बचपन में जब पहली बार ‘गंगा जमनी तहज़ीब’ यह शब्द सुना तो प्यारेलाल सर से पूछा “सर, इसका मतलब क्या होता है ? “ सर ने कहा “जिस संस्कृति में हिन्दू,मुसलमान सब धर्मों के लोग मिलकर एक साथ रहते हों, जहाँ हिन्दी,मराठी की तरह उर्दू व अन्य भाषाओं को भी मान्यता दी जाती हो, वह गंगा जमनी तहज़ीब कहलाती है ৷” मैंने कहा “सर,लेकिन गंगा जमना तो दोनों हिन्दुओं की नदियाँ हैं ? इसमें एक नदी मुसलमानों या ईसाईयों की भी होना चाहिए ना ?“
प्यारेलाल सर ज़ोर से हँसे “नदियाँ, ज़मीनें, सागर किसी एक धर्म के थोड़े ही होते हैं, सबका उन पर बराबर हक़ होता है ৷ “ मैं भारत,पाकिस्तान,चीन,अमेरिका,ईरान,ईराक के नक्शों से भरे एटलास में झांक कर बराबरी की रेखा ढूँढता रहता था फिर उसे न पाकर प्रयास छोड़ देता था ৷ अपने बड़े होते हुए शरीर की उपरी मंज़िल में स्थित मेरे साढ़े आठ सौ ग्राम के भेजे में केवल इतनी बात समा पाई कि जो भी हो , दुनिया के सब लोग बराबर हैं बाकी यह धर्म, राष्ट्रीयता वगैरह सब बेकार है ৷
अपने भंडारा शहर को जब भी मैं देखता, मुझे गंगा जमनी तहज़ीब वाली सर की बातें बिलकुल सही लगतीं ৷ यह वह शहर था जहाँ भगवे और हरे झंडे एक साथ दिखाई देते थे, जहाँ ईद,गुरुनानक जयन्ती और रामनवमी के जुलूस एक ही रास्ते से निकलते थे और उनमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख सभी समुदाय के लोगों द्वारा शर्बत बांटा जाता था ৷ चर्च की घंटियाँ पुकारती थीं और अज़ान सुनकर लोग मस्जिद का रुख करते थे ৷ यहाँ कव्वालियों और मुशायरों में हिन्दी मराठी कविता के प्रेमी भी होते थे और गणेशोत्सव, दुर्गा उत्सव में मुस्लिम भाई भी चंदा देते थे ৷
मुहर्रम माह की दसवीं तारीख आने के पहले कई गलियों में हरे झंडे दिखाई देने लगते ৷ हजरत पैगम्बर के नवासे इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाये जाने वाले मोहरम नामक इस पर्व में हम बच्चों की रूचि सबसे अधिक ताज़िए और सवारी देखने में होती थी ।
एक दिन स्कूल से लौटते हुए नईम के घर रुका तो मुनीर खान चचा ने बताया हिजरी सन इकसठ अर्थात ईसवी सन 680 में मोहरम माह की दसवी तारीख को बगदाद से 100 किलोमीटर उत्तर पूर्व में करबला नामक एक गाँव में हजरत इमाम हुसैन का उनके विरोधियों ने वध कर दिया था ৷ उन्हीं की याद में मुहर्रम मनाते हैं ৷
चचा ने बताया कि हजरत हुसैन और हसन की याद में मोहरम माह के पाँचवे दिन यह सवारी बैठाई जाती है और नवें दिन उठाई जाती है । मैंने देखा एक दिन कि मोहर्रम के जुलूस में काले कपडे पहने लोग नंगे बदन हा हुसैन हा हुसैन कहते हुए अपनी छाती पीट रहे हैं, उनकी छाती से उससे खून निकल रहा है ৷
मैंने नईम से कहा तुम भी तो मुसलमान हो तुम लोग जुलूस में नहीं जाते ? “नईम ने कहा “ नहीं, यह शिया लोग हैं यह इसी तरह मातम मनाते हैं ৷ हम लोग सुन्नी हैं इसलिए इसे नहीं मनाते ৷ मैंने पूछा “यह शिया सुन्नी क्या होता है ?” तो उसने कहा “हम लोग हज़रत पैगम्बर और इस्लाम में ईमान रखते हैं और शिया लोग पैगम्बर के दामाद उनके नवासे और उनकी फैमिली में विश्वास रखते हैं ৷”
बचपन के अपने उस साढ़े आठ सौ ग्राम के भेजे में यह बात भी नहीं आई, लेकिन गंगा जमनी शब्द के पेशे नज़र इतना ज़रूर समझ में आ गया कि जैसे गंगा को कहीं भागीरथी कहते हैं, कहीं मन्दाकिनी, कहीं हुगली वैसे ही मुसलमानों को कहीं शिया कहते हैं कहीं सुन्नी , बाकी हैं तो सब एक ही ৷ फिर बरसों बाद जब अपना वयस्क भेजा पूरे चौदह सौ ग्राम का हो गया एक दिन दुर्ग में अपने कवि मित्र नासिर अहमद सिकंदर से पूछा “यार तुम शिया हो या सुन्नी ?“नासिर भाई मुस्कुराए और उन्होंने जवाब में जनवादी शायर अकबर इलाहाबादी का शेर कहा ..
“मेरा ईमान मुझसे क्या पूछती हो मुन्नी,
शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी ৷”
क्षमा करें ..बचपन की गली से निकलकर जवानी की खुली सड़क पर आ गया था ৷ फिर चलते हैं भंडारा के देशबंधु वार्ड की उस पतली सी गली में जहाँ किराये के एक घर में हम रहते थे ৷ गलियों के इस शहर में हमारी गली से आगे रिंग रोड पर रवि रेहपाड़े के घर के ठीक पीछे, पाटलिन बाई के घर की बगल में एक खाली जगह पर एक मंडप बनाया जाता था और वहाँ मुहर्रम माह के पाँचवे दिन यह सवारी रखी जाती थी जिसमें मोरपंख का बना एक झाड़ू जैसा होता था, इसके अलावा चान्दी का एक पंजा भी जिसे अली का पंजा कहते थे । वह एक खुली जगह थी जहाँ बल्लियों पर लाल- हरे झंडे बन्धे रहते थे ৷ उन्ही बल्लियों पर बंधे ट्यूब लाइटों पर हरी पन्नी या ज़िलेटिन लगा दी जाती थी जिसके कारन सब ओर हरी रोशनी दिखाई देती थी । सवारी उठने वाले दिन वहाँ उपस्थित हरी या सफ़ेद पगड़ी बांधे हुए एक व्यक्ति वह सवारी उठाता था ।
जब मुझे पता चला कि सवारी उठाने वाला वह व्यक्ति हिन्दू है तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ । पूछने पर ज्ञात हुआ कि सवारी उठाने का पहला हक उसे ही मिलता है जो सबसे पहले मन्नत मानता है या जिसकी मन्नत पूरी होती है फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम । पहले मुझे लगता था कि मोहरम में केवल मुस्लिम लोग ही शामिल रहते हैं लेकिन इस सवारी के आयोजन में पूरे हिन्दू ही दिखाई देते थे । सवारी निकलने के बाद वहाँ के हिन्दू घरों में उसकी पूजा होती थी । एक व्यक्ति ऊददान में लोबान जलाता रहता था और एक व्यक्ति मशाल लेकर चलता था । मशाल को वहाँ टेम्भा कहते थे जो खाने के तेल से जलाई जाती थी ।
सवारी उठाने वाला वह व्यक्ति एक अजीब सी बेख़याली में रहता था , कुछ ही देर में वह झूमने लगता , उसकी कमर से एक रस्सी बंधी होती थी जिसे लोग थामे रहते थे ৷ लोग कहते थे उस पर हाल आ रहे हैं .. वह जोर लगाकर आगे बढ़ता, उसकी ऑंखें लाल हो जातीं और वह अस्फुट सा बडबडाता रहता “हा हसन .. दूल्हा हसन, हा हसन, दूल्हा हसन ৷” मैं सोचता, वध तो पैगम्बर के नवासे हुसैन का किया गया था, यह हसन हसन क्यों कहता है ৷
फिर एक दिन चचा ने बताया कि हसन, हुसैन से बड़े भाई थे, लेकिन उनकी मृत्यु एक हादसे में हो गई थी ৷ कहते हैं कि शादी के वक्त जब वे दूल्हा बने हुए थे उनकी बीबी ने धोखे से उन्हें दूध में शीशा घोलकर पिला दिया था जिससे उनकी मौत हो गई थी ৷ यह षड्यंत्र यजीद ने किया था ৷ जब उनकी हत्या की गई वे दूल्हे के वेश में थे इसीलिये सवारी उठाते समय दूल्हा हसन पुकारते हैं ৷
मैं समझ गया मोहर्रम में यह जो मोरपंख से बनी फूलों से सजी पगड़ी जैसी सवारी लोग उठाते हैं वह दूल्हा बने हसन के सेहरे का ही प्रतीक है ৷ हाँ ताजिया ज़रूर हज़रत हुसैन की कब्र या मज़ार के प्रतीक के रूप में है ৷ इस तरह ग़मी का यह त्यौहार दोनों भाइयों हसन हुसैन और उनके परिवार के बहत्तर लोगों की याद में मनाया जाता है ৷
कितना सुन्दर दृश्य होता था उस जगह का जहाँ यह सवारी रखी जाती थी ৷ मिट्टी के एक बड़े से ऊददान में लाल लाल अंगारे सुलगते रहते थे৷ हर थोड़ी देर में एक आदमी गत्ते से उन अंगारों को हवा देता और उन पर लोबान छिड़क देता ৷ जलते हुए कोयलों से धुएँ के गहरे बादल उठते और मंडप की छत पर छा जाते ৷ लोबान की खुशबू चरों ओर फ़ैल जाती ৷ लेकिन न जाने क्यों मुझे धुएँ के उस बादल में उन बेबस पुरुषों, स्त्रियों और दुधमुंहे शिशुओं के चेहरे दिखाई देते जिन्हें ज़ालिम यजीद द्वारा मार डाला गया था ৷
अपनी उम्र की सीमा का अतिक्रमण कर मैं सोचने लगता, क्या धर्म का अर्थ वर्चस्व की लड़ाई है ? लोग अपने झूठे अहंकार, जातिगत अभिमान, सत्ता लोलुपता,झूठी शान या राजनीतिक प्रभुत्व को त्यागकर इन्सान की तरह क्यों नहीं रहते ? क्यों कुछ लोग चाहते हैं कि दुनिया में सब लोग उन्ही के धर्म के हो जाएँ ? क्या हासिल होता है उन्हें ऐसा करने से ? हर मनुष्य को अपने विश्वासों के साथ जीने का अधिकार क्यों नहीं है ?
लोबान के उस धुएँ में मुझे जाने कितने प्रश्न चिन्ह तैरते दिखाई देते थे, अंततः सोचना बंद कर अन्य आस्थावान लोगों की तरह मैं भी लोबान की गंध में खो जाता ৷ दरगाहों और मजारों पर जलने वाले लोबान की गंध श्रद्धा के वातावरण निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका ऐडा करती है ৷ मुझे भी यह गंध हमेशा से आकर्षित करती रही है ৷ अक्सर मैं देखता था कि भंडारा में कशकोल लिए हरा चोला पहने एक फ़कीर अपने ऊददान में जलते हुए अंगारे लिए घरों और दुकानों में जाते थे और उन दहकते अंगारों पर लोबान छिड़कते थे ৷ लोबान के धुएँ से उठती खुशबू मुझे अलीबाबा और मरजीना के देश में ले जाती थी ৷ मुझे उस धुएँ में सफ़ेद परिधान पहने पंख लगाकर उड़ती हुई परियों की छवि दिखाई देती थी ৷
मोहरम के अंतिम यनि दसवें दिन एक जुलूस की शक्ल में हजरत हुसैन की मज़ार के प्रतीक ताज़िए निकाले जाते थे ৷ इन ताज़ियों को देखकर मुझे दिवाली पर बनाये कागज़ के और मिट्टी के किलों की याद आती थी ৷ मैं हर बार सोचता कि दिवाली पर ताज़िए की तरह एक किला बनाऊंगा ৷ हालाँकि ऐसा किला मैं कभी नहीं बना पाया ৷ बचपन बहुत अधिक वक्त नहीं देता है जितनी जल्दी आता है, उतनी जल्दी चला भी जाता है ৷ इसीलिये तो मैं बच्चों से कहता हूँ बचपन को भरपूर जी लो वर्ना फिर यह बचपन लौटकर कभी नहीं आएगा ৷
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