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10 जून 2026

119.भंडारा : वे केवल बजट प्रस्तुत कर सकती थीं और कुछ नहीं

जगमोहन कोकास शीला कोकास 

अपने चार भाइयों में उम्र की दृष्टि से बाबूजी की स्थिति भरत की भांति तीसरे स्थान पर थी ৷ भातृ  प्रेम  एवं परिवार के प्रति दायित्व की भावना उनके मन में सदैव विद्यमान रहती थी । दोनों बड़े भाई किसान थे और किसान होने के दुख के साथ साल भर खेती के काम में व्यस्त रहते थे । बाबूजी सरकारी नौकरी में थे जो उन लोगों की दृष्टि में आय का एक निश्चित साधन थी ৷ बाबूजी जब भी छुट्टियों में बैतूल जाते अपनी बचत का अधिकांश हिस्सा अपने भाइयों को दे आते । 

माँ को यह बात पता थी लेकिन बाबूजी के डर के मारे वे कुछ नहीं कहती थीं । पितृसत्तात्मक परिवार की संसदीय प्रणाली में उनकी स्थिति नाम के लिए गृहमंत्री की तरह थी ৷ वित्तमंत्री की तरह वे बजट प्रस्तुत कर सकती थीं लेकिन घर में कौनसी वस्तु खरीदी जानी है से लेकर रिश्तेदारों और अपने चचेरे भाई बहनों के विवाह में कितना व्यवहार और लेन देन करना है संबंधी निर्णय शत प्रतिशत बाबूजी के ही होते थे ৷ परिवार के प्रति उनके दायित्व निर्वाह की इस भावना के व्यावहारिक परिणाम स्वरूप अनेक बार उनकी थाली में रोटियों की संख्या कम हो जाती लेकिन बाबूजी के माथे पर कभी कोई शिकन हमने नहीं देखी । 

वह दिन मुझे भूले नहीं भूलता जब प्रकाश बुआ की ननद के विवाह में शामिल होने हम लोगों को इन्दौर जाना था । हम लोगों ने अपने कपड़ों में से अच्छे अच्छे कपडे छांटकर टीन की पेटी में रख लिए ৷ शाम को निकलना था, अतः बाबूजी घर के खिड़की दरवाज़े और अन्य सामान व्यवस्थित करने के काम में जुटे हुए थे   ৷ 

यही कोई सुबह के ग्यारह बजे होंगे, अचानक बाहर से आवाज आई ..”पोस्टमैन ৷” बाबूजी बाहर निकले, मैंने देखा उनके हाथों में एक पोस्टकार्ड था ৷ बाबूजी ने उसे पढ़ा और मोड़कर पैंट की जेब में रख लिया ৷ फिर भीतर आकर शर्ट पहनी और साइकल लेकर बाहर निकल गये । लगभग आधे घंटे बाद वे लौटे ৷ माँ हाथ पोंछते हुए रसोई से बाहर आईं ৷ अपनी चिंता को वे शब्द दे चुकी थीं, आखिर ऐसा क्या हुआ जो बाबूजी बिना कुछ बोले घर से निकल गए ? ..” 

बाबूजी ने उनकी ओर बिना देखे कहा “सब सामान खोल लो, अब हम शादी में नहीं जा रहे हैं ।“ हम लोगों की आशा में यह अप्रत्याशित चाय में मख्खी की तरह आ गिरा ৷ पहला ख्याल तो यही आया कि पत्र में कहीं विवाह स्थगित या निरस्त हो जाने की सूचना तो नहीं थी, लेकिन यदि ऐसा होता तो बाबूजी पहले ही बता देते ৷ लेकिन वे तो बिना कुछ कहे बाहर चले गए थे ?

हम सब की उतरी हुई सूरत माँ से देखी नहीं गई, उनके द्वारा बार बार पूछे जाने पर आखिर बाबूजी को स्थगन के कारण की सार्वजनिक घोषणा करनी पड़ी ..”बैतूल से दादा भैया की चिठ्ठी आई है, उन्हें खेती के काम के लिये कुछ रुपये चाहिये थे, मेरे पास जितने पैसे थे मैं उन्हें मनीऑर्डर कर आया हूँ, अब यात्रा के लिये पैसे नहीं हैं ।“ 

माँ ने कुछ नहीं कहा ৷ उनके चेहरे की रेखाओं में क्रोध, निराशा,बच्चों का चेहरा देखकर उपजा दुःख,पति की ख़ुशी में अपनी खुशी मानने का संतोष  और भविष्य के लिए अच्छे दिनों की आस सब कुछ दिखाई दे रहा था ৷ मैंने शादी में पहनने वाली अपनी सबसे अच्छी ड्रेस पेटी से निकाली और आलमारी में रख आया ৷ मूड ऑफ होना किसे कहते हैं इस भाव से वह मेरा पहला परिचय था । माँ के मन में कुछ भी रहा हो लेकिन प्रकट में उनके शब्दों में  सांत्वना थी “कोई बात नहीं, शादियाँ तो अपने घर में होती ही रहती हैं, इसमें जाने का मौका नहीं मिला तो क्या हुआ अगली बार किसी और शादी में चले जायेंगे ।“ 

मैंने कुछ नहीं कहा ৷ मैं जानता था बैतूल और नागपुर में तो विवाह होते ही रहते हैं लेकिन जीवन में पहली बार इंदौर जाने का अवसर हमें मिला था, जो हम चूक गए थे ৷ बड़े होने के बाद जब राजनीति की समझ आई तो समझ में आया, हर साल वित्त मंत्री बजट प्रस्तुत करते हैं तब वे यही कहते हैं ..इस बार न सही अगली बार सही, और जनता भी उनके आश्वासन से उसी तरह से बहल जाती है जैसे हम अपने बचपन में बहल जाया करते थे ৷

शरद कोकास 

5 अगस्त 2009

ब्लॉग पर इसे लिखते हुए रो रहा हूँ मै


4
अगस्त 2001 का वह दिन
। उस दिन रक्षाबन्धन का पर्व था । भंडारा में मेरी माँ मृत्युशैया पर थी ,उसी शहर में रहने वाली छोटी बहन सीमा उनके पास अकेली थी । किसी कारण वश मैं उनके पास नहीं पहुँच पाया ।उस दिन वे दोनो माँ-बेटी भी थीं और अपने भाईयों का इंतज़ार करती अकेली बहनें भी । मैं चार रोज़ बाद घर पहुंचा । माँ तब तक यह दुनिया छोड़कर जा चुकी थी । रक्षाबन्धन के उस दिन दोनो माँ-बेटी इस पीड़ा को कैसे सहन करती रहीं, इस अकथ व्यथा को व्यक्त करती हुई बहन सीमा की यह कविता जो उसने कई दिनो बाद मुझे पत्र में लिख भेजी थी ।


ऐसा भी था एक रक्षाबन्धन


परम्परा के शब्दकोष में

रक्षाबन्धन पर्व है भाई बहन के प्यार का

परदेश गये भाई के ना आने पर

यह दिन होता था माँ के लिये

शहर में रहने वाली बेटी के इंतज़ार का


भाई की अनुपस्थिति में

माँ के हाथ में

रेशमी धागा बान्धते हुए कहा मैने

यह धागा तुम्हारी रक्षा करेगा माँ

मृत्युशैया पर लेटी हुई माँ की रक्षा की बात

निरर्थक जानते हुए भी माँ मै तुमसे कहती रही

तुमसे बिछड़ने की कल्पना का दुख सहती रही

तुमने अपने व मेरे भाई को याद किया

मुझसे कहा आओ तुम्हे ही राखी बांध दूँ

पता नहीं अगले रक्षाबन्धन तक....


इसके आगे तुम्हारी आवाज़

सिसकियों में डूब गई

जीवन से जितनी अपेक्षायें थीं तुम्हारी

सारी की सारी टूट गईं

मेरी विदाई के सत्रह साल बाद

पहली बार मुझसे लिपटकर रोईं तुम

बस इतनी सी बात कहने के लिये

कई रातों से नहीं सोईं तुम

कि मन नहीं है तुम्हे छोड़ कर जाने का

फिर बॉनी-बुलबुल को दुलार किया

कहा पढ़ना लिखना नाम कमाना

बाला को याद किया दुआएँ दीं

कहा जीवन में ढेरों खुशियाँ पाना


पिछले साल अस्पताल से लौटने पर

बेटी के घर रुकने का कर्ज़ था तुम्हारा

जो तुमने चुकाना चाहा

सारी उम्र कानों में पहना जिसे

वह कुंडल देकर

विवशता में जिसे स्वीकारा मैने

कैसे खुश रहती तुम्हे दुख देकर


'चलूँ' कहने पर बिलख कर रोईं तुम

मगर कह न सकीं फिर आना

तुम जानती थी शायद

मृत्यु ढूँढ रही थी तुम्हे ले जाने का बहाना


फिर गालों पर चुम्बन व प्यार दिया

आखरी बार अपनी बेटी को

जी भरकर प्यार किया


अपनी कोख जनी बेटी को

पराया मानने वाली इस संस्कृति में

मैं आज भी महसूस करती हूँ तुम्हारा स्पर्श

जो रक्षा करेगा मेरी आजीवन

जो सदा रहेगा जीवन का स्पन्दन

”ऐसा भी था एक रक्षाबन्धन”


सीमा किशोर गोडनाले

राममन्दिर वार्ड भंडारा (महा.)