मैं हमेशा सोचता था कि बजबजाती नालियों से भरी तंग गलियों में रहने वाले झोपडपट्टी के बच्चे, खूबसूरत बँगलों वाली साफ सुथरी पॉश कालोनियों में रहने वाले बच्चों को देखकर क्या सोचते होंगे ৷ क्या कभी उन्हें इस बात का ख्याल आता होगा कि नाक नक्श और अंग संरचना में ठीक उन्ही की तरह दिखाई देने वाले यह बच्चे उनसे अच्छे कपड़े क्यों पहने हुए हैं और इन बड़े बड़े मकानों में कैसे रह रहे हैं ৷
मेरे मन में यह बात भी आती कि कालोनियों में रहने वाले यह खूबसूरत बच्चे, मैले कुचैले कपड़े पहने गंदे से दिखने वाले उन बच्चों को देखकर क्या सोचते होंगे ৷ मैं अक्सर देखता था कि उन बंगलों में रहने वाले लोग इन बच्चों को गंदे बच्चे कहकर उनकी ओर संदेह भरी नज़रों से देखते हैं और चोर या उठाईगीर समझकर दुत्कार कर भगा देते हैं ৷
बाबूजी जब बताते कि भगवान ने सारे बच्चों को दुनिया में एक जैसा पैदा किया है तब मैं उनसे पूछता कि फिर यह बच्चे इतने गरीब क्यों है ? वे कहते “उनकी किस्मत ऐसी ही है ৷” मैंने उनसे कभी बहस तो नहीं की लेकिन भगवान और भाग्य से भरोसा उठना मेरा उन्ही दिनों शुरू हो गया था ৷ किताबों की दुनिया से गुजरते हुए धीरे धीरे मुझे मेरे सवालों का जवाब मिलना शुरू हुआ और एक दिन मैं जान गया कि कोई ग़रीब और कोई अमीर कैसे होता है ৷
मेरे शहर में कोई ऐसी पॉश कालोनी तो थी नहीं लेकिन बड़े शहरों में इस तरह की कालोनियों में भटकना मुझे अच्छा लगता था ৷ हालाँकि कभी किसीने मुझे दुत्कार कर भगाया नहीं, शायद मैं शक्ल सूरत से झोपडपट्टी वाला बच्चा लगता नहीं था ৷ फिर भी ‘कुत्ते से सावधान’ या ‘बीवेयर ऑफ़ डॉग्स’ जैसी पट्टी लगे वाले बंगलों के सामने से गुजरते हुए मैं थोड़ा सतर्क रहता था और सोचता था कुत्तों से सावधान वाला बोर्ड लगाने की बजाय ज़्यादा ज़रूरत तो इन बंगलों में रहने वाले लोगों से सावधान रहने का बोर्ड लगाने की है ৷
इन जगमगाती सडकों से गुजरते हुए मैं सोचता काश हम लोग भी कभी इस तरह के बंगले में रह पाते ৷ हालाँकि मैं जानता बाबूजी जीवन भर शिक्षक की नौकरी करेंगे और यह संभव नहीं होगा ৷ मेरे मन में दबी इस सुप्त इच्छा की पूर्ति तब होती जब हमें मुंबई में दयानंद मामा के बंगले में कुछ दिन रहने का अवसर मिलता ৷
अपनी सुप्त इच्छाओं को साकार करने का एक अवसर मुझे तब भी मिला जब हम लोग जबलपुर में आशा मौसी के विवाह में शामिल होने गए थे ৷ आशा मौसी के पिता महावीर प्रसाद शर्मा माँ के मामा थे इसलिए मैं उन्हें नाना कहता था और माँ की मामी श्रीमती गायत्री देवी को नानी ৷ निकटस्थ रिश्तों में वही एक थीं जो मेरे लिए नानी हो सकती थीं ৷
नानाजी आर्डिनेंस फैक्ट्री जबलपुर में फोरमैन थे और खूबसूरत बंगलों वाली वेस्टलैंड खमरिया की पॉश कॉलोनी में रहते थे ৷ उनका बंगला भी मुंबई वाले मामाजी के बंगले जैसा ही बड़ा सा बंगला था, आगे पीछे ढेर सारी जगह ,बड़ा सा लॉन बड़े बड़े कमरे और बाथरूम और बगीचे में आम के पेड़ ৷ नानाजी के चार बेटों ओमप्रकाश,रविप्रकाश, ज्ञानप्रकाश और वेदप्रकाश में सबसे छोटे वेदू मामा मुझसे उम्र में कुछ ही बड़े हैं इसलिए उनसे दोस्ती का रिश्ता भी निराला था ।
| रविप्रकाश मामा और निर्मल मामी |
भंडारा से जबलपुर की उस यात्रा में गोन्दिया जबलपुर नैरो गेज की ट्रेन से जबलपुर जाने का वह अनुभव अद्भुत था । धीमी गति से हिलते डुलते चलने वाली उस छोटी सी ट्रेन को लेकर उन दिनों कई किस्से चलते थे ৷ एक किस्सा मशहूर था कि ट्रेन के बार बार बार रुकने पर एक यात्री ने गार्ड से पूछा “गार्ड साहब, ट्रेन बार बार क्यों रुक रही है ?” तो उन्होंने जवाब दिया “ इसका कारण एक गाय है, जो इंजन के सामने आ जाती है ৷ हम उसे भगाते हैं, लेकिन गाड़ी चलते ही फिर वह भागकर सामने पटरी पर आ जाती है ৷
आशा मौसी के विवाह में शामिल होने मुम्बई से दयानन्द मामा अपने पूरे परिवार सहित आये थे । झांसी से कृष्णदत्त मामा और कानपुर से रामचन्द्र मामा सपरिवार । मातृकुल के बच्चों की एक पूरी टीम जिनमे किशन,प्रकाश,बेबी,दीदी,चित्रा वगैरह शामिल ৷ शादी के दो दिन पहले से हम लोगों ने लान को सजाना प्रारम्भ कर दिया । धागे में रंगीन पन्नियाँ चिपकाकर ऊपर बान्धने के लिए एक मन्डप तैयार करने की ज़िम्मेदारी हम बच्चों की थी । बीच बीच में मठरी, बालूशाही, और बून्दी के लड्डू आदि का आयात जारी था । हमसे बड़े लोगों का एक ग्रूप अलग था जिसमें लाल दादा, ज्ञान मामा ,दया मामी के भाई श्रवण और रवि मामा वगैरह थे ।
लाल दादा ने उस समय एक पैरोड़ी बनाई थी जिसमें माँ की एक बहन सुषमा के पतिदेव मदन जी का ज़िक्र था । एक दिन पहले ही वेदू मामा और ज्ञान मामा का उपनयन संस्कार भी हुआ । उनके सर मुन्डा दिये गये, जिसके कारण वे बहुत दुखी हुए । पंडित जी ने संस्कार करते हुए कहा “उपनयन के बाद पेड़ पर चढ़ना वर्जित है ৷” लेकिन अगले ही दिन चटनी के लिये आम की ज़रूरत पड़ी और वेदू मामा पंडित जी की निषेधाज्ञा का उल्लंघन करते हुए पेड़ पर चढ़ गये ।
शादी वाले दिन शाम से ही हम लोग बहुत उत्साह में थे । हम लोग नये कपड़े पहन कर इतरा रहे थे । पहली बार फुल पैंट पहनना मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था ৷ रात नौ बजे लगभग दूल्हा बने रामकिशन मौसाजी यानि डॉ.रामकृष्ण गोरख बारात लेकर हमारे यहाँ पहुँचे । बारात भोपाल से आई थी । द्वारचार हुआ फिर खाना पीना और रात में फेरे । जागकर शादी देखने का पहला अवसर था ৷ याद नहीं कि लम्बा चलने वाला यह सीरियल हमने किस एपिसोड देखा ৷
बात झोपडपट्टी के बच्चों से शुरू की थी आशा मौसी के विवाह तक पहुँच गई ৷ ज़िंदगी ऐसे ही मंज़िलों को धोखा देते हुए चलती है नाना नानी को गुजरे कई साल हो गए विगत वर्षों में आशा मौसी और रामकिशन मौसा जी भी गुजर गए ৷ ओमप्रकाश, ज्ञान,रवि और वेदू मामा ने अपने अपने मकान बना लिए ৷ रवि मामा की सालीजी यानी लता जी से मेरा विवाह हो गया और हम लोगों ने भी शहर की एक पॉश कॉलोनी में अपना मकान बना लिया ৷
मेरे घर के पास अटल आवास नाम की एक झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी है जिसे मैं जे जे कॉलोनी कहता हूँ ৷ मैले कुचैले कपडे पहने हुए वहाँ रहने वाले कुछ बच्चे अक्सर मेरी स्ट्रीट से गुजरते हैं ৷ उन्हें देखकर मैं सोचता हूँ क्या यह बच्चे भी यही सोचते होंगे कि भगवान ने कुछ बच्चों को गरीबों के घर में और कुछ बच्चों को अमीरों के घर में क्यों पैदा किया ৷ क्या इसे भी वे अपनी किस्मत मानकर चुप रह जाते होंगे ?
शरद कोकास
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