उन दिनों प्रत्येक पर्व के आगमन से पूर्व अखबार एवं पत्रिकाएँ कवर स्टोरी के रूप में उस पर्व से जुड़ी पौराणिक कहानियाँ अवश्य प्रस्तुत करते थे ৷ फलां फलां अभिनेत्री ने दिवाली कैसे मनाई या होली कैसे मनाई यह छापने का चलन भी प्रारंभ हो चुका था ৷ यद्यपि किसी अभिनेता या अभिनेत्री ने राखी कैसे मनाई यह कभी नहीं बताया जाता था ৷ शायद फ़िल्मी दुनिया में भाई बहन के सम्बन्ध बताना व्यावसायिक दृष्टि से उचित नहीं होता होगा ৷ अतः राखी का महत्त्व जानने हेतु हम लोग केवल पौराणिक कहानियों पर ही निर्भर रहते थे ৷
रानी पद्मावती द्वारा हुमायूं को राखी बांधे जाने की प्रचलित कथा के अलावा पहली पौराणिक कथा जो मैंने रक्षाबंधन के महत्व पर सुनी वह इंद्र और शची की कथा थी ৷ इस कथा के अनुसार एक बार जब राजा इंद्र व्रतासुर का वध करने जा रहे थे तो उनकी पत्नी देवी शची ने अपने पति की रक्षा हेतु उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधे थे ৷ यह कथा जानने के पश्चात अपना यह कांसेप्ट समाप्त हो गया कि केवल बहन ही भाई को राखी बांध सकती है ৷
दूसरी कथा में मैंने पढ़ा कि तीन पग में धरती नापने के पश्चात जब राजा बलि अतिथि के रूप में विष्णु को अपने साथ पाताल ले गए और बहुत दिनों तक उन्हें आने नहीं दिया तो लक्ष्मीजी उनके अपहरण की आशंका से चिंतित हो उठीं ৷ फिर उन्होंने नारद मुनि की सलाह पर राजा बलि को राखी बांधी और उपहार में अपने पति को मांग लिया ৷ यहाँ दूसरा कांसेप्ट यह बना कि राखी बांधने वाला अपनी मनचाही वस्तु उपहार में मांग सकता है ৷
तीसरी कथा जो मैंने पढी थी वह सबसे इंटरेस्टिंग थी ৷ इस कथा में शिशुपाल वध के समय कृष्ण का हाथ ज़ख्मी हो जाता है तब द्रौपदी अपनी साड़ी से एक टुकड़ा फाड़कर उनके हाथ पर बांध देती है ৷ इस टुकड़े को राखी का प्रतीक माना जाता है ৷ इसके प्रतिदान स्वरूप श्रीकृष्ण चीरहरण के समय द्रौपदी की रक्षा करते हैं ৷ वैसे महाभारत के पूरे आख्यान में मुझे द्रौपदी और कृष्ण भाई बहन की तरह नहीं अपितु मित्र की तरह लगते हैं ৷ यहाँ मेरा कांसेप्ट यह बना कि रिश्ते में भले कोई भाई बहन हों और उनकी उम्र में चाहे जितना अंतर हो उन्हें हमेशा मित्रवत ही व्यवहार करना चाहिए ৷
अपने युवा मित्रों से बात करते हुए जब मैं विभिन्न सभ्यताओं की पौराणिक कहानियाँ उन्हें बताता हूँ तो वे कहते हैं यह सब झूठ है, ऐसा कभी हुआ ही नहीं, न कहीं कोई स्वर्ग है न पाताल है ৷ मैं उनके इतिहास बोध पर किसी प्रकार का संदेह न करते हुए उनसे केवल इतना कहता हूँ कि बावजूद इसके हमें विश्व की विभिन्न सभ्यताओं की माइथोलॉजी जानना आवश्यक है ৷ केवल भारत की ही नहीं अपितु ग्रीस, रोम , मेसोपोटामिया, चाइना इत्यादि सभ्यताओं की माइथोलॉजी भी हमें ज्ञात होनी चाहिए ৷ इसके अलावा बुद्धिस्ट, इस्लामिक,ख्रिश्चेनिटी,इत्यादि की माइथोलॉजी जानना भी आवश्यक है ৷ अगर हमें माइथोलॉजी नहीं पता है तो हम बहुत सारी कविताओं, कहानियों और उपन्यासों का आनंद नहीं ले पाएंगे ৷ अगर कहीं ‘एकीलिस की एड़ी’ या ‘ट्रॉय का घोड़ा’ जैसा शब्द आ गया तो हम कहेंगे “ यह क्या बला है ?”
‘बैरो डनहैम’ अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मिथक बनाम मनुष्य’ में कहते हैं कि पौराणिक मिथकों के अलावा हमारा सामना अनेक सामाजिक मिथकों से भी होता है जैसे ‘मनुष्य जन्म से स्वार्थी होता है ‘ और ‘मनुष्य के स्वभाव को बदला नहीं जा सकता ‘ आदि ৷ ऐसे और जाने कितने मिथक हैं जिनसे दिन-प्रतिदिन के जीवन में हमारा साक्षात्कार होता है ৷
खैर, मिथक बनाम मनुष्य की यह बहस तो चलती रहेगी और हम स्वविवेक से मिथकों के अस्तित्व पर विमर्श न करते हुए धार्मिक सत्ताधीशों द्वारा बनाये नियमों के आधार पर अपने पर्व मनाते रहेंगे ৷ हालाँकि यह तय है कि हमारे जीवन में अनेक तीज त्यौहार इन्ही मिथकों के कारण अस्तित्व में आये हैं ৷
हम रक्षाबंधन पर्व की बात कर रहे थे ৷ मैं अपने अवचेतन के स्मृति कक्ष के द्वार खटखटाता हूँ और जीवन के प्रथम रक्षाबंधन पर्व का स्मरण करता हूँ ৷ उन दिनों एकल संतान का चलन नहीं था और इस पर्व की पूर्णता हेतु घर में एक भाई एक बहन का होना अनिवार्य था ৷ बहन की अनुपस्थिति में रिश्ते की किसी बहन से या पड़ोस की किसी लड़की से राखी बंधवाने का कार्य स्वाभाविक रूप से संपन्न किया जाता था ৷
मेरी बहन सीमा मुझसे बाद में पैदा हुई थी इसलिए प्रारंभिक दो तीन वर्षों तक राखी बंधवाने का यह पारंपरिक कार्य मैंने बाबूजी के मित्र राम हेडाऊ की बेटी भारती के माध्यम से पूर्ण किया ৷ उसके बाद जब तक बहन राखी बांधने लायक नहीं हुई तब तक माँ ही इस कार्य को संपन्न करती रही ৷ शुची की परम्परा में वे बाबूजी को राखी बांधती ही थीं ৷
रक्षाबंधन का पर्व एक तरह से परिवारों के मिलने जुलने का पर्व भी होता था ৷ मिलने का सिलसिला अगले दिन अर्थात भुजलिया या कजलिया के दिन तक जारी रहता ৷ भुजलिया के लिए राखी से एक सप्ताह पूर्व बाँस की टोकरियों में गेहूं बोकर जवारे उगाए जाते थे ৷ हमारे घर के आसपास जिस समाज के लोग रहते थे उनके यहाँ यह परम्परा थी कि राखी के अगले दिन यानि पाड़वा के दिन महिलायें यह जवारे की टोकरी लेकर भुजलिया ठंडी करने खामतलाव जाती थीं । वह दृश्य बहुत अद्भुत होता था जब सामने सामने बैंड बाजे वाले चलते थे और पीछे पीछे सर पर टोकरी लिए मोहल्ले की महिलायें ৷
हमारे घर में भुजलिया उगाने की प्रथा तो थी लेकिन तालाब तक जाकर उन्हें ठंडा करने जैसा कार्य नहीं होता था ৷ हम लोग यह कार्य घर की टंकी में ही कर लिया करते ৷ फिर सबकी देखा सेखी माँ ने यह काम करने की ठानी लेकिन मध्यवर्गीय अवगुंठन में स्वयं न जाकर यह कार्य उन्होंने सामने रहने वाले ठाकरे काका की पत्नी सुमन को सौंप दिया ৷ वैसे कुछ बड़ा हो जाने के बाद भुजलिया की टोकनी ले जाने का काम मैं भी करने लगा । तालाब के घाट पर पहुंचकर मिट्टी तालाब में बहा दी जाती थी और जवारे यानि भुजलिया लेकर हम घर आ जाते थे । मुझे तालाब के पानी तक जाने की मनाही थी इसलिए ठंडा करने का यह काम सुमन काकी ही किया करती थीं ।
घर लौटकर यह गेहूं के जवारे अर्थात भुजलिया सबसे पहले भगवान की फोटो पर चढ़ाई जाती । फिर बाबूजी उसे अपने माता पिता यानि अम्मा और बापू की तस्वीर पर चढाते । फिर यह भुजलिया लेकर हम लोग पास पड़ोस के सभी घरों में जाते और बड़ों को देकर उनके चरण स्पर्श किया करते थे । इस तरह मोहल्ले के और लोग और बच्चे भी हमारे घर आते थे । यही प्रक्रिया शमीपत्र को लेकर दशहरे के दिन भी की जाती थी ।
हमारे घर में भुजलिया का यह पर्व दुगुने उत्साह के साथ मनाया जाता था इसलिए कि इस दिन बहन सीमा का भी जन्म हुआ था ৷ बाबूजी हमेशा कहते कि इसे राखी के दिन पैदा होना था लेकिन यह एक दिन लेट पैदा हुई ৷ यद्यपि तारीख के अनुसार उसका जन्मदिन हम लोग सत्ताईस अगस्त को ही मनाते थे ।
आज छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध कथाकार और लोक कला मर्मज्ञ परदेशीराम जी ने बताया कि छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य नाचा में एक प्रसंग आता है जब बहन विदाई के समय अपने भाई की कमर पकड़कर रोती है और कहती है ‘ अगर इस तरह विदा लेकर मुझे पति के घर न जाना पड़ता तो मैं तेरे साथ खेत में नागर चलाती और उसमें भी सामने का बड़ा वजनी हिस्सा मैं थामती और तुझसे कहती तू पीछे का छोटा और कम भार का हिस्सा थाम ৷ “
इस कथा से मेरा एक और कांसेप्ट क्लियर हुआ कि भाई बहन का सम्बन्ध मित्रता का तो होता ही है और मेहनत के कामों में वह केवल अपने पिता या भाई की सहायता ही नहीं करती बल्कि हमारे जीवन में थोपे गए इस पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री हेतु वर्जित घोषित किये गए समस्त कार्य संपन्न कर सकने का दम भी रखती है ৷
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