28 अप्रैल 2026

26 . फॉर हूम द बेल टॉल्स

भंडारा शहर की मेन  रोड 
भंडारा शहर उन दिनों इतना छोटा था कि लोग टहलने निकलते थे और कुछ देर बाद पता चलता थे कि लो शहर तो कबका ख़त्म हो चुका है और वे  शहर की सीमा से बाहर आ गए हैं इतने छोटे शहर की ख़बरें अखबार में तो छपती नहीं थीं न यहाँ के स्थानीय समाचार रेडियो पर आते थे फिर भी लोगों का मन तो होता ही था कि जानें शहर में क्या चल रहा है उनके लिए , शहर में  किसने नई दुकान डाली है, किस लोकल नेता ने जनता को क्या झूठा आश्वासन दिया है से लेकर किस के घर में चोरी हुई है, कौन किसकी लड़की को भगा ले गया है और किस की बीबी ने अपने शराबी पति से तंग आकर उसे ‘सोड़चिठ्ठी’ दे दी है, तक सभी ख़बरें महत्वपूर्ण थीं     

गांधी चौक सदा गुलज़ार 
शहर की ताज़ा ख़बरें जानने के लिए गाँधी चौक के किसी टी स्टाल पर हाफ़ चाय पीते हुए खड़े होना ही पर्याप्त था पान की दुकान वाला भी पान के साथ ऐसी चटपटी ख़बरें लपेट कर देता था जिन्हें आप काफी देर तक चुघल सकते थे किसी सेलून में दाढ़ी बनवाते हुए ‘किसी से न कहना’ के अंदाज़ में सभी खबरें आपको मिल जाती थीं इनमे कुछ ऐसी भी ख़बरें होती थीं जिन्हें अख़बार में छपने का सौभाग्य कभी प्राप्त हो ही नहीं सकता था इसके बावजूद जिन्हें देश दुनिया की ख़बरें जानना होता था वे नागपुर से निकलने वाले अख़बार मंगाते थे ख़बरें हर आदमी के पास होती थी अदा ज़ाफरी साहब ने ऐसे ही शहर के लोगों के लिए लिखा होगा ..

हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है

कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

महाल रोड पर एक प्रेस 
लेकिन इन सबके बावजूद शहर में कुछ ऐसे सजग पत्रकार थे जो अपनी कम पूंजी में ही सही साप्ताहिक अख़बार निकालते थे ऐसे ही एक पत्रकार थे हमारे मोहल्ले के अनंत रघुनाथराव पंडितराव पंडितराव जी ने अकबर इलाहाबादी का शेर सुन रखा था “खींचों न कमानों को न तलवार निकालो , जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो ।“ हालाँकि कोई तोप उनके मुकाबिल नहीं थी और रोज़ अख़बार निकलने लायक संसाधन भी उनके पास नहीं थे इसलिए वे सप्ताह में एक बार सोमवार को अख़बार निकालते थे । उनके अख़बार का नाम था ‘लोकवाणी’ और इसकी कीमत थी मात्र दस पैसे ।

पुराने समय की ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन 
पंडित राव जी एक झोला लटकाए साइकिल पर घूमते हुए हफ़्ते भर तक शहर की ख़बरें इकठ्ठा करते थे । उनके यहाँ एक कम्पोज़र था जो अलग अलग अक्षरों के लोहे से बने गुटकों को जिन्हें टाइप कहते थे एक लोहे की फ्रेम के भीतर सेट करता था । फिर पूरा पन्ना तैयार हो जाने के बाद उसे कस देता था ताकि छपाई के समय वे गिरे नहीं । फिर उसे वह ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन पर चढ़ाता था और रोलर पर स्याही डालता था । इतवार की शाम से ही धड़ धड़ की आवाज़ के साथ वह मशीन चलने लगती थी और थोड़ी देर में ही सत्रह बाई ग्यारह इंच के टैबलायड  साइज़ के चार पेज छप जाते थे ।  सोमवार की सुबह पंडितराव जी खुद अख़बार बाँटने निकलते थे । दूर मोहल्लों में बांटने के लिए उन्होंने एक हॉकर भी रखा था ।

पुराने समय का डायल वाला टेलीफोन 

पंडित राव जी की पहचान एक बुद्धिजीवी के रूप में तो थी ही लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उनके यहाँ टेलीफोन था
उस समय जिसके घर में टेलीफोन होता था वह बड़ा आदमी कहलाता था । हम लोग इस मायने में खुशनसीब थे कि हमारे मोहल्ले में दो टेलीफोन थे एक पंडितराव के यहाँ और एक एड्वोकेट शंगर्पवार के यहाँ । अनेक लोगों ने उनके घर के टेलीफोन नंबर अपने रिश्तेदारों को दे रखे थे जो अक्सर पंडित राव जी के टेलीफोन की घंटी बजाया करते थे  

हेमिंग्वे का उपन्यास 
अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास “ फॉर हूम द बेल टॉल्स “ के शीर्षक की तरह पंडितराव जी को भी पता नहीं होता था कि घंटी किसके लिए बज रही है इन पी पी नंबरों पर जब किसी का कोई रिश्तेदार फोन करता और पंडित राव जी से कहता “ कृपया फलां फलां को बुला दीजिये” पंडितराव जी जैसे सज्जन व्यक्ति पैदल ही नंगे पाँव उस व्यक्ति को बुलाने दौड़ जाते थे और “तुमचा फोन “ कह कर लौट आते । वे कितने भी व्यस्त हों उन्होंने पड़ोस के लोगों को बुलाने में कभी कोई कोताही नहीं की ।

पास पड़ोस का फोन 
उन दिनों पड़ोस के ऐसे बड़े आदमी का टेलीफोन नंबर पी पी नंबर कहलाता था हम लोग पी पी नंबर  का अर्थ नहीं जानते थे जिससे पूछो वह अलग अलग मतलब बताता था, कोई कहता पी पी यानि पर्सनल फोन तो कोई कहता पर्टिकुलर फोन हम लोगों ने सहूलियत के लिए इसका नाम रखा था ‘पास पड़ोस का फोन’ बाद में ज्ञात हुआ कि इसका वास्तविक अर्थ था पर्टिकुलर पर्सन अर्थात किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए आनेवाला फोन या उसके घर का नंबर

ट्रंक काल टेलीफोन एक्सचेंज में बुक होते थे 
लोग इमरजेंसी में जैसे किसी की मृत्यु आदि की सूचना देने के लिए इन्ही लोगों के घर से ट्रंक काल बुक करते थे और यह लोग इतने अच्छे कि कभी उसके पैसे भी नहीं लेते थे जबकि उन दिनों फोन का बिल बहुत ज़्यादा आता था । पास पड़ोस के फोन का उपयोग करने का यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक शहर में एस टी डी पी सी ओ नहीं खुल गए अथवा लोगों के घरों  में फोन नहीं लग गए । वह समय कब का बीत चुका है । अब तो हर जेब में मोबाइल है और पंडितराव जैसे परोपकारी लोग दुनिया से जा  चुके हैं  

पहले यहाँ हुआ करता था पंडितराव जी का घर 
एक ज़माना बीत गया यह सब घटित हुए तबसे लेकर अब तक जाने कितना पानी भंडारा की वैनगंगा नदी में बह चुका होगा भंडारा की गलियों से लेकर सडकों तक की सूरत बदल गई है पुराने मकान अब भी साँस ले रहे हैं लेकिन उनका वैभव अब ऊँची ऊँची इमारतों के आगे फीका पड़ रहा है लोग भी अब पंडितराव जी और शंगर्पवार जी जैसे कहाँ शेष हैं अब तो लगता है सब आपाधापी में हैं हर कोई दौड़ रहा है, जैसे उन्हें कहीं जाने की कोई जल्दी हो दौड़ सब रहे हैं लेकिन कोई कहीं पहुँच नहीं रहा है वे ऐसे दिन थे जब पड़ोस में रहने वालों को आपके रिश्तेदारों के नाम भी मालूम रहते थे । अब रिश्तेदार तो दूर बगल में कौन रहता है यह भी पता नहीं होता

लोकवाणी चौक 
लेकिन अभी भी समय बीत कर रीत नहीं गया है लोग विकास की अंधी दौड़ में दौड़ अवश्य रहे हैं लेकिन वे अभी चुके नहीं हैं फिर कोई कितना भी होशियार हो,  दौड़ जीतने की जल्दी में हो ,दौड़ते हुए एक न एक बार पीछे मुड़कर देखता ज़रूर है हम आप भी अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में बीते दिनों की धूल पर अपने पिछले कदमों के निशान ज़रूर देखते हैं ताकि हम बेहतर जान सकें कि हमें अगला कदम कौनसा रखना है

अभी भंडारा की इन गलियों में मुझे ऐसे बहुत से निशान दिखाई दे रहे हैं इनमे कुछ निशान तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर आप चौंक जायेंगे ध्यान से देखिये आपको इन गलियों में बाबासाहेब आम्बेडकर के पाँव के निशान भी दिखाई देंगे , उन दिनों के जब उन्होंने भंडारा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के दौरान यहाँ डेरा डाला था

अख़बार पर आज बहुत सी बातें हुई  बशीर महताब का एक शेर जो मुझे बहुत अच्छा लगता है वह भी पढ़ लीजिये...

मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें

हर रोज़ नया फ़ितना बयाँ करती हैं

शरद कोकास 

 


26 अप्रैल 2026

25. सिलबट्टे की खीर

दादा हलमारे के घर के सामने की सीमेंट की बेंच 
हमारी गली से निकलते ही दाईं ओर दादा हलमारे का मकान था जिनके घर के सामने सीमेंट की बेंचें लगी थीं । उनके घर के बाद भैया का मकान था, जिनकी गाय कभी कभार हमारे दूध वितरक राजाराम जी के अवकाश के दिनों में एक वक्त की चाय के लिए दस पैसे के ऐवज में आधा गिलास दूध प्रदान कर दिया करती थी ৷ इस तिगड्डे से दो रास्ते निकलते थे जिनमे एक रास्ता खामतालाव वार्ड होते हुए मेरे स्कूल की ओर जाता था और दूसरा रास्ता बाज़ार की ओर ।


सारवे का बाड़ा 2017 की तस्वीर 
बाज़ार की ओर जाने वाले रास्ते पर बाईं ओर सबसे पहले सारवे का बाड़ा था । सारवे गुरूजी का बेटा विजू मेरा हम उम्र था ৷ उसकी कंजी आँखों की वज़ह से वह मुझे किसी दूसरे ग्रह से आये प्राणी की तरह लगता था ৷ सारवे गुरूजी ख़ुद भी यहाँ रहते थे और मकान के अन्य भाग उन्होंने किराए से उठा दिए थे । ऊपर की ओर श्री मानकर का निवास था, उनकी तीन बेटियां और एक बेटा था ৷ उनकी छोटी बेटी का नाम मीना था । सारवे के मकान के बाद, सवालाखे का मकान, फिर हनुमान मन्दिर और फिर श्री 
शंगर्पवार वकील का मकान था ।

छोटी बहन सीमा और माया के साथ एक तस्वीर 
सारवे गुरूजी के इसी बाड़े में नीचे की ओर बोपचे काका रहते थे ৷ श्री फूलचंद जी बोपचे शिक्षा विभाग में कार्यरत थे । उनकी दो बेटियाँ हैं जिनके नाम छाया और माया हैं और दो बेटे किशोर यानि नाना और मनोज यानि बबलू । काका और काकू का मेरे प्रति बचपन से ही बहुत स्नेह रहा और मेरा आना जाना उनके घर में परिवार के सदस्य की तरह ही रहा ৷ वैसे भी उस मोहल्ले में पढ़े - लिखे मध्यवर्गीय लोगों के परिवार बहुत कम थे सो इस तरह की अंतरंगता बहुत कम परिवारों के साथ हो पाई ৷ बोपचे काका मध्यप्रदेश के ही बालाघाट की ओर के रहने वाले थे इसलिए बाबूजी से उनकी बहुत अच्छी मित्रता रही ৷ वे बाबूजी को बड़े भैया कहते थे और यही रिश्ता उन्होंने जीवन भर माना ৷ हम लोगों का परिवार हर सुख दुख में उनके परिवार के साथ ही रहा ৷

मैट्रिक के बाद जब मैं उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु भोपाल गया तो मेरे जाने के दो साल बाद माया भी वहाँ पढ़ने आ गई थी । बाबूजी के आग्रह पर बोपचे काका ने अपनी बिटिया को रीजनल कॉलेज में पढ़ने भेजा था ৷ माया पढ़ने में काफी होशियार थी ৷ बी एस सी ऑनर्स बी एड की अपनी पढाई पूर्ण करने के बाद उसने भंडारा में ही शिक्षक की नौकरी ज्वाइन कर ली और डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन ऑफिसर के पद तक पहुँची ৷ बचपन से हम लोगों के बीच का भाई बहन का यह रिश्ता अब अपने अपने परिवार के विस्तार के साथ और प्रगाढ़ हो गया है ৷ उसका विवाह भी भंडारा के जे एम पटेल कॉलेज के व्याख्याता मदन लाल जी देशमुख के साथ हुआ इस तरह भंडारा उनका स्थायी निवास हो गया ।

हम लोगों का नाट्य स्थल दुर्गा मंदिर 2012 

छाया और माया हम बच्चों के दिन प्रतिदिन के उधमबाजी वाले खेलों में तो शामिल नहीं थीं लेकिन वे हमारी सांस्कृतिक टीम की सक्रिय सदस्य थीं । क्वांर के माह में आनेवाले शारदीय नवरात्र की हमारे यहाँ धूम मचती थी । एक माह पूर्व ही मोहल्ले की बालपुरी नव दुर्गा उत्सव समिति के सदस्य सक्रिय हो जाते थे । यह ग़रीब लोगों की समिति थी, चंदा भी बहुत कम होता था इसलिए ऑर्केस्ट्रा , फिल्म , मिमिक्री जैसे कार्यक्रम नहीं होते थे लेकिन हम बच्चों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर प्रदान करने हेतु दो दिनों का सांस्कृतिक कार्यक्रम अवश्य रखा जाता था । छाया, माया, मेरी बहन सीमा, शंगर्पवार जी की बिटिया शुभा और प्रमोद भोयर सहित हम बच्चों की सांस्कृतिक टीम डांस, नाटक, गीत, कविता जैसे कार्यक्रमों की रिहर्सल में जुट जाती ।

वैसे तो हम लोगों ने बहुत से नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम किये लेकिन एक नाटक मुझे विशेष रूप से याद है इसका नाम था ‘वरवंट्याची खीर’ अर्थात ‘सिलबट्टे की खीर’ । मराठी में पाटा यानि सिल और वरवंटा का अर्थ बट्टा होता है । एक तरह से इसे ‘बट्टे की खीर’ भी कह सकते हैं इस नाटक में मैंने मुसाफिर की और माया ने माई की भूमिका का निर्वाह किया था । इस नाटक का कथानक बड़ा मज़ेदार था ।

एक मुसफ़िर भटकता हुआ एक एक गाँव में पहुँच जाता है । उन दिनों यात्री पैदल ही यात्राये करते थे । शाम होती है तो वह रात बिताने के लिए कोई ठिकाना ढूँढता है । संयोग से उसे गाँव की सीमा पर ही एक बुढ़िया का घर दिखाई देता है । बुढिया उसे रात बिताने के लिए अपनी झोपडी में आसरा दे देती है ।

बुढिया तो भोजन कर चुकी होती है लेकिन आतिथेय के नाते उससे पूछती है “तुम कुछ नहीं खाओगे ?“ मुसाफ़िर रुखा सा जवाब देता है “मैं किसी के यहाँ का कुछ नहीं खाता । आपने मुझे सहारा दिया इतना काफी है । “ लेकिन वृद्धा का मन नहीं मानता । वह ज़ोर देती है तो मुसाफिर कहता है “ अच्छा माई ऐसा करो चूल्हे पर एक बर्तन में पानी उबलने रख दो ।“

फिर वह थैले में से एक बट्टा निकालता है और वृद्धा से कहता है “इसे भी पानी में डाल दो । “ बुढिया पूछती है “ इससे क्या होगा ? यह तो पत्थर है । “ वह कहता है “माई, इसे ऐसा वैसा पत्थर न समझो यह चमत्कारी पत्थर है, इसीसे खीर बनेगी ।“

बहुत देर तक पानी उबलने के बाद भी जब कुछ नहीं होता तो वृद्धा चिंतित हो जाती है । वह कहती है “बेटा, इसमें तो कुछ नहीं हो रहा है ।“ वह कहता है “माई लगता है कहीं कुछ गड़बड़ हो गई है । ऐसा करो इसमें थोड़ा दूध डाल दो ।“ वृद्धा दूध डाल देती है । उसके बाद भी कुछ नहीं होता तो कहता है “माई कुछ तो गड़बड़ अवश्य है इसका जादू काम नहीं कर रहा है, ऐसा करो थोड़ा चावल डाल दो ।“ फिर वह कुछ देर बाद वह माई को फुसलाकर चीनी, काजू, किशमिश भी डलवा लेता है । खीर पक जाने के बाद वह बर्तन से बट्टा निकाल लेता है और उसे धो पोछ कर थैले में रख देता है । फिर चटखारे लेते हुए ख़ुद खीर खाता है और माई से कहता है “ माई तुम भी चखो , देखो इस चमत्कारी बट्टे की खीर कितनी स्वादिष्ट बनी है ।“

कभी कभी लगता है हम देशवासियों की हालत उस सीधी सादी बुढिया जैसी हो गई है और हमारे पालनहार उस चालाक मुसाफिर जैसे हो गए हैं । सारे के सारे योजनाओं का सिल और बट्टा लिए घूम रहे हैं और हमारे दिए गए टैक्स के पैसों से, हमारे श्रम से अर्जित धन और खेतों में उपजाए धान्य की वज़ह से बनी सुख सुविधाओं की खीर का उपभोग कर रहे हैं । हम उनकी इस चालाकी को उनका चमत्कार समझ कर ही प्रसन्न हैं।

शरद कोकास 

24 अप्रैल 2026

24.बेटा बात कर नहीं वे बेटावदकर हैं

रहाटे ,नईम और मैं  
बचपन के भूगोल में अपना मोहल्ला या पास पड़ोस वहीं तक होता था जहाँ तक हमारे नंगे पांवों की पहुँच होती थी । नगर पालिका द्वारा निर्धारित सीमा से इसका कोई लेना देना नहीं होता था । सीमाएँ भी केवल ज़मीन पर बनाई जा सकती थीं, मित्रता की ज़मीन पर अतीत वर्तमान और भविष्य किसी भी काल में कोई सीमा रेखा नहीं खींची जा सकती थी । दोस्तों के मकानों में कमरों की आतंरिक सज्जा अलग अलग होती थी लेकिन लोगों के अंतःकरण एक होते थे । वहाँ हमारी माँ जैसी एक माँ होती थी और पिता जैसे एक पिता , दोस्त के भाई बहन यानि अपने भाई बहन । यहाँ तक कि उनके मामा चाचा बुआ के साथ भी वही रिश्ता ।

शरद प्रमोद का यवतमाल का घर 

कुछ वर्षों पश्चात शरद और प्रमोद के पिताजी का तबादला यवतमाल हो गया था । कुछ दिनों तक तो उनकी ख़बर मिलती रही फिर मैं बाहर पढने चला गया और उनसे संपर्क टूट गया । लेकिन शीघ्र ही उनसे फिर मुलाकात हुई और यह दोस्ती का सिलसिला अब तक जारी है । शरद एयर फ़ोर्स में लांस नायक का कार्यकाल पूरा करने के बाद यांत्रिकी के व्याख्याता हो गए और प्रमोद यवतमाल के कॉलेज में सिविल इंजिनीअरिंग के व्याख्याता हो गए । वर्तमान में वे दोनों अपनी चौरासी वर्षीय माताजी, और परिवार के साथ यवतमाल में निवास कर रहे हैं ।

भंडारा का हमारा यह मोहल्ला जिसे हम अपने नन्हे पांवों से रोज़ ही नापते थे कुछ और आगे तक था । भोयर काका के बाद वाले ब्लॉक में देशमुख रहते थे । फिर उसी लाइन में आगे के मकानों में बम्बावाले, जोगलेकर और भी बहुत से लोग ৷ वहीं पर एक परिवार रहता था माँ उनका नाम ‘बेटा बात कर’ बताती थी । मैंने एक दिन माँ से पूछा “यह कैसा नाम है?” तो माँ ने कहा “यह उनका सरनेम है ।“ मुझे कई दिनों तक समझ में नहीं आया कि ऐसा सरनेम कैसे हो सकता है बाद में किसी ने बताया कि उनका सरनेम ‘बेटा बात कर’ नहीं बल्कि ‘बेटावदकर’ है , अर्थात वे बेटावद गाँव के रहने वाले हैं । महाराष्ट्र में अनेक सरनेम ऐसे ही बनते हैं जैसे
लता मंगेशकर 

तेंदूल गाँव के रहने वाले तेंदुलकर, मंगेशी गाँव के मंगेशकर, उज्जैन के उज्जैनकर, खरगोन के खरगोनकर अम्बावड़े गाँव के आंबेडकर ।

मैंने मराठी उपनामों की जब खोज की तो मुझे अनेक तरह के रोचक सरनेम पता चले । यह सरनेम अजीब से लगते हैं लेकिन तय है कि कहीं न कहीं से इनका उद्भव हुआ ही होगा । इनकी उत्पत्ति के बारे में जानना बहुत रोचक है । गाँव के नाम पर सरनेम कैसे होते हैं यह तो हमने देखा । अब कुछ सरनेम प्राणियों के नाम पर देखें, जैसे सुअर के नाम पर डुकरे, चींटी के नाम पर मुंगी, बिल्ली के नाम पर मांजरेकर,कौवे के नाम पर कावले, बन्दर के नाम पर माकडे । कोल्हिया या सियार के नाम पर कोल्हे या लांडगे, गधे के नाम पर गाढवे , गाय जैसे मुँह वाले गायतोंडे और गायों के मालिक गायधनी, गोस्वामी, गोसावी और गोसाई । कुछ सरनेम शिकारियों जैसे होते हैं जिन्होंने बाघ मारा वे वाघमारे, जिन्होंने बाघ पकड़ा वे वाघधरे , फिर हत्तीमारे, तीतरमारे आदि भी हैं । संभव है इनके पूर्वजों ने इन प्राणियों का शिकार किया हो अथवा यह प्राणी अथवा वनस्पति इनके प्राचीन कबीले या कुनबे के टोटम या गण चिन्ह रहे हों ।

महाराष्ट्र में रंगों के नाम पर भी अनेक सरनेम मिलते हैं जैसे काले, गोरे,पिवले,हिरवे,निले आदि । वहीं धातुओं के नाम पर सरनेम हैं पितले, ताम्बे, लोखंडे,सोने,चांदे आदि । कुछ सरनेम शारीरिक स्थितियों पर भी होते हैं जैसे एकबोटे यानि एक ऊँगली वाले , खोकले यानि खांसने वाले,बोबड़े अर्थात जिनके दांत न हों , पोट दुखे जिनका पेट दुखता हो, पोटफाड़े बाप रे.. पेट फाड़ने वाले या बारह हाथ वाले बाराहाते और कानफाड़े,नाकतोड़े और डोईफोड़े जैसे हिंसक सरनेम भी ।

फिर हगे होते हैं तो चाटे भी, ढगे भी होते हैं और फुगे भी । संतानों की संख्या पर अष्टपुत्रे और दशपुत्रे या पाँच लड़कों वाले पाचपोरे । कुछ खरे होते हैं तो कुछ खोटे । मीठा बोलने वाले गोडबोले या गोडे तथा कडवा बोलने वाले कडू । करमरकर को हम लोग अंग्रेजी में बोलते थे ‘डू डाय डू’ । खाने की वस्तुओं पर भी कई सरनेम होते हैं जैसे दहीवड़े, भाजीपाले, खोबरे,साखरे आदि । अब कुछ खाते हैं तो कुछ नखाते हैं । कुछ लेले है तो कुछ नेने यानि ले जा ।

रुई के व्यवसाय वाले कापसे या रुइकर कहलाये और कम्बल वाले काम्बले । पेशवा के यहाँ विभिन्न पदों पर काम करने वाले अर्जनवीस,फड़नवीस,महाजन,राजे,कुलकर्णी,पाटील,पूजा करने वाले पुजारी, कपड़ा सिलने वाले शिम्पी और सुनार यानि सोनार, जौहरी और रत्नपारखी, बांस का काम वाले बंसोड, लकड़ी का काम करने वाले सुतार , दूध बेचने वाले गवली, बगीचे वाले माली और बर्तन बनने वाले मतकरी, भाला चलाने वाले भालधरे या भालेराव, ठेकेदार यानि मुकादम आदि । इनके अलावा सूबेदार है, देशपांडे और देशमुख हैं। उसी तरह बुद्धिमान शहाणे या सहस्त्रबुद्धे हो गए, स्टेनोग्राफर टिपनिस हुए और वेद पढ़ने वाले वेदपाठक ।
यह मजेदार जानकारी आपको कैसी लगी जरूर बताईएगा 

आपका शरद कोकास 


23.हाफ कैंची से लेकर फुल कैंची तक –भाग दो

फिल्म मंज़िल मे अमिताभ मौसमी 
बरखा की रिमझिम फुहारें इस देह को भिगोती हैं, बचपन में पहली बार भीगने का बिम्ब अवचेतन में उभरता है, गले के स्वरयंत्र के तार झनझनाने लगते हैं, होठ हारमोनियम की धौंकनी की तरह हिलने लगते हैं , जिव्हा तालू से ताल देती है, दांतों के ड्रम बजने लगते हैं और फेफड़ों से निकली हवा स्वांस नली के सेक्सोफोन से बाहर आने लगती है ৷ हवा के अणुओं में एक ऑर्केस्ट्रा बजने लगता है और कानों के परदे से टकराती है एक आवाज़.... रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन ৷

फिल्म मंज़िल का अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी पर फिल्माया यह गीत हम सहज रूप से गीत गुनगुनाते हैं लेकिन क्या कभी ख्याल आता है कि गायन की इस कला तक पहुँचने के लिए हमारे पुरखों ने कितनी लम्बी यात्रा की है ৷ पहली पहली बार कोई भी काम करते हुए कभी भी हमारे मन में यह ख्याल नहीं आता कि इसे पहली बार किसने किया होगा ?

कार्ल वान ड्राइस

बचपन में पहली बार जब मैंने साइकिल का हैंडल पकड़कर उसके पायडल पर पांव रखा था तो मुझे भी यह ख्याल कहाँ आया था कि पहली बार साईकिल किस इंसान ने चलाई होगी या साइकिल का आविष्कार किसने किया होगा ৷ बरसों बाद पता चला कि वह एक फारेस्ट ऑफिसर कार्ल वान ड्राइस था जो सन अठारह सौ सत्रह में जर्मनी के जंगलों में काम करता था ৷ जंगल के भीतर दूर दूर तक जाने के लिए उसके पांव नाकाफ़ी थे इसलिए उसे एक ऐसी सवारी की आवश्यकता थी जो उसे तुरंत उन घने पेड़ों और झाड़ियों के बीच से अपने गंतव्य तक पहुँचा सके ৷

फिर जाने कितने असफल प्रयोगों के बाद, जाने कितने कलपुर्जे बनाने और बदलने के बाद जर्मनी के एक जंगल अधिकारी ने आखिर दुनिया की पहली साइकिल बना ही ली थी ৷ कई बार गिरने पड़ने के बाद आखिर वह साइकिल चलने में भी सफल हो गया था ৷ सीखने में मैं उसका वंशज था । उम्र के शुरुआती वर्षों में साइकिल चलाने का यह हुनर मुझमे पैदा करने का श्रेय मैं अपने दो मित्रों शरद और प्रमोद भोयर को देता हूँ ৷

भोयर काका इसी घर मे आए थे  

शरद और प्रमोद उर्फ़ प्रवीण के पिता श्री वामन पुंडलीक भोयर की पोस्टिंग भंडारा के निकट बेला स्थित बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में हुई थी ৷ बाबूजी भी उसी कॉलेज में थे । बाबूजी ने उन्हें अपने ही पड़ोस में एक किराए का मकान दिलवा दिया ৷ यह मकान जोगीतलाव में खुलने वाली गली के बाद वाली चाल में दूसरे नंबर पर था ৷ वे बाबूजी के मित्र थे इसलिए हम उन्हें भोयर काका कहने लगे । उनके दोनों बेटे शरद और प्रमोद से मेरी मित्रता प्रारंभ हुई और यह मित्रता भोयर काका के भंडारा से तबादला हो जाने के बाद भी जारी रही ।

हमारी दोस्ती की शुरुआत बरसात की उन शामों में हुई जब ज़मीन थोड़ी नर्म हो जाती है और लोहे का लम्बा सूजा गाड़ कर खेलने वाला खेल शुरू हो जाता है । घर के भीतर जाने वाली पायरी और बाहरी दीवार के बीच वाले कोने में हमारा कंचे का अड्डा हुआ करता था । आँगन में घेरा बनाकर भौरा खेलना भी हमारा प्रिय खेल था । भौरे में लोहे की नोक लगाने के लिए हम लोग लोहार के पास जाया करते थे और गाहे बगाहे उस नोक को फर्शी पर घिस घिस कर धार दिया करते थे ताकि प्रतिद्वंद्वी का लकड़ी का भौरा एक चोट में ही तोडा जा सके ।


शरद के घर का पिछला दरवाज़ा जोगीतलाव के मैदान में खुलता था । वह हम लोगों के लिए खेल का एक विस्तृत मैदान था । जब बारिश होती तो हम लोग सूजे वाला खेल खेलते और बारिश बंद होने पर गिल्ली डंडा । फिर धीरे धीरे और भी दोस्त आने लगे और हमारा यह खेल क्रिकेट में बदल गया । क्रिकेट यह गिल्ली डंडे के खेल का अपडेटेड वर्शन था । मैदान में अपनी आरक्षित पिच पर हम लोग प्रतिदिन देर शाम तक क्रिकेट खेला करते थे ৷ हमारी टीम में शरद और प्रमोद के एक मामा भी रहते थे जिन्हें हम केशव मामा कहते थे और वे हमारे हम उम्र थे । उनके अलावा शंकर सव्वालाखे और नरेश तिवारी भी हमारी टीम के सदस्य थे । नरेश उर्फ़ गुल्लू शरद के घर के सामने ही एक झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में रहता था ।

जब हमारा खेल शुरू होता तो घड़ियों के कांटे हमारे लिए रुक जाते । स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से बाहर आकर हमें डराने वाले अभ्यास के भयावह दैत्य मैदान के बाहर ही खड़े रहते । फिर जैसे ही अँधेरा होने लगता शरद व प्रमोद के घर में सांध्य दीप जलते दिखाई देने । इससे पहले कि काकू के डाँटने की आवाज़ हम तक पहुँचे हम लोग अपने घरेलू जुगाड़ से बनाये स्टम्प, गेंद और बल्ला उठाकर घर लौट आते ৷ भोयर काका और काकू की आवाज़ दूर तक मेरा पीछा करती .. जय देव जय देव जय आनंद रूपा ..जय देव जय देव जय मंगल मूर्ती .. दर्शन मात्रे मनोकामना पूर्ति.. ।


इसे कहते हैं कैंची साइकिल 

शरद और प्रमोद के साथ किया जाने वाला सबसे एडवेंचरस काम था साइकिल चलाना सीखना । यह काम हम लोग पिताओं की छुट्टी के दिन या उनके नौकरी से आने के बाद किया करते थे इसलिए कि उन दिनों घर में केवल एक ही साइकिल होती थी। शरद मुझसे पहले साइकिल चलाना सीख गया था । एक दिन उसने मुझे अपने साइकिल थमाई और कहा “उल्टा पांव इस पाइडल पर रखो और दूसरा बीच से निकालकर दूसरे पाइडल पर रखो ।” फिर उसने पीछे कैरियर से साइकिल पकड़ी और कहा “ अब चढ़ जाओ और आधा आधा पाइडल मारो, मैं पकडे हूँ । मैंने पहले ही दिन सफलता पूर्वक यह लेसन पूर्ण कर लिया ।

इस तरह मैं ‘आधी कैंची’ में प्रवीण हो गया । फिर दो दिन आधी कैंची की प्रैक्टिस के बाद उसने मुझे फुल कैंची सिखाई मतलब पूरा पाइडल मार कर साइकिल चलाना। आखिरी लेसन तब मिला जब मैं हैंडल पर नज़र रखने के चक्कर में शरद के घर के सामने वाले बिजली के खम्भे से टकराया “ अरे अरे .. हैंडल पर नहीं ..रोड पर नज़र रखो ।“ बचपन के इस आनंद की कल्पना वही कर सकता है जिसने उस उम्र में साइकिल सीखी हो । सीट पर बैठकर चलाने का समय तो तब आया जब हमारी हाईट साइकिल के बराबर हो गई ৷ जीवन का सफ़र भी साइकिल के सफ़र की तरह होता है । बहुत से लोग सीट पर बैठकर साइकिल चला ही नहीं पाते , उनका कद , उनकी योग्यता और स्थिति सफ़र सिर्फ हाफ़ कैंची से फुल कैंची तक ही रहता है

पीछे शरद सामने प्रमोद माताजी और बहूएं यवतमाल 

यह वे दिन थे जब हम अपनी पतंगों को उड़ाते हुए उनके साथ अपनी खुशियों और उमंगों को भी आसमान तक पहुंचता हुआ देखते थे । लट्टू के साथ हमारा मन भी झूमता था और दूर जाती गेंद के साथ हम दूर जाती दुश्चिंताओं को देखते थे । मैंने साइकिल सिखाने का श्रेय तो शरद को दिया लेकिन इस सवारी के आविष्कार का श्रेय मैं बचपन के उस बालसुलभ अहं और अपनी नासमझी वाली समझ में सभ्यता के बचपन में जन्म लेने वाले उस आदिम मनुष्य को ही देता रहा जिसने पेड़ के गोल तने को लुढ़काकर पहिये का अविष्कार किया था ৷

हम सब आज भी यही करते हैं । विज्ञान के आधार पर हमें आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने हेतु किये गए अविष्कारों का श्रेय वैज्ञानिकों या अविष्कारकों को न देकर हम अपनी गौरवशाली संस्कृति का गुणगान करते हुए उन पौराणिक कथा लेखकों को देते हैं जिन्होंने इसकी कल्पना मात्र की थी ৷ यद्यपि अतीत से लेकर अद्यतन प्रत्येक अविष्कार में प्रत्येक व्यक्ति का योगदान प्रशंसनीय है चाहे वह कल्पना क्यों न हो । यह ठीक उस तरह है जैसे कि हमारे व्यक्तित्व निर्माण में बचपन से लेकर अब तक के हर पल का योगदान है ৷



23 अप्रैल 2026

22 सूनी दोपहरियों की बदमाशियाँ

देशबंधु वार्ड की गली मे हमारा मकान 

यद्यपि पौराणिक पात्रों के नामों पर बच्चों के नाम तो अभी भी रखे जाते हैं लेकिन इन पात्रों में भी ऐसे अनेक नाम हैं जो कहीं सुनने को नहीं मिलते जैसे रावण, कंस या दुर्योधन ৷ लड़कियों में शूर्पणखा,ताड़का या हिडिम्बा यह नाम मिलना तो असम्भव है ৷ द्रौपदी नाम भी बहुत कम मिलता है ৷

ऐसा ही कुछ था उस बच्चे का नाम  ৷ वह रामकिशन के घर के बाद वाली गली में रहता था ৷ उसके घर में एक स्त्री थी जिसका रंग साँवला था, इतना साँवला कि माँ उसे काली कहती थी । माँ पड़ोस की सभी स्त्रियों से बात करती थी लेकिन उससे नहीं ৷ वह स्त्री अक्सर हमारे घर के सामने से निकलती थी और कनखियों से हमारे घर की ओर देख लेती थी ৷ माँ अगर दरवाज़े पर खड़ी हो तब भी कभी वह उनसे आँख नहीं मिलाती थी ৷

मैंने एक दिन माँ से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया “ तुम्हारे पहले जन्मदिन पर हमने तुम्हे सोने की एक पतली सी चैन पहनाई थी । जब तुम आंगन में खेल रहे थे तब यह स्त्री घर में आई थी और चुपचाप तुम्हारे गले से चैन उतारकर ले गई ৷ फिर जब पुलिस में रिपोर्ट की गई और मोहल्ले वालों को पता चल गया तो वह स्त्री जाने कब घर में आई और चुपचाप वह चैन बगीचे में फेंक कर चली गई । चैन मिल गई तो फिर आगे कोई कार्यवाही नहीं की गई । “
हमारे घर वाली गली 

उस के घर तो मैं वैसे भी कभी नहीं गया लेकिन उसके बाद वाले रमाबाई के घर ज़रूर जाता था । रमाबाई विधवा थी और बर्तन माँजकर अपना गुजारा करती थी । छोटी बहन सीमा जब नन्ही सी थी तो रमा बाई उसका बहुत लाड़ किया करती थी । रमाबाई का एक बेटा था जिसका नाम सुधाकर था । उसे जब महाराष्ट्र राज्य परिवहन यानि एस टी में कंडक्टर की नौकरी मिल गई थी तो रमाबाई ने बर्तन माँजना बन्द कर दिया । इनका सरनेम अम्बाडारे था ।  

रमाबाई के घर के सामने एक बड़े से अहाते वाला मकान था जिनके यहाँ गायें थी और हमारे दूधवाले के न आने पर मैं उसके यहाँ से दस पैसे में एक गिलास का दूध लाया करता था । रमाबाई के मकान से लगा हुआ भरतलाल का मकान था ৷ भरतलाल जी वैसे तो अच्छे आदमी थे लेकिन कभी कभी तरंग में रहते तो पूरे मोहल्ले में उधम मचा देते थे । लेकिन कोकास गुरूजी का वे बहुत सम्मान करते थे इसलिए कि उन्हें शांत भी बाबूजी ही करते थे ৷ उनके बेटे का नाम सुभाष था । उसके घर के सामने उन्ही के भाई नागपुरे का मकान था ।

नागपुरे का मकान 

 यह तमाम बस्ती गरीबों की बस्ती थी जिनके मकान की   दीवारें मिट्टी की थीं और उनके ज़ख्मों की तरह रिसती   रहती थीं ৷ ओलावृष्टि से अथवा बंदरों के प्रकोप से अक्सर   खपरे टूट जाते थे और मूसलाधार बरसात के दिनों में घर के  भीतर पानी टपकता रहता था ৷ इतनी आय किसी की   नहीं थी कि बार बार मरम्मत करवा सकें ৷ अभाव इनके घर  में सदा अपना डेरा डाले रहते थे और किसी की आर्थिक क्षमता इतनी नहीं थी कि अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकें । गली के इन दोनों अंतिम मकानों के बाद रिंग रोड थी ।

हमारी गली की पूर्व से होने वाली शुरुआत में घर से निकलते ही बाईं ओर डाकरे का बाड़ा आता था लेकिन उसका दरवाज़ा गली में न खुल कर मुख्य सड़क पर खुलता था । गली से बाहर निकलो तो दाहिनी ओर यह सड़क आगे बाज़ार तक जाती थी ৷ बाईं ओर कुछ दूर जाकर यही सड़क रिंग रोड से मिल जाती थी जहाँ त्रिकोण का एक कोण बनता था । गली के ठीक सामने सड़के के दूसरी ओर एक बिजली का खम्भा था जिसकी बाईं ओर मटन वाले भेदरे काका रहते थे, उनके दाईं ओर येवले, फिर सामने दादा हलमारे जिनके घर के सामने सीमेंट की दो बेंचें बनी थी ।

भैयालाल पटले का मकान 

डाकरे के बाड़े में अनेक किरायेदार रहते थे ৷ आगे बढ़ने पर एक ऊंची इमारत थी ৷ यह कांग्रेस के नेता भैयालाल पटले का अस्थायी आवास था ৷ पटले जी बाद में जिला पंचायत के अध्यक्ष बने । उस घर में जाने के लिये हमारे घर के पीछे से भी एक रास्ता था । जब मैं नौ-दस साल का था तब कभी कभार शौकिया तौर पर उनके यहाँ चाय बनाने के लिए जाया करता था । मैने वहीं उनके रसोइये से चाय बनाना सीखा । मेहनताने में मुझे एक कप चाय मिला करती थी, बाल्यावस्था में यह मेरा प्रथम पारिश्रमिक था ।

डाकरे और पटले के मकान के बीच एक झोपड़ीनुमा मकान था जिसके पिछवाड़े में हम लोगों के घर के लिविंग रूम की खिड़की खुलती थी । पटले के घर के सामने जाम्भुलकर का मकान था, जहाँ लीला रहती थी । लीला हम सब बच्चों से बड़ी थी और हम सब की बॉस थी । रंगोली बनाना, भुलाबाई के गाने गाना और लड़कियों वाले तमाम खेल जैसे लघोरी यानि कवेलू के टुकड़े एक के ऊपर एक रखकर उन पर गेंद से निशाना लगाना, नदी पहाड़, डबा आइस पाइस , बिल्लस यानि बिट्टी,सागर गोटी, पत्थर के टुकड़ों या चूड़ी उछालकर खेलने वाला खेल , पुराने कपड़े का सोटा बनाकर वृत में बैठे बच्चों की पीठ पर मरने वाला खेल ‘आईचा पत्र हरवला’ , आंखमिचौली यानि आंधळी कोशिंबीर जैसे अनेक खेल मैंने लीला की मंडली में ही सीखे थे ৷ कपड़े की गुड़िया व गुड्डे वाला खेल नानी की नातिन अन्नू के साथ खेलता था ৷

लीला ताई 

लीला के मकान की दाहिनी ओर किराना वाले नन्दू काका यानि नंदलाल बैस ने अपना मकान बनाया था जिस पर ‘जलाराम निवास‘ लिखा था । नंदू काका स्वयं अपने खामतालाव वाले मकान में रहा करते थे और यह मकान उन्होंने किराये पर दे दिया था ৷ इस मकान में बाद में श्री महेश पाण्डेय रहने आये थे वे स्थानीय जे.एम.पटेल कॉलेज में प्रोफेसर थे और उनकी दो नन्ही नन्ही बेटियाँ थीं । महेश पाण्डेय के भाई मधुप पाण्डेय नागपुर में रहते थे और मंचों के सुप्रसिद्ध कवि थे ।

इस मकान के दायीं ओर एक सँकरी सी गली थी जो बमुश्किल तीस फिट लम्बी थी ৷ यह गली जोगीतालाव के मैदान में खुलती थी । इस मैदान में जकातदार कन्या शाला थी जिसके सामने से एक रास्ता अन्धविद्यालय और महिला समाज बालक मन्दिर की ओर जाता था । अन्धविद्यालय के सामने एक टेकड़ी थी जिसके खत्म होते ही मनरो हाइस्कूल था । जकातदार कन्या शाला की बाईं ओर बी. एड. कॉलेज था ৷ बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज बेला से सन सडसठ में बाबूजी इसी बी एड कॉलेज में प्रोफ़ेसर बनकर आ गए थे । इस सँकरी गली के ठीक सामने सड़क की दूसरी ओर पटले के घर की बाईं ओर एक गली और थी जिसमें हमारे मकान का पीछे का दरवाज़ा खुलता था ।

जकातदार कन्या शाला 

 जोगी तलाव की ओर जाने वाली इस सँकरी गली के बाद कुछ   मकान और थे । पहला मकान एक बाड़ेनुमा या चालनुमा   मकान था, जिसमें अनेक किरायेदार रहा करते थे । पहले   नबर के ब्लॉक में हमेशा नये लोग आते थे । एक बार इस   ब्लॉक में एक नया जोड़ा रहने के लिये आया । इस ब्लॉक की   एक खिड़की संकरी गली में खुलती थी ৷ मोहल्ले के बड़ी उम्र   के बदमाश लड़के सूनी दोपहरियों में उस खिड़की की दरारों   से ताक झाँक किया करते थे । एक दिन उचक उचक कर   दरार से झाँककर देखने के प्रयास में एक लड़का हड़बड़ाहट   में खिड़की से टकरा गया । शोर मचा तो उस घर में रहने वाले   सज्जन घर से बाहर आये और लड़कों को गालियाँ देनी शुरू  कर दी । कुछ समझ आने के बाद अपने समवयस्कों से उनकी बदमाशियों के किस्से सुनते हुए मुझे मालूम हुआ कि वे झाँककर क्या देखते थे ৷

अभी के बच्चों को मोबाइल में गेम खेलते हुए देखता हूँ तो याद आता है हम लोग स्कूल से आने के बाद घर में टिकते ही नहीं थे बस्ता पटक कर सीधे जोगीतालाव के मैदान निकल जाते और गिल्ली डंडा , भौरा , घुप्पस ( जमीन में लोहे की डंडी गाड़ने वाला खेल ) और एक लकड़ी उछलने वाला खेल खेलते थे

पटले के घर के सामने जाम्भुलकर का मकान था, जहाँ लीला रहती थी । लीला हम सब बच्चों से बड़ी थी और हम सब की बॉस थी । लड़कियों वाले सारे खेल मैंने लीला ताई से ही सीखे |

टायर के खेल 

इन खेलों में रंगोली बनाना, भुलाबाई के गाने गाना और लड़कियों वाले तमाम खेल जैसे लघोरी यानि कवेलू के टुकड़े एक के ऊपर एक रखकर उन पर गेंद से निशाना लगाना, नदी पहाड़, डबा आइस पाइस , बिल्लस यानि बिट्टी,सागर गोटी, पत्थर के टुकड़ों या चूड़ी उछालकर खेलने वाला खेल , पुराने कपड़े का सोटा बनाकर वृत में बैठे बच्चों की पीठ पर मरने वाला खेल ‘आईचा पत्र हरवला’ , आंखमिचौली यानि आंधळी कोशिंबीर जैसे अनेक खेल मैंने लीला की मंडली में ही सीखे थे ৷ कपड़े की गुड़िया व गुड्डे वाला खेल नानी की नातिन अन्नू के साथ खेलता था ৷

आप लोगों ने बचपन में इनमे से कौन से खेल खेले हैं ?

( पुस्तक " बैतूल से भंडारा : एक जन इतिहास से एक अंश 

21. ठाकरे किराना में चंदामामा घराना


शहर की गलियों से गुज़रते हुए मुझे अक्सर दुष्यंत का वह शेर याद आता है जिसमे वे कहते हैं ..”शहर की भीड़ भाड़ से बचकर, तू गली से निकल रही होगी ৷ “ भंडारा शहर इतना बड़ा शहर नहीं था कि उसकी सड़कों पर भीड़ भाड़ रहे फिर गलियों में तो आवाजाही बहुत ही कम थी ৷ जिस गली में हमारा मकान था वह गली दो मुख्य सड़कों को जोड़ती थी, एक शहर के भीतर की सड़क और एक रिंग रोड । यह भीतर की सड़क भी आगे जाकर रिंग रोड में मिल जाती थी । इस तरह हमारा मोहल्ला एक त्रिकोण के भीतर आ जाता था । एक भुजा हमारी गली और दोनों सड़कें दो भुजाएँ ।

हमारी गली में अधिकांश निम्नमध्यवर्गीय लोग ही रहा करते थे । उनमें कुछ घर लोधी जाति के लोगों के थे जिनके उपनाम ठाकरे, माहुले और सव्वालाखे थे और उनकी भाषा छत्तीसगढ़ी से बहुत कुछ मिलती जुलती थी । घर के सामने एक बाड़ी थी जहाँ आगे चलकर मकान के दाहिनी ओर रहने वाले पाण्डुरंग ठाकरे के काका भोजराम ठाकरे ने मकान बनाया । जैसा कि गांवों के मकानों में होता है मकान बनने से पूर्व वहाँ एक बाड़ी थी जिसमे मचान बनाकर कद्दू की बेल लगाईं गई थी । उसके बगल में एक टीला था जिस पर पांडुरंग ठाकरे की गाय बन्धती थी । पांडुरंग ठाकरे की अपने ही घर में एक छोटे सी कम पूंजी में लगाई गई किराने की दुकान थी ৷ और

बचपन के उन दिनों में राजाओं महाराजाओं और परियों की कहानियाँ पढ़ने का शौक तो होता था लेकिन पत्रिकाएँ खरीदने के लिए जेब में पैसे नहीं होते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे की दुकान में आई रद्दी में मैं पत्रिकाएँ खोजता था और मुझे अचानक बच्चों की मशहूर पत्रिका चंदामामा दिख जाती थी ৷ उनके बरामदे में लकड़ी का एक झूला लगा था जिस पर बैठकर मैं ‘ चंदामामा ‘ पत्रिका की कहानियाँ पढ़ा करता था । उस समय बच्चों की पत्रिका चंदामामा बड़ी मशहूर थी ৷ इसमें राजाओं की कहानियाँ होती थीं, कुछ नीति परक, कुछ बोध कथाएँ यह पत्रिका दक्षिण से निकलती थी और उस समय तमिल के अलावा कई अन्य भाषाओं में आती थी ৷ इस पत्रिका में कलाकारों द्वारा कहानियों पर बनाये चित्र होते थे ৷ मज़े की बात यह कि कहानी भले ही उत्तर भारत के किसी नगर के बारे में हो वहाँ का राजा दक्षिण के राजाओं की तरह वेशभूषा और आभूषण धारण किये होता था ৷ आखिर चित्रकार तो दक्षिण के ही होते थे ।

चंदामामा के अलावा बाल पत्रिकाओं के घराने में पराग, नंदन, चम्पक जैसी पत्रिकाएँ भी प्रारंभ हो चुकी थीं कहीं कहीं लोटपोट पत्रिका भी मिल जाती थी ৷ यह पत्रिकाएँ नियमित पढ़ने को तो मिलती नहीं थी कभी कभार बैतूल आते जाते स्टेशन पर बाबूजी ख़रीद कर दे देते थे वर्ना ठाकरे किराना में आई रद्दी में तो मिल ही जाती थीं ৷

पांडुरंग ठाकरे थोड़ा ऊँचा सुनते थे और उनकी माँ उन्हें ‘बहरा‘ कहकर बुलाती थी सो उनकी किराने की दुकान भी ‘ किराना स्टोर्स ‘ की बजाय ‘‘बहरे की दुकान “ के नाम से प्रसिद्ध थी । पांडुरंग ठाकरे जितने ग़रीब थे उतने ही ग़रीब उनके ग्राहक भी थे, इसलिए उनकी दुकान बमुश्किल चल पाती थी । जब घर में दुकान नहीं चली तो एक दिन उन्होंने नुक्कड़ के खाली पड़े एक मकान में ,जिसे हम लोग बोम्बल्या भागवत का मकान कहते थे, की छपरी में अपनी दुकान लगा ली जिसके एक पटिये पर मैंने पिपरमेंट की मीठी गोली का मेहनताना लेकर चाक से लिख दिया था ‘ ठाकरे किराना स्टोर्स ‘ । लेकिन वहाँ भी उनकी दुकान नहीं चली तो वे अपनी दुकान समेट कर वापस घर आ गये ।

उनकी दुकान के बन्द होने का सबसे बड़ा कारण पास ही एक बड़ी दुकान का होना था जिसे ‘भाटया की दुकान’ कहते थे ৷ पांडुरंग ठाकरे के पास इतनी पूंजी नहीं थी कि वे अपनी दुकान में अधिक सामान रख सकते ৷ जिसे उनके यहाँ वांछित सामान नहीं मिलता वह भाटया की दुकान चला जाता और फिर सारा सामान वहीं से खरीदने लगता ৷ धीरे धीरे इनके सभी ग्राहक वहाँ चले गए ৷ पूंजी का खेल किस तरह होता है यह बात मुझे उन्ही दिनों समझ में आ गई थी ৷ आज देश में मल्टी नेशनल कम्पनियाँ और माल्स किस तरह छोटे छोटे व्यवसायियों का धंधा चौपट कर रहे हैं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किस तरह इन छोटे व्यापारियों को उजाड़ रहा है इस बात को इस उदाहरण से भलीभांति समझा जा सकता है ৷

पांडुरंग ठाकरे के चार बच्चे थे अशोक, अरुण, मनोहर और मंगला । बाद में उनकी एक और बेटी हुई जो बहुत गोरी थी और जिसके बाल भूरे थे इस वज़ह से सभी उसे भूरी कहकर बुलाते थे । उनके घर में रहनेवाली एक वृद्धा के बारे में दबी जुबान में कहा जाता था कि वह जादू-टोना करती थी , हालाँकि प्रकट में ऐसा कहने का साहस किसी में नहीं था ৷ हम लोग ऐसे किसी भी अन्धविश्वास को नहीं मानते थे बल्कि ऐसा कहने वालों का विरोध भी करते थे । लेकिन गाँवों में यह अन्धविश्वास बहुत अधिक था ৷ छत्तीसगढ़ आने के बाद मैंने देखा कि यहाँ के गांवों में इतना अंधविश्वास है कि गाँव में कोई बीमारी फ़ैलने या किसी बच्चे की मृत्यु होने पर ऐसी ही किसी स्त्री को ‘टोनही’ करार दे दिया जाता है और उसे प्रताड़ित किया जाता है ৷ मैंने बाद में स्त्री की इस पीड़ा पर ‘डायन’ कविता लिखी थी ৷ उसमे रात्रि के अंतिम पहर में नग्नावस्था में नदी का जल लेने गई स्त्री का चित्रण करते हुए मेरे अवचेतन में बचपन का यही चित्र था ৷

बचपन में हम दोस्तों को उनके वर्ग या उनकी हैसियत से नहीं बल्कि उनके अपने जैसे बच्चे होने की वज़ह से चुनते हैं ৷ पांडुरंग़ ठाकरे का तीसरे नम्बर का बेटा मनोहर लगभग मेरे बराबर का था । उससे बड़ा अरुण थोड़ा मेन्टली रिटार्डेड था और हमेशा उसकी लार बहा करती थी, उसके बुद्धू होने के कारण सब उसे ‘ बुद्ध्या ‘ कह कर बुलाते थे । मेरी गली में मकान मालकिन पार्वती बाई चव्हाण की नातिन अन्नू, सामने वाली बाड़ी की बाईं ओर रहने वाले उरकुडा माहुले के बच्चे थे रामकिशन, राधाकिशन और प्रमिला यही सब मेरे बचपन के साथी थे । रामकिशन की एक निराश्रित मौसी भी थी जिसे सब मिलखी मौसी कहते थे । वह किसी स्किन डिसऑर्डर के कारण अंग्रेज़ों की तरह गोरी दिखाई देने लगी थी ৷ इतनी गोरी कि बड़ा होने के बाद मैं उसे ‘मिल्की मौसी ’ कहकर बुलाने लगा था ।

शरद कोकास 

22 अप्रैल 2026

20.भूख के पक्ष में आदिम बहस



देशबंधु वार्ड का यह कच्चा मकान ग.भा.पार्वतीबाई के साम्राज्य का एक हिस्सा था उनका खेत और एक मकान भंडारा से बीस किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे के निकट बसे गड़ेगाँव में था बड़े बेटे ठाकुर जगमोहन सिंह नागपुर में रहा करते थे उनके एक बेटा और दो बेटियाँ थीं जिनमें एक का नाम शीला था माँ का यही नाम होने के कारण वह नाम मुझे याद है । पार्वतीबाई अर्थात नानी के छोटे बेटे विजयमोहन सिंह गोंदिया में बिजली विभाग में नौकरी किया करते थे । । विजय काका की पोस्टिंग गोंदिया में थी लेकिन भंडारा ज़िला उनका मुख्यालय था इसलिए वे कभी कभी ऑफिस के काम से भंडारा आ जाते थे बाबूजी को वे अपने बड़े भाई की तरह ही मानते थे, वैसे भी उनके सगे बड़े भाई का नाम जगमोहन था

 विजय काका बिजली विभाग में मीटर रीडर थे उन दिनों बिजली के मीटर के भीतर एक गोल चक्का हुआ करता था जो बिजली का उपयोग करने की स्थिति में तेज़ी से घूमता था अन्यथा स्थिर रहता था एक दिन उन्होंने बाबूजी को मीटर खोलकर घूमने वाले चक्के को रोककर बिजली चोरी करने का तरीका बताया कि आप बिजली का उपयोग भी करते रहें और चक्का भी न घूमे इसमें एक छोटी सी ट्रिक थी जिसमे चक्के को घुमाने वाली लोहे की एक छोटी सी पट्टी को पेंचकस से खोलकर नीचे गिराना होता था जैसे ही पट्टी का संपर्क  चक्के से टूटता चक्का घूमना बंद हो जाता और बिजली का प्रवाह भी निरंतर जारी रहता ज़ाहिर है इससे बिल बहुत कम आता

 वे कहते थे आप इसे महीने भर गिरा कर रखो और जैसे ही विभाग के लोग मीटर रीडिंग करने आयें उसे जोड़ दो ताकि काम भी हो जाये और चोरी पकड़ी भी न जाए यह उनके लिए बहुत सामान्य बात थी लेकिन बाबूजी बिजली चोरी जैसी इस बात के बहुत खिलाफ़ थे उन्होंने कहा “ अधिक बिल देना मुझे मंज़ूर है लेकिन मैं गलत काम नहीं करूँगा मकान मालिक के खुद बिजली विभाग में होने की सुविधा के बावजूद एकाध बार के अलावा उन्होंने इस काम के लिए उन्हें कभी इज़ाज़त नहीं दी । 

 विजय काका जब भी भंडारा आते भोजन हमारे घर में ही करते थे । वैसे तो उनकी माँ पार्वतीबाई वहीं रहती थी लेकिन कभी कभी वे अपने खेतों की देखभाल के लिये या फसल की बुआई और कटाई के समय काफी दिनों के लिये गड़ेगाँव चली जाया करती थीं । उनकी अनुपस्थिति में विजय काका हमारे मेहमान होते । वे लोग शुद्ध शाकाहारी थे । पार्वती बाई ने मकान इसी शर्त पर किराये से दिया था कि वहाँ मांसाहार नहीं होगा । वैसे वे स्वयं बहुत छुआ छूत मानती थीं और बिना नहाये उनकी रसोई की ओर जाने की भी सख्त मनाही थी ।

 

वे जब भंडारा में नहीं होती थीं तब  कभी किसी रविवार को हमारे यहाँ मटन बनता था । माँ शुद्ध शाकाहारी थी और उन्हें मांस की गंध भी पसंद नहीं थी लेकिन बाबूजी बचपन से ही माँसाहारी थे हम बच्चे अपने आदिम पुरखों की भांति पितृ धर्म का निर्वाह कर रहे थे

 

रविवार के इस विशेष दिन हमारे घर में हिन्दुस्तान पकिस्तान की तरह का नज़ारा होता था माँ ने हम लोगों का चूल्हा यानि स्टोव,पकाने और खाने के बर्तन अलग कर दिए थे यही नहीं माँ तेल, मसाले, आलू , हरा धनिया सब कुछ पहले ही निकालकर अलग रख देती थीं मटन खाने के लिए हमारे घर में तामचीनी की पीले रंग की बहुत सुन्दर प्लेटें थीं जिनपर नीले रंग से फूलों की डिज़ाइन बनी थी पकाने से लेकर बर्तन धोने तक का काम बाबूजी के ही ज़िम्मे था

 हालाँकि यह सब करते हुए  हमें समाज से बहिष्कृत किये जाने वाली अनुभूति होती थी लेकिन जीभ के स्वाद के लिए हमें इस टाइप का सारा अपमान सहनीय था माँ अपना खाना पका कर, खुद भोजन कर हम लोगों के लिए पर्याप्त रोटियां थापकर और चावल पकाकर पड़ोसनो से गपशप करने निकल जाती थी उनके गमन के पश्चात तामसिक भोजन पकाने और उसे भक्षण करने का हम लोगों का यह पैशाचिक कृत्य प्रारंभ होता था

 

एक रविवार को गज़ब हो गया मटन पककर तैयार हो चुका था हम भाई बहन अपनी अपनी तामचीनी की प्लेट लिए रोटियों के साथ बोटियां परोसे जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि टीन का वह दरवाज़ा खड़का और बाहर आँगन से आवाज़ आई “ भाभी, खाना खाऊंगा, भूख लगी है ।“  यह विजय काका की आवाज़ थी । बाबूजी पहले तो घबरा गये फिर जैसे ही विजय काका ऊपर अपना आवास देखने गये उन्होंने एक कपड़े से पके पकाये मटन का गर्म बर्तन पकड़ा और पिछले दरवाज़े से निकलकर पड़ोस के भेदरे काका के यहाँ रख आये ।

 फिर माँ को तुरंत पड़ोस से बुलाया गया और इस आपात स्थिति के बारे में उन्हें बताया गया उन्होंने  पंद्रह बीस मिनट में ही आलू की सब्जी बनाकर रख दी फिर हम सब लोगों ने विजय काका के साथ बैठकर रोटी चावल और आलू की सब्ज़ी खाई । विजय काका बार बार आलू की सब्ज़ी सूंघते रहे उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आलू की सब्ज़ी से मटन की गंध कैसे आ सकती है । शाम को उनके जाने के उपरांत ही हम लोगों को  उस मटन का स्वाद चखने का अवसर प्राप्त हुआ । हालाँकि इस बार हम लोग तृप्त नहीं हो पाए इसलिए कि बाबूजी भेदरे काका को बर्तन अपने घर रखने और उनकी इज्ज़त बचने के एवज में आधा मटन  दे आये थे । मटन वैसे भी महंगा होने के कारण हमारे घर में बहुत कम आता था विजय काका को यह बात उनके जीवन काल में कभी पता नहीं चली

 

उस दिन माँ ने शाकाहार मांसाहार हो लेकर चली आ रही शाश्वत बहस में कोई भागीदारी नहीं की न ही बाबूजी ने आदिम समय से चली आ रही मनुष्य की अलग अलग फूड हैबिट्स पर कोई व्याख्यान दिया संसार की विभिन्न सभ्यताओं में उनके देवी देवताओं द्वारा मांस भक्षण किये जाने तथा जिव्हा के स्वाद की पूर्ति हेतु पशुओं की बलि दिए जाने की प्रथा पर भी कोई बात नहीं हुई न शाकाहारी वस्तुओं की गुणवत्ता और विभिन्न प्रकार के मांसों में शामिल खनिज और विटामिनों की उपस्थिति पर कोई भाषण झाड़ा गया

 


13 अप्रैल 2026

19. कवेलुओं को दुलराती डालियाँ


उन दिनों मैं अपनी हमउम्र नन्ही नहीं बच्चियों को फ्रिल वाली फ्रॉक पहने देखता था और सोचता था परियाँ भी ऐसी ही फ्रॉक पहनती होंगी
माँ मुझे रात को कहानी सुनाकर सुला देती थी सुबह जब मैं जागता तो कहानी के कुछ दृश्य ही मुझे याद रहते मुझे ऐसा लगता जैसे रात हवाओं पर सवार होकर कोई परी खिड़की से आई थी और मुझे कोई कहानी सुना गई कुछ बड़े होने के बाद मैंने रंगीन किताबों में उन परियों की तस्वीरें देखीं उनकी फ्राकें बहुत ख़ूबसूरत थीं तस्वीर देखकर कीमत का अंदाज़ लगाना मुश्किल था फिर भी इतना तो समझ में आ ही गया कि वे जो फ्राकें पहने हैं, वे मेरे घर के आसपास रहनेवाली ग़रीब बच्चियों की फ्राकों से बहुत महंगी हैं यह भी मैं जान गया था कि परियाँ सिर्फ किताबों और कहानियों में होती हैं वास्तविकता में नहीं फिर कभी कोई किसी बच्ची को नन्ही परी कहता था तो मुझे हँसी आती थी

 


समझ के सोपान चढ़ते हुए मुझे यह भी समझ में आ गया कि दुनिया में बच्चों को कहानी सुनाने का हक़ सिर्फ़ माताओं को होता है
परियाँ कहानी नहीं सुनातीं बल्कि परियों की कहानियाँ भी माँ ही सुनाती है माँ के पास एक कहानियों का पिटारा था जिसके भीतर  ढेर सारी कहानियाँ थीं, परी और जादूगर की , वीर योद्धाओं की, गाँव के भोले भाले लोगों की और  पौराणिक पात्रों की उन्हीं में एक कहानी यूनान के शक्तिशाली वीर हर्क्यूलिस की कहानी भी थी  

 

एक बार वीर हर्क्यूलिस किसी राजा के आदेश पर सोने के सेब की खोज में निकला । यह सुनहरा सेब यूनान के पश्चिम में एक महासागर के तट पर एक बाग़  में उगा था । वहाँ आकाश पृथ्वी तक झुक आया था लेकिन वीर अटलांटिस उसे अपनी पीठ पर थामकर नीचे पृथ्वी पर गिरने से रोके हुए था । हरक्युलिस ने उससे सेब तोड़ने हेतु निवेदन किया । अटलांटिस ने उसके निवेदन को स्वीकार करते हुए कहा “ ऐसा करो, तो फिर तुम कुछ देर इस आकाश को थामे रहो ” जब तक अटलांटिस सेब तोड़ता हरक्युलिस ने आकाश अपनी पीठ पर थाम  लिया लेकिन  आकाश इतना वज़नी था कि हरक्युलिस घुटनों तक पृथ्वी में धंस गया । फिर उसे सेब मिल गया और वह सेब लेकर राजा के पास चला गया इसी वीर अटलांटिस के नाम पर अटलांटिक  महासागर का नाम पड़ा है

 


मैं रोज़ देखता था, घर के बरामदे का छप्पर भी आकाश की तरह नीचे तक झुक आया था लेकिन लकड़ी की कुछ बल्लियाँ हरक्युलिस की तरह उसे थामे हुए थीं
वहीं एक अमरूद का एक पेड़ भी उग आया था जिसकी डालियों ने छप्पर तक पहुँचने की ज़ुर्रत कर ली थी डर लगता था कहीं वे डालियाँ उस कमज़ोर छप्पर को तोड़ न दें एक दिन मैंने देखा कि वे डालियाँ उन कवेलुओं को बिलकुल भी परेशान नहीं कर रही हैं बल्कि वे उन्हें अपने स्पर्श से दुलरा रही हैं ।

 

ठण्ड के दिनों में ठण्ड बहुत पड़ती थी, फिर भी भंडारा और आसपास के क्षेत्र में  प्रेमचंद की कथा ‘पूस की रात‘ में बताई रातों की तरह ठंडी रातें नहीं होती थीं हाँ सुबह सुबह हल्की ठण्ड ज़रूर होती थी ऐसे समय अमरूद के पेड़ के नीचे बैठकर गुनगुनी धूप सेंकने में बहुत आनंद आता था । यहीं बैठकर मैं पहाड़े रटा करता था... दो एकम दो ,दो दुनी चार निदा फाज़ली साहब का शेर सुनने समझने तक और कवि होने तक मैं दो दुनी चार को ही सच समझता था दो साल की उम्र तक यह आँगन ही मेरा क्रिड़ास्थल था । टीन के मुख्य दरवाज़े से प्रवेश करते ही दोनों ओर क्यारियाँ थी जिनमें बाबूजी ने फूलों के पौधे लगाये थे इन क्यारियों में लगे पौधों के साथ मैं भी धीरे धीरे बड़ा हो रहा था ।

 

आप सोच रहे होंगे ना निदा फ़ाज़ली साहब का वो शेर कौनसा है..तो लीजिये मुलाहिज़ा फरमाइये

 

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है

सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

 


माँ बाबूजी रोज़ आंगन के पौधों में पानी डालते थे
समझ और नादानी का खेल खेलते हुए यह बात समझ में आ ही गई थी कि बच्चों की तरह इन पौधों को भी बढ़ने के लिए भोजन पानी की ज़रूरत होती है मैंने शौक शौक में उनका हाथ बँटाने की ज़िम्मेदारी ले ली मैंने नन्ही उँगलियों से क्यारी में लगे पौधों के पास छोटी छोटी नालियाँ बनाईं मैं लम्बी क्यारी के एक सिरे पर पानी डालता और वह छोटी छोटी नालियों से बहकर सभी पौधों की जड़ों तक पहुँच जाता । नालियों में पानी बहता हुआ देखकर मैं कल्पना करता था कि पृथ्वी के बनने के बाद जब पहली बार नदियाँ बनी होंगी तो उन नदियों में भी पानी इसी तरह बहा  होगा

 

बाल मन में उपजती प्रश्नों की दुनिया में एक प्रश्न यह भी था कि इस नाली में तो पानी मैं बहा रहा हूँ लेकिन नदियों में पानी कौन बहाता होगा ? हालाँकि ईश्वर का कोई भी खयाल उस वक़्त मेरे मन में नहीं था और बाबूजी मुझे यह वैज्ञानिक तथ्य बता ही चुके थे कि ब्रह्माण्ड में सूर्य के बाद अन्य ग्रहों के साथ पृथ्वी कैसे बनी, पहाड़, चट्टाने और समंदर कैसे बने , नदियाँ कैसे बनी और उनमे पानी कैसे आया पौराणिक कहानियों में वर्णित वर्षा करवाने वाले देवता इन्द्र पर मुझे कतई विश्वास नहीं था इसलिए कि बाबूजी मुझे पहले ही बता चुके थे बादल कैसे बनते हैं, बिजली क्यों कड़कती है और वर्षा कैसे होती है मेरे लिए मेरे पिता दुनिया के तमाम इन्द्रों से बड़े थे

 


मिट्टी मुझे बहुत अधिक आकर्षित करती थी
। शैशव अवस्था में अन्य बच्चों की तरह मृदा भक्षण पर माँ के हाथों से तमाचे खाने के बाद भी यह आकर्षण समाप्त नहीं हुआ । किसानों के कीचड़ में सने हुए पांव और मजदूरों के मिटटी के गारे से सने हुए पांव आज भी मुझे आकर्षित करते हैं मिट्टी के प्रति इस आकर्षण की वज़ह से आगे चलकर मुझे दिवाली का  ‘किल्ला’  बनाना और गणेशोत्सव में मिटटी का पहाड़ बनाना अच्छा लगने लगा  था । भले ही ‘देश की मिट्टी’, ‘वतन की मिट्टी’ जैसे संप्रत्ययों  से प्रेम करने वाले कथित राष्ट्रवादी लोग कभी नंगे पाँव ज़मीन पर न चले हों लेकिन मेरे भीतर मिट्टी की यह ललक अभी भी बरक़रार है  । मैं इस मिटटी को कभी भी चूम सकता हूँ

 

सुबह स्कूल से आने के बाद दोपहर बाद खाना खाकर मैं मिट्टी से खेलते हुए उन क्यारियों से पत्ते साफ किया करता और अपनी बनाई इन नदियों में पानी बहाया करता मानों अपने इस सृजनात्मक कार्य में मैं ही अपना ईश्वर था जाने कितनी देर मैं उन पत्तियों को सूंघा करता था चन्दन की गंध को मैं चन्दन की लकड़ी के चंदनी रंग में और मोगरे की गंध जो मोगरे के सफ़ेद रंग में महसूस करता जैसे मैं धुएं की गंध में काला रंग महसूस किया करता था वैसे ही पत्तियों की गंध को मैं हरे रंग में महसूस करता गीली मिट्टी की गंध मुझे बहुत अच्छी लगती थी उसे मैं मिट्टी के रंग में महसूस करता अदृश्य गंध को उसके स्त्रोत के रंग में महसूस करने का मेरा यह अपना तरीका था दूध की गंध को मैं आज भी अपनी माँ के रूप और उनकी ममता के रंग में महसूस करता हूँ



माँ की याद तो आज भी बहुत बहुत आती है

 
शरद कोकास