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10 जून 2026

145. भंडारा : जय जय शिव शंकर कांटा लगे न कंकर


पहली बार जब मैंने उन्हें देखा तो वे एक फ्रेम में कैद घर की दीवार पर लटके हुए थे ৷ गोरे और साँवले इंसानों की दुनिया में उनके नीले होने का सबब मुझे यही बताया गया कि वे भगवान हैं ৷  धीरे धीरे मुझे पता चला कि भगवानों को यह हक़ होता है कि वे मनचाहे रंग के हो सकते हैं,उनके चाहे जितने सर या हाथ भी हो सकते हैं ৷ 

रावण के चित्र से परिचय होने के उपरांत ब्रह्माजी के तीन सरों के तारतम्य में जब मैंने उन्हें भी भगवान कहा तो मुझे बताया गया कि यह भगवान नहीं राक्षस है ৷ मैंने पूछा कि फिर इनके दस सर क्यों हैं ? मुझे उसी तरह बहला दिया गया जिस तरह ईश्वर के स्वरूप को लेकर बच्चों को बहला दिया जाता है ৷ 

आज इस परम्परा का विस्तार धर्म के अलावा राजनीति के क्षेत्र में भी हो गया है और भक्तों के लिए उनके नेता चाहे जैसे हों वे ही उनके ईश्वर हैं ৷

शाम अँधेरा घिरने से पहले खेलकर आने के उपरांत हाथ मुँह धोकर आरती में शामिल होने की परंपरा में माँ बाबूजी के साथ मैं उस तस्वीर के सामने खड़ा हो जाता और अपने भोलेपन में भोले की तस्वीर को निहारता रहता ৷ रघुवीर मूलगाँवकर की बनाई हुई उस तस्वीर में मुझे नीले रंग में बना शिवजी का चेहरा अपने नाक नक्श में एक स्त्री के चेहरे की भांति दिखाई देता था ৷ मैंने स्त्रियों को कभी नीले चेहरे में नहीं देखा था इसलिए मैं उन्हें भगवान ही समझता था ৷  

फिर कुछ दिनों बाबूजी ने किसी कैलेण्डर से काटकर शिव पार्वती और गणेश की एक तस्वीर निकाली और उसे टीन के एक ड्रम पर चिपका दिया ৷ ऐसे ही शिव पार्वती की एक तस्वीर उन्होंने एक लैम्प शेड पर लगाईं । उस लैम्प में रेल्वे के सिग्नल वाला लाल काँच लगा था और उसे हरतालिका के समय शिव पार्वती की प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की प्रतिमा के ऊपर लटकाया जाता था ৷ 

एक दिन माँ ने कहा “देखो इस चित्र में जो शिवजी हैं ना वो बाबूजी हैं और यह पार्वती माता जैसे हम, और तुम जैसे नन्हे गणेश ৷” मैंने कहा “लेकिन इसमें तो पार्वती जी ब्लाउज़ नहीं पहने हैं, तुम तो पहनती हो ৷” माँ हँसने लगी “अरे वो कैलाश पर्वत पर रहती थी ना शंकर जी  के साथ, वहाँ कपड़े नहीं मिलते होंगे ৷ या उस समय चलन नहीं रहा होगा ৷ ” 

मैं पूछना चाहता था.. “फिर पार्वती जी साड़ी क्यों पहने हुए है ? शिवजी तो व्याघ्र की खाल में ही प्रसन्न हैं  और नन्हे गणेश को नंगू नंगू क्यों रखा उसे भी तो कुछ पहनाना चाहिए था ना?” लेकिन मैंने उनसे नहीं पूछा ৷ उन दिनों भी आज की तरह बच्चों का मुँह यह कह कर बंद करवा दिया जाता था कि भगवान के बारे में ज़्यादा सवाल नहीं पूछा करते ৷

माइथोलॉजी के अध्ययन के अंतर्गत आदिम परम्पराओं में देवी देवताओं की उत्पत्ति पर शोध करते हुए और देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय की ‘लोकायत’ पढ़ते हुए यद्यपि मुझे अपने प्रश्नों के उत्तर मिल गए लेकिन माँ की बात उस समय मेरे अवचेतन में इस तरह अवस्थित हुई कि मैं दोनों को शिव पार्वती के रूप में ही देखने लगा ৷ हालाँकि वे दोनों मुझे कैलेण्डर वाले शिव पार्वती से भी अधिक बहुत सुन्दर लगते थे ৷

बड़े होने के बाद  कालिदास की ‘कुमार संभव’ में मुझे वे फिर मिले और मैंने उन दृश्यों में फिर उन्हें देखा लेकिन जिस सहजता से माँ ने मुझसे कह दिया था मैं उनसे कभी नहीं कह पाया ৷ बाबूजी से तो कहने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता था, उनका भी तीसरा नेत्र दिखाई नहीं देता था ৷ 


144 मेरे बचपन की फ़ाइल में कश्मीर


हर शाम आरती के समय शिवजी की तस्वीर के सामने खड़ा होकर मैं उसे एकटक देखा करता ৷ वह रघुवीर मूलगाँवकर की बनाई हुई एक खूबसूरत पेंटिंग थी जिसमे पीछे की ओर बर्फ से ढंके पहाड़ दिखाई देते थे । बाबूजी ने एक दिन बताया कि यह कैलाश पर्वत है । मैंने पूछा “यह कहाँ है ?” बाबूजी का जवाब था “कश्मीर में ।“ इस तरह कश्मीर शब्द से मेरा पहला परिचय शिवजी की कॉलोनी के रूप में हुआ ।

फिर एक दिन एक तस्वीर देखी । उसमे खूबसूरत से पहाड़ थे और ढेर सारे चीड़ के दरख्त । वह तस्वीर कश्मीर की थी जिसमे नीचे एक कैप्शन लिखा था “अगर फ़िरदौस बर रुए ज़मी अस्त हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त “ अर्थात धरती पर अगर स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है । बाबूजी ने बताया कश्मीर को सही मायने में "धरती का स्वर्ग" कहा जाता है。 हिमालय की गोद में बसी यह घाटी अपनी बर्फ से ढकी चोटियों ,शांत शांत साफ झीलों और घने जंगलों  के लिए जानी जाती है ।  यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य किसी भी यात्री को मंत्रमुग्ध कर देता है

कुछ बड़ा हुआ और फ़िल्मी गानों को सुन कर समझने की सुघड़ता पैदा हुई तो गाना सुना “हर चेहरा यहाँ चाँद है हर ज़र्रा सितारा, ये वादी ए कश्मीर है जन्नत का नज़ारा ।“ उर्दू का कुछ ज्ञान हुआ तो पता चला कि जन्नत का मतलब स्वर्ग होता है । 

दीपक कुमार और विम्मी (आबरू 1968)

स्वर्ग नर्क सम्बन्धी पौराणिक ज्ञान प्राप्त होने के बाद मैंने मन ही मन यह समीकरण बना लिया कि कश्मीर में जन्नत है अर्थात स्वर्ग है और लोग मरने के बाद स्वर्ग जाते हैं इसलिए लोग मरने के बाद पक्का कश्मीर ही जाते होंगे

फिर एक फिल्म आई ‘कश्मीर की कली’ । उन दिनों फिल्म निर्देशक बहुत इमानदार हुआ करते थे । तय था कि अगर फिल्म में कश्मीर के दृश्य हैं तो शूटिंग कश्मीर में ही होगी । आज की तरह स्टूडियो में बैठकर और कंप्यूटर ग्राफिक्स से कश्मीर के दृश्य नहीं डाले जाते थे । दर्शकों को पता रहता था कि कहानी पूरी तरह काल्पनिक है,पात्र नकली हैं लेकिन स्थान के दृश्य कम से कम वास्तविक है । आज के दर्शकों की अपेक्षा वे दर्शक अधिक समझदार थे जो फिल्म की काल्पनिक कथा और यथार्थ में अंतर करना जानते थे ।

‘कश्मीर की कली’ नामक फिल्म में पहली बार शिकारा और हाउस बोट देखा यानी नाव पर बसा एक घर देखा । मैंने कहा “वाओ.. नाव में ही सब, ड्राइंग रूम भी, बेड रूम भी, किचन भी ।“ एक सवाल मन में आया “लेकिन यह लोग टॉयलेट के लिए कहाँ जाते होंगे ?” हालाँकि आज तक यह सवाल किसी से पूछ नहीं पाया । सोच रहा था क्या पता ‘कश्मीर फाइल’ में इसका उत्तर मुझे मिल जाए । 

हालाँकि फिर कश्मीर के मुताल्लिक यह जानने की इच्छा भी होगी कि वहाँ के लोग पढाई लिखाई, चिकित्सा आदि के लिए कहाँ जाते होंगे ? क्या पर्याप्त स्कूल, कॉलेजेस और अस्पताल वहाँ होंगे ? ‘टॉयलेट’ की बात तो अब पुरानी हो गई ना ।

फिर कुछ बड़ा होने पर फिल्म ‘आपकी कसम’ में एक गाना देखा ‘जय जय शिवशंकर काँटा लगे न कंकरजो प्याला तेरे नाम का पिया ’ पता चला कि यह गाना गुलमर्ग में किसी मंदिर की सीढ़ियों पर फिल्माया गया है और आज भी लोग जब वहाँ जाते हैं तो गाइड बताता है , “साहेबान यह वही सीढियाँ हैं जहाँ राजेश खन्ना और मुमताज भंग पीकर टुन्न हो गए थे ।“ क्या करूँ ..कभी कभी सत्ता की सीढ़ियों में मुझे वैसी ही सीढियाँ दिखाई देती हैं ।


फिर थोड़ा और बड़ा हुआ तो नवें दशक की फिल्म ‘बेताब’ देखी सनी देओल अमृता सिंह वाली जिसे कश्मीर की घाटियों में फिल्माया गया था । कहते हैं फिल्म के बाद उस घाटी का नाम ही ‘बेताब घाटी’ पड़ गया । फिल्म की शूटिंग से पहले इस जगह को 'हगन वैली' (Hagan Valley) या 'हागून' (Hagoon) के नाम से जाना जाता था। यह दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में पहलगाम से कुछ ही दूरी पर स्थित है। यह हरी-भरी वादियों, ऊंचे बर्फीले पहाड़ों और लिद्दर नदी के लिए दुनिया भर में मशहूर है। 
बेताब घाटी 
अब इस नामकरण वाली बात मे पता नहीं इसमें कितना सच है कितना झूठ ..साहब की जुबान की तरह ।

जो भी हो, मेरे बचपनकी फाइलों में मेरा कश्मीर आज भी वैसा ही है । आज भी बचपन के उन गीतों को सुनता हूँ तो याद आता है मुझे रूमानी होना कश्मीर ने ही सिखाया था । जब पहली बार अपनी टीन एज के पूर्वार्ध में देशबंधु वार्ड  वाले मकान मे, बीच का कमरे मे बिछे पलंग पर रखे बिस्तर के ढेर पर पीठ टिकाकर  रेडियों पर बजता सुना था फिल्म ‘वासना’ का वह गीत ...

“ये पर्वतों के दायरे ये शाम का धुआँ... ऐसे में क्यों न छेड़ दें दिलों की दास्ताँ”


अब यह गाना भले ही कश्मीर में ना फ़िल्माया गया हो लेकिन जब भी इसे सुनता हूँ तो हल्की हल्की सी ठंड,सिहरन  जिस्म में महसूस होती है एक अलग ही रूमानियत पैदा हो जाती है। ऐसा ही कुछ महसूस किया था उस समय जब 2014 मे मैं ऊटी गया था । 

 अब कमलेश्वर जी की बात करें उन्होंने तो कश्मीर के लिए जो प्रेम जगाया कि पूछो मत । याद कीजिए उनके उपन्यास ‘डाक बंगला’ की वो पंक्तियाँ....

” पहलगाम से आडू का रास्ता.. बाएँ लिद्दर बह रही है और दाएँ पहला पठार घास फूलों से ढंका है, उसी की कमर पर से पतला रास्ता जा रहा है ... "

जब मैं इस प्रेरणा से अभिभूत होकर लिखना शुरू करता हूँ तो कश्मीर का अनंत सौन्दर्य मुझ पर हावी हो जाता है ।“


मित्रों , मेरे बचपन की कश्मीर फाइल में कश्मीर कुछ ऐसा ही है, खूबसूरत दृश्यों से भरा हुआ । उसमे ज़ाफ़रान की खुशबू के बीच ‘एक था गुल और एक था बुलबुल’ की कहानी का पन्ना लगा हुआ है । डर लगता है ‘इस चमन में कोई सैयाद न आ जाये’ और उस पन्ने को नोचकर फेंक दे । इस फ़ाइल में आज भी सच्चाई, सुन्दरता, प्रेम, मोहब्बत, सौहार्द्र, भाईचारा,ज़िंदगी आदि के ढेर सारे पन्ने लगे हैं । डर है कोई उन पन्नों को वैमनस्यता, झूठ,नफ़रत, दरिन्दगी,मौत के पन्नों में ना बदल दे ।