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10 जून 2026

99. भंडारा : क्यों कुछ लोग चाहते हैं कि दुनिया में सब लोग उन्ही के धर्म के हो जाएँ


बचपन में जब पहली बार ‘गंगा जमनी तहज़ीब’ यह शब्द सुना तो प्यारेलाल सर से पूछा “सर, इसका मतलब क्या होता है ? “ सर ने कहा “जिस संस्कृति में हिन्दू,मुसलमान सब धर्मों के लोग मिलकर एक साथ रहते हों, जहाँ हिन्दी,मराठी की तरह उर्दू व अन्य भाषाओं  को भी मान्यता दी जाती हो, वह गंगा जमनी तहज़ीब कहलाती है ৷” 

मैंने कहा “सर,लेकिन गंगा जमना तो दोनों हिन्दुओं की नदियाँ हैं ? इसमें एक नदी मुसलमानों या ईसाईयों की भी होना चाहिए ना ?“

  प्यारेलाल सर ज़ोर से हँसे “नदियाँ, ज़मीनें, सागर किसी एक धर्म के थोड़े ही होते हैं, सबका उन पर बराबर हक़ होता है ৷ “ मैं भारत,पाकिस्तान,चीन,अमेरिका,ईरान,ईराक के नक्शों से भरे एटलास में झांक कर  बराबरी की रेखा  ढूँढता रहता था फिर उसे न पाकर प्रयास छोड़ देता था ৷ 

अपने बड़े होते हुए शरीर की उपरी मंज़िल में स्थित मेरे साढ़े आठ सौ ग्राम के भेजे में केवल इतनी बात समा पाई कि जो भी हो , दुनिया के सब लोग बराबर हैं बाकी यह धर्म, राष्ट्रीयता वगैरह सब बेकार है ৷

अपने भंडारा शहर को  जब भी मैं देखता, मुझे गंगा जमनी तहज़ीब वाली सर की बातें बिलकुल सही लगतीं ৷ यह वह शहर था जहाँ भगवे और हरे झंडे एक साथ दिखाई देते थे, जहाँ  ईद,गुरुनानक जयन्ती और रामनवमी के जुलूस एक ही रास्ते से निकलते थे और उनमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख सभी समुदाय के लोगों द्वारा शर्बत बांटा जाता था  ৷ चर्च की घंटियाँ पुकारती थीं और अज़ान सुनकर लोग मस्जिद का रुख करते थे ৷ यहाँ कव्वालियों और मुशायरों में हिन्दी मराठी कविता के प्रेमी भी होते थे  और गणेशोत्सव, दुर्गा उत्सव में मुस्लिम भाई भी चंदा देते थे ৷ 

मुहर्रम माह की दसवीं तारीख आने के पहले कई गलियों में हरे झंडे दिखाई देने लगते ৷ हजरत पैगम्बर के नवासे इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाये जाने वाले मोहरम नामक इस पर्व में हम बच्चों की रूचि सबसे अधिक ताज़िए और सवारी देखने में होती थी  । 

ताजिये 

एक दिन स्कूल से लौटते हुए नईम के घर रुका तो मुनीर खान चचा ने बताया हिजरी सन इकसठ अर्थात ईसवी सन 680 में मोहरम माह की दसवी तारीख को बगदाद से 100 किलोमीटर उत्तर पूर्व में करबला नामक एक गाँव में हजरत इमाम हुसैन का उनके विरोधियों ने वध कर दिया था ৷ उन्हीं की याद में मुहर्रम मनाते हैं ৷

चचा ने बताया कि हजरत हुसैन और हसन की याद  में मोहरम माह के पाँचवे दिन यह सवारी बैठाई जाती है  और नवें दिन उठाई जाती है । मैंने देखा एक दिन कि मोहर्रम के जुलूस में काले कपडे पहने लोग नंगे बदन हा हुसैन हा हुसैन कहते हुए अपनी छाती पीट रहे हैं, उनकी छाती से उससे खून निकल रहा है ৷ 

मैंने नईम से कहा तुम भी तो मुसलमान हो तुम लोग जुलूस में नहीं जाते ? “नईम ने कहा “ नहीं, यह शिया लोग हैं यह इसी तरह मातम मनाते हैं ৷ हम लोग सुन्नी हैं इसलिए इसे नहीं मनाते ৷ मैंने पूछा “यह शिया सुन्नी क्या होता है ?” तो उसने कहा “हम लोग हज़रत पैगम्बर और इस्लाम में ईमान रखते हैं और शिया लोग पैगम्बर के दामाद उनके नवासे और उनकी फैमिली में विश्वास रखते हैं ৷”

बचपन के अपने उस साढ़े आठ सौ ग्राम के भेजे में यह बात भी नहीं आई, लेकिन गंगा जमनी शब्द के पेशे नज़र इतना ज़रूर समझ में आ गया कि जैसे गंगा को कहीं भागीरथी कहते हैं, कहीं मन्दाकिनी, कहीं हुगली वैसे ही मुसलमानों को कहीं शिया कहते हैं कहीं सुन्नी , बाकी हैं तो सब एक ही ৷ फिर बरसों बाद जब अपना वयस्क भेजा पूरे चौदह सौ ग्राम का हो गया एक दिन दुर्ग में अपने कवि मित्र नासिर अहमद सिकंदर से पूछा “यार तुम शिया हो या सुन्नी ?“नासिर भाई मुस्कुराए और उन्होंने जवाब में जनवादी शायर अकबर इलाहाबादी का शेर कहा .. 

“मेरा ईमान मुझसे क्या पूछती हो मुन्नी, 

शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी ৷”

क्षमा करें ..बचपन की गली से निकलकर जवानी की खुली सड़क पर आ गया था ৷ फिर चलते हैं भंडारा के देशबंधु वार्ड की उस पतली सी गली में जहाँ किराये के एक घर में हम रहते थे  ৷ गलियों के इस शहर में हमारी गली से आगे रिंग रोड पर रवि रेहपाड़े के घर के ठीक पीछे, पाटलिन बाई के घर की बगल में एक खाली जगह पर एक मंडप बनाया जाता था और वहाँ मुहर्रम माह के पाँचवे दिन यह सवारी रखी जाती थी जिसमें  मोरपंख का बना एक झाड़ू जैसा होता था, इसके अलावा चान्दी का एक पंजा भी जिसे अली का पंजा कहते थे । 

वह एक खुली जगह थी जहाँ बल्लियों पर लाल- हरे झंडे बन्धे रहते थे ৷ उन्ही बल्लियों पर बंधे ट्यूब लाइटों पर हरी पन्नी या ज़िलेटिन लगा दी जाती थी जिसके कारन सब ओर  हरी रोशनी दिखाई देती थी  । सवारी उठने वाले दिन वहाँ उपस्थित हरी या सफ़ेद पगड़ी बांधे हुए एक व्यक्ति वह सवारी  उठाता था । 

जब मुझे पता चला कि सवारी उठाने वाला वह व्यक्ति हिन्दू है तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ । पूछने पर ज्ञात हुआ  कि सवारी उठाने का पहला हक उसे ही मिलता है जो सबसे पहले मन्नत मानता है या जिसकी मन्नत पूरी होती है फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम । पहले मुझे लगता था कि मोहरम में केवल मुस्लिम लोग ही शामिल रहते हैं लेकिन इस सवारी के आयोजन में पूरे हिन्दू ही दिखाई देते थे । सवारी निकलने के बाद वहाँ के हिन्दू घरों में उसकी पूजा होती थी । एक व्यक्ति ऊददान में लोबान जलाता रहता था और एक व्यक्ति मशाल लेकर चलता था । मशाल को वहाँ टेम्भा कहते थे जो खाने के तेल से जलाई जाती थी । 

सवारी उठाने वाला वह व्यक्ति एक अजीब सी बेख़याली में रहता था , कुछ ही देर में वह झूमने लगता , उसकी कमर से एक रस्सी बंधी होती थी जिसे लोग थामे रहते थे ৷ लोग कहते थे उस पर हाल आ रहे हैं .. वह जोर लगाकर आगे बढ़ता, उसकी ऑंखें लाल हो जातीं और वह अस्फुट सा बडबडाता रहता “हा हसन .. दूल्हा हसन, हा हसन, दूल्हा हसन ৷” मैं सोचता, वध तो पैगम्बर के नवासे हुसैन का किया गया था, यह हसन हसन क्यों कहता है ৷ 

फिर एक दिन चचा ने बताया कि हसन, हुसैन से बड़े भाई थे, लेकिन उनकी मृत्यु एक हादसे में हो गई थी ৷ कहते हैं कि शादी के वक्त जब वे दूल्हा बने हुए थे उनकी बीबी ने धोखे से उन्हें दूध में शीशा घोलकर पिला दिया था जिससे उनकी मौत हो गई थी ৷ यह षड्यंत्र यजीद ने किया था ৷ जब उनकी हत्या की गई वे दूल्हे के वेश में थे इसीलिये सवारी उठाते समय दूल्हा हसन पुकारते हैं ৷ 

मैं समझ गया मोहर्रम में यह जो मोरपंख से बनी फूलों से सजी पगड़ी जैसी सवारी लोग उठाते हैं वह दूल्हा बने हसन के सेहरे का ही प्रतीक है ৷ हाँ ताजिया ज़रूर हज़रत हुसैन की कब्र या मज़ार के प्रतीक के रूप में है ৷ इस तरह ग़मी  का यह त्यौहार दोनों भाइयों हसन हुसैन और उनके परिवार के बहत्तर लोगों की याद में मनाया जाता है ৷  

कितना सुन्दर दृश्य होता था उस जगह का जहाँ यह सवारी रखी जाती थी ৷ मिट्टी के एक बड़े से ऊददान में लाल लाल अंगारे सुलगते रहते थे৷ हर थोड़ी देर में एक आदमी गत्ते से उन अंगारों को हवा देता और उन पर लोबान छिड़क देता ৷ जलते हुए कोयलों से धुएँ के गहरे बादल उठते और मंडप की छत पर छा  जाते ৷ लोबान की खुशबू चरों ओर फ़ैल जाती ৷ लेकिन न जाने क्यों मुझे धुएँ के उस बादल में उन बेबस पुरुषों, स्त्रियों और दुधमुंहे शिशुओं  के चेहरे दिखाई देते जिन्हें ज़ालिम यजीद द्वारा मार डाला गया था ৷ 

अपनी उम्र की सीमा का अतिक्रमण कर मैं सोचने लगता, क्या धर्म का अर्थ वर्चस्व की लड़ाई है ? 

लोग अपने झूठे अहंकार, जातिगत अभिमान, सत्ता लोलुपता,झूठी शान या राजनीतिक प्रभुत्व को त्यागकर इन्सान की तरह क्यों नहीं रहते ? क्यों कुछ लोग चाहते हैं कि दुनिया में सब लोग उन्ही के धर्म के हो जाएँ ? क्या हासिल होता है उन्हें ऐसा करने से ? हर मनुष्य  को अपने विश्वासों के साथ जीने का अधिकार क्यों नहीं है ?    

लोबान के उस धुएँ में मुझे जाने कितने प्रश्न चिन्ह तैरते दिखाई देते थे, अंततः सोचना बंद कर अन्य आस्थावान लोगों की तरह मैं भी लोबान की गंध में खो जाता ৷ दरगाहों और मजारों पर जलने वाले लोबान की गंध श्रद्धा के वातावरण निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका ऐडा करती है ৷ मुझे भी यह गंध हमेशा से आकर्षित करती रही है ৷ 

अक्सर मैं देखता था कि भंडारा में कशकोल लिए हरा चोला पहने एक फ़कीर अपने ऊददान में जलते हुए अंगारे लिए घरों और दुकानों में जाते थे  और उन दहकते अंगारों पर लोबान छिड़कते थे  ৷ लोबान के धुएँ से उठती खुशबू मुझे अलीबाबा और मरजीना के देश में ले जाती थी ৷ मुझे उस धुएँ में सफ़ेद परिधान पहने पंख लगाकर उड़ती हुई परियों की छवि दिखाई देती थी ৷  

मोहरम के अंतिम यनि दसवें दिन एक जुलूस की शक्ल में हजरत हुसैन की मज़ार के प्रतीक ताज़िए निकाले जाते थे ৷ इन ताज़ियों को देखकर मुझे दिवाली पर बनाये कागज़ के और मिट्टी के किलों की याद आती थी ৷ मैं हर बार सोचता कि दिवाली पर ताज़िए की तरह एक किला  बनाऊंगा ৷ हालाँकि ऐसा किला मैं कभी नहीं बना पाया ৷ बचपन बहुत अधिक वक्त नहीं देता है जितनी जल्दी आता है, उतनी जल्दी चला भी जाता है ৷ इसीलिये तो मैं बच्चों से कहता हूँ बचपन को भरपूर जी लो वर्ना फिर यह बचपन लौटकर कभी नहीं आएगा ৷


शरद कोकास 

7 जून 2026

55. बैतूल : रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क


बैतूल शहर अपनी परंपराओं,अपने संस्कारों और अपनी मासूमियत के साथ इस तरह बड़ा हो रहा था कि उसे देखने वाले दावे के साथ कह सकते थे कि वह बड़ा होकर किसी बड़े शहर की सोहबत में भी नहीं बिगड़ेगा । बड़े शहरों के नाम पर बैतूल के दक्षिण की ओर नागपुर था और उत्तर की ओर भोपाल । दोनों शहर मोहल्ले के बड़े बच्चों की तरह बैतूल से काफी दूर दूर रहते थे । 

अपनी देह में महुए की आदिम गंध लिए बैतूल धीरे धीरे बड़ा हो रहा था  । अंग्रेजों को इसकी  देहगंध से कोई सरोकार नहीं था लेकिन उन्हें इसकी शीतलता पसंद थी इसलिए उन्होंने गोंड राजा द्वारा किसी समय निर्मित खेड़ला किले  से छह किलोमीटर दूर अपने सरकारी दफ्तर और आवास बनाये, उन दिनों वस्तुओं के आयात निर्यात की सुविधा के लिए रेल लाइन के निकट ही मंडी हुआ करती थी । बैतूल में रेलवे स्टेशन के निकट का यह क्षेत्र गंज कहलाने लगा । धीरे धीरे बस्ती बसनी शुरू हुई, सदर में बंगले बने,शहर में बाज़ार बने । हमारा मोहल्ला कोठीबाज़ार के अंतर्गत आता था और साप्ताहिक बाज़ार लगने की वज़ह से इतवारी बाज़ार कहलाता था । यह शहर के लगभग अंतिम छोर पर बसा था । यहाँ हमारे दो मकान थे एक नया मकान जो 1957 मे बना था 


और पुराना मकान लगभग सन 1925 मे बना था


गंज से आने वाली रिंग रोड बीच में ही कालापाठा  की ओर मुड़ जाती थी जहाँ सागौन वन में सागौन के चौड़े चौड़े पत्तों के ऊपर से आसमान शहर के भीतर झाँकने की कोशिश करता था ।

वर्षा के दिनों में बादल उन ऊँचे ऊँचे पेड़ों के ऊपर पसर जाते और कुछ देर ठहर कर बरस जाते । नमी लिए हुए जंगल की आदिम गंध उस वीरानी में चारों ओर पसर जाती । लाल लाल बीर बहूटियाँ अपने पट खोलकर मिटटी के टीलों में दीमकों के साथ अपने घर बनाने लगतीं ।

बैतूल में उन दिनों जंगल ही जंगल थे इसलिए शहर में भी जंगल विभाग के दफ्तर भी सर्वप्रथम यहीं खुले ।

हमारे घर के सामने से गुजरने वाली वह सड़क शहर की अंतिम सड़क थी । उसके बाद  टी अक्षर की ऊपरी डंडी की तरह रिंग रोड आ जाती थी ।


यह शहर की सीमा रेखा की तरह ही थी । रिंग रोड के उस पार मुस्लिमों का कब्रस्तान था


और उसीसे लगा हिन्दुओं का स्मशान ।

उन दिनों मैं आत्मा में विश्वास करता था और सोचता था कि जीते जी तो  हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ते हैं लेकिन मरने के बाद उनकी रूह और आत्माएँ कितने चैन से पास पास घर बनाकर एक साथ रहती हैं । यह सत्य मैंने बड़े होने के बाद जाना कि मृत्यु के बाद देह हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है और उसे जीवित लोगों के संसार से कोई सरोकार नहीं होता है । फिर भी शेष जीवित लोग आत्मा, परलोक,श्राद्ध  आदि के नाम पर अपना मन बहलाने के लिए उसके अस्तित्व का आभास कायम रखते हैं । 

गर्मियों की उन सूनी दोपहरियों में हम लोग अक्सर कब्रस्तान चले जाते थे इसलिए कि वहाँ के आम बहुत मीठे होते थे । यद्यपि इस बात की कोई गुंजाइश नहीं थी कि कोई मुर्दा कब्र से बाहर निकलकर हमें डांटेगा फिर भी पत्थर चलाते हुए हमें इस बात का ध्यान रहता था कि पैर किसी कब्र पर न पड़े । अगर ऐसा होता तो हम लोग तुरंत पाँव छूने की मुद्रा में झुक जाते और कब्र छूकर माफ़ी मांग लेते ।


छुप छुप कर धूम्रपान करने के लिए यह मरघट बहुत उपयुक्त जगह थी इसलिए मोहल्ले के बड़े भाई लोग किसी क़ब्र पर बैठकर सिगरेट फूंकते नज़र आ जाते । सर्दियों के दिनों में हम लोग बगल के स्मशान चले जाते थे । जलती हुई किसी चिता के करीब बैठकर देह को गर्मी देना अच्छा लगता था । दादाजी बताते थे कि हमारा मकान  बनने से पहले बस्ती तक कब्रस्तान का विस्तार था और नींव खोदते समय कुछ बच्चों के कंकाल भी निकले थे । उस समय बाल मृत्यु दर काफी अधिक थी और हिन्दु मुसलमान दोनों में बच्चों को मुख्य स्मशान से कुछ अलग हटकर दफ़नाने की परम्परा थी । 
मदन मोहन कोकाश 
बाज़ार के दिनों के अलावा मोहल्ले की शामें बहुत शांत हुआ करती थीं । अँधेरा घिरने से पहले घर के सामने पानी सींचकर खटिया बिछा दी जातीं या बेंचे रख दी जातीं । हम लोग एक छोर से दूसरी छोर तक दौड़ लगाते फिर थक कर बेंचों पर बैठ जाते  । इधर हम लोग रेस टीप खेलने में व्यस्त होते उधर सामने वाले दालान में मदन मोहन ताउजी की बैठक जम जाती । एक रेहल निकल आती उस पर रखी होती गीता प्रेस गोरखपुर से छपी तुलसी कृत रामचरितमानस की टीका वाली प्रति, साथ ही अगरबत्ती का स्टैंड और उसमे लगी चन्दन अगरबत्ती । ताउजी दुकान बंद करने के बाद कुछ देर टहलने जाते फिर लौटकर हाथ मुँह धोते और गमछे  से मुँह पोछते हुए अपना आसन ग्रहण करते।

इतनी देर में मानस पाठ सुनने की इच्छुक श्रोता मंडली वहाँ एकत्रित हो जाती । इनमे होते पड़ोस के फारेस्ट डिपार्टमेंट वाले चंद्रकांत गुंडे बाबू, छत्तीस इंच मोहरी का पजामा पहनने वाले फद्दी गुरूजी, आमले वाले पटेल, बाजू की  प्रिंटिंग प्रेस वाले सुरेश बाजपेयी जी, शिवदुलारे श्रीवास जी, मुंशी जी, हमारे फर्नीचर के कारखाने में काम करने वाले सद्दू गोंड और भी बहुत सारे लोग । पीले बल्ब की टिमटिमाती रौशनी में मदन भैया हाथ जोड़कर पहले बाल काण्ड का एक श्लोक पढ़ते.. 

वर्णानामर्थ संघानां रसानां छंद सामपि ।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।।

अर्थात, अक्षरों,अर्थ समूहों,रसों, छंदों और मंगलों को करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ । फिर वे रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क वाला पृष्ठ खोलते और अपना पाठ प्रारंभ करते । उनके मुँह से सस्वर दोहे,सोरठे और चौपाइयों का पाठ चलता रहता, साथ साथ वे उनकी व्याख्या भी करते जाते और श्रोता गण भक्ति रस में सराबोर हो जाते । 

साठ के दशक के बच्चे हम लोग 
उस खुले खुले से मोहल्ले में रहने वालों और आते जाते लोगों  के लिए यह दृश्य बहुत मनोरम होता था । वहीं आंखमिचौली खेलते हुए हम बच्चों के लिए यह दृश्य  बड़ों के संरक्षण में बड़े होने की एक सुखद अनुभूति की भांति अवचेतन में आकार लेता था । चन्दन की अगरबत्ती की गंध हमें अपनी ओर खींचती थी । धोती पहने माथे पर तिलक लगाए मदन मोहन ताउजी हमें तुलसीदास की तरह दिखाई देते थे । वे हम बच्चों से भी आग्रह करते थे कि हम बैठकर राम कथा सुने लेकिन हम लोग उसे विशुद्ध धार्मिक कृत्य मानते थे और उसे बुजुर्गों के जीवन का हिस्सा मानकर खेलने कूदने में लग जाते थे ।  बावज़ूद इसके कभी कभार सुस्ताने या पानी पीने के बहाने कोई प्रसंग सुनने बैठ जाते थे और आश्चर्य कि कथा में हमारा मन रमने लगता था ।

बड़े होने के बाद सभी धर्मों के धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने के तारतम्य में मैंने सर्वप्रथम तुलसी कृत मानस और उसके बाद वाल्मीकि कृत रामायण भी पढ़ी । मानस पढ़ने का आधार बैतूल का यही प्रसंग था । बाबूजी भी भंडारा में जीवन भर नियम से प्रतिदिन रामचरित मानस का पाठ करते रहे ।

जगमोहन कोकास मेरे बाबूजी 

इस मकान के दालान में संपन्न होने वाला मानस पाठ बाबूलाल दादाजी के निधन के पश्चात नए वाले मकान के दालान में संपन्न होने लगा । मदन मोहन ताउजी का यह क्रम उनके जीवन तक चलता रहा और गुंडे बाबू ,सुरेश चाचा, फद्दी गुरूजी, सद्दू गोंड और मुंशीजी भी नियमित रूप से उनके श्रोताओं में शामिल होते रहे । 

शरद कोकास 

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