ा, यूनियन जैक निकाल कर ज़मीन पर फेंक दिया और वहाँ बंधी रस्सी में लकड़ी खोंसकर तिरंगा फ़हरा दिया

यह एक ऐसी हरकत थी जिस पर हर किसी का ध्यान था लाठीचार्ज करते हुए सिपाहियों के पास बंदूकें नहीं थी लेकिन जाने कहाँ से एक अंग्रेज़ पुलिस ऑफिसर आया और उसने झंडा फहराकर खम्भे पर नीचे फिसलते हुए जगमोहन पर गोली चला दी लेकिन ज़ाहिर है कि निशाना चूक गया जगमोहन को यह सब देखने की फुर्सत कहाँ थी वह तो क्षणों में भीड़ में गायब हो गया था


बैतूल का टाउन हॉल 

बाबूजी ने कभी मुझे विस्तार से इस घटना के बारे में नहीं बताया हमें बस इतना पता था कि वे अपने बचपन में कचहरी में झंडा फहराकर आये थे मैंने उनसे कहा भी कि “आप सरकार से यह सब क्यों नहीं कहते ?” उन्होंने कहा “ मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है हज़ारों लोगों ने देश के लिए अपनी जान दी है ,मैंने तो बस झंडा फहराया था ” मैंने उनसे कहा .. “फिर भी .. “ बाबूजी समझ गए “ मुझे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का तमगा लटकाए घुमने का कोई शौक नहीं है

बाबूजी के निधन के बरसों बाद रम्मू चाचा यानि डॉ. रमेश कुमार बाजपेयी ने विस्तार से यह घटना बताई अठ्ठासी वर्षीय बाजपेयी जी रीजनल कॉलेज भोपाल से सेवानिवृत प्रोफ़ेसर हैं और भोपाल में रहते हैं बाबूजी को वे हमेशा अपना बड़ा भाई ही मानते रहे रम्मू चाचा से पूरी घटना विस्तार से सुनने के बाद मैं चुप हो गया फिर मैंने उनसे पूछा “ मान लीजिये बाबूजी को उस दिन गोली लग जाती तो ?”


डॉ रमेश बाजपेयी 

    रम्मू चाचा ने कहा ..” तो क्या, देश के लिए शहीद हो जाते ” “ बाद में बाबूजी को गिरफ़्तार नहीं किया गया ? “ मेरा अगला सवाल था “ अरे भवानी प्रसाद मिश्र जी और उनके साथियों के रहते किसकी हिम्मत थी जग्गू भैया को कोई हाथ भी लगाता उन्हें तुरंत अंडरग्राउंड कर दिया गया ” हाँ भवानी भाई , उनके शिक्षक साथी रामस्वरूप मास्साब और शम्भू प्रधान ज़रूर गिरफ़्तार कर लिए गए और उन्हें नागपुर जेल भेज दिया गया जहाँ वे उन्नीस सौ चौवालीस तक रहे

 कभी कभी कैसा होता है ना .. बाबूजी से उनके रहते हुए मैंने एक दो बार इस घटना का विस्तार जानना चाहा था लेकिन मुझे उन्होंने कभी कुछ नहीं बताया और मुझे क्या किसी को भी कुछ नहीं बताया शायद उन्होंने कभी इस घटना को इतना महत्त्व ही नहीं दिया क्या पता वे क्या सोचते थे ।“ मैंने रम्मू चाचा से कहा 

अरे, तुम्हारे पिता जैसे ईमानदार, कर्मठ, प्रसिद्धी के मोह से कोसों दूर लोग कहाँ मिलते हैं अगर प्रसिद्ध होने या नाम कमाने की इतनी ही ख्वाहिश होती तो आज सरकार से ताम्रपत्र लेकर स्वंत्रता संग्राम सेनानी की पेंशन                                          नहीं पा रहे होते ? चाचाजी ने कहा । 

    “लेकिन बेटा, तुम इस बात को लोगों तक ज़रूर पहुँचाओ, भंडारा के लोगों तक और हमारे बैतूल के लोगों तक भी यह बात जानी चाहिए कि उनके शहर के बेटे जगमोहन ने स्वतंत्रता आन्दोलन में क्या योगदान किया है मुझे भी आज तक बचपन के उस जुलूस में मार खाई उस एक लाठी का दर्द याद है  चाचाजी ने गर्व से अपना भाल उन्नत करते हुए कहा

शरद कोकास