“यार यह डॉक्टर हैं फिर भी स्कूल में पढ़ाते हैं ?” मैंने स्कॉट से पूछा “ अरे वो मेडिकल वाले डॉक्टर थोड़े ही हैं.. पी एच डी हैं । पी एच डी नहीं जानते ?” “जानता हूँ भाई, अच्छी तरह से जानता हूँ , पी एच डी यानी डॉक्टर ऑफ़ फिलोसोफी ।“ स्कॉट को पता नहीं था मेरा आई क्यू और जी के उससे अधिक है ।
“मैं तो इसलिए पूछ रहा हूँ कि हिन्दी में पी एच डी होने के होने के बावजूद डॉ. नरेशचन्द्र पशीने सर स्कूल में पढ़ाते हैं ,उन्हें तो कॉलेज में हिन्दी के प्रोफ़ेसर की नौकरी मिल सकती है ?“ “अब यह तो नहीं पता भाई .. यह उनका प्राइवेट मैटर है।“ स्कॉट ने अनभिज्ञ बनते हुए कहा ।
उन दिनों पी एच डी होना बहुत बड़ी बात थी । पूरे शहर में मुश्किल से किसी विषय में दो-तीन पी एच डी ही मिलते थे और वे भी महाविद्यालय में अच्छे अच्छे पदों पर पदस्थ होते थे । ऐसे में मुझे पशीने सर का भंडारा जैसे छोटे शहर के नगर पालिका के हाई स्कूल में टीचर की नौकरी करना बहुत अजीब लगता था । सोचता था, कभी उनसे पूछूँगा कि उन्होंने भंडारा के एकमात्र आर्ट्स कॉलेज में नौकरी क्यों नहीं की ? लेकिन कभी उनसे यह सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई । स्कॉट की बात याद आ जाती थी ..यह उनका प्राइवेट मैटर है ।
गोरा रंग , कंजी कंजी आँखें, घुंघराले बाल, सफ़ेद कुर्ता और पायजामा, पांवों में कोल्हापुरी चप्पल, पूरा सुदर्शन व्यक्तित्व था पशीने सर का । वे अक्सर पैदल ही स्कूल आया करते थे , कभी कभार पेंट शर्ट पहनकर साईकिल पर पैडल मारते हुए भी दिखाई देते । अब भंडारा शहर था ही कितना बड़ा । चलना शुरू करते ही ख़त्म हो जाता था ।
उस समय पशीने सर की उम्र पैंतीस- चालीस के आसपास रही होगी । एक दिन मुझे पता चला कि उन्होंने विवाह नहीं किया है । इस उम्र तक किसी पुरुष का विवाह न करना भी उन दिनों अजीब बात थी । उनकी पहले वाली अजीब बात में यह बात भी जुड़ गई । पहली बात की तरह यह भी उनसे पूछना आसान नहीं था उनके अविवाहित रहने की बात तो बिलकुल भी नहीं । वैसे भी हम लोग बच्चे थे हमें इन बातों से कोई मतलब नहीं होता था ।
लेकिन हमारी क्लास के बड़ी उम्र के लड़के उनकी इसी बात को लेकर पीठ पीछे उनका मजाक उड़ाया करते। कोई कहता किसी ने उन्हें प्रेम में धोखा दिया है । कोई कहता अब तो उनकी उम्र भी निकल गई, अब विवाह करके भी क्या करेंगे । मुझे पशीने सर इतने अच्छे लगते थे कि मैं लड़कों से उनके लिए झगड़ लेता, लेकिन फिर लड़के मेरा ही मजाक उड़ाने लगते .. “ लगा रह , तुझे ही गोद ले लेंगे वो एक दिन ।“ मेरी हिंदी उन लोगों से कहीं ज्यादा अच्छी थी मुझे पता था सब मुझसे जलते थे इसलिए ऐसा कहते थे ।
एक दिन पशीने सर क्लास में आये और आते ही उन्होंने बोर्ड पर लिखा ‘ गया गया गया ‘ टेबल पर चॉक रखी और सबसे कहा चलो इसका मतलब बताओ । एक लड़का खड़ा हुआ .. “ सर यह तो क्रिया है, गया लेकिन आपने इसे तीन बार लिखा है ।“ पशीने सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ बैठ जाओ” फिर मेरी और इशारा करके कहा “अच्छा शरद तुम बताओ ।“ इतनी देर में मेरा दिमाग काम कर गया था । मैंने कहा “ गया नामका लड़का गया नामके शहर में गया ।“ पशीने सर ने कहा “शाब्बास बिलकुल सही ।“ लेकिन मैंने उनके ‘बैठ जाओ’ कहने से पहले ही मैंने पूछ लिया “सर लेकिन गया क्यों गया था ?” पशीने सर ने मुस्कुराते हुए कहा “ गया कोई किसलिए जाता है ..गया होगा भाई किसीका पिंडदान करने ।“फिर कहा “तुममे लेखक बनने के पूरे गुण हैं।“उन्हें पता था मैं बच्चों के पन्ने पर अखबार में एक कहानी लिख चुका हूँ।
यह वे दिन थे जब स्कूलों में जादू का खेल दिखाने वाले, गाना गाकर भीख मांगने वाले, बच्चों की कॉपी किताब, या खिलौने बेचने वाले निसंकोच आ जाया करते थे । एक दिन जब क्लास चल रही थी एक बारह तेरह साल की सांवली सी लड़की एक फटी पुरानी फ्रॉक पहने दरवाज़े पर आ खड़ी हुई । पशीने सर ने उससे पूछा “क्या बात है?” उस लड़की ने कुछ नहीं कहा, उसके पास रंगीन कागज के छपे हुए कुछ पैम्पलेट्स थे, उसने एक पर्चा सर के सामने रख दिया । सर ने उसे सस्वर पढ़ना शुरू किया .. “आई एम अ पुअर गर्ल, आई हैव कम फ्रॉम असाम, आवर हाउस हैस बीन वाश्ड अवे इन फ्लड, वी हैव नथिंग टू ईट, प्लीज़ हेल्प अस ।“
परचा पढ़ कर सर ने कहा “बट यू डज़न्ट सीम टू बी फ्रॉम आसाम । मराठी आती है ?” लड़की ने एक बार ‘हाँ’ में फिर तुरंत ‘ना’ में सर हिलाया । सर ने उसे परचा लौटाते हुए कहा “मुझे पता है तुम यहीं की हो ..खैर अब जाओ । तुम्हे कुछ नहीं मिलेगा ।“ फिर हम लोगों से मुखातिब होकर उन्होंने कहा “यू नो, बेगरी इस ऐन आर्ट इन इण्डिया, सच पीपल आर ओफेन फाउंड इन ट्रेन्स, आल दोज़ पीपल आर फ्रॉड ” हम बच्चे हिन्दी पढ़ाने वाले पशीने सर को इस तरह अंग्रेज़ी बोलते देखकर अभिभूत हो रहे थे ।
महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद,माखनलाल चतुर्वेदी, सुमित्रानंदन पन्त, अज्ञेय, सुभद्राकुमारी चौहान ,जैसे हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकारों के नामों से मेरा परिचय तो बाबूजी ने घर में ही करवा दिया था लेकिन उनकी रचनाओं से परिचय पशीने सर ने करवाया । सर किसी भी पद्यांश को इतनी अच्छी तरह हमें समझाते थे कि सम्पूर्ण दृश्य आँखों के सामने साकार हो उठता था ।
पशीने सर कभी कभार हमारे घर भी आया करते थे । बाबूजी उनके हमउम्र थे और हिंदी साहित्य में परास्नातक होने के कारण उनके साहित्यिक मित्र भी । दोनों काफी देर बैठकर साहित्य चर्चा किया करते थे । मैं चुपचाप कहीं आसपास बैठ जाया करता और ‘बड़ों के बीच नहीं बैठते’ जैसे वर्जित कामों के संस्कार के बावजूद उन लोगों की बातें सुना करता । बड़े यदि सार्थक चर्चा कर रहे हों तो उनकी बातें सुनने से ज्ञान प्राप्त होता है यह ज्ञान मुझे बचपन में ही प्राप्त हो गया था । कभी कभी पशीने सर बाबूजी को ‘तू’ कहकर संबोधित करते थे । मुझे यह बड़ा अटपटा सा लगता इसलिए कि इस तरह बाबूजी को संबोधित करते मैंने किसी को नहीं सुना था, उनके बड़े भाई भी उन्हें तुम कहते थे ।
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