10 जून 2026

141 अरे ! कुत्ता खाते हो शरम नहीं आती



बनखंडेश्वर मंदिर के सामने,एक सौ चार बटे चार सौ तेरह, सीसामऊ कानपुर ৷ यह पता था रामे मामा का ৷ रामे मामा यानी मुंबई वाले हमारे दयानंद मामा के साले रामचंद्र शर्मा  जो सत्तर के उस दशक में  अपने तीन बेटों प्रकाश,सुशील,प्रेम और बिटिया किरण के साथ इस भवन में उपरी मंज़िल पर रहते थे ৷ नीचे सब दुकानें थीं ৷ इसी घर से हमारे छोटे मामा सर्वदानंद की शादी होनी तय हुई थी ৷


शादी की धूमधाम ख़त्म हुई ৷ मुंबई से आये मेरे हमउम्र ममेरे भाई अनिल उर्फ़ पप्पू ने प्रस्ताव रखा “ यार शरद, उत्तर प्रदेश की पचमेल मिठाई,उड़द के दाल की कचोरियाँ और समोसे खा खाकर मैं ऊब गया हूँ ৷ चलो बाज़ार चलकर ‘हॉट डॉग’ खाकर आते हैं ৷ 


“हॉट डॉग ? यह क्या होता है ?” मैंने चौंककर पूछा ৷ पप्पू ने जवाब दिया “वह मीट को कीमे की तरह पीस कर उसके सासेज़ बनाते हैं और उसे बन में रखकर ग्रिल करते हैं ৷” हॉट डॉग के इस संक्षिप्त परिचय में मुझे केवल ‘कीमा’ समझ में आया৷  बाकी ‘सासेज़’ शब्द मेरे लिए बिलकुल नया था ৷ शेष परिचय खाते हुए मिल जायेगा यह सोचकर मैंने कहा “ चलो ৷ ”  


सीढियाँ उतरकर हम लोग नीचे आये और बनखंडेश्वर मंदिर की लाइन में चलते हुए देखने लगे कहीं ‘हॉट डॉग’ का बोर्ड लगा हो ৷ बोर्ड तो हमें चाट, गुपचुप, पानी पतासा, समोसा, कचोरी, आदि के भी नहीं दिखाई दे रहे थे फिर ‘हॉट डॉग’ का कैसे दिखाई देता ৷ अचानक सामने एक होटल आ गई ৷ हम लोग भीतर प्रवेश कर गए और एक टेबल पर बैठ गए ৷ एक छोकरा आया, उसने टेबल पर कपडा मारा और ज़ोर  से  आवाज़ लगाई तीन नंबर टेबल पर साहब को पानी मारो ৷ हमें पता था पानी मारना मतलब पानी का गिलास रखकर आर्डर लेना होता है ৷ ऐसे ही ग्राहक को चाय, समोसा, कचोरी भी मारे जाते हैं ৷


पानी मारने वाला बैरा आया “हाँ मुन्ना, बोलो क्या  लगाऊं ?” पानी रखकर उसने पूछा “ एक प्लेट ‘हॉट डॉग’ ৷” पप्पू ने आर्डर किया ৷ बैरे ने पूछा “क्या बोले ? समोसा ? कचोरी ? “ “नहीं भाई वो हॉट डॉग होता है ना सासेज़ को ब्रेड वाले बन में रखकर बनाते हैं ৷” पप्पू ने उसे समझाते हुए कहा ৷ “अच्छा डबलरोटी का पकौड़ा ?” बैरे ने अपने आई क्यू का इस्तेमाल किया ৷  “नहीं भाई वो सब नहीं ৷” पप्पू थोड़ा खीझने लगा था ৷ बैरे ने कहा “आप क्या कह रहे हैं मेरी तो समझ में नहीं आता ৷ यहाँ कानपुर में उसे क्या  बोलते है वो बताओ ৷“ पप्पू ने कहा “उसे तो पूरी दुनिया में हॉट डॉग ही कहते हैं ৷”


बैरे ने साफ़ कहा “फिर तो मुन्ना वो यहाँ नहीं मिलता ৷ कहीं और देखिए ৷” बैरे की बात सुनकर हम लोग होटल से बाहर  आ गए ৷ मैंने पप्पू से कहा “यार, भीतर बैठने के पहले ही पूछ लेते तो बेहतर था ৷” जैसे रेगिस्तान में मुसाफ़िर चश्मे की तलाश में आगे बढ़ता है हम लोग भी आगे बढ़ते गए ৷ आगे एक होटल और मिली ৷ ठीक सामने भट्टी थी जिस पर चढ़ी कढाई में एक हलवाई गरम गरम आलू बोंडे तल रहा था ৷ आलूबोंडों की खुशबू इतनी अच्छी थी कि मेरे मुँह में पानी आने लगा ৷ मैंने पप्पू से कहा “ हॉट डॉग वाट डॉग छोड़ो, यहीं आलूबोंडे  खा लेते हैं ৷ पप्पू ने कहा “ ठीक है, पहले इसके मालिक से पूछ तो लें ৷”


बड़ी बड़ी मूंछों और घुटे हुए सर वाला होटल मालिक जो शक्ल से ही हलवाई लग रहा था हमें अपनी  ओर आता देख खुश हुआ “कहिये ?” “भैया आपके यहाँ हॉट डॉग मिलेगा क्या ?” पप्पू ने पूरे आत्मविश्वास से पूछा ৷ “क्या बोले ? फिर से बोलो ?” मालिक ने कान खुजाते हुए पूछा ৷ पप्पू ने जवाब दिया “हॉट डॉग ৷” मालिक ने दोहराया “हॉट डॉग, हॉट याने गरम डॉग याने कुत्ता ৷ ओये.. चलो निकलो यहाँ से.. कुत्ता खाते हो शर्म नहीं आती ....छी छी.. राम राम राम राम .. सब भ्रष्ट कर दिया.. चलो भागो यहाँ से ৷” 


हमने पिटे हुए वकील की तरह थोड़ी जिरह करने की कोशिश की लेकिन उसने हमें ठहरने ही नहीं दिया ৷ वैसे भी इतने बेआबरू होने के बाद वहाँ रुकने का सवाल ही पैदा नहीं होता था ৷ मैंने हसरत भरी निगाहों से आलूबोंड़े की कढ़ाई की ओर  देखा ৷ पप्पू ने हाथ पकड़कर खींचा “चलो,जल्दी चलो, पिटना है क्या यहाँ रुककर, उसके तेवर नहीं देखे ৷” 


अगली होटल ज़रा आधुनिक सी दिखाई दे रही थी ৷ हम लोग भीतर प्रवेश कर गए ৷काउंटर पर जो युवा बैठा हुआ था  वह पैंट शर्ट पहने हुए था ৷ पप्पू ने कहा “इसे पक्का पता होगा ৷“ “सर आपके यहाँ हॉट डॉग मिलेगा क्या ৷“ उसने उक्त व्यक्ति को संबोधित करते हुए कहा ৷ मैंने ध्यान दिया, धोती पहना हुआ आदमी भैया कहलाता है और पैंट पहना हुआ आदमी अपने आप सर हो जाता है ৷ उसने  धीरे से कहा “हॉट डॉग ? ओह.. सॉरी, हॉट डॉग, तो हमारे यहाँ नहीं है৷ 


हमें संतोष हुआ, बन्दे को इतना तो पता है कि हॉट डॉग क्या होता है ৷ मैंने सोचा इसी से पूछ लिया जाये “सर, कानपुर में यह कहाँ मिलेगा ?” वह मुस्कुराने लगा “भाई, यह डिश तो मुझे पता है, मुंबई में मिलती है, शायद आप लोग वहीं से आए हैं ? पप्पू ने हाँ में सर हिलाया ৷ “लेकिन कानपुर में इसका मिलना मुश्किल है,  सॉरी ৷” उसने हमारे सामान्य ज्ञान में वृद्धि की ৷


उसने इस तरह दो बार ‘सॉरी’ कहा कि हम लोग पिघल गए और हमने अपने अपमान की पूरी दास्तान उसे सुना दी ৷ बदले में उसने हमें पुचकारते हुए हॉट डॉग के आभासी चित्र के साथ अपने होटल की बासी डबलरोटी सेंक कर चटनी के साथ खिला दी ৷ हमने खा तो ली लेकिन लौटते हुए भुनभुनाने लगे, अच्छा मतलब बम्बई वाला जानकर इसने भी हमें बेवकूफ बना दिया ৷ लेकिन हम भी नहीं माने और लौटते में एक दुकान पर आलू टिकिया की गरम गरम चाट बनवाई और साथ में फुलकी भी खाई चार चार आने की ৷


बरसों बाद जब मैं नौकरी करने के लिए दुर्ग आया मेरी मुलाकात मनोज रूपड़ा से हुई ৷ उसकी मिठाई की दुकान पर हम लोगों की बैठक जमती थी जिसमे मैं, कथाकार कैलाश बनवासी, पूरन हार्डी, अनिल कामड़े, हरी सेन आदि मित्र शामिल रहते थे ৷ मनोज ने कहानियाँ लिखने की शुरुआत की थी और मै भी कविता के क्षेत्र में कदम रख रहा था ৷ मनोज कहानियां लिखता और दूकान में ही हम लोगों को पढ़ पढ़कर सुनाता था ৷ 


एक दिन मनोज ने पूछा “यार ये ‘सासेज़’ क्या होता है ?” उन दिनों वह अपने कहानी ‘युयुत्सा’ लिख रहा था जिसमे उसका एक कैरेक्टर होटल में ‘सासेज़’ आर्डर करता है ৷ उसके बात सुनकर मुझे कानपुर के हॉट डॉग वाला किस्सा याद आ गया ৷ इतना तो मुझे पता था कि हॉट डॉग में ‘सासेज़’ का ही इस्तेमाल होता है  


आप लोग भी सोच रहे होंगे कि जबसे कहे जा रहा है लेकिन यह हॉट डॉग आखिर होता क्या है ৷ इसके  लिए पहले आपको ‘सासेज़’ क्या होता है यह समझना होगा ৷ सासेज़ यह बीफ़,पोर्क,चिकन आदि के कीमे से बनता है ৷ कीमे को भूनकर उसमें विभिन्न मसाले मिलाकर उसकी लम्बी लम्बी लोई बनाई जाती है, या मसाला मिले कीमे को बेक किया जाता है, स्टीम किया जाता है या ग्रिल किया जाता है ৷ कहीं कहीं उसे धुएँ में भी पकाया जाता है ৷ यह कुछ उसी तरह है जैसे हमारे यहाँ कबाब बनाया जाता है ৷ इस गरम गरम ‘सासेज़’ को एक बन के बीच रखकर यानी दबाकर खाया जाता है, बोले तो अपन के यहाँ के  वड़ा पाँव स्टाइल में ৷ 


लेकिन अब भी आपके दिमाग में ‘डॉग’ शब्द  अटका होगा ? आप ठीक सोच रहे हैं यहाँ इस डॉग का अर्थ उसी डॉग से है जिसे हम कुत्ता कहते हैं ৷ ऐसा कहा जाता है कि उन्नीस सौ से पहले जर्मनी और आसपास क्षेत्रों में सासेज़ के लिए कुत्ते के मांस का प्रयोग किया जाता था जो बाद में बंद हो गया ৷ इस डिश के लिए ‘हॉट डॉग’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिका के अखबार नॉक्स विले जर्नल में सन अठारह सौ त्र्यान्बे में किया गया ৷


खैर माँसाहार के नाम से नाक भौं सिकोड़ने की ज़रूरत नहीं अब तो शाकाहारियों के लिए ‘वेजिटेबल हॉट डॉग’ भी आ गए हैं ৷ बढ़िया आलू की टिक्की जैसे किसी भी चीज़ को किस कर उसकी टिक्की बनाइये उसे भून कर तल कर बन के बीच में रखिये उस पर थोड़ा सौस लगाइए ৷ भीतर उबला मटर, कटे प्याज़, हरा धनिया रखिये, थोड़े सेव भी,फिर थोड़ा थोड़ा चाट मसाला,जीरा पाउडर,काली मिर्च  छिड़क दीजिये और दबा कर खा जाइये ৷ अब ‘डॉग’ शब्द से आपको क्या करना है इस नाम का तो इस व्यंजन के साथ गठ बंधन हो ही गया है ৷ 


शहरों के नाम, सड़कों के नाम, इमारतों के नाम भले ही बदल दें आप ज़रा हॉट डॉग का नाम बदल कर दिखाइए ৷ आखिर पिज्जा बर्गर के नाम भी तो नहीं बदल पाए ना हम ৷ इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने से उसका इलाहाबादीपन नहीं गया, न ही लेनिनग्राद का नाम सेंट पीटर्सबर्ग करने से लेनिन का नाम भुला दिया गया  ৷ उसी तरह हॉट डॉग का नाम ‘हॉट आलू’ या ‘हॉट गोभी’ कर देने से उसका स्वाद थोड़े ही बदल जाएगा ৷ 



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