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2 जून 2026

43.भंडारा : एक बीड़ी रात भर सीने में सुलगती है


इस देश के पहले बीड़ी मजदूर आन्दोलन की कथा 

 वह उन्नीस सौ तीस के नवम्बर माह की नौ तारीख की एक सुबह थी । सारे बीड़ी कामगार अपने परिवारों सहित तिरोड़ा के इस कारखाने के द्वार पर इकठ्ठा होने लगे । इनमे अधिकांश महिलाएँ थीं जो अपनी गोद में दुधमुँहे शिशुओं को लेकर आईं थीं । 

उनकी बहुत साधारण सी मांगें थी कि हमें काम का उचित मुआवजा दिया जाए, हमारे द्वारा बनाई गई बीडियों को जानबूझकर रिजेक्ट न किया जाये, हमारे काम के घंटे तय किये जाएँ, हमारा मानसिक व शारीरिक शोषण समाप्त किया जाए तथा हमारे बच्चों के लिखने पढ़ने की उचित व्यवस्था की जाये । 

रोज सुबह बासी खाकर और चावल का पेज पीकर वे कारखाने के दरवाजे पर इकठ्ठा हो जाते थे ताकि नारे लगाने लायक ताकत उनमे पैदा हो जाये । बच्चों को वे घर पर नहीं छोड़ सकते थे इसलिए कि वे घर में रहकर भी क्या करते । आखिर मजदूर तो बच्चे भी थे । 

हाड़ कंपा देने वाली सर्दियों के दिन भी उन्होंने कारखाने के बाहर लगे पंडाल के नीचे गुजार दिए । वहीं वे चूल्हे जला लेते औ हँड़िया में भात पका लेते । सर्दियों में ठिठुरते हुए इन मजदूरों के पास आस के अलाव से आग लेने के सिवा कोई चारा नहीं था । 

कारखानेदारों के पास इतना पैसा था कि महीनों कारखाना बंद रहने के बाद भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था । उन्हें पता था कई तूतियां मिलकर भी उनके नक्कारखाने में बज रहे दमन के नगाड़े की आवाज़ को दबा नहीं सकतीं । सत्ता उनके साथ थी, व्यवस्था उनके साथ थी ।

हेमंत और शिशिर के बाद बसंत आकर भी चला गया और गर्मियां आ गईं । पंडाल के नीचे बैठे मजदूर अब कुछ नहीं कहते थे । उनकी खामोशी में उनकी विवशता थी । उनके पास का अनाज ख़त्म हो गया था,कपड़े फट चुके थे ,बर्तन भांडे तक गिरवी रखे जा चुके थे । अब उन्हें कोई उधार भी नहीं देता था । 

जब पेट में अन्न का दाना न हो तो चाहे कितना सुहावना मौसम हो,परिस्थितियाँ कितनी भी अनुकूल हों मुँह से आवाज़ नहीं निकलती है । हड्डियों का ढांचा बने यह मजदूर बेचारे क्या करते । वे इंसान थे और उन्हें जीने के लिए दो समय का खाना ज़रूरी था । 

आखिर भूखे बच्चों के गड्ढे बनते हुए पेट उनसे नहीं देखे गए और छह माह बाद उन्होंने अपनी हड़ताल वापस ले ली । 

कारखानेदारों और उनके द्वारा पोषित लोगों के चेहरों पर क्रूरता की परत और घनी हो गई । अर्थसत्ता और राजसत्ता के ऊँचे ऊँचे मंचो पर मानो कोई नाटक चल रहा था जिसमे क्रूर तानाशाह के अट्टहास गूँज रहे थे । मेसोपोटामिया के हम्मुराबी द्वारा प्रजा को डराने के लिए की जाने वाली मुनादियों से लेकर रोम, फ़्रांस अमेरिका, रूस के खेतों, कारखानों में किसी दौर में सुनाई देने वाली चेतावनियाँ यहाँ भी सुनाई दे रही थीं   ..

” सुनो मजदूरों ध्यान से सुनो .. जब तुम लोग घर बैठे भूखों मर रहे थे, हमने तुम्हे काम दिया, वह भी इतना आसान काम जिसके लिए न धूप में पसीना बहाना है ना हाड़ तोड़ मेहनत करना है उसके बाद भी तुम्हे नखरे आते हैं ? ध्यान रखो ग़रीबी और भुखमरी से हमारे सिवा तुम्हे कोई नहीं बचा सकता, हम ही हैं जो तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं , हम ही तुम्हारे मालिक हैं , हम ही तुम्हारे ईश्वर हैं , हमारी शरण में आने के अलावा तुम्हारे पास और कोई चारा नहीं है ।

मजदूरों की आस टूट गई थी । वे जानते थे मालिकों द्वारा कही गई एक एक बात सच है । इस काम के अलावा उनके पास और कोई काम नहीं है, न कहीं उन्हें काम मिलने वाला है । उन्होंने काम पर वापस आने का निर्णय कर लिया । लेकिन मालिक लोग इतनी सी बात पर खुश होने वाले नहीं थे एक नया फरमान जारी हुआ 

“ छह माह तक तुमने काम न करके हमारा नुकसान किया है, इसकी सज़ा मिलेगी, बराबर मिलेगी ।“ और ठीक अगले ही दिन से बीड़ी कामगारों की मजदूरी चार आने प्रति हज़ार की जगह दो आने प्रति हज़ार कर दी गई । 

कहाँ कुछ बदला है ? आज भी इसी तरह हमारे ईश्वर बने कुछ लोग हमें बरगला रहे हैं, हम उनके लिए रात दिन मेहनत कर रहे हैं, उन्हें मुनाफ़ा कमा कर दे रहे हैं और वे हमें मेहनत और मेहनताने का गणित समझा रहे हैं । हम इतने नासमझ भी नहीं कि यह न समझ सकें कि हम जितनी मेहनत करते हैं उतना  मेहनताना हमें आज भी नहीं मिलता है । अगर सही सही मेहनताना मिलता तो आज हम झोपड़ियों में नहीं रहते बल्कि सेठों की तरह हमारे पास भी महल होते । “ 

छह माह तक हड़ताल करने,सब कुछ गँवाने के बाद भी हल निकलना तो दूर उलटे उनकी मजदूरी भी आधी कर दी गई । अँधेरा तो पहले ही छाया हुआ था इन की बस्तियों में, यह अँधेरा और गहरा  गया । लेकिन जो चिंगारी उन्होंने जलाई थी वह व्यर्थ नहीं गई । 

उनकी आवाज़ भंडारा ज़िले के बीड़ी कामगारों के अलावा कामठी, नागपुर के मजदूरों तक पहुँच चुकी थी । सुख सबके भले अलग अलग हों लेकिन दुःख एक होते हैं । अलग अलग जगहों पर रहने के कारण भले वे एक साथ नहीं रह सकते थे लेकिन दुःख एक थे और वे अपने जैसे दुखों के साथ मिलकर अपना संगठन बना रहे थे ।

उन दिनों कामठी के बाबू लक्ष्मण नगरारे हरदास सेन्ट्रल प्रोविंस एंड बेरार असेम्बली के विधायक थे । 

बाबू एल एन हरदास स्वयं इसी पृष्ठभूमि से आये थे इसलिए बीड़ी कामगारों का दुःख जानते थे । तिरोडा के बीड़ी कामगारों की हड़ताल के वे प्रत्यक्ष गवाह थे । उन्होंने इस आन्दोलन में शामिल लोगों की मीटिंग लेना प्रारम्भ की । फिर उनके नेतृत्व में कामठी और आसपास के क्षेत्रों के बीड़ी कामगार एकत्र होना शुरू हुए और उन्नीस सौ इकतीस की पहली जनवरी को उनके द्वारा एक संगठन की स्थापना की गई । इस संगठन का नाम था ‘

मध्यप्रांत बीड़ी कामगार संगठन’ । 

यह एक ऐसी चिंगारी थी जो लगातार बढ़ती जा रही थी । बीड़ी कामगार अपने हक़ ले लिए लड़ रहे थे, जेल जा रहे थे । यह लड़ाई आगे के अनेक दशकों तक चलती रही । मेरे बचपन के मित्र भगवान रहाटे बताते हैं कि साठ के दशक में जब बीड़ी कामगारों को आन्दोलन के दौरान गिरफ्तार कर जेल ले जाया जाता था बहुत सी माताओं के साथ उनके बच्चे भी जेल चले जाते थे । उन्हें भी इसी तरह अपनी माँ के साथ बचपन में ही जेल जाने का अवसर मिला था । 

हालाँकि एक दिन में ही उन मजदूरों  छोड़ दिया जाता था । 

आग की लपटों को कैद करके रखना वैसे भी मुश्किल काम था । 

लोगों में चेतना जागृत हो रही थी बाबासाहेब का घोषवाक्य ‘शिक्षित हो संगठित हो और संघर्ष करो’ हवाओं में गूँज रहा था । बीड़ी कामगारों के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर नाम कमा रहे थे । लेकिन अभी भी एक बहुत बड़ा तबका था जिनके लिए आजीविका का साधन बीड़ी बनाना ही था ।

इसके आगे की कथा बहुत संक्षेप में है । 

आगे चलकर महाराष्ट्र की रिपब्लिकन पार्टी के प्रसिद्ध नेता राज्यसभा सदस्य एडवोकेट ना. ह. कुंभारे के प्रयासों से महाराष्ट्र सरकार द्वारा बीड़ी मजदूर कानून बनाया गया । यह पिछले दौर में बने, न्यूनतम मजदूरी एक्ट, औद्योगिक विवाद कानून,बाम्बे इंडस्ट्रियल एक्ट के तारतम्य में ही था। इस कानून ने बीड़ी मजदूरों को अनेक अधिकार दिए । कारखानेदारों द्वारा अब उन्हें न्यूनतम मजदूरी देना अनिवार्य कर दिया गया था । उनके लिए एक कल्याण फंड की स्थापना भी की गई । इस फंड में उन्हें दिए जा रहे पारिश्रमिक से ही पैसा काटकर जमा किया जाता था । यद्यपि सरकार को उसका हिसाब देते समय कुछ गोलमाल भी होता था । लेकिन कुल मिलाकर मजदूरों के बेहतर दिन आने लगे थे ।

लेकिन पूंजीवाद कभी हार नहीं मानता है । 

मजदूरों को फांसने के लिए उसके पास नए नए जाल होते हैं । ऐसा कहते हैं कि एक समय जब पचास के दशक में भंडारा ज़िले में लौह अयस्क की उपलब्धता को देखते हुए नेहरु द्वारा सोवियत संघ के सहयोग से स्टील प्लांट के स्थापना की बात चल रही थी यहाँ के कतिपय बीड़ी कारखानेदारों ने उसके लिए मना कर दिया । 

उन्हें डर था कि उनके सारे मजदूर अच्छे मेहनताने के लालच में  स्टील प्लांट में चले जायेंगे और उनके बीड़ी कारखाने बंद हो जायेंगे, इसलिए वह प्रस्ताव रद्द हो गया । खैर जो भी हुआ हो बाद में भंडारा से दो सौ किलोमीटर पूर्व में भिलाई में उसकी स्थापना हुई । 

लेकिन मुनाफे का खेल बहुत ख़तरनाक होता है । मजदूरों के शिक्षित और संगठित हो जाने तथा महाराष्ट्र सरकार द्वारा बीड़ी कामगार एक्ट बना दिए जाने के कारण इन कारखानेदारों को अब उतना मुनाफ़ा नहीं हो रहा था जितना कि पहले हुआ करता था । ज़माना बदल गया था, राज्य सरकार के अलावा केंद्र सरकार में भी उन्ही के बीच से ऐसे अनेक लोग  पहुँच चुके थे जो मजदूरों के हिमायती थे । इसलिए पूँजीवाद अब शोषण के नए रास्ते तलाश करने लगा । 

सन सत्तर के बाद धीरे धीरे यह बीड़ी कारखाने बंद होने लगे । लेकिन वस्तुतः यह कारखाने बंद नहीं हो रहे थे बल्कि महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश शिफ्ट किये जा रहे थे । बीड़ी उद्योग के लिए बाज़ार तलाशने की ज़रूरत नहीं थी वह तो पूरे देश में बन ही चुका था, हर उद्योग की तरह अब उसे भी सस्ते मजदूरों की जरुरत थी । वैसे भी जागरूक जनता के बीच अब उनकी दाल नहीं गलने वाली थी इसलिए वे उन क्षेत्रों की खोज में लग गए जहाँ के लोगों को गुलाम बनाये जाने की सम्भावना अधिक थी । 


आज भंडारा की गलियों से गुजरते हुए तम्बाखू और तेंदू पत्ते की वह कुंवारी महक नहीं आती कोई सुभद्रा बाई ,जानकी बाई और यसोदा अपनी गोद में तम्बाकू की ट्रे यानि पत्तर लिए बैठी नहीं दिखाई देती । अब यह दृश्य , बुंदेलखंड, बंगाल, आँध्रप्रदेश में देखने को मिलते हैं । 

देश में ग़रीबी इतनी है कि कारखानेदारों को कामगार तो कहीं भी मिल जायेंगे लेकिन यह तय है  कि भंडारा के बीड़ी कामगारों जैसे मेहनतकश और कुशल कामगार उन्हें कहीं नहीं मिलने वाले । 

यह वे लोग थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी बीड़ी के धुएँ में होम कर दी, जिनके बच्चों  का भविष्य ज़हरीली तम्बाकू के साथ बीड़ी के पत्तों में लपेट दिया गया, जिन्होंने अपनी इच्छाओं और सपनो को विवशता की लोहे की पट्टी से कोंच कोंच कर अपने मन के भीतर ही रख दिया और बाहर नहीं आने दिया, ज़िन्दगी की काली अंधेरी रात में  इच्छाओं की एक बीड़ी रात भर उनके सीने में सुलगती रही और अपने हक़ की हवा न मिलने के कारण अंत तक पहुँचने से पहले ही बुझ गई । 


सलाम ऐसे बीड़ी कामगारों को जिन्होंने अपनी कई पीढियां सिर्फ इसलिए कुर्बान कर दीं कि उनकी झोपड़ियों में जलती मिट्टी की तेल की ढिबरियां भले बुझ जाएँ लेकिन उनके मालिकों के महलों झाड़ फानूस सदा जगमगाते रहें । 


22 मई 2026

41.भंडारा : मुक्तिबोध जिनकी बनाई हुई बीड़ी पीते थे

रात का गहन अन्धकार, सूनी बावड़ी, खोह से झाँकता ब्रह्मराक्षस का भय, तालाब के किनारे खड़े पीपल और बरगद के आदिम वृक्षों की डालियों से टकराकर सांय सांय करती हवाएँ, निस्तब्धता में सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट,  पुराने महल के परकोटे के द्वार के ऊपर बने निवास में एक चक्करदार सीढ़ी, माचिस की तीली जलने की फिस्स सी आवाज़, सुलगती हुई बीड़ी और बीड़ी के सिरे पर दहकता हुआ अंगारा, धुंध के साथ एकाकार होता हुआ बीड़ी का गाढ़ा धुआं । 

यह कोई स्वप्न दृश्य नहीं है । हिन्दी कविता के हमारे सुधी पाठक प्रारंभ की आधी पंक्ति से ही जान गए होंगे कि इन पंक्तियों में हिंदी के हमारे पुरखे कवि मुक्तिबोध की स्मृति है ।

मुक्तिबोध का एक प्रसिद्ध चित्र है जिसमे वे बीड़ी सुलगा रहे हैं । भीतर धँसे हुए गालों की गहराई में उभरते उनके होठों के बीच एक बीड़ी है जिसे उन्होंने बाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा उंगली के बीच पकड़ रखा है । दायें हाथ में माचिस की जलती हुई एक तीली है जिसकी लौ बीड़ी की नोक से स्पर्श कर रही है । उनकी पलकें नीचे की ओर झुकी हैं और वे उस लौ में मनुष्य द्वारा पहली बार चकमक पत्थर से जलाई गई आग का अक्स देख रहे हैं । 

कला एवं साहित्य के मित्रों को यह चित्र कुछ रूमानियत से भरा हुआ लग सकता है लेकिन जब भी मैं बीड़ी पीते हुए मुक्तिबोध के इस चित्र को देखता हूँ तो मुझे बचपन के दिनों में भंडारा के अपने पड़ोस के घर में रहने वाले बुध्या की माँ और दादी की याद आ जाती है, याद आती हैं कंदील की मद्धम रौशनी में  बीड़ी बनाते हुए झुकी हुई उनकी पीठ और तेंदू पत्ते व तम्बाकू से भरी ट्रे में गुम हो चुकी उनकी ऑंखें । मोहल्ले की अनेक महिलाओं की तरह पांडुरंग ठाकरे के घर में उनकी पत्नी और माँ बीड़ी बनाया करती थीं । मैं अक्सर उनके पास बैठकर उनका बीड़ी बनाना देखा करता था । 

वे टीन से बनी एक ट्रे में तम्बाकू, धागा और पत्तों को रखतीं । इस तरह की चौकोर या सूप के आकार की ट्रे महाराष्ट्र में ‘पत्तर’ कहलाती है । पत्तर सज जाने के बाद वे फिर पत्तों को पान काटने वाली एक कैंची से सिगरेट के पैकेट से कुछ छोटे आकार में काटतीं, एक ओर थोड़ा अधिक चौड़ा व दूसरी ओर उससे कुछ कम । फिर बीड़ी के एक बण्डल लायक पत्ते गिनकर उनकी गड्डी बनातीं । यह पत्ते नर्म रहें इसलिए जूट की बोरी के एक टुकड़े जिसे ‘फारी’ कहते थे उसे गीला कर उसमे पत्ते लपेटकर रखतीं । 

बीड़ी बनाने की शुरुआत करते हुए सर्वप्रथम वे उस गड्डी से एक आयताकार पत्ता लेकर उसपर बीच में थोड़ी सी तम्बाकू भरतीं और एक कोने से सामने के विकर्ण कोने तक तिरछे चलते हुए,तम्बाकू को थोड़ा थोड़ा सिरों की ओर फैलाते हुए  उँगलियों के एक निश्चित दबाव के साथ उसे गोल गोल लपेट देतीं । तम्बाकू भरकर पत्ते को लपेटते हुए इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी होता था कि बीड़ी का जो सिरा होठों के भीतर होता है उसे थोड़ा सा दबाकर चपटा कर दिया जाए । फिर उसे धागे से बांधना भी ज़रूरी होता है ताकि वह खुल न जाये । फिर लोहे की तीन इंच लम्बी आधा इंच चौड़ी पतली सी एक आयताकार पट्टी की नोक से बीड़ी के जलाये जाने वाले सिरे को भीतर की ओर दबाते हुए कोंच कोंच कर उसका मुँह बन्द कर देतीं ताकि तम्बाकू वहाँ से बाहर न निकले ।  इस तरह चोवीस या पच्चीस बीड़ियाँ हो जाने पर वे उसका एक बण्डल बना देतीं । 

मुझे तम्बाकू और तेंदू पत्ते की कुँवारी गंध बहुत अच्छी लगती थी । बीड़ी बनाने की कला भी मेरे लिए किसी सृजनात्मक कला से कम नहीं थी । एक दिन मैंने उनसे कहा “मुझे भी बीड़ी बनाना सिखा दो न काकी “ वे बहुत देर तक हँसती रहीं और कहा ..”तू बड़े घर का लड़का है, तू क्या करेगा बीड़ी बनाना सीख कर, तू तो साहेब बनेगा साहेब । ” मुझे उस उम्र में उनकी बात समझ में नहीं आई थी कि किराये के छोटे से घर में रहने वाला मैं, बड़े घर का लड़का कैसे हो गया और इसका बीड़ी बनाना सीखने से क्या सम्बन्ध है ।

बीड़ी बनाने के बाद काकी उन बंडलों को एक टोकनी में रखकर, सर पर लादकर, बीड़ी कारखाने तक पहुँचाने जाती थी । उनका कोई ख़ास कारखाना रहा होगा लेकिन मुझे याद नहीं । वैसे भंडारा में उन दिनों अनेक बीड़ी कारखाने थे जिनमे बड़े बाज़ार में दादा धोटे उर्फ़ बारा भाई के घर के पास स्थित छोटाभाई जेठाभाई बीड़ी कारखाना सबसे मशहूर था । यह सन दो हज़ार चार में केंद्र सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री रह चुके कांग्रेस के लोकप्रिय नेता प्रफुल्ल पटेल के दादा और भंडारा ज़िले के शैक्षणिक विकास के प्रणेता मनोहर भाई पटेल के पिताजी का कारखाना था । यह लोग बंदरी बीड़ी बनाया करते थे जो बाद में मनोहर बीड़ी के नाम से प्रसिद्ध हुई । स्टेशन जाने वाली रोड पर दिनकर राव रहाटे के घर के दाहिनी ओर खण्डहर सी दिखाई देने वाली अधूरी बनी एक इमारत में सेठ रावजी भाई अम्बालाल का बीड़ी कारखाना था जो ठक्कर अम्बालाल कारखाने के नाम से प्रसिद्ध था । इसका बड़ा सा खुला दरवाज़ा था जिस पर प्लास्टर नहीं था । कहते हैं कि वहाँ किसी ब्रह्मराक्षस का शाप था जिसकी वज़ह से इमारत का निर्माण कार्य कभी पूरा नहीं हो पाता था ।अंततः वह इमारत ढहा दी गई , वहां अब जो है उसे आप इस चित्र में देख सकते हैं । 

उस समय बीड़ी का कारोबार अधिकतर गुजरातियों के हाथ में था । उन्हीं में से एक मूलजी भाई का कारखाना था जो राममंदिर के पीछे कोष्टी मोहल्ले में था । एक बीड़ी कंपनी सी पी कंपनी के नाम से भी मशहूर थी । अनेक छोटे मोटे कारखानों के अलावा राजा गणपतराव पाण्डे के महल वाली सड़क पर उनके हाथीखाने  के सामने हरगोविंद लाल मोहन लाल का बीड़ी कारखाना था । यह कारखाना बहुत बड़े एक परिसर में था जहाँ खूब सारे आम के पेड़ थे । मेरे साथ मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले दोस्त रूपचंद ज्ञानी के पिता इस कारखाने में मुनीम थे । हाथीखाने के पीछे ही गाँधी विद्यालय था । मैं अक्सर दोपहर की लंच की छुट्टी में रूपचंद के साथ कारखाने चला जाया करता था और वहाँ मजदूरों को बीड़ी बनाते हुए देखने के अलावा अन्य गतिविधियाँ भी देखा करता था ।  इस चित्र मे जो गेट है उसके भीतर था यह कारखाना । 

कारखाने की इमारत में बीचों बीच एक बड़ा हाल था जो पुरुष मजदूरों के लिए था और एक छोटा हाल महिला कामगारों के लिए था । वे सुबह सुबह कारखाने आते एक वितरण खिड़की से अपनी ट्रे यानि पत्तर , तम्बाकू ,पत्ते, धागा और पट्टी लेते और हाल में बिछी दरी पर एक जगह पालथी मारकर बैठ जाते । हर कारखाने में बीड़ी में प्रयुक्त की जाने वाली तम्बाकू की किस्म अलग अलग होती थी । इसके अलावा अलग अलग कंपनियों का धागा भी अलग होता था । लाल,पीले,हरे,नारंगी आदि रंगों के धागों से ही अलग अलग कंपनियों की बीड़ियाँ पहचानी जाती थीं । जिन लोगों को कारखाने में बैठकर काम नहीं करना होता था वे अपना तम्बाकू,धागा और पत्ते आदि लेकर घर चले जाते थे । इनमें अधिकांश महिलाएँ होती थीं इसलिए कि उन्हें बीड़ी निर्माण के अलावा घर के काम भी करने होते थे । यह उन दिनों के वर्क फ्रॉम होम का प्रारंभिक संस्करण था । बीड़ी तैयार होने के बाद उसका बण्डल बनाया जाता और उसे कारखाने में उसी दिन या अगले दिन जमा किया जाता । 

शहरों की तरह गांवों में भी बड़े कारखानों की छोटी छोटी इकाइयाँ थीं । यहाँ एक दीवान जी नामक शख्स के माध्यम से सारा काम होता था । यह दीवान या उनका आदमी शहर के कारखाने से तेंदू पत्ता,तम्बाकू,धागा आदि लेकर आता और उसे हिसाब से गाँव के बीड़ी मजदूरों में बाँट देता । फिर बीड़ियाँ बन जाने के बाद एक बाँस के बने एक बड़े से टोकरे में जिसे ‘हारा’ या ‘झाल’ कहते थे उन बंडलों को इकठ्ठा किया जाता और दीवान या उनका आदमी उन्हें  भरकर शहर के बड़े कारखाने में पहुँचा देता था । 

फिर दीवान सप्ताह में एक बार शहर के कारखाने जाता और वहाँ उन बंडलों के एवज  में प्राप्त भुगतान राशि लेकर गाँव आता और उन्हें मजदूरों में बाँट देता था । मजदूरी का भुगतान सप्ताह में एक बार ही किया जाता था । मजदूर लगभग रोज ही उनके द्वारा बनाई हुई बीडियों के बण्डल  दीवान के पास जमा करते और नए बण्डल बनाने के लिए अगले लाट का सामान ले जाते । हर मजदूर को दी गई तम्बाकू, तेंदू पत्ते की मात्रा का हिसाब बराबर रखा जाता । उसके ऐवज में प्राप्त बनी हुई बीडियों के बण्डल और उसे किये गए साप्ताहिक भुगतान का हिसाब भी एक कॉपी में लिखा जाता था । ऊपर से देखने में ऐसा ही लगेगा कि यह कितनी बढ़िया व्यवस्था है, कारखाने से कच्चा माल लो, आराम से घर बैठकर बीड़ियाँ बनाओ, उन्हें कारखाने में जमा  कर अपना मेहनताना वसूल करो और ख़ुशी ख़ुशी जीवन बिताओ । लेकिन ऐसे दृश्य केवल गाँव का सेट बनाकर गाँव का सुखी जीवन  दिखाने वाली हिंदी फिल्मों में मिलते हैं, वास्तविकता इसके बिलकुल विपरीत होती है  । 

शरद कोकास 

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