कोकाश भवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कोकाश भवन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

7 जून 2026

57. बैतूल : गू - गोबर छोड़कर सब खाना है

शीर्षक पढ़कर नाक -भौं  न सिकोड़ें , पढिए आगे आपको बहुत मज़ा आएगा । 

बाबूलाल जी और राजरानी देवी 
बैतूल के हमारे पुराने घर जितने ही बुज़ुर्ग थे दादाजी यानी बाबूलाल जी वैद्य । वे जब दूध में मिस कर रोटी खाते थे तो दूध उनकी मूंछों की सफ़ेदी में इस तरह मिल जाता था कि पता ही नहीं चलता था दूध की वज़ह से मूंछे सफ़ेद हुई हैं या मूंछों की वज़ह से दूध इतना सफ़ेद दिखाई दे रहा है । 

दादाजी उस ज़माने के मल्टीटेलेंटेड व्यक्ति थे । खेती किसानी और फर्नीचर का काम करते हुए उन्होंने आयुर्वेद चिकित्सा का डिप्लोमा भी ले लिया था और गोंड आदिवासियों का निशुल्क उपचार करना प्रारंभ करना शुरू कर दिया था । प्राकृतिक चिकित्सा और जड़ी बूटियों में उनकी काफी दिलचस्पी थी । अक्सर वे जंगलों की ओर निकल जाते और आदिवासियों के बीच प्रचलित जड़ी बूटियाँ ढूंढकर ले आते ।

खेतीबाड़ी और दुकान का काम उनके भाईयों और बेटों ने संभाल ही लिया था इसलिए वे निश्चिन्त होकर  पूरी तरह चिकित्सा सेवा के कार्य में लग गए । उनकी इच्छा हुई कि लोगों की चिकित्सा के लिए एक दवाखाना खोला जाए । पुराने घर के सामने ही सड़क के उस पार उन्होंने ज़मीन ली और एक नए भवन का निर्माण प्रारम्भ किया ।

‘कोकास भवन’ को अंतिम रूप देते हुए उन्नीस सौ सत्तावन की गर्मियों में राज मिस्त्री एच के आकार में दिखाई देने वाली इस इमारत की एक दीवार पर एक चक्र के भीतर उकेर  रहे थे “मुनि बाबूलालजी वैद्य औषधालय’ । दादाजी उस समय ‘मुनि समाज’ के अध्यक्ष भी थे सो अपने नाम के साथ मुनि लिखते थे ।

दवाखाने के सामने खड़ा नीम का पेड़ जो अब तक केवल राहगीरों को छाँव देता था दूर गांवों से आनेवाले मरीजों की बैलगाड़ियों और उनके बैलों को भी छाँव देने लगा ।  मरीज़ों के लिए पीछे की ओर बनाये गए कमरों से उनकी कराहों के साथ साथ उनके घरवालों की प्रार्थनाओं के स्वर भी सुनाई देने लगे । 

नीम के पेड़ और नीम के धोखे में लगाये गए बकायन के पेड के नीचे ईट पत्थरों से बने टेम्पररी चूल्हे दिखाई देने लगे जिन पर रखे तवों पर मरीज के रिश्तेदार मक्के और ज्वार की रोटियाँ थाप कर पकाते हुए नज़र आने लगे ।

गर्मियों की दोपहर में हवाएँ खामोश हो जाती थीं । उस खामोशी में गूंजती थी लोहे के खलबत्ते में जड़ी बूटियाँ कूटने की धम्म धम्म की आवाज़ । वह घर के पुरुष की तरह बिना आवाज़ किये कोई काम कर ही नहीं सकता था वहीं उसके बरअक्स संगमरमर की खरल घर की सुघड़ स्त्री की तरह धीमे धीमे शांत स्वरों में जड़ी बूटियों को पीसती और औषधि हेतु उपयुक्त उनका चूर्ण बना देती ।

दादाजी ने दान-पुण्य और समाज सेवा किस्से कहानियों और पुराणों से नहीं सीखी थी, वे एक मनुष्य के रूप में वे अपना कर्तव्य जानते थे । उस ज़माने के अपने इस नर्सिंग होम में  दादाजी निर्धन मरीज़ों की न केवल निशुल्क सेवा किया करते अपितु उनके रहने खाने का प्रबंध भी कर देते थे । बाक़ी आय उनकी यही थी कि जो स्वेच्छा से जो कुछ भी दे दे वह ठीक ।

मुनि बाबूलाल जी वैद्य का यह दवाखाना अपने आप में एक अनुसंधान केंद्र भी था । वे प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति और आयुर्वेदिक पद्धति से मरीज़ों की चिकित्सा करते थे और नित नये नुस्खों की खोज कर अपने अनुसंधानों को एक रजिस्टर में लिखते रहते थे । उनके निधन के बरसों बाद एक दिन मैंने वह रजिस्टर देखा था, उसमे कैंसर तक का इलाज़ लिखा हुआ था । 

दादाजी की ओपीडी दालान में और उसके बाईं और स्थित कमरे में थी। एक बड़ी सी टेबल के पीछे कुर्सी पर उनका आसन था । दीवार पर उनका आयुर्वेदाचार्य का प्रमाणपत्र और धन्वन्तरी की एक तस्वीर । टेबल पर औषधि की कुछ डिब्बियां, स्टेथोस्कोप,रजिस्टर कलम, दवात और बिजली की मशीन ।

बाबूलाल जी वैद्य 
बिजली की यह मशीन भी गज़ब की चीज़ थी । यह लकड़ी के एक छोटे से बॉक्स में स्थित थी जो दो बैटरियों से चलती थी । उसमें धातु की दो छड़ थीं जिनकी मूठ लकड़ी की बनी थी, एक का रंग हरा था और दूसरी का लाल । इनमे से एक छड़ वे घुटना दर्द , गठिया या वात के मरीज़ के हाथ में पकड़ा देते थे और दूसरा हिस्सा मूठ की ओर से स्वयं पकड़े रहते, फिर प्रभावित स्थान पर गीला कपड़ा रखते और सेल लगाकर बटन ऑन करते । किर्र किर्र की आवाज़ के साथ वह मशीन चालू हो जाती । 

किर्र की यह आवाज़ जैसे ही बच्चों के कानों तक पहुँचती वे दवाखाने की ओर दौड़ लगा देते थे क्योंकि इसके बाद का दृश्य देखने लायक होता था । जैसे ही दादाजी अपने हाथ की छड़ का लोहे वाला हिस्सा उस गीले कपड़े पर रखते मरीज़ को बिजली का हल्का सा झटका लगता और वह ज़ोर से उछलता । अपने हाथ में पकड़ी लोहे की छड़ वह छोड़ने की कोशिश करता लेकिन छोड़ नहीं पाता । दादाजी रॉड से हल्का हल्का स्पर्श दर्द वाली जगह पर करते और हँसते हुए कहते “ कोई बात नहीं, यह मामूली दर्द  सह लो फिर तुम्हारा गठिया का दर्द हमेशा के लिए गायब हो जायेगा ।“

ऐसा दृश्य रोज़ नहीं घटित होता था लेकिन जब भी होता कोई न कोई हम बच्चों तक यह खबर पहुँचा ही देता था कि ‘बिजली की पेटी’ निकाली जा रही है । हम लोग दौड़कर वहाँ पहुँच जाते । मरीज़ों को चिल्लाते हुए ,उछल कूद करते हुए और दादाजी को उन्हें डाँटते देखकर हम बच्चों को बड़ा मज़ा आता था । हमें हँसता देख कभी कभी मरीज़ भी अपना दर्द भूलकर हँसने लगता । 

यह मशीन दरअसल TENS (Transcutaneous Electrical Nerve Stimulation) या Muscle Stimulator (इलेक्ट्रोथेरेपी मशीन) है। गठिया और मांसपेशियों के दर्द से राहत के लिए इन मशीनों के जरिए नसों को हल्का करंट (इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन) दिया जाता है। 
ये मशीनें दो तरह से काम करती हैं:
  • पेन इलेक्ट्रोड (Pen Electrode): आप जिन दो हैंडल्स (या पेन जैसी रॉड) की बात कर रहे हैं, उनका उपयोग चिकित्सक एक्यूप्रेशर या एक्यूपंक्चर पॉइंट्स पर सीधा दबाव और करंट देने के लिए करते थे। 
  • इलेक्ट्रोड पैड्स (Electrode Pads): आधुनिक TENS मशीनों में हैंडल्स की जगह त्वचा पर चिपकाने वाले पैड (इलेक्ट्रोड) होते हैं, जिनसे सुन्न करने वाली हल्की झनझनाहट पैदा होती है। यह तंत्रिका संकेतों को अवरुद्ध करके दर्द को रोकता है। 

बाबूलालजी को लोग सम्मान से बापू कहते थे । उनके के बारे में यह बात मशहूर थी कि जिस मरीज़ को जिला अस्पताल वाले वापस कर देते थे उसे भी बापू अपनी चिकित्सा से ठीक कर देते थे । यह बैतूल के विकास का प्रारम्भिक समय था और जिस तरह सम्पूर्ण देश में चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव था उसी तरह बैतूल में भी यह सुविधायें अपर्याप्त थी फिर भी इस तरह के वैद्य और हकीम आदि अपने ज्ञान और अध्ययन के आधार पर जनता की सेवा करने में लगे थे ।

अब पढिए बाबूलाल जी  के मित्र डॉ जौहरी का किस्सा  

अब बापू के दवाखाने के साथ यदि डॉ. वी एम जौहरी के दवाखाने का उल्लेख न आये तो बात अधूरी रह जाएगी । घर के निकट  ही देवी मन्दिर के पीछे मेन रोड पर डॉ. जौहरी  का दवाखाना था ।

इसी कॉर्नर पर था डॉ जौहरी का दवाखाना 

वे भी आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज़ करते थे लेकिन आवश्यक एलोपेथी औषधियाँ भी उनके पास रहती थीं । उन्हीके सामने कांतिलाल एण्ड ब्रदर्स की मशहूर दवा की दूकान भी थी ।  

कांतिलाल एंड ब्रदर्स की दवा  की दुकान 
उन्नीस सौ पैंसठ में बापू के निधन के बाद उनका दवाखाना श्याममोहन  चाचाजी ने संभाल लिया था लेकिन उन्नीस सौ सतत्तर में उनकी असामयिक मृत्यु के पश्चात यह दवाखाना भी बंद हो गया । उनके बाद किसी के पास न योग्यता थी न किसी को इस  काम में रूचि थी, अतः  हमारे घर से चिकित्सा सेवा का यह कार्य हमेशा के लिए बंद हो गया । 

बैतूल शहर में चिकित्सकीय व्यवसाय मगर पनपता रहा । नए नए चिकित्सक आते गए साथ ही डॉ. जौहरी का दवाखाना भी बाकायदा चलता रहा। डॉक्टर जौहरी अपने चिकित्सकीय ज्ञान के अलावा अपनी स्पष्टवादिता और तीखी ज़ुबान के लिए भी मशहूर थे । वैसे तो उनके कई किस्से मशहूर थे लेकिन एक किस्सा मुझे याद आ रहा है । 

डॉ.जौहरी अपने मरीज़ों की दवा के साथ साथ उनके पथ्य परहेज़ पर भी ज़ोर देते थे । एक दिन दवा के साथ पथ्य परहेज़ संबंधी हिदायतें प्राप्त कर जैसे ही एक मरीज़ चलने के लिए तत्पर हुआ उसने पूछा

 “डॉक्टर साहब, वो..क्या क्या नहीं खाना है ?” डॉ. साहब ने उसे बता दिया । 

गेट पर खड़े होकर उसने फिर पूछा “डॉक्टर साहब, भूल गया एक बार और बता दीजिये क्या क्या नहीं खाना है ?”

 डॉ. जौहरी तब तक अगले मरीज़ में व्यस्त हो चुके थे फिर भी उन्होंने सहजता से बता दिया । 

चप्पल पहन कर वह मरीज़ जैसे ही सड़क पर उतरा वह ठिठक गया और पलटकर उसने फिर पूछा ..” डॉक्टर साहब क्या क्या नहीं खाना ....” 

उसका वाक्य पूरा भी नहीं हुआ कि डॉक्टर साहब को गुस्सा आ गया और वे उसे डाँटते हुए बोले .. “गू गोबर छोड़कर सब खाना है.. चल भाग यहाँ से । 

बात मज़ाक में कही गई थी लेकिन चिकित्सा हेतु गोबर का उपयोग उस समय भी मना था । इसे विगत दिनों कोरोना काल में कतिपय लोगों के गोबर से स्नान द्वारा इलाज के सन्दर्भ में देखा जाए, साथ ही सर्प दंश से मृत्यु, बिजली गिरने से मृत्यु आदि में मरीज को गोबर में गले तक गाड़ दिए जाने जैसे समाचारों पर गौर किया जाए तो लगता है अगर लोगों ने बाबूलाल जी वैद्य और डॉक्टर जौहरी जैसे सुयोग्य चिकित्सकों की सलाह मानी होती तो उन्हें इस तरह के अंधविश्वासों का शिकार होकर अपनी जान तो न गंवाना पड़ता ।

शरद कोकास 

मित्रों, पोस्ट के अंत मे टिप्पणियों के नीचे जाएं । यहाँ “ मुख्यपृष्ठ “ पर क्लिक करने से आप मेरे ब्लॉग्स के मीनू या लेटेस्ट सूची तक पहुँच सकते हैं उसके नीचे जहां " वेब वर्शन देखें " लिखा है उसे क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा उसमें साइड बार में मेरी पुस्तकों के चित्र हैं जो वस्तुतः उन्हें पढने के लिए लिंक हैं । उन पर क्लिक करें और “कविता कोश” में मेरी कविताएँ पढ़ें । उसी तरह वहाँ दिए गए ब्लॉग्स के चित्र पर टच कर आप मेरे अन्य ब्लॉग्स तक पहुँच सकते हैं - शरद कोकास

55. बैतूल : रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क


बैतूल शहर अपनी परंपराओं,अपने संस्कारों और अपनी मासूमियत के साथ इस तरह बड़ा हो रहा था कि उसे देखने वाले दावे के साथ कह सकते थे कि वह बड़ा होकर किसी बड़े शहर की सोहबत में भी नहीं बिगड़ेगा । बड़े शहरों के नाम पर बैतूल के दक्षिण की ओर नागपुर था और उत्तर की ओर भोपाल । दोनों शहर मोहल्ले के बड़े बच्चों की तरह बैतूल से काफी दूर दूर रहते थे । 

अपनी देह में महुए की आदिम गंध लिए बैतूल धीरे धीरे बड़ा हो रहा था  । अंग्रेजों को इसकी  देहगंध से कोई सरोकार नहीं था लेकिन उन्हें इसकी शीतलता पसंद थी इसलिए उन्होंने गोंड राजा द्वारा किसी समय निर्मित खेड़ला किले  से छह किलोमीटर दूर अपने सरकारी दफ्तर और आवास बनाये, उन दिनों वस्तुओं के आयात निर्यात की सुविधा के लिए रेल लाइन के निकट ही मंडी हुआ करती थी । बैतूल में रेलवे स्टेशन के निकट का यह क्षेत्र गंज कहलाने लगा । धीरे धीरे बस्ती बसनी शुरू हुई, सदर में बंगले बने,शहर में बाज़ार बने । हमारा मोहल्ला कोठीबाज़ार के अंतर्गत आता था और साप्ताहिक बाज़ार लगने की वज़ह से इतवारी बाज़ार कहलाता था । यह शहर के लगभग अंतिम छोर पर बसा था । यहाँ हमारे दो मकान थे एक नया मकान जो 1957 मे बना था 


और पुराना मकान लगभग सन 1925 मे बना था


गंज से आने वाली रिंग रोड बीच में ही कालापाठा  की ओर मुड़ जाती थी जहाँ सागौन वन में सागौन के चौड़े चौड़े पत्तों के ऊपर से आसमान शहर के भीतर झाँकने की कोशिश करता था ।

वर्षा के दिनों में बादल उन ऊँचे ऊँचे पेड़ों के ऊपर पसर जाते और कुछ देर ठहर कर बरस जाते । नमी लिए हुए जंगल की आदिम गंध उस वीरानी में चारों ओर पसर जाती । लाल लाल बीर बहूटियाँ अपने पट खोलकर मिटटी के टीलों में दीमकों के साथ अपने घर बनाने लगतीं ।

बैतूल में उन दिनों जंगल ही जंगल थे इसलिए शहर में भी जंगल विभाग के दफ्तर भी सर्वप्रथम यहीं खुले ।

हमारे घर के सामने से गुजरने वाली वह सड़क शहर की अंतिम सड़क थी । उसके बाद  टी अक्षर की ऊपरी डंडी की तरह रिंग रोड आ जाती थी ।


यह शहर की सीमा रेखा की तरह ही थी । रिंग रोड के उस पार मुस्लिमों का कब्रस्तान था


और उसीसे लगा हिन्दुओं का स्मशान ।

उन दिनों मैं आत्मा में विश्वास करता था और सोचता था कि जीते जी तो  हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ते हैं लेकिन मरने के बाद उनकी रूह और आत्माएँ कितने चैन से पास पास घर बनाकर एक साथ रहती हैं । यह सत्य मैंने बड़े होने के बाद जाना कि मृत्यु के बाद देह हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है और उसे जीवित लोगों के संसार से कोई सरोकार नहीं होता है । फिर भी शेष जीवित लोग आत्मा, परलोक,श्राद्ध  आदि के नाम पर अपना मन बहलाने के लिए उसके अस्तित्व का आभास कायम रखते हैं । 

गर्मियों की उन सूनी दोपहरियों में हम लोग अक्सर कब्रस्तान चले जाते थे इसलिए कि वहाँ के आम बहुत मीठे होते थे । यद्यपि इस बात की कोई गुंजाइश नहीं थी कि कोई मुर्दा कब्र से बाहर निकलकर हमें डांटेगा फिर भी पत्थर चलाते हुए हमें इस बात का ध्यान रहता था कि पैर किसी कब्र पर न पड़े । अगर ऐसा होता तो हम लोग तुरंत पाँव छूने की मुद्रा में झुक जाते और कब्र छूकर माफ़ी मांग लेते ।


छुप छुप कर धूम्रपान करने के लिए यह मरघट बहुत उपयुक्त जगह थी इसलिए मोहल्ले के बड़े भाई लोग किसी क़ब्र पर बैठकर सिगरेट फूंकते नज़र आ जाते । सर्दियों के दिनों में हम लोग बगल के स्मशान चले जाते थे । जलती हुई किसी चिता के करीब बैठकर देह को गर्मी देना अच्छा लगता था । दादाजी बताते थे कि हमारा मकान  बनने से पहले बस्ती तक कब्रस्तान का विस्तार था और नींव खोदते समय कुछ बच्चों के कंकाल भी निकले थे । उस समय बाल मृत्यु दर काफी अधिक थी और हिन्दु मुसलमान दोनों में बच्चों को मुख्य स्मशान से कुछ अलग हटकर दफ़नाने की परम्परा थी । 
मदन मोहन कोकाश 
बाज़ार के दिनों के अलावा मोहल्ले की शामें बहुत शांत हुआ करती थीं । अँधेरा घिरने से पहले घर के सामने पानी सींचकर खटिया बिछा दी जातीं या बेंचे रख दी जातीं । हम लोग एक छोर से दूसरी छोर तक दौड़ लगाते फिर थक कर बेंचों पर बैठ जाते  । इधर हम लोग रेस टीप खेलने में व्यस्त होते उधर सामने वाले दालान में मदन मोहन ताउजी की बैठक जम जाती । एक रेहल निकल आती उस पर रखी होती गीता प्रेस गोरखपुर से छपी तुलसी कृत रामचरितमानस की टीका वाली प्रति, साथ ही अगरबत्ती का स्टैंड और उसमे लगी चन्दन अगरबत्ती । ताउजी दुकान बंद करने के बाद कुछ देर टहलने जाते फिर लौटकर हाथ मुँह धोते और गमछे  से मुँह पोछते हुए अपना आसन ग्रहण करते।

इतनी देर में मानस पाठ सुनने की इच्छुक श्रोता मंडली वहाँ एकत्रित हो जाती । इनमे होते पड़ोस के फारेस्ट डिपार्टमेंट वाले चंद्रकांत गुंडे बाबू, छत्तीस इंच मोहरी का पजामा पहनने वाले फद्दी गुरूजी, आमले वाले पटेल, बाजू की  प्रिंटिंग प्रेस वाले सुरेश बाजपेयी जी, शिवदुलारे श्रीवास जी, मुंशी जी, हमारे फर्नीचर के कारखाने में काम करने वाले सद्दू गोंड और भी बहुत सारे लोग । पीले बल्ब की टिमटिमाती रौशनी में मदन भैया हाथ जोड़कर पहले बाल काण्ड का एक श्लोक पढ़ते.. 

वर्णानामर्थ संघानां रसानां छंद सामपि ।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।।

अर्थात, अक्षरों,अर्थ समूहों,रसों, छंदों और मंगलों को करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ । फिर वे रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क वाला पृष्ठ खोलते और अपना पाठ प्रारंभ करते । उनके मुँह से सस्वर दोहे,सोरठे और चौपाइयों का पाठ चलता रहता, साथ साथ वे उनकी व्याख्या भी करते जाते और श्रोता गण भक्ति रस में सराबोर हो जाते । 

साठ के दशक के बच्चे हम लोग 
उस खुले खुले से मोहल्ले में रहने वालों और आते जाते लोगों  के लिए यह दृश्य बहुत मनोरम होता था । वहीं आंखमिचौली खेलते हुए हम बच्चों के लिए यह दृश्य  बड़ों के संरक्षण में बड़े होने की एक सुखद अनुभूति की भांति अवचेतन में आकार लेता था । चन्दन की अगरबत्ती की गंध हमें अपनी ओर खींचती थी । धोती पहने माथे पर तिलक लगाए मदन मोहन ताउजी हमें तुलसीदास की तरह दिखाई देते थे । वे हम बच्चों से भी आग्रह करते थे कि हम बैठकर राम कथा सुने लेकिन हम लोग उसे विशुद्ध धार्मिक कृत्य मानते थे और उसे बुजुर्गों के जीवन का हिस्सा मानकर खेलने कूदने में लग जाते थे ।  बावज़ूद इसके कभी कभार सुस्ताने या पानी पीने के बहाने कोई प्रसंग सुनने बैठ जाते थे और आश्चर्य कि कथा में हमारा मन रमने लगता था ।

बड़े होने के बाद सभी धर्मों के धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने के तारतम्य में मैंने सर्वप्रथम तुलसी कृत मानस और उसके बाद वाल्मीकि कृत रामायण भी पढ़ी । मानस पढ़ने का आधार बैतूल का यही प्रसंग था । बाबूजी भी भंडारा में जीवन भर नियम से प्रतिदिन रामचरित मानस का पाठ करते रहे ।

जगमोहन कोकास मेरे बाबूजी 

इस मकान के दालान में संपन्न होने वाला मानस पाठ बाबूलाल दादाजी के निधन के पश्चात नए वाले मकान के दालान में संपन्न होने लगा । मदन मोहन ताउजी का यह क्रम उनके जीवन तक चलता रहा और गुंडे बाबू ,सुरेश चाचा, फद्दी गुरूजी, सद्दू गोंड और मुंशीजी भी नियमित रूप से उनके श्रोताओं में शामिल होते रहे । 

शरद कोकास 

मित्रों, पोस्ट के अंत मे टिप्पणियों के नीचे जाएं । यहाँ “ मुख्यपृष्ठ “ पर क्लिक करने से आप मेरे ब्लॉग्स के मीनू या लेटेस्ट सूची तक पहुँच सकते हैं उसके नीचे जहां " वेब वर्शन देखें " लिखा है उसे क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा उसमें साइड बार में मेरी पुस्तकों के चित्र हैं जो वस्तुतः उन्हें पढने के लिए लिंक हैं । उन पर क्लिक करें और “कविता कोश” में मेरी कविताएँ पढ़ें । उसी तरह वहाँ दिए गए ब्लॉग्स के चित्र पर टच कर आप मेरे अन्य ब्लॉग्स तक पहुँच सकते हैं - शरद कोकास