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10 मई 2026

32. भंडारा : बाबासाहेब ने किसके लिए कहा था "यह अशोक नहीं सम्राट अशोक हैं"



भाषण देते हुए डॉ आंबेडकर 

कल मैंने आपको बताया था कि मुंबई से चुनाव हार जाने के पश्चात किस तरह बाबासाहेब अम्बेडकर को 1954 मे पुनः भंडारा लोकसभा से उपचुनाव मे शामिल होकर दिल्ली मे लोकसभा मे जाने का अवसर मिला। चुनाव के पहले भंडारा मे किस तरह उनके चुनाव प्रचार की तैयारी चल रही थी , कहाँ दफ्तर बनाया गया था , कहाँ चुनावी सभा हुई थी , इस बात को जानिए विस्तार से इस पोस्ट मे । 
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता 
भंडारा के नौतलाव मैदान मे मंच सज चुका था , हजारों लोगों की भीड़ बाबासाहेब को सुनने , उन्हे देखने के लिए आई थी । आखिर वे उस दौर के नायक थे जिन्होंने लाखों लोगों को जाति के आधार पर होने वाले शोषण से मुक्त किया था , जिन्होंने संविधान निर्माण मे अपनी महती भूमिका निभाई थी 

बाबासाहेब बोलने के लिए खड़े हुए । करतल ध्वनि से उनका स्वागत हुआ । उन्होंने जनता का अभिवादन स्वीकार किया । वे जनता के मन की बात जानते थे । भंडारा के इतिहास से भी वे वाकिफ़ थे । जनता के दुखों पर मरहम लगाते हुए उन्होंने अपनी बात सबके सामने रखी । 

उन्होंने स्पष्ट किया शिड्फेयूल कास्डट फेडरेशन का एक ही उद्देश्य है जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त करना, युवाओं के लिए रोजगार की और आम जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य आदि का समुचित प्रबंध करना ।यद्यपि उन  दिनों सभी पार्टियों के घोषणा पत्र में थोड़े बहुत फेरबदल के साथ यही बातें हुआ करती थीं । 

देखिए कितने उदारमना थे बाबासाहेब 

मुख्य मुख्य बातें कहने के बाद उन्होंने जनता के मन में गाँठ की तरह बंधी हुई वोट के बहिष्कार की बात को ध्यान में रखते हुए कहा 

“यद्यपि मुंबई में हमने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से धोखा खाया है लेकिन हम किसी को धोखा देने के बारे में सोच भी नहीं सकते ।“ 

लोगों के अशोक मेहता को वोट न देने की बात पर उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से तो कुछ नहीं कहा लेकिन परोक्ष रूप से इतना अवश्य कहा कि “हमने संविधान में जनतांत्रिक चुनाव की यह व्यवस्था की है । यह भी कहा है कि हमारा वोट बहुत महत्वपूर्ण है, यह व्यर्थ नहीं जाना चाहिए ।“ 

भंडारा की जनता उनकी अपनी थी, यह उनका अपना परिवार था, उनके दुःख उनके अपने थे । उनके पूर्वजों ने भी वही अपमान और पीड़ा सही थी । जनता उनकी बात के स्थूल अर्थ को समझ नहीं पाई अतः अवसर देखकर उन्होंने पत्र का उल्लेख करना आवश्यक समझा “ मुझे सुचेता कृपलानी का पत्र प्राप्त हुआ है जिसमे उन्होंने भंडारा की जनता से सहयोग की अपेक्षा की है ।“ 

सुचेता कृपलानी 
बाबासाहेब स्वयं विद्वान थे और अशोक मेहता की विद्वता का सम्मान करते थे । वे जानते थे कि सम्प्रति सामान्य सीट से भंडारा से चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस के उम्मीदवार पूनमचंद राका से अशोक मेहता कहीं बेहतर हैं । उन्होंने भरी सभा में एक रूपक गढ़ते हुए कहा कि 

“भंडारा की इस सामान्य सीट से चुनाव लड़ने वाले अशोक समझ लीजिये हमारे लिए सम्राट अशोक हैं । बेहतर होगा कि हम अपना एक वोट व्यर्थ न गवाएँ ।“ 

महाराष्ट्र के पत्रकार अमृत बंसोड बताते हैं उस समय नागपुर से निकलने वाले प्रमुख अखबार ‘तरुण भारत‘ ने इक्कीस अप्रेल चौवन की इस सभा में दिया गया बाबासाहेब का यह व्याख्यान विस्तार से  प्रकाशित किया था । 

अब जानिए उन अनजान लोगों के नाम जिन्होंने बाबासाहेब को चुनाव मे प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग दिया ( यह जानकारी मुझे बाबासाहेब के चुनाव प्रभारी दीनदयाल रहाटे के पुत्र और मेरे मित्र सुमंत रहाटे,अमृत बंसोड, और भंडारा के अन्य वरिष्ठ लोगों  से प्राप्त हुई है )

बाबासाहेब का यह व्याख्यान भंडारा में उनके पक्ष में वातावरण निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था  ৷ फेडरेशन के अध्यक्ष दिनकर राव के मित्र भानुदास बंसोड़  उनके सक्रिय सहयोगी थे । हुसैन रामटेके उनकी रोज़ के मंडली के सदस्य थे । हुसैन रामटेके सिर्फ नाम से ही हुसैन थे लेकिन  मुस्लिम समुदाय के दलित समाज में भी उनकी काफी पैठ थी ৷ 

भोजराज रामटेके सी पी आई के कार्यकर्त्ता थे और गोंदिया में रहते थे लेकिन वे भी बाबासाहेब का चुनाव प्रचार करने के लिए आ गए थे ৷ 

भंडारा में ही शुक्रवारी मोहल्ले में रहने वाले मेंढे पहलवान अपने अखाड़े के साथियों के साथ उनका सहयोग करने आ गए थे ৷ 

स्टेशन के निकट वरठी के रहने वाले नारायण राव फुले उनके सहयोगी थे वहीं भंडारा के श्यामचरण नंदागौली ने युवाओं की एक टीम खड़ी कर ली थी ৷ 

अ.शि. रंगारी और करडी के रहने वाले शेंडे बाबू भी दल बल के साथ उपस्थित हो गए ৷ 

यह ऐसा उपचुनाव था जिसमे जवाहर लाल नेहरू को भी आना पड़ा 

सामान्य सीट के लिए यहीं पर कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का प्रचार भी ज़ोरों पर था । देश के प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता प्राप्त की थी अतः वह चाहती थी कि भंडारा से उनकी सीट बरकरार रहे फिर इस बार तो आम्बेडकर यहाँ से चुनाव लड़ रहे थे । कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरु को भी यहाँ आना पड़ा । आंबेडकर की सभा की तरह भंडारा के निकट गोंदिया में नेहरू की विशाल सभा हुई जिसमे देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजना का क्रियान्वयन और कृषि, औद्योगिक व वाणिज्यिक विकास के मुद्दे दोहराए गए । 

हाथी चुनाव चिन्ह बाबासाहेब को सबसे पहली बार मिला था 

बाबासाहेब का चुनाव चिन्ह ‘हाथी’ भंडारा की दीवारों पर दिखाई देने लगा था ৷ बच्चे अपनी कमीज़ की जेब पर हाथी छाप,बैल जोड़ी छाप,झोपडी छाप के बिल्ले  लगाकर लाउड स्पीकर लगे रिक्शों के पीछे दौड़ते और फेंके गए बिल्ले और पर्चे बटोरते ৷ आज की तारीख  में हाथी यह चुनाव चिन्ह बाबासाहेब के आदर्शों पर चलने वाली  बहुजन समाज पार्टी के पास है । यह चुनाव चिन्ह उस समय उन दलित, शोषित, पीड़ित लोगों को उनकी ताकत का अहसास दिलाता था । 

कांग्रेस का चुनाव चिन्ह उन दिनों दो बैलों की जोड़ी था जिस पर 1952 से 1969 तक कॉंग्रेस चुनाव लड़ती रही जो विभाजन के बाद 1977 मे बाद में गाय बछड़ा हुआ और 1977 मे हाथ या पंजे पर आकर स्थिर हो गया । 

इस चुनाव चिन्ह पर कांग्रेस के दो उम्मीदवार दो वर्ग एक सामान्य एक आरक्षित से चुनाव लड़ रहे थे । सामान्य वर्ग से अशोक मेहता की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को झोपड़ी निशान मिला था । 

बाबासाहेब के भंडारा के कार्यकर्ताओं की जन सभाओं में भीड़ उमड़ने लगी थी ৷ वे सभी आसपास के क्षेत्रों में दौरा करने लगे । भंडारा के मेरे मित्र और दिनकर राव के भतीजे भगवान रहाटे बताते हैं कि उनकी माँ सुभद्रा बाई अपनी तमाम सखी सहेलियों  के साथ उनके भाषण सुनने जाती थी ৷ भगवान उस समय माँ के पेट में थे और दिनकर राव के बेटे सुमंत का जन्म नहीं हुआ था ৷ पूरे भंडारा संसदीय क्षेत्र में जाने कितने स्थानों पर सभाएँ हुई और लोगों ने संकल्प लिया, चाहे जो हो इस बार बाबासाहेब को जिताना ही है । यह चुनाव उनके लिए आत्मसम्मान के प्रश्न के अलावा एक चुनौती भी था ।

लेकिन बाबासाहेब के दुश्मन यहाँ भी थे 

भंडारा के लोग जात पात,भेदभाव, ऊँच नीच सब भूलकर बाबासाहेब का तन मन धन से साथ दे रहे थे । लेकिन भंडारा का एक बहुत बड़ा भद्र वर्ग उनके साथ नहीं था ৷ यह वह वर्ग था जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व ही अपने आपको अंग्रेजों का उत्तराधिकारी घोषित कर चुका था ৷ जाति और वर्ण के संस्कार जिसकी नसों में ज़हर की तरह फ़ैल चुके थे जो अब भी बाहरी इलाके में बनी इन बस्तियों में रहने वालों को हिकारत की नज़रों से देखता था ৷ बाबासाहेब की असली लड़ाई व्यवस्था के साथ साथ इन लोगों से भी थी ৷ लेकिन वे संवैधानिक रूप से चुनाव जीतकर एक जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी यह लड़ाई लड़ना चाहते थे ৷ आखिर संविधान में यह व्यवस्था उन्होंने ही तो की थी ৷ 

इसके अतिरिक्त भंडारा में अपने आप को परंपरागत कांग्रेसी मानने वाला भी एक वर्ग था जो सैद्धांतिक रूप से बाबासाहेब को पसंद करता था, उनकी विद्वता का सम्मान करता था और स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु किये गए उनके कार्यों की सराहना भी करता था । इनमे गाँधी और नेहरू के अनुयायियों के साथ साथ अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे । 

यह सभी कांग्रेसजन बाबासाहेब को चाहते थे लेकिन उनका कहना यही था कि अगर वे कांग्रेस से चुनाव लड़ते तो वे उनका साथ अवश्य देते ।

विशेष बात यह कि कॉंग्रेस का विरोधी होने के कारण इस चुनाव मे भारतीय जनसंघ भी उनका सहयोगी था । 

यह एक ऐसा स्वप्न था जिसके घटित होने की संभावना प्रारंभ में ही दम तोड़ चुकी थी ।

( शेष अगले अंक मे, यह इतिहास आपको कैसा लगा अवश्य बताएं  )

आपका 

शरद कोकास 


5 मई 2026

29. मुंबई : एक ऐसा चुनाव जिसमे डॉ.आंबेडकर भी हार गए थे


डॉ बाबासाहेब आंबेडकर मुंबई में 
1951 मे मुंबई का  प्रथम लोकसभा चुनाव 

सन उन्नीस सौ इन्क्यावन का प्रथम लोकसभा का यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण था । जनता को इस चुनाव में यह साबित करके दिखाना था कि वह न केवल बाबासाहेब की विचारधारा और सिद्धांतों के सम्मान के अलावा संविधान के लिए किये गए उनके परिश्रम की न केवल सराहना करती है बल्कि उसका पालन करने का संकल्प भी लेती है साथ ही दलितों के लिए लड़ी गई लड़ाई में उनकी भूमिका को रेखांकित करती है ।


दो वोट एक सामान्य एक आरक्षित सीट के लिए 

बाबासाहेब कांगेस में न होने के बावजूद अकेले नहीं थे,समाजवादी विचारधारा के प्रणेता अशोक मेहता जो सामान्य सीट से चुनाव लड़ रहे थे, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के तमाम सदस्यों के साथ उनके पक्ष में खड़े थे ৷ सामान्य जनता के बीच ऐसा मौखिक सन्देश दिया गया कि दो वोटों में से एक वोट सामान्य सीट के लिए अशोक मेहता को और एक वोट आरक्षित सीट के लिए बाबासाहेब आंबेडकर को दिया जाए ।

बॉम्बे राज्य की राजधानी मुंबई पूरे देश के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था । सिनेमा उद्योग, कपड़ा उद्योग, मछली
1951 में मुंबई 

व्यवसाय ऐसे अनेक क्षेत्रों में यहाँ के मजदूर कार्यरत थे । जहाँ एक ओर अट्टालिकाएँ खड़ी हो रही थीं वहीं टीन और तिरपाल की छत के नीचे तंग झोपड़ियों में जाने कितने जीवन साँस ले रहे थे । 

“मुंबई ऐसी नगरी है जो सुबह इंसान को भूखा जगा तो सकती है लेकिन भूखा सोने नहीं देती ।“

यह मुहावरा पूरे देश में फ़ैल चुका था । मुंबई आने वाली रेलगाड़ियों में अपने सपनों की गठरी 
लादे प्रतिदिन हज़ारों की संख्या में देश के कोने कोने से लोग चले आ रहे थे । यही थे वे वोटर जिन्हें आगामी चुनाव में बाबासाहेब का राजनीतिक भविष्य तय करना था ।

3 जनवरी 52 मुंबई प्रथम लोकसभा चुनाव 

पूरे देश में यह चुनाव धूमधाम से संपन्न हुआ ৷ देश की जनता के लिए मताधिकार का यह पहला अवसर था ৷ पूरे देश में सत्रह करोड़ साठ लाख मतदाताओं में से दस करोड़ सत्तर लाख मतदाताओं ने अर्थात साठ प्रतिशत मतदाताओं ने इस चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग किया ৷ यह जनतंत्र का प्रथम उत्सव था जिसे हर पांच साल बाद दोहराया जाना था । मुंबई में यह चुनाव जनवरी उन्नीस सौ बावन में संपन्न हुआ । तीन जनवरी का वह दिन मुंबई वासियों के लिए हर्ष का दिन था । स्वतंत्र भारत में पहली बार वे अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे थे । मतगणना के लिए सात जनवरी का दिन तय हुआ और ग्यारह जनवरी को चुनाव परिणामों की घोषणा हुई ।

नारायण सदाशिव काजरोलकर 
राजनीति की बाज़ी शतरंज की तरह होती है वह कभी भी किसी ओर पलट सकती है । मुंबई में इस चुनाव की बहुत धूम मची लेकिन अंततः दिल्ली मुंबई पर हावी रही । इस संसदीय क्षेत्र से दो लोग चुने जाने थे । 

सामान्य सीट से एक लाख उनंचास हज़ार एक सौ अड़तीस वोटों से कांग्रेस के विट्ठल गाँधी विजयी रहे वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी सोशलिस्ट पार्टी के अशोक मेहता को एक लाख उनतालीस हज़ार सात सौ इकतालीस वोट मिले । 

अशोक मेहता स्वयं तो हारे ही, आरक्षित सीट पर बाबासाहेब को वोट देने की उनकी मौखिक अपील भी जनता के बीच नहीं पहुँच पाई और तमाम कोशिशों के बावजूद बाबासाहेब यह चुनाव हार गए ৷ 

आरक्षित सीट से यह चुनाव श्येद्युल कास्ट फेडरेशन के डॉ भीमराव आंबेडकर के विरुद्ध कांग्रेस के नारायण सदोबा काजरोलकर ने जीता और इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया ৷ उन्हें एक लाख अड़तीस हज़ार एक सौ सैंतीस वोट मिले । वोटों के हिसाब से बाबासाहेब आंबेडकर चौथे स्थान पर रहे ৷ उन्हें काजरोलकर से चौदह हज़ार पांच सौ इकसठ वोट कम मिले इस तरह वह सीट के हिसाब से दूसरे स्थान पर और वोटों के हिसाब से चौथे स्थान पर रहे ।

बाबासाहेब के हारने के पीछे क्या कारण था 

जैसा कि आजकल होता है उन दिनों भी चुनाव के उपरांत इस चुनाव में डॉ आंबेडकर के हारने व कांग्रेस के जीतने के कारणों का विश्लेषण किया गया । सोशलिस्ट पार्टी का सहयोग एक छद्म साबित हुआ था । नेहरु के रूप में कांग्रेस की देशव्यापी छवि उनके कद से भी बड़ी हो गई थी । गाँधी की चिता से उठती लपटों के अक्स अभी जनता की आँखों में दिखाई दे रहे थे और उसका इतनी जल्दी धूमिल होना असंभव था । 

इसके अलावा हार के कुछ स्थानीय कारण भी थे । विभाजन के पश्चात उत्तर मुंबई में ऐसे अनेक लोगों के आगमन हुआ था जिन्हें देश के पुनर्निर्माण में बाबासाहेब के योगदान के बारे में बिलकुल पता नहीं था । वर्तमान सरकार ने उनके पुनर्वास की व्यवस्था की थी । वे अपने देवता अपने मूल निवास के मंदिरों में छोड़ आये थे और अपने पालनहार के रूप में उन्होंने नई प्रतिमाएँ गढ़ ली थीं जो मनुष्यों के रूप में उनके देवता थे और भविष्य में अनेक वर्षों तक उसी स्थान पर बने रहने वाले थे ।

मुंबई की इस हार से बाबासाहेब आंबेडकर तनिक भी विचलित नहीं हुए ৷ वे जानते थे संसद में उनके लिए कुर्सी भले न हो लेकिन देश के लोगों के दिलों में उनके लिए बहुत जगह थी और आनेवाली कई सदियों तक उस पद से उन्हें कोई नहीं हटा सकता था । मनुष्य के सुख, उसकी अस्मिता,अधिकार और गौरव के लिए लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में वे हमेशा के लिए विजेता घोषित कर दिए गए थे । 

बाबासाहेब को राज्यसभा मे ले लिया गया 

नेहरू जी मतभेदों के बावजूद उन्हें खोना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने राज्यसभा के माध्यम से उनके सरकार में आने की व्यवस्था कर दी । लेकिन जनता के प्रतिनिधि के रूप में सरकार में आने का महत्त्व तब भी था और आज भी है और फिर बाबासाहेब तो देश की असंख्य जनता के चहेते थे इसलिए जैसे ही मध्य प्रांत के भंडारा ज़िले में यह प्रथम लोकसभा चुनाव रद्द घोषित किये जाने के बाद वह सीट खाली हुई बाबासाहेब ने भंडारा सीट से उपचुनाव लड़ कर लोक सभा में जाने का निर्णय कर लिया ৷

डॉ आंबेडकर मार्ग मुंबई 
मुंबई का यह चुनाव अनेक मायनों में ऐतिहासिक रहा । इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि अंत तक कोई नहीं जान सकता कि राजनीति में ऊँट किस करवट बैठेगा । बाबासाहेब ने जिस जनता के लिए काम किया उसी जनता ने उन्हें हरा दिया इस घटना ने जनता व नेता के संबंधों का एक नया समीकरण स्थापित किया । लेकिन इसीके साथ यह भी तय हुआ कि जिस व्यक्ति की जगह लोगों के मन में होती है और जो जनता के लिए निस्वार्थ भावना से काम करता है देर से ही सही उसका उचित सम्मान होता है ।

बाबासाहेब को हराने वाले काजरोलकर को आज देश में बहुत कम लोग जानते होंगे लेकिन बाबासाहेब को पूरा विश्व जानता है । बाद में इस क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने की स्मृति में मुंबई उत्तर से दक्षिण तक पूरे मुंबई के मध्य से गुजरती हुई एक लम्बी सड़क बनाई गई जिसका नाम डॉक्टर आंबेडकर मार्ग रखा गया है ।


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आपका 
शरद कोकास