धान को भट्टी पर चढ़े कढ़ाव में रेत के संग भून कर भी अनेक खाद्य पदार्थ बनते हैं जिनमे मुझे सबसे अधिक पसंद है लाई,लावा या खील । बालकमन्दिर से लौटने के बाद शाम को मेरा प्रिय नाश्ता होता था दूध और धान की लाई । भंडारा में धान की खेती होती थी इसलिए चावल सस्ता था । धान से लाई, मुरमुरा और पोहा बनाने का गृह उद्योग तो सदियों से ग्रामीण संस्कृति का अंग रहा है ।
उन दिनों भंडारा में गाँधी चौक के आगे मेन रोड पर गुप्ता जी की एक दुकान हुआ करती थी जिसमे फुटाणा यानि फूटा हुआ चना, मुरमुरा,लाई, भुनी मूंगफल्ली,भुना मक्का , रेवड़ी आदि मिलते थे । गुप्ता जी उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे और अपने पूरे परिवार के साथ वहीं दुकान के पिछवाड़े रहते थे । उनके घर के पीछे आदर्श टाकीज से लगी हुई गली थी । गुप्ता जी बाबूजी का बहुत सम्मान करते थे इसलिए कि हमारे पुरखे भी यू पी के रहने वाले थे । वे अक्सर कहते “ गुरूजी तो हमारे देस वाले हैं ।“
गुप्ता जी की दुकान में सामने की ओर ढाबे वाली स्टाइल में एक भट्टी बनी थी जिस पर एक बड़ा सा कढ़ाव हल्का सा टेढ़ा कर फिक्स कर दिया गया था । इस में रेत गर्म की जाती थी । धान को भिगोकर सुखाकर फिर गर्म रेत में भूना जाता था जिससे धान खिल जाता और उसके भीतर का चावल का दाना लाई बनकर फूट पड़ता ।
फिर उसे छान कर रेत से अलग कर लिया जाता । उसी तरह मुरमुरा बनाने के लिए उसना चावल पहले भिगोया जाता फिर उसमे नमक मिलाकर जैसे ही उसे भट्टी की कढ़ाई की गर्म रेत में डाला जाता वह नर्म नाज़ुक कुरकुरा सा मुरमुरा बन जाता ।
धान से पोहा बनाने के लिए उसे साफ किया जाता, फिर पंद्रह सोलह घंटे भिगोकर रखने के बाद भूना जाता । इस भुने हुए धान को लकड़ी के मूसल से कूटने पर पोहा अलग हो जाता था और धान अलग । उस समय तक भंडारा में पोहा मिले स्थापित हो चुकी थीं, वहाँ हाथ से कूटने की बजाय भुने धान से प्रेस मशीन द्वारा पोहा अलग किया जाता था । लेकिन गुप्ता जी के यहाँ हाथ कुटाई वाला पोहा ही मिलता था जो मशीन वाले पोहे की तुलना में अधिक स्वादिष्ट होता था ।
इसी मोटे पोहे को फिर से गर्म रेत में डाल दिया जाता तो उसके फूटने से सकुचाई शरमाई सी चिवड़ी बन जाता । इसी चिवड़ी को तेल में तलकर अन्य वस्तुओं व मसालों के साथ मिलाया जाता तो वह अपना लिंग परिवर्तन कर बाज़ार में मिलने वाला नमकीन चिवड़ा बन जाता ।
गुप्ता जी धान को भिगोने, छाँटने आदि के बाद रोज़ सुबह भट्टी सुलगा देते थे । रेत गर्म होते ही उसमे वे धान डालते, एक तेज़ लपट धुएँ के साथ ऊपर उठती, गुप्ता जी हाथ में एक बड़ी से छन्नी होती थी जिससे वे गर्म गर्म रेत में फूटते हुए लावे को छानकर निकालते । बाद में मुझे पता चला कि यही भट्टी भाड़ कहलाती है और इस पर धान से लाई या मक्के से पॉप कॉर्न निकालने वाले को भड़भून्जा कहते हैं । भाड़ झोंकना या भाड़ में जाना जैसे मुहावरे भी इसी भाड़ से बने हैं ।
लाई और दूध के नाश्ते में दूसरा हिस्सा था दूध का । दूध पांढराबोड़ी गाँव के श्री राजाराम गभने लेकर आते थे । राजाराम बाबूजी के प्रिय पात्र थे और जब से बाबूजी भंडारा आये थे दूध देने वही आते थे । धमनियों में खून की तरह हम लोगों की अंतड़ियों में उन्हीके यहाँ की भैंसों का दूध बहता था । बाबूजी उन्हें बहुत चाहते थे, यहाँ तक कि जब वे अपने स्टूडेंट्स के साथ बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज की शैक्षणिक यात्रा पर भारत भ्रमण के लिये निकले तब वे राजाराम जी को भी अपने साथ ले गये थे ।
राजाराम जी दूध में चाहे जितना पानी मिलाते , बाबूजी स्नेहवश उन्हें कुछ नहीं कहते थे । अनेक वर्षों बाद माँ के लगातार कहते रहने के बाद उनसे दूध लेना बन्द किया गया । माँ बार बार यही कहती थी कि दूधवाले और सोने के गहने बनाने वाले का कोई भरोसा नहीं होता, वे मिलावट करते ही हैं ।लेकिन बाबूजी माँ की बात पर ध्यान न देकर राजाराम जी पर ही ज़्यादा भरोसा करते थे, समय समय पर उन्हें दूध की कीमत भी बढाकर दिया करते थे । पैसे बढ़ने के बाद राजाराम जी कुछ दिनों तक तो शुद्ध दूध लाते फिर वही ढाक के तीन पात । भैंस ज़्यादा पानी पी लेती है इसलिए दूध पतला देती है यह वैज्ञानिक रिसर्च उन्हीके पुरखों ने की थी ।
हमारे यहाँ दूध का उपयोग चाय बनाने के लिए अधिक होता था । कभी कभार ही हम बच्चों को दूध रोटी या दूध लाई खाने को मिलती थी इसलिए हम लोगों की हड्डियों में कैल्शियम की कमी हमेशा बनी रही । फिर भी हम लोग उन कुपोषित बच्चों से बहुत बेहतर थे जिन्हें दूध पीने को क्या देखने तक को नहीं मिलता था । आज भी देश में बहुत बेहतर स्थिति नहीं है, बल्कि स्थिति पहले से ज़्यादा ख़राब है । शासन की पोषण आहार योजना का सच सबके सामने है । इस योजना के अंतर्गत बच्चों को मिड डे मील के नाम पर केवल खाना पूर्ति की जाती है । इस मिड डे मील में भी क्या मिलता है, सब जानते हैं ।
आपका
शरद कोकास
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