| मैं और मेरी नानी गायत्री देवी शर्मा |
मैं बाबूजी से ऐसे सवाल करता जिन्हें आजकल की भाषा में ‘सिली क्वेश्चन्स’ कह सकते हैं “मतलब दादाजी के पिताजी के पिताजी के पिताजी और ऐसे उनके भी कोई न कोई पिताजी रहे होंगे ?” बाबूजी कहते “हाँ ৷“ “मतलब उनके पिताजी के भी कोई पिताजी रहे होंगे ?” मेरा अगला सवाल होता ৷
बाबूजी समझ जाते कि ‘उनके पिताजी’ ‘उनके पिताजी’ कहते हुए यह प्रश्नों की श्रंखला आदिम पुरखों तक ले जायेगा इसलिए वे एक बार में ही बता देते “ हाँ, सभी के कोई न कोई पिता रहे हैं, बिना पिता के कोई नहीं होता है ৷ शुरू में एक ही पिता थे, फिर उन की कई संतानें हुईं फिर उनसे कई संतानें हुई और उनसे आगे उनकी हुईं ৷ और इस तरह हम सब एक ही परमपिता की संतान हैं ৷“
“मतलब वो नईम अल्ताफ़ और उनके अब्बा वो भी उसी परमपिता की संतान हैं?” एक और सिली क्वेश्चन ৷ बाबूजी कहते “हाँ आदिम पुरखे तो सबके एक ही थे, फिर उनके किसी पुरखे ने यह धर्म अपना लिया तो वे मुसलमान हो गए, इसी तरह कोई सिख हो गया, कोई ईसाई हो गया लेकिन हैं तो हम सब एक ही परमपिता की संतान ৷”
“अच्छा !“ मैं ऐसे खुश होता जैसे मैंने कोई बड़ा रहस्य जान लिया हो “इसका मतलब ऐसे ही हमारी माँ होती है फिर उनकी कोई माँ होती है फिर उनकी भी माँ होती है ?” बाबूजी कहते “बिलकुल, जैसे बिना पिता के कोई नहीं होता वैसे ही बिना माँ के भी किसी का जन्म नहीं हो सकता৷”
“इसका मतलब ऐसे ही हमारी एक परम माता भी होगी ?” बाबूजी मेरे इस सवाल पर थोड़ा उलझते फिर कहते “जैसे पिता के पिता वही पिता होते हैं वैसे ही माता की माता की माता वही माता नहीं होती ৷ पिता का बीज उसकी संतानों में जाता है लेकिन फिर भाई बहनों से अलग हो जाता है, वे लोग अपना परिवार अलग बसाते हैं इसलिए सगे भाई बहनों के बच्चों की माताएँ अलग अलग होती हैं ৷“ थोड़ा बहुत सर खुजाते हुए मैं उनकी बात समझता और फिर नए सवाल करता ৷ बाबूजी आराम से मेरे सवालों के जवाब देते ৷
लेकिन यह बात मुझे हमेशा खलती थी कि हमें परमपिता की संतान कहा जाता है परममाता की संतान क्यों नहीं ? बहुत बाद में मुझे पता चला कि यह सब नियम पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अंतर्गत बनाए गए हैं यद्यपि संसार में एक ऐसा भी समय था जब यहाँ मातृसत्ता थी और संतानों को उनके पिता के नहीं बल्कि उनकी माता के नाम से जाना जाता था ৷ मैं हमेशा मातृसत्ता के अवशेष दशरथ के पुत्र लक्ष्मण के नाम सुमित्रानंदन में ढूँढता था ৷
बाबूजी ही नहीं माँ भी कभी कभी मेरे सवालों के दायरे में आ जाती लेकिन मैं उनसे वैश्विक सवाल की बजाय पारिवारिक सवाल पूछना ज़्यादा पसंद करता ৷ एक दिन माँ से पूछा मैंने “माँ, तुम्हारी सूरत नाना से ज्यादा मिलती है या नानी से ?” माँ कहती “मुझे कुछ ठीक से याद नहीं, तुम्हारे नाना नानी तो तब ही गुजर गए थे जब मैं दस साल की भी नहीं थी ৷ दयानंद भैया ने ही हमें पाल पोस कर बड़ा किया,शादी करवाई ৷”
बड़े मामा, माँ से उम्र में काफी बड़े थे ৷ वे और उनके अन्य तीन भाई हमारे नाना की पहली पत्नी की संतान थे और माँ,लीला मौसी और सर्वदानंद मामा उनकी दूसरी पत्नी की ৷ नानाजी का यह दूसरा विवाह अंतरजातीय था ৷ हालाँकि यह रहस्य हम बच्चों को काफी बड़े होने के बाद पता चला ৷ जाति तो दूर हमारे चारों बड़े मामाओं ने हम बच्चों को कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वे और माँ अलग अलग माताओं की संतान हैं ৷ मातृकुल के मेरे तमाम रिश्ते हमारी बड़ी नानी की वज़ह से ही हैं ৷ मेरे नानाजी दुर्गा प्रसाद शर्मा के दो विवाह हुए थे, यह बात आज भी हमारे परिवार के अनेक लोगों को नहीं मालूम ৷
“मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी
वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी,
वो नानी की बातों में सदियों का डेरा ..”
जगजीत सिंह की गाई सुदर्शन फ़ाकिर की यह नज़्म जब भी सुनता हूँ तो यही सोचता हूँ मेरी नानी कैसी होगी, कैसी दिखती होगी ? नानी से मिलना तो कभी हुआ नहीं लेकिन एक बार बचपन में कानपुर में नानी की माँ अर्थात माँ की नानी से अवश्य मिले थे ৷ उनके बेटे,शायद उनका नाम दीपक साहू था और माँ की एक मौसी जिनका नाम मीना था ৷
फिर पता नहीं आगे क्या हुआ ৷ क्या कारण रहे कि माँ बाबूजी का उनसे संपर्क बना नहीं रहा ৷ अब तो किसी को पता भी नहीं कि कानपुर में वे लोग कहाँ हैं ৷ पितृसत्ता के दंश बहुत गहरे होते हैं ৷ क्या पता, विजातीय नानी के परिवार को जानबूझकर विस्मृत कर देने के मूल में भी ऐसी कोई बात रही हो ৷
आज भी बुज़ुर्ग महिलाओं में मैं अपनी नानी को ढूँढता हूँ ৷ कभी कभी अपनी नानी मुझे रमाशंकर यादव की इस कविता में भी दिखाई देती है ....
कविता नहीं कहानी है,
और ये दुनिया सबकी नानी है,और नानी के आगे
ननिहाल का वर्णन अच्छा नहीं लगता।
मुझे अपने ननिहाल की बड़ी याद आती है,
आपको भी आती होगी!
एक अंधेरी कोठी में
एक गोरी सी बूढ़ी औरत,
रातो-दिन जलती रहती है चिराग की तरह,
मेरे खयालों में।
मेरे जेहन में मेरी नानी की तसवीर
कुछ इस तरह से उभरती है
जैसे कि बाजरे के बाल पर गौरैया बैठी हो।
और मेरी नानी की आंखे...
उमड़ते हुए समंदर सी लहराती हुई
उन आंखों में,
आज भी आपाद मस्तक डूब जाता हूं
आधी रात को दोस्तों!
और उन आंखों की कोर पर लगा हुआ
काजल,
लगता था कि जैसे
क्षितिज छोर पर बादल घुमड़ रहे हों।
और मेरी नानी की नाक,
नाक नहीं पीसा की मीनार थी,
और मुंह, मुंह की मत पूछो,
मुंह की तारे थी मेरी नानी,
और जब चीख कर डांटती थीं,
तो जमीन इंजन की तरह
हांफने लगती थी।
जिसकी आंच में आसमान का लोहा
पिघलता था,
सूरज की देह गरमाती थी,
दिन धूप लगती थी,
और रात को जूड़ी आती थी।
और गला, द्वितीया के चंद्रमा की तरह,
मेरी नानी का गला पता ही नहीं चलता था,
कि हंसुली में फंसा है या हसुली गले में फंसी है।
लगता था कि गला, गला नहीं,
विधाता ने समंदर में सेतु बांध दिया है।
और मेरी नानी की देह,
देह नहीं आर्मीनिया की गांठ थी,
पामेर के पठार की तरह
समतल पीठ वाली मेरी नानी,
जब कोई चीज उठाने के लिए
जमीन पर झुकती थीं,
तो लगता था जैसे बाल्कन झील में
काकेसस की पहाड़ी झुक गई हो!
बिलकुल इस्कीमों बालक की तरह
लगती थी मेरी नानी।
और जब घर से निकलती थीं,
तो लगता था जैसे
हिमालय से गंगा निकल रही हो!
एक आदिम निरंतरता
जे अनादि से अनंत की और उन्मुख हो।
सिर पर दही की डलिया उठाये,
जब दोनों हाथों को झुलाती हुई चलती थी,
तो लगता था जैसे सिर पर
दुनिया उठाये हुए जा रही हो।
जिसमें मेरे पुरखों का भविष्य छिपा हो,
और मेरा जी करे कि मैं पूछूं,
कि ओ री बुढि़या, तू क्या है,
आदमी कि आदमी का पेड़!
पेड़ थी दोस्तों, मेरी नानी आदमियत की,
जिसका कि मैं एक पत्ता हूं।
मेरी नानी मरी नहीं है,
वह मोहनजोदड़ो के तालाब में
स्नान को गई है,
और अपनी धोती को
उसकी आखिरी सीढ़ी पर सुखा रही है।
उसकी कुंजी यहीं कहीं खो गई है,
और वह उसे बड़ी बेसब्री के साथ खोज रही है।
मैं देखता हूं कि मेरी नानी
हिमालय पर मूंग दल रही है,
और अपनी गाय को
एवरेस्ट के खूंटे से बांधे हुए है।
मैं खुशी में तालियां बजाना चाहता हूं,
लेकिन यह क्या!!
मेरी हथेलियों पर सरसों उग आई है,
मैं उसे पुकारना चाहता हूं,
लेकिन मेरे होठों पर दही जम गई है,
मैं पाता हूं
कि मेरी नानी दही की नदी में बही जा रही है।
मैं उसे पकड़ना चाहता हूं,
पकड़ नहीं पाता हूं,
मैं उसे बुलाना चाहता हूँ,
लेकिन बुला नहीं पाता हूं,
और मेरी देह, मेरी समूची देह,
एक पत्ते की तरह थर-थर कांपने लगती है,
जो कि अब गिरा कि तब गिरा।
शरद कोकास
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