7 जून 2026

53 गुदना गुदवा लो भैया बैतूल बजार में

टैटू बनवाते हुए शरद कोकास 
“ शरम नहीं आती तुम लोगों को ? क्या कर रहे हो ..चलो उठो यहाँ से “ “ मैंने और बिन्नू भैया ने देखा कि सामने से श्याम काका दहाड़ते हुए चले आ रहे हैं । बिन्नू भैया ने झट मुझे कोहनी मारी । हम लोग उकडूँ बैठे हुए थे इसलिए उठने में ज़रा भी देर नहीं हुई । बिन्नू भैया फुर्तीले थे, वे तो सरपट निकल लिए  लेकिन मैं पकड़ में आ गया ।“ क्या चल रहा था ये ?” चाचा ने डाँटते हुए पूछा “ कुछ नहीं चाचा, गुदना गुदवा रहे थे “ “ गुदना ..?  यह क्या भले घर के बच्चों का काम है ?” मैं चुप था । चाचा ने कहा “ चलो घर .. अब दुबारा यहाँ दिखना भी नहीं ।“ 

यह दृश्य विगत सदी में साठ के दशक में, मई माह के एक रविवार को, बैतूल नामक शहर के इतवारी बाज़ार नामक मोहल्ले में, दुर्गा मंदिर की बाईं ओर मोहनजोदाड़ो के टीले की तरह दिखाई देने वाले एक ऊँचे से टीले पर साप्ताहिक बाज़ार में लगने वाली गुदना गुदवाने की एक दुकान के सामने घटित हुआ था  । यह टीला हमारे नए घर के पीछे के दरवाज़े के ठीक सामने की ओर था । इस दुकान में चान्दी के आभूषण पहने आदिवासी बालाएँ और महिलायें अपने हाथ, पांव, ठोड़ी आदि में गुदना गुदवाने के लिए बाकायदा अपॉइंटमेंट लेकर आती थीं । उधर उनके घर के लोग दुकानों से सामान खरीदते उतनी देर में यह बालाएँ गुदना गुदवा लेती । कभी कभी इनके साथ कुछ युवक भी होते थे ।  

गुदना गोदने वाली स्त्री के पास मिटटी के एक दिये में काजल जैसी कोई चीज होती थी । वह बोतल से अरंडी का तेल निकालती, उसमे वह काजल घोलती फिर एक कपडे में लिपटी हुई छोटी छोटी सुइयां निकालती थी । जिस युवती को गुदना गुदवाना होता उसका हाथ अपने हाथ में लेकर  सबसे पहले वह उस पर तेल लगाती, फिर गुदना गुदवाने वाली उस युवती से पूछती “ क्या गुदवाना है ? “ वह युवती अपनी रूचि के अनुसार कोई आकृति बताती जैसे सूर्य, चन्द्र ,तारे, फूल पत्ती, बिच्छू, या ऐसी ही कोई आकृति । फिर वह गोदने वाली कपड़े की थैली से उपयुक्त सुई निकालती और उसे काजल वाले तेल में डुबोकर धीरे धीरे उसके हाथ पर चुभोते हुए वह आकृति बना देती । सुई के चुभने से थोड़ा बहुत दर्द तो होता था लेकिन गुदना गोदने वाली उसे बातों में लगाये रहती । गुदना समाप्त होते ही उस पर हल्दी का लेप लगा दिया जाता ।

मैं और बिन्नू भैया अक्सर वहाँ खड़े हो जाते और गुदना गुदवाने का यह दृश्य देखते । गोदने वाली स्त्री जिसे गुदनारी कहते थे उसकी बातें भी बड़ी मज़ेदार होती थीं “ ठोड़ी में गुदवाओगी तो दांत मोती जैसे चमकते रहेंगे “ “ इतना सुन्दर गोदूंगी कि तुम्हारा प्रेमी देखता ही रह जायेगा । “ यदि कोई उम्रदराज़ गोंड स्त्री आती तो उससे कहती “ गुदना नहीं गुदवाओगी तो बूड़ा देव नाराज हो जायेंगे ।“ 

गुदनारी की बात सुनकर युवतियाँ  हँस देतीं । उन्हें किसी देवी देवता के नाराज़ होने की चिंता नहीं होती थी ।वे केवल इतना चाहती थीं कि बस उनका प्रेमी खुश रहे । अक्सर वे श्रृंगार के रूप में गुदना गुदवाती थीं । कभी कभी उनके साथ आनेवाले युवक भी बिंदी, सितारा, फूल जैसी कोई आकृति गुदवा लेते । जब वे एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराते हुए गुदना गुदवाते थे उन्हें दर्द महसूस नहीं होता था । किसी ने सच कहा है जब मनुष्य प्रेम में होता है तो उसे किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं होता । 

अलग अलग स्थानों पर गोदे जाने वाले गुदने के नाम भी अलग अलग होते थे, जैसे ठोड़ी का गुदना मुटकी, नाक का फुल्ली और कान का गुदना झुमका कहलाता था । हाथों के अलावा यह स्त्रियाँ अपने माथे, कान, पिंडली, जांघ, आदि पर भी गुदना गुदवाती थीं । इन आदिवासी जनों के अलावा यहाँ पढ़े लिखे लोग भी आते थे यह लोग केवल हाथ पर नाम गुदवाते थे । कुछ लोग शरीर में कुछ जगहों पर राम नाम भी लिखवाते थे । कुछ लोग इसलिए गुदवाते थे कि उससे धार्मिक मान्यताएँ जुड़ी थीं जैसे कि गुदवाओगे नहीं तो स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी, मोक्ष नहीं मिलेगा,पितृ तर्पण नहीं होगा आदि आदि ।

गुदना गोदने वाली स्त्री गुदने से सम्बंधित अच्छी अच्छी कहानियाँ भी सुनाया करती थी । उस समय की कहानियाँ तो मुझे याद नहीं लेकिन बड़े होने के बाद मैंने उरांव आदिवासियों के बीच प्रचलित गुदने की एक कहानी सुनी थी । 

एक कहानी 

ऐसा कहा जाता है की एक बार औरंगजेब की सेना ने पटना के निकट रोहतासगढ़ के किले पर आक्रमण कर दिया । उरांव राजा उरगन ठाकुर की सेना में बलशाली स्त्रियों की एक टुकड़ी थी जो पुरुषों की वेशभूषा में लड़ती थी। इस टुकड़ी ने तीन बार औरंगजेब की सेना को हराया । फिर किसी लुन्दरी ग्वालन नामक स्त्री ने मुगलों को यह रहस्य बता दिया कि यह योद्धा पुरुष नहीं हैं बल्कि पुरुष के रूप में लड़ने वाली यह स्त्रियाँ हैं । बस फिर क्या था ,पितृसत्ता के पोषक औरंगजेब के सैनिकों का मनोबल बढ़ गया और उन्होंने इन वीर स्त्रियों को येन केन हरा दिया । तीन बार मुगलों को मज़ा चखाने वाली इस घटना की याद में आज भी उरांव स्त्रियाँ अपने माथे पर तीन खड़ी डंडियाँ गुदवाती हैं । 

उन दिनों यह सब कुछ हमें बहुत रोमांचक लगता था । इसी रोमांचक अनुभव को प्राप्त करने के लिए एक दिन मैंने और बिन्नू भैया ने मिलकर विचार किया था कि हम दोनों अपने हाथ पर अपना नाम गुदवायेंगे । हम लोग गुदने वाले की दुकान पर अपना नम्बर लगाकर बैठे ही थे कि यह हादसा घटित हुआ और हमारा प्लान फेल हो गया ।  

मुझे याद है ..श्याम काका ने कहा था कि  अच्छे घरों के बच्चे गुदना नहीं गुदवाते हैं । आज जब मैं अच्छे घरों के बच्चों को बतौर फ़ैशन  अपने जिस्म में यहाँ वहाँ टैटू लगाये देखता हूँ तो मुझे उस घटना की याद आती है । फिर हम लोग कभी गुदना नहीं गुदवा पाए और जीवन भर अच्छे घरों के बच्चे बने रहे ।

अब आदिवासी क्षेत्रों में ही गुदना अपने पारंपरिक रूप में शेष है हालाँकि अब उसका चलन भी कम होता जा रहा है । शहरों की युवा पीढी को टैटू लगाये हुए देखता हूँ तो सोचता हूँ यह विकास के द्वारा मानव को उपहार में मिला साम्यवाद है  या नवीनता और परिवर्तन के प्रति मनुष्य का आकर्षण ..जो भी हो किसी का वह कथन सत्य लगता है कि विकास का चक्र आगे बढ़ने के क्रम में कुछ मामलों में खुद को दोहराता है ।



52. आदिवासी अपनी वनोपज महुआ, अचार,चिरौंजी बेचने आते हैं


बैतूल के इस साप्ताहिक बाज़ार में आनेवाले सभी आदिवासी केवल ज़रूरत का सामान खरीदने यहाँ नहीं आते थे बल्कि बहुत सारे आदिवासी अपनी वनोपज महुआ, अचार,चिरौंजी जैसी वस्तुएं बेचने के लिए भी यहाँ आते थे । बिक्री के बाद उन्हें जो पैसे प्राप्त होते उससे वे नमक, किराना, साबुन,अनाज और अन्य ज़रूरत का सामान खरीद लेते । इस तरह वे ग्राहक भी होते और दुकानदार भी, यद्यपि शहर के लोगों जैसे चालाक दुकानदार तो वे हो भी नहीं सकते थे । शहर के लोग भी उन दिनों इतने सभ्य नहीं हुए थे कि उनकी वनोपज को औने-पौने दामों में खरीद लें । फिर भी उनकी वस्तुओं को इतने कम दामों में बिकता देख कर आश्चर्य होता था । चिरौंजी जैसी वस्तु भी सूखे मेवों की दुकान पर पहुँचकर बीस पच्चीस गुना महंगे दामों में बिकने लगती थी ।

आज आदिवासी पहले की अपेक्षा समझदार हो गए हैं । वे अब इस तरह ठगे नहीं जाते । हालाँकि अब उन्हें ठगने वालों ने नए तरीके ईज़ाद कर लिए हैं । आज आदिवासियों के जंगल और ज़मीन पर मल्टी नेशनल कम्पनियाँ कब्ज़ा कर रही हैं, उन्हें असीमित दोहन के अधिकार और लायसेंस दिए जा रहे हैं । आदिवासी उस समय भी इन चालाक शहर वासियों का मुकाबला नहीं कर सकते थे आज भी वे बमुश्किल अपने शोषण के खिलाफ़ कुछ बोल पाते हैं । यह बात और है कि अब तो अपने शोषण के खिलाफ़ पढ़े-लिखे शहरी भी बोल नहीं पा रहे हैं ।

ये सब ताड़ी के अधिकारी  

सुबह से शाम तक चलने वाला बैतूल का यह हाट बाज़ार केवल सब्जी भाजी या आवश्यक वस्तुओं के लिए नहीं होता था बल्कि मनोरंजन के भी यहाँ भरपूर साधन होते थे । हमारी लाइन के पीछे की ओर मरघट के सामने वाले मैदान में जहाँ सफाई कर्मियों की बस्ती थी वहाँ ऊपर नीचे चलने वाले लकड़ी के हवाई झूले लगते थे ।


खाने पीने की वस्तुओं के अलावा स्त्रियों और बच्चों के लिए इतना मनोरंजन पर्याप्त था । लेकिन बड़ों का मन इस तरह थोड़ी देर झूलने और झूमने से थोड़े ही भरता सो वहीं एक किनारे पर ताड़ी की एक दुकान के रूप में उनके झूमने का भी बेहतर प्रबंध था । घर लौटते हुए जहाँ ठहरना उनके लिये अनिवार्य था । 

इतने अलंकारों से तो आप समझ ही गए होंगे कि ताड़ी कोई नशीला पदार्थ है वास्तव में ताड़ी का अर्थ है ताड़ के या छीन्द के पेड़ का रस । पेड़ से यह रस प्राप्त करने के लिए अर्थात ताड़ी उतारने के लिए ताड़ के पेड़ पर चढ़कर ऊपर की ओर पत्तों के निचले हिस्से में तने पर एक हल्का सा चीरा लगाया जाता है, फिर उसमे एक खपच्ची फँसाकर उसका दूसरा सिरा वहीं तने से बंधी एक मटकी में लगा दिया जाता है ताड़ के पेड़ के तने से बूँद बूंद रस निकलता है और नाली नुमा खपच्ची से बहता हुआ धीरे मटकी में इकठ्ठा होने लगता है । कुछ घंटों बाद जब मटकी रस से भर जाती है , एक आदमी पेड़ पर चढ़कर उसे उतार लेता है ।


धीरे धीरे फर्मेंटेशन होते जाने के कारण यह रस नशीला होता जाता है । हालाँकि  इसका नशा बहुत हल्का रहता है । एक तरह से यह लोकल प्राकृतिक बियर ही होती है । महाराष्ट्र में नागपुर की ओर ताड़ी नमक इस पेय को नीरा कहते हैं और सरकार द्वारा बाकायदा इसे प्राप्त करने और बिक्री हेतु लाइसेंस प्रदान किये जाते हैं ।

अब इनमें कुछ लोग ऐसे भी होते थे जिन्हें इतने मामूली से झूमने में आनंद नहीं आता था अर्थात उनका झूमने का माद्दा इससे थोड़ा अधिक था । ये हमारे पियक्कड़ समाज के उन लोगों की तरह थे जिन्हें ताड़ी लेडीज़ ड्रिंक लगता था । ऐसे मर्दों को अपनी मर्दानगी का अवसर प्रदान करने हेतु वहीं पास में देसी शराब ठेके की व्यवस्था भी थी यहाँ सरकारी शराब के अलावा महुए की शराब भी मिलती थी । हालाँकि ज़्यादातर आदिवासी अपने घरों में ही महुए की शराब बनाने में विश्वास रखते थे इसलिए यहाँ वे सरकार के आबकारी विभाग के माध्यम से सरकार को वित्तीय सहायता पहुँचाने के उद्देश्य से एकत्रित होते थे । 

जैसे जैसे संध्या परी का आगमन होता लाल परी की बिक्री बढ़ जाती । चालीस वाट के टिमटिमाते पीले बल्ब की रौशनी में देसी शराब भट्टी की खिड़की पर उपस्थित उन मानव आकृतियों को पहचानना मुश्किल होता  । कुछ दूरी पर बाहर मैदान में अँधेरे में जलते हुए पुआल पर छोटी छोटी मछलियाँ भूनी जा रही होतीं । वातावरण में उपस्थित इस स्वप्न दृश्य में सोंधी सोंधी सी गंध और कुछ न समझ में आने वाली ध्वनियों के बीच जाने कितने घीसू,माधव और देवदास दिखाई देने लगते । उनके सामने बोतल और गिलास के साथ चखने के रूप में भुनी हुई ताज़ी छोटी छोटी सुनहरी मछलियाँ, भुनी कलेजी और शाकाहारी चना चबैना भी मौजूद होता । फिर शाम ढलने के साथ धीरे धीरे यह वैभव भी ढलने लगता ।



51.बैतूल का साप्ताहिक हाट बाज़ार

 

रविवार और गुरुवार को हमारा मोहल्ला एक रंगमंच बन जाता था । हफ़्ते के इन दो दिनों में लगने वाला यह हाट बाज़ार हम लोगों के लिये बैतूल के हमारे इतवारी बाज़ार नामक मोहल्ले के स्थायी से दिखाई देने वाले परिवेश में दृश्य परिवर्तन की तरह होता था । 
दुर्गा मंदिर से लगी दुकानें 
रंगमंच पर प्रॉपर्टी अर्थात ज़रूरी उपकरणों का प्रवेश सुबह से ही प्रारंभ हो जाता था सबसे पहले बैलगाड़ियों, छोटे ट्रकों का आना शुरू होता, उनसे एक एक कर सामान उतरता , कैनवास के तम्बू, तिरपाल ,सब्जियों के टोकरे, तराजू, बाँट, खाली बोरे, हलवाइयों की भट्टियाँ, बड़े बड़े थाल , बाल्टियाँ , फल वालों के लकड़ी के स्टैंड, आदि । सबकी अपनी अपनी दुकान की जगह तय रहती थी कोई किसी के क्षेत्र में अतिकरामं नहीं कर सकता था चारों कोनों में तिरपाल बांधने के लिए ज़मीन गीली कर लोहे के बड़े बड़े खूंटे गाड़े जाते। टन टन टन खूंटों पर पड़ती घन की मार से हम लोग समझ जाते कि अब इन पर तिरपाल बांधा जायेगा यह तम्बू जिसे हम लोग तिरपाल कहते थे यह तार्पोलीन का देशज रूपांतर था । 

बोरों मे सब्ज़ी 
बाज़ार के इस रंगमंच पर दुकान लगाने हेतु आवश्यक वस्तुएं स्थापित हो जाने के पश्चात गीले बोरों के में लिपटे सब्जियों के गठ्ठर उतारे जाते और उन्हें करीने से सामने बिछे हुए बोरों पर सजाया जाता । उधर रघुवीर टाकीज के सामने फल वालों की दुकानें सज जातीं । मोहल्ले के अंतिम छोर पर बनी रिंग रोड पर मिर्च मसाले और अनाज की दुकानें लाल रंग में रंगी दिखाई देतीं वहीं तापी की कपड़ों में प्रेस करने की दुकान के सामने वाले हिस्से में हलवाइयों की भट्टियाँ तैयार हो जातीं । मंदिर की दाहिनी ओर मिशन स्कूल के सामने मनिहारी की दुकानें सजतीं और मेन रोड पर चांदी के जेवरों की ।

ग्यारह बारह बजे तक बाज़ार के इस मंच की सज सज्जा जारी रहती थी । फिर दुकानदार दुकान की को झुककर प्रणाम करते और गद्दी पर बैठ जाते । अब संवाद शुरू होते, बैंगन एक आना किलो, टमाटर दो आना,  लो कटहल ताज़ा कटहल । अब नए पात्रों के रूप में ग्राहकों का आना शुरू होता । 

ख़मीर की ख़ुमारी में गर्म गर्म जलेबियाँ 

दोपहर तक बाज़ार अपने शबाब पर आ जाता था । हलवाई की दुकान पर भट्टी के लाल लाल दहकते हुए कोयले पर रखी कढ़ाई में खौलते तेल से जलेबियों की महक उठने लगती । जैसे ही खुशी से फूलती उसे चाशनी में दबा दिया जाता । गुड़पट्टी तो घर से बनाकर लाई जाती थी । ढेर पर मंडराती हुई ततैया से बचते हुए ग्राहक गुड़ में पगे सेव के लड्डू खरीदते और वहीं दुकान पर खड़े खड़े खा जाते ।


मैदे के टुकड़ों को चाशनी में डुबोकर बनाये हुए खाजा को बंधवाकर घर ले जाना अधिक उचित होता था यह लम्बे समय तक टिकने वाली मिठाई होती थी बूंदी के लड्डू तो गरमागरम तुरंत तैयार किये जाते जलेबी के साथ कॉम्बिनेशन के लिए एक भट्टी में गरमागरम आलुबोंड़े निकलते रहते ।

उधर मनिहारी की दुकान पर आदिवासी बालाएँ चूड़ी ,कंगन, बिंदिया, चोटी में लगाने के बैंगनी रंग वाले फुंदने, रंगबिरंगी कंघियाँ और शीशे, नेलपालिश और आलता, आदि खरीदने हुए दिकाही देतीं वहीं पास में होती बच्चों के खिलौनों की दुकानें, मिट्टी की कमर मटकाने वाली गुड़िया, पी पी करने वाला बाजा , रंगीन कागज की चरखी ,

हम लोगों को पैसे मिलते थे उससे हम लोग क्या क्या खरीदते थे 

बैतूल शहर के आसपास से अनेक ग्रामीण जन  सब्जी भाजी ,कपडा , मिठाई और जरुरत की वस्तुएं खरीदने अपने बालबच्चों सहित आते थे । इन गाँव वालों में आदिवासियों की संख्या अधिक हुआ करती थी l गोंड आदिवासियों को सबसे पहले मैंने इसी हाट बाज़ार में देखा l उनकी भाषा गोंडी थी लेकिन सामान खरीदने के लिए वे कामचलाऊ भाषा सीख चुके थे । दुकानदारों ने भी गोंडी के कुछ शब्द सीख लिए थे और उन्हें भी सामान बेचने में कोई दिक्कत नहीं होती थी । आज हम दुनिया के किसी भी देश में बने प्रोडक्ट का विज्ञापन देश की किसी भी भाषा में देख सकते हैं 

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6 जून 2026

50.कौनसा आम खाते थे तुलसीदास


अंग्रेज़ों ने जैसे भारत में प्रवेश करने की स्मृति में मुंबई में गेट वे ऑफ़ इंडिया बनाया था वैसे ही अनेक शहरों में प्रवेश द्वार बनाये थे बैतूल का कमानिया गेट भी ऐसा ही एक दरवाज़ा था । कमानिया गेट से जैसे ही मार्च का महीना बैतूल शहर की सीमा के भीतर प्रवेश करता उसके पीछे पीछे जंगल की ओर से आनेवाली आम के बौर की मादक गंध भी प्रवेश कर जाती ।  

हमारे मोहल्ले के अंतिम छोर से निकलने वाली रिंग रोड शहर की भी अंतिम सीमा थी । रिंग रोड से एक कच्चा रास्ता हमारे खेतों की ओर चला जाता था । मार्च आते ही इस रास्ते के दोनों ओर  लगे आम के पेड़ों पर कूकती हुई कोयलों के समवेत स्वरों में में कोई गोंडी गीत सुनाई देने लगता ।

अप्रेल के अंत तक गेहूँ कट कर खलिहान में चला जाता और भूसा नए घर के पीछे वाली कोठरी में रख दिया जाता । हम समझ जाते कि अब इसके पीछे पीछे अमराई से तोड़े हुए आम आयेंगे । कोयलों की तरह हम लोग भी आम पकने की प्रतीक्षा करने लगते ।

अमराई के आम घर आने से पहले बाज़ार में दूर दूर से आम आने लगते । इतवार और  बृहस्पतिवार के बाज़ार में रघुबीर टाकीज की ओर जाने वाली सड़क के दोनों ओर आम के टोकने लिए बैठे आम विक्रेता दिखाई देने लगते । गर्मी के दिनों में सब्जियों के अलावा तरबूज और आम बाज़ार की शोभा होते थे । श्याम काका आवाज़ लगाते “चलो कौन चल रहा है आम लेने ?”  हम दो तीन लोग तो तैयार हो ही जाते थे ।

दरअसल श्याम चाचा के साथ आम खरीदने जाने का अर्थ होता था पेट भर आम खाने का मौका मिलना । उन दिनों चखने के लिए खरीददार की हथेली पर ज़रा सा रस टपकाने या चाकू से काटकर आम की एक फाँक पकड़ा देने का कंजूसी से भरा चलन नहीं था । आम बेचने वाले खरीददार को चखने के लिये पूरा चुसना आम ही दे दिया करते थे । हमारे घर में आम भी सैकड़े की तादाद में ख़रीदा जाता था । श्याम चाचा कम से कम बीस दुकानों पर जाते और अंत में तय करते “ वो रघुवीर टाकीज के गेट के बाएँ तरफ़ जो बैठा है ना , उसके पास ठीक आम है । फिर टोकरे का भाव तय किया जाता और हम में से कोई न कोई उस टोकरे को सर पर रखकर घर छोड़ आता । सब्जियाँ भी इसी तरह से ख़रीदी जाती थीं, पांच किलो बैंगन लिया टोकरी सर पर रखकर दौड़कर घर पहुँचे, किचन से लगे कमरे में सब्जी उंडेली और फिर वापस आकर श्याम काका के पास तैनात हो गए । 

आम के उन ख़ास दिनों में श्याम काका के साथ बाज़ार जाने के लिये बच्चों के बीच प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन जायेगा । । बैतूल अपनी विशिष्ट प्रजाति के गाजर्या आम के लिए प्रसिद्ध है इसका स्वाद कुछ कुछ गाजर की तरह होता है  ।  बैतूल में हम लोगों के लिए आम की कमी नहीं थी फिर भी रास्ते चलते हुए पेड़ों पर पत्थर मारकर आम गिराने में जो आनंद आता था उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । हरे आमों के बीच कोई पकती हुई सांख भर दिख जाए फिर समझो उसका काम तमाम ৷ हम बच्चों के बीच एक मिथ चलता था कि जिस आम पर बैठकर कोयल पाद देती है उसका स्वाद बहुत मीठा हो जाता है । 

शाम को जब मदन मोहन ताउजी मानस पाठ के लिए दालान में बैठते तो श्रोताओं में एक न एक बार उस साल की आम की फ़सल के बारे में बात ज़रुर होती थी । अब राम का और तुलसीदास का क्या सम्बन्ध था यह तो हमें उस समय नहीं पता था लेकिन अभी अभी पंकज चतुर्वेदी की एक कविता पढ़ने में आई तो लगा कि कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य रहा होगा । पंकज लिखते हैं... 


रसाल है रामचरित / 

और रसाल है / 

अवधी में उसका विन्यास / 

भक्ति का रस / और काव्य का रस / 

जानने में/ शायद इससे मदद मिले/ 

कि कौन-सा आम / खाते थे तुलसीदास / 


तुलसी बाबा कौनसा आम खाते थे और आम खाने के क्या किस्से सुनाते थे यह तो मुझे पता नहीं लेकिन बैतूल से जुड़े हुए आम के किस्सों की मेरे पास कमी नहीं है  । 

अब पढिए एक मजेदार किस्सा 

हम लोगों के खेत में भी आम के पेड़ थे जो उन दिनों फल देने लगे थे । मनमोहन ताउजी खेत से बहुत सारा कच्चा आम तुड़वाकर घर में भेज देते थे जिन्हें  तह लगाकर भूसे के बीच रख दिया जाता था  ताकि कुछ दिनों बाद वे पक जाएँ और उन्हें खाया जा  सके । बड़ी माँ यानि बिन्नू की माँ इस कमरे की इंचार्ज थीं । उन्हें पता था कि कौनसा आम कब रखा गया है और वह कब पकेगा ।हम लोग आम रखने में उनकी मदद करते थे और इस रहस्य को जान लेते थे । जैसे जैसे खेत से कच्चा आम आता उसे वहाँ रख दिया जाता । आम रखे जाने के बाद बड़ी माँ उस कमरे में ताला लगा देती थीं । 

बड़ी माँ और माँ 

मैं और बिन्नू भैया इस बात का बराबर हिसाब रखते थे कि किस ओर रखा हुआ आम कब तक पकेगा जैसे ही वह समय आता हमारी चौर्य कला आजमाने का समय भी आ जाता । बड़ी माँ रोज दोपहर में खाना खाकर कुछ देर के लिए सो जाती थीं । सोते हुए वे आम वाले कमरे की चाबी का गुच्छा अपनी तकिया के नीचे रख लेती थीं । उन्हें सोता हुआ जानकर हम लोग उनकी तकिया के नीचे से धीरे से चाबियाँ निकालते और आम वाले कमरे का ताला खोलकर कुछ आम चुरा लेते फिर चाबियाँ यथा स्थान रख कर आम लेकर पुराने घर में आते और चूस चूस कर आराम से आम खाते । 

एक दिन बड़ी माँ ने  बहुत प्यार से हम लोगों को बुलाया और पूछा “ बेटा आम खाओगे ? “ नेकी और पूछ पूछ , हम लोगों ने तुरंत हाँ कर दी । आम के सार्वजनिक वितरण से इतर यह हम लोगों पर उनकी विशेष कृपा थी । वे आम की कोठरी का ताला खोलकर भीतर गईं और एक टोकरी में बहुत सारे आम लेकर आ गईं, फिर  एक बाल्टी भर पानी में उन्हें डुबो दिया । यह चुसना आम थे जिन्हें चूस चूस कर खाया जाता था । वे बहुत प्यार से धो धो कर हम लोगों को आम देती रहीं । हम बाएँ हाथ की मध्यमा और अंगूठे के बीच उन्हें रख पिलपिला करते फिर उसका मुँह खोलकर दो बूंद रस बाहर टपकाते और फिर हुए चूस चूस कर खा जाते  । बड़ी माँ हम दोनों को उसी तरह देखती रहीं जैसे यशोदा मैया कृष्ण और बलदाऊ को मक्खन खाते हुए देखती होगी ।  

आठ दस आम खाने के बाद हम लोगों का पेट भर गया । मैंने बड़ी माँ से कहा “ बस बड़ी माँ, अब पेट भर गया । । “ वे बोलीं “ बस बेटा, एक आम और खा लो । “  मैंने बिन्नू भैया की ओर देखा बिन्नू भैया ने संकेत किया ‘खा लो’  बड़ी मुश्किल से वह एक आम खाया गया । लेकिन बड़ी माँ तो एक एक आम लिए फिर तैयार थीं  ..”लो बस एक और खा लो ..।“ हमने मना किया तो उन्होंने धमकी दी “नहीं खाओगे, तो कल से एक भी आम नहीं मिलेगा ।“ मज़बूरी में हम लोगों ने फिर एक एक आम खाया । 

यह हमारी भूख,स्वाद,इच्छा और तृप्ति की इन्तहा थी । अगला आम उनके हाथ में देखकर हम लोगों ने सुबक सुबक कर रोना शुरू कर दिया ..”बस बड़ी माँ..बस.. अब नहीं खा सकते ..बस ..अब पेट फूट जायेगा, अब नहीं ।“ बड़ी माँ मुस्कुराईं और हम बच्चों पर रहम दिखाते हुए कहा ..ठीक है , अब नहीं देंगे लेकिन पहले बोलो कि  अब से आम चुराकर तो नहीं खाओगे ? “ 

हम दोनों ने रोते रोते चौंक कर उनकी ओर देखा .. हमें समझ में आ गया था कि उन्हें हम लोगों की इस चोरी का  पता चल गया है और वे हमें प्यार से आम नहीं खिला रही थीं बल्कि इस तरह चोरी की सज़ा दे रही थीं । हम लोगों ने कान पकड़ कर कहा “ठीक है, अब से चोरी नहीं करेंगे । “ तब जाकर हम लोगों को छुट्टी मिली ।

शरद कोकास 

49. काले पत्थरों के बीच लाल लाल रक्त की धारियाँ


“मैं अपनी जेब में एक शाम लिए घूमता हूँ/और जब लगता है कि कॉफ़ी पीना चाहिए/या उस सड़क पर चल देना चाहिए /जिसके दोनों ओर पेड़ ही पेड़ है / इतने इतने और इतने सुन्दर / और जिस पर अफसरों की या ईसाई लडकियाँ सड़क घेर कर/चलती हैं खेलती और मुस्कुराती हुई..” 

अशोक वाजपेयी की कविता ‘एक छोटा शहर’ की इस सड़क जैसी एक सडक हमारे घर के सामने भी थी जिसके दोनों ओर पेड़ ही पेड़ थे । सब्ज़ी खरीदने के लिए आई हुई अफसरों की लडकियाँ उस पर सिर्फ रविवार और गुरूवार को साप्ताहिक बाज़ार के दिन ही दिखाई देती थीं, साथ ही गोंड आदिवासियों की भी लडकियाँ होती थीं जो गुदना गुदवाने के लिए यहाँ आती थीं । 


इस सड़क तक पहुँचने के लिए कोठी बाज़ार की मुख्य सड़क से कमानिया गेट की  ओर बढ़ते हुए जैसे ही देवी मंदिर के शीर्ष पर लगी ध्वजा दिखाई देती थी दाहिने मुड़ जाना होता था ।

यह खुला खुला सा इलाका इतवारी बाज़ार कहलाता था । हाट बाज़ार लगने की वज़ह से यहाँ सड़क के दोनों ओर खूब सारी खुली जगह छोड़ दी गई है । 

दुर्गा मंदिर के ठीक सामने बने चौराहे के बाद इस सड़क पर प्रवेश करते ही एक मकान के बाद दाहिनी ओर हमारा पुराना मकान है और ठीक उसके सामने सड़क की बाईं ओर नया मकान जिसे हमारे दादा ने उन्नीस सौ सत्तावन में औषधालय के लिए बनवाया था ।

पुराना मकान 
उनके निधन के बाद जैसे जैसे परिवार बढ़ता गया लोग इस मकान में भी बसते गए । दादाजी ने पुराने वाले मकान के निर्माण के समय ही सड़क के दोनों ओर नीम के पेड़ लगवा दिए थे जो उस समय तक काफ़ी बड़े हो चुके थे ।
औषधालय 
वे दिन शोर के प्रदूषण से मुक्त शांत दिन थे । मुख्य सड़क पर कभी कभार इक्का दुक्का स्कूटर या कार दिखाई दे जाती थी वर्ना वहाँ सिर्फ साइकिल की घंटियों की आवाज़ गूंजती थी जो शाम होते ही दुर्गा मंदिर से आनेवाली घंटियों की आवाज़ में मिल जाती, वहीं उसमे शामिल होती दूर किसी मस्जिद से आती अज़ान की आवाज़ । कुछ ही देर में सिन्धी गुरूद्वारे से भजन के स्वर सुनाई देने लगते ।

कृष्ण मंदिर 
उधर कृष्ण मंदिर से पुजारी जी की आवाज़ आने लगती “आरती कुंज बिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की / गले में वैजन्ती माला, बजावे मुरली मधुर बाला”
कृष्ण मंदिर के पुजारी के साथ 
उन दिनों वैजंती माला सिने जगत की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं, हम बच्चों को यह बात कभी समझ में नहीं आई के वे कृष्ण जी के गले में कैसे पहुँच गईं । 
घर के सामने खुली जगह 
कृष्ण मंदिर की आतंरिक साज सज्जा तो बहुत सुन्दर थी लेकिन साठ के उस दशक तक दुर्गा मंदिर की स्थिति जंगल में बने किसी प्राचीन मंदिर की तरह ही थी ।

दुर्गा मंदिर 
बैतूल के हमारे मोहल्ले का यह दुर्गा मंदिर तब भी था जब यहाँ बस्ती नहीं थी । प्रेमचंद की कहानी ‘बांका ज़मींदार’ में बताई गई किसानों की मडैया की तरह यहाँ भी एक मडैया थी जिसके नीचे रखे एक काले पत्थर को देवी स्वरूप माना जाता था, इसलिए इसे देवी मडैया कहते थे ।
वर्तमान में दुर्गा मंदिर 
फिर धीरे धीरे इसने मंदिर का स्वरूप धारण करना प्रारंभ किया दादाजी के बाद ताऊजी इसके संरक्षक मंडल में थे । मंदिर की जीर्ण शीर्ण अवस्था को देखते हुए  शहर के गणमान्य लोगों ने मिलकर एक समिति बनाई और मंदिर के जीर्णोद्धार का जिम्मा ले लिया । समिति ने प्रयास कर शहर के धनाढ्य और श्रद्धालु लोगों से पैसा इकठ्ठा किया और मंदिर बनने लगा । तीन ओर से दुकाने निकाल दी गईं और उन्हें किराये से दे दिया गया ताकि मंदिर का निर्माण कार्य आगे बढ़ता रहे और अन्य खर्चे भी पूरे हो सकें । 
मंदिर के भीतर का दृश्य 
इस मंदिर के बारे में हम लोगों ने बहुत सी बातें सुन रखी थीं जिनमे से एक यह भी थी कि वहाँ कभी मनुष्यों की बलि चढ़ाई जाती थी । मोहल्ले के हमारे बड़े भाई लोग बहुत भयावह ढंग से उस बलि प्रथा का वर्णन भी करते थे ।  मनुष्यों अथवा प्राणियों की बलि की बात उस समय तक हम लोगों ने केवल किस्से कहानियों में ही पढ़ी थी ।

मंदिर के प्रांगण में रखी अनगढ़ सी उन प्राचीन मूर्तियों के काले पत्थरों के बीच कहीं कहीं हल्की सी लाल लाल धारियाँ दिखाई देती थीं जिनके बारे में किंवदंती थी कि वह दरारों से झाँकता हुआ बलि चढ़ाये गए मनुष्यों का रक्त है । यह तो हमें बाद में ज्ञात हुआ कि उन पत्थरों की प्राकृतिक संरचना ही कुछ ऐसी थी । यद्यपि पूरे बैतूल में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जिसने वहाँ किसी को नर बलि चढाते हुए देखा हो इसलिए इस किंवदंती पर हमें कभी विश्वास ही नहीं हुआ ৷ हालाँकि देवी को पशुबलि चढाने की प्रथा अवश्य थी जो कई वर्षों तक चलती रही लेकिन वह भी उस समय तक बंद हो चुकी थी ।

अब तो बैतूल में बालाजी पुरम नाम से एक भव्य मंदिर बन गया है जो बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है । यहाँ कृत्रिम झरने हैं , कृतिम गुफाएं हैं और कृत्रिम मन्दाकिनी भी बनाई गई है । देश विदेश से पर्यटक यहाँ आते हैं लेकिन बैतूल शहर के पुराने लोगों का मन तो अभी कोठीबाज़ार के दुर्गा मंदिर में  माता के चरणों की वंदना में लगा रहता है वे कृष्ण मंदिर में अभी भी वही आरती गाते हैं और रामनवमी के दिन धनिया का प्रसाद खाने दौड़ जाते हैं ।

बालाजी पुरम 
बैतूल के बारे में यह भी सुना था कि बैतूल में अंग्रेज़ों से पहले के गोंड राजाओं के समय अपराधियों को सज़ा देने के लिये उनकी नाक काट कर उन्हें बदनूर कर दिया कर दिया जाता था  इसलिए इस जगह का नाम बदनूर रखा गया था । कुछ आलिम फ़ाज़िल लोगों का यह भी कहना था कि बैतूल में मुग़लों के समय सरकारी खजाना रखा जाता था । अरबी में बैतुल का अर्थ खजाना होता है इसलिए इसका नाम बैतूल हो गया ৷ हालाँकि बैतूल आदिवासी क्षेत्र था और वहाँ मुस्लिम प्रभाव नहीं था अतः इस पर विश्वास करना कठिन था । वैसे एक मान्यता यह भी थी कि अंग्रेज़ों की पसंद कपास यानि तूल वहाँ नहीं होता था इसलिए बिना कपास का क्षेत्र बेतूल कहलाया ।  


शरद कोकास 

48. फलीभूत हुआ दूधों नहाओ पूतों फलों का आशीर्वाद


संयुक्त परिवार बादलों से भरे उस आसमान की तरह होता है जहाँ मौत हवा के झोंके की तरह आती है और पुराने बादलों को उड़ा ले जाती है । फिर उन बादलों की जगह लेने के लिए दूसरे बादल आ जाते हैं । विश्वेश्वर प्रसाद जी के पांच पुत्रों में से सबसे छोटे चन्दनलाल और सबसे बड़े बाबूलाल के गुजर जाने के बाद उनके शेष तीन पुत्र कई बरस जीवित रहे। बाबूलाल जी से छोटे थे ब्रजलाल जी । उन्हें सब लोग ‘बड़े काका’ कहते थे । अपनी जेठानी राजरानी की तरह दादी जी का नाम राजप्यारी था, उन्हें ब्रजरानी भी कहते थे । ब्रजरानी दादी के तीन बेटों में सबसे बड़े बेटे रमेश नागपुर में रेल्वे में टी टी थे ।

संयुक्त परिवार के बच्चे जब नौकरी या रोजगार के सिलसिले में माँ से दूर चले जाते है तब माँ उनके साथ नहीं जाती। वह अपने अन्य बेटों के साथ उसी घर में रहना पसंद करती है जहाँ वह बहू बन कर आई थी । लेकिन उन बच्चों के लिए माँ की चिंता पास रहने वाले बच्चों से अधिक होती है । जब भी हम लोग भंडारा नागपुर से होते हुए बैतूल जाते, दादी माँ हम लोगों से रमेश चाचा के हाल चाल अवश्य पूछती थीं ।

प्रणय प्रभात और ब्रजरानी दादी 

रमेश चाचा का विवाह माँ की छोटी बहन लीला से हुआ था इसलिए रिश्ते में वे मेरे मौसाजी भी लगते थे । यद्यपि प्रथम सम्बन्ध के अनुसार मैं उन्हें चाचा ही कहता था । लीला मौसी तो खैर मेरी एकमात्र सगी मौसी थी ही । रमेश चाचा, मौसी, बड़े बेटे प्रभात,दो बेटियों संध्या व निशा के साथ इतवारी नागपुर में इतवारी रेलवे स्टेशन के निकट जुलाहों की एक बस्ती में रहते थे ।  छोटे बेटे प्रणय का तब जन्म नहीं हुआ था । उनसे छोटे दोनों भाई सुरेश व दिनेश बैतूल में ही रहते थे । 

रमेश चाचा व लीला मौसी 

सुरेश काका उस समय कॉलेज स्टूडेंट थे । बाबूजी के बाद उनकी पीढ़ी में प्राणिशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर वे पहले साइंस पोस्ट ग्रेजुएट हुए । । सुरेश काका का विवाह बाद में सन बहत्तर में महू में बिहारी लाल शर्मा जी की बेटी संतोष से हुआ और उनकी संतानें हुईं प्रतुल, तुषार और शिशिर ।

संतोष चाची और मैं 

ब्रजलाल जी के सबसे छोटे बेटे यानि दिनेश काका हम बड़े बच्चों से बहुत अधिक बड़े नहीं थे इसलिए वे हम लोगों से बहुत घुले मिले थे। 
सुरेशकाका 

ब्रजलाल दादाजी की चार बेटियों में से तारा और शीला निधन बचपन में ही हो गया था ।
छोटी बेटी छाया उस समय स्कूल में पढ़ रही थीं ।

छाया बुआ और अशोक फूफाजी 

बड़ी बेटी माया का विवाह भुसावल में श्रीनाथ शर्मा जी के साथ हो चुका था । श्रीनाथ फूफाजी रेलवे में वरिष्ठ चालक  थे । उनके बेटे राजेश और बेटी रेखा थे। उसके बाद उनसे छोटे महेंद्र,रेखा,उमा,सीमा,विमला,रवींद्र और पुष्पा हुए । उस समय छाया बुआ स्कूल में पढ़ती थीं । उनका विवाह सन उन्यासी में मुंबई के अशोक शर्मा जी के साथ हुआ जो फैशन डिज़ाईनर थे । फिर उनकी संतानें हुईं सपना और सपन । 

छाया बुआ के विवाह के पश्चात सन अस्सी में दिनेश काका का विवाह भी कामठी में हमारी बड़ी माँ हेमलता देवी की भांजी और हमारे रामप्रसाद मामा की बेटी सुमित्रा से हुआ । इस तरह से उस परिवार से हमारा दोहरा रिश्ता हो गया । कामठी मेरे बचपन की स्मृतियों में शामिल रहा  । दिनेश काका और सुमित्रा चाची की संतानें हुईं प्रवेश, निषेध और आकांक्षा । 

दिनेश काका का विवाह 

अक्सर लोग जब अपने पूर्वजों के वंश का बखान करते हैं तो उसमें केवल बेटों का ही ज़िक्र करते हैं लेकिन मैंने वंशावली बनाते हुए पितृसत्ता की इस परंपरा को नकार कर बेटियों को भी वंश में शामिल किया । बैतूल के हमारे परिवार में दादाओं के अलावा उनकी पाँच सगी बहनें यानि मेरी पाँच दादी बुआएँ भी थीं जिनके नाम थे ललता बाई, रन्नो बाई, नारायणी बाई, बिरजन बाई और इन्द्राणी बाई यानि बिट्टी बुआ। मुझे केवल बिरजन दादी बुआ और बिट्टी बुआ की याद है । गर्मी की छुट्टियों में बिरजन दादी बुआ के बच्चे यानि रज्जन काका, मुरारी काका , विपिन चाचा,  राजकुमारी व कृष्णा बुआ तथा बिट्टी बुआ की बेटी शीला भी आ जाया करते थे । यह सभी लोग नागपुर के बबूलखेड़ा के निवासी थे और हम लोगों की बैतूल के अलावा नागपुर में भी सबसे मुलाकात होती थी । 

हमारे आदि पूर्वज बलदू प्रसाद जी का यह परिवार उनके पोते के पोते विश्वेश्वर के माध्यम से बैतूल में वृद्धि कर रहा था लेकिन उनकी फतेहपुर, अमरावती और मुंबई शाखा के वंशज भी आपस में जुड़े हुए थे । हमारे दादाओं के चचेरे भाई अमरावती स्थित मेरे दादा जी  नत्थूलाल जी शर्मा के बेटे गणेश, उनकी बेटी कुसुम और उनके परिवार के बच्चे योगेश, मनीष ,आशीष, रीतेश वगैरह भी विभिन्न कालावधि में आते रहे । शादियों में तो फतेहपुर से दादा गणेश प्रसाद और उनके बच्चे राजकुमार, लक्ष्मी आदि भी आते रहे । मुंबई से रामप्रसाद बाबा  भी सपरिवार आते थे । और इनके अलावा जाने कितने रिश्तेदारों के रिश्तेदार जैसे हमारे मामा के बेटे आनंद , नंदकिशोर ब्रजकिशोर फूफाजी के भाई नवल किशोर रामदास फूफाजी के भाई भरत चाचा, लखन फूफाजी, आदि भी सपरिवार हमेशा आते रहे ।   

मेरे बचपन के उन प्रारंभिक दिनों में परिवार इतना बड़ा नहीं था इसलिए कि  बहुत सारे भाई बहनों का उस समय तक आगमन ही नहीं हुआ था । बच्चों के साथ खेलने वालों में चन्दनलाल दादाजी के एकमात्र बेटे थे किशन काका जो बुद्धि में हम बच्चों जैसे ही सहज और सरल थे । दिनेश काका, उपेन्द्र चाचा, बच्चन भैया ,संतोष व लल्ली भैया तो काफी बड़े थे । वहीं ऊषा बुआ, सरोज बुआ , छाया बुआ ,मुल्लू भैया और मधु जीजी, नांदगाँव वाले राजू भैया आदि मुझसे बड़े थे और बिन्नू भैया लगभग बराबरी के , प्रभात, भारती, राजेंद्र  व मुन्ना कक्कू कुछ छोटे  । अन्य बच्चों में सीमा के बराबर के राजू , राकेश और मनोज थे । 

१९६४  में बैतूल के बच्चे 

पता नहीं हमारे परदादाओं में से किसे किसी संत महात्मा ने दूधों नहाओ पूतों फलों का आशीर्वाद दिया था कि आठ दस बच्चे सभी दादाओं के हुए । ग़नीमत की हमारी पीढ़ी तक इस आशीर्वाद का प्रभाव समाप्त  हो गया वर्ना बहुत मुश्किल हो जाती । फिर चाचाओं और बुआओं की शादियाँ होती गईं और घर फलता फूलता गया ।सारे बच्चे गर्मियों में बैतूल में इकठ्ठा होते थे । इस तरह लगभग तीस पैंतीस लोगों के इस संयुक्त परिवार की गर्मी की छुट्टियों में सदस्य संख्या पचास साठ के लगभग हो जाती थी । खेलने के लिए जगह की कमी नहीं थी, दो मकान, बीच में बहुत सारी खुली जगह ,खुला खुला सा मोहल्ला और घर के पास ही खेत । 

अब मल्टी स्टोरी बिल्डिंग के फ़्लैट सिस्टम और सोसायटी में रहने वाले बच्चे उन बच्चों की तरह बचपन के दिनों का अनुभव नहीं कर सकते जब किताबें और कापियाँ गठ्ठर बंधकर रख दी जाती थीं । अब लोगों के घर जितने छोटे हो चले हैं मन उससे भी छोटे । इसमें कुछ अस्वाभाविक नहीं हैं । रोजी रोटी के लिए बच्चे घर से बाहर जा रहे हैं इसलिए एकल परिवार बनना अनिवार्य है । बस ज़रूरी है कि इन परिवारों की जड़ें कहीं गांवों, कस्बों या नगरों में सुरक्षित रहें ताकि इनके बच्चे भी बड़े होकर कह सकें कि हम भी गर्मी की छुट्टियों में अपने दादा या नाना के यहाँ जाते थे ।   

शरद कोकास