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10 जून 2026

154. भंडारा : भगवान की माँ उन्हें कौनसी कहानी सुनाती थी

चिकित्सा विज्ञान आज बहुत आगे बढ़ चुका है हर मर्ज के लिए किसिम किसिम की दवाएँ मौजूद हैं लेकिन आज तक नींद की गोलियाँ बनाने वाली दवा कम्पनियाँ ऐसी दवा नहीं बना सकी जिसमे बिस्तर पर लेटकर माँ से कहानी सुनकर सुला देने जैसी तासीर हो ।

बचपन के उन बिस्तरों पर तकिया पर सर रखने के बावजूद तब तक नींद नहीं आती थी जब तक माँ कोई कहानी नहीं सुना देती थी । जाने कितनी पुराण कथाएँ कितने किस्से माँ को याद थे । दिवाली के बाद जब ठण्ड आने लगती, एकादशी के दिन से विवाह प्रारम्भ हो जाने की घोषणा के साथ माँ कहती अब चार महीने की नींद के बाद ग्यारस के दिन भगवान जागेंगे और तुलसी विवाह के साथ शादी ब्याह शुरू हो जायेंगे । 

मैंने माँ से कहा माँ,तुम हमें कहानी सुनाती हो तो हम रात भर के लिए सो जाते हैं और सुबह जाग जाते हैं, भगवान की माँ उन्हें ऐसी कौनसी कहानी सुनाती है जिसे सुनकर वे चार महीने के लिये सो जाते हैं ? और यह कहानी कब सुनाती है ? 

माँ हँसकर कहती “ जैसे ही बरसात शुरू होती है देवशयनी एकादशी आती है भगवान की माँ उन्हें इसी दिन कहानी सुनाती है, जिसे सुनकर वे चार महीने के लिए सो जाते हैं ।“ “लेकिन वह कहानी है कौनसी ?“ माँ जानती थी, बच्चा ज़िद्दी है मानेगा नहीं । 

माँ ने कहा “अब यह तो पता नहीं कि वे उन्हें कौनसी कहानी सुनाती है लेकिन मैं तुम्हे तुलसी विवाह की कहानी सुनाती हूँ । “

“हाँ सुनाओ ना माँ “ इतना कहकर मैंने माँ की गोद में अपना सर रख दिया । माँ ने प्यार से मेरे बालों में उंगलियाँ घुमाई और कहा “तो सुनो । जालंधर नाम का एक राक्षस था जिसे शिवजी से वरदान प्राप्त था । उसका विवाह वृंदा से हुआ था । एक बार वह शिवाजी के कैलाश पर्वत पर पहुँच गया और उसने पार्वती देवी पर बुरी नजर डाली ।“

“बुरी नज़र माने ?” मैंने उचक कर सवाल पूछा ।माँ थोड़ा हिचकिचाई “मतलब वो माता पार्वती को परेशान करना चाहता था । अच्छा सुनो बीच में मत बोलो नहीं तो हम भूल जायेंगे ।“ मुझे पता था माँ भूलेगी बिलकुल नहीं फिर भी मैं चुप रहा । 

माँ ने मुस्कुराकर कहा “फिर शिवजी को गुस्सा आया । वे उसे भस्म कर देना चाहते थे लेकिन उन्हें पता चला कि  वृंदा अपने पति की इतनी भक्ति करती है कि कोई उसके पति का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्होंने विष्णु जी से सलाह की । विष्णु जी को एक उपाय सूझा, वे ऋषि का वेष धारण कर वृंदा के पास गए और उससे कहा कि जालंधर की शिवजी से लड़ाई हो गई है और वह मारा गया है , यह सुनकर वृंदा मूर्छित हो गई । लेकिन जैसे ही उसे होश आया उसने ऋषि से प्रार्थना की कि  वे उसके पति को जीवित कर दे ।“  

मुझे टेक्निकली कहानी समझने में थोड़ी दिक्कत हो रही थी फिर भी मैं चुप रहा । माँ ने कहना जारी रखा “विष्णु जी ने फिर जालंधर का रूप धर लिया । वृंदा ने जैसे ही जालंधर बने विष्णु को अपना पति माना उसकी पवित्रता नष्ट हो गई और उधर सचमुच का जालंधर मारा गया । लेकिन जैसे ही वृंदा को असलियत मालूम पडी कि यह उसका पति नहीं बल्कि विष्णु है उसने विष्णु को शाप दे दिया कि तुम पत्थर बन जाओगे और मेरे पैरों के पास पड़े रहोगे । फिर उसने खुद को भी नष्ट कर दिया और वह खुद एक पौधा हो गयी और तुलसी कहलाई । इसीलिए तुलसी के पास जो गोल गोल पत्थर या शालिग्राम पड़ा रहता है वह विष्णु ही है । इसीलिए हर साल एकादशी पर तुलसी का विवाह विष्णु से करवाया जाता है ।

सवाली राम के दिमाग में सवाल आया “ लेकिन माँ ,उसका पति तो जालंधर था ना फिर उसका विवाह जालंधर से क्यों नहीं करते ? विष्णु ने तो उसे धोखा दिया था ?” माँ ने कहा “ अरे वह राक्षस था न , दोबारा उसका विवाह राक्षस से क्यों करते और विष्णु जी तो भगवान थे इसलिए उसका विवाह भगवान के साथ करते हैं ।“

कहानी बहुत ऊबाऊ थी और पेचीदा भी, लेकिन अपनी विधा में थी तो कहानी ही और फिर माँ ने सुनाई थी, और कोई सुनाता था बहस कर लेता अब माँ से क्या बहस करना यह सोचकर चुपचाप सो गया । 

वे बचपन के दिन थे उन दिनों सुनी गई कहानियों में रोचकता प्रमुख तत्व होता था , अचानक इंसान की जगह बन्दर का प्रकट होना, धड का सर से जुड़ जाना, रूप बदलकर इंसान से गधा हो जाना  जैसे चमत्कारों की बातें सुनाने में मजा आता था । हालाँकि बच्चे सवाल पूछते हैं लेकिन माँ बाप उनके सही सही जवाब कहाँ देते हैं । बड़े होकर बच्चे सवाल पूछना भूल जाते हैं और फिर अपने बच्चों को वही काल्पनिक कथाएं सुनाते हैं । वे भी अपने बच्चों को उनके सवालों के सही जवाब नहीं देते । ऐसा पीढी दर पीढी चलता रहता है ।

मैं भी सवाल पूछना छोड़कर तुलसी विवाह वाले दिन की राह देखने लगता । उस दिन बाबूजी बाजार से गन्ने लेकर आते तुलसी वाले गमले के चारों ओर उन्हें खड़ा कर विवाह मंडप बनाया जाता, फिर श्लोक पढ़कर उनकी शादी की जाती । महाराष्ट में यह शादी बिलकुल पारम्परिक तरीके से होती है उसी तरीके से जैसे वर वधु का विवाह होता है । वर शालिग्राम और वधु तुलसी के पौधे के बीच एक वस्त्र जिसे अंतरपट कहते हैं रखा जाता और फिर मंगलाष्टक गाये जाते हैं । पाँच मंगलाष्टक के पश्चात ‘कुर्यात सदा मंगलम’ कहकर विवाह सम्पन्न हुआ ऐसा माना जाता । मुझे मंगलाष्टक गाने में बहुत मज़ा आता था इसलिए तुलसी विवाह के दिन मेरी काफी डिमांड होती थी ।

बचपन में माँ से जिन सवालों को पूछने का मौका नहीं मिला वे सवाल मैंने बड़े होकर अपने गुरूजी से पूछे,  जैसे इन कहानियों में राक्षस हमेशा बुरे क्यों होते हैं ? ऐसा क्यों कहा जाता है की वे देवियों पर बुरी नजर डालते हैं ? जब वे इतने ख़राब है तो फिर देवता उन्हें कभी न मरने का वरदान क्यों देते हैं ? और फिर उसके बाद षड्यंत्र करके उन्हें क्यों मार देते हैं ? ऐसा है तो वरदान देना ही नहीं चाहिए था ना ? फिर देवता ऐसे क्यों होते हैं कि  वे किसी के साथ भी कुछ भी कर सकते हैं ? विष्णुजी  को क्या और कोई तरीका नहीं आता था जालंधर को मारने का ? 

गुरूजी ध्यान से मेरे सवाल सुनते और कहते “बेटा यह सब कहानियां है, इन्हें कहानियों की तरह ही देखो, श्रद्धापूर्वक इनमे विश्वास करो और खुश रहो । “ खैर, मैंने उस समय भी गुरूजी की बात नहीं मानी और अपने सवालों के जवाब ढूँढता रहा । यह क्रम आज भी जारी है ।    

ऐसे ही दिवाली का त्योहार होता था । शुरू शुरू में तो हम लोग हर दिवाली पर बैतूल पहुंच जाया करते थे । लेकिन बाद में हम लोगों की और बाबूजी की छुट्टियों में तालमेल न होने के कारण बैतूल जाना बन्द हो गया । हालाँकि बैतूल की दिवाली में ज़्यादा मज़ा आता था । वहाँ पुराने घर में दादाभैया के कमरे में यह पूजा होती थी । सबसे पहले बापू , फिर उनके छोटे भाई , फिर दादा भैया , फिर उनके छोटे भाई और फिर हम लोगों की पीढ़ी के बच्चे । इस तरह सीनियरटी के अनुसार सबको पूजा करते देखने का भी अपना अलग आनन्द था । उसके बादा पटाखे , धूम्धाम खाना पीना आदि । वैसे ही उसके बाद गोवर्धन पूजा का भी आनंद आता था ।

शरद कोकास 

 



143. भंडारा : भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना

उन दिनों प्रत्येक पर्व के आगमन से पूर्व अखबार एवं पत्रिकाएँ कवर स्टोरी के रूप में उस पर्व से जुड़ी पौराणिक कहानियाँ अवश्य प्रस्तुत करते थे ৷ फलां फलां अभिनेत्री ने दिवाली कैसे मनाई या होली कैसे मनाई यह छापने का चलन भी प्रारंभ हो चुका था ৷ यद्यपि किसी अभिनेता या अभिनेत्री ने राखी कैसे मनाई यह कभी नहीं बताया जाता था ৷ शायद फ़िल्मी दुनिया में भाई बहन के सम्बन्ध बताना व्यावसायिक दृष्टि से उचित नहीं होता होगा ৷ अतः राखी का महत्त्व जानने हेतु हम लोग केवल पौराणिक कहानियों पर ही निर्भर रहते थे ৷

मेवाड़ की रानी कर्णावती द्वारा मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजने और भाई बनाने की प्रसिद्ध कथा है । 


इस कथा के अलावा पहली पौराणिक कथा जो मैंने रक्षाबंधन के महत्व पर सुनी वह इंद्र और शची की कथा थी ৷  इस  कथा के अनुसार एक बार जब राजा इंद्र व्रतासुर का वध करने जा रहे थे तो उनकी पत्नी देवी शची ने अपने पति की रक्षा हेतु उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधे थे ৷ इस ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंग से जुड़े मुख्य विवरण इस प्रकार हैं । देवराज इंद्र और असुर वृत्रासुर के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था, जिसमें असुरों की शक्ति लगातार बढ़ रही थी और देवता हार की कगार पर थे । हताश होकर इंद्र जब अपने गुरु बृहस्पति के पास गए, तो उन्होंने विजय प्राप्त करने और प्राणों की रक्षा के लिए श्रावण पूर्णिमा पर कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधने का सुझाव दिया। गुरु के निर्देश पर, इंद्र की पत्नी देवी शची (इंद्राणी) ने अपने तपोबल और वैदिक मंत्रों से एक पवित्र रक्षासूत्र (राखी) अभिमंत्रित किया और उसे देवराज इंद्र की दाहिनी कलाई पर बांधा । इस रक्षा-सूत्र के प्रभाव और शची की प्रार्थना से इंद्र में अद्भुत साहस और बल का संचार हुआ। वे युद्ध के मैदान में उतरे और वृत्रासुर का वध करके स्वर्ग पर पुनः अपना अधिकार प्राप्त कर लिया । 

यह कथा जानने के पश्चात अपना यह कांसेप्ट समाप्त हो गया कि केवल बहन ही भाई को राखी बांध सकती है ৷

दूसरी कथा में मैंने पढ़ा कि तीन पग में धरती नापने के पश्चात


जब राजा बलि अतिथि के रूप में विष्णु को अपने साथ पाताल ले गए और बहुत दिनों तक उन्हें आने नहीं दिया तो लक्ष्मीजी उनके अपहरण की आशंका से चिंतित हो उठीं ৷ फिर उन्होंने नारद मुनि की सलाह पर राजा बलि को राखी बांधी और उपहार में अपने पति को मांग लिया ৷ यहाँ दूसरा कांसेप्ट यह बना कि  राखी बांधने वाला अपनी मनचाही वस्तु उपहार में मांग सकता है ৷

तीसरी कथा जो मैंने पढी थी वह सबसे इंटरेस्टिंग थी ৷ इस कथा में शिशुपाल वध के समय कृष्ण का हाथ ज़ख्मी हो जाता है तब द्रौपदी अपनी साड़ी से एक टुकड़ा फाड़कर उनके हाथ पर बांध देती है ৷ इस टुकड़े को राखी का प्रतीक माना जाता है ৷ इसके प्रतिदान स्वरूप श्रीकृष्ण चीरहरण के समय द्रौपदी की रक्षा करते हैं ৷ वैसे महाभारत के पूरे आख्यान में मुझे द्रौपदी और कृष्ण भाई बहन की तरह नहीं अपितु मित्र की तरह लगते हैं ৷ यहाँ मेरा कांसेप्ट यह बना कि रिश्ते में भले कोई भाई बहन हों और उनकी उम्र में चाहे जितना अंतर हो उन्हें हमेशा मित्रवत ही व्यवहार करना चाहिए ৷ 

कृष्ण और द्रौपदी 

अपने युवा मित्रों से बात करते हुए जब मैं विभिन्न सभ्यताओं की पौराणिक कहानियाँ उन्हें बताता हूँ  तो वे कहते हैं यह सब झूठ है, ऐसा कभी हुआ ही नहीं, न कहीं कोई स्वर्ग है न पाताल है ৷ मैं उनके इतिहास बोध पर किसी प्रकार का संदेह न करते हुए उनसे केवल इतना कहता हूँ कि बावजूद इसके हमें विश्व की विभिन्न सभ्यताओं की माइथोलॉजी जानना आवश्यक है ৷ केवल भारत की ही नहीं अपितु ग्रीस, रोम , मेसोपोटामिया, चाइना इत्यादि सभ्यताओं  की माइथोलॉजी भी हमें ज्ञात होनी चाहिए ৷ इसके अलावा बुद्धिस्ट, इस्लामिक,ख्रिश्चेनिटी,इत्यादि की माइथोलॉजी जानना भी आवश्यक है ৷ अगर हमें माइथोलॉजी नहीं पता है तो हम बहुत सारी कविताओं, कहानियों और उपन्यासों का आनंद नहीं ले पाएंगे ৷ अगर कहीं  ‘एकीलिस की एड़ी’ या ‘ट्रॉय का घोड़ा’ जैसा शब्द आ गया तो हम कहेंगे “ यह क्या बला है ?” 

‘बैरो डनहैम’ अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मिथक बनाम मनुष्य’ में कहते हैं कि पौराणिक मिथकों के अलावा हमारा सामना अनेक सामाजिक मिथकों से भी होता है जैसे ‘मनुष्य जन्म से स्वार्थी होता है ‘ और ‘मनुष्य के स्वभाव को बदला नहीं जा सकता ‘ आदि ৷ ऐसे और जाने कितने मिथक हैं जिनसे दिन-प्रतिदिन के जीवन में हमारा साक्षात्कार होता है ৷ 

खैर, मिथक बनाम मनुष्य की यह बहस तो चलती रहेगी और हम स्वविवेक से मिथकों के अस्तित्व पर विमर्श न करते हुए धार्मिक सत्ताधीशों द्वारा बनाये नियमों के आधार पर अपने पर्व मनाते रहेंगे ৷ हालाँकि यह तय है कि हमारे जीवन में अनेक तीज त्यौहार इन्ही मिथकों के कारण अस्तित्व में आये हैं ৷ 

हम रक्षाबंधन पर्व की बात कर रहे थे ৷ मैं अपने अवचेतन के स्मृति कक्ष के द्वार खटखटाता हूँ और जीवन के प्रथम रक्षाबंधन पर्व का स्मरण करता हूँ ৷ उन दिनों एकल संतान का चलन नहीं था और इस पर्व की पूर्णता हेतु घर में एक भाई एक बहन का होना अनिवार्य था ৷ बहन की अनुपस्थिति में रिश्ते की किसी बहन से या पड़ोस की किसी लड़की से राखी बंधवाने का कार्य स्वाभाविक रूप से संपन्न किया जाता था ৷

मेरी बहन सीमा मुझसे बाद में पैदा हुई थी इसलिए प्रारंभिक दो तीन वर्षों तक  राखी बंधवाने का यह पारंपरिक कार्य मैंने बाबूजी के मित्र राम हेडाऊ की बेटी भारती के माध्यम से पूर्ण किया ৷ उसके बाद जब तक बहन राखी बांधने लायक नहीं हुई तब तक माँ ही इस कार्य को संपन्न करती रही ৷ शुची की परम्परा में वे बाबूजी को राखी बांधती ही थीं ৷ 

रक्षाबंधन का पर्व एक तरह से परिवारों के मिलने जुलने का पर्व भी होता था ৷ मिलने का सिलसिला अगले दिन अर्थात भुजलिया या कजलिया के दिन तक जारी रहता ৷ भुजलिया के लिए राखी से एक सप्ताह पूर्व बाँस की टोकरियों में गेहूं बोकर जवारे उगाए जाते थे ৷ हमारे घर के आसपास जिस समाज के लोग रहते थे उनके यहाँ यह परम्परा थी कि राखी के अगले दिन यानि पाड़वा के दिन महिलायें यह जवारे की टोकरी लेकर भुजलिया ठंडी करने खामतलाव जाती थीं । वह दृश्य बहुत अद्भुत होता था जब सामने सामने बैंड बाजे वाले चलते थे और पीछे पीछे सर पर टोकरी लिए मोहल्ले की महिलायें ৷ 

हमारे घर में भुजलिया उगाने की प्रथा तो थी लेकिन तालाब तक जाकर उन्हें ठंडा करने जैसा कार्य नहीं होता था ৷ हम लोग यह कार्य घर की टंकी में ही कर लिया करते ৷ फिर सबकी देखा सेखी माँ ने यह काम करने की ठानी लेकिन मध्यवर्गीय अवगुंठन में स्वयं न जाकर यह कार्य उन्होंने  सामने रहने वाले ठाकरे काका की पत्नी सुमन को सौंप दिया ৷ वैसे कुछ बड़ा हो जाने के बाद भुजलिया की टोकनी ले जाने का काम मैं भी करने लगा । तालाब के घाट पर पहुंचकर  मिट्टी तालाब में बहा दी जाती थी और जवारे यानि भुजलिया लेकर हम घर आ जाते थे । मुझे तालाब के पानी तक जाने की मनाही थी इसलिए ठंडा करने का यह काम सुमन काकी ही किया करती थीं । 

घर लौटकर यह गेहूं के जवारे अर्थात भुजलिया  सबसे पहले भगवान की फोटो पर चढ़ाई जाती । फिर बाबूजी उसे अपने माता पिता यानि अम्मा और बापू की तस्वीर पर चढाते । फिर यह भुजलिया लेकर हम लोग पास पड़ोस के सभी घरों में जाते और बड़ों को देकर उनके चरण स्पर्श किया करते थे । इस तरह मोहल्ले के और लोग और बच्चे भी हमारे घर आते थे । यही प्रक्रिया शमीपत्र को लेकर दशहरे के दिन भी की जाती थी । 

हमारे घर में भुजलिया का यह पर्व दुगुने उत्साह के साथ मनाया जाता था इसलिए कि इस दिन बहन सीमा का भी जन्म हुआ था ৷ बाबूजी हमेशा कहते कि इसे राखी के दिन पैदा होना था लेकिन यह एक दिन लेट पैदा हुई ৷ यद्यपि तारीख के अनुसार उसका जन्मदिन हम लोग सत्ताईस अगस्त को ही मनाते थे । 

आज छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कथाकार और लोक कला मर्मज्ञ परदेशीराम जी ने बताया कि छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य नाचा में एक प्रसंग आता है जब बहन विदाई के समय अपने भाई की कमर पकड़कर रोती है और कहती है ‘ अगर इस तरह विदा लेकर मुझे पति के घर न जाना पड़ता तो मैं तेरे साथ खेत में नागर चलाती और उसमें भी सामने का बड़ा वजनी हिस्सा मैं थामती और तुझसे कहती तू पीछे का छोटा और कम भार का हिस्सा थाम ৷ “  

इस कथा से मेरा एक और कांसेप्ट क्लियर हुआ कि भाई बहन का सम्बन्ध मित्रता का तो होता ही है और मेहनत के कामों में वह केवल अपने पिता या भाई की सहायता ही नहीं करती बल्कि हमारे जीवन में थोपे गए इस पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री हेतु वर्जित घोषित किये गए समस्त कार्य संपन्न कर सकने का दम भी रखती है ৷    


शरद कोकास