10 जून 2026

139 वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी



‘एक स्त्री और एक पुरुष बिना विवाह किये भी संतान को जन्म दे सकते हैं ৷’ यह साधारण सी बात जब मेरे संज्ञान में आई तो मेरे लिए चिंतन का एक नया आयाम प्रस्तुत हो गया ৷ एक पुरुष अनेक स्त्रियों के साथ और एक स्त्री अनेक पुरुषों के साथ मिलकर संतान उत्पन्न कर सकती है यह जानने के बाद तो मानो मेरे लिए संसार की उत्पत्ति और मनुष्य जाति के विस्तार का मार्ग जानने का रहस्य ही खुल गया ৷ 


मैं बाबूजी से ऐसे सवाल करता जिन्हें आजकल की भाषा में ‘सिली क्वेश्चन्स’ कह सकते हैं “मतलब दादाजी के पिताजी के पिताजी के पिताजी और ऐसे उनके भी कोई न कोई पिताजी रहे होंगे ?” बाबूजी कहते “हाँ ৷“ “मतलब उनके पिताजी के भी कोई पिताजी रहे होंगे ?” मेरा अगला सवाल होता ৷ 


बाबूजी समझ जाते कि ‘उनके पिताजी’ ‘उनके पिताजी’ कहते हुए यह प्रश्नों की श्रंखला आदिम पुरखों तक ले जायेगा इसलिए वे एक बार में ही बता देते “ हाँ, सभी के कोई न कोई पिता रहे हैं, बिना पिता के कोई नहीं होता है ৷ शुरू में एक ही पिता थे, फिर उन की कई संतानें हुईं फिर उनसे कई संतानें हुई और उनसे आगे उनकी हुईं ৷ और इस तरह हम सब एक ही परमपिता की संतान हैं ৷“  


“मतलब वो नईम अल्ताफ़ और उनके अब्बा वो भी उसी परमपिता की संतान हैं?” एक और सिली क्वेश्चन ৷ बाबूजी कहते “हाँ आदिम पुरखे तो सबके एक ही थे, फिर उनके किसी पुरखे ने यह धर्म अपना लिया तो वे मुसलमान हो गए, इसी तरह कोई सिख हो गया, कोई ईसाई हो गया लेकिन हैं तो हम सब एक ही परमपिता की संतान ৷” 


 “अच्छा !“ मैं ऐसे खुश होता जैसे मैंने कोई बड़ा रहस्य जान लिया हो “इसका मतलब ऐसे ही हमारी माँ होती है फिर उनकी कोई माँ होती है फिर उनकी भी माँ होती है ?” बाबूजी कहते “बिलकुल, जैसे बिना पिता के कोई नहीं होता वैसे ही बिना माँ के भी किसी का जन्म नहीं हो सकता৷” 


“इसका मतलब ऐसे ही हमारी एक परम माता भी होगी ?” बाबूजी मेरे इस सवाल पर थोड़ा उलझते फिर कहते “जैसे पिता के पिता वही पिता होते हैं वैसे ही माता की माता की माता वही माता नहीं होती ৷ पिता का बीज उसकी संतानों में जाता है लेकिन फिर भाई बहनों से अलग हो जाता है, वे लोग अपना परिवार अलग बसाते हैं  इसलिए सगे भाई बहनों के बच्चों की माताएँ अलग अलग होती हैं ৷“  थोड़ा बहुत सर खुजाते हुए मैं उनकी बात समझता और फिर नए सवाल करता  ৷ बाबूजी आराम से मेरे सवालों के जवाब देते ৷ 


लेकिन यह बात मुझे हमेशा खलती थी कि हमें परमपिता की संतान कहा जाता  है परममाता की संतान क्यों नहीं ? बहुत बाद में मुझे पता चला कि यह सब नियम पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अंतर्गत बनाए गए हैं  यद्यपि  संसार में एक ऐसा भी समय था जब यहाँ मातृसत्ता थी और संतानों को उनके पिता के नहीं बल्कि उनकी माता के नाम से जाना जाता था ৷ मैं हमेशा मातृसत्ता के अवशेष दशरथ के पुत्र लक्ष्मण के नाम सुमित्रानंदन में ढूँढता था ৷ 


बाबूजी ही नहीं माँ भी कभी कभी मेरे सवालों के दायरे में आ जाती लेकिन मैं उनसे वैश्विक सवाल की बजाय पारिवारिक सवाल पूछना ज़्यादा पसंद करता ৷ एक दिन माँ से पूछा मैंने “माँ, तुम्हारी सूरत नाना से ज्यादा मिलती है या नानी से ?” माँ कहती “मुझे कुछ ठीक से याद नहीं, तुम्हारे नाना नानी तो तब ही गुजर गए थे जब मैं दस साल की भी नहीं थी ৷ दयानंद भैया ने ही हमें पाल पोस कर बड़ा किया,शादी करवाई  ৷” 


बड़े मामा, माँ से उम्र में काफी बड़े थे ৷ वे और उनके अन्य तीन भाई हमारे नाना की पहली पत्नी की संतान थे और माँ,लीला मौसी और सर्वदानंद मामा उनकी दूसरी पत्नी की ৷ नानाजी का यह दूसरा विवाह अंतरजातीय था ৷ हालाँकि यह रहस्य हम बच्चों को काफी बड़े होने के बाद पता चला ৷ जाति तो दूर हमारे चारों बड़े मामाओं ने हम बच्चों को कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वे और माँ अलग अलग माताओं की संतान हैं ৷ मातृकुल के मेरे तमाम रिश्ते हमारी बड़ी नानी की वज़ह से ही हैं ৷ मेरे नानाजी दुर्गा प्रसाद शर्मा के दो विवाह हुए थे, यह बात आज भी हमारे परिवार के अनेक लोगों को नहीं मालूम ৷


“मोहल्ले की सबसे निशानी पुरानी वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी, वो नानी की बातों में सदियों का डेरा ..” जगजीत सिंह की गाई सुदर्शन फ़ाकिर की यह नज़्म जब भी सुनता हूँ तो यही सोचता हूँ मेरी नानी कैसी होगी, कैसी दिखती होगी ?  नानी से मिलना तो कभी हुआ नहीं लेकिन एक बार बचपन में कानपुर में नानी की माँ अर्थात माँ की नानी से अवश्य मिले थे ৷ उनके बेटे,शायद उनका नाम दीपक साहू था और माँ की एक मौसी जिनका नाम मीना था ৷ 


फिर पता नहीं आगे क्या हुआ ৷ क्या कारण रहे कि माँ बाबूजी का उनसे संपर्क बना नहीं रहा ৷ अब तो किसी को पता भी नहीं कि कानपुर में वे लोग कहाँ हैं ৷ पितृसत्ता के दंश बहुत गहरे होते हैं ৷ क्या पता, विजातीय नानी के परिवार को जानबूझकर विस्मृत कर देने के मूल में भी ऐसी कोई बात रही हो ৷  


आज भी बुज़ुर्ग महिलाओं में मैं अपनी नानी को ढूँढता हूँ ৷ कभी कभी अपनी नानी मुझे रमाशंकर यादव की इस कविता में भी दिखाई देती है .... 

 


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