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10 जून 2026

120 .भंडारा : बादशाही लॉज शनिवार पेट पुणे से आनेवाली चिठ्ठियाँ

माँ बाबूजी 

चौड़ी मोहरी वाली पैंट को टखने के पास से मोड़ कर बाबूजी उस पर एक क्लिप लगा देते ताकि मोहरी साइकिल की चेन में न फँसे ৷ साइकिल पर चढ़ कर वे घर से निकलते और रास्ते भर ‘कोकास गुरूजी नमस्कार’ के अभिवादनों का उत्तर देते हुए काम पर चले जाते ৷ एक मध्यवर्गीय शिक्षक का जीवन उन दिनों बहुत कठिन होता था, इज्ज़त तो बहुत मिलती थी लेकिन तनख्वाह बहुत कम ৷ पूरे परिवार के साथ गुजारा करना उतना मुश्किल तो नहीं था लेकिन बाबूजी की तरह अपने भाइयों और उनके परिवार की ज़िम्मेदारी भी जिसके पास हो उसके लिए कुछ अतिरिक्त काम करना आवश्यक होता था ৷ 

बाबूजी को हर साल पुणे संभाग के बोर्ड एग्जाम में मॉडरेटर का काम मिल जाता  था ৷ वे हर साल मार्च अप्रेल में एक माह के लिए पुणे चले जाया करते थे । शुरू शुरू में शनिवार पेठ में ‘बादशाही लॉज’ उनका ठिकाना हुआ करता था बाद में वे ‘स्वरूप लॉज’ में ठहरने लगे । पुणे से लौटते हुए वे एकाध दिन मुंबई में दयानंद मामा के यहाँ ठहरते और वहाँ से हम लोगों के लिये कपड़े और अन्य वस्तुएँ लेकर आते थे । उनके लौटने की हम लोगों को बेसब्री से प्रतीक्षा रहती थी । 

उस साल मैं आठवीं में था ৷ पुणे जाने से पहले बाबूजी ने माँ से कहा “तुम भी चलो, तुम मुंबई में रहना, मैं एक माह पुणे में रह लूँगा৷” माँ ने कहा “बच्चों को छोड़कर कैसे जायेंगे ?” बाबूजी के पास उसका उत्तर था  “बच्चों की देखभाल के लिए बैतूल से अम्मा को और नागपुर से श्यामा को बुला लेते हैं ৷” कुछ बहस के बाद बाबूजी का प्रस्ताव अंततः स्वीकृत हो गया, बैतूल से दादी माँ और नागपुर से मेरी फुफेरी बहन यानी श्यामा जीजी को भंडारा बुलवा लिया गया ৷ बबलू को छोटे होने का लाभ मिला और वह भी माँ के साथ मुंबई चला गया ৷ रह गए भंडारा में मैं और छोटी बहन सीमा । यह पहला अवसर था जब हम लोग माँ बाबूजी के बिना रह रहे थे । 

जब घर में अपने से कोई छोटा होता है तब बड़े होने का भाव अपने आप आ जाता है ৷ यह घर जब समाज और दुनिया हो जाता है तब भी यह भाव बना रहता है ৷ मैं उम्र में सीमा से बड़ा था इसलिए उसे संभालने की ज़िम्मेदारी भी मेरी थी ৷ माँ की याद तो मुझे भी आती थी लेकिन उसे देखकर चुप हो जाता ৷ उसका मन बहलाने के लिए मैं रोज शाम उसे बागीचे तक घुमाने ले जाता था । एक दिन सिनेमा दिखाने भी ले गया । दादी माँ मेरे इन प्रयासों को देखकर बहुत प्रसन्न होती थी हालाँकि सीमा उनके पास बहुत मज़े से रहती थी । 

एक माह तक माता पिता के बिना जीवन व्यतीत करने का यह दौर मुझे अनेक बातें सिखा गया ৷ बाज़ार से सब्ज़ी लाना, अपने कपड़े खुद धोना, घर में झाडू लगाना, पानी भरना,छोटी बहन की चोटी करना जैसे छोटे मोटे कामों के लिए अनेक  अलिखित प्रशंसापत्र मुझे प्राप्त हुए । 

सबसे अधिक मज़े की बात यह रही कि माँ की अनुपस्थिति में मैं वे सारे नखरे भूल गया जो माँ के सामने किया करता था । अब यह मत पूछियेगा कि वे नखरे कौन कौन से थे, आप सब ने भी किये होंगे जैसे यह सब्जी नहीं खाऊंगा, यह कपड़े नहीं पहनूँगा आदि आदि ৷ 

कभी कभी पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी के बीच अचानक माँ बाबूजी की याद आती फिर बस कुछ दिनों की तो बात है ऐसा कहकर अपने आप को समझा लेता ৷ मुझे अपने से ज़्यादा चिंता सीमा की रहती थी । हर तीन चार दिन बाद बाबूजी की चिठ्ठी  मिल जाती और उनके अक्षरों में हम उनकी उपस्थिति को महसूस कर लेते ৷ खैर, जैसे तैसे एक माह बीत गया । मेरी व सीमा की परीक्षाएं  समाप्त हो गई और माँ बाबूजी भी वापस आ गये । मुझे लगा था कि माता - पिता की अनुपस्थिति का मेरी पढ़ाई पर कुछ प्रभाव पड़ेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उस वर्ष भी मेरा क्रमांक कक्षा में प्रथम ही रहा ।  

जैसे किसी फिल्म का ट्रेलर होता है उसी तरह माँ बाप के बिना जीवन गुजारने की लम्बी फिल्म का वह ट्रेलर था ৷ बरसों बाद माँ हमेशा हमेशा के लिए चली गई, बाबूजी भी चले गए .. मैं भी भंडारा से बाहर इस शहर में आ गया .. लेकिन अब भी वहाँ जाता हूँ तो ऐसा लगता है, बाबूजी कुछ दिनों के लिए पुणे गए हुए हैं और माँ भी उनके साथ मुंबई, मामा के यहाँ ৷

माँ बाबूजी 

उस रात माँ को अंतिम विदा देते समय ऐसी ही कुछ बातें मैंने माँ की मृत देह से की थी एक कविता के शिल्प में....  


एक वादा करो माँ

जब भी आउंगा इस घर में 

तुम यहीं कहीं मिलोगी

 

मैं बैठूंगा ड्राइंगरूम में 

तुम रसोई में सब्ज़ी छौंक रही होगी

 

मैं बेडरूम में सोता रहूंगा 

तुम पीछे के कमरे में

प्याज़ जमा रही होगी 


जब मैं पीछे वाले कमरे में जाऊंगा 

तुम छत पर टहलने चली जाओगी

 

मेरे छत पर जाते ही 

तुम जा बैठोगी पड़ोस में


न मैं तुम्हें दिखूंगा 

न तुम मुझे दिखोगी 


बस ऐसी ही आँखमिचौली में 

बीत जाएँगी मेरी छुट्टियाँ  

एक वादा करो माँ ৷


आपको पता है माताएँ बच्चों से कभी ऐसा प्रॉमिस नहीं करतीं लेकिन हमेशा उनके आसपास रहती हैं ৷


12 मई 2026

34. भंडारा : बाबासाहेब के बाद महाराष्ट्र

बाबासाहेब आम्बेडकर छह दिसंबर उन्नीस सौ छप्पन को ही संसार से विदा लेकर जा चुके थे । उनके लाखों अनुयायी नई उर्जा से लैस होकर महाराष्ट्र में शिक्षा के विकास पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे थे ।

बजबजाती नालियों की बदबू से भरी गलियाँ जस की तस थीं । इन गलियों में रहने वाले कभी अपने कदमों के निशान मिटाने के लिए अपनी कमर में झाड़ू बांधकर चला करते थे ताकि किसी सवर्ण का पैर उन पर न पड़े और इस अपराध का जवाब उन्हें अपनी पीठ पर कोड़े खाकर न देना पड़े । सड़क पर थूकने की भी जिन्हें इज़ाज़त नहीं थी जो थूक इकठ्ठा करने के लिए गले में मटकी बांधे हुए चलते थे, उन्होंने अब अपनी मटकियाँ फोड़ दी थीं । इन बस्तियों में अब बाबासाहेब का नारा गूँज रहा था “शिक्षित हो,संगठित हो, संघर्ष करो ।“ अपने जीवनकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही वे जान गए थे कि इस देश के निवासियों की पहली ज़रूरत है शिक्षा । असहयोग के आवरण में लिपटे विरोध के बावजूद इसका सूत्रपात हो चुका था ।
लेकिन यह पहला शंखनाद नहीं था । उनसे भी पहले सन अठारह सौ अड़तालीस में ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने महाराष्ट्र में स्त्री शिक्षा की शुरुआत कर दी थी l पुणे जैसे शहर में स्त्रियों को शिक्षा देने के लिए एक स्कूल खोलना अपने आप में एक विद्रोह था । उस समय स्त्री शिक्षा का अधिकार जैसी कोई बात किसी की कल्पना में भी नहीं थी । पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उकसाना भी एक तरह का सामाजिक अपराध था ।

सावित्री बाई जब अपने घर से निकलकर लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल जाती थीं तो स्त्री शिक्षा के विरोधी सड़क के दोनों ओर खड़े हो जाते थे । वे केवल शब्दों में लिपटी हुई गन्दगी ही नहीं बल्कि गोबर, कीचड़ और मैला जैसी गन्दगी भी उन पर फेंकते थे । सावित्रीबाई उन्हें कोई जवाब नहीं देतीं । वे अपने साथ एक थैली में धुली हुई एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थीं । स्कूल पहुंचकर पहले वे अपनी साड़ी बदलतीं और कक्षा में जाकर पितृसत्ता द्वारा शोषित उन स्त्रियों के मस्तिष्क में शिक्षा के बीज बोतीं । उन्हें ज्ञात था कि उनका लगाया हुआ यह पौधा एक दिन महाविशाल वृक्ष बनेगा । इस बात में कोई दो राय नहीं कि महाराष्ट्र के इस समाज ने स्त्री शिक्षा के लिए संघर्ष किया है इसीलिए आज स्त्री शिक्षा के मामले में महाराष्ट्र अग्रणी है ।

महाराष्ट्र का निर्माण यद्यपि एक मई उन्नीस सौ साठ को हुआ लेकिन उससे पूर्व ही गांवों में शिक्षा संस्थानों का खुलना प्रारंभ हो चुका था । ब्रिटिश काल से चली आ रही शिक्षा प्रणाली में देशकालानुसार परिवर्तन कर उसे लागू करने का ज़िम्मा राजनीतिक इच्छा शक्ति पर निर्भर करता था । मराठा साम्राज्यों के समय प्रारंभ की गई मराठी शालाएँ भी चल रही थीं । शिक्षा के स्तर तथा मानकों की कोई बात ही नहीं थी , औसत दर्जे की शिक्षा मिल जाए इतना ही काफी था । निजी स्कूल न के बराबर थे और शिक्षा को मूलभूत अधिकारों में शामिल करने की संवैधानिक व्यवस्था पर अनेक मत मतांतर थे । फिर भी महाराष्ट्र अपनी प्रगतिशील सोच के कारण शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तरक्की कर रहा था ।

स्त्री शिक्षा की स्थिति में भी परिवर्तन आ चुका था लेकिन पितृसत्तात्मक विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया था । धर्म परिवर्तन का अर्थ सब कुछ त्याग देना नहीं था, पत्थर,मिट्टी और पीतल के बने देवी देवता पूजाघरों में विद्यमान थे बस उनके साथ आंबेडकर और बुद्ध की प्रतिमाएँ और जुड़ गई थीं । मस्तिष्क में वैचारिक परिवर्तन नहीं हुआ था इसलिए अवैज्ञानिक विचार अभी जीवन से चिपके हुए थे ।

साड़ी में सजी धजी लडकियाँ अपनी लाल पीले रिबन से बंधी अपनी चोटियाँ लहराते हुए स्कूल जाने लगी थीं और विद्यार्थिनी कहलाने लगी थीं । लेकिन स्कूल से आने के बाद वे फिर छात्रा से बेटी और बहन बन जाती थीं और पिताओं,भाईयों और धर्मगुरुओं के बनाये समाज के नियमों से संचालित होने लगती थीं । समय अपनी क्रूर हँसी हँस रहा था ..वह जानता था कि समाज उससे अधिक तेज़ गति से चलकर उससे आगे नहीं हो सकता ।

भंडारा में अभी इतनी बरसात नहीं हुई थी शहर की दीवारों पर चुनाव के दौरान नील से लिखी गई प्रत्याशियों को वोट देने की अपीलें और चुनाव चिन्ह के रेखांकन धुल जाएँ । आज़ादी के समय ख़रीदी गई लोगों की छतरियों में अनगिनत छेद हो चुके थे, अभावों का आसमान अपनी बुलंदी में उन छेदों से झाँक रहा था और उनकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ा रहा था । कपसीले बादलों में दिल्ली के लाल किले से की गई घोषणाओं और विकास के वादों का अस्पष्ट सा अक्स था ।

जिससे तारीख का एक पन्ना रोज़ फाड़ दिया जाता है ऐसे टीन पर छपे लक्ष्मी गणेश की फोटो वाले वाल कैलेण्डर से सन छप्पन का इकतीस दिसंबर वाला आख़िरी पन्ना फाड़ा जा चुका था । गाँवों में बरगद के नीचे चौपाल पर रेडिओ बज रहे थे । समाचारों में बताया जा रहा था कि आल इंडिया रेडिओ अब आकाशवाणी है । प्रथम पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य आत्मनिर्भरता, कृषि का विकास, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण तथा शरणार्थियों की व्यवस्था आदि अब पूर्ण हो चुका है ।

दूसरी पंचवर्षीय योजना प्रारंभ हो चुकी थी और नेहरू जी के कोट में लगे लाल गुलाब की खुशबू औद्योगिक विकास, घरेलु उत्पादन जैसे शब्दों के साथ घर घर तक पहुँच रही थी । भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला जैसे इस्पात संयंत्रों की ताज़ा ताज़ा बनी पहली ब्लास्ट फर्नेस काला धुआं उगलने लगी थी ।