हर शाम आरती के समय शिवजी की तस्वीर के सामने खड़ा होकर मैं उसे एकटक देखा करता ৷ वह रघुवीर मूलगाँवकर की बनाई हुई एक खूबसूरत पेंटिंग थी जिसमे पीछे की ओर बर्फ से ढंके पहाड़ दिखाई देते थे । बाबूजी ने एक दिन बताया कि यह कैलाश पर्वत है । मैंने पूछा “यह कहाँ है ?” बाबूजी का जवाब था “कश्मीर में ।“ इस तरह कश्मीर शब्द से मेरा पहला परिचय शिवजी की कॉलोनी के रूप में हुआ ।
फिर एक दिन बाबूजी के टूर एल्बम में एक तस्वीर देखी । उसमे खूबसूरत से पहाड़ थे और ढेर सारे चीड़ के दरख्त । वह तस्वीर कश्मीर की थी जिसमे नीचे एक कैप्शन लिखा था “अगर फ़िरदौस बर रुए ज़मी अस्त हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त “ अर्थात धरती पर अगर स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है ।
कुछ बड़ा हुआ और फ़िल्मी गानों को सुन कर समझने की सुघड़ता पैदा हुई तो गाना सुना “हर चेहरा यहाँ चाँद है हर ज़र्रा सितारा, ये वादी ए कश्मीर है जन्नत का नज़ारा ।“ उर्दू का कुछ ज्ञान हुआ तो पता चला कि जन्नत का मतलब स्वर्ग होता है । स्वर्ग नर्क सम्बन्धी पौराणिक ज्ञान प्राप्त होने के बाद मैंने मन ही मन यह समीकरण बना लिया कि कश्मीर में जन्नत है अर्थात स्वर्ग है और लोग मरने के बाद स्वर्ग जाते हैं इसलिए लोग मरने के बाद पक्का कश्मीर ही जाते होंगे ।
फिर एक फिल्म आई ‘कश्मीर की कली’ । उन दिनों फिल्म निर्देशक बहुत इमानदार हुआ करते थे । तय था कि अगर फिल्म में कश्मीर के दृश्य हैं तो शूटिंग कश्मीर में ही होगी । आज की तरह स्टूडियो में बैठकर और कंप्यूटर ग्राफिक्स से कश्मीर के दृश्य नहीं डाले जाते थे । दर्शकों को पता रहता था कि कहानी पूरी तरह काल्पनिक है,पात्र नकली हैं लेकिन स्थान के दृश्य कम से कम वास्तविक है । आज के दर्शकों की अपेक्षा वे दर्शक अधिक समझदार थे जो फिल्म की काल्पनिक कथा और यथार्थ में अंतर करना जानते थे ।
‘कश्मीर की कली’ नामक फिल्म में पहली बार शिकारा देखा यानी नाव पर बसा एक घर देखा । मैंने कहा “वाओ.. नाव में ही सब, ड्राइंग रूम भी, बेड रूम भी, किचन भी ।“ एक सवाल मन में आया “लेकिन यह लोग टॉयलेट के लिए कहाँ जाते होंगे ?” हालाँकि आज तक यह सवाल किसी से पूछ नहीं पाया । सोच रहा था क्या पता ‘कश्मीर फाइल’ में इसका उत्तर मुझे मिल जाए । हालाँकि फिर कश्मीर के मुताल्लिक यह जानने की इच्छा भी होगी कि वहाँ के लोग पढाई लिखाई, चिकित्सा आदि के लिए कहाँ जाते होंगे ? क्या पर्याप्त स्कूल, कॉलेजेस और अस्पताल वहाँ होंगे ? ‘टॉयलेट’ की बात तो अब पुरानी हो गई ना ।
फिर कुछ बड़ा होने पर फिल्म ‘आपकी कसम’ में एक गाना देखा ‘जय जय शिवशंकर काँटा लगे न कंकरजो प्याला तेरे नाम का पिया ’ पता चला कि यह गाना गुलमर्ग में किसी मंदिर की सीढ़ियों पर फिल्माया गया है और आज भी लोग जब वहाँ जाते हैं तो गाइड बताता है , “साहेबान यह वही सीढियाँ हैं जहाँ राजेश खन्ना और मुमताज भंग पीकर टुन्न हो गए थे ।“ क्या करूँ ..कभी कभी सत्ता की सीढ़ियों में मुझे वैसी ही सीढियाँ दिखाई देती हैं ।
फिर थोड़ा और बड़ा हुआ तो नवें दशक की फिल्म ‘बेताब’ देखी सनी देओल अमृता सिंह वाली जिसे कश्मीर की घाटियों में फिल्माया गया था । कहते हैं फिल्म के बाद उस घाटी का नाम ही ‘बेताब घाटी’ पड़ गया । पता नहीं इसमें कितना सच है कितना झूठ ..साहब की जुबान की तरह ।
जो भी हो, मेरे बचपनकी फाइलों में मेरा कश्मीर आज भी वैसा ही है । आज भी बचपन के उन गीतों को सुनता हूँ तो याद आता है मुझे रूमानी होना कश्मीर ने ही सिखाया था । जब पहली बार अपनी टीन एज के पूर्वार्ध में सुना था फिल्म ‘वासना’ का वह गीत ...
“ये पर्वतों के दायरे ये शाम का धुआँ... ऐसे में क्यों न छेड़ दें दिलों की दास्ताँ”
और कमलेश्वर जी ने तो कश्मीर के लिए जो प्रेम जगाया कि पूछो मत । याद कीजिए उनके उपन्यास ‘डाक बंगला’ की वो पंक्तियाँ....” पहलगाम से आडू का रास्ता.. बाएँ लिद्दर बह रही है और दाएँ पहला पठार घास फूलों से ढंका है, उसी की कमर पर से पतला रास्ता जा रहा है ... जब मैं इस प्रेरणा से अभिभूत होकर लिखना शुरू करता हूँ तो कश्मीर का अनंत सौन्दर्य मुझ पर हावी हो जाता है ।“
मित्रों , मेरे बचपन की कश्मीर फाइल में कश्मीर कुछ ऐसा ही है, खूबसूरत दृश्यों से भरा हुआ । उसमे ज़ाफ़रान की खुशबू के बीच ‘एक था गुल और एक था बुलबुल’ की कहानी का पन्ना लगा हुआ है । डर लगता है ‘इस चमन में कोई सैयाद न आ जाये’ और उस पन्ने को नोचकर फेंक दे । इस फ़ाइल में आज भी सच्चाई, सुन्दरता, प्रेम, मोहब्बत, सौहार्द्र, भाईचारा,ज़िंदगी आदि के ढेर सारे पन्ने लगे हैं । डर है कोई उन पन्नों को वैमनस्यता, झूठ,नफ़रत, दरिन्दगी,मौत के पन्नों में ना बदल दे ।
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