अपने बचपन की उन गलियों में भटकते हुए एक दिन मैं जगजीत सिंह की गाई हुई मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों का कैसेट ख़रीद लाया था और जैसे ही उसे कैसेट प्लेयर पर लगाया गुलज़ार साहब की आवाज़ में उनकी एक मशहूर नज़्म गूंजने लगी ...
बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों सी गलियाँ
सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के कसीदे
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
एक बकरी के मिम्याने की आवाज़
और धुन्दलाई हुई शाम के बे-नूर अँधेरे साये
अरे..! मैं चौंक गया.. यह दृश्य तो मेरा देखा हुआ है ৷ भंडारा में अपने ढोला प्राइमरी स्कूल जाते हुए और स्कूल से लौटते हुए हर रोज़ मैं इसी दृश्य के भीतर से होकर ही तो गुज़रता था ৷ बाईं ओर सत्तार दरोगा का मकान, फिर शफ़ी भाई पानवाले और हफीज़ पटेल का घर ৷ उसके बाद की गली में नईम का घर ৷ जैसे ही नईम अपनी गली में मुड़ता, मैं नईम से ‘कल मिलेंगे’ कहकर, नूरी मस्ज़िद के सामने से, कूँक कूँक करती मुर्गियों और क्वैक क्वैक करती हुई बत्तखों से बतियाता हुआ और मिमियाती बकरियों को हकालता हुआ अपने घर की ओर बढ़ जाता ৷
वैसे तो अनेक मुस्लिम परिवारों के बच्चे हमारे स्कूल में पढ़ते थे जिनमे कय्यूम था,अशरफ था लेकिन मेरी दोस्ती नईम से ही हुई ৷ नईम के अब्बा जनाब मुनीर खान सरकारी विभाग में ड्राफ्ट्समैन थे ৷ पुराने ढंग का, मिट्टी की मोटी मोटी दीवारों वाला उनका मकान, मस्जिद के पास ही स्थित था । अकसर घर लौटते हुए पानी पीने के लिए मैं नईम के घर रुक जाता ৷ मकान के दरवाज़े पर सबसे पहले नईम की फूफी से दुआ सलाम होती थी । वैधव्य के सफ़ेद लिबास में उनके साँवले चेहरे पर दुख साफ़ पढ़ा जा सकता था ৷ वे हमेशा मुझसे मेरे हाल चाल पूछतीं जिसमे मैं उनके ममत्व का अक्स देखता ৷
नईम की माँ का निधन उन्हीं दिनों हो गया था जब हम लोग स्कूल में पढ़ते थे । वे डायबिटीज़ की मरीज़ थीं जो उन दिनों एक असाध्य सा रोग था ৷ नईम के घर में उससे छोटे दो भाई थे अल्ताफ़ और सैफ़ और एक छोटी बहन शाहीन ৷ नईम की माँ के गुजर जाने के बाद उनकी बुआ ने बच्चों की देखभाल की ৷ कभी कभी मैं नईम और उसके भाई बहनों के लिए सोचता तो मुझे बहुत दुःख होता ৷ मैंने पहली बार जीवन में महसूस किया कि माँ के नहीं रहने पर जीवन कैसा होता है ৷ अक्सर ऐसा सोचते हुए मेरी ऑंखें भर आतीं ৷
नईम की माँ मुझे बिलकुल अपनी माँ जैसी लगती थीं ৷ वे मुझसे मेरी माँ के बारे में पूछतीं, सीमा और बबलू के बारे में पूछतीं, पढाई लिखाई के बारे में पूछतीं ৷ मैं जब भी नईम के घर जाता सीधे उनकी रसोई में चला जाता ৷ मुगलाई शैली में बने मांसाहारी व्यंजनों का सबसे पहला पहला स्वाद मेरी ज़ुबान पर नईम की माँ के हाथों बने खाने का ही है ৷
नईम के घर के सामने का हिस्सा जो रोड की तरफ खुलता था उसमे मुनीर खान चचा ने एक लकड़ी की टाल खोल ली थी ৷ उसके बाद हमें गली से होकर घर जाने की ज़रूरत नहीं रही ৷ हम लोग टाल के बड़े से दरवाज़े से ही आना जाना करने लगे ৷ रमज़ान ईद के शीर खुरमे का स्वाद अभी ज़ुबान से उतर भी नहीं पाता था कि चचा बकरीद के लिए एक बकरा ख़रीद लाते ৷ स्कूल से लौटते हुए हम लोग उस बकरे के लिए हरी पत्तियाँ तोड़कर लाते ৷ फिर नईम घर के भीतर से जर्मन सिल्वर के एक घमेले में मुरमुरे लेकर आता और उसे बकरे के सामने रख देता৷ वह कहता कि इसे खाने से ईद तक बकरा मोटा हो जाएगा ৷ लेकिन बकरीद के अगले रोज़ ही वह बकरा गायब हो जाता৷ छुट्टी के बाद जब मैं नईम के घर पहुँचता और उससे पूछता कि वह बकरा कहाँ गया , तो वह कहता उसकी कुर्बानी दे दी गई ৷
यह वह समय था जब कुर्बानी,शरीयत,रोज़ा,नमाज़,जकात,बुरखा,अल्लाह,मस्जिद,इबादत,सवाब, कुरआन जैसे शब्द, दान,पुण्य,ईश्वर,पर्दा,पूजा,प्रार्थना,व्रत, उपवास,सेवा,मंदिर,प्रणाम, पोथी, पुराण जैसे शब्दों के साथ बचपन के मेरे शब्दकोष में सहअस्तित्व स्थापित कर रहे थे ৷ मज़ेदार बात यह कि इस शब्दकोष में धर्म,मज़हब जैसे शब्द साथ साथ रहते थे और आपस में कभी लड़ाई नहीं करते थे ৷ प्रेम,मोहब्बत और दोस्ती जैसे शब्दों का स्थान इन सभी शब्दों से ऊपर था ৷
जाने कितनी ईद और दिवालियाँ इस तरह बीत गईं ৷ मैं और नईम साथ साथ पढ़े और बढ़े ৷ मैट्रिक के बाद हम दोनों बी एस सी करने के लिए नागपुर पढने चले गए ৷ नईम तो वापस भंडारा आ गया लेकिन मैं कभी स्थायी रूप से भंडारा नहीं लौट पाया ৷ पढाई लिखाई पूरी हो जाने पर मुझे स्टेट बैंक की दुर्ग शाखा में नौकरी मिली और नईम को भंडारा शाखा में ৷ फिर शादी ब्याह, बच्चे और तमाम लंतरानियाँ ज़िंदगी की चलती रहीं, हम लोग एक दूसरे के परिवार के सुख दुःख में, शादी ब्याह आदि में शामिल होते रहे ৷ बचपन की हमारी यह मित्रता आज भी कायम है, भले ही अब हमारी मुलाकातें कभी कभार होती हैं लेकिन होती ज़रूर हैं ৷ हाँ, फोन पर हम लोग अक्सर बतियाते रहते हैं और इस बात की सत्यता स्थापित करते हैं कि दोस्ती कभी भौतिक उपस्थिति की मोहताज़ नहीं होती है ৷
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