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10 जून 2026

156 हिस्ट्री ज्याग्रफी बड़ी बेवफ़ा रात को रटो दिन को सफा

घनश्याम ,नईम और शरद 

हफ़ीज़ खान मास्साब कहते थे “हिस्ट्री ज्याग्रफी बड़ी बेवफ़ा रात को रटो दिन को सफा। ” स्कूल के उन दिनों में हम इतने बड़े तो हो गए थे कि वफ़ा और बेवफ़ा का फर्क हमें मालूम था । वैसे भी मुकेश का गाया गीत “वफ़ा जिनसे की बेवफ़ा हो गए” उन दिनों रेडियो पर खूब बजता था, तो हमने सोचा कि बेवफ़ा से क्या दिल लगाना सो हम कुछ छात्रों ने  हाईस्कूल में आर्ट्स के बदले साइंस ले लिया ।

हालाँकि साइंस की क्लास में हम लोग अल्पसंख्यक थे । पहले ही दिन जब फिजिक्स केमेस्ट्री मैथ्स की क्लास में एक भी लड़की नहीं दिखाई दी तो क्षण भर के लिए लगा कि कहीं गलत डिसीजन तो नहीं ले लिया? लेकिन फिर अपना विशिष्टता बोध उस भाव पर हावी हो गया कि साइंस तो दिमाग वाले लोग पढ़ते हैं । वैसे भी भाषा की क्लासेस तो सबकी साथ ही होती थी ।

पहले ही दिन ढगे सर की फिज़िक्स की क्लास थी । ढगे सर सीधे सादे से थे । दुबली पतली काया, एक ढीली ढाली शर्ट और पैरों में चमड़े की चप्पलें , लेकिन बहुत बढ़िया पढ़ाते थे । पहले ही दिन उन्होंने कहा आज हम फिजिक्स का इतिहास पढेंगे । ओ माँ... यहाँ भी इतिहास पढ़ना है । लेकिन साइंटिस्ट का इतिहास राजाओं के इतिहास से बेहतर था । राजाओं का इतिहास पढने से भले राजा बनने की प्रेरणा न मिले लेकिन वैज्ञानिकों का इतिहास वैज्ञानिक बनने के लिए प्रेरित करता था । धीरे धीरे थोडा थोडा इंटरेस्ट आने लगा ।

केमिस्ट्री के ढवले सर अच्छे ऊंचे पूरे थे और धोती कमीज पहनकर साइकिल चलाते हुए स्कूल आया करते थे। उनके पास एक झोला रहता था जिसमे केमिस्ट्री की एक फटी पुरानी किताब होती थी । वे हफीज खान सर के बिलकुल विपरीत थे, हफीज खान सर को किताबों की जरुरत नहीं पड़ती थी और ढवले सर बिना किताब के पढ़ा ही नहीं सकते थे ।

यह रहस्य हमें तब पता चला जब एक दिन वे अपना झोला लेकर नहीं आये । हमारी कक्षा के खुराफाती छात्रों को आईडिया मिल गया । जिस दिन हमे केमिस्ट्री पढ़ने की इच्छा नहीं होती हम उनका झोला लैब में कहीं छुपा देते । बस वे पूरे टाइम अपना झोला ढूँढते रहते और हम लोगों की छुट्टी हो जाती । लेकिन एक दिन हम लोगों की पोल खुल गई फिर तो ऐसी डांट  पडी कि पढाई और मस्ती के सारे समीकरण बिगड़ गए ।

गणित वाले उके सर बहुत टिपटॉप रहते थे । बाकायदा आयरन की गई शर्ट और क्रीज वाली पेंट । वे एक हाथ पीछे पीठ की ओर रख लेते और बोर्ड पर गणित का सवाल हल कर देते । फिर कहते  अच्छा तो यह तुम लोगों की समझ में आ गया होगा, इसे कॉपी में उतार  लो । उनके इन दोनों वाक्यों के बीच में कोई गैप नहीं रहता था सो हम लोग भी बिना गणित समझे गुरु की आज्ञा मानकर चुपचाप सवाल कॉपी में उतार लेते ।

लेकिन इन सब मस्तियों, और अरुचि का असर यह हुआ कि हम लोग सभी विषयों में कमजोर रह गए । आगे चलकर जिसकी परिणति कई छात्रों द्वारा साइंस से आर्ट ले लेने में हुई । मेरा हाल मत पूछो , जिसे मैं बेवफा समझता था उसी हिस्ट्री ने पोस्ट ग्रेजुएशन लेवल तक मेरा साथ निभाया और आज भी निभा रही है । 

जीवन में तरह तरह के गुरु मिलते हैं जिनके तरह तरह के छात्र होते हैं । मेरे लिए  आज उन गुरुजनों को याद करना इसलिये जरुरी है कि विज्ञान पढ़ाने के बहाने उन्होंने मुझमे वैज्ञानिक चेतना का बीजारोपण किया । 

लेकिन इस बारे में मेरा अपना मत है कि केवल विज्ञान पढ़ लेने से हम में वैज्ञानिक  चेतना नहीं आ जाती  उसे सायास अपने भीतर लाना होता है । वर्ना हम सारी जिन्दगी एक और विज्ञान को मानते हैं , विज्ञान  के प्रयोग करते रहते हैं ,नए नए वैज्ञानिक अविष्कार करते हैं दूसरी ओर अंधविश्वासों में घिरे रहते हैं । हमारे मस्तिष्क में यह दोहरी प्रणाली किस तरह चलती है इस पर बात फिर कभी ।   

शरद कोकास 


155. भंडारा : मेरे हाइस्कूल के शिक्षक : हफ़ीज़ खान मास्साब

गाँधी विद्यालय 

“अपनी ग्रामर की किताब कौन कौन नहीं लेकर आया है ?” हफ़ीज़ खान मास्साब की कड़कती हुई आवाज़ क्लास में गूँज रही थी । अब छात्रों में इतनी शर्म तो बाकी थी कि वे हाथ खड़ा कर खीसे निपोरकर नहीं कह सकते थे कि सर ,मैं नहीं लाया हूँ । मास्साब का अगला फरमान था  “ठीक है  जो लोग अपनी किताब लेकर नहीं आए हैं वे क्लास से बाहर चले जाएँ और अगली बार किताब लेकर ही क्लास में एंटर करें ।“

उसके बाद उन्होंने कहा “अब अपनी किताब खोलें और पेज नंबर फलां फलां निकाले ।“ सब ने अपनी किताब खोलकर डेस्क पर फैला ली । “ठीक है पहले बेंच से शुरू करें एक्टिव वौइस् पैसिव वौइस् ।“ पहला नंबर मेरा ही होता था मैंने शुरू किया कोलम्बस  डिस्कवर्ड अमेरिका , अमेरिका वाज़ डिस्कवर्ड बाय कोलम्बस ।“ “ वैरी गुड सर ने कहा “नेक्स्ट ।” मेरे साथ वाला छात्र अनुपस्थित था ज़ाहिर है मुझसे पीछे वाले का नंबर था वह थोड़ा असावधान था या फिर उसका ध्यान कहीं भटक गया था वह हड़बड़ी में पन्ने पलटाने लगा और इधर उधर देखने लगा । मास्साब ने कहा “ यहाँ वहाँ क्या देख रहे हो ? पेज नंबर फलां फलां ऊपर से सेवंथ रो ।

वैसे यह एक कक्षा का सामान्य दृश्य हो सकता है फिर इस क्लास में ऐसी क्या विशेषता थी ? विशेषता यह थी कि सबको अपनी अपनी किताब लाने का हुक्म देने वाले हफ़ीज़ खान मास्साब की टेबल पर कोई किताब नहीं थी और इसके ज़रूरत भी नहीं थी इसलिए कि उन्हें रेन और मार्टिन की पूरी ग्रामर पेज दर पेज लाइन दर लाइन याद थी और वे अपनी याददाश्त से बता रहे थे फलां पेज पर फलां लाइन देखो ।   

उम्रदराज़ हफ़ीज़ खान मास्साब बरसों से गाँधी विद्यालय भंडारा में इंग्लिश पढ़ाते आ रहे थे होमवर्क करके न लाने पर वे सीधे सीधे कहते “ दुनिया में काम प्यारा होता है चाम नहीं “ । भंडारा में हिंदी उर्दू मीडियम का एकमात्र स्कूल होने के कारण वे सभी छात्र जिनकी मातृभाषा मराठी नहीं थी इसी स्कूल में पढ़ते थे और यहाँ को एजुकेशन था 

हफ़ीज़ खान मास्साब उस ज़माने में भी बहुत प्रोग्रेसिव थे और लड़कियों की शिक्षा पर बहुत ध्यान देते थे । उनकी नज़र में लडके लडकियाँ सब बराबर थे । “अच्छा तो क्या नाम है आपका ?” उनका डायलाग कुछ इस तरह शुरू होता ..बिलकिस बेगम... बेगम मतलब जिसे कोई ग़म नहीं । पढ़ाई लिखाई में कमज़ोर हैं लेकिन कोई ग़म नहीं ।“ बेगम का यह मतलब पहली बार सुना था हम लोगों ने 

हफ़ीज़ खान मास्साब की हमेशा की एक ही वेशभूषा थी उनका रहन सहन बहुत सादा था वे छत्तीस इंच मोहरी का एक पायजामा और उस पर एक लम्बी घुटनों तक आनेवाली क़मीज़ । पैंट शर्ट में हमने उन्हे बस एकाध बार ही देखा है ।

एक दिन लंच टाइम में क्लास के उधमी छात्रों ने शरारतन बेंचों को लात मार मार कर टेढ़ा कर दिया जस्ट उसके बाद हफ़ीज़ खान सर की क्लास थी । “ ये बेंचे किसने टेढ़ी की हैं ? क्लास में प्रवेश करते ही हफीज़ खान सर की गरजती हुई आवाज़ क्लास में गूंजी । सारे छात्र व छात्रायें सर झुकाकर खड़े थे लेकिन किसीकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि कोई कुछ कहे ।  वे एक एक कर सभी के पास गये और बहुत प्यार से पूछा “ बेटा यह बेंचे किसने गिराई हैं ?” लेकिन सबके सब चुप । 

मास्साब मुस्कुराने लगे “ अच्छा इतनी एकता है तुम लोगों में कि गुनहगारों का नाम भी नहीं बताओगे । ठीक है फिर सभी को सज़ा मिलेगी । सब गुनाह में बराबर के शरीक हैं चलो लड़कियों के अलावा बाकी सब लोग बेंच पर खड़े हो जाओ । “ हफीज़ खान सर ने आदेश दिया । सभी बच्चे बेंच पर खड़े हो गये लेकिन मैं अपने स्थान पर ही खड़ा रहा । वे मेरे पास आये और कहने लगे ..” क्यों भाई क्या आप लोकमान्य तिलक हैं या गान्धीजी हैं जो गुनाह में अपने आप को शरीक नहीं मान रहे हैं ।“

“ठीक है अपने साथियों के नाम बताइये ।“ सर ने धीरे से कहा । मैंने पढ़ रखा था कि लोकमान्य तिलक के साथ भी उनके बचपन में ऐसा ही वाकया हुआ था, जब उन्हें क्लास में मूंगफल्ली के छिलके फ़ैलाने के लिए डांट पडी थी तब उन्होंने कहा था “ न मैं अपने साथियों के नाम बताउंगा न ही सज़ा भोगूंगा क्योंकि यह कचरा मैंने नहीं फैलाया है ।“

मैंने उसी तर्ज पर कहा “ यह बेंचे मैंने टेढ़ी नहीं की हैं ।“ “ ठीक है सच कहने की हिम्मत है तुममें । “ सर ने  कहा लेकिन  बाकी लोग खड़े रहें ।“ मुझे लगा सर लोकमान्य तिलक की कहानी भूल गए हैं  क्योंकि उस कहानी मे ऐसा नहीं हुआ था बल्कि उनके टीचर ने सभीको माफ़ कर दिया था ।

लेकिन हफ़ीज़ खान सर को भी शीघ्र ही इस बात का अहसास हुआ और उन्होंने अगली बार ऐसा न हो इस हिदायत के साथ सब छात्रों को बेंच से नीचे उतरने का आदेश दिया । यह कहने की ज़रूरत नहीं कि दो मिनट में हम लोगों ने क्लासरूम यथावत कर दिया । “  

हफ़ीज़ खान मास्साब उसी साल रिटायर हो गए थे । बरसों बाद एक दिन मैं उनसे मिलने उनके घर गया अस्सी से ऊपर उम्र थी वे बूढ़े और कमज़ोर दिखाई से रहे थे और उन्हें आँखों से भी कम दिखाई देने लगा था मैंने उन्हें अपना नाम बताया तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा “बेटा तुम्हे देख तो नहीं सकता लेकिन महसूस कर सकता हूँ । खूब खुश रहो ।“

हफ़ीज़ खान मास्साब से स्कूल लाइफ में जितने भी डायलाग्स हम बच्चों ने सुने थे उनसे यह डायलाग बहुत अलग था । वे सब तो हम एक कान  से सुनकर दूसरे से निकाल देते थे लेकिन यह डायलाग मन के भीतर तक पहुँच गया । आज हफ़ीज़ खान मास्साब दुनिया में नहीं हैं लेकिन उन्हें मैं महसूस कर सकता हूँ ।  


शरद कोकास 

135 . भंडारा : वह चिंटू बाबा वाला स्कूल का कैम्प नहीं था

 

संवादों में अक्सर देश और समाज की डिक्शनरी पलटने वाले लोग उन दिनों उन पन्नों को अधिक पलटते थे जिनमे ‘राष्ट्र प्रेम’ और ‘राष्ट्रवादी’ की जगह ‘देशप्रेम’ और ‘देशभक्त’ जैसे शब्द लिखे थे ৷ दो दशक पहले देश को आज़ादी दिलाने वाले अधिकांश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उस समय जीवित थे और “तुम में ही कोई गौतम होगा, तुम में ही कोई होगा गाँधी” जैसे गीत गाते हुए “दुनिया को प्यार की राह दिखाने और नफ़रत की आंधी रोकने” के लिए हम बच्चों को प्रेरित करते थे ৷

सिनेमा शुरू होने से पहले दिखाई जाने वाले भारतीय समाचार चित्र में फ़ौजी जवानों को बढ़िया मिलिट्री यूनिफ़ॉर्म में देखकर स्कूल ड्रेस में ही हमारी भुजाएँ फड़कने लगती और हम सोचते क्या कभी ऐसी ही फ़ौजी ड्रेस पहनकर हमें परेड में मार्च करने का अवसर प्राप्त होगा ৷ पाकिस्तान और चीन से हुए ताज़े ताज़े युद्ध के पेशेनज़र फ़ौज में भरती होकर देशसेवा करने का ख्याल भी कभी कभी मन में आता था ৷

ड्रेस पहनने के उस ख्याल को जब मैंने एक दिन हमारे एन सी सी ऑफिसर के सामने प्रकट  किया तो उन्होंने कहा “सुबह ऑफिस में आना और ड्रेस ले जाना, बेल्ट, कैप,शूज़ सब ৷ मैंने घर में बहुत गर्व से जब यह बात बताई तो किसीने कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी ৷ मन थोडा उदास हुआ उसी तरह जैसे आजकल फेसबुक में पोस्ट पर किसी की टिप्पणी न आने से होता है ৷ वैसे उन दिनों माता-पिता आज के पैरेंट्स की तरह बच्चों के हर काम में दखल नहीं देते थे ৷ ऐसे छोटे मोटे कामों में बच्चों को अपना निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता थी ৷ मैंने सोचा कोई बात नहीं अब इन्हें ड्रेस पहनकर ही बताऊंगा कि मैंने एन सी सी ले ली है ৷

ड्रेस लेने गए तो वहाँ बड़ी कक्षाओं के छात्रों की लाइन लगी थी ৷ मुझ जैसे कम उम्र बच्चे के लिए कोई ठीक ठाक ड्रेस ही नहीं थी शर्ट जो थी वह मुझसे डबल साइज़ की, हाफ़ पैंट तो नीचे से इतने चौड़े जैसे आधे कटे हुए पेटीकोट ৷ बड़ी मुश्किल से अपने साइज़ की एक  ड्रेस मिली ৷ सीनियर्स ने बता ही दिया था कि कैसे आरारोट पानी में खौलाना है, फिर कपड़ों में कलफ लगाना है, टोपी के बैज और बेल्ट के बकल को ब्रासो से चमकाना है और कपड़े के जूतों पर  लाल खड़िया पाउडर पोतना है ৷ शर्ट की आस्तीन कोहनी के ऊपर तक और उतनी ही मुड़ी होनी चाहिए जितनी सार्जेंट के सिगरेट के पैकेट की लम्बाई है ৷ 


परेड के पहले दिन ही मज़ा आ गया ৷ लेफ्ट राईट के बाद विश्राम फिर ब्रेक में क्रीम वाले ऑरेंज बिस्किट साथ  में पार्ले जी के चार पारंपरिक ग्लूकोज़ बिस्किट भी ৷ सार्जेंट ने कहा “सब कैडेट होशियार, दिवाली तक हफ़्ते में दो दिन अच्छे से परेड करना है , जो अच्छा परेड करेगा उसको विंटर में कैम्प में जाने को मिलेगा ৷ अहा कैम्प..  मुझे ‘मेरा नाम जोकर’ का वह चिंटू बाबा वाला स्कूल का कैम्प याद आ गया ৷ 

लेकिन हफ्ते में दो बार सुबह दो घंटे जमकर परेड करते हुए दो-तीन बार चक्कर खाकर गिर जाने के बाद यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई कि सिनेमा और डॉक्युमेंट्री में दिखाई जाने वाली फौजियों की लाइफ देखकर प्रेरित होने की बेवकूफ़ी कभी नहीं करनी चाहिए ৷ सभ्य शब्दों में कहूँ तो इस तरह देशभक्ति के मोह में फँसना नहीं चाहिए ৷ बहरहाल देशप्रेम का जज़्बा फिर भी इस ख्याल पर हावी था और बीच में छोड़ देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था ৷     

दिवाली की छुट्टियों से पहले ही बता दिया गया कि दस दिवसीय इस कैम्प की लाइफ कैसी होगी, खाने को क्या मिलेगा, क्या क्या ले जाना है, क्या नहीं ले जाना है वगैरह वगैरह ৷ जानेवाले दिन हम लोग स्कूल में इकठ्ठा हुए ৷ मिलिटरी का एक ट्रक आया और हम सभी पच्चीस तीस बच्चों को को उसमे भरकर वैनगंगा नदी के किनारे स्थित भीलवाड़ा नामक एक गाँव में ले जाया गया ৷ यह सब कुछ बहुत रोमांचक था ৷

उस विशाल कैम्प एरिया में अनेक स्कूलों के तम्बुओं के बीच हमारे स्कूल के लिए एक खास जगह तय थी ৷ टेंट में अपना सामान पटककर हम लोग गाँव घूमने निकल गए, इस हिदायत के साथ कि शाम को अटेंडेंस के पहले तक लौट आना है ৷भीलवाडा, नदी का किनारा, गिरोला पहाडी और उसके आसपास का क्षेत्र घूमते  हुए मन में ख्याल आ रहा था  कि  रोज़ इसी तरह सैर करने को मिलेगा ৷

लेकिन अगले ही दिन हमारे ख़्वाबों का यह शीशे का मर्तबान गिरकर चकनाचूर हो गया जब हमें पता चला कि अगले दिन से दस दिनों तक का प्रोग्राम फिक्स है ,सुबह पाच बजे उठना, फिर शौच नहाने धोने आदि के बाद हल्का फुल्का नाश्ता, फिर तीन घंटे परेड दोपहर दो बजे लंच, फिर आराम, फिर स्नैक्स चाय और शाम की परेड, आदि ৷

कैम्प का टेम्पररी शौचालय बहुत अजीब टाइप का था, मैदान में एक लम्बा सा गढ्ढा खोदकर उस पर लकड़ी के तख्ते रख दिए गए थे ৷ हर तख्ते के बीचोबीच एक चौकोर छेद  था ৷ उस के दोनों ओर पैर जमाकर अच्छी तरह  बैठना होता था । यहाँ सावधानी बहुत ज़रूरी थी ज़रा गड़बड़ हुई और ‘स्लम डॉग मिलेनियर’ के प्रारंभिक दृश्य वाले बच्चे जैसी हालत बनी । शौच के बाद ब्रश करना, नहाना और ड्रेस पहन कर परेड के लिये तैयार होना । परेड के बाद नाश्ता मिलता था । उसके बाद मेजर लोगों द्वारा मिलट्री के जीवन के और विगत कैम्पों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं ৷ दो बार हम लोग फायरिंग रेंज भी गए जहाँ मैंने थ्री नॉट थ्री और पॉइंट टू टू की रायफल चलाई 

दोपहर में भोजन के बाद अपने तम्बू को व्यवस्थित करन होता था । मेजर लोग उसके बाद चेकिंग के लिये आते थे । शाम को चाय के बाद फिर परेड होती थी ৷ पहले दिन ही यह बात मेरी समझ में आ गई  कि मेरा नाम जोकर वाले पिकनिक कैम्प और इस कैम्प में बहुत अंतर है ৷ यहाँ तो हमें इस तरह तैयार किया जा रहा था जैसे पाकिस्तान से होने वाली अगली लड़ाई में हमें ही भेजा जाना है ৷

एक बात अच्छी हुई कि पहले ही दिन हमारे मेजर ने ट्रेनिंग प्रोग्राम बताते हुए कहा कि  लास्ट के दो दिन कैम्प फायर होगा, जो बच्चे उसमे भाग लेना चाहते हैं उन्हें रोज शाम को रिहर्सल करवाया जायेगा और उन्हें परेड में नहीं जाना है ৷ मेरे दिमाग़ में छठवी सातवीं में किये गए तमाम डांस ड्रामा घूम गए और मैंने यह सोचकर अपना हाथ खड़ा  कर दिया कि इसी बहाने शाम की  परेड से मुक्ति मिलेगी ৷

रोज रात्रि भोजन के पश्चात  दस बजे के पहले स्ट्रिक्टली तम्बू की बत्ती बंद कर सो जाना होता था৷ हालाँकि हर तम्बू के भीतर धीमी आवाज़ में उधमबाजी चलती ही रहती थी ৷ हमारे  टेंट में एक बदमाश लड़का था जो उम्र में सबसे बड़ा था, वह नित्यप्रति कुछ न कुछ शरारतें करता ही रहता, अश्लील चुटकुले सुनाता और अजीब अजीब हरकतें करता था ৷ उसे कोई अपने पास सुलाना पसंद नहीं करता था, लेकिन मज़बूरी थी, सबको लाइन से सोना ही पड़ता था ৷ उसका नंबर एक कोने में लाइन के अंत में आता था ৷

एक रात जब सब लगभग सो चुके थे और मैं भी आधी नींद में था मुझे टेंट के उस कोने  से अचानक खुसुर पुसुर की आवाज़ सुनाई दी ৷ वह एक लड़के से लगातार कह रहा था ‘बटन  खोल न यार, पैंट थोडा नीचे सरका ৷’ दूसरा लड़का जो शायद उसकी बगल में सो रहा था बार बार ‘नहीं’ कहता था ৷ इसी बीच अचानक वह लड़का जोर से चिल्लाया “नहीं बोला न तेरे को” ৷ यह आवाज़ इतनी तेज़ थी कि सबकी नींद खुल गई ৷ “कूण है वहाँ ?“ टेंट के बाहर तैनात हमारे एक राजस्थानी सार्जेंट की आवाज़ आई ৷ “खोलो तम्बू का पर्दा ये कोण शोर कर रहा है ?”  कोई कुछ  बोलने को तैयार नहीं, सब सूम सट्ट ৷ 

“चलो सब निकलो बाहर, नहीं तो देख लूँगा एक एक को ৷“ यह  आवाज़ हमारे तम्बू के बाहर से ही आ रही थी ৷ लड़कों ने टेंट खोला और बाहर आ गए ৷ “कौन चिल्लाया था तुम में से ? “किसी ने जब कुछ नहीं कहा तो उसने सबको ऑर्डर दिया “फाल इन हो जाओ और पूरे ग्राउंड के सात चक्कर लगाओ ৷” चक्कर लगाने की बात सुनकर मुझे वैसे ही चक्कर आ गए ৷ खैर चक्कर लगाना शुरू हुआ पहले ही चक्कर में मेरी जान निकल गई ৷ सार्जेंट वहीं खड़ा था ৷ उसने मुझे रोका “तू तो नहीं चिल्लाया था ?” मैंने एक दम रोनी सूरत बनाकर कहा “नहीं ৷”  “ठीक है तू अन्दर जा”  मैं फुर्ती से भीतर चला गया और चुपचाप ओढ़कर सो गया ৷ मुझे पता नहीं हमारे बाकी के जवान कब लौटकर आये ৷ 

सुबह सब कुछ इतना सामान्य था जैसे रात कुछ हुआ ही न हो ৷ बस मेरे मन में सवाल था कि उस लड़के ने उस शरारती लड़के की शिकायत क्यों नहीं की ? खैर, एन सी सी कैम्प की अंतिम दो रातें कैम्प फायर  की थीं ৷ यह उसी तरह हुआ जैसे कि होता है, वही छोटे मोटे कॉमेडी वाले नाटक, मिमिक्री, जबरदस्ती फ़िल्मी गाने गाते हुए उन पर अपनी कमर मटकाने वाले नृत्य और हो गया ৷ इसके बाद अगली तैयारी छब्बीस जनवरी पर गणतंत्र दिवस की परेड के लिए करना था ৷

शरद कोकास 


79 .भंडारा : किसी लड़की का नाम मोहम्मद अकरम कैसे हो सकता है


उन दिनों यह एक परंपरा थी कि अंतरशालेय क्रिड़ा प्रतियोगिता अर्थात डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट के अंतर्गत विभिन्न शालाओं के विद्यार्थियों के बीच रात्रि के समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रतियोगिता भी होती थी  और उसमे  नृत्य,नाटक,इत्यादि प्रस्तुतियों के लिए अलग अलग स्कूलों को प्रथम द्वितीय,तृतीय पुरस्कार दिया जाता था ৷ मुझे खेल के मैदान की बजाय नाटक का मंच अधिक प्रिय था इसलिए टूर्नामेंट में बच्चों के साथ मैं केवल दर्शक की भूमिका में तालियाँ बजने के लिए उपस्थित रहता था ৷ उस वर्ष कुछ ऐसा संयोग हुआ कि  नाटक ‘भूख हड़ताल’ के बहाने हमारी टीम को टूर्नामेन्ट में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ ৷ यह टूर्नामेंट भंडारा शहर से बाईस किलोमीटर पर स्थित तुमसर नामक स्थान में आयोजित था ৷

तुमसर मेरे लिए नई जगह थी इसलिए वैसे भी जाने का उत्साह बहुत था ৷ नियत तिथि पर हमारी डांस ड्रामा की कल्चरल टीम बस से वहाँ के लिए रवाना हुई ৷ लड़कियाँ और उनकी अभिभावक मैडम सुजाता रॉय तथा एक शिक्षक श्री हीरालाल फुलसुंघे पहले ही जीप में चले गये थे और हमें सीनियर छात्रों के साथ आने के लिए कहा गया था । वरिष्ठ छात्रों के साथ बस में स्कूल के शिक्षकों के विषय में ‘गुप्त ज्ञान’ की बातें सुनते हुए हम लोग दोपहर में ही तुमसर पहुँच गए ৷

अपने खिलाड़ी साथियों वाले कमरे में अपने कास्ट्यूम और मेकअप आदि का सामान रखकर सीनियर्स के साथ मैं और नानक शहर घूमने निकल पड़े ৷ शहर छोटा सा था लेकिन औद्योगिक केंद्र होने के कारण वहाँ मजदूरों की बस्तियां अधिक थीं ৷ लौटते हुए हमने देखा तुमसर के उस खेल के मैदान के बाहर एक बहुत बड़ा मंच बनाया गया था जहाँ सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न होने वाले थे  ৷ दिन में क्रिड़ा प्रतियोगिताएँ संपन्न होने के पश्चात रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारंभ हुए ৷ 

हमारा नाटक विभिन्न कार्यक्रमों के अंत में होना था इसलिए हम लोग निश्चिन्त होकर परिसर में टहलते रहे ৷ मंच भी एक खुले स्थान पर बना था जहाँ बाहर की ओर मेला  जैसा लगा था ৷ यहाँ  अनेक प्रकार की दुकानें भी थीं ৷ वहाँ पहली बार मैंने ‘लौंग लता’ नामक एक मिठाई खाई थी । यह मिठाई मैदे की कई परतों की बनी होती थी जिसके बीचोबीच एक लौंग लगी होती थी इसे तेल में तलकर चाशनी में डुबो दिया जाता था । मैदे की अनेक परतों को देखते हुए हमारे एक सीनियर अहमद ने इस मिठाई का नाम ‘लौंग लपेटा’ रख दिया था । 

हम लोग एक के बाद एक विभिन्न शालाओं की प्रस्तुतियां देख रहे थे कि मंच पर अनाउंसमेंट हुआ “ अब प्रस्तुत है भंडारा के गाँधी विद्यालय की ओर  से एक नृत्य” ৷ यह प्रतियोगिता के अंतर्गत था इसलिए प्रस्तुति से पूर्व कलाकार का नाम नहीं लिया जाता था, केवल स्कूल का नाम घोषित होता था ৷ 

पर्दा उठा और मंच पर पहने एक नृत्यांगना ने प्रवेश किया ৷ उस समय की प्रसिद्ध फिल्म ‘ लव इन टोकियो ‘ का एक प्रसिद्ध गीत हवाओं में गूंजने लगा  .. ‘सायोनारा सायोनारा, वादा निभाउंगी सायोनारा’ । मैदान में बैठे शोहदों की सीटियों के आवाज़ के बीच उसने नृत्य शुरू किया .. इठलाती और बल खाती कल फिर आउंगी सायोनारा ৷

नृत्य के चलते अन्य जगहों से आये कुछ छात्र जो जानते थे कि हम गांधी विद्यालय भंडारा से आये हैं पूछने लगे कि यह खूबसूरत लड़की कौन है ? हम लोग उनका प्रश्न सुनकर केवल मुस्कुराते रहे ৷ हमें पता था कि    इस गीत में जापानी लड़की की वेशभूषा और मेकअप में, हाथ में पंखा लिए स्टेज पर उतरने वाली यह नृत्यांगना कौन है ৷ नृत्य समाप्त होने के बाद अनाउंस किया गया “ अभी आप गाँधी विद्यालय भंडारा की यह प्रस्तुति देख रहे थे , प्रस्तुत कर रहे थे मोहम्मद अकरम ৷


हमने देखा आश्चर्य से सबके मुँह खुले रह गए हैं ৷ ৷ सबके मुंह पर एक ही सवाल था ”इस सुन्दर लड़की का नाम मोहम्मद अकरम कैसे हो सकता  है ?” किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई लड़का लड़की बनकर इतना अच्छा नृत्य कैसे कर सकता है

मोहम्मद अकरम स्कूल में हमसे एक कक्षा आगे था । अकरम के पिता एक  पुलिस ऑफिसर थे । मुझे याद है सभ्रांत घरों के बच्चों की भांति अकरम बहुत अच्छे और महँगे कपड़े पहनकर स्कूल आता था । उसके पास एक ऐसा स्वेटर था जिसे भीतर बाहर दोनों ओर से  पहना जा सकता था, एक ओर से उसका  रंग गहरा लाल था और दूसरी ओर से गहरा नीला । अकरम दिखने में बहुत सुन्दर था, चेहरा बिलकुल लड़कियों की तरह  और रंग झक्क गोरा । उसकी आवाज़ भी लड़कियों जैसी ही पतली थी । उसकी इन विशेषताओं को देखते हुए स्कूल के स्नेह सम्मलेन में ‘बहादुर शाह ज़फर’ इस नाटक में उसे शाहज़फर की बेगम जीनत महल का रोल दिया गया था ।


अभिनय के अलावा अकरम नृत्य कला में भी माहिर था ৷ उन दिनों शास्त्रीय संगीत और नृत्यों का चलन तो था ही लेकिन फ़िल्मी गानों पर नृत्य का चलन आम था ৷ स्नेह सम्मलेन के अवसर पर सर ने अकरम से कुछ गीतों पर नृत्य भी तैयार करवाया था । नृत्य के बाद हम लोगों का नाटक हुआ स्कूल की धाक पहले ही जैम गई थी इसलिए लोगों ने बहुत ध्यान से नाटक देखा ৷ कहना न होगा कि नाटक बहुत बढ़िया रहा ৷ 

कार्यक्रम के बाद तुमसर से लौटते हुए काफी रात हो गई थी इसलिये मैं फुलसुंगे सर के घर रुक गया था । बड़े बाज़ार में उनका मकान था और उनका कमरा तीसरी मंज़िल पर था । वह कमरा मुझे अभी तक याद है इसलिए कि बहुत सुन्दर ढंग से उन्होंने उसे सजाया था । उनका कमरा देखकर उस समय मेरे मन में विचार आया था कि यदि बड़े होकर मुझे अलग कमरा मिला तो मैं उसे ऐसे ही सजाउंगा । मेरी यह इच्छा नौकरी लगने के बाद दुर्ग में बक्षी जी के मकान के किराये के कमरे में पूरी हुई । हालाँकि होस्टेल के कमरों को भी मैं इसी तरह सजाता था ।     

शरद कोकास 

70 भंडारा : ग़रीबी देशकाल के अनुसार अपनी परिभाषा बदलती है ৷

गांधी विद्यालय 
गाँधी विद्यालय भंडारा में मिडिल स्कूल में श्री घड़ोले हमें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे ৷ एक दिन घड़ोले सर के मुँह से अंग्रेज़ी की एक कहावत सुनी “बोर्न विद सिल्वर स्पून इन माउथ ।“ सर ने बताया था कि यह मुहावरा व्यंजना में उन बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनका जन्म बहुत धनाढ्य घरों में होता है, वास्तव में पैदा होते समय चांदी का चम्मच मुँह में नहीं होता । मैं जब भी अपने आसपास नज़र दौड़ाता तो मुझे अपना एक भी दोस्त ऐसा नहीं दिखाई देता था जो चाँदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुआ हो । मेरे सारे के सारे दोस्त मेरे जैसे ही इस मुहावरे के अभिधात्मक अर्थ में मुँह में खुद का अँगूठा लेकर ही पैदा हुए थे ।  

 बाबूजी अक्सर हम बच्चों को अपने बचपन की ग़रीबी के किस्से सुनाया करते थे कि किस तरह उनके घर में कभी कभी ऐसी नौबत आ जाती थी जब खाने के लिए भी कुछ नहीं रहता था और पडौसियों से उधार मांगना पड़ता था यहाँ तक कि एक बार घर आये किसी मेहमान से ही पैसे लेकर सब्ज़ी लानी पड़ी थी । 

बाबूजी बार बार दोहराए गए किस्सों की शर्म से निर्लिप्त होकर अक्सर हम बच्चों से कहते “ तुम लोग तो बहुत अच्छे समय में पैदा हुए हो ।“ आज जब मैं अपने बचपन के दिनों के अपनी ग़रीबी के किस्से बच्चों को सुनाता हूँ तो उनसे भी यही वाक्य कहता हूँ । ऐसा लगता है जैसे यह वाक्य हर बच्चे को परम्परा से मिलता है जिसे वह अपने पिता बनने के बाद बच्चों को ग़रीबी का महत्व बताने के लिए उपयोग में लाता है । 

एक बार मैंने किसी मैगज़ीन में अमेरिका के कुछ ऐसे लोगों के चित्र देखे थे जो स्पोर्ट शू और जींस पहने किसी स्क्वायर पर गिटार बजाते हुए भीख मांग रहे थे৷ अपने यहाँ के भिखारियों की वेशभूषा से उनकी तुलना करने पर वे मुझे बिलकुल भी भिखारियों की तरह नहीं लगे मुझे ৷ उनकी प्रतीति भारत के संपन्न लोगों की भांति थी ৷ सही बात है , ग़रीबी भी देशकाल के अनुसार अपनी परिभाषा बदल लेती है ৷ 

वैसे इस बात में कहीं कोई दो राय नहीं कि उन दिनों हर मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार में आर्थिक तंगी तो रहा करती थी । हालाँकि उन दिनों महंगाई आज जैसी नहीं थी और बाज़ार भी  आज के बाजारों की तरह जेब काटने वाले बाज़ार नहीं हुआ करते थे । तो चलिए, अब चलते हैं भंडारा शहर के बाज़ार की ओर और सैर करते हैं उन दुकानों की जो मेरे नन्हे पाँवों के रास्तों में आती थीं 

शरद कोकास