7 जून 2026

55. रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क


बैतूल शहर अपनी परंपराओं,अपने संस्कारों और अपनी मासूमियत के साथ इस तरह बड़ा हो रहा था कि उसे देखने वाले दावे के साथ कह सकते थे कि वह बड़ा होकर किसी बड़े शहर की सोहबत में भी नहीं बिगड़ेगा । बड़े शहरों के नाम पर बैतूल के दक्षिण की ओर नागपुर था और उत्तर की ओर भोपाल । दोनों शहर मोहल्ले के बड़े बच्चों की तरह बैतूल से काफी दूर दूर रहते थे । 

अपनी देह में महुए की आदिम गंध लिए बैतूल धीरे धीरे बड़ा हो रहा था  । अंग्रेजों को इसकी  देहगंध से कोई सरोकार नहीं था लेकिन उन्हें इसकी शीतलता पसंद थी इसलिए उन्होंने गोंड राजा द्वारा किसी समय निर्मित खेड़ला किले  से छह किलोमीटर दूर अपने सरकारी दफ्तर और आवास बनाये, उन दिनों वस्तुओं के आयात निर्यात की सुविधा के लिए रेल लाइन के निकट ही मंडी हुआ करती थी । बैतूल में रेलवे स्टेशन के निकट का यह क्षेत्र गंज कहलाने लगा । धीरे धीरे बस्ती बसनी शुरू हुई, सदर में बंगले बने,शहर में बाज़ार बने । हमारा मोहल्ला कोठीबाज़ार के अंतर्गत आता था और साप्ताहिक बाज़ार लगने की वज़ह से इतवारी बाज़ार कहलाता था । यह शहर के लगभग अंतिम छोर पर बसा था । यहाँ हमारे दो मकान थे एक नया मकान जो 1957 मे बना था 


और पुराना मकान लगभग सन 1925 मे बना था


गंज से आने वाली रिंग रोड बीच में ही कालापाठा  की ओर मुड़ जाती थी जहाँ सागौन वन में सागौन के चौड़े चौड़े पत्तों के ऊपर से आसमान शहर के भीतर झाँकने की कोशिश करता था ।

वर्षा के दिनों में बादल उन ऊँचे ऊँचे पेड़ों के ऊपर पसर जाते और कुछ देर ठहर कर बरस जाते । नमी लिए हुए जंगल की आदिम गंध उस वीरानी में चारों ओर पसर जाती । लाल लाल बीर बहूटियाँ अपने पट खोलकर मिटटी के टीलों में दीमकों के साथ अपने घर बनाने लगतीं ।

बैतूल में उन दिनों जंगल ही जंगल थे इसलिए शहर में भी जंगल विभाग के दफ्तर भी सर्वप्रथम यहीं खुले ।

हमारे घर के सामने से गुजरने वाली वह सड़क शहर की अंतिम सड़क थी । उसके बाद  टी अक्षर की ऊपरी डंडी की तरह रिंग रोड आ जाती थी ।


यह शहर की सीमा रेखा की तरह ही थी । रिंग रोड के उस पार मुस्लिमों का कब्रस्तान था


और उसीसे लगा हिन्दुओं का स्मशान ।

उन दिनों मैं आत्मा में विश्वास करता था और सोचता था कि जीते जी तो  हिन्दू और मुसलमान आपस में लड़ते हैं लेकिन मरने के बाद उनकी रूह और आत्माएँ कितने चैन से पास पास घर बनाकर एक साथ रहती हैं । यह सत्य मैंने बड़े होने के बाद जाना कि मृत्यु के बाद देह हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है और उसे जीवित लोगों के संसार से कोई सरोकार नहीं होता है । फिर भी शेष जीवित लोग आत्मा, परलोक,श्राद्ध  आदि के नाम पर अपना मन बहलाने के लिए उसके अस्तित्व का आभास कायम रखते हैं । 

गर्मियों की उन सूनी दोपहरियों में हम लोग अक्सर कब्रस्तान चले जाते थे इसलिए कि वहाँ के आम बहुत मीठे होते थे । यद्यपि इस बात की कोई गुंजाइश नहीं थी कि कोई मुर्दा कब्र से बाहर निकलकर हमें डांटेगा फिर भी पत्थर चलाते हुए हमें इस बात का ध्यान रहता था कि पैर किसी कब्र पर न पड़े । अगर ऐसा होता तो हम लोग तुरंत पाँव छूने की मुद्रा में झुक जाते और कब्र छूकर माफ़ी मांग लेते ।


छुप छुप कर धूम्रपान करने के लिए यह मरघट बहुत उपयुक्त जगह थी इसलिए मोहल्ले के बड़े भाई लोग किसी क़ब्र पर बैठकर सिगरेट फूंकते नज़र आ जाते । सर्दियों के दिनों में हम लोग बगल के स्मशान चले जाते थे । जलती हुई किसी चिता के करीब बैठकर देह को गर्मी देना अच्छा लगता था । दादाजी बताते थे कि हमारा मकान  बनने से पहले बस्ती तक कब्रस्तान का विस्तार था और नींव खोदते समय कुछ बच्चों के कंकाल भी निकले थे । उस समय बाल मृत्यु दर काफी अधिक थी और हिन्दु मुसलमान दोनों में बच्चों को मुख्य स्मशान से कुछ अलग हटकर दफ़नाने की परम्परा थी । 
मदन मोहन कोकाश 
बाज़ार के दिनों के अलावा मोहल्ले की शामें बहुत शांत हुआ करती थीं । अँधेरा घिरने से पहले घर के सामने पानी सींचकर खटिया बिछा दी जातीं या बेंचे रख दी जातीं । हम लोग एक छोर से दूसरी छोर तक दौड़ लगाते फिर थक कर बेंचों पर बैठ जाते  । इधर हम लोग रेस टीप खेलने में व्यस्त होते उधर सामने वाले दालान में मदन मोहन ताउजी की बैठक जम जाती । एक रेहल निकल आती उस पर रखी होती गीता प्रेस गोरखपुर से छपी तुलसी कृत रामचरितमानस की टीका वाली प्रति, साथ ही अगरबत्ती का स्टैंड और उसमे लगी चन्दन अगरबत्ती । ताउजी दुकान बंद करने के बाद कुछ देर टहलने जाते फिर लौटकर हाथ मुँह धोते और गमछे  से मुँह पोछते हुए अपना आसन ग्रहण करते।

इतनी देर में मानस पाठ सुनने की इच्छुक श्रोता मंडली वहाँ एकत्रित हो जाती । इनमे होते पड़ोस के फारेस्ट डिपार्टमेंट वाले चंद्रकांत गुंडे बाबू, छत्तीस इंच मोहरी का पजामा पहनने वाले फद्दी गुरूजी, आमले वाले पटेल, बाजू की  प्रिंटिंग प्रेस वाले सुरेश बाजपेयी जी, शिवदुलारे श्रीवास जी, मुंशी जी, हमारे फर्नीचर के कारखाने में काम करने वाले सद्दू गोंड और भी बहुत सारे लोग । पीले बल्ब की टिमटिमाती रौशनी में मदन भैया हाथ जोड़कर पहले बाल काण्ड का एक श्लोक पढ़ते.. 

वर्णानामर्थ संघानां रसानां छंद सामपि ।

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ।।

अर्थात, अक्षरों,अर्थ समूहों,रसों, छंदों और मंगलों को करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ । फिर वे रामचरितमानस में रखे मोरपंख के बुक मार्क वाला पृष्ठ खोलते और अपना पाठ प्रारंभ करते । उनके मुँह से सस्वर दोहे,सोरठे और चौपाइयों का पाठ चलता रहता, साथ साथ वे उनकी व्याख्या भी करते जाते और श्रोता गण भक्ति रस में सराबोर हो जाते । 

साठ के दशक के बच्चे हम लोग 
उस खुले खुले से मोहल्ले में रहने वालों और आते जाते लोगों  के लिए यह दृश्य बहुत मनोरम होता था । वहीं आंखमिचौली खेलते हुए हम बच्चों के लिए यह दृश्य  बड़ों के संरक्षण में बड़े होने की एक सुखद अनुभूति की भांति अवचेतन में आकार लेता था । चन्दन की अगरबत्ती की गंध हमें अपनी ओर खींचती थी । धोती पहने माथे पर तिलक लगाए मदन मोहन ताउजी हमें तुलसीदास की तरह दिखाई देते थे । वे हम बच्चों से भी आग्रह करते थे कि हम बैठकर राम कथा सुने लेकिन हम लोग उसे विशुद्ध धार्मिक कृत्य मानते थे और उसे बुजुर्गों के जीवन का हिस्सा मानकर खेलने कूदने में लग जाते थे ।  बावज़ूद इसके कभी कभार सुस्ताने या पानी पीने के बहाने कोई प्रसंग सुनने बैठ जाते थे और आश्चर्य कि कथा में हमारा मन रमने लगता था ।

बड़े होने के बाद सभी धर्मों के धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने के तारतम्य में मैंने सर्वप्रथम तुलसी कृत मानस और उसके बाद वाल्मीकि कृत रामायण भी पढ़ी । मानस पढ़ने का आधार बैतूल का यही प्रसंग था । बाबूजी भी भंडारा में जीवन भर नियम से प्रतिदिन रामचरित मानस का पाठ करते रहे ।

जगमोहन कोकास मेरे बाबूजी 

इस मकान के दालान में संपन्न होने वाला मानस पाठ बाबूलाल दादाजी के निधन के पश्चात नए वाले मकान के दालान में संपन्न होने लगा । मदन मोहन ताउजी का यह क्रम उनके जीवन तक चलता रहा और गुंडे बाबू ,सुरेश चाचा, फद्दी गुरूजी, सद्दू गोंड और मुंशीजी भी नियमित रूप से उनके श्रोताओं में शामिल होते रहे । 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आइये पड़ोस को अपना विश्व बनायें