हफ़ीज़ खान मास्साब कहते थे “हिस्ट्री ज्याग्रफी बड़ी बेवफ़ा रात को रटो दिन को सफा। ” स्कूल के उन दिनों में हम इतने बड़े तो हो गए थे कि वफ़ा और बेवफ़ा का फर्क हमें मालूम था । वैसे भी मुकेश का गाया गीत “वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए” उन दिनों रेडियो पर खूब बजता था, तो हमने सोचा कि बेवफ़ा से क्या दिल लगाना सो हम कुछ छात्रों ने हाईस्कूल में आर्ट्स के बदले साइंस ले लिया ।
हालाँकि साइंस की क्लास में हम लोग अल्पसंख्यक थे । पहले ही दिन जब फिजिक्स केमेस्ट्री मैथ्स की क्लास में एक भी लड़की नहीं दिखाई दी तो क्षण भर के लिए लगा कि कहीं गलत डिसीजन तो नहीं ले लिया? लेकिन फिर अपना विशिष्टता बोध उस भाव पर हावी हो गया कि साइंस तो दिमाग वाले लोग पढ़ते हैं । वैसे भी भाषा की क्लासेस तो सबकी साथ ही होती थी ।
पहले ही दिन ढगे सर की फिज़िक्स की क्लास थी । ढगे सर सीधे सादे से थे । दुबली पतली काया, एक ढीली ढाली शर्ट और पैरों में चमड़े की चप्पलें , लेकिन बहुत बढ़िया पढ़ाते थे । पहले ही दिन उन्होंने कहा आज हम फिजिक्स का इतिहास पढेंगे । ओ माँ... यहाँ भी इतिहास पढ़ना है । लेकिन साइंटिस्ट का इतिहास राजाओं के इतिहास से बेहतर था । राजाओं का इतिहास पढने से भले राजा बनने की प्रेरणा न मिले लेकिन वैज्ञानिकों का इतिहास वैज्ञानिक बनने के लिए प्रेरित करता था । धीरे धीरे थोडा थोडा इंटरेस्ट आने लगा ।
केमिस्ट्री के ढवले सर अच्छे ऊंचे पूरे थे और धोती कमीज पहनकर साइकिल चलाते हुए स्कूल आया करते थे। उनके पास एक झोला रहता था जिसमे केमिस्ट्री की एक फटी पुरानी किताब होती थी । वे हफीज खान सर के बिलकुल विपरीत थे, हफीज खान सर को किताबों की जरुरत नहीं पड़ती थी और ढवले सर बिना किताब के पढ़ा ही नहीं सकते थे ।
यह रहस्य हमें तब पता चला जब एक दिन वे अपना झोला लेकर नहीं आये । हमारी कक्षा के खुराफाती छात्रों को आईडिया मिल गया । जिस दिन हमे केमिस्ट्री पढ़ने की इच्छा नहीं होती हम उनका झोला लैब में कहीं छुपा देते । बस वे पूरे टाइम अपना झोला ढूँढते रहते और हम लोगों की छुट्टी हो जाती । लेकिन एक दिन हम लोगों की पोल खुल गई फिर तो ऐसी डांट पडी कि पढाई और मस्ती के सारे समीकरण बिगड़ गए ।
गणित वाले उके सर बहुत टिपटॉप रहते थे । बाकायदा आयरन की गई शर्ट और क्रीज वाली पेंट । वे एक हाथ पीछे पीठ की ओर रख लेते और बोर्ड पर गणित का सवाल हल कर देते । फिर कहते अच्छा तो यह तुम लोगों की समझ में आ गया होगा, इसे कॉपी में उतार लो । उनके इन दोनों वाक्यों के बीच में कोई गैप नहीं रहता था सो हम लोग भी बिना गणित समझे गुरु की आज्ञा मानकर चुपचाप सवाल कॉपी में उतार लेते ।
लेकिन इन सब मस्तियों, और अरुचि का असर यह हुआ कि हम लोग सभी विषयों में कमजोर रह गए । आगे चलकर जिसकी परिणति कई छात्रों द्वारा साइंस से आर्ट ले लेने में हुई । मेरा हाल मत पूछो , जिसे मैं बेवफा समझता था उसी हिस्ट्री ने पोस्ट ग्रेजुएशन लेवल तक मेरा साथ निभाया और आज भी निभा रही है ।
जीवन में तरह तरह के गुरु मिलते हैं जिनके तरह तरह के छात्र होते हैं । मेरे लिए आज उन गुरुजनों को याद करना इसलिये जरुरी है कि विज्ञान पढ़ाने के बहाने उन्होंने मुझमे वैज्ञानिक चेतना का बीजारोपण किया ।
लेकिन इस बारे में मेरा अपना मत है कि केवल विज्ञान पढ़ लेने से हम में वैज्ञानिक चेतना नहीं आ जाती उसे सायास अपने भीतर लाना होता है । वर्ना हम सारी जिन्दगी एक और विज्ञान को मानते हैं , विज्ञान के प्रयोग करते रहते हैं ,नए नए वैज्ञानिक अविष्कार करते हैं दूसरी ओर अंधविश्वासों में घिरे रहते हैं । हमारे मस्तिष्क में यह दोहरी प्रणाली किस तरह चलती है इस पर बात फिर कभी ।
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