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10 जून 2026

67.भंडारा : भविष्य के एक गायक की हत्या


कालखंड, बीसवीं सदी में सत्तर का दशक । स्थल, भंडारा की आदर्श टाकीज़ का लेडीज़ क्लास । फिल्म, दिल एक मंदिर, शाम छह बजे का पहला खेल जो अब समाप्ति पर है । परदे पर एक मार्मिक दृश्य और हॉल में गूंजती हुई रफ़ी साहब की आवाज़ “जाने वाले कभी नहीं आते, जाने वाले की याद आती है ।“ घुप्प अँधेरा है और मैं किसी का चेहरा नहीं देख पा रहा हूँ लेकिन दबी दबी सिसकियों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही है । मुझे न वह दृश्य समझ में आ रहा है न गाने के बोलों का अर्थ, लेकिन माँ को रोता देख मैं भी धीरे धीरे सुबक रहा हूँ। 

हम इसीलिए सिनेमा मे दुख के दृश्य देखकर रोते हैं 

कुछ बड़े होने के बाद जब ऐसे दृश्यों को समझ कर मैंने उन पर रिएक्ट करना शुरू किया तो समझ में आया कि दूसरों के दुःख में द्रवित होना यह हम मनुष्यों का यह मूल स्वभाव है । इसीलिए ऐसे किसी फिल्म या नाटक के काल्पनिक दृश्य में भी हमारी कैथार्सिस या भाव विरेचन की यह प्रक्रिया जारी रहती है । हाँ,  हम सायास अपने आप को इस भावनाओं के विरेचन से अवश्य रोक सकते हैं  लेकिन ऐसा  कर पाना बहुत मुश्किल होता है । आँसू  रोकने की कोशिश करोगे तो और ज़्यादा आँसू निकलेंगे । मैं तो ऐसा  कभी सायास भी नहीं कर पाया । आज भी  सिनेमा के परदे पर किसी भावुक दृश्य में आँसू अपने आप बहने लगते हैं  । 

मृत्यु के दर्शन पर आज तक जाने कितने लोगों ने क्या क्या लिखा है, लेकिन मैं जब भी सोचता हूँ तो इसे एक इंसान की देह की अनुपस्थिति के रूप में ही सोचता हूँ । कैसा होता है ना, एक इंसान का इस दुनिया से चले जाना । वह अपनी देह के साथ जीवन भर इस संसार में उपस्थित रहता है, हम उसे देख सकते हैं, उसे छू सकते हैं, उसकी आवाज़ सुन सकते हैं । मृत्यु के बाद वह एक तस्वीर बन जाता है और घर की किसी दीवार पर एक फ्रेम के भीतर कैद होकर टंग जाता है  । 

बैतूल के अपने दवाखाने में दादाजी अब अपनी ही कुर्सी के पीछे दीवार पर वीरेंद्र चाचा द्वारा बनाई एक खूबसूरत फ्रेम के भीतर एक तस्वीर के रूप में विराजमान थे  । तस्वीर में भी दादाजी की मूछों से उनका रौब टपकता था । यह तस्वीर बरसों उस कमरे में टंगी रही । जब भी मैं उस तस्वीर की ओर  देखता मुझे उनका वह रूप याद आता जब दूध रोटी खाते समय उनकी इन बड़ी बड़ी सफेद मूँछों पर दूध की सफ़ेदी की एक परत और चढ़ जाया करती थी । 

उनकी यह तस्वीर वही तस्वीर थी जो उनके भंडारा आने पर योगेश काले मामा ने खींची थी और जो एल्बम में अब भी उपस्थित है । एल्बम में दादाजी की तस्वीर देखते हुए उन क्षणों को याद करने की कोशिश करता हूँ जो मैंने दादाजी के साथ बिताये थे । दादाजी के साथ बिताये हुए बहुत कम क्षणों के निगेटिव मेरे मस्तिष्क के डार्क रूम में हैं। इनमे  डेढ़ साल की उम्र में मेरे जानी जोकर बनने का एक किस्सा भी है । 

अरे ! मैं तो जॉनी जोकर बन गया 

उन दिनों बैतूल के हमारे घर में एक गाय थी जिसका नाम लक्ष्मी था । लक्ष्मी ‘गाय जैसी सीधी’ इस मुहावरे को ग़लत साबित करते हुए पूरे मोहल्ले में अपने सींग मारने के लिए प्रसिद्ध थी । उसके मरखनी होने की वज़ह से बच्चे तो बच्चे बड़े भी उसके करीब नहीं जाते थे । दादी माँ की ड्यूटी थी उसे बांधने और दूध दुहने की । सुबह होते ही उसे खोल दिया जाता और घर के पास ही नागोराव जी के घर के सामने वह अन्य गायों के साथ नार में शामिल हो जाती । फिर वह शाम ढले गोधूली बेला में ही लौटती । 

उस दिन शाम को मुल्लू भैया देवी मन्दिर के पास कबाड़ में मिली एक पेराम्बुलेटर यानी बाबा गाड़ी में मुझे घुमा रहे थे । घर लौटती हुई लक्ष्मी के कानों में जैसे ही इस पुरानी गाड़ी की चूं चूं आवाज़ पहुँची वह उसे पृथ्वी का कोई विचित्र  जीव मानकर सींग मारने के लिए उस ओर दौड़ी । भैया खतरा भाँप कर गाड़ी छोड़कर अलग हो गये लेकिन मुझे बाहर निकलने का अवसर उन्हें नहीं मिला । लक्ष्मी ने अपने दोनों सींग गाड़ी में फँसाये और उसे उछाल दिया । 

मैं जैसे ही अंतरिक्ष से धरती पर आया मुझे पता चला मेरा सर फटा हुआ है । घर तक की यात्रा मुल्लू भैया की गोद में रोते हुए पूरी की । बापू ने तुरंत डेटाल के पानी से मेरा ज़ख्म धोया पट्टी बांधी और कहा “तुम्हे कुछ नहीं हुआ है , जाओ अब खेलो ।“ 

बापू का मेरे अंतर्मन को दिया हुआ सजेशन अपना काम कर गया और मैं चोट का दर्द भूल गया । अपने सर पर बन्धी हुई पट्टी लेकर एक विशिष्टता बोध के साथ मैं बाहर आया  और अपने दोस्तों पर इम्प्रेशन मारते हुए  कहा “ देखो, मैं जानी जोकर बन गया हूँ ।“ 

अपने साथ के बच्चों पर इम्प्रेशन मारने की मेरी यह आदत उन्ही दिनों डेवलप हुई थी । मैं एवरेज बच्चों की तरह नहीं रहना चाहता था । 

उस साल भी अपनी गायन की कॉपी अपने साथ लेकर मैं बैतूल इसी लिए गया था कि दोस्तों को कुछ राग रागिनियाँ सुना कर अपना प्रभाव जमा सकूँ  । लेकिन लौटते वक्त जाने किस बेखयाली में वह कॉपी वहीं  छूट गई । 

जुलाई 1965 का माह लग गया था और मेरी पाँचवी की कक्षा शुरू हो गई थी । स्कूल से आने के बाद मैं खेलने चला जाता था जबकि पिछले साल वह संगीत विद्यालय का समय होता था । एक दिन बाबूजी ने पूछा “गायन क्लास क्यों नहीं जा रहे हो ?” मैंने उन्हें बताया कि मेरी कॉपी बैतूल में छूट गई है और बिना कॉपी के संगीत विद्यालय जाने में मुझे शर्म आती है । 

यहीं था संगीत विद्यालय 
उन दिनों के अभिभावकों के भीतर अपने बच्चों को जैक ऑफ़ आल बनाने की ज़िद नहीं थी इसलिए बाबूजी ने भी जोर नहीं दिया । मैं उसके बाद संगीत विद्यालय नहीं गया और इस तरह भविष्य के एक गायक की हत्या हो गई ।

रूपचंद से दोस्ती 

हिंदी माध्यम का वह केवल एक ही प्रायमरी स्कूल था इसलिए सभी नॉन मराठी यानी सिन्धी,पंजाबी,मुस्लिम,बंगाली छात्र इसी स्कूल में पढ़ते थे । मेरी क्लास के सभी छात्र छात्राएँ संपन्न घरों से थे और न केवल उम्र में बल्कि कद में भी मुझसे बड़े थे । होना तो नहीं चाहिए था लेकिन इस बात को लेकर मेरे भीतर एक गिल्ट कॉम्प्लेक्स पैदा होने लगा । यद्यपि मैं पढने में सबसे आगे था लेकिन मेरी दोस्ती किसी से नहीं हो पा रही थी  । नानक भी उन दिनों थोड़ा कटने सा लगा था । ऐसे समय मेरी दोस्ती रूपचन्द नामक एक लड़के से हुई । 

रूपचंद गांधी चौक से स्टेशन जानेवाले रास्ते पर बीड़ी कारखाने के पीछे बसी दलितों की बस्ती मे एक कच्चे मकान में रहता था । उस के पिता स्कूल के पास ही एक बीड़ी कारखाने में मुनीम थे । हम लोग दोपहर की छुट्टी में अक्सर उस कारखाने चले जाते थे और वहीं बैठकर खाना खाते थे । रूपचन्द भी कभी कभार मेरे घर आ जाया करता था । एक बार जब मैं पीछे के आंगन में नंगा नहा रहा था तब वह गली से होता हुआ सीधे पीछे आ गया । 

किसी दोस्त के सामने निर्वस्त्र होने का यह पहला अवसर था । उन दिनों शेम शेम कहने का चलन नहीं था फिर भी मुझे अचानक शर्म सी महसूस हुई । बड़े होने के बाद जब मैंने अदन के बगीचे में हव्वा द्वारा ज्ञान का फल चखे जाने और अपने निर्वस्त्र होने पर शर्मा जाने के अहसास का किस्सा पढ़ा मुझे अपने बचपन का वह दृश्य याद आ गया । उस दिन मुझे भी अहसास हुआ कि अब मैं बच्चा नहीं हूँ और अगले दिन से ही मैंने अंडरवियर पहनकर नहाना शुरू कर दिया ।  अंडरवियर पहनकर नहाने का यह सिलसिला पूरी स्कूल लाइफ मे चलता रहा ।  

उसी साल मकान मालकिन नानी ने मकान के पुनर्निर्माण का काम प्रारम्भ किया । वे किराये से देने के लिये आंगन के बगल में दो कमरे और निकालना चाहती थीं  । उन्होंने बाबूजी को अल्टीमेटम दे दिया कि वे मकान खाली कर दें । लेकिन उस मकान का किराया बहुत कम था और उससे अधिक देने की स्थिति में हम लोग नहीं थे इसलिये बाबूजी वह मकान छोड़ना नहीं चाहते थे । उन्होंने थोड़ा सा किराया बढ़ा दिया और निर्माण होने तक उसी असुविधा में रहना स्वीकार कर लिया । 

शायद उस समय मकान का किराया अठारह रुपए था । 

माँ बाबूजी मैं और मुझसे छोटे दोनों भाई बहन सामान सहित दो कमरों में सिमट गए । उस साल हमारे यहाँ नागपुर से मेरे फुफेरे भाई बच्चन भैया,बहन निर्मल जीजी और परमानन्द मामा भी आए थे । वे भी हम लोगों के साथ धूल मिट्टी के बीच रहे । उन दिनों मेहमानों के आने जाने का काफी चलन था और उन्हें किसी प्रकार की अतिरिक्त सुविधा भी नहीं दी जाती थी । परमानन्द मामा मिलिट्री में थे और अंग्रेज़ी तरीके से रहते थे,स्पून नाइफ के साथ अंग्रेज़ी तरीक़े से खाना खाते थे फिर भी हम लोगों के साथ उन्हें बहुत मज़ा आया  । माँ बताती थी कि वे बचपन से ही अनुशासन प्रिय और सलीके से रहने वाले थे इसलिये उनकी भाभी उन्हें मज़ाक में ‘काला अंग्रेज़’ कहती थीं । मुझे याद है मामा ने  अपने कैमरे से हम लोगों की ढेर सारी तस्वीरें भी ली थीं । 


66 भंडारा : देह राग में जन्म आरोह है अवरोह मृत्यु

यहीं था भारतीय संगीत महाविद्यालय 

जिन बच्चों के जीवन में दादा दादी, नाना-नानी सभी का अस्तित्व होता है उनके संस्कार उन बच्चों की अपेक्षा बेहतर होते हैं जिन्हें यह सुख नहीं मिला होता है ।दादा दादी की उपस्थिति तो मेरे जीवन में थी लेकिन नाना नानी को मैंने कभी नहीं देखा था । वे लोग माँ के विवाह से पूर्व ही वे गुजर गए थे । इसलिए सबसे बड़े मामा ही मेरे लिए नाना जैसे थे, उन्हीने माँ की देखभाल की थी और उन का विवाह संपन्न करवाया था । 

1964 के उस साल हम लोग जून की शुरुआत में ही बैतूल से लौट आये मुम्बई से बड़े मामा अपने परिवार सहित भंडारा आने वाले थे । 

मामा मामी और और उनके बच्चे यानि लाल दादा, मन्जू दीदी, मणि दादा, बेबी दीदी और पप्पू का वह भंडारा प्रवास मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षणों में से है । वैनगंगा का तट, अम्भोरा, कोरम्बी जाने कितनी जगहों पर हमारे पाँव पड़े । तस्वीरें खींचने का दायित्व बाबूजी के कॉलेज के ही एक शिक्षक श्री योगेश काले का था  । वे माँ को दीदी कहते थे सो हम बच्चे उन्हें मामा कहते थे । काले मामा एक अच्छे चित्रकार व फोटोग्राफर भी थे । मेरी पायडल वाली मोटर में भी उन्होंने ही पेंट किया था । 

1964 जून की यह तस्वीर 
उन दिनों एक जुलाई का दृश्य आम दिनों से भिन्न होता था सड़क पर स्कूल ड्रेस पहने बच्चों की भीड़ टन टन घंटी बजाते साइकिल और रिक्शे वाले । मेरे पाँव पहले ही दिन रास्ता नापते हुए देशबंधु वार्ड और खामतालाव वार्ड पार कर मस्जिद से कुछ आगे बने ढोला स्कूल की इमारत में पहुँच गए ।
ढोला प्राइमरी स्कूल 
बाईं ओर के पहले कमरे में चौथी कक्षा लगती थी और प्रधान अध्यापक शिवहरे गुरूजी क्लास टीचर थे । उस  साल बोर्ड के इम्तिहान होने थे और गुरूजी ने साल के प्रारम्भ से ही मुझे पढ़ाई करने की हिदायत दे दी थी । कक्षा में पहला नंबर आने के लिए कोंचने वालों में बाबूजी के साथ गुरूजी भी शामिल थे । तीसरी कक्षा में बीमारी की वज़ह से मेरी रैंक  चौथी आई थी सो उसकी भी भरपाई करना था  । 

दोपहर में स्कूल से लौटने के बाद मैं पढाई करता और शाम को खेलने निकल जाता । मेरे अवचेतन में दबे शब्द जो पहले बड़बड़ाहट के रूप में निकलते थे अब गुनगुनाहट में बदल गए । बाबूजी ने एक दिन मुझे कोई गीत गुनगुनाते हुए देखा तो भारतीय संगीत विद्यालय के संचालक अपने मित्र सुधाकर हांडे से यह बात बताई। हांडे सर ने मुझे अपने विद्यालय की शास्त्रीय गायन की प्रवेशिका कक्षा में  भरती कर लिया । हांडे सर दृष्टिबाधित थे लेकिन बहुत सुन्दर थे । उनका गौर वर्ण और मीठी आवाज़ मेरे कानों में अब भी गूंजती है । उन्होंने प्रेम विवाह किया था और उनके दो बेटे थे । 

बेला के बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज में बाबूजी के साथ एक शिक्षक श्री गजानन राव नानोटी भी थे । वे तबले में विशारद थे ৷ बाबूजी ने उनसे जब मेरी संगीत में रूचि के विषय में बात की तो उन्होंने बाबूजी से कहा कि वे मुझे तबला सीखने के लिये उनके पास भेजें ৷ बाबूजी ने मुझसे कहा लेकिन मेरी रुचि गायन में थी इसलिए मैंने गायन की कक्षा ही ज्वाइन की । 

नानोटी काका का निवास 
मेरी शामें अब खेल के मैदान की बजाय  राग रागिनियों की सोहबत में गुज़रने लगीं । शाम होते ही मैं अपनी कॉपी उठाता और संगीत विद्यालय की ओर कदम बढ़ा देता । 

इधर शरद,प्रमोद,गुल्लू,बाबा, मन्या,और रामकिशन खुप्पस, कंचे और भौरा खेलने के लिए मेरी राह देखते और मैं संगीत विद्यालय में आलाप,तान,आरोह अवरोह, वादी,संवादी, ध्वनि ,नाद, लय, मात्रा, ताल, स्वर, चल स्वर, अचल स्वर, शुद्ध स्वर, विकृत स्वर जैसे दोस्तों के साथ अल्हैया बिलावल,यमन खमाज,भूपाली,बागेश्री  जैसे रागों के खेल खेलता  रहता । 

हांडे सर मुझे बहुत चाहते थे, वे अक्सर कहते थे जीवन एक राग की तरह ही है । जीवन की शुरुआत बचपन के आरोह से होती । फिर हम युवावस्था तक पहुँचते हैं और उसके बाद जीवन का अवरोह प्रारंभ होता है वृद्धावस्था आती है जहाँ हमारी स्थिति फिर बचपन जैसी होती है । इसी बीच सुख दुःख के आलाप, तान ,लय आदि आते हैं । 

हांडे सर ने बहुत मनोयोग से मुझे संगीत की शिक्षा दी । मेरे पास एक कॉपी थी जिसमें कई राग रागिनियों के बोल लिखे थे । अक्सर ऐसा होता था कि घर में कोई आता तो बाबूजी मुझे कोई राग गाने के लिये कहते । यद्यपि बिना साज के गाना कठिन होता था लेकिन मैं बोल सुनाकर ही प्रसन्न हो जाता था । 

इस तरह वह साल भी बीत गया और परीक्षा का समय आ गया । सर ने एक तारीख दी और कहा कि इस दिन सभी लोगों को आना है इस दिन बाहर से एक्ज़ामिनर आयेंगे और परीक्षा लेंगे उसके बाद सभी को एक प्रमाणपत्र मिलेगा । अब पता नहीं कैसे मुझे तारीख को लेकर कंफ्यूज़न हो गया । जो तिथि मुझे याद थी उस दिन मैं पहुँचा तो पता चला कि गायन की परीक्षा तो एक दिन पूर्व ही हो गई है । मैं बहुत निराश हो गया और रुआँसा भी हो गया । 

लेकिन हाँडॆ सर ने कहा “ निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है , हम ही तुम्हारी परीक्षा ले लेंगे ৷ “ फिर उन्होंने कई राग रागिनियाँ मुझसे गवाईं और इस तरह मेरी परीक्षा सम्पन्न हुई । हालाँकि यह मुझे बहुत बाद में पता चला कि मूल परीक्षा में मुझे अनुपस्थित बताया गया था और उस दिन मेरा मन रखने के लिये ही मुझसे गवाया गया था । इसलिए उस परीक्षा का कोई प्रमाणपत्र मेरे पास नहीं है ৷

सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी और दिन धोने के बाद सिकुड़ जाने वाले सूती कपड़े की तरह कुछ छोटे हो गए थे ।

 उस साल फिर बैतूल में पुराने मकान के उपरी कमरे में लक्ष्मीजी हमारी राह देख रही थीं । पटाखे छुड़ाकर और गन्ने खाकर हम लोग भंडारा लौट आये । आते समय बाबूजी दादा दादी यानी  बापू और अम्मा को भी साथ ले आये थे । बापू ने भंडारा पहुँचते ही घर में ही छपरी में एक अस्थायी दवाखाना खोल दिया और मोहल्ले के तमाम लोग उनके पास अपने दुख दर्द लेकर आने लगे । बापू उन्हे निशुल्क परामर्श व दवाएँ दिया करते थे । 

दादा दादी के सान्निध्य मे कुछ दिन 

सामने की गली से शुरू होने वाले हमारे घर का पिछला दरवाज़ा पीछे की गली में खुलता था जहाँ बंद गली के आख़िरी मकान के रूप में सहसराम और गजराबाई का मकान था । घर के  आँगन में  पकी मिटटी की एक नान्द थी, जिसे मिट्टी में आधा गाड़ दिया गया था  । उसमें वे लोग घर का बचा हुआ खाना डाल दिया करते थे । शाम को जब सहसराम अपने खेत से हीरा मोती की जोड़ी लिए घर लौटते तो वे बैल  उस नांद में मुँह डालकर अपना भोजन तलाशने लगते । जानवर बिना कुछ कहे हमारा जूठन खा लिया करते थे, यह तो बाद में मुझे मालूम हुआ कि उस वक़्त भी हमारे देश में ऐसे कई लोग थे जिन्हें जानवरों की तरह जूठन भी नसीब नहीं होता था ।

बापू की सुबह चिड़ियों के चहचहाने से होती । मुझे साथ लेकर वे मुंह अँधेरे गजरा बाई के खेत की ओर निकल जाया करते और खेत से ज्वार का एक भुट्टा तोड़कर उसके दाने चिडियों को खिलाया करते । मैं उनके साथ ‘आ’ ‘आ’ कहता हुआ चिड़ियों को मनुष्यों की भाषा सिखाने का प्रयास करता ।  गजराबाई के घर में एक गाय थी और गाय जैसी एक बिटिया जिसका नाम शांति था ।


वह गाय का दूध दुहती थी । प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व की कक्षा में जब मैंने बेटी के लिए संस्कृत शब्द ‘दुहिता’ पढ़ा तो मेरे मानस पटल पर दूध दुहती हुई शांति का चेहरा ही उभरा । शांति अभी भंडारा में ही अपने नाती पोतों के साथ उसी घर में रहती है । कुछ दिनों बाद अम्मा और बापू  वापस बैतूल चले गये ।

उस वर्ष का जाड़ा प्रेमचंद की कहानी पूस की रात के जाड़े की तरह ही हाड़ कंपा देने वाला था । 

वह जनवरी का महीना था । सुबह स्कूल से लौटा तो देखा दरवाज़े पर पोस्टमैन खड़ा है और उसके हाथों में एक तार है । उन दिनों टेलीग्राम आने का अर्थ होता था किसी की मृत्यु की सूचना । बाबूजी ने काँपते हाथों से तार खोला । तार बैतूल से आया था और उसमें बापू के निधन का समाचार था । हम लोगों ने जल्दी जल्दी तैयारी की और नागपुर के लिए रवाना हो गए । नागपुर में स्टेशन पर ही अन्य रिश्तेदार भी मिल गए । हम सब पेसेन्जर से बैतूल के लिए रवाना हुए लेकिन बैतूल की परम्परा के अनुसार अग्निसंस्कार तो शाम को ही हो चुका था । वहाँ पहुँचने के बाद बाबूजी चिता के दर्शन के लिए गए । बापू की मृत्यु के उपरान्त दसवें दिन दशगात्र हुआ और हम सभी के सर मुंडा दिए गए । दशगात्र के तीसरे दिन तेरहवीं हुई । 

दादाजी का अंतिम चित्र 
ग़नीमत कि ठण्ड उसके बाद कम हो गई थी वर्ना सर पर लगी टोपी भी सर की रक्षा नहीं कर सकती थी । सब बच्चों के बीच घुटा हुआ सर लेकर जाना भी बहुत अटपटा सा लगता था इसलिए कि  बच्चे चमनगोटा या टकलू कहकर मजाक उड़ाते थे । ऐसे में मेरी दोस्ती नानक चंद पंजाबी से हुई । वह बिलकुल भी मज़ाक नहीं उड़ाता था । नानक के पिता की गांधी चौक में मेन रोड पर किराने की एक दुकान थी, जहाँ कभी कभी मैं नानक के साथ बैठा करता था ।

मैंने अपने अकेलेपन में फिर शब्दों से दोस्ती कर ली । चाक पर पात्र रखने से पहले मिटटी गूंदने की तरह मैं कागज़ पर कुछ कुछ लिखने लगा था । फिर एक दिन पोस्टकार्ड पर एक छोटी सी कहानी लिखकर नागपुर से निकलने वाले अखबार  ‘नवभारत’ के बच्चों के कालम ‘बच्चों की फुलवारी’ में भेज दी । 

नानक के घर नवभारत आता था उसने स्कूल में बताया कि तुम्हारी कहानी “सुनो सबकी करो मनकी‘ अखबार में छपी है । फिर मैंने उसे मैंने नानक की दुकान पर ही देखा । मेरी पहली प्रकाशित कहानी की कोई कॉपी मेरे पास नहीं है यहाँ तक कि यह भी याद नहीं कि उसमे मैंने क्या लिखा था । 

नानक से मेरी दोस्ती सातवीं क्लास तक चली । फिर स्कूल से निकलने के बाद उससे मिलना जुलना कम हो गया । नौकरी लगने के बाद छुट्टियों मे कभी भंडारा जाता तो उसकी दुकान पर जाता था लेकिन हमेशा उसे नशे में धुत पाता । मैंने और घनश्याम ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह शराबियों की तरह हमें भरोसा देता रहा  । इधर मौत घात लगाये बैठी थी एक दिन उसे अपने साथ ले गई बड़े होने के बाद नानक को पीने की लत हो गई थी जिसकी वज़ह से उसका असामयिक निधन हो गया ।  

शरद कोकास