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22 अप्रैल 2026

20.भंडारा : भूख के पक्ष में आदिम बहस



देशबंधु वार्ड का यह कच्चा मकान ग.भा.पार्वतीबाई के साम्राज्य का एक हिस्सा था ৷ उनका खेत और एक मकान भंडारा से बीस किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे के निकट बसे गड़ेगाँव में था ৷ बड़े बेटे ठाकुर जगमोहन सिंह नागपुर में रहा करते थे ৷ उनके एक बेटा और दो बेटियाँ थीं जिनमें एक का नाम शीला था ৷ माँ का यही नाम होने के कारण वह नाम मुझे याद है । पार्वतीबाई अर्थात नानी के छोटे बेटे विजयमोहन सिंह गोंदिया में बिजली विभाग में नौकरी किया करते थे । । विजय काका की पोस्टिंग गोंदिया में थी लेकिन भंडारा ज़िला उनका मुख्यालय था इसलिए वे कभी कभी ऑफिस के काम से भंडारा आ जाते थे । बाबूजी को वे अपने बड़े भाई की तरह ही मानते थे, वैसे भी उनके सगे बड़े भाई का नाम जगमोहन था ।

 विजय काका बिजली विभाग में मीटर रीडर थे । उन दिनों बिजली के मीटर के भीतर एक गोल चक्का हुआ करता था जो बिजली का उपयोग करने की स्थिति में तेज़ी से घूमता था अन्यथा स्थिर रहता था । एक दिन उन्होंने बाबूजी को मीटर खोलकर घूमने वाले चक्के को रोककर बिजली चोरी करने का तरीका बताया कि आप बिजली का उपयोग भी करते रहें और चक्का भी न घूमे । इसमें एक छोटी सी ट्रिक थी जिसमे चक्के को घुमाने वाली लोहे की एक छोटी सी पट्टी को पेंचकस से खोलकर नीचे गिराना होता था । जैसे ही पट्टी का संपर्क  चक्के से टूटता चक्का घूमना बंद हो जाता और बिजली का प्रवाह भी निरंतर जारी रहता । ज़ाहिर है इससे बिल बहुत कम आता ।

 वे कहते थे आप इसे महीने भर गिरा कर रखो और जैसे ही विभाग के लोग मीटर रीडिंग करने आयें उसे जोड़ दो ताकि काम भी हो जाये और चोरी पकड़ी भी न जाए । यह उनके लिए बहुत सामान्य बात थी । लेकिन बाबूजी बिजली चोरी जैसी इस बात के बहुत खिलाफ़ थे । उन्होंने कहा “ अधिक बिल देना मुझे मंज़ूर है लेकिन मैं गलत काम नहीं करूँगा । मकान मालिक के खुद बिजली विभाग में होने की सुविधा के बावजूद एकाध बार के अलावा उन्होंने इस काम के लिए उन्हें कभी इज़ाज़त नहीं दी । 

 विजय काका जब भी भंडारा आते भोजन हमारे घर में ही करते थे । वैसे तो उनकी माँ पार्वतीबाई वहीं रहती थी लेकिन कभी कभी वे अपने खेतों की देखभाल के लिये या फसल की बुआई और कटाई के समय काफी दिनों के लिये गड़ेगाँव चली जाया करती थीं । उनकी अनुपस्थिति में विजय काका हमारे मेहमान होते । वे लोग शुद्ध शाकाहारी थे । पार्वती बाई ने मकान इसी शर्त पर किराये से दिया था कि वहाँ मांसाहार नहीं होगा । वैसे वे स्वयं बहुत छुआ छूत मानती थीं और बिना नहाये उनकी रसोई की ओर जाने की भी सख्त मनाही थी ।

 

वे जब भंडारा में नहीं होती थीं तब  कभी किसी रविवार को हमारे यहाँ मटन बनता था । माँ शुद्ध शाकाहारी थी और उन्हें मांस की गंध भी पसंद नहीं थी लेकिन बाबूजी बचपन से ही माँसाहारी थे ৷ हम बच्चे अपने आदिम पुरखों की भांति पितृ धर्म का निर्वाह कर रहे थे ৷

 

रविवार के इस विशेष दिन हमारे घर में हिन्दुस्तान पकिस्तान की तरह का नज़ारा होता था ৷ माँ ने हम लोगों का चूल्हा यानि स्टोव,पकाने और खाने के बर्तन अलग कर दिए थे । यही नहीं माँ तेल, मसाले, आलू , हरा धनिया सब कुछ पहले ही निकालकर अलग रख देती थीं । मटन खाने के लिए हमारे घर में तामचीनी की पीले रंग की बहुत सुन्दर प्लेटें थीं जिनपर नीले रंग से फूलों की डिज़ाइन बनी थी ৷ पकाने से लेकर बर्तन धोने तक का काम बाबूजी के ही ज़िम्मे था ৷

 हालाँकि यह सब करते हुए  हमें समाज से बहिष्कृत किये जाने वाली अनुभूति होती थी लेकिन जीभ के स्वाद के लिए हमें इस टाइप का सारा अपमान सहनीय था । माँ अपना खाना पका कर, खुद भोजन कर हम लोगों के लिए पर्याप्त रोटियां थापकर और चावल पकाकर पड़ोसनो से गपशप करने निकल जाती थी । उनके गमन के पश्चात तामसिक भोजन पकाने और उसे भक्षण करने का हम लोगों का यह पैशाचिक कृत्य प्रारंभ होता था ৷

 

एक रविवार को गज़ब हो गया । मटन पककर तैयार हो चुका था । हम भाई बहन अपनी अपनी तामचीनी की प्लेट लिए रोटियों के साथ बोटियां परोसे जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे कि टीन का वह दरवाज़ा खड़का और बाहर आँगन से आवाज़ आई “ भाभी, खाना खाऊंगा, भूख लगी है ।“  यह विजय काका की आवाज़ थी । बाबूजी पहले तो घबरा गये फिर जैसे ही विजय काका ऊपर अपना आवास देखने गये उन्होंने एक कपड़े से पके पकाये मटन का गर्म बर्तन पकड़ा और पिछले दरवाज़े से निकलकर पड़ोस के भेदरे काका के यहाँ रख आये ।

 फिर माँ को तुरंत पड़ोस से बुलाया गया और इस आपात स्थिति के बारे में उन्हें बताया गया । उन्होंने  पंद्रह बीस मिनट में ही आलू की सब्जी बनाकर रख दी ৷ फिर हम सब लोगों ने विजय काका के साथ बैठकर रोटी चावल और आलू की सब्ज़ी खाई । विजय काका बार बार आलू की सब्ज़ी सूंघते रहे ৷ उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि आलू की सब्ज़ी से मटन की गंध कैसे आ सकती है । शाम को उनके जाने के उपरांत ही हम लोगों को  उस मटन का स्वाद चखने का अवसर प्राप्त हुआ । हालाँकि इस बार हम लोग तृप्त नहीं हो पाए इसलिए कि बाबूजी भेदरे काका को बर्तन अपने घर रखने और उनकी इज्ज़त बचने के एवज में आधा मटन  दे आये थे । मटन वैसे भी महंगा होने के कारण हमारे घर में बहुत कम आता था ৷ विजय काका को यह बात उनके जीवन काल में कभी पता नहीं चली ৷

 

उस दिन माँ ने शाकाहार मांसाहार हो लेकर चली आ रही शाश्वत बहस में कोई भागीदारी नहीं की ৷ न ही बाबूजी ने आदिम समय से चली आ रही मनुष्य की अलग अलग फूड हैबिट्स पर कोई व्याख्यान दिया ৷ संसार की विभिन्न सभ्यताओं में उनके देवी देवताओं द्वारा मांस भक्षण किये जाने तथा जिव्हा के स्वाद की पूर्ति हेतु पशुओं की बलि दिए जाने की प्रथा पर भी कोई बात नहीं हुई न शाकाहारी वस्तुओं की गुणवत्ता और विभिन्न प्रकार के मांसों में शामिल खनिज और विटामिनों की उपस्थिति पर कोई भाषण झाड़ा गया ৷

 


4 जुलाई 2021

9. चांदूर : जनम से बंजारा हूँ बन्धु


ओवरसीयर की नौकरी से त्यागपत्र देने के बाद जगमोहन फर्नीचर की दुकान में जाकर बैठने लगे ৷ लेकिन वे अब पहले की तरह रंदा नहीं खिंचवाते थे ৷ उनके गुरुदेव भवानी प्रसाद मिश्र जी उस समय तक बैतूल से जा चुके थे इसलिए ऐसा कोई नहीं था जिनसे वे अपने मन की बातें कह सकें । हाँ उनके दो मित्र अवश्य थे कमल जायसवाल और मदन श्रीवास जो उनके बचपन के साथी थे ৷ मदन उस समय कलेक्टर कार्यालय में बाबू की नौकरी में लग चुके थे और कमल स्वयं का फोटोग्राफी का व्यवसाय शुरू कर चुके थे ৷ उन्होंने सलाह दी कि वहीं कोई छोटा मोटा काम ढूंढ लें घर के घर में रहेंगे ৷ लेकिन जगमोहन बाबू के सपनों का संसार इतना छोटा नहीं था ৷ फिर जिस शहर में ओवरसीयर रहे उसी शहर में किसी दफ्तर में क्लर्की करना उन्हें कैसे मंज़ूर होता ৷

आसपास तमाम शुभचिंतक लोगों के होते हुए भी वे नितांत अकेले थे ৷ यह अकेलापन भौतिक नहीं था लेकिन भीतर ही भीतर वे अपने आप को बहुत अकेला महसूस कर रहे थे ৷ कहने को वे अर्हताप्राप्त इंजिनियर थे  लेकिन अब वे किसी ऐसे महकमे में नौकरी नहीं करना चाहते थे जहाँ घूसखोरी, बेईमानी और झूठ का साम्राज्य हो । खुद का व्यवसाय करने लायक पूंजी उनके पास थी नहीं और उन दिनों इस तरह के प्राइवेट संस्थान होते नहीं थे जहाँ उनके लायक कोई काम हो ৷


बाबूलाल जी भी विवश थे ৷ आज़ादी के समय केवल राजनीतिक व्यवस्था में ही नहीं सामाजिक व्यवस्था में भी बहुत उथल पुथल हुई थी ৷ सरकारी व्यवस्थाएँ बदल चुकी थीं ৷ अंग्रेज़ अफसरों को फेयर वेल पार्टियाँ देकर उन्हें इंग्लैण्ड जाने वाले जहाज़ों में बिठाया जा चुका था और अब सरकारी महकमों में देशी अफसरों का साम्राज्य था  ৷ फर्नीचर बनाने का काम मिलना वैसे भी बहुत कम हो गया था ৷ बाबूलाल जी एक पादरी साहब के संपर्क में रहे थे और उनके प्रयासों से उनकी रूचि प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में बढ़ती जा रही थी ৷ बाबूलाल वैद्य नाम के एक प्रसिद्ध चिकित्सक का बनना अभी भविष्य की गर्त में छुपा था ৷ फिलहाल तो सीमित आमदनी में परिवार  का खर्च चलाना बहुत मुश्किल था इसलिए बेटे की कोई सहायता वे नहीं कर सकते थे ৷

अपनी स्वीकार की हुई बेरोजगारी से शर्मसार होकर जगमोहन अख़बारों की काली सफ़ेद लाइनों के बीच अपने भविष्य की संभावनाएँ ढूंढ रहे थे ৷ अचानक एक दिन मध्य प्रांत के किसी अखबार में उन्होंने चांदूर बाज़ार नामक एक कस्बे में किसी स्कूल शिक्षक की आवश्यकता के विषय में पढ़ा ৷ इस नौकरी के लिए मैट्रिक की अर्हता पर्याप्त थी ৷ लेकिन शिक्षण क्षेत्र में जाने का अर्थ था फिर तीन साल पीछे लौट जाना ৷ शिक्षा के क्षेत्र में उनका इंजीनियरिंग डिप्लोमाधारी होना कोई मायने नहीं रखता था ৷ वैसे भी डिप्लोमा की अहमियत स्नातक की डिग्री जितनी तो होती नहीं है इसलिए इतने साल पढ़ लेने के बाद भी वे ग्रेजुएट नहीं कहला सकते थे । एकेडेमिक क्षेत्र में उनकी योग्यता मैट्रिक पास ही थी ৷


समस्याएँ केवल वर्तमान के आईने की चमकने वाली सतह पर ही नहीं दिखाई दे रही थीं वे कहीं पीछे पुते हुए पारे में भी दर्ज थीं उन्हें हटाने के लिए उन्हें खुरचने का मतलब था आईने का बर्बाद हो जाना ৷ घर से बाहर जाने का अर्थ था, अकेले संघर्ष करना, अपने खर्चे सीमित करना, ख़ुद के आवास और भोजन की व्यवस्था करना और अपनों से दूर अपने लिए एक नई दुनिया निर्माण करना ৷ पढ़ने के लिए बाहर जाना और नौकरी के लिए बाहर जाना इन दोनों बातों में अंतर तो था ৷ वे एक ऐसे दोराहे पर खड़े थे जहाँ उन्हें यह तो ज्ञात था कि यह मार्ग कहाँ जाते हैं लेकिन मार्ग का चयन कर उस पर कदम रखने से पहले उन्हें गंभीरता से इस बारे में सोचना आवश्यक था ৷ कुछ दिनों तक मन बहलाने के लिए वे स्थानीय संस्थाओं में, दुकानों में नौकरी के लिए आवेदन देते हुए चप्पलें घिसते रहे फिर उन्होंने दृढ़ होकर निर्णय लिया और चांदूर रेलवे  के उस प्रायमरी स्कूल में नौकरी के लिए अर्जी दे दी৷ कुछ ही समय में वहाँ से जवाब आ गया ৷ प्राथमिक शाला के शिक्षक पद के लिए वहाँ उनका चयन हो चुका था ।

बैतूल से लगभग सवा सौ  किलोमीटर दूर स्थित चांदूर रेलवे एक छोटा सा क़स्बा था लेकिन शैक्षणिक दृष्टिकोण से उसका विकास हो चुका था ৷ मध्यप्रांत जहाँ मूलतः हिंदी और मराठी भाषी लोग रहा करते थे धीरे धीरे विकास की गति पकड़ रहा था ৷ वर्तमान अमरावती ज़िले के अंतर्गत आने वाला यह क़स्बा राजनीतिक दृष्टि से काफ़ी सजग था ৷


जगमोहन बाबू अब कोकास गुरूजी हो चुके थे स्थानीय निवासियों ने उनके भोजन और रहने की व्यवस्था कर दी ৷ गुरूजी हिन्दी के विशेषज्ञ थे और उस समय मराठी में पढ़ाने की कोई अनिवार्यता भी नहीं थी फिर भी उन्होंने तुरंत मराठी सीखनी प्रारंभ कर दी और कुछ ही समय में मराठी पर भी उनका अधिकार हो गया ৷ छुट्टियाँ होते ही वे बैतूल लौट जाते थे और फिर माता-पिता और काकाओं के सान्निध्य में रहकर अपने फेफड़ों में ढेर सारी प्राण वायु भरकर चांदूर आ जाते थे ৷

चांदूर रेलवे उन्हें रास आ रहा था लेकिन वे जानते थे इस मैट्रिक पास योग्यता के साथ भविष्य के सुनहरे स्वप्न देखना शेखचिल्ली के ख़्वाब की तरह होगा ৷ नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद वे सागर यूनिवर्सिटी से बी ए प्रथम वर्ष की प्राइवेट परीक्षा का फॉर्म भर ही चुके थे ৷ अब उनकी दोहरी ज़िंदगी शुरू हो चुकी थी वे शिक्षक भी थे और छात्र भी ৷ ज़िंदगी करवट ले रही थी৷

अभावों से भरा यह जीवन उन्होंने खुद चुना था । अपने बड़े भाइयों की तरह वे किसान या बढ़ई नहीं होना चाहते थे । यद्यपि इसमें कोई बुराई नहीं थी लेकिन फिर उनकी तीन साल की पढ़ाई व्यर्थ हो जाती और उनके गुरुदेव भवानी दादा के स्वप्न भी मिटटी में मिल जाते इसलिये स्कूल में शिक्षक की नौकरी करते हुए अपने खर्च पर उन्होंने बी.ए. किया, फिर जबलपुर के प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय से बी.टी. किया, फिर हिन्दी साहित्य में एम ए किया, और प्रयाग से साहित्यरत्न की परीक्षा पास कर ली ।

जीवन पथ  पर आगे बढ़ते हुए वे अपने गुरु भवानी प्रसाद मिश्र जी के अहसान को कभी नहीं भूले । वे हमेशा कहते थे कि अगर सर नहीं होते तो शायद वे जीवन भर बैतूल में उसी फर्नीचर की दूकान में ही काम करते रहते ৷ भवानी प्रसाद मिश्र जी के बारे में बाते करते हुए वे गौरवान्वित हो उठते ৷ वे अक्सर कहते थे कि “एक कवि समाज की बेहतरी के लिए कविता लिखता है लेकिन वह जब तक समाज में दीन  दुखियों, गरीबों के उत्थान लिए वास्तविक रूप से कार्य नहीं करता है तब उसका लिखना सार्थक नहीं होता है ।“

एक बार मैंने बाबूजी से पूछा “आप हिन्दी के इतने बड़े कवि के शिष्य रहे , आपने कभी कोई कविता नहीं लिखी ? “ उन्होंने बताया कि स्कूल के दिनों में वे एक कविता लिख कर भवानी प्रसाद मिश्र जी के पास ले गए थे ৷तब उन्होंने उनकी कविता की प्रशंसा की थी लेकिन उनसे यह भी कहा था कि तुम्हारा काम कविता लिखना नहीं है, तुम्हारा जन्म देश की सेवा करने के लिए और हिन्दी की सेवा करने के लिए हुआ है ৷ पहले दायित्व का निर्वाह तो उन्होंने बचपन से प्रारंभ कर दिया था ৷ आगे चल कर बाबूजी  महाराष्ट्र में हिन्दी के प्रचारक बने ৷ कविताएँ तो उन्होंने नहीं लिखीं लेकिन कुछ लेख अवश्य लिखे ৷ लेकिन वे जीवन भर भवानी भाई को याद करते रहे ৷ वे हमेशा कहते थे कि “मैं जो कुछ हूँ मिश्रा सर की वजह से हूँ ৷”

चांदूर रेलवे के बाद इस बीच वे कुछ समय के लिए अमरावती जिले की तहसील मोर्शी के अंतर्गत आनेवाले एक गाँव उमरखेड भी पहुँच गए ৷ वहाँ भी उन्हें शिक्षक की नौकरी मिली ৷ यह नौकरी चांदूर की नौकरी से कुछ बेहतर थी ৷ फिर वे अपने छात्र छात्राओं के बीच बहुत लोकप्रिय भी थे ৷ एक बार जब वे बैतूल लौटे तो बाबूलालजी ने उन्हें बताया कि वे झाँसी में रहने वाले दरोगा साहब दुर्गा प्रसाद शर्मा की बिटिया शीला से उनका रिश्ता तय कर चुके हैं और बस उन्हें बारात लेकर जाना है ৷


मेरी माँ ‘झाँसी वाली दुल्हन‘ बनकर बैतूल के हमारे परिवार में आ गई ৷ उस समय बाबूजी उमरखेड में थे ৷ माँ कुछ समय के लिए उमरखेड पहुँची ৷ उत्तर प्रदेश की एक लड़की के लिए महाराष्ट्र का वह वातावरण बिलकुल ही नया था लेकिन उन्होंने धीरे धीरे उसे समझना प्रारम्भ किया ৷ उमरखेड के बारे में माँ एक किस्सा सुनाती थी ৷

माँ उन दिनों बस उमरखेड आई ही थी कि एक दिन उनके घर में चोरी हो गई ৷ माँ सारे जेवर एक बड़ी सी टीन की पेटी में रखती थी ৷ एक दिन सुबह सुबह लगभग चार बजे किसी देहाती चोर ने घर में प्रवेश किया और चुपचाप वह पेटी उठाकर ले गया ৷ उसे पता था कि इस घर में नई दुल्हन आई है इसलिए अच्छे खासे जेवर तो यहाँ मिल ही जायेंगे ৷पेटी में ताला लगा था इसलिए उसे तोड़ना ज़रूरी था ৷ घर में ही तोड़ता तो पकड़ा जाता इसलिए वह पेटी लेकर पास के खेत में चला गया ৷इससे पहले कि वह पेटी का ताला तोड़ पाता सुबह सुबह लोटा लेकर जाने वाली महिलाओं के समूह ने उसे देख लिया ৷ उनके शोर मचाते ही वह भाग गया और पेटी सही सलामत घर में वापस आ गई ৷



माँ का उमरखेड निवास बहुत अल्प समय के लिए रहा৷ उसके बाद बाबूजी का चयन बी एड के लिए जबलपुर स्थित प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय में हो गया और वे साल भर के लिए वहाँ चले गए ৷ माँ का स्थायी ठिकाना एक वर्ष के लिए बैतूल में हो चुका था ৷ जबलपुर में एक वर्ष बिताने के पश्चात बाबूजी जैसे ही  वापस आये नागपुर के हिंदी भाषी संघ के विद्यालय में शिक्षक के पद के लिए उनका चयन हो गया৷ शिक्षक के लिए अब वे पूरी तरह से क्वालिफाइड थे ৷ नागपुर शहर भी बड़ा था और बेहतर भविष्य के लिए यहाँ बहुत गुंजाइश थी ৷ नागपुर में रहते हुए ही उन्हें पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में इंस्ट्रक्टर के पद का ऑफर मिला और उन्होंने वह भी ज्वाइन कर लिया ৷

नागपुर के इस पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में उनका रुतबा तो बहुत था लेकिन उन्हें बच्चों को पढ़ाने  में जो आनंद आता था वैसा आनंद बड़ी उम्र के पुलिस कर्मियों को मनोविज्ञान पढ़ाने में नहीं आता था ৷ इस बीच उन्होंने हिंदी साहित्य में एम ए भी कर लिया था और प्रयाग से हिंदी साहित्यरत्न की परीक्षा भी पास कर ली थी ৷ अब उनके पास अवसरों की कमी नहीं थी ৷ वे बेहतर नौकरी की तलाश में लगे थे और उन्हें यह अवसर मिला जब वे भंडारा के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में शिक्षक बनकर आये 

अपनी युवावस्था में ही बाबूजी ने यह तय कर लिया था कि भले ही वे सरकारी नौकरी में रहें या ना रहें लेकिन उन्हें जीवन भर दर दर  भटकना नहीं है ৷ इसलिए बैतूल से निकलकर चांदूर, उमरखेड,नागपुर होते हुए जब वे भंडारा आये तो यह छोटा सा शहर उन्हें पसंद आ गया ৷ यह उनके जन्मगृह बैतूल से अधिक दूर भी नहीं था ৷ फिर यही रहकर उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से इतिहास में एम ए किया और एम एड की परीक्षा पास की ৷ बरसों बरस किराये के मकान में रहने के बाद उन्होंने यहीं मकान बना लिया और जीवन के अंत तक वे यहीं रहे ৷ अब उनकी दो संतानें अर्थात मेरे छोटे भाई और बहन भंडारा में अपना घर बसा चुके हैं ৷

 शरद कोकास 

 

1 जुलाई 2021

8 . नागपुर : बैतूल : ऐसी नौकरी से तो बेरोज़गारी अच्छी



यह वह दौर था जब कवि और लेखक मानवता, परोपकार,प्रेम, और भाईचारे की बात केवल अपनी रचना में ही नहीं करते थे बल्कि यह सब कुछ उनके जीवन, उनके आदर्शों एवं क्रियाकलाप में भी शामिल था ৷ उनकी रचना के सामाजिक सरोकार उनके जीवन में विद्यमान थे ৷ अपने प्रिय शिष्य जगमोहन के पॉलिटेक्निक कॉलेज नागपुर में एडमिशन हेतु भवानी प्रसाद मिश्र जी ने समस्त कार्यवाही संपन्न की और एक दिन कॉलेज से आया एक पत्र लेकर जगमोहन नागपुर पहुँच गए ৷ नागपुर शहर उनके लिए बिलकुल ही अनजान था ৷ यद्यपि अपनी बुआ, बड़ी बहन विद्यावती और जीजा शिवनाथ जी कोकास से उन्होंने नागपुर के बारे में सुन रखा था ৷ वे लोग नागपुर के एक संपन्न इलाके धंतोली में रहते थे ৷


जगमोहन का एडमिशन करवाने के लिए उनके जीजा शिवनाथ जी उन्हें कॉलेज ले गए । प्रवेश हेतु फॉर्म भरते हुए मराठी भाषी क्लर्क ने उनका नाम पूछा “तुमचं नाव काय आहे ?” उन्होंने अपना नाम बता दिया फिर पूछा गया “वडिला चे नाव काय ?” यानि पिता का नाम क्या है ? उन्होंने कहा “बाबूलाल“ “अच्छा, आडनाव ?”  जगमोहन की समझ में नहीं आया कि वे क्या पूछ रहे हैं । यद्यपि एक समय मराठा राज्य के अंतर्गत आने के कारण बैतूल में मराठी भाषी अनेक लोग थे लेकिन हमारे घर के लोगों के भाषाई संस्कार हिन्दी के ही थे ৷

उनके जीजा शिवनाथ जी ने बताया “ यह महोदय सरनेम पूछ रहे हैं ।“ उस समय तक सरनेम लिखने की कोई परंपरा हमारे घर में नहीं थी, बैतूल में शाला में दाखिले के समय जो नाम लिखाया जाता था उसमे जगमोहन वल्द बाबूलाल , रमेश वल्द बृजलाल, मनोहर वल्द कुंदनलाल इतना लिख देना ही पर्याप्त होता था । बहुत हुआ तो जाति भी साथ में लिख दी जाती थी ৷ उनकी मैट्रिक की अंक सूची में भी बस नाम और पिता का नाम ही था ৷


लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा नहीं था ৷ यहाँ नाम के साथ केवल पिता का नाम ही नहीं बल्कि सरनेम लगाने की भी परंपरा थी । जगमोहन बाबू कुछ पसोपेश में पड़ गए ৷ क्लर्क ने रास्ता निकाला ৷ उसने साथ आये शिवनाथ जी से पूछा “ तुमचा आडनाव काय ?” यानि आपका सरनेम क्या है ? शिवनाथ जी ने कहा “कोकास ৷ ” बस क्लर्क ने नाम लिख लिया ‘जगमोहन बाबूलाल कोकास’, जो आगे चल कर उनकी डिग्रियों में भी लिखा गया और नौकरी में फिर यह जे. बी. कोकास हो गया ৷ इस तरह हमारे परिवार को एक उपनाम मिल गया । आने वाले समय में जब उनके छोटे भाइयों को सरनेम की आवश्यकता महसूस हुई यही सरनेम कोकास लिखा गया किन्तु फिर किसी लिपिकीय चूक अथवा उच्चारण दोष की वज़ह से ‘स’ के स्थान पर ‘श’ हो गया ৷ अब बैतूल की हमारे परिवार की पीढियां अपना सरनेम ‘कोकाश’ लिख रही हैं वहीं मेरे लकड़दादा बलदू प्रसाद जी के रायबरेली और फतेहपुर में रहने वाले वंशज अपना उपनाम ‘शर्मा’ लिख रहे हैं ৷

धन्तोली में रहने वाले जीजा शिवनाथ जी कोकास, विद्या जीजी और बबूलखेड़ा में रहने वाली बुआ बिरजन बाई और फूफा महादेव प्रसाद के संरक्षण में जगमोहन के तीन वर्ष देखते देखते निकल गए ৷ कस्बे से बड़े शहर में आना एक तरह से सपनों के नये  संसार में प्रवेश करना था ৷  पालीटेक्नीक से सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त करने के पश्चात बाबूजी बैतूल आ गए । उस समय यह शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी । उन्हें तत्काल ही लोक निर्माण विभाग में ओवरसीयर नौकरी भी मिल गई । वैसे भी उस समय देश बस आज़ाद हुआ ही था और पढ़े लिखे लोगों के लिए नौकरी की कोई कमी नहीं थी । उन दिनों ओवरसीयर की यह नौकरी आज के जूनियर इंजिनियर के समकक्ष मानी जाती थी ৷


जगमोहन की नौकरी की शुरुआत के वे दिन उनके जीवन में उत्सव के दिन थे ৷ माँ बाप का सान्निध्य और अपने ही शहर में इतनी बड़ी नौकरी, और क्या चाहिए ৷ लेकिन वे निश्चिन्त होकर बैठ जाने वाले व्यक्ति नहीं थे ৷ उन्होंने अपने ज्ञान और अध्ययन का उपयोग करना शुरू किया ৷ शुरुआत में उन्हें पी डब्ल्यू दी द्वारा बैतूल के खंजनपुर इलाके में बनाये जा रहे एक छोटे से पुल के निर्माण कार्य में वरिष्ठ अभियंता के सहायक के तौर पर नियुक्त किया गया ৷ छह माह के भीतर ही उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से सबका विश्वास जीत लिया ৷

मुश्किलें यहीं से प्रारंभ हुई ৷ एक दिन उन्हें ऐसा काम सौंपा गया जिसमे एक ठेकेदार से मिलकर कुछ राशि की व्यवस्था करनी थी ৷ वे अपने पद की गरिमा जानते थे और उस ठेकेदार का वरिष्ठ अधिकारियों के साथ व्यवहार तथा अनुचित लाभ लेने का तरीका भी ৷ उन्हें यह काम कुछ उचित नहीं लगा ৷ इतने दिन महकमे में रहकर वे जान ही गए थे कि धन की यह व्यवस्था किसलिए की जानी है और इसका वितरण किन किन लोगों के बीच होना है ৷ सरकारी महकमों में देश के आज़ाद होते ही भ्रष्टाचार का घुन लग गया था । या कह सकते हैं कि अंग्रेज़ हमें विरासत में लोभ लालच की यह पुडिया दे गए थे ৷ पंचवर्षीय योजनाएँ बन रही थीं, काम की भी कमी नहीं थी लेकिन अंग्रेज़ों के जाते ही जैसे देसी अंग्रेज़ों को अचानक अमीर बनने का चस्का लग गया था ৷

जगमोहन कोकास, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संवेदनशील कवि और ईमानदार शिक्षक के शिष्य थे । ईमानदारी उनके भीतर कूट कूट कर भरी थी । भ्रष्टाचार करना तो बहुत दूर की बात है वे भ्रष्टाचार होता हुआ भी नहीं देख सकते थे । मानसिक यंत्रणाओं से परेशान होकर एक दिन वे अपने पिता बाबूलाल जी के समक्ष उपस्थित हुए और उन्हें अपनी परेशानी बताते हुए कहा “ बापू, मुझसे यह नौकरी नहीं होगी ৷ “ बापू ने कहा “ तो फिर क्या करोगे ? “ उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया ৷ उन्हें इतना तो पता था कि वे अब दोबारा फर्नीचर के कारखाने में जाकर आरी बसूला नहीं चलाएंगे ৷


“जैसी तुम्हारी मर्ज़ी ।“ बाबूलाल जी ने उन्हें खामोश देखकर कहा ৷ यह वो ज़माना था जब बच्चे अपने छोटे से छोटे निर्णय में वरिष्ठ जनों की अनुमति अवश्य लेते थे और वरिष्ठ जन भी उनके कामों में अनावश्यक दख़ल नहीं देते थे ৷ अगले ही दिन दफ्तर पहुँचकर उन्होंने घोषणा कर दी कि वे ऐसे भ्रष्ट,घूसखोर लोगों के साथ इस सरकारी विभाग में नौकरी नहीं कर सकते । उनके इस निर्णय को उनकी मूर्खता करार देकर लोगों ने उनकी हँसी उड़ाई और कहा “ भैया, हमरे देस में ऐसा कौनो सरकारी विभाग नहीं है जहाँ लेन देन नहीं चलता ..৷ “ कुछ लोगों ने नेक सलाह भी दी  “भैया करो भले ही नहीं, बस जो हो रहा है उसकी ओर से आँख बंद कर लो ৷” वहीं कुछ मित्रों ने सब कुछ जानकर उन्ही से पूछा “अब क्या करोगे ? ”

जगमोहन दृढ़ प्रतिज्ञ थे ৷ उनके बाजुओं में ताकत और मन में हिम्मत थी ৷ वे जानते थे अब सब कुछ नए सिरे से शुरू करना होगा ৷ लेकिन वे  निराश नहीं थे ৷ उन्हें पता था ज़िंदगी ने उनके लिए अभी रास्ते बंद नहीं किये हैं, अभी बीजों में अंकुर आना बाक़ी है और उनका पेड़ बनना भी सुनिश्चित है ৷ उन्हें पता था हवाओं का रुख़ कोई अपनी मर्ज़ी से मोड़ नहीं सकता है न उन्हें कोई बहुत देर तक दीवारों के भीतर क़ैद करके रख सकता है ৷ फिर वे तो तूफ़ान थे, यह बात अलग थी कि इस वक़्त उन्हें अपने ही मन में उठ रहे तूफ़ान का सामना करना पड़ रहा था 

शरद कोकास 

-------  ------ तस्वीर बैतूल का पी डब्ल्यू डी ऑफिस ,  शिवनाथ कोकास और उनका नागपुर स्थित धंतोली का मकान बाबूलाल जी और उनके बेटे जगमोहन 

22 जून 2021

6. बैतूल : अगर उन्हें गोली लग जाती तो

    

जगमोहन कोकास 


मेरे परदादा विश्वेश्वर प्रसाद जब बैतूल आये तो उन्होंने तालाब के पास मुसलमानी मोहल्ले में एक मकान किराये से ले लिया फिर कुछ वर्षों बाद इतवारी बाज़ार में अपना मकान बना लिया ৷ मकान से लगा हुआ लकड़ी का कारखाना था ৷ जैसे कि उन दिनों भी पढ़े लिखे माँ बाप अपने बच्चों को स्कूल भेजते थे बाबूलाल जी ने भी अपनी संतानों को स्कूल भेजना शुरू किया ৷

 उन दिनों शहर में एक ही हाई स्कूल था जिसे मिश्रा हाई स्कूल कहते थे ৷ बाद में उसका नाम न्यू बैतूल हाई स्कूल हो गया ৷ छात्र जगमोहन पढ़ने में तो मेधावी थे ही लेकिन देशभक्ति की बातों में उनका मन अधिक लगता था ৷ “हवाओं में रहेंगी मेरे ख्यालों की बिजलियाँ” कहते हुए फांसी के फंदे पर लटक जाने वाले भगतसिंह को शहीद हुए एक दशक भी नहीं हुआ था और देश भर के बच्चे  उन बिजलियों की रौशनी में आज़ादी की ओर जाने वाला मार्ग तलाश रहे थे ৷


यह संयोग की बात है कि सन चालीस के करीब हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र, मिश्रा हाईस्कूल में हेडमास्टर बन कर आ गये ৷ भवानी दादा उस समय युवा थे और गाँधीजी से बहुत प्रेरित थे৷ उन्ही की प्रेरणा से स्कूल की गतिविधियों के साथ साथ वे स्वतंत्रता आन्दोलन में भी रूचि लेने लगे ৷ उन्होंने इतवारी बाज़ार बैतूल में एक मकान किराये से ले लिया और बैतूल के युवाओं और बच्चों को संगठित करने का काम शुरू कर दिया ৷ उनका यह मकान मेरे पैतृक मकान के बहुत ही करीब था ৷


भवानी प्रसाद मिश्र जी ने अपने शिक्षक साथियों मदनलाल चौबे,रामस्वरूप बाजपेयी,शम्भू प्रधान,लघाटे मास्टर आदि को लेकर एक टीम तैयार की और विभिन्न गुप्त योजनाओं को अंजाम देने के काम में लग गए ৷ इन कामों में प्रमुख काम थे अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करना, जुलुस निकालना, जहाँ अन्याय दिखे उस अन्याय का विरोध करना और अंग्रेज अधिकारीयों के ख़िलाफ़ नारे लगाना ৷ एक टीम उन्होंने अपने स्कूल के छात्रों को लेकर भी बनाई थी जिसमे शामिल थे राममूर्ति चौबे, कोमल सिंह ,जगमोहन कोकास, रमेश कुमार बाजपेयी और उनके स्कूल के कई छात्र ৷ मेरे पिता जगमोहन तो उस समय सातवीं में थे और रमेश बाजपेयी यानि रम्मू चाचा पांचवीं में पढ़ते थे ৷
जगमोहन व उनके मित्र 

यद्यपि यह बच्चे बहुत छोटे थे लेकिन उनमे जज़्बा ग़ज़ब  का था ৷ आन्दोलन शब्द के विषय में उन्हें भले पता न हो लेकिन गुलामी का अहसास अवश्य था ৷ वे अपने पिताओं,चाचाओं और घर के कामकाजी लोगों को अंग्रेज़ों के हंटर से पिटते हुए देखते थे तो उनका बाल मन उद्वेलित हो जाता था ৷ लगता था ৷ यह देशप्रेम का जज़्बा अनुभव से उपजा था ज़ाहिर हैं शोषण के ख़िलाफ़ लड़ने की समझ पैदा करने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं होता ৷

 यह बच्चे भवानी दादा और उनकी टीम के लगों के लिए प्रमुख रूप से सन्देश लाने ले जाने, सूचनाएँ और आन्दोलन सामग्री पहुँचाने का काम करते थे | बच्चों पर अंग्रेज़ों की नज़र ज़रा कम रहती थी इसलिए सारे काम आसानी से हो जाते थे ৷


बंगलुरु का जुलुस 
 फिर आई तारीख़ नौ अगस्त उन्नीस सौ बयालीस ৷ उस दिन गाँधीजी के आव्हान पर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ प्रदर्शन करने और जुलूस निकालने के अलावा कचहरी की बिल्डिंग पर तिरंगा फहराने की योजना बन चुकी थी ৷ उस दिन सुबह से ही जुलुसू की तैयारी होने लगी थी ৷ जुलुस के लिए इकठ्ठा

 होने की जगह ,प्रस्थान के समय की सूचनाएँ एक दिन पूर्व ही पहुँचाई जा चुकी थीं ৷ भवानी दादा के नेतृत्व में स्कूल के अनेक शिक्षकगण और शहर के देशप्रेमी लोग जुलुस में शामिल हो गए छोटे बच्चों को जुलूस में कोई अनहोनी होने आशंका की वज़ह से आने की मनाही थी लेकिन रक्त में मचलती भावनाओं को कौन रोक सकता है ৷वैसे भी बच्चों को जुलुस में जो आनंद आता है वह सब जानते ही हैं৷

 जुलूस की शुरुआत न्यू बैतूल हाईस्कूल से हुई और कोठी बाज़ार मेन रोड, गुजरी से होता हुआ वह कचहरी की ओर बढ़ने लगा ৷ जैसा कि हम आज़ाद भारत में भी देखते आये हैं उस समय भी पुलिसवाले डंडे लिए जुलूस के साथ चल रहे थे ৷ बिना आदेश के उन्हें कुछ भी करने की मनाही थी ৷ जुलुस आगे बढ़ने लगा৷ बंकिमचंद्र की कविता ‘वन्दे मातरम’ और बिस्मिल अज़ीमाबादी का गीत ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ फिज़ाओं में गूंजने लगे ৷

 यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन जुलूस जैसे ही डिस्ट्रिक्ट जेल के पास पहुँचा गीत नारों में बदल गए .. अंग्रेज़ों भारत छोड़ो , अंग्रेज़ी हुकूमत मुर्दाबाद के तीखे स्वर जैसे ही सियासतदां लोगों के कानो में पड़े एक फ़रमान जारी हुआ .. लाठी चार्ज ..৷ जुलूस में शामिल मदनलाल चौबे,रामस्वरूप बाजपेयी,शम्भू प्रधान ,लघाटे मास्साब ने देखा .. अरे यह तो अपने जानकी प्रसाद दुबे हैं ৷ पोलिस दरोगा जानकी प्रसाद के चेहरे पर कोई दुविधा नहीं थी ৷ वे उस समय अंग्रेज़ सरकार के मुलाजिम की भूमिका में थे ৷

 फूटे हुए माथों से बहता हुआ खून मुँह में भर आता था लेकिन “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो“  की आवाज़ में वही जोश था, वही ताकत थी , वही प्रतिरोध जो बरसों ज़ुल्म सहने के बाद पैदा होता है ৷ लाठियाँ बच्चों पर भी पड़ रही थीं लेकिन उनका सर बचाया जा रहा था ৷ एक लाठी जांघ पर दस वर्ष के बालक रमेश बाजपेयी पर भी पड़ी ৷ बाकी बच्चों ने उन्हें कवर किया ৷ बस कुछ ही दूरी पर था वह खम्भा जिस पर यूनियन जैक लहरा रहा था ৷ क्रांतिकारियों ने अपने अपने पास रखे तिरंगों को हवा में लहराना शुरू किया ৷उनका अगला लक्ष्य उस खम्भे पर झंडा फहराना था ৷

अचानक एक बालक भगदड़ के बीच से निकला, उसके हाथ में एक तिरंगा था जिसमें एक लकड़ी लगी हुई थी ৷ लोगों ने देखा वह बालक तेज़ी से उस खम्भे की ओर बढ़ा जा रहा है ৷ “अरे जग्गू .. जगमोहन ..” जुलुस में शामिल वरिष्ठ लोगों ने आवाज़ दी ৷ लेकिन ग्यारह वर्षीय वह बालक रुका नहीं ৷ वह फुर्ती से खंभे की ओर बढ़ा, यूनियन जैक निकाल कर ज़मीन पर फेंक दिया और वहाँ बंधी रस्सी में लकड़ी खोंसकर तिरंगा फ़हरा दिया ৷

यह एक ऐसी हरकत थी जिस पर हर किसी का ध्यान था ৷ लाठीचार्ज करते हुए सिपाहियों के पास बंदूकें नहीं थी लेकिन जाने कहाँ से एक अंग्रेज़ पुलिस ऑफिसर आया और उसने झंडा फहराकर खम्भे पर नीचे फिसलते हुए जगमोहन पर गोली चला दी ৷ लेकिन ज़ाहिर है कि निशाना चूक गया ৷ जगमोहन को यह सब देखने की फुर्सत कहाँ थी वह तो क्षणों में भीड़ में गायब हो गया था ৷


बैतूल का टाउन हॉल 

बाबूजी ने कभी मुझे विस्तार से इस घटना के बारे में नहीं बताया ৷ हमें बस इतना पता था कि वे अपने बचपन में कचहरी में झंडा फहराकर आये थे ৷ मैंने उनसे कहा भी कि “आप सरकार से यह सब क्यों नहीं कहते ?” उन्होंने कहा “ मैंने कोई बड़ा काम नहीं किया है हज़ारों लोगों ने देश के लिए अपनी जान दी है ,मैंने तो बस झंडा फहराया था ৷” मैंने उनसे कहा .. “फिर भी .. ৷ “ बाबूजी समझ गए ৷ “ मुझे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का तमगा लटकाए घुमने का कोई शौक नहीं है ৷”

बाबूजी के निधन के बरसों बाद रम्मू चाचा यानि डॉ. रमेश कुमार बाजपेयी ने विस्तार से यह घटना बताई ৷ अठ्ठासी वर्षीय बाजपेयी जी रीजनल कॉलेज भोपाल से सेवानिवृत प्रोफ़ेसर हैं और भोपाल में रहते हैं ৷ बाबूजी को वे हमेशा अपना बड़ा भाई ही मानते रहे ৷ रम्मू चाचा से पूरी घटना विस्तार से सुनने के बाद मैं चुप हो गया ৷ फिर मैंने उनसे पूछा “ मान लीजिये बाबूजी को उस दिन गोली लग जाती तो ?”


डॉ रमेश बाजपेयी 

    रम्मू चाचा ने कहा ..” तो क्या, देश के लिए शहीद हो जाते ৷” “ बाद में बाबूजी को गिरफ़्तार नहीं किया गया ? “ मेरा अगला सवाल था ৷ “ अरे भवानी प्रसाद मिश्र जी और उनके साथियों के रहते किसकी हिम्मत थी जग्गू भैया को कोई हाथ भी लगाता ৷ उन्हें तुरंत अंडरग्राउंड कर दिया गया ৷ ” हाँ भवानी भाई , उनके शिक्षक साथी रामस्वरूप मास्साब और शम्भू प्रधान ज़रूर गिरफ़्तार कर लिए गए और उन्हें नागपुर जेल भेज दिया गया जहाँ वे उन्नीस सौ चौवालीस तक रहे ৷

 “कभी कभी कैसा होता है ना .. बाबूजी से उनके रहते हुए मैंने एक दो बार इस घटना का विस्तार जानना चाहा था लेकिन मुझे उन्होंने कभी कुछ नहीं बताया । और मुझे क्या किसी को भी कुछ नहीं बताया । शायद उन्होंने कभी इस घटना को इतना महत्त्व ही नहीं दिया । क्या पता वे क्या सोचते थे ।“ मैंने रम्मू चाचा से कहा 

“अरे, तुम्हारे पिता जैसे ईमानदार, कर्मठ, प्रसिद्धी के मोह से कोसों दूर लोग कहाँ मिलते हैं । अगर प्रसिद्ध होने या नाम कमाने की इतनी ही ख्वाहिश होती तो आज सरकार से ताम्रपत्र लेकर स्वंत्रता संग्राम सेनानी की पेंशन                                          नहीं पा रहे होते ?“ चाचाजी ने कहा । 

    “लेकिन बेटा, तुम इस बात को लोगों तक ज़रूर पहुँचाओ, भंडारा के लोगों तक और हमारे बैतूल के लोगों तक भी यह बात जानी चाहिए कि उनके शहर के बेटे जगमोहन ने स्वतंत्रता आन्दोलन में क्या योगदान किया है । मुझे भी आज तक बचपन के उस जुलूस में मार खाई उस एक लाठी का दर्द याद है  ।“ चाचाजी ने गर्व से अपना भाल उन्नत करते हुए कहा ।

शरद कोकास