उन दिनों कस्बों और छोटे शहरों में मेन रोड नामक एक रास्ता हुआ करता था ৷ शहर की मुख्य दुकानें इसी रोड के दोनों ओर हुआ करती थीं ৷ कुछ दुकानों के ऊपर दुकान के मालिक का निवास हुआ करता था अतः रात में भीतर से दुकान बंद करने की सुविधा उन्हें प्राप्त थी ৷ सुबह सुबह दुकानें खुलतीं, दुकान मालिक दुकान के आगे झाड़ू लगाकर पानी सींचते और अगरबत्ती लगाकर बोहनी की राह देखते ৷ अगरबत्ती की खुशबुओं के बीच बाज़ार की सुबह एक पवित्र सी सुबह लगती ৷
भंडारा का मुख्य बाज़ार गांधी चौक के आसपास ही केन्द्रित था । गांधी चौक से बस स्टैंड जाने वाली मेन रोड के दोनों ओर कुछ दुकानें थीं जिनमें कपड़ा,किराना,अनाज,जूते,बर्तन,स्टेशनरी,दवा,मिठाई,बल्ब से लेकर हार्डवेयर सामग्री तक सब कुछ मिला करता था । उसी तरह एक रास्ता गांधी चौक से महल की ओर जाता था उस पर भी दुकानों का निर्माण प्रारंभ हो चुका था ৷ शहर के दोनों सिनेमाघर भी इसी मार्ग पर थे ৷
बस स्टैंड के पास का क्षेत्र बड़ा बाज़ार कहलाता था । पोस्ट ऑफिस चौक और तुरस्कर टी हाउस के बीच एक पुरानी इमारत थी जिसे बारादरी कहते थे । शायद बारह दरवाज़ों की वज़ह से इसका यह नाम पड़ा था ৷ यह अंग्रेजों के समय बनी लाल पत्थर की एक ईमारत थी ৷ लाल किले और मांडू के महलों का आभास देती इस इमारत में केवल खम्भे और चबूतरे शेष थे ৷ छत की जगह आसमान दिखाई देता था इन्ही चबूतरों पर प्रति रविवार और बुधवार को सब्ज़ी बाज़ार लगा करता था ।
बाबूजी रविवार और बुधवार ड्यूटी से लौटने के बाद अपनी साइकिल की घंटी टनटनाते हुए बाज़ार जाते थे और दो तीन दिनों के लिए सब्ज़ियाँ फल इत्यादि ले आते थे । हम बच्चे उनके लौटने का बेसब्री से इंतज़ार करते ৷ वयस्कों की प्रिय सब्जी से हमें कोई सरोकार न होता लेकिन उनके थैले में सब्ज़ी के अलावा हम लोगों की मनपसन्द कोई न कोई चीज़ अवश्य होती थी, कभी सिंघाड़े, कभी अमरूद ,जिन्हे स्थानीय भाषा में जाम कहते हैं ,कभी पपीता,चना बूट,जामुन,बेर आदि । सेब,अनार जैसे महँगे फलों की किस्मत में उस झोले के माध्यम से हमारे घर तक का प्रवास नहीं लिखा था । महँगे फलों को हम सजी हुई फलों की दुकान में या ‘अ’ अनार का पढ़ते हुए किताबों में देखते थे । हमें पता था, बाबूजी की जेब में रखी आमदनी की किताब में ‘अ’ से अनार नहीं बल्कि ‘अ’ से अमरुद लिखा है ।
इधर जैसे ही ठण्ड शुरू होती ओस से भीगी हुई चने की भाजी बाज़ार में आने लगती ৷ हरे चने को मराठी में सोला कहते हैं ৷ हम बच्चों के लिए एक हाथ में हरे चने का गुच्छा पकड़कर दूसरे हाथ से एक एक चना ढूँढकर और उसे दांत या नाखूनों की सहायता से छीलकर खाने से बड़ा करतब और टाइम पास कुछ नहीं होता था ৷ अक्सर हम लोग आंगन में आग जलाकर उसमे हरे चनों से युक्त वह गुच्छा भूनते और फिर राख से काले पड़ चुके होलों या सोलों को छीलकर उनके भीतर से चने निकालकर खाते ৷ यह हमें सीप से मोती निकालने की तरह लगता था ৷ महाराष्ट्र में गेहूँ ,चना,ज्वार आदि की हरी बालियों को आग में भूनकर बने इस भुने अनाज को हुरडा कहते हैं ৷ कभी कभी हम लोग खेतों की ओर चले जाते और किसानों के साथ हुरडा पार्टी में शामिल हो जाते ৷ भुने हुए उन हरे चनों का सोंधापन आज भी कभी कभी ज़ुबान पर मचल जाता है ৷
बादाम,अखरोट,खुबानी,चिलगोज़ा, जैसे मेवों के हमने केवल नाम सुने थे और बड़ी बड़ी दुकानों में उन्हें कांच के मर्तबानों में सजा हुआ देखा था । बहुत से मेवे तो हम पहचानते ही नहीं थे कि कैसे दिखाई देते हैं । स्मृति के हल्के से चित्र में एक काबुलीवाला था जिसे बलराज सहानी कहते थे, जब पहली बार काबुलीवाला आया पिस्ता बादाम लाया यह गीत सुना तो बाबूजी से पूछा था पिस्ता क्या होता है ? बाबूजी ने केवल इतना बताया कि एक मेवा होता है ৷ पिस्ता नामक इस अफगानी मेवे के दर्शन उस उम्र में हुए जब काबुलीवाला फिल्म देखने की समझ पैदा हुई ৷
ऐसा नहीं कि हमने उस ग़रीबी में मेवे न देखे हों ৷ मेवों के नाम पर कभी कभी खीर में डालने के लिए बाबूजी चार आठ आने के छुहारे, काजू या चिरौंजी ले आया करते थे । टुकड़े वाले काजू कुछ सस्ते मिला करते थे लेकिन कभी कभार पुड़िया में कोई साबुत काजू निकल आता था ৷ माँ पुड़िया खोलकर खीर में डालने से पहले वह साबुत काजू मुझे पकड़ा देती , मैं काफ़ी देर तक उस काजू को उलट पलट कर देखता फिर आशा भरी नज़रों से माँ की ओर देखता ,माँ मेरा आशय समझकर गर्दन ऊपर करते हुए मुझे संकेत देती ‘खा लो’ , फिर मैं उस साबुत काजू को लेकर गली में चला जाता और आधे घंटे तक उसे कुतर कुतर कर खाता रहता ৷
दुकानों के अलावा बादाम के दर्शन पास पड़ोस में होने वाले सत्यनारायण की कथा में पूजा की चौकी पर भी होते थे । पंडित लक्षमण प्रसाद शुक्ला चौकी पर लाल कपड़ा बिछाते और नवग्रहों की स्थापना करते हुए वहाँ नौ सुपारी,नौ खारीक, नौ बादाम रखते । पड़ोस में होने वाली इन कथाओं में मैं सबसे आगे बैठता और मिलने वाली खारीक या छुहारे की लालच में लीलावती कलावती की पूरी कथा सुनता । पंडित जी मुझे कोकास गुरूजी के बेटे के रूप में जानते थे इसलिए कथा समाप्त होने पर अपना माल असबाब समेटते हुए मुझ पर कृपा बरसाते हुए वे मुझे एक छुहारा पकड़ा देते लेकिन मैं ललचाई नज़रों से बादाम की ओर देखता । ऐसा कई बार हुआ लेकिन कभी भी उन्हें मुझ पर तरस नहीं आया और मैं ग्रहों की कृपा से वंचित ही रहा ।
शरद कोकास

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