2 जून 2026

43.एक बीड़ी रात भर सीने में सुलगती है


इस देश के पहले बीड़ी मजदूर आन्दोलन की कथा 

 वह उन्नीस सौ तीस के नवम्बर माह की नौ तारीख की एक सुबह थी । सारे बीड़ी कामगार अपने परिवारों सहित तिरोड़ा के इस कारखाने के द्वार पर इकठ्ठा होने लगे । इनमे अधिकांश महिलाएँ थीं जो अपनी गोद में दुधमुँहे शिशुओं को लेकर आईं थीं । 

उनकी बहुत साधारण सी मांगें थी कि हमें काम का उचित मुआवजा दिया जाए, हमारे द्वारा बनाई गई बीडियों को जानबूझकर रिजेक्ट न किया जाये, हमारे काम के घंटे तय किये जाएँ, हमारा मानसिक व शारीरिक शोषण समाप्त किया जाए तथा हमारे बच्चों के लिखने पढ़ने की उचित व्यवस्था की जाये । 

रोज सुबह बासी खाकर और चावल का पेज पीकर वे कारखाने के दरवाजे पर इकठ्ठा हो जाते थे ताकि नारे लगाने लायक ताकत उनमे पैदा हो जाये । बच्चों को वे घर पर नहीं छोड़ सकते थे इसलिए कि वे घर में रहकर भी क्या करते । आखिर मजदूर तो बच्चे भी थे । 

हाड़ कंपा देने वाली सर्दियों के दिन भी उन्होंने कारखाने के बाहर लगे पंडाल के नीचे गुजार दिए । वहीं वे चूल्हे जला लेते औ हँड़िया में भात पका लेते । सर्दियों में ठिठुरते हुए इन मजदूरों के पास आस के अलाव से आग लेने के सिवा कोई चारा नहीं था । 

कारखानेदारों के पास इतना पैसा था कि महीनों कारखाना बंद रहने के बाद भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था । उन्हें पता था कई तूतियां मिलकर भी उनके नक्कारखाने में बज रहे दमन के नगाड़े की आवाज़ को दबा नहीं सकतीं । सत्ता उनके साथ थी, व्यवस्था उनके साथ थी ।

हेमंत और शिशिर के बाद बसंत आकर भी चला गया और गर्मियां आ गईं । पंडाल के नीचे बैठे मजदूर अब कुछ नहीं कहते थे । उनकी खामोशी में उनकी विवशता थी । उनके पास का अनाज ख़त्म हो गया था,कपड़े फट चुके थे ,बर्तन भांडे तक गिरवी रखे जा चुके थे । अब उन्हें कोई उधार भी नहीं देता था । 

जब पेट में अन्न का दाना न हो तो चाहे कितना सुहावना मौसम हो,परिस्थितियाँ कितनी भी अनुकूल हों मुँह से आवाज़ नहीं निकलती है । हड्डियों का ढांचा बने यह मजदूर बेचारे क्या करते । वे इंसान थे और उन्हें जीने के लिए दो समय का खाना ज़रूरी था । 

आखिर भूखे बच्चों के गड्ढे बनते हुए पेट उनसे नहीं देखे गए और छह माह बाद उन्होंने अपनी हड़ताल वापस ले ली । 

कारखानेदारों और उनके द्वारा पोषित लोगों के चेहरों पर क्रूरता की परत और घनी हो गई । अर्थसत्ता और राजसत्ता के ऊँचे ऊँचे मंचो पर मानो कोई नाटक चल रहा था जिसमे क्रूर तानाशाह के अट्टहास गूँज रहे थे । मेसोपोटामिया के हम्मुराबी द्वारा प्रजा को डराने के लिए की जाने वाली मुनादियों से लेकर रोम, फ़्रांस अमेरिका, रूस के खेतों, कारखानों में किसी दौर में सुनाई देने वाली चेतावनियाँ यहाँ भी सुनाई दे रही थीं   ..

” सुनो मजदूरों ध्यान से सुनो .. जब तुम लोग घर बैठे भूखों मर रहे थे, हमने तुम्हे काम दिया, वह भी इतना आसान काम जिसके लिए न धूप में पसीना बहाना है ना हाड़ तोड़ मेहनत करना है उसके बाद भी तुम्हे नखरे आते हैं ? ध्यान रखो ग़रीबी और भुखमरी से हमारे सिवा तुम्हे कोई नहीं बचा सकता, हम ही हैं जो तुम्हारी रक्षा कर सकते हैं , हम ही तुम्हारे मालिक हैं , हम ही तुम्हारे ईश्वर हैं , हमारी शरण में आने के अलावा तुम्हारे पास और कोई चारा नहीं है ।

मजदूरों की आस टूट गई थी । वे जानते थे मालिकों द्वारा कही गई एक एक बात सच है । इस काम के अलावा उनके पास और कोई काम नहीं है, न कहीं उन्हें काम मिलने वाला है । उन्होंने काम पर वापस आने का निर्णय कर लिया । लेकिन मालिक लोग इतनी सी बात पर खुश होने वाले नहीं थे एक नया फरमान जारी हुआ 

“ छह माह तक तुमने काम न करके हमारा नुकसान किया है, इसकी सज़ा मिलेगी, बराबर मिलेगी ।“ और ठीक अगले ही दिन से बीड़ी कामगारों की मजदूरी चार आने प्रति हज़ार की जगह दो आने प्रति हज़ार कर दी गई । 

कहाँ कुछ बदला है ? आज भी इसी तरह हमारे ईश्वर बने कुछ लोग हमें बरगला रहे हैं, हम उनके लिए रात दिन मेहनत कर रहे हैं, उन्हें मुनाफ़ा कमा कर दे रहे हैं और वे हमें मेहनत और मेहनताने का गणित समझा रहे हैं । हम इतने नासमझ भी नहीं कि यह न समझ सकें कि हम जितनी मेहनत करते हैं उतना  मेहनताना हमें आज भी नहीं मिलता है । अगर सही सही मेहनताना मिलता तो आज हम झोपड़ियों में नहीं रहते बल्कि सेठों की तरह हमारे पास भी महल होते । “ 

छह माह तक हड़ताल करने,सब कुछ गँवाने के बाद भी हल निकलना तो दूर उलटे उनकी मजदूरी भी आधी कर दी गई । अँधेरा तो पहले ही छाया हुआ था इन की बस्तियों में, यह अँधेरा और गहरा  गया । लेकिन जो चिंगारी उन्होंने जलाई थी वह व्यर्थ नहीं गई । 

उनकी आवाज़ भंडारा ज़िले के बीड़ी कामगारों के अलावा कामठी, नागपुर के मजदूरों तक पहुँच चुकी थी । सुख सबके भले अलग अलग हों लेकिन दुःख एक होते हैं । अलग अलग जगहों पर रहने के कारण भले वे एक साथ नहीं रह सकते थे लेकिन दुःख एक थे और वे अपने जैसे दुखों के साथ मिलकर अपना संगठन बना रहे थे ।

उन दिनों कामठी के बाबू लक्ष्मण नगरारे हरदास सेन्ट्रल प्रोविंस एंड बेरार असेम्बली के विधायक थे । 

बाबू एल एन हरदास स्वयं इसी पृष्ठभूमि से आये थे इसलिए बीड़ी कामगारों का दुःख जानते थे । तिरोडा के बीड़ी कामगारों की हड़ताल के वे प्रत्यक्ष गवाह थे । उन्होंने इस आन्दोलन में शामिल लोगों की मीटिंग लेना प्रारम्भ की । फिर उनके नेतृत्व में कामठी और आसपास के क्षेत्रों के बीड़ी कामगार एकत्र होना शुरू हुए और उन्नीस सौ इकतीस की पहली जनवरी को उनके द्वारा एक संगठन की स्थापना की गई । इस संगठन का नाम था ‘

मध्यप्रांत बीड़ी कामगार संगठन’ । 

यह एक ऐसी चिंगारी थी जो लगातार बढ़ती जा रही थी । बीड़ी कामगार अपने हक़ ले लिए लड़ रहे थे, जेल जा रहे थे । यह लड़ाई आगे के अनेक दशकों तक चलती रही । मेरे बचपन के मित्र भगवान रहाटे बताते हैं कि साठ के दशक में जब बीड़ी कामगारों को आन्दोलन के दौरान गिरफ्तार कर जेल ले जाया जाता था बहुत सी माताओं के साथ उनके बच्चे भी जेल चले जाते थे । उन्हें भी इसी तरह अपनी माँ के साथ बचपन में ही जेल जाने का अवसर मिला था । 

हालाँकि एक दिन में ही उन मजदूरों  छोड़ दिया जाता था । 

आग की लपटों को कैद करके रखना वैसे भी मुश्किल काम था । 

लोगों में चेतना जागृत हो रही थी बाबासाहेब का घोषवाक्य ‘शिक्षित हो संगठित हो और संघर्ष करो’ हवाओं में गूँज रहा था । बीड़ी कामगारों के बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर नाम कमा रहे थे । लेकिन अभी भी एक बहुत बड़ा तबका था जिनके लिए आजीविका का साधन बीड़ी बनाना ही था ।

इसके आगे की कथा बहुत संक्षेप में है । 

आगे चलकर महाराष्ट्र की रिपब्लिकन पार्टी के प्रसिद्ध नेता राज्यसभा सदस्य एडवोकेट ना. ह. कुंभारे के प्रयासों से महाराष्ट्र सरकार द्वारा बीड़ी मजदूर कानून बनाया गया । यह पिछले दौर में बने, न्यूनतम मजदूरी एक्ट, औद्योगिक विवाद कानून,बाम्बे इंडस्ट्रियल एक्ट के तारतम्य में ही था। इस कानून ने बीड़ी मजदूरों को अनेक अधिकार दिए । कारखानेदारों द्वारा अब उन्हें न्यूनतम मजदूरी देना अनिवार्य कर दिया गया था । उनके लिए एक कल्याण फंड की स्थापना भी की गई । इस फंड में उन्हें दिए जा रहे पारिश्रमिक से ही पैसा काटकर जमा किया जाता था । यद्यपि सरकार को उसका हिसाब देते समय कुछ गोलमाल भी होता था । लेकिन कुल मिलाकर मजदूरों के बेहतर दिन आने लगे थे ।

लेकिन पूंजीवाद कभी हार नहीं मानता है । 

मजदूरों को फांसने के लिए उसके पास नए नए जाल होते हैं । ऐसा कहते हैं कि एक समय जब पचास के दशक में भंडारा ज़िले में लौह अयस्क की उपलब्धता को देखते हुए नेहरु द्वारा सोवियत संघ के सहयोग से स्टील प्लांट के स्थापना की बात चल रही थी यहाँ के कतिपय बीड़ी कारखानेदारों ने उसके लिए मना कर दिया । 

उन्हें डर था कि उनके सारे मजदूर अच्छे मेहनताने के लालच में  स्टील प्लांट में चले जायेंगे और उनके बीड़ी कारखाने बंद हो जायेंगे, इसलिए वह प्रस्ताव रद्द हो गया । खैर जो भी हुआ हो बाद में भंडारा से दो सौ किलोमीटर पूर्व में भिलाई में उसकी स्थापना हुई । 

लेकिन मुनाफे का खेल बहुत ख़तरनाक होता है । मजदूरों के शिक्षित और संगठित हो जाने तथा महाराष्ट्र सरकार द्वारा बीड़ी कामगार एक्ट बना दिए जाने के कारण इन कारखानेदारों को अब उतना मुनाफ़ा नहीं हो रहा था जितना कि पहले हुआ करता था । ज़माना बदल गया था, राज्य सरकार के अलावा केंद्र सरकार में भी उन्ही के बीच से ऐसे अनेक लोग  पहुँच चुके थे जो मजदूरों के हिमायती थे । इसलिए पूँजीवाद अब शोषण के नए रास्ते तलाश करने लगा । 

सन सत्तर के बाद धीरे धीरे यह बीड़ी कारखाने बंद होने लगे । लेकिन वस्तुतः यह कारखाने बंद नहीं हो रहे थे बल्कि महाराष्ट्र से मध्यप्रदेश शिफ्ट किये जा रहे थे । बीड़ी उद्योग के लिए बाज़ार तलाशने की ज़रूरत नहीं थी वह तो पूरे देश में बन ही चुका था, हर उद्योग की तरह अब उसे भी सस्ते मजदूरों की जरुरत थी । वैसे भी जागरूक जनता के बीच अब उनकी दाल नहीं गलने वाली थी इसलिए वे उन क्षेत्रों की खोज में लग गए जहाँ के लोगों को गुलाम बनाये जाने की सम्भावना अधिक थी । 


आज भंडारा की गलियों से गुजरते हुए तम्बाखू और तेंदू पत्ते की वह कुंवारी महक नहीं आती कोई सुभद्रा बाई ,जानकी बाई और यसोदा अपनी गोद में तम्बाकू की ट्रे यानि पत्तर लिए बैठी नहीं दिखाई देती । अब यह दृश्य , बुंदेलखंड, बंगाल, आँध्रप्रदेश में देखने को मिलते हैं । 

देश में ग़रीबी इतनी है कि कारखानेदारों को कामगार तो कहीं भी मिल जायेंगे लेकिन यह तय है  कि भंडारा के बीड़ी कामगारों जैसे मेहनतकश और कुशल कामगार उन्हें कहीं नहीं मिलने वाले । 

यह वे लोग थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी बीड़ी के धुएँ में होम कर दी, जिनके बच्चों  का भविष्य ज़हरीली तम्बाकू के साथ बीड़ी के पत्तों में लपेट दिया गया, जिन्होंने अपनी इच्छाओं और सपनो को विवशता की लोहे की पट्टी से कोंच कोंच कर अपने मन के भीतर ही रख दिया और बाहर नहीं आने दिया, ज़िन्दगी की काली अंधेरी रात में  इच्छाओं की एक बीड़ी रात भर उनके सीने में सुलगती रही और अपने हक़ की हवा न मिलने के कारण अंत तक पहुँचने से पहले ही बुझ गई । 


सलाम ऐसे बीड़ी कामगारों को जिन्होंने अपनी कई पीढियां सिर्फ इसलिए कुर्बान कर दीं कि उनकी झोपड़ियों में जलती मिट्टी की तेल की ढिबरियां भले बुझ जाएँ लेकिन उनके मालिकों के महलों झाड़ फानूस सदा जगमगाते रहें । 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें