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10 जून 2026

153. भंडारा : घर घर में दिवाली मेरे घर में अँधेरा

वह अक्तूबर का उतार था । बाबूजी ने आंगन में निवार का पलंग बिछाया और माँ ने टीन की पेटी से गर्म कपड़े निकालकर उन्हें धूप दिखाने के लिए उस पर डाल  दिया । नीले, पीले, हरे स्वेटरों,शाल,मफलर आदि  के बीच से मेरा पूरी बांह वाला लाल रंग का स्वेटर झाँक रहा था और मुझे ललचा रहा था । मेरा मन हुआ उसे एक बार पहनकर देखूँ । माँ ने कहा “अभी नहीं, शाम तक उसे पूरी धूप लग जाने दो, उसमे बसी बरसात की सीलन उड़ जाये तब पहनना ।

अपने प्रिय लाल स्वेटर में मैं कैसा दिखूंगा इस खयाल के साथ मैं दिन भर उस स्वेटर के साथ बाकी गर्म कपड़ों को भी उलटता पलटता रहा ताकि कमबख्त सीलन अच्छे से निकल जाए । जब से मैंने होश संभाला तब से मेरा यह कोई तीसरा या चौथा स्वेटर रहा होगा । मैंने धूप को जल्दी जल्दी विदा किया और  शाम ढलने से पहले उस स्वेटर को उठाकर अपनी बाहें उसमे डाल दीं । लेकिन यह क्या, मेरा शरीर उस स्वेटर के भीतर जाने को राजी ही नहीं हो रहा था । जैसे तैसे मैंने अपने आप को उसके भीतर घुसाया । बाहें कलाई से कुछ ऊपर आकर ठहर गई और कमर ने निचले हिस्से को  प्यार से अपने पास ही बिठा लिया ।

दिन भर से जमा की गई मेरी खुशी में थोड़ी उदासी घुल गई थी । मैंने माँ से कहा  “देखो ना माँ , स्वेटर छोटा हो गया है ।“ माँ ने मुस्कुराते हुए कहा “स्वेटर छोटा नहीं हुआ, तुम थोड़े बड़े हो गए हो ।“ फिर प्यार से मेरे गाल पर हल्का सा दुलार किया और कहा “कोई बात नहीं, अभी रोज रोज पहनोगे तो थोड़ा ढीला हो जायेगा । इस साल इसी स्वेटर के साथ निकाल लो, अगले साल के लिए एक नया स्वेटर बुन दूंगी।“ 

माँ की बात सुनकर न मैं ठीक से दुखी हो पाया न ही मुस्कुरा पाया ।  लेकिन अगले साल की नौबत नहीं आई । माँ ने अगले ही सप्ताह फेरीवाले से ऊन खरीदा और मेरे नाप का एक स्वेटर बुनना शुरू कर दिया । माँ जैसे ही कहती “पीछे मुड़ो नाप लेना है ।” मैं पीठ पर माँ  की हथेलियों के स्पर्श के साथ उस स्वेटर की गर्माहट भी महसूस करने लगता । रोज रोज थोड़ा थोड़ा स्वेटर बनते हुए देखने का सुख भी अजीब होता है , बड़े बड़े मॉल्स और ऑनलाइन स्टोर्स से स्वेटर खरीदने वाले इस सुख से हमेशा वंचित रहते हैं ।

दिवाली अपने आगमन का संकेत दे रही थी । ठंडी हवाएँ रोज सुबह मेरी रंगोली देखने आ जातीं और गुदगुदाते हुए देह में हल्की सी झुरझुरी भर देतीं । घरों में खिड़की दरवाज़ों और दीवारों का मेकअप शुरू हो गया था । रजाइयों को भी धूप दिखाई जा चुकी थी और वे गद्दों के संग अपनी टीम बना चुकी थीं । हर रात उसके  आगोश में समाते हुए मैं ठण्ड से कांपते हुए कुछ देर घोड़े की तरह हिनहिनाता फिर उसकी गर्मी में गुम हो जाता  । कम्बल मुझे शुरू से ही पसंद नहीं था,रजाई के भार के नीचे दबकर सुख प्राप्त करने का जो अनिर्वचनीय आनंद है वह कम्बल में कहाँ ।

दिवाली के पांच दिनों को मैंने अपनी सुविधा के अनुसार नाम दिए थे, धनतेरस यानी पटाखे खरीदने का दिन, नरक चतुर्दशी उबटन से नहाने और फुलझड़ी जलाने का दिन, लक्ष्मीपूजन नए कपड़े पहनने और पटाखे छुड़ाने का दिन,बलि प्रतिपदा सुर्री पटाखे बटोरने का दिन और भाई दूज बचा खुचा स्टॉक खत्म करने का दिन । थोड़ी सी फुलझड़ी, छोटे वाले लक्ष्मी बम, टिकिया वाला सांप, महताब वाली माचिस और टिकली की डिब्बियों का एक पैकेट बस इससे अधिक की न चाहत थी न गुंजाईश । राजेश फटाका दुकान पर बाबूजी की जेब इससे अधिक की इजाज़त भी नहीं देती थी । लक्ष्मी पूजन वाले दिन बाबूजी सुबह सुबह लक्ष्मी जी की वही पुरानी मिट्टी की मूरत लेकर निकालते  और  गांधी चौक वाले पेंटर से उसे रीपेंट करवाकर ले आते  । साथ में लाते  सिंघाड़े, खील बताशे और पूजा की सामग्री । 

हम लोग आम की पत्तियों का तोरण बनाते और उसे दरवाज़े पर टांग देते । तोरण के बीच बीच में गेंदे के फूल की छोटी छोटी लड़ियाँ । नए कपड़े पहनने की इच्छा भी शाम को जल्दी बुला नहीं सकती थी सो इंतजार करते ।  बाबूजी की वेशभूषा में शामिल होता हर साल पहना जाने वाला कोसे का कुरता और माँ की वेशभूषा में अपनी सबसे अच्छी साड़ी । इधर पीतल की परात में दिये सजाकर रख दिए जाते । पटाखों की राशनिंग के अनुसार मैं कुछ पटाखे निकालता और राह देखता कब ओम  जय जगदीश हरे का हूटर बजे  और मैं धड़ाम धुडूम शुरू करूँ । 

लक्ष्मी पूजन और आतिशबाजी के बाद हर साल की तरह उस साल भी बाबूजी ने कहा “चलो शहर की रौशनी देखकर आते हैं ।“  वैसे भी हमारे पटाखे चुक गए थे और टाइम पास नहीं हो रहा था । दूसरों को पटाखे छुडाते देखना भी उतना ही आनंददायक होता है जितना खुद छुड़ाना, राजनेताओं की जनता का  मन बहलाने वाली बात की तरह यह बात भी बचपन से ही हमारे भेजे में डाल दी गई थी ।

हम अपनी गली से निकले और गलियाँ पार करते हुए मेन रोड पर पहुँचे । जैसे जैसे हम बड़ी सड़क पर आ रहे थे आतिशबाजी और सजावट का वर्गभेद स्पष्ट होता जा रहा था । फिर भी हम बच्चों को रंगोली देखने और दूसरों को पटाखे छुड़ाते देखने में आनंद आ रहा था । हमारा गंतव्य था मेन रोड पर दो मारवाड़ी व्यवसाइयों की इमारतें जिनके आंगन में उनके घर की बेटियाँ बड़ी सी रंगोली डालतीं और उसे खूब सजातीं थीं ।

इन इमारतों पर  बिजली के नन्हे बल्बों से सजावट भी की जाती थी । हम मिट्टी के दिए वालों के लिए ,बिजली के छोटे छोटे बल्बों की यह सीरीज भी खुश होने का एक सबब था । रोशनी, नये कपड़े, पटाखे ,मिठाई और रंगोली के अलावा लोगों को खुश होते देखना भी हमें  अच्छा लग रहा था । दूसरों के सुख में सुखी होने का भाव कुछ तरह जन्मा था कि ऐसा लगने लगा था कि इस दिन संसार में शायद ही कोई दुखी रहता होगा । लेकिन उस साल  मेरा यह भ्रम टूट गया । 

गांधी चौक से आगे शहर की जगमगाती सड़क हम बड़े बाज़ार की ओर बढ़ ही रहे थे की पटेल मेडिकल स्टोर्स के पास अचानक एक भिखारी सामने आ गया । जीर्ण शीर्ण वस्त्र पहने हाथ में कटोरा लिये वह धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था । मैंने देखा कि वह देख नहीं सकता है । मैंने ध्यान देकर सुना तो वह एक गाना गा रहा था .. घर घर में दिवाली है मेरे घर में अन्धेरा...।” भिखारी का दिखाई देना तो आम बात थी लेकिन उस वक़्त उसका दिखाई देना मुझे उदास कर गया । 

हम लोग आगे बढ़ाते हुए सारडा  बिल्डिंग तक आ गए थे । बहन सीमा ने रंगोली  की ओर इशारा किया “ भैया देखो कितनी अच्छी रंगोली  है । “ मैं बार बार पीछे मुड़कर देख रहा था, वह नेत्रहीन भिखारी दूर जा चुका था लेकिन मेरा ध्यान उस की ओर ही लगा था । मुझसे रहा नहीं गया और मैंने बाबूजी से पूछा “ बाबूजी यह दिवाली के दिन भी भीख मांग रहा है ? “ बाबूजी ने कहा ...” हाँ बेटा, वह भीख नहीं मांगेगा तो उसके घर चूल्हा कैसे जलेगा । “ “ तो “ मैंने कहा वह दिवाली कब मनायेगा ? “ बाबूजी ने कहा “ वह नेत्रहीन है ,उसके लिये क्या दिवाली क्या ईद । “ 

बचपन का वह लाल स्वेटर जाने कहाँ चला गया, माँ बाबूजी भी दुनिया से चले गए, कितनी दीवालियों में कितने दीप जले और बुझ गए । पटाखे छुड़ाना तो कबका बंद हो गया । दिवाली अब भी हर बरस आती है , मैं भी बाबूजी की परम्परा का निर्वाह करते हुए बिटिया को लेकर उसे शहर की रौशनी दिखाने ले जाता हूँ । लेकिन आज भी मेरी निगाहें उस नेत्रहीन भिखारी को ढूँढती हैं । वह तो शायद अब इस दुनिया में नहीं होगा लेकिन उस जैसे लाखों करोड़ों लोग अब भी हैं जो अपनी सूनी आँखों में भयावह अन्धेरे का चित्र लिये आँख वालों की इस दुनिया में मुश्किलों से भरी अपनी ज़िन्दगी जीने  को अभिशप्त हैं । जब भी आप दिये की ज्योत जलाएँ तो ऐसे लोगों को याद अवश्य कीजियेगा जिनकी आँखों की ज्योत बुझ चुकी है ।


शरद कोकास 

7 जून 2026

56 .बैतूल : बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं पुराने मकान

मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । छप्पर की कमर झुक जाती है, दीवारों के पलस्तर में बेशुमार झुर्रियाँ दिखाई देने लगती हैं, बरसातों में  नज़ले ज़ुकाम की तरह टूटे खपरैल से होता हुआ पानी भीतर टपकने लगता है, उनकी त्वचा पर पड़े सीलन के धब्बे किसी चर्म रोग की तरह दिखाई देने लगते हैं , वे बमुश्किल साँस ले पाते हैं और देर रात तक खाँसते हैं । 

गर्मियों में अक्सर उनकी नींद सुबह जल्दी उचट जाती है और वे अपने आसपास बने युवा मकानों को एसी और कूलर की लोरी में गहरी नींद में सोता हुआ देखते हैं ।


सर्दियों में वे कानों में मफ़लर लपेटने के बावजूद कभी भी ढह जाने का अंदेशा लिए काँपते हैं । बेमौसम बारिश में अपने आँगन में पानी से भरे डबरे में अपना अक्स देखते हुए वे सोचते हैं कि वे भी कभी जवान थे ।

मेरा बचपन बैतूल के इस पुराने मकान की जवानी का गवाह है ।


हम बच्चे  खेलकर आते थे और दालान से होते हुए बीच का कमरा और आंगन पार कर सीधे रसोईघर में प्रवेश करते थे । दालान के बाद  बीच में एक बड़ा कमरा था । इसकी छत बांस और मिटटी से बनी थी जो ऊपर वाले कमरे का मिट्टी का फर्श थी ।
दालान के बाद बीच के कमरे में सीमा 

बीच के कमरे के बाद छपरी से बाहर 
यहाँ से लकड़ी के पटियों से बनी दस पायदान वाली सीढ़ियाँ ऊपर की ओर जाती थीं । बिनाका गीतमाला में जब अमीन सयानी साहब ‘पायदान’ शब्द कहते थे तो हमारे जेहन में इन्ही सीढ़ियों का अक्स उभरता था ।
लकड़ी की सीढ़ियों पर सुभाष बाबू 
हम लोग सीढ़ियों से चढकर ऊपर जाते लेकिन उतरते वक़्त छत से बाहर निकले बाँस के दो टुकड़ों से किसी जिमनास्ट की भांति लटककर नीचे आ जाते  । सीढ़ियों से ऊपर पहुँचते ही दाहिनी ओर मदन मोहन ताउजी का एक कमरा था जहाँ हम बच्चे इनडोर गेम्स खेल खेला करते थे ।
मदन मोहन ताउजी का कमरा 
बीच में एक बड़ा हाल नुमा कमरा जिसमें बाहर झाँकती छोटी छोटी दो खिड़कियाँ थीं, फिर मनमोहन ताउजी यानि दादाभैया का कमरा । 
मनमोहन ताउजी का कमरा 
दिवाली के दिन यह कमरा लक्ष्मी जी को आवंटित हो जाता था । लक्ष्मी पूजन हेतु सारे लोग इस कमरे में जुटते । दादाभैया लक्ष्मीजी की प्रतिमा की स्थापना करते और स्थल सजावट करते । हम सब श्रमजीवी थे इसलिए प्रतिमा के साथ कुदाल, फावड़े, आरी,बसूला, हथौड़ी,खुरपी आदि औजार रखे जाते । पूजन का प्रोटोकाल बिलकुल तय था, सबसे पहले दादाजी और उनके भाई, फिर दोनों ताउजी, फिर बाबूजी, फिर सभी  चाचा लोग  और उसके बाद तीसरी पीढी में हम बच्चों का नंबर आता था । तब तक हम लोग इतने ऊब जाते कि नीचे जाकर पटाखे जलाने में व्यस्त हो जाते । उसके बाद तो लक्ष्मी जी खुद कह देती थीं ..जाओ बच्चों , खेलो कूदो, मेरी इबादत बड़े होने के बाद कर लेना ।

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नीचे बीच वाले कमरे के बाद एक छपरी थी जिसमे जाली लगी थी,


उसके बाद जच्चाघर जैसा एक कमरा जिसे हम ‘माँ की कोठरी’ कहते थे । मेरे बड़े भाइयों और मेरे अलावा अनेक बच्चों ने आँखे खोलते ही सबसे पहले इसी कोठरी की दीवारें देखी थीं और खिड़की से आती सुबह की धूप की पहली उष्मा महसूस की थी । माँ की यह कोठरी बिना अवकाश लिए नवजात शिशुओं के आगमन से सदा प्रफुल्लित रहती थी । वैसे यह एरिया छोटी दादी के अंडर में आता था ।
इस खिड़की से पहली बार मैंने दुनिया देखी थी 
इस छपरी को पार करने के बाद बीच में एक बड़ा सा आंगन था जो हमारा डायनिंग लॉन था ।

आंगन पार करते ही उस पार  रसोई घर व भंडार घर के कमरे, स्नानगृह आदि । रसोई में दादियाँ,दोनों बड़ी माताएँ  , व चाची खाना बनाया करती थीं । माँ का आगमन चूँकी छुट्टियों में मेहमानों की तरह होता था इसलिये उन्हें  सुबह शाम चूल्हा जलाकर चाय का अदहन चढ़ाकर सबको चाय पिलाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी जाती थी । हालाँकि यह कार्य भी आसान नहीं था, पच्चीस तीस सदस्यों को जिनका जागने का समय अलग अलग था, चाय पिलाते पिलाते दो घंटे का समय तो उन्हें लग ही जाता था, यही क्रम शाम को भी जारी रहता । 

बाबा नागार्जुन की कविता में आंगन से ऊपर उठता धुआं भले कई दिनों के बाद दिखाई देता हो लेकिन हमारे घर में प्रतिदिन शाम को धुआं उठने का यह दृश्य अनिवार्य था । इस धुएँ में शामिल छौंकी हुई दाल की गंध,फूलगोभी की सब्ज़ी की महक, कच्ची कैरी की चटनी में शामिल पुदीने की ख़ुशबू जैसे ही हम लोगों के नासापुटों तक पहुँचती हम लोग थाली लिए बड़ी माँ के सामने खड़े हो जाते । थाली में दाल,रोटी, सब्ज़ी, चटनी प्याज़, आदि लेकर हम लोग आंगन में आ जाते और पसरकर बैठ जाते । 

उन दिनों एक थाली में अकेले बैठकर खाने जितने हम लोग सभ्य नहीं हुए थे । अक्सर यह होता था कि दो बच्चे एक बड़ी सी थाली में खाना शुरू करते और फिर एक एक कर बच्चे उनके साथ शामिल हो जाते । ओपनिंग बैट्समैन के आउट होने के बाद भी लास्ट विकेट तक भोजन का यह सिलसिला उसी पिच पर जारी रहता, साथ ही रसोईघर से मांग और पूर्ति के नियमानुसार रोटियों और सब्जियों की आपूर्ति जारी रहती।

  इस भोजन सत्र में सबसे अधिक आकर्षण मदन मोहन ताउजी के बेटे यानि हमारे मुल्लू भैया और होशंगाबाद वाली पुष्पा बुआ के बेटे संतोष भैया का एक साथ भोजन करना था । वे उम्र में बड़े थे सो उनकी पार्टी अलग थी । उनके साथ थाली में भोजन का दुस्साहस करने वाले बच्चे जल्दी ही आउट हो जाते लेकिन मुल्लू भैया और संतोष भैया पिच पर लगभग डेढ़-दो घंटे डटे रहते।  दोनों ही अखाड़े में वर्जिश करते थे इसलिए उनकी खुराक काफी तगड़ी थी । 

दोनों भाइयों में कभी कभी मिर्ची खाने की प्रतियोगिता भी होती थी जिसका समापन तीखेपन को न सह पाने के कारण हिचकी, आँखों से पानी आने जैसी क्रियाओं पर ही होता था । पुरस्कार स्वरूप उन्हें एक गगरी पानी और मुठ्ठी भर गुड़ प्रदान किया जाता था । वैसे भोजन में ज़्यादातर रोटी, सब्ज़ी ,प्याज़ और चटनी हुआ करती थी, दाल का कोटा ज़रा कम था । गेहू तो खेत में ही होता था सो बहुतायत में उपलब्ध था लेकिन चावल एक विलासिता की वस्तु थी इसलिए कभी कभार ही पकता था । 

हम लोगों के भोजन सत्र इतने मनोरंजक होते थे कि भोजन संपन्न होने के पश्चात भी किसी के उठने का मन नहीं करता था । इन सत्रों में विगत में संपन्न शादी ब्याह और बारातों के किस्से, फूफाओं और जीजाओं के साथ की गई शरारतों के किस्से बहुत चाव से सुने सुनाये जाते । बड़े भाइयों और चाचाओं द्वारा सुनाये गए उन किस्सों में हम बच्चों को कहानी सुनने का मज़ा आता था । 

मिट्टी के पुराने मकान बूढ़े बुज़ुर्गों की तरह होते हैं । वे भले ही किसी काम के न हों लेकिन उनके हमारे आसपास बने रहने से रौनक बनी रहती हैं उनकी उपस्थिति हमें न केवल अपने बल्कि मनुष्य जाति के बचपन की याद दिलाती हैं ।


शरद कोकास 



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