10 जून 2026

135 वह चिंटू बाबा वाला स्कूल का कैम्प नहीं था

 


 

संवादों में अक्सर देश और समाज की डिक्शनरी पलटने वाले लोग उन दिनों उन पन्नों को अधिक पलटते थे जिनमे ‘राष्ट्र प्रेम’ और ‘राष्ट्रवादी’ की जगह ‘देशप्रेम’ और ‘देशभक्त’ जैसे शब्द लिखे थे ৷ दो दशक पहले देश को आज़ादी दिलाने वाले अधिकांश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उस समय जीवित थे और “तुम में ही कोई गौतम होगा, तुम में ही कोई होगा गाँधी” जैसे गीत गाते हुए “दुनिया को प्यार की राह दिखाने और नफ़रत की आंधी रोकने” के लिए हम बच्चों को प्रेरित करते थे ৷


सिनेमा शुरू होने से पहले दिखाई जाने वाले भारतीय समाचार चित्र में फ़ौजी जवानों को बढ़िया मिलिट्री यूनिफ़ॉर्म में देखकर स्कूल ड्रेस में ही हमारी भुजाएँ फड़कने लगती और हम सोचते क्या कभी ऐसी ही फ़ौजी ड्रेस पहनकर हमें परेड में मार्च करने का अवसर प्राप्त होगा ৷ पाकिस्तान और चीन से हुए ताज़े ताज़े युद्ध के पेशेनज़र फ़ौज में भरती होकर देशसेवा करने का ख्याल भी कभी कभी मन में आता था ৷


ड्रेस पहनने के उस ख्याल को जब मैंने एक दिन हमारे एन सी सी ऑफिसर के सामने प्रकट  किया तो उन्होंने कहा “सुबह ऑफिस में आना और ड्रेस ले जाना, बेल्ट, कैप,शूज़ सब ৷ मैंने घर में बहुत गर्व से जब यह बात बताई तो किसीने कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं दी ৷ मन थोडा उदास हुआ उसी तरह जैसे आजकल फेसबुक में पोस्ट पर किसी की टिप्पणी न आने से होता है ৷ वैसे उन दिनों माता-पिता आज के पैरेंट्स की तरह बच्चों के हर काम में दखल नहीं देते थे ৷ ऐसे छोटे मोटे कामों में बच्चों को अपना निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता थी ৷ मैंने सोचा कोई बात नहीं अब इन्हें ड्रेस पहनकर ही बताऊंगा कि मैंने एन सी सी ले ली है ৷


ड्रेस लेने गए तो वहाँ बड़ी कक्षाओं के छात्रों की लाइन लगी थी ৷ मुझ जैसे कम उम्र बच्चे के लिए कोई ठीक ठाक ड्रेस ही नहीं थी शर्ट जो थी वह मुझसे डबल साइज़ की, हाफ़ पैंट तो नीचे से इतने चौड़े जैसे आधे कटे हुए पेटीकोट ৷ बड़ी मुश्किल से अपने साइज़ की एक  ड्रेस मिली ৷ सीनियर्स ने बता ही दिया था कि कैसे आरारोट पानी में खौलाना है, फिर कपड़ों में कलफ लगाना है, टोपी के बैज और बेल्ट के बकल को ब्रासो से चमकाना है और कपड़े के जूतों पर  लाल खड़िया पाउडर पोतना है ৷ शर्ट की आस्तीन कोहनी के ऊपर तक और उतनी ही मुड़ी होनी चाहिए जितनी सार्जेंट के सिगरेट के पैकेट की लम्बाई है ৷ 


परेड के पहले दिन ही मज़ा आ गया ৷ लेफ्ट राईट के बाद विश्राम फिर ब्रेक में क्रीम वाले ऑरेंज बिस्किट साथ  में पार्ले जी के चार पारंपरिक ग्लूकोज़ बिस्किट भी ৷ सार्जेंट ने कहा “सब कैडेट होशियार, दिवाली तक हफ़्ते में दो दिन अच्छे से परेड करना है , जो अच्छा परेड करेगा उसको विंटर में कैम्प में जाने को मिलेगा ৷ अहा कैम्प..  मुझे ‘मेरा नाम जोकर’ का वह चिंटू बाबा वाला स्कूल का कैम्प याद आ गया ৷ 


लेकिन हफ्ते में दो बार सुबह दो घंटे जमकर परेड करते हुए दो-तीन बार चक्कर खाकर गिर जाने के बाद यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई कि सिनेमा और डॉक्युमेंट्री में दिखाई जाने वाली फौजियों की लाइफ देखकर प्रेरित होने की बेवकूफ़ी कभी नहीं करनी चाहिए ৷ सभ्य शब्दों में कहूँ तो इस तरह देशभक्ति के मोह में फँसना नहीं चाहिए ৷ बहरहाल देशप्रेम का जज़्बा फिर भी इस ख्याल पर हावी था और बीच में छोड़ देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था ৷     


दिवाली की छुट्टियों से पहले ही बता दिया गया कि दस दिवसीय इस कैम्प की लाइफ कैसी होगी, खाने को क्या मिलेगा, क्या क्या ले जाना है, क्या नहीं ले जाना है वगैरह वगैरह ৷ जानेवाले दिन हम लोग स्कूल में इकठ्ठा हुए ৷ मिलिटरी का एक ट्रक आया और हम सभी पच्चीस तीस बच्चों को को उसमे भरकर वैनगंगा नदी के किनारे स्थित भीलवाड़ा नामक एक गाँव में ले जाया गया ৷ यह सब कुछ बहुत रोमांचक था ৷


उस विशाल कैम्प एरिया में अनेक स्कूलों के तम्बुओं के बीच हमारे स्कूल के लिए एक खास जगह तय थी ৷ टेंट में अपना सामान पटककर हम लोग गाँव घूमने निकल गए, इस हिदायत के साथ कि शाम को अटेंडेंस के पहले तक लौट आना है ৷भीलवाडा, नदी का किनारा, गिरोला पहाडी और उसके आसपास का क्षेत्र घूमते  हुए मन में ख्याल आ रहा था  कि  रोज़ इसी तरह सैर करने को मिलेगा ৷


लेकिन अगले ही दिन हमारे ख़्वाबों का यह शीशे का मर्तबान गिरकर चकनाचूर हो गया जब हमें पता चला कि अगले दिन से दस दिनों तक का प्रोग्राम फिक्स है ,सुबह पाच बजे उठना, फिर शौच नहाने धोने आदि के बाद हल्का फुल्का नाश्ता, फिर तीन घंटे परेड दोपहर दो बजे लंच, फिर आराम, फिर स्नैक्स चाय और शाम की परेड, आदि ৷


कैम्प का टेम्पररी शौचालय बहुत अजीब टाइप का था, मैदान में एक लम्बा सा गढ्ढा खोदकर उस पर लकड़ी के तख्ते रख दिए गए थे ৷ हर तख्ते के बीचोबीच एक चौकोर छेद  था ৷ उस के दोनों ओर पैर जमाकर अच्छी तरह  बैठना होता था । यहाँ सावधानी बहुत ज़रूरी थी ज़रा गड़बड़ हुई और ‘स्लम डॉग मिलेनियर’ के प्रारंभिक दृश्य वाले बच्चे जैसी हालत बनी । शौच के बाद ब्रश करना, नहाना और ड्रेस पहन कर परेड के लिये तैयार होना । परेड के बाद नाश्ता मिलता था । उसके बाद मेजर लोगों द्वारा मिलट्री के जीवन के और विगत कैम्पों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं ৷ दो बार हम लोग फायरिंग रेंज भी गए जहाँ मैंने थ्री नॉट थ्री और पॉइंट टू टू की रायफल चलाई 


दोपहर में भोजन के बाद अपने तम्बू को व्यवस्थित करन होता था । मेजर लोग उसके बाद चेकिंग के लिये आते थे । शाम को चाय के बाद फिर परेड होती थी ৷ पहले दिन ही यह बात मेरी समझ में आ गई  कि मेरा नाम जोकर वाले पिकनिक कैम्प और इस कैम्प में बहुत अंतर है ৷ यहाँ तो हमें इस तरह तैयार किया जा रहा था जैसे पाकिस्तान से होने वाली अगली लड़ाई में हमें ही भेजा जाना है ৷


एक बात अच्छी हुई कि पहले ही दिन हमारे मेजर ने ट्रेनिंग प्रोग्राम बताते हुए कहा कि  लास्ट के दो दिन कैम्प फायर होगा, जो बच्चे उसमे भाग लेना चाहते हैं उन्हें रोज शाम को रिहर्सल करवाया जायेगा और उन्हें परेड में नहीं जाना है ৷ मेरे दिमाग़ में छठवी सातवीं में किये गए तमाम डांस ड्रामा घूम गए और मैंने यह सोचकर अपना हाथ खड़ा  कर दिया कि इसी बहाने शाम की  परेड से मुक्ति मिलेगी ৷


रोज रात्रि भोजन के पश्चात  दस बजे के पहले स्ट्रिक्टली तम्बू की बत्ती बंद कर सो जाना होता था৷ हालाँकि हर तम्बू के भीतर धीमी आवाज़ में उधमबाजी चलती ही रहती थी ৷ हमारे  टेंट में एक बदमाश लड़का था जो उम्र में सबसे बड़ा था, वह नित्यप्रति कुछ न कुछ शरारतें करता ही रहता, अश्लील चुटकुले सुनाता और अजीब अजीब हरकतें करता था ৷ उसे कोई अपने पास सुलाना पसंद नहीं करता था, लेकिन मज़बूरी थी, सबको लाइन से सोना ही पड़ता था ৷ उसका नंबर एक कोने में लाइन के अंत में आता था ৷


एक रात जब सब लगभग सो चुके थे और मैं भी आधी नींद में था मुझे टेंट के उस कोने  से अचानक खुसुर पुसुर की आवाज़ सुनाई दी ৷ वह एक लड़के से लगातार कह रहा था ‘बटन  खोल न यार, पैंट थोडा नीचे सरका ৷’ दूसरा लड़का जो शायद उसकी बगल में सो रहा था बार बार ‘नहीं’ कहता था ৷ इसी बीच अचानक वह लड़का जोर से चिल्लाया “नहीं बोला न तेरे को” ৷ यह आवाज़ इतनी तेज़ थी कि सबकी नींद खुल गई ৷ “कूण है वहाँ ?“ टेंट के बाहर तैनात हमारे एक राजस्थानी सार्जेंट की आवाज़ आई ৷ “खोलो तम्बू का पर्दा ये कोण शोर कर रहा है ?”  कोई कुछ  बोलने को तैयार नहीं, सब सूम सट्ट ৷ 


“चलो सब निकलो बाहर, नहीं तो देख लूँगा एक एक को ৷“ यह  आवाज़ हमारे तम्बू के बाहर से ही आ रही थी ৷ लड़कों ने टेंट खोला और बाहर आ गए ৷ “कौन चिल्लाया था तुम में से ? “किसी ने जब कुछ नहीं कहा तो उसने सबको ऑर्डर दिया “फाल इन हो जाओ और पूरे ग्राउंड के सात चक्कर लगाओ ৷” चक्कर लगाने की बात सुनकर मुझे वैसे ही चक्कर आ गए ৷ खैर चक्कर लगाना शुरू हुआ पहले ही चक्कर में मेरी जान निकल गई ৷ सार्जेंट वहीं खड़ा था ৷ उसने मुझे रोका “तू तो नहीं चिल्लाया था ?” मैंने एक दम रोनी सूरत बनाकर कहा “नहीं ৷”  “ठीक है तू अन्दर जा”  मैं फुर्ती से भीतर चला गया और चुपचाप ओढ़कर सो गया ৷ मुझे पता नहीं हमारे बाकी के जवान कब लौटकर आये ৷ 


सुबह सब कुछ इतना सामान्य था जैसे रात कुछ हुआ ही न हो ৷ बस मेरे मन में सवाल था कि उस लड़के ने उस शरारती लड़के की शिकायत क्यों नहीं की ? खैर, एन सी सी कैम्प की अंतिम दो रातें कैम्प फायर  की थीं ৷ यह उसी तरह हुआ जैसे कि होता है, वही छोटे मोटे कॉमेडी वाले नाटक, मिमिक्री, जबरदस्ती फ़िल्मी गाने गाते हुए उन पर अपनी कमर मटकाने वाले नृत्य और हो गया ৷ इसके बाद अगली तैयारी छब्बीस जनवरी पर गणतंत्र दिवस की परेड के लिए करना था ৷



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