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10 जून 2026

158 . भंडारा : जीवन के रंग लिट्टी चोखा के संग


‘खइके पान बनारस वाला’ गाते हुए, गंगा किनारे वाले छोरे के संग घुटन्नी धोती और कुर्ता पहने, ढोलक बजा कर मुंबई की एक पुरानी बस्ती में किसी चाल के परिसर में ठंडाई की तरंग में नाचते हुए लोग आपको याद होंगे । महाराष्ट्र की मुंबई नगरी आज़ादी के काफी पहले से ही उत्तर भारत के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी । बनारस और पटना से आने वाली ट्रेने मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पर जैसे ही ठहरती सर पर गठरी लादे, अपनी धोती कमीज सहेजते, लोगों का झुण्ड रेल से उतरता । स्टेशन के बाहर काली पीली टैक्सी चलाते हुए उन्हें अपने ही गाँव जवार के लोग मिल जाते । यह टैक्सीयां उन्हें उन बस्तियों की ओर ले जातीं जहाँ कोयले की आँच में लिट्टी सिंक रही होती और आलू के चोखे और बैंगन के भरते की गंध वातावरण में विद्यमान होती । 

मुंबई के जी पी ओ से रोज़ ढेरों पोस्टकार्ड निकलते जिनमे इनके दुःख सुख के समाचारों  के साथ मुंबई शहर की चकाचौंध और रोजगार के अवसरों का वर्णन होता जिन्हें पढ़कर फिर उनके बन्धु बांधव भी इन्ही ट्रेनों में सवार होते और मुंबई पहुँच जाते । मुंबई शहर तो जैसे माँ की गोद था जहाँ उन्हें पनाह मिलती, ढेर सारी कपड़ा मिलों, रसायनों और फूड प्रोडक्ट्स के कारखानों के मस्टर रोल में मजदूरों की सूची में उनका नाम लिख लिया जाता और फिर यह सिलसिला चलता रहता । 

यह केवल मुंबई शहर में ही नहीं हो रहा था मध्य प्रान्त के बड़े शहरों और मंझोले शहरों और कस्बों में भी यू पी बिहार के लोग आ रहे थे । इनमे बिना पढ़े लिखे लोगों से लेकर अच्छे पढ़े लिखे लोग भी शामिल थे । और केवल यू पी बिहार के ही नहीं राजस्थान , पंजाब, हरियाणा, के लोग भी काफी संख्या में यहाँ आ आकर बस रहे थे जिनमे हिन्दू भी थे मुसलमान भी, सवर्ण भी और दलित भी । यह लोग मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे थे जो आगे चलकर इसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए दुनिया में अपना स्थान बनाने वाला था ।

दरअसल यह दुनिया भी ऐसे ही बसी थी । लाखों साल पहले जब इन्सान ने इस धरती पर जन्म लिया वह एक जगह ठहरा ही कहाँ । समुद्र जब आपस में जुड़े थे और उनके पैदल चलने के लिए रास्ते ही रास्ते थे । कहीं भी जन्म लेने वाला इंसान कहीं भी जा सकता था, न उसे पासपोर्ट की जरुरत थी न वीज़ा की ।

लेकिन यह दौर अधिक समय तक नहीं चला । हम धीरे धीरे सभ्य होते गए । धीरे धीरे हमने इस धरती को बाँट लिया । धीरे धीरे हम अपनी संकुचित जगहों में और संकुचित दिमागों में सिमटते गए । हमने अपने आप ही तय कर लिया कि यह हमारा देश, यह हमारे लोग, हम यहाँ के मूल निवासी, यह हमारा धर्म और फिर एक दिन हमने एक फरमान जारी कर दिया.. हमारे अलावा बाकी के सब लोग यहाँ से चले जाएँ यह सिर्फ और सिर्फ हमारा देश है। 

हँसिये मत,  यह सिलसिला अभी थमा नहीं है , ‘यह हमारा देश’ अब धीरे धीरे ‘यह हमारा राज्य’ में बदलने लगा है । इसे ‘यह हमारा शहर’, ‘यह हमारा गाँव’ ,‘यह हमारा मोहल्ला’ में बदलने में देर नहीं लगेगी ।  और जिस दिन ‘यह हमारा घर’ में तब्दील हो जायेगा, दम तोड़ती मानवता उसी दिन आत्महत्या कर लेगी ।  

दरअसल मैं भंडारा के डॉ. रामकुमार सिंह के बारे में लिखना चाहता था और इतना सब लिख गया । रामकुमार चाचा बिहार से भंडारा आए थे पचास के दशक में स्थानीय जे एम पटेल कॉलेज में नौकरी करने । वे हिन्दी के प्राध्यापक थे । अपने रिटायर होने की उम्र तक वे भंडारा में एक कमरा लेकर रहे, खुद ही खाना पकाते थे और कपड़े धोते थे ।  वे अक्सर हमारे घर आ जाया करते और बाबूजी के साथ हिन्दी साहित्य पर चर्चा करते फिर जाने कब बातें करते करते उत्तर प्रदेश और बिहार पहुँच जाते । लिट्टी चोखा के बारे में पहली बार उन्ही से सुना था । 

शुरू शुरू में बाबूजी ने उनसे कहा भी कि “सिंह साहब अपने परिवार को यहाँ ले आइये ।“ वे हंसकर कहते “कहाँ कोकास साहब हम तो परदेसी हैं, नौकरी करेंगे और फिर अपने घर लौट जायेंगे ।“ बाबूजी कहते “ऐसा कोई जरुरी थोड़े ही है । देखिये हमारे दादा यू पी से मध्यप्रदेश आये थे और बैतूल में बस गए, हम महाराष्ट्र आ गये और यही भंडारा में बस जायेंगे ।“

परदेस यह शब्द मैंने पहली बार रामकुमार चाचा के मुँह से ही सुना था । मुझे आश्चर्य हुआ यह जानकर कि देश में भी कोई परदेश होता है । रामकुमार चाचा अक्सर कहते  .. “अरे हम कहाँ बसेंगे यहाँ । हमारे बच्चों को अपना गाँव छोड़कर बाहर अच्छा ही नहीं लगता।“ बाबूजी कहते “अरे लेकर तो आइये, यहाँ रहने लगेंगे तो अच्छा लगने लगेगा । “ लेकिन रामकुमार चाचा बाबूजी की बात  हंसकर टाल  देते ।

सत्तू 

रामकुमार सिंह चाचा साल में दो बार अपने गाँव जाते थे और लौटते समय वे वहां से ढेर सारा सत्तू और अचार लेकर आते । कभी कभी वे थोड़ा सा सत्तू हम लोगों के लिए भी लाया करते । ऐसे ही दिन बीत गए रामकुमार चाचा की नौकरी समाप्त हुई और वे अपने गाँव लौट गए । फिर उसके बाद उनकी कोई खबर नहीं मिली ।  

शरद कोकास 

99. भंडारा : क्यों कुछ लोग चाहते हैं कि दुनिया में सब लोग उन्ही के धर्म के हो जाएँ


बचपन में जब पहली बार ‘गंगा जमनी तहज़ीब’ यह शब्द सुना तो प्यारेलाल सर से पूछा “सर, इसका मतलब क्या होता है ? “ सर ने कहा “जिस संस्कृति में हिन्दू,मुसलमान सब धर्मों के लोग मिलकर एक साथ रहते हों, जहाँ हिन्दी,मराठी की तरह उर्दू व अन्य भाषाओं  को भी मान्यता दी जाती हो, वह गंगा जमनी तहज़ीब कहलाती है ৷” 

मैंने कहा “सर,लेकिन गंगा जमना तो दोनों हिन्दुओं की नदियाँ हैं ? इसमें एक नदी मुसलमानों या ईसाईयों की भी होना चाहिए ना ?“

  प्यारेलाल सर ज़ोर से हँसे “नदियाँ, ज़मीनें, सागर किसी एक धर्म के थोड़े ही होते हैं, सबका उन पर बराबर हक़ होता है ৷ “ मैं भारत,पाकिस्तान,चीन,अमेरिका,ईरान,ईराक के नक्शों से भरे एटलास में झांक कर  बराबरी की रेखा  ढूँढता रहता था फिर उसे न पाकर प्रयास छोड़ देता था ৷ 

अपने बड़े होते हुए शरीर की उपरी मंज़िल में स्थित मेरे साढ़े आठ सौ ग्राम के भेजे में केवल इतनी बात समा पाई कि जो भी हो , दुनिया के सब लोग बराबर हैं बाकी यह धर्म, राष्ट्रीयता वगैरह सब बेकार है ৷

अपने भंडारा शहर को  जब भी मैं देखता, मुझे गंगा जमनी तहज़ीब वाली सर की बातें बिलकुल सही लगतीं ৷ यह वह शहर था जहाँ भगवे और हरे झंडे एक साथ दिखाई देते थे, जहाँ  ईद,गुरुनानक जयन्ती और रामनवमी के जुलूस एक ही रास्ते से निकलते थे और उनमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख सभी समुदाय के लोगों द्वारा शर्बत बांटा जाता था  ৷ चर्च की घंटियाँ पुकारती थीं और अज़ान सुनकर लोग मस्जिद का रुख करते थे ৷ यहाँ कव्वालियों और मुशायरों में हिन्दी मराठी कविता के प्रेमी भी होते थे  और गणेशोत्सव, दुर्गा उत्सव में मुस्लिम भाई भी चंदा देते थे ৷ 

मुहर्रम माह की दसवीं तारीख आने के पहले कई गलियों में हरे झंडे दिखाई देने लगते ৷ हजरत पैगम्बर के नवासे इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाये जाने वाले मोहरम नामक इस पर्व में हम बच्चों की रूचि सबसे अधिक ताज़िए और सवारी देखने में होती थी  । 

ताजिये 

एक दिन स्कूल से लौटते हुए नईम के घर रुका तो मुनीर खान चचा ने बताया हिजरी सन इकसठ अर्थात ईसवी सन 680 में मोहरम माह की दसवी तारीख को बगदाद से 100 किलोमीटर उत्तर पूर्व में करबला नामक एक गाँव में हजरत इमाम हुसैन का उनके विरोधियों ने वध कर दिया था ৷ उन्हीं की याद में मुहर्रम मनाते हैं ৷

चचा ने बताया कि हजरत हुसैन और हसन की याद  में मोहरम माह के पाँचवे दिन यह सवारी बैठाई जाती है  और नवें दिन उठाई जाती है । मैंने देखा एक दिन कि मोहर्रम के जुलूस में काले कपडे पहने लोग नंगे बदन हा हुसैन हा हुसैन कहते हुए अपनी छाती पीट रहे हैं, उनकी छाती से उससे खून निकल रहा है ৷ 

मैंने नईम से कहा तुम भी तो मुसलमान हो तुम लोग जुलूस में नहीं जाते ? “नईम ने कहा “ नहीं, यह शिया लोग हैं यह इसी तरह मातम मनाते हैं ৷ हम लोग सुन्नी हैं इसलिए इसे नहीं मनाते ৷ मैंने पूछा “यह शिया सुन्नी क्या होता है ?” तो उसने कहा “हम लोग हज़रत पैगम्बर और इस्लाम में ईमान रखते हैं और शिया लोग पैगम्बर के दामाद उनके नवासे और उनकी फैमिली में विश्वास रखते हैं ৷”

बचपन के अपने उस साढ़े आठ सौ ग्राम के भेजे में यह बात भी नहीं आई, लेकिन गंगा जमनी शब्द के पेशे नज़र इतना ज़रूर समझ में आ गया कि जैसे गंगा को कहीं भागीरथी कहते हैं, कहीं मन्दाकिनी, कहीं हुगली वैसे ही मुसलमानों को कहीं शिया कहते हैं कहीं सुन्नी , बाकी हैं तो सब एक ही ৷ फिर बरसों बाद जब अपना वयस्क भेजा पूरे चौदह सौ ग्राम का हो गया एक दिन दुर्ग में अपने कवि मित्र नासिर अहमद सिकंदर से पूछा “यार तुम शिया हो या सुन्नी ?“नासिर भाई मुस्कुराए और उन्होंने जवाब में जनवादी शायर अकबर इलाहाबादी का शेर कहा .. 

“मेरा ईमान मुझसे क्या पूछती हो मुन्नी, 

शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी ৷”

क्षमा करें ..बचपन की गली से निकलकर जवानी की खुली सड़क पर आ गया था ৷ फिर चलते हैं भंडारा के देशबंधु वार्ड की उस पतली सी गली में जहाँ किराये के एक घर में हम रहते थे  ৷ गलियों के इस शहर में हमारी गली से आगे रिंग रोड पर रवि रेहपाड़े के घर के ठीक पीछे, पाटलिन बाई के घर की बगल में एक खाली जगह पर एक मंडप बनाया जाता था और वहाँ मुहर्रम माह के पाँचवे दिन यह सवारी रखी जाती थी जिसमें  मोरपंख का बना एक झाड़ू जैसा होता था, इसके अलावा चान्दी का एक पंजा भी जिसे अली का पंजा कहते थे । 

वह एक खुली जगह थी जहाँ बल्लियों पर लाल- हरे झंडे बन्धे रहते थे ৷ उन्ही बल्लियों पर बंधे ट्यूब लाइटों पर हरी पन्नी या ज़िलेटिन लगा दी जाती थी जिसके कारन सब ओर  हरी रोशनी दिखाई देती थी  । सवारी उठने वाले दिन वहाँ उपस्थित हरी या सफ़ेद पगड़ी बांधे हुए एक व्यक्ति वह सवारी  उठाता था । 

जब मुझे पता चला कि सवारी उठाने वाला वह व्यक्ति हिन्दू है तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ । पूछने पर ज्ञात हुआ  कि सवारी उठाने का पहला हक उसे ही मिलता है जो सबसे पहले मन्नत मानता है या जिसकी मन्नत पूरी होती है फिर चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम । पहले मुझे लगता था कि मोहरम में केवल मुस्लिम लोग ही शामिल रहते हैं लेकिन इस सवारी के आयोजन में पूरे हिन्दू ही दिखाई देते थे । सवारी निकलने के बाद वहाँ के हिन्दू घरों में उसकी पूजा होती थी । एक व्यक्ति ऊददान में लोबान जलाता रहता था और एक व्यक्ति मशाल लेकर चलता था । मशाल को वहाँ टेम्भा कहते थे जो खाने के तेल से जलाई जाती थी । 

सवारी उठाने वाला वह व्यक्ति एक अजीब सी बेख़याली में रहता था , कुछ ही देर में वह झूमने लगता , उसकी कमर से एक रस्सी बंधी होती थी जिसे लोग थामे रहते थे ৷ लोग कहते थे उस पर हाल आ रहे हैं .. वह जोर लगाकर आगे बढ़ता, उसकी ऑंखें लाल हो जातीं और वह अस्फुट सा बडबडाता रहता “हा हसन .. दूल्हा हसन, हा हसन, दूल्हा हसन ৷” मैं सोचता, वध तो पैगम्बर के नवासे हुसैन का किया गया था, यह हसन हसन क्यों कहता है ৷ 

फिर एक दिन चचा ने बताया कि हसन, हुसैन से बड़े भाई थे, लेकिन उनकी मृत्यु एक हादसे में हो गई थी ৷ कहते हैं कि शादी के वक्त जब वे दूल्हा बने हुए थे उनकी बीबी ने धोखे से उन्हें दूध में शीशा घोलकर पिला दिया था जिससे उनकी मौत हो गई थी ৷ यह षड्यंत्र यजीद ने किया था ৷ जब उनकी हत्या की गई वे दूल्हे के वेश में थे इसीलिये सवारी उठाते समय दूल्हा हसन पुकारते हैं ৷ 

मैं समझ गया मोहर्रम में यह जो मोरपंख से बनी फूलों से सजी पगड़ी जैसी सवारी लोग उठाते हैं वह दूल्हा बने हसन के सेहरे का ही प्रतीक है ৷ हाँ ताजिया ज़रूर हज़रत हुसैन की कब्र या मज़ार के प्रतीक के रूप में है ৷ इस तरह ग़मी  का यह त्यौहार दोनों भाइयों हसन हुसैन और उनके परिवार के बहत्तर लोगों की याद में मनाया जाता है ৷  

कितना सुन्दर दृश्य होता था उस जगह का जहाँ यह सवारी रखी जाती थी ৷ मिट्टी के एक बड़े से ऊददान में लाल लाल अंगारे सुलगते रहते थे৷ हर थोड़ी देर में एक आदमी गत्ते से उन अंगारों को हवा देता और उन पर लोबान छिड़क देता ৷ जलते हुए कोयलों से धुएँ के गहरे बादल उठते और मंडप की छत पर छा  जाते ৷ लोबान की खुशबू चरों ओर फ़ैल जाती ৷ लेकिन न जाने क्यों मुझे धुएँ के उस बादल में उन बेबस पुरुषों, स्त्रियों और दुधमुंहे शिशुओं  के चेहरे दिखाई देते जिन्हें ज़ालिम यजीद द्वारा मार डाला गया था ৷ 

अपनी उम्र की सीमा का अतिक्रमण कर मैं सोचने लगता, क्या धर्म का अर्थ वर्चस्व की लड़ाई है ? 

लोग अपने झूठे अहंकार, जातिगत अभिमान, सत्ता लोलुपता,झूठी शान या राजनीतिक प्रभुत्व को त्यागकर इन्सान की तरह क्यों नहीं रहते ? क्यों कुछ लोग चाहते हैं कि दुनिया में सब लोग उन्ही के धर्म के हो जाएँ ? क्या हासिल होता है उन्हें ऐसा करने से ? हर मनुष्य  को अपने विश्वासों के साथ जीने का अधिकार क्यों नहीं है ?    

लोबान के उस धुएँ में मुझे जाने कितने प्रश्न चिन्ह तैरते दिखाई देते थे, अंततः सोचना बंद कर अन्य आस्थावान लोगों की तरह मैं भी लोबान की गंध में खो जाता ৷ दरगाहों और मजारों पर जलने वाले लोबान की गंध श्रद्धा के वातावरण निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका ऐडा करती है ৷ मुझे भी यह गंध हमेशा से आकर्षित करती रही है ৷ 

अक्सर मैं देखता था कि भंडारा में कशकोल लिए हरा चोला पहने एक फ़कीर अपने ऊददान में जलते हुए अंगारे लिए घरों और दुकानों में जाते थे  और उन दहकते अंगारों पर लोबान छिड़कते थे  ৷ लोबान के धुएँ से उठती खुशबू मुझे अलीबाबा और मरजीना के देश में ले जाती थी ৷ मुझे उस धुएँ में सफ़ेद परिधान पहने पंख लगाकर उड़ती हुई परियों की छवि दिखाई देती थी ৷  

मोहरम के अंतिम यनि दसवें दिन एक जुलूस की शक्ल में हजरत हुसैन की मज़ार के प्रतीक ताज़िए निकाले जाते थे ৷ इन ताज़ियों को देखकर मुझे दिवाली पर बनाये कागज़ के और मिट्टी के किलों की याद आती थी ৷ मैं हर बार सोचता कि दिवाली पर ताज़िए की तरह एक किला  बनाऊंगा ৷ हालाँकि ऐसा किला मैं कभी नहीं बना पाया ৷ बचपन बहुत अधिक वक्त नहीं देता है जितनी जल्दी आता है, उतनी जल्दी चला भी जाता है ৷ इसीलिये तो मैं बच्चों से कहता हूँ बचपन को भरपूर जी लो वर्ना फिर यह बचपन लौटकर कभी नहीं आएगा ৷


शरद कोकास