बाज़ार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बाज़ार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

10 जून 2026

153. भंडारा : घर घर में दिवाली मेरे घर में अँधेरा

वह अक्तूबर का उतार था । बाबूजी ने आंगन में निवार का पलंग बिछाया और माँ ने टीन की पेटी से गर्म कपड़े निकालकर उन्हें धूप दिखाने के लिए उस पर डाल  दिया । नीले, पीले, हरे स्वेटरों,शाल,मफलर आदि  के बीच से मेरा पूरी बांह वाला लाल रंग का स्वेटर झाँक रहा था और मुझे ललचा रहा था । मेरा मन हुआ उसे एक बार पहनकर देखूँ । माँ ने कहा “अभी नहीं, शाम तक उसे पूरी धूप लग जाने दो, उसमे बसी बरसात की सीलन उड़ जाये तब पहनना ।

अपने प्रिय लाल स्वेटर में मैं कैसा दिखूंगा इस खयाल के साथ मैं दिन भर उस स्वेटर के साथ बाकी गर्म कपड़ों को भी उलटता पलटता रहा ताकि कमबख्त सीलन अच्छे से निकल जाए । जब से मैंने होश संभाला तब से मेरा यह कोई तीसरा या चौथा स्वेटर रहा होगा । मैंने धूप को जल्दी जल्दी विदा किया और  शाम ढलने से पहले उस स्वेटर को उठाकर अपनी बाहें उसमे डाल दीं । लेकिन यह क्या, मेरा शरीर उस स्वेटर के भीतर जाने को राजी ही नहीं हो रहा था । जैसे तैसे मैंने अपने आप को उसके भीतर घुसाया । बाहें कलाई से कुछ ऊपर आकर ठहर गई और कमर ने निचले हिस्से को  प्यार से अपने पास ही बिठा लिया ।

दिन भर से जमा की गई मेरी खुशी में थोड़ी उदासी घुल गई थी । मैंने माँ से कहा  “देखो ना माँ , स्वेटर छोटा हो गया है ।“ माँ ने मुस्कुराते हुए कहा “स्वेटर छोटा नहीं हुआ, तुम थोड़े बड़े हो गए हो ।“ फिर प्यार से मेरे गाल पर हल्का सा दुलार किया और कहा “कोई बात नहीं, अभी रोज रोज पहनोगे तो थोड़ा ढीला हो जायेगा । इस साल इसी स्वेटर के साथ निकाल लो, अगले साल के लिए एक नया स्वेटर बुन दूंगी।“ 

माँ की बात सुनकर न मैं ठीक से दुखी हो पाया न ही मुस्कुरा पाया ।  लेकिन अगले साल की नौबत नहीं आई । माँ ने अगले ही सप्ताह फेरीवाले से ऊन खरीदा और मेरे नाप का एक स्वेटर बुनना शुरू कर दिया । माँ जैसे ही कहती “पीछे मुड़ो नाप लेना है ।” मैं पीठ पर माँ  की हथेलियों के स्पर्श के साथ उस स्वेटर की गर्माहट भी महसूस करने लगता । रोज रोज थोड़ा थोड़ा स्वेटर बनते हुए देखने का सुख भी अजीब होता है , बड़े बड़े मॉल्स और ऑनलाइन स्टोर्स से स्वेटर खरीदने वाले इस सुख से हमेशा वंचित रहते हैं ।

दिवाली अपने आगमन का संकेत दे रही थी । ठंडी हवाएँ रोज सुबह मेरी रंगोली देखने आ जातीं और गुदगुदाते हुए देह में हल्की सी झुरझुरी भर देतीं । घरों में खिड़की दरवाज़ों और दीवारों का मेकअप शुरू हो गया था । रजाइयों को भी धूप दिखाई जा चुकी थी और वे गद्दों के संग अपनी टीम बना चुकी थीं । हर रात उसके  आगोश में समाते हुए मैं ठण्ड से कांपते हुए कुछ देर घोड़े की तरह हिनहिनाता फिर उसकी गर्मी में गुम हो जाता  । कम्बल मुझे शुरू से ही पसंद नहीं था,रजाई के भार के नीचे दबकर सुख प्राप्त करने का जो अनिर्वचनीय आनंद है वह कम्बल में कहाँ ।

दिवाली के पांच दिनों को मैंने अपनी सुविधा के अनुसार नाम दिए थे, धनतेरस यानी पटाखे खरीदने का दिन, नरक चतुर्दशी उबटन से नहाने और फुलझड़ी जलाने का दिन, लक्ष्मीपूजन नए कपड़े पहनने और पटाखे छुड़ाने का दिन,बलि प्रतिपदा सुर्री पटाखे बटोरने का दिन और भाई दूज बचा खुचा स्टॉक खत्म करने का दिन । थोड़ी सी फुलझड़ी, छोटे वाले लक्ष्मी बम, टिकिया वाला सांप, महताब वाली माचिस और टिकली की डिब्बियों का एक पैकेट बस इससे अधिक की न चाहत थी न गुंजाईश । राजेश फटाका दुकान पर बाबूजी की जेब इससे अधिक की इजाज़त भी नहीं देती थी । लक्ष्मी पूजन वाले दिन बाबूजी सुबह सुबह लक्ष्मी जी की वही पुरानी मिट्टी की मूरत लेकर निकालते  और  गांधी चौक वाले पेंटर से उसे रीपेंट करवाकर ले आते  । साथ में लाते  सिंघाड़े, खील बताशे और पूजा की सामग्री । 

हम लोग आम की पत्तियों का तोरण बनाते और उसे दरवाज़े पर टांग देते । तोरण के बीच बीच में गेंदे के फूल की छोटी छोटी लड़ियाँ । नए कपड़े पहनने की इच्छा भी शाम को जल्दी बुला नहीं सकती थी सो इंतजार करते ।  बाबूजी की वेशभूषा में शामिल होता हर साल पहना जाने वाला कोसे का कुरता और माँ की वेशभूषा में अपनी सबसे अच्छी साड़ी । इधर पीतल की परात में दिये सजाकर रख दिए जाते । पटाखों की राशनिंग के अनुसार मैं कुछ पटाखे निकालता और राह देखता कब ओम  जय जगदीश हरे का हूटर बजे  और मैं धड़ाम धुडूम शुरू करूँ । 

लक्ष्मी पूजन और आतिशबाजी के बाद हर साल की तरह उस साल भी बाबूजी ने कहा “चलो शहर की रौशनी देखकर आते हैं ।“  वैसे भी हमारे पटाखे चुक गए थे और टाइम पास नहीं हो रहा था । दूसरों को पटाखे छुडाते देखना भी उतना ही आनंददायक होता है जितना खुद छुड़ाना, राजनेताओं की जनता का  मन बहलाने वाली बात की तरह यह बात भी बचपन से ही हमारे भेजे में डाल दी गई थी ।

हम अपनी गली से निकले और गलियाँ पार करते हुए मेन रोड पर पहुँचे । जैसे जैसे हम बड़ी सड़क पर आ रहे थे आतिशबाजी और सजावट का वर्गभेद स्पष्ट होता जा रहा था । फिर भी हम बच्चों को रंगोली देखने और दूसरों को पटाखे छुड़ाते देखने में आनंद आ रहा था । हमारा गंतव्य था मेन रोड पर दो मारवाड़ी व्यवसाइयों की इमारतें जिनके आंगन में उनके घर की बेटियाँ बड़ी सी रंगोली डालतीं और उसे खूब सजातीं थीं ।

इन इमारतों पर  बिजली के नन्हे बल्बों से सजावट भी की जाती थी । हम मिट्टी के दिए वालों के लिए ,बिजली के छोटे छोटे बल्बों की यह सीरीज भी खुश होने का एक सबब था । रोशनी, नये कपड़े, पटाखे ,मिठाई और रंगोली के अलावा लोगों को खुश होते देखना भी हमें  अच्छा लग रहा था । दूसरों के सुख में सुखी होने का भाव कुछ तरह जन्मा था कि ऐसा लगने लगा था कि इस दिन संसार में शायद ही कोई दुखी रहता होगा । लेकिन उस साल  मेरा यह भ्रम टूट गया । 

गांधी चौक से आगे शहर की जगमगाती सड़क हम बड़े बाज़ार की ओर बढ़ ही रहे थे की पटेल मेडिकल स्टोर्स के पास अचानक एक भिखारी सामने आ गया । जीर्ण शीर्ण वस्त्र पहने हाथ में कटोरा लिये वह धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था । मैंने देखा कि वह देख नहीं सकता है । मैंने ध्यान देकर सुना तो वह एक गाना गा रहा था .. घर घर में दिवाली है मेरे घर में अन्धेरा...।” भिखारी का दिखाई देना तो आम बात थी लेकिन उस वक़्त उसका दिखाई देना मुझे उदास कर गया । 

हम लोग आगे बढ़ाते हुए सारडा  बिल्डिंग तक आ गए थे । बहन सीमा ने रंगोली  की ओर इशारा किया “ भैया देखो कितनी अच्छी रंगोली  है । “ मैं बार बार पीछे मुड़कर देख रहा था, वह नेत्रहीन भिखारी दूर जा चुका था लेकिन मेरा ध्यान उस की ओर ही लगा था । मुझसे रहा नहीं गया और मैंने बाबूजी से पूछा “ बाबूजी यह दिवाली के दिन भी भीख मांग रहा है ? “ बाबूजी ने कहा ...” हाँ बेटा, वह भीख नहीं मांगेगा तो उसके घर चूल्हा कैसे जलेगा । “ “ तो “ मैंने कहा वह दिवाली कब मनायेगा ? “ बाबूजी ने कहा “ वह नेत्रहीन है ,उसके लिये क्या दिवाली क्या ईद । “ 

बचपन का वह लाल स्वेटर जाने कहाँ चला गया, माँ बाबूजी भी दुनिया से चले गए, कितनी दीवालियों में कितने दीप जले और बुझ गए । पटाखे छुड़ाना तो कबका बंद हो गया । दिवाली अब भी हर बरस आती है , मैं भी बाबूजी की परम्परा का निर्वाह करते हुए बिटिया को लेकर उसे शहर की रौशनी दिखाने ले जाता हूँ । लेकिन आज भी मेरी निगाहें उस नेत्रहीन भिखारी को ढूँढती हैं । वह तो शायद अब इस दुनिया में नहीं होगा लेकिन उस जैसे लाखों करोड़ों लोग अब भी हैं जो अपनी सूनी आँखों में भयावह अन्धेरे का चित्र लिये आँख वालों की इस दुनिया में मुश्किलों से भरी अपनी ज़िन्दगी जीने  को अभिशप्त हैं । जब भी आप दिये की ज्योत जलाएँ तो ऐसे लोगों को याद अवश्य कीजियेगा जिनकी आँखों की ज्योत बुझ चुकी है ।


शरद कोकास 

71 भंडारा : लाल किले और मांडू के महलों के चबूतरे


उन दिनों कस्बों और छोटे शहरों में मेन रोड नामक एक रास्ता हुआ करता था ৷ शहर की मुख्य दुकानें इसी रोड के दोनों ओर हुआ करती थीं ৷ कुछ दुकानों के ऊपर दुकान के मालिक का निवास हुआ करता था अतः रात में भीतर से दुकान बंद करने की सुविधा उन्हें प्राप्त थी ৷ सुबह सुबह दुकानें खुलतीं, दुकान मालिक दुकान के आगे झाड़ू लगाकर पानी सींचते और अगरबत्ती लगाकर बोहनी की राह देखते ৷ अगरबत्ती की खुशबुओं के बीच बाज़ार की सुबह एक पवित्र सी सुबह लगती ৷

भंडारा का मुख्य बाज़ार गांधी  चौक के आसपास ही केन्द्रित था । गांधी चौक से बस स्टैंड जाने वाली मेन रोड के दोनों ओर कुछ  दुकानें थीं जिनमें कपड़ा,किराना,अनाज,जूते,बर्तन,स्टेशनरी,दवा,मिठाई,बल्ब से लेकर हार्डवेयर सामग्री तक सब कुछ मिला करता था । उसी तरह एक रास्ता गांधी चौक से महल की ओर जाता था उस पर भी दुकानों का निर्माण  प्रारंभ हो चुका था ৷ शहर के दोनों सिनेमाघर भी इसी मार्ग पर थे ৷

बस स्टैंड के पास का क्षेत्र बड़ा बाज़ार कहलाता था । पोस्ट ऑफिस चौक और तुरस्कर टी हाउस के बीच एक पुरानी इमारत थी जिसे बारादरी कहते थे । शायद बारह दरवाज़ों की वज़ह से इसका यह नाम पड़ा था ৷ यह अंग्रेजों के समय बनी लाल पत्थर की एक ईमारत थी ৷ लाल किले और मांडू के महलों का आभास देती इस इमारत में केवल खम्भे और चबूतरे शेष थे ৷ छत की जगह आसमान दिखाई देता था  इन्ही चबूतरों पर  प्रति रविवार और बुधवार को सब्ज़ी बाज़ार लगा करता था । 

बाबूजी रविवार और बुधवार ड्यूटी से लौटने के बाद अपनी साइकिल की  घंटी टनटनाते हुए बाज़ार जाते थे और दो तीन दिनों के लिए सब्ज़ियाँ फल इत्यादि ले आते थे । हम बच्चे उनके लौटने का बेसब्री से इंतज़ार करते ৷ वयस्कों की प्रिय सब्जी से हमें कोई सरोकार न होता लेकिन उनके थैले में सब्ज़ी के अलावा हम लोगों की मनपसन्द कोई न कोई चीज़ अवश्य होती थी, कभी सिंघाड़े, कभी अमरूद ,जिन्हे स्थानीय भाषा में जाम कहते हैं ,कभी पपीता,चना बूट,जामुन,बेर आदि । सेब,अनार जैसे महँगे फलों की किस्मत में उस झोले के माध्यम से हमारे घर तक का प्रवास नहीं लिखा था । महँगे फलों को हम सजी हुई फलों की दुकान  में या  ‘अ’ अनार का पढ़ते हुए किताबों में देखते थे । हमें पता था, बाबूजी की जेब में रखी आमदनी की किताब में ‘अ’ से अनार नहीं बल्कि ‘अ’ से अमरुद लिखा है ।

इधर जैसे ही ठण्ड शुरू होती ओस से भीगी हुई चने की भाजी बाज़ार में आने लगती ৷ हरे चने को मराठी में सोला कहते हैं ৷ हम बच्चों के लिए एक हाथ में हरे चने का गुच्छा पकड़कर दूसरे हाथ से एक एक चना ढूँढकर और उसे दांत या नाखूनों की सहायता से छीलकर खाने से बड़ा करतब और टाइम पास कुछ नहीं होता था ৷ अक्सर हम लोग आंगन में आग जलाकर उसमे हरे चनों से युक्त वह गुच्छा भूनते और फिर राख से काले पड़ चुके होलों या सोलों को छीलकर उनके भीतर से चने निकालकर खाते ৷ यह हमें सीप से मोती निकालने की तरह लगता था ৷ महाराष्ट्र में गेहूँ ,चना,ज्वार आदि की हरी बालियों को आग में भूनकर बने इस भुने अनाज को हुरडा कहते हैं ৷ कभी कभी हम लोग खेतों की ओर चले जाते और किसानों के साथ हुरडा पार्टी में शामिल हो जाते ৷ भुने हुए उन हरे चनों का सोंधापन आज भी कभी कभी ज़ुबान पर मचल जाता है ৷

बादाम,अखरोट,खुबानी,चिलगोज़ा, जैसे मेवों के हमने केवल नाम सुने थे और बड़ी बड़ी दुकानों में उन्हें कांच के मर्तबानों में सजा हुआ देखा था । बहुत से मेवे तो हम पहचानते ही नहीं थे कि कैसे दिखाई देते हैं । स्मृति के हल्के से चित्र में एक काबुलीवाला था जिसे बलराज सहानी कहते थे, जब पहली बार काबुलीवाला आया पिस्ता बादाम लाया यह गीत सुना तो बाबूजी से पूछा था पिस्ता क्या होता है ? बाबूजी ने केवल इतना बताया कि एक मेवा होता है ৷ पिस्ता नामक इस अफगानी मेवे के दर्शन उस उम्र में हुए जब काबुलीवाला फिल्म देखने की समझ पैदा हुई ৷

ऐसा नहीं कि हमने उस ग़रीबी में मेवे न देखे हों ৷ मेवों के नाम पर कभी कभी खीर में डालने के लिए बाबूजी चार आठ आने के छुहारे, काजू या चिरौंजी ले आया करते थे । टुकड़े वाले काजू कुछ सस्ते मिला करते थे लेकिन कभी कभार पुड़िया में कोई साबुत काजू निकल आता था ৷ माँ पुड़िया खोलकर खीर में डालने से पहले  वह साबुत काजू मुझे पकड़ा देती , मैं काफ़ी देर तक उस काजू को उलट पलट कर देखता फिर आशा भरी नज़रों से माँ की ओर देखता ,माँ मेरा आशय समझकर गर्दन ऊपर करते हुए मुझे संकेत देती ‘खा लो’ ,  फिर मैं उस साबुत काजू को लेकर गली में चला जाता और आधे घंटे तक उसे कुतर कुतर कर खाता रहता ৷

दुकानों के अलावा बादाम के दर्शन पास पड़ोस में होने वाले सत्यनारायण की कथा में पूजा की चौकी पर भी होते थे । पंडित लक्षमण प्रसाद शुक्ला चौकी पर लाल कपड़ा बिछाते और नवग्रहों की स्थापना करते हुए वहाँ नौ सुपारी,नौ खारीक, नौ बादाम रखते । पड़ोस में होने वाली इन कथाओं में मैं सबसे आगे बैठता और मिलने वाली खारीक या छुहारे की लालच में लीलावती कलावती की पूरी कथा सुनता । पंडित जी मुझे कोकास गुरूजी के बेटे के रूप में जानते थे इसलिए कथा समाप्त होने पर अपना माल असबाब समेटते हुए मुझ पर कृपा बरसाते हुए वे मुझे एक छुहारा पकड़ा देते लेकिन मैं ललचाई नज़रों से बादाम की ओर देखता । ऐसा कई बार हुआ लेकिन कभी भी उन्हें मुझ पर तरस नहीं आया और मैं ग्रहों की कृपा से वंचित ही रहा  ।

शरद कोकास 

6 जून 2026

50.बैतूल : कौनसा आम खाते थे तुलसीदास


अंग्रेज़ों ने जैसे भारत में प्रवेश करने की स्मृति में मुंबई में गेट वे ऑफ़ इंडिया बनाया था वैसे ही अनेक शहरों में प्रवेश द्वार बनाये थे बैतूल का कमानिया गेट भी ऐसा ही एक दरवाज़ा था । कमानिया गेट से जैसे ही मार्च का महीना बैतूल शहर की सीमा के भीतर प्रवेश करता उसके पीछे पीछे जंगल की ओर से आनेवाली आम के बौर की मादक गंध भी प्रवेश कर जाती ।  

हमारे मोहल्ले के अंतिम छोर से निकलने वाली रिंग रोड शहर की भी अंतिम सीमा थी । रिंग रोड से एक कच्चा रास्ता हमारे खेतों की ओर चला जाता था । मार्च आते ही इस रास्ते के दोनों ओर  लगे आम के पेड़ों पर कूकती हुई कोयलों के समवेत स्वरों में में कोई गोंडी गीत सुनाई देने लगता ।

अप्रेल के अंत तक गेहूँ कट कर खलिहान में चला जाता और भूसा नए घर के पीछे वाली कोठरी में रख दिया जाता । हम समझ जाते कि अब इसके पीछे पीछे अमराई से तोड़े हुए आम आयेंगे । कोयलों की तरह हम लोग भी आम पकने की प्रतीक्षा करने लगते ।

अमराई के आम घर आने से पहले बाज़ार में दूर दूर से आम आने लगते । इतवार और  बृहस्पतिवार के बाज़ार में रघुबीर टाकीज की ओर जाने वाली सड़क के दोनों ओर आम के टोकने लिए बैठे आम विक्रेता दिखाई देने लगते । गर्मी के दिनों में सब्जियों के अलावा तरबूज और आम बाज़ार की शोभा होते थे । श्याम काका आवाज़ लगाते “चलो कौन चल रहा है आम लेने ?”  हम दो तीन लोग तो तैयार हो ही जाते थे ।

दरअसल श्याम चाचा के साथ आम खरीदने जाने का अर्थ होता था पेट भर आम खाने का मौका मिलना । उन दिनों चखने के लिए खरीददार की हथेली पर ज़रा सा रस टपकाने या चाकू से काटकर आम की एक फाँक पकड़ा देने का कंजूसी से भरा चलन नहीं था । आम बेचने वाले खरीददार को चखने के लिये पूरा चुसना आम ही दे दिया करते थे । हमारे घर में आम भी सैकड़े की तादाद में ख़रीदा जाता था । श्याम चाचा कम से कम बीस दुकानों पर जाते और अंत में तय करते “ वो रघुवीर टाकीज के गेट के बाएँ तरफ़ जो बैठा है ना , उसके पास ठीक आम है । फिर टोकरे का भाव तय किया जाता और हम में से कोई न कोई उस टोकरे को सर पर रखकर घर छोड़ आता । सब्जियाँ भी इसी तरह से ख़रीदी जाती थीं, पांच किलो बैंगन लिया टोकरी सर पर रखकर दौड़कर घर पहुँचे, किचन से लगे कमरे में सब्जी उंडेली और फिर वापस आकर श्याम काका के पास तैनात हो गए । 

आम के उन ख़ास दिनों में श्याम काका के साथ बाज़ार जाने के लिये बच्चों के बीच प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन जायेगा । । बैतूल अपनी विशिष्ट प्रजाति के गाजर्या आम के लिए प्रसिद्ध है इसका स्वाद कुछ कुछ गाजर की तरह होता है  ।  बैतूल में हम लोगों के लिए आम की कमी नहीं थी फिर भी रास्ते चलते हुए पेड़ों पर पत्थर मारकर आम गिराने में जो आनंद आता था उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । हरे आमों के बीच कोई पकती हुई सांख भर दिख जाए फिर समझो उसका काम तमाम ৷ हम बच्चों के बीच एक मिथ चलता था कि जिस आम पर बैठकर कोयल पाद देती है उसका स्वाद बहुत मीठा हो जाता है । 

शाम को जब मदन मोहन ताउजी मानस पाठ के लिए दालान में बैठते तो श्रोताओं में एक न एक बार उस साल की आम की फ़सल के बारे में बात ज़रुर होती थी । अब राम का और तुलसीदास का क्या सम्बन्ध था यह तो हमें उस समय नहीं पता था लेकिन अभी अभी पंकज चतुर्वेदी की एक कविता पढ़ने में आई तो लगा कि कुछ न कुछ सम्बन्ध अवश्य रहा होगा । पंकज लिखते हैं... 


रसाल है रामचरित / 

और रसाल है / 

अवधी में उसका विन्यास / 

भक्ति का रस / और काव्य का रस / 

जानने में/ शायद इससे मदद मिले/ 

कि कौन-सा आम / खाते थे तुलसीदास / 


तुलसी बाबा कौनसा आम खाते थे और आम खाने के क्या किस्से सुनाते थे यह तो मुझे पता नहीं लेकिन बैतूल से जुड़े हुए आम के किस्सों की मेरे पास कमी नहीं है  । 

अब पढिए एक मजेदार किस्सा 

हम लोगों के खेत में भी आम के पेड़ थे जो उन दिनों फल देने लगे थे । मनमोहन ताउजी खेत से बहुत सारा कच्चा आम तुड़वाकर घर में भेज देते थे जिन्हें  तह लगाकर भूसे के बीच रख दिया जाता था  ताकि कुछ दिनों बाद वे पक जाएँ और उन्हें खाया जा  सके । बड़ी माँ यानि बिन्नू की माँ इस कमरे की इंचार्ज थीं । उन्हें पता था कि कौनसा आम कब रखा गया है और वह कब पकेगा ।हम लोग आम रखने में उनकी मदद करते थे और इस रहस्य को जान लेते थे । जैसे जैसे खेत से कच्चा आम आता उसे वहाँ रख दिया जाता । आम रखे जाने के बाद बड़ी माँ उस कमरे में ताला लगा देती थीं । 

बड़ी माँ और माँ 

मैं और बिन्नू भैया इस बात का बराबर हिसाब रखते थे कि किस ओर रखा हुआ आम कब तक पकेगा जैसे ही वह समय आता हमारी चौर्य कला आजमाने का समय भी आ जाता । बड़ी माँ रोज दोपहर में खाना खाकर कुछ देर के लिए सो जाती थीं । सोते हुए वे आम वाले कमरे की चाबी का गुच्छा अपनी तकिया के नीचे रख लेती थीं । उन्हें सोता हुआ जानकर हम लोग उनकी तकिया के नीचे से धीरे से चाबियाँ निकालते और आम वाले कमरे का ताला खोलकर कुछ आम चुरा लेते फिर चाबियाँ यथा स्थान रख कर आम लेकर पुराने घर में आते और चूस चूस कर आराम से आम खाते । 

एक दिन बड़ी माँ ने  बहुत प्यार से हम लोगों को बुलाया और पूछा “ बेटा आम खाओगे ? “ नेकी और पूछ पूछ , हम लोगों ने तुरंत हाँ कर दी । आम के सार्वजनिक वितरण से इतर यह हम लोगों पर उनकी विशेष कृपा थी । वे आम की कोठरी का ताला खोलकर भीतर गईं और एक टोकरी में बहुत सारे आम लेकर आ गईं, फिर  एक बाल्टी भर पानी में उन्हें डुबो दिया । यह चुसना आम थे जिन्हें चूस चूस कर खाया जाता था । वे बहुत प्यार से धो धो कर हम लोगों को आम देती रहीं । हम बाएँ हाथ की मध्यमा और अंगूठे के बीच उन्हें रख पिलपिला करते फिर उसका मुँह खोलकर दो बूंद रस बाहर टपकाते और फिर हुए चूस चूस कर खा जाते  । बड़ी माँ हम दोनों को उसी तरह देखती रहीं जैसे यशोदा मैया कृष्ण और बलदाऊ को मक्खन खाते हुए देखती होगी ।  

आठ दस आम खाने के बाद हम लोगों का पेट भर गया । मैंने बड़ी माँ से कहा “ बस बड़ी माँ, अब पेट भर गया । । “ वे बोलीं “ बस बेटा, एक आम और खा लो । “  मैंने बिन्नू भैया की ओर देखा बिन्नू भैया ने संकेत किया ‘खा लो’  बड़ी मुश्किल से वह एक आम खाया गया । लेकिन बड़ी माँ तो एक एक आम लिए फिर तैयार थीं  ..”लो बस एक और खा लो ..।“ हमने मना किया तो उन्होंने धमकी दी “नहीं खाओगे, तो कल से एक भी आम नहीं मिलेगा ।“ मज़बूरी में हम लोगों ने फिर एक एक आम खाया । 

यह हमारी भूख,स्वाद,इच्छा और तृप्ति की इन्तहा थी । अगला आम उनके हाथ में देखकर हम लोगों ने सुबक सुबक कर रोना शुरू कर दिया ..”बस बड़ी माँ..बस.. अब नहीं खा सकते ..बस ..अब पेट फूट जायेगा, अब नहीं ।“ बड़ी माँ मुस्कुराईं और हम बच्चों पर रहम दिखाते हुए कहा ..ठीक है , अब नहीं देंगे लेकिन पहले बोलो कि  अब से आम चुराकर तो नहीं खाओगे ? “ 

हम दोनों ने रोते रोते चौंक कर उनकी ओर देखा .. हमें समझ में आ गया था कि उन्हें हम लोगों की इस चोरी का  पता चल गया है और वे हमें प्यार से आम नहीं खिला रही थीं बल्कि इस तरह चोरी की सज़ा दे रही थीं । हम लोगों ने कान पकड़ कर कहा “ठीक है, अब से चोरी नहीं करेंगे । “ तब जाकर हम लोगों को छुट्टी मिली ।

शरद कोकास 

मित्रों, पोस्ट के अंत मे टिप्पणियों के नीचे जाएं । यहाँ “ मुख्यपृष्ठ “ पर क्लिक करने से आप मेरे ब्लॉग्स के मीनू या लेटेस्ट सूची तक पहुँच सकते हैं उसके नीचे जहां " वेब वर्शन देखें " लिखा है उसे क्लिक करने पर जो पेज खुलेगा उसमें साइड बार में मेरी पुस्तकों के चित्र हैं जो वस्तुतः उन्हें पढने के लिए लिंक हैं । उन पर क्लिक करें और “कविता कोश” में मेरी कविताएँ पढ़ें । उसी तरह वहाँ दिए गए ब्लॉग्स के चित्र पर टच कर आप मेरे अन्य ब्लॉग्स तक पहुँच सकते हैं - शरद कोकास