10 जून 2026

142 .चेहरे पर केक मलने की परम्परा कब शुरू हुई




उत्सवधर्मिता हम होमो सेपियंस के जींस में है ৷ अनुष्ठान हमारे जीवन से जुड़े हैं ৷ खुशियाँ उनका सहउत्पाद हैं ৷ कृषि से पूर्व शिकार के भी उत्सव हुआ करते थे ৷ जैसे आदिम मानव जब हिरण का शिकार करने जाता था तो वह धरती पर या दीवार पर एक हिरण का चित्र बनाता था,भाले की नोक से उसका स्पर्श करता था और उसके इर्द गिर्द नाचता था ৷ ऐसा करने के पीछे उसकी मान्यता थी कि इस तरह शिकार प्राप्त करने में उसे सफलता मिलेगी ৷ आग की खोज के बाद भोजन पकाना और खाना भी एक उत्सव ही  होता था ৷


उत्सव की यह परंपरा फिर कृषि अवस्था में भी चली आई ৷ इसमें बीज बोने से लेकर फसल काटने तक तमाम अनुष्ठान और उत्सव हुआ करते थे ৷ धीरे धीरे जब इन अनुष्ठानों और उत्सवों में धर्म का प्रवेश हुआ इनका स्वरूप विकृत होता गया ৷ इन मेहनतकश इंसानों के बीच एक पुरोहित वर्ग का जन्म हुआ जिसने इन्हें सुव्यवस्थित करने और इनका लाभ मनुष्य को दिलाने के नाम पर उनका नेतृत्व करना प्रारंभ किया ৷


धीरे धीरे इन उत्सवों में कर्मकाण्ड प्रवेश करते गए, धर्म, ईश्वर और भाग्य का इनमे समावेश हुआ ৷ फिर जैसे जैसे अलग अलग धर्मों के ईश्वर अलग हुए उत्सव भी अलग होते गए ৷ उत्सवों से लोगों के रोजगार जुड़ते गए ৷ आगे उत्सव विलासिता और धन के प्रदर्शन के प्रतीक बन गए  ৷


वैभव और उत्सव का सम्बन्ध भले धन से हो लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इनसे प्राप्त होने वाली खुशी का पैमाना दोनों में बराबर होता है अर्थात खुशी पैदा करने वाले हारमोंस अमीर और ग़रीब दोनों में बराबर मात्रा में स्त्रवित होते हैं ৷ जैसे दस लाख का सूट पहनने से साहब को जो खुशी मिलती है उतनी ही खुशी एक ग़रीब को नई कमीज़ पहनने से मिलती है ৷ यह बात अलग है कि ग़रीब को तीज त्यौहार पर भी नए कपडे नसीब नहीं होते ৷ 


एक मध्यवर्गीय या निम्नवर्गीय परिवार में तीज त्योहारों के अलावा उत्सव के अवसर बहुत कम आते हैं । इनमे विवाहोत्सव और जन्मोत्सव प्रमुख हैं । उत्सव से फिर अपना बचपन याद आता है ৷ बाबूजी का जन्मदिन दशहरे के दिन और माँ का जन्मदिन दिवाली के दिन आता था सो अलग से मनाये जाने ला प्रश्न ही उद्भव नहीं होता था  । मेरे जन्मदिन अर्थात तीस सितम्बर को माँ सुबह सुबह मुझे नहला धुलाकर टीका लगा देती थी । खीर तो खैर सबके जन्मदिन पर बनती ही थी  ।  


मैं बैतूल में देखता था कि बड़ी माँ और चाचियाँ मुल्लू भैया को उनके जन्मदिन के दिन टोकरी में रखकर कुछ दूर तक घसीटती थीं ৷ मैंने पूछा “ऐसा क्यों करते हैं आप लोग ?” तो उन्होंने बताया कि विजय भैया मूल में पैदा हुए थे उनका मूल उतारने के लिए हर जन्मदिन पर ऐसा करना अनिवार्य है ৷ बड़े होने के बाद ज्ञात हुआ कि जन्मदिन मनाने के ऐसे अजीबोगरीब तरीके हमारे देश में नहीं हैं बल्कि अन्य देशोंमे भी हैं ৷ जैसे ब्रिटेन में बच्चे के जन्मदिन पर उसे हवा में उछाला जाता है ৷ उसे बर्थ डे बंप कहते हैं ৷ जर्मनी में बच्चे से चर्च की सफाई करवाई जाती है और हंगरी में बर्थ डे बेबी के कान खींचे जाते हैं ৷ 


हमारे देश में दीपक से बच्चे की आरती उतारने, तिलक लगाने और खीर खिलाने की परम्परा में धीरे से केक काटने की परम्परा प्रविष्ट हो गई ৷ बच्चे अब अपना जन्मदिन स्कूल में मना लेते हैं स्कूल में हों तो अन्य बच्चों को टॉफ़ी बाँटते हैं और बड़े हुए तो दोस्तों के साथ पार्टी करते हैं ৷ अब तो सुबह की राह भी नहीं देखी जाती रात बारह बजे ही केक काट लिया जाता है ৷


पिछले कुछ वर्षों से केक काटने के बाद जिसका जन्मदिन है उसके चेहरे पर केक मलने की परम्परा शुरू हुई है ৷ मैंने जब पहली बार यह दृश्य देखा तो बड़ा अजीब सा लगा ৷ इस चलन का उद्भव कैसे हुआ यह जानने की मैंने कोशिश की तो बड़ी मज़ेदार बातें पता चलीं ৷ जैसे अमेरिका में बच्चे के पहले जन्मदिन पर ‘स्मैश केक’ बनाया जाता है जो काफी नर्म होता है ৷ फिर बच्चे को उस केक के  सामने बैठा दिया जाता है ৷ बच्चा इस नर्म केक को हाथ से सानते हुए , मुँह नाक पर चुपड़ते हुए मनचाहे तरीके से खाता है ৷ इसमें सबका मनोरंजन होता है ৷


इसी तरह कनाडा में जन्मदिन पर बच्चों की नाक पर पेस्ट्री,केक या मख्खन लगा दिया जाता है जिसे वे जीभ से चाट चाट कर खाते हैं ৷ इसे ‘नोज़ ग्रीसिंग’, ‘ग्रीस फेस’ या ‘बटर्ड नोज़’ कहते हैं ৷ इसका आशय होता है जीवन भर आपके भीतर स्निग्धता बनी रहे ৷ इस तरह अन्य देशों में भी यह चुपड़ने वाली प्रथाएँ हो सकती हैं ৷ संभव है जन्मदिन मनाने का यह तरीका बाद में बड़ों को भी पसंद आने लगा हो ৷


कुछ इसी तरह की प्रथाएँ विवाह उत्सव में भी चलती हैं ৷ हमारे यहाँ दूल्हा दुल्हन को हल्दी लगाते हुए बाकी लोगों को भी हल्दी चुपड़ देते हैं, इसे ‘हल्दी खेलना’ कहते हैं ৷ आंध्रप्रदेश में दूल्हा दुल्हन के सर पर पापड़ तोड़ कर उसके चेहरे पर मल देता है ৷ मुझे ज्ञात हुआ कि ऐसे ही प्राचीन रोम में दुल्हन के सर पर सूखा केक रखकर तोड़ा जाता था ৷ अब इसका क्या उद्देश्य था यह तो पता नहीं लेकिन यह प्रश्न मेरे मन में अवश्य आया कि पापड़ दुल्हन के सर पर रखकर ही क्यों तोड़ा जाता है ৷ कुछ विद्वानों का कथन है इसका सम्बन्ध दुल्हन के कौमार्य भंग से हो सकता है , लेकिन वह तो दूल्हे का भी होता है ?


खैर, केक काटने की परम्परा तो अब आम हो गई है ৷ अब तो काटने और चुपड़ने के लिए केक भी अलग अलग आने लगे हैं ৷ चाहे जन्मोत्सव हो, विवाहोत्सव हो या कोई उद्घाटन हो केक काटना अनिवार्य है ৷ क्या पता कुछ समय बाद अंतिम संस्कार के समय भी केक काटा जाने लगे और उसे मृतक के चेहरे पर मला जाने लगे ৷ फिर शायद किसी दिन हमें पता चले कि इस चलन को शुरू करने के पीछे दुनिया के केक बनाने वाले बड़े बड़े बेकर्स का मार्केटिंग फंडा था ৷ पूंजीवाद के दौर में कुछ भी संभव है ৷


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