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10 जून 2026

124. भंडारा : ब्लैक आउट उन दिनों दिमागों में नहीं होता था


आज के भंडारा शहर को देखकर मुझे कवि नासिर अहमद सिकंदर की एक कविता याद आती है 

“छोटे शहर का दुख / 

क्या हो सकता है /  

सबसे बड़ा दुःख यही होगा- / 

कुछ वर्ष पहले/ 

वह गाँव था /

अब शहर है “ 

यह कविता केवल भंडारा शहर के लिए नहीं हैं बल्कि दुनिया के उन तमाम शहरों के लिए हैं जो अपने शिल्प में कभी खूबसूरत गाँव हुआ करते थे ৷ हम सबका शहर इसमे शामिल है ৷

उन दिनों भंडारा एक गाँव के वस्त्र धीरे धीरे उतार रहा था और एक एक कर शहर के कपड़े पहन रहा था । घर के पास रेल पटरी से लगे विशाल भूखण्ड पर सहकार नगर नामक कॉलोनी जन्म लेने लगी थी । वैसे तो इस कॉलोनी का कार्य उन्नीस सौ सड़सठ से ही प्रारम्भ हो गया था । ट्रकों से वहाँ लाइ गई रेत में हमारे नन्हे हाथों से बने घरौन्दे इस बात के गवाह थे । 

इस कॉलोनी की अंतिम सीमा पर एक रेल्वे लाइन थी जो भंडारा रोड रेल्वे स्टेशन से जवाहर नगर ऑर्डिनेंस फैक्टरी तक जाती थी । इस फैक्टरी में बनने वाला बारूद रेलगाड़ियों से मुख्य स्टेशन तक पहुँचाया जाता फिर वहाँ से देश की विभिन्न आयुध निर्माणियों तक भेजा जाता था, जहाँ वह बुलेट्स और हथगोलों में समाकर चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के जिस्म में समाकर उन्हें नेस्तनाबूद करता था ৷

बासठ और पैंसठ का वह समय भारत के चीन और पाकिस्तान से युद्धों का समय था ৷ भंडारा के तमाम लोग युद्ध की शब्दावली से परिचित हो चुके थे ৷ रेडियो पर लता जी का गाया गीत बजता था  “ जब देश में थी दिवाली वो खेल रहे थे होली, जब हम बैठे थे घरों मे वो झेल रहे थे गोली “ उस वक़्त हमें पता नहीं था कि गोलियों में बारूद होता है और वह बारूद हमारे शहर की आयुध निर्माणी में ही बनता है ৷ 

युद्ध के उन दिनों में रिक्शों पर शहर में अनाउंसमेंट होता ..”आज शहर में ब्लैक आउट रहेगा ৷ आम जनता से निवेदन है कि शाम के बाद अपने घर में कोई लाइट नहीं जलाएगा, सड़क के खम्भों की लाइट भी नहीं जलेगी ৷ बाज़ारों में दुकानों के लाइट भी हमें बंद रखना है ৷” 

हमें समझ में नहीं आता था कि घर में लाइट नहीं जलाने का युद्ध से क्या सम्बन्ध है ৷ बाबूजी ने हमारी शंका का समाधान किया  “हमारे शहर में बारूद फैक्टरी है, अगर ग़लती से दुश्मन का कोई हवाई जहाज़ इधर आ गया और उसे रौशनी दिख गई तो वह यहाँ बम फेंक देगा ৷” 

हम बच्चों की तरह सवाल करते लेकिन हमारा शहर तो पकिस्तान से इतनी दूर है यहाँ तक हवाई जहाज आएगा कैसे ? बाबूजी कहते “हाँ, यह सही है, हमारे फ़ौजी अफसर इतने सजग हैं कि उसे यहाँ तक आने ही नहीं देंगे लेकिन, मान लो ..फिर भी, किसी की ग़लती से आ गया तो ?” 

हम मानते ही नहीं थे कि ऐसा हो सकता है ৷ लेकिन अब बरसों बाद जब पुलवामा जैसी घटनाएँ घटित होते हुए देखते हैं तो लगता है बाबूजी ठीक कहते थे ৷ वैसे अब शहरों में ब्लैक आउट नहीं होता, हाँ लोगों के दिमागों में अब अवश्य ब्लैक आउट होने लगा है ৷

जवाहर नगर फैक्टरी के कामगारों के लिए उन्ही पहाड़ियों के हरियाली के बीच बसी एक रिहायशी कॉलोनी थी जिसमे मेरा क्लासमेट देशवंत राव चव्हाण रहा करता था । उसे स्कूल तक पहुँचाने के लिये फैक्टरी की स्कूल बस आया करती थी । उन दिनों स्कूल बस से आना जाना अभिजात्य जीवन शैली में शामिल था ৷ गली कूचों में नंगे पाँव घूमने वाले हम बच्चे उन बसों से उतरने वाले बच्चों को हसरत भरी निगाह से देखते और सोचते क्या कभी ऐसी बस में बैठने का मौका हमें मिलेगा ? 

एक बार यशवंत ने मुझसे और नईम से कहा मेरा घर देखने चलोगे ? स्कूल बस में बैठने की कल्पना से हम लोग खुश थे लेकिन बस तो शाम को वापस जाती थी इसलिए भंडारा के बस स्टैंड से नियमित रूप से भंडारा से जवाहर नगर की और जानेवाली स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस से एक रविवार को हमारा जाने का कार्यक्रम बना ৷ 

व्यवस्थित रूप से बसी इस तरह की कॉलोनी देखने का हमारा यह प्रथम अवसर था  । सहकार नगर में भी बहुत सुव्यवस्थित ढंग से क्वार्टर्स बन रहे थे लेकिन रेत ,ईट,सीमेंट और लोहे की छड़ें देखकर हमें कुछ समझ में नहीं आ रहा था, जवाहर नगर कॉलोनी देखने के बाद उसके रूप की कल्पना हम लोग करने लगे ৷

टेढ़ी मेढ़ी गलियों वाले किसी छोटे शहर में जब कोई कॉलोनी बन जाती है तो वह शहर वासियों के गौरव का हिस्सा बन जाती है लेकिन उन्हें नहीं पता वर्गभेद की शुरुआत भी यहीं से होती है ৷ जब सहकार नगर के क्वार्टर्स बन गये तो मध्यवर्गीय लोगों ने वहाँ रहना प्रारम्भ किया ৷ हमारी गली से वहाँ जाने का शॉर्टकट रास्ता था इसलिए हमारी गली में  स्कूटरों का आना जाना शुरू हो गया । 


हम सहकार नगर के सुव्यवस्थित क्वार्टर्स देखते और सोचते क्या हम लोग कभी इनमें रह पाएंगे ৷ देशबन्धु वार्ड का किराए का मकान छोड़ने  के बाद खुद का मकान बनाने से पहले सन चौरासी में माँ - बाबूजी दो तीन  साल के लिये सहकार नगर में रहने गये थे, लेकिन तब तक मेरी नौकरी लग चुकी थी और मैं दुर्ग आ गया था । सहकार नगर का घर मेरे लिए शनिवार रविवार का अड्डा था ৷ 

 शरद कोकास 

109.भंडारा : कूँक कूँक करती मुर्गियों से संवाद

अपने बचपन की उन गलियों में भटकते हुए एक दिन मैं जगजीत सिंह की गाई हुई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों का कैसेट ख़रीद लाया था और जैसे ही उसे कैसेट प्लेयर पर लगाया गुलज़ार साहब की आवाज़ में उनकी एक मशहूर नज़्म गूंजने लगी ...

बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों सी गलियाँ

सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के कसीदे

गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा

चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे

एक बकरी के मिम्याने की आवाज़

और धुन्दलाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साये   

अरे..! मैं चौंक गया.. यह दृश्य तो मेरा देखा हुआ है ৷ भंडारा में अपने ढोला प्राइमरी स्कूल जाते हुए और स्कूल से लौटते हुए हर रोज़ मैं इसी दृश्य के भीतर से होकर ही तो गुज़रता था ৷ बाईं ओर सत्तार दरोगा का मकान, फिर शफ़ी भाई पानवाले और हफीज़ पटेल का घर ৷ उसके बाद की गली में नईम का घर ৷ जैसे ही नईम अपनी गली में मुड़ता, मैं नईम से ‘कल मिलेंगे’ कहकर, नूरी मस्ज़िद के सामने से, कूँक कूँक करती मुर्गियों और  क्वैक क्वैक करती हुई बत्तखों से बतियाता हुआ और मिमियाती बकरियों को हकालता हुआ अपने घर की ओर बढ़ जाता ৷  


वैसे तो अनेक मुस्लिम परिवारों के बच्चे हमारे स्कूल में पढ़ते थे जिनमे कय्यूम था,अशरफ था लेकिन मेरी दोस्ती नईम से ही हुई ৷ नईम के अब्बा जनाब मुनीर खान सरकारी विभाग में ड्राफ्ट्समैन थे ৷ पुराने ढंग का, मिट्टी की मोटी मोटी दीवारों वाला उनका मकान, मस्जिद के पास ही स्थित था । अकसर घर लौटते हुए पानी पीने के लिए मैं नईम के घर रुक जाता ৷ मकान के दरवाज़े पर सबसे पहले नईम की फूफी  से दुआ सलाम  होती थी । वैधव्य के सफ़ेद लिबास में उनके साँवले चेहरे पर दुख साफ़ पढ़ा जा सकता था ৷ वे हमेशा मुझसे मेरे हाल चाल पूछतीं जिसमे मैं उनके ममत्व का अक्स देखता ৷   


नईम की माँ का निधन उन्हीं दिनों हो गया था जब हम लोग स्कूल में पढ़ते थे । वे डायबिटीज़ की मरीज़ थीं जो उन दिनों एक असाध्य सा रोग था ৷ नईम के घर में उससे छोटे दो भाई थे अल्ताफ़ और सैफ़ और एक छोटी बहन शाहीन ৷ नईम की माँ के गुजर जाने के बाद उनकी बुआ ने बच्चों की देखभाल की ৷ कभी कभी मैं नईम और उसके भाई बहनों के लिए सोचता तो मुझे बहुत दुःख होता ৷ मैंने पहली बार जीवन में महसूस किया कि माँ के नहीं रहने पर जीवन कैसा होता है ৷ अक्सर ऐसा सोचते हुए मेरी ऑंखें भर आतीं ৷

नईम की माँ मुझे बिलकुल अपनी माँ जैसी लगती थीं ৷ वे मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछतीं, सीमा और बबलू के बारे में पूछतीं, पढाई लिखाई के बारे में पूछतीं ৷ मैं जब भी नईम के घर जाता सीधे उनकी रसोई में चला जाता ৷ मुगलाई शैली में बने मांसाहारी व्यंजनों का सबसे पहला पहला स्वाद मेरी ज़ुबान पर नईम की माँ के हाथों बने खाने का ही है ৷

नईम के घर के सामने का हिस्सा जो रोड की तरफ खुलता था उसमे मुनीर खान चचा ने एक लकड़ी की टाल खोल ली थी ৷ उसके बाद हमें गली से होकर घर जाने की ज़रूरत नहीं रही ৷ हम लोग टाल के बड़े से दरवाज़े से ही आना जाना करने लगे ৷ रमज़ान ईद के शीर खुरमे का स्वाद अभी ज़ुबान से उतर भी नहीं पाता था कि चचा बकरीद के लिए एक बकरा ख़रीद लाते ৷ स्कूल से लौटते हुए हम लोग उस बकरे के लिए हरी पत्तियाँ तोड़कर लाते ৷ फिर नईम घर के भीतर से जर्मन सिल्वर के एक घमेले में मुरमुरे लेकर आता और उसे बकरे के सामने रख देता৷ वह कहता कि इसे खाने से ईद तक बकरा मोटा हो जाएगा ৷ लेकिन बकरीद के अगले रोज़ ही वह बकरा गायब हो जाता৷  छुट्टी के बाद जब मैं नईम के घर पहुँचता और उससे पूछता कि वह बकरा कहाँ गया , तो वह कहता उसकी कुर्बानी दे दी गई ৷ 

मैंने चचा  से पूछा कि कुर्बानी क्यों दी जाती है तो उन्होंने बताया "इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने पैगंबर इब्राहिम से उनकी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी मांगी थी। जब इब्राहिम अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने लगे, तो अल्लाह ने उनके जज़्बे से खुश होकर बेटे की जगह एक मेमने (बकरे) को भेज दिया था। इसी परंपरा के तहत बकरा ईद पर बकरे, भेड़ या अन्य जानवर की कुर्बानी दी जाती है।"

यह वह समय था जब कुर्बानी,शरीयत,रोज़ा,नमाज़,जकात,बुरखा,अल्लाह,मस्जिद,इबादत,सवाब, कुरआन जैसे शब्द, दान,पुण्य,ईश्वर,पर्दा,पूजा,प्रार्थना,व्रत, उपवास,सेवा,मंदिर,प्रणाम, पोथी, पुराण जैसे शब्दों के साथ बचपन के मेरे शब्दकोष में सहअस्तित्व स्थापित कर रहे थे ৷ मज़ेदार बात यह कि इस शब्दकोष में धर्म,मज़हब जैसे शब्द साथ साथ रहते थे और आपस में कभी लड़ाई नहीं करते थे ৷ प्रेम,मोहब्बत और दोस्ती जैसे शब्दों का स्थान इन सभी शब्दों से ऊपर था ৷   

जाने कितनी ईद और दिवालियाँ इस तरह बीत गईं ৷ मैं और नईम साथ साथ पढ़े और बढ़े ৷ मैट्रिक के बाद हम दोनों बी एस सी करने के लिए नागपुर पढने चले गए ৷ नईम तो वापस भंडारा आ गया लेकिन मैं कभी स्थायी रूप से भंडारा नहीं लौट पाया ৷ पढाई लिखाई पूरी हो जाने पर मुझे स्टेट बैंक की दुर्ग शाखा में नौकरी मिली और नईम को भंडारा शाखा में ৷ फिर शादी ब्याह, बच्चे और तमाम लंतरानियाँ ज़िंदगी की चलती रहीं, हम लोग एक दूसरे के परिवार के सुख दुःख में, शादी ब्याह आदि में शामिल होते रहे ৷  बचपन की हमारी यह मित्रता आज भी कायम है, भले ही अब हमारी मुलाकातें कभी कभार होती हैं लेकिन होती ज़रूर हैं ৷ हाँ, फोन पर हम लोग अक्सर बतियाते रहते हैं और इस बात की सत्यता स्थापित करते हैं कि दोस्ती कभी भौतिक उपस्थिति की मोहताज़ नहीं होती है ৷

शरद कोकास 

91. भंडारा : उस दिन ठण्ड का रंग गुलाबी था


हाँ उस दिन जब हम सातवीं क्लास  के बच्चे पिकनिक पर गए थे  

ज़िंदगी भर देश विदेश की यात्राएँ करें लेकिन बचपन के दिनों में अपने क्लासमेट्स के साथ पहली पहली यात्रा या पिकनिक हमेशा याद रहती है ৷ वह दिन भी मेरे जीवन का एक ऐसा दिन था जो बरसों मेरी स्मृतियों में बसेरा करने वाला था ৷ उस दिन सुबह आठ बजे हम सभी बच्चे स्कूल के सामने एकत्रित हो गए । 

ठंड का कोई रंग मुझे दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन सब उसे गुलाबी ठण्ड कह रहे थे ৷ हम लोग जुलुस की शक्ल में पैदल पैदल ही ढोला स्कूल से निकले, फिर वहाँ से शीतला माता मंदिर पहुँचे और वहाँ से रिंग रोड से आगे बढ़ कर खामतालाव, शुक्रवारी, मनरो स्कूल चौक से होते हुए शहर से बाहर एक ईट भठ्ठे पर पहुँचे । यह ईट भठ्ठा हमारी कक्षा की एक पंजाबी लड़की विनोद मदान के पिता निहालचंद जी मदान का था । 

हमारा कोई तयशुदा पिकनिक स्पॉट नहीं था लेकिन हमें आगे सूर नदी के किनारे तक जाना था ৷ यह जगह हमें इतनी अच्छी लगी कि हमने कुछ देर यहीं रुकने का फैसला किया । अचानक देखा ईट भठ्ठे में काम करने वाली कुछ महिलाएँ अखबार के कागज़ पर गर्मागर्म पोहा लेकर चली आ रही हैं ৷  मदान अंकल ने हम लोगों के लिए नाश्ते में पोहे की व्यवस्था पहले ही कर रखी थी ৷ अनुमान ने आश्चर्य से कहा ‘घड़ोले सर पहले ही मदान साहब से मिलकर सब कुछ तय कर चुके हैं ৷’ 

यहाँ तक पहुंचते पहुंचते भूख तो लग ही गई थी सो जमकर पोहा खाया और उसके बाद मस्ती शुरू ৷ माँ कहती थी ‘ पेट में गया दाना, मुर्गी करे धिंगाना ‘ सही बात थी ৷ हमने देखा आसपास बेर के कई पेड़ थे । पेट भरा था फिर भी हम लोगों ने बेर तोड़ कर खानी शुरू कर दी । इसके बाद अंकल हम बच्चों को ईट भठ्ठे पर ले गए मिट्टी से किस तरह साँचे में ढलकर ईट बन जाती है , उसे किस तरह पकने के लिए भट्ठी में रखा जाता है यह सब हमने पहली बार देखा ৷ ईट भठ्ठे के मजदूरों से भी हमारा परिचय हुआ जो वहीं टिन शेड में घर बनाकर रह रहे थे ৷ 

हमारा अगला पड़ाव था सूर नदी ৷ तीन- चार किलोमीटर पैदल चलने के बाद हम लोग थकावट महसूस कर रहे थे लेकिन नाश्ते ने हमारे लिए एनर्जी बूस्टर का काम किया था । नदी का बहता हुआ पानी देखकर सारी थकावट ग़ायब हो गई ৷ मैं नदी से कुछ दूर ही था लेकिन मुझे लगा नदी मुझे अपने पास बुला रही है ৷ इस निमंत्रण को मैं  कैसे अस्वीकार कर सकता था ৷ मैंने अपने मित्रों के साथ सर से अनुमति ली और नदी में छलांग लगा दी । कुछ सीनियर और अनुभवी छात्रों की सलाह पर हम लोग अंतर्वस्त्र,टावेल आदि साथ लेकर गए थे ৷ हालाँकि नदी में पानी कम और रेत अधिक थी इसलिए डुबकी लगाने के आनंद से हम लोग वंचित रहे ৷ मुझे याद है मेरे मित्र नरेश मदान की सैंडल उस रेत में फँस गई थी जिसे बहुत मुश्किल से हम लोगों ने निकाला । 

नहा धोकर फिर हम लोग आगे बढ़े और एक संतरे के बाग में पहुँचे । उसके निकट ही अमरुद का एक बाग़ भी था ৷ हम लोगों ने ईमानदारी से इन बागों से संतरे और अमरुद खरीदे । यद्यपि खरीदना सिर्फ नाम के लिए था, खरीदकर खाने से ज़्यादा आनंद चुराकर खाने में आया ৷ हालाँकि यह चोरी छुपी नहीं रही, बहरहाल संतरे और जाम इतने मीठे थे कि चौकीदार की  गालियाँ भी हमें मीठी लगीं । 

इस पिकनिक का सबसे ज़ोरदार आइटम था लड़कियों द्वारा सूजी का हलुआ बनाना ৷ हम लोग अपने साथ हलुआ बनाने का सामान भी ले गये थे ।  भोजन की अन्य सामग्री विनोद के पिताजी के सौजन्य से आई थी ৷  सबसे पहले हम लोगों ने एक पेड़  के नीचे ईटों का एक चूल्हा बनाया । फिर लकड़ियाँ इकठ्ठी की और आग जलाई ৷ आगे कढ़ाई चढ़ाने से लेकर  हलुआ बनाने तक का काम लड़कियों के ज़िम्मे था सो लड़के निश्चिन्त होकर खेलते रहे  । 

थोड़ी देर में आवाज़ आई, ‘हलुआ तैयार है’ । पेट तो वैसे ही सबके भरे हुए थे फिर भी सभी ने बहुत चटखारे लेकर हलुआ खाया । हालाँकि उसमे पानी की मात्रा अधिक हो जाने के कारण हलुआ थोड़ा सा पतला हो गया था । कुछ लड़कों ने मज़ाक में कहा कि अगर पतंग बनाने के ताव ( कागज़ ) ले आते तो इससे पतंग भी बना लेते । उसके बाद मनोरंजन कार्यक्रम शुरू हुआ । वैसे भी खाने के बाद गाना होना ही था ৷ किसीने गीत गाया, किसीने चुटकुला सुनाया । 

अर्चना ने अपने तैयार किये हुए दोनों गीत सुनाये । मैं तो शास्त्रीय संगीत वाला गायक था लेकिन मैंने उन दिनों चर्चित एक  गीत सुनाया ..”सुन ले बापू ये पैगाम मेरी चिठ्ठी तेरे नाम , चिठ्ठी में सबसे पहले लिखा तुझको राम राम ৷” इस गीत की यह पंक्तियाँ मुझे अब भी याद हैं .. “तेरी लकड़ी ठगों ने ठग ली तेरी बकरी ले गए चोर, साबरमती सिसकती तेरी तड़प रहा है सेवाग्राम ৷” मुझे क्या पता था कि अगले अनेक वर्षों तक इस परिदृश्य में कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है ৷

खैर, नहाना-धोना, घूमना-फिरना, खाना-पीना,गाना - बजाना ख़त्म हुआ ৷ पिकनिक को परिभाषित करने वाले सभी कार्य संपन्न हुए ৷ ठण्ड के दिन थे इसलिए जल्द ही घर लौटना था ৷ जैसे गंजे का माथा कहाँ तक होता है पता नहीं चलता वैसे ही ठण्ड के दिनों में सुबह दोपहर के बीच कहाँ तक चली जाती है समझ में नहीं आता ৷ इधर शाम बिना ओवरटाइम किये जल्द ही घर लौट जाना चाहती है  ৷ हम लोगों को अँधेरा होने से पहले घर पहुंचना था इसलिए दोपहर की साँस टूटने से पहले ही हम लोग ईट भठ्ठे पर लौट आये । विनोद के पिताजी ने हम लोगों के लिये चाय बिस्कुट की व्यवस्था कर रखी थी ৷ अब हमें पैदल नहीं लौटना था, वापसी की यात्रा के लिए उन्होंने एक ट्रक की व्यवस्था भी कर दी थी । ट्रक के डाले में बैठकर हम लोग स्कूल के सामने तक आये और फिर वहाँ से सब बच्चे शाम ढलने से पूर्व ही अपने अपने घरों को लौट गए  ।   



83. भंडारा : मस्जिद के पास मंडराती बत्तखें

सप्ताह में एक बार किसी शाम मुझे गेहूँ पिसवाने के लिए फाये की आटा चक्की जाना पड़ता था ৷ साइकिल के कैरियर पर गेहूँ का पीपा रखकर पैदल पैदल मैं चक्की तक जाता और एक पटिये पर लाइन में रखे  डिब्बों के पीछे अपना पीपा रखकर,  चावल से भूसा निकालने की विशालकाय मशीन के लिए लगी लकड़ी के पटिये वाली सीढ़ी पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करता ৷

फाये की यह आटा चक्की एक बड़े से हाल में थी जहाँ पीली मरियल रौशनी वाला एक बल्ब टिमटिमाता रहता था ৷ वह मरियल सी उदास रौशनी और चक्की के कैनवास के पट्टों से आती ‘फट फटा फट फट, फट फटा फट फट’ की मोनोटोनिक आवाज़ शाम को गहरी उदासी से भर देती ৷ मैं टाइम पास करने के लिए उस ‘फट फटा फट’ की लय में कोई भी गीत फिट करके मन ही मन उसे गुनगुनाता रहता ৷

जैसे ही चक्की की खड़ खड़ की आवाज़ में किंचित परिवर्तन होता मैं समझ जाता एक जन का गेहूं पिस गया है ৷ फिर जब मेरा नंबर आता मैं सीढ़ी से उतरकर नीचे आ जाता और फिर अपना पीपा उठाने से पहले  उड़ते हुए आटे से सनी भौंहे और बालों वाले फाये को गिनकर पैसे दे देता ৷ भरी जवानी में इस तरह सफ़ेद भौंहों और सफ़ेद बालों वाले फाये को देखकर मेरी ऊब पूरी तरह समाप्त हो जाती ৷ लौटते हुए पीपे को बहुत संभालकर लाना होता था ৷कैरियर पर पीपा रखकर दाहिने हाथ से पीपा और बाएँ हाथ से साइकिल का हैंडल पकड़कर पैदल चलते हुए साइकिल घर तक लाना बहुत कठिन काम होता था ৷ फिर लौटते समय पीपा भी बहुत गर्म रहता था जिसे न पूरी तरह पकड़ सकते थे न पूरी तरह छोड़ सकते थे ৷

फाये आटा  चक्की की जगह अब फाये ज्वेलर्स है 

आटा चक्की के बाद पनके का मकान आता है ৷ उसके बाद एक बाड़ा था जहाँ खड़तकर रहा करते थे ৷ मिसेस खड़तकर बाबूजी को भाई मानती थीं और उनके यहाँ हमारा आना जाना था ৷ यहीं वह चौराहा  आता है जिससे सीधे जाएँ तो हमारा स्कूल आता है ৷ चौराहे से दाहिनी ओर का रास्ता खामतालाव  जाता है और बाईं ओर का रास्ता गांधी चौक ৷

लेकिन अभी तो यह नन्हे पाँव स्कूल की ओर बढ़ रहे हैं ৷ इस चौक पर पेट्रोल पम्प वाले गुर्जर का मकान है इसलिये यह चौक ‘गुर्जर चौक’ भी कहलाता है । गुर्जर के घर के सामने की ओर लकड़ी की जालियां लगी थी जिसके पीछे शायद उनका ड्राइंग रूम था ৷ मेरे नन्हे पाँव उनके घर के पिछवाड़े पारिजात  के एक पेड़ के नीचे अक्सर ठहर जाते थे ৷ वैसे तो यह पेड़ उनके घर के भीतर आंगन में था लेकिन उसकी डालियाँ बाहर सड़क तक आ गई थीं ৷ शनिवार की सुबह स्कूल जाते हुए नीचे बिछे हुए नारंगी डंडी वाले सफ़ेद फूलों को चुनने का मोह मैं कभी नहीं त्याग पाया ৷ 

बरसों बाद मैंने दुष्यंत का एक शेर पढ़ा था “ तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा किया , पांवों की सब ज़मीन को फूलों से ढँक दिया “ आज भी जब मैं इस शेर को याद करता हूँ तो मुझे भंडारा के गुर्जर चौक पर गुर्जर  के मकान में लगे हरसिंगार के सड़क पर बिछे  हुए वे फूल याद आते हैं ৷ 

इस चौक के बाद अगला चौक बजरंग चौक है जहाँ पीपल का एक बड़ा सा पेड़ है और उसके नीचे गोल चबूतरा यह फुरसतिया लोगों का गप लड़ने का अड्डा है  । मेरे मन में चौपाल का बिम्ब इसी चबूतरे का बिम्ब है  ৷ बजरंग चौक से आगे बढ़ते ही दाहिनी ओर भँवरे सर का जाली वाला मकान मिलता था, भँवरे सर हमें हिन्दी पढ़ाते थे, साथ ही स्कूल में एन सी सी ऑफिसर भी थे ৷ उनकी बेटी का नाम रजनी था । 

यहीं था भवरे सर का मकान जाली वाला 

बजरंग चौक के बाद मुस्लिम बस्ती शुरू हो जाती है  ৷ जहाँ बाईं ओर एक मस्जिद है और दाहिनी ओर अन्य मकानों के साथ पतंग वाले अब्बास मियाँ का मकान । अब्बास मियाँ पहलवान भी थे और पतंगबाज़ भी ৷ वे पतंग और मांझा बेचने का धंधा भी किया करते ৷ चौखाने वाला तहमत पहने अब्बास मियाँ मस्जिद के सामने वाले बिजली के दो खम्भों के बीच धागा बांधते और रंगीन लुगदी लगाकर मांझा सूतते थे । मैं अक्सर उनके पास रुक कर उनका मांझा सूतना देखा करता ৷

उस मोहल्ले में रहने वाले मेरे सहपाठी  बताते थे कि अब्बास मियाँ पके हुए चावल में अरारोट और रंग के अलावा काँच का महीन चूरा भी मिलाते हैं और फिर उससे पतंग के धागे को सूतते हैं । उनका दावा था कि उनके बनाये हुए मांझे को किसी का भी बनाया हुआ मांझा नहीं काट सकता । मेरे पास मांझा खरीदने के लिए कभी पैसे नहीं रहे ৷ हालाँकि अब्बास मिया से प्रेरित होकर मैंने  भी एक बार मांझा सूतने की कोशिश की थी लेकिन लुगदी बनाने के लिए काँच पीसने की कोशिश में पहले ही काँच से हाथ कट गया था ।  

अब्बास मियाँ के मकान में हरी चादर से ढकी हुई मज़ार की तरह दिखाई देने वाली किसी पीर बाबा की गद्दी भी है ৷ फिर  एक कच्चा सा मकान है जिसमें एक बड़ा सा दालान है ৷ इस दालान की छत बांस की बल्लियों पर टिकी हुई है । इस मकान के आंगन में जहाँ अमरुद का एक पेड़ है  वहाँ अक्सर एक साइकिल रिक्शा खड़ा रहता है  ৷ इस मकान के सामने से गुजरते हुए मैं हमेशा उस रिक्शे को देखा करता ৷ मस्जिद की चारदीवारी ठीक इसी मकान के सामने से शुरू होती है ৷ मस्जिद के मुख्य द्वार के सामने एक  गली है जिसमें स्कूल का मेरा दोस्त अशरफ रहा करता था । 

इस गली के बाद दाहिनी ओर मेरे मित्र नईम का मकान आता है  । पहले नईम के यहाँ जाने के लिये पीछे की गली से जाना होता था,बाद में नईम के अब्बा ने सामने की ओर एक लकड़ी की टाल डाल दी थी सो हम लोग वहीं से आना जाना करने लगे । नईम का मकान पार करते ही एक दो मकानों और सड़क की ढलान के बाद ढोला प्रायमरी स्कूल आ जाता है  । इस स्कूल के सामने जो बड़ी सी पानी की टंकी है उसकी वज़ह से इसे ढोला स्कूल कहा जाता था । वैसे इसका नाम विवेकानंद प्राइमरी स्कूल  था ৷इससे आगे बढ़ने पर नगर परिषद गांधी विद्यालय आता है लेकिन वहाँ तो हम बाद में जायेंगे ৷ अभी तो यहाँ नालियों के आसपास घूमती और क्वैक क्वैक  करती बत्तखों से थोडा बतिया लेते हैं ৷ तिथि दानी की कविता ‘प्रार्थनारत बत्तखें ’ पढ़ते हुए मुझे भंडारा की उस मस्जिद के पास मंडराती यही बत्तखें याद आती हैं ৷