‘खइके पान बनारस वाला’ गाते हुए, गंगा किनारे वाले छोरे के संग घुटन्नी धोती और कुर्ता पहने, ढोलक बजा कर मुंबई की एक पुरानी बस्ती में किसी चाल के परिसर में ठंडाई की तरंग में नाचते हुए लोग आपको याद होंगे । महाराष्ट्र की मुंबई नगरी आज़ादी के काफी पहले से ही उत्तर भारत के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी । बनारस और पटना से आने वाली ट्रेने मुंबई के विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पर जैसे ही ठहरती सर पर गठरी लादे, अपनी धोती कमीज सहेजते, लोगों का झुण्ड रेल से उतरता । स्टेशन के बाहर काली पीली टैक्सी चलाते हुए उन्हें अपने ही गाँव जवार के लोग मिल जाते । यह टैक्सीयां उन्हें उन बस्तियों की ओर ले जातीं जहाँ कोयले की आँच में लिट्टी सिंक रही होती और आलू के चोखे और बैंगन के भरते की गंध वातावरण में विद्यमान होती ।
मुंबई के जी पी ओ से रोज़ ढेरों पोस्टकार्ड निकलते जिनमे इनके दुःख सुख के समाचारों के साथ मुंबई शहर की चकाचौंध और रोजगार के अवसरों का वर्णन होता जिन्हें पढ़कर फिर उनके बन्धु बांधव भी इन्ही ट्रेनों में सवार होते और मुंबई पहुँच जाते । मुंबई शहर तो जैसे माँ की गोद था जहाँ उन्हें पनाह मिलती, ढेर सारी कपड़ा मिलों, रसायनों और फूड प्रोडक्ट्स के कारखानों के मस्टर रोल में मजदूरों की सूची में उनका नाम लिख लिया जाता और फिर यह सिलसिला चलता रहता ।
यह केवल मुंबई शहर में ही नहीं हो रहा था मध्य प्रान्त के बड़े शहरों और मंझोले शहरों और कस्बों में भी यू पी बिहार के लोग आ रहे थे । इनमे बिना पढ़े लिखे लोगों से लेकर अच्छे पढ़े लिखे लोग भी शामिल थे । और केवल यू पी बिहार के ही नहीं राजस्थान , पंजाब, हरियाणा, के लोग भी काफी संख्या में यहाँ आ आकर बस रहे थे जिनमे हिन्दू भी थे मुसलमान भी, सवर्ण भी और दलित भी । यह लोग मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे थे जो आगे चलकर इसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए दुनिया में अपना स्थान बनाने वाला था ।
दरअसल यह दुनिया भी ऐसे ही बसी थी । लाखों साल पहले जब इन्सान ने इस धरती पर जन्म लिया वह एक जगह ठहरा ही कहाँ । समुद्र जब आपस में जुड़े थे और उनके पैदल चलने के लिए रास्ते ही रास्ते थे । कहीं भी जन्म लेने वाला इंसान कहीं भी जा सकता था, न उसे पासपोर्ट की जरुरत थी न वीज़ा की ।
लेकिन यह दौर अधिक समय तक नहीं चला । हम धीरे धीरे सभ्य होते गए । धीरे धीरे हमने इस धरती को बाँट लिया । धीरे धीरे हम अपनी संकुचित जगहों में और संकुचित दिमागों में सिमटते गए । हमने अपने आप ही तय कर लिया कि यह हमारा देश, यह हमारे लोग, हम यहाँ के मूल निवासी, यह हमारा धर्म और फिर एक दिन हमने एक फरमान जारी कर दिया.. हमारे अलावा बाकी के सब लोग यहाँ से चले जाएँ यह सिर्फ और सिर्फ हमारा देश है।
हँसिये मत, यह सिलसिला अभी थमा नहीं है , ‘यह हमारा देश’ अब धीरे धीरे ‘यह हमारा राज्य’ में बदलने लगा है । इसे ‘यह हमारा शहर’, ‘यह हमारा गाँव’ ,‘यह हमारा मोहल्ला’ में बदलने में देर नहीं लगेगी । और जिस दिन ‘यह हमारा घर’ में तब्दील हो जायेगा, दम तोड़ती मानवता उसी दिन आत्महत्या कर लेगी ।
दरअसल मैं भंडारा के डॉ. रामकुमार सिंह के बारे में लिखना चाहता था और इतना सब लिख गया । रामकुमार चाचा बिहार से भंडारा आए थे पचास के दशक में स्थानीय जे एम पटेल कॉलेज में नौकरी करने । वे हिन्दी के प्राध्यापक थे । अपने रिटायर होने की उम्र तक वे भंडारा में एक कमरा लेकर रहे, खुद ही खाना पकाते थे और कपड़े धोते थे । वे अक्सर हमारे घर आ जाया करते और बाबूजी के साथ हिन्दी साहित्य पर चर्चा करते फिर जाने कब बातें करते करते उत्तर प्रदेश और बिहार पहुँच जाते । लिट्टी चोखा के बारे में पहली बार उन्ही से सुना था ।
शुरू शुरू में बाबूजी ने उनसे कहा भी कि “सिंह साहब अपने परिवार को यहाँ ले आइये ।“ वे हंसकर कहते “कहाँ कोकास साहब हम तो परदेसी हैं, नौकरी करेंगे और फिर अपने घर लौट जायेंगे ।“ बाबूजी कहते “ऐसा कोई जरुरी थोड़े ही है । देखिये हमारे दादा यू पी से मध्यप्रदेश आये थे और बैतूल में बस गए, हम महाराष्ट्र आ गये और यही भंडारा में बस जायेंगे ।“
परदेस यह शब्द मैंने पहली बार रामकुमार चाचा के मुँह से ही सुना था । मुझे आश्चर्य हुआ यह जानकर कि देश में भी कोई परदेश होता है । रामकुमार चाचा अक्सर कहते .. “अरे हम कहाँ बसेंगे यहाँ । हमारे बच्चों को अपना गाँव छोड़कर बाहर अच्छा ही नहीं लगता।“ बाबूजी कहते “अरे लेकर तो आइये, यहाँ रहने लगेंगे तो अच्छा लगने लगेगा । “ लेकिन रामकुमार चाचा बाबूजी की बात हंसकर टाल देते ।
रामकुमार सिंह चाचा साल में दो बार अपने गाँव जाते थे और लौटते समय वे वहां से ढेर सारा सत्तू और अचार लेकर आते । कभी कभी वे थोड़ा सा सत्तू हम लोगों के लिए भी लाया करते । ऐसे ही दिन बीत गए रामकुमार चाचा की नौकरी समाप्त हुई और वे अपने गाँव लौट गए । फिर उसके बाद उनकी कोई खबर नहीं मिली ।
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