उन्नीस सौ अठहत्तर की वो एक शाम थी ৷ छुट्टियों में घर आया था मैं ৷ मेरी शामें उन दिनों अक्सर भंडारा के गांधी चौक पर सुशील माहुले के बुक कार्नर पर गुजरती थीं ৷ सुरेन्द्र और तिलक भी वहीं आ जाया करते थे ৷ सुरेन्द्र के यहाँ उन दिनों एक रिकॉर्ड प्लेयर था जिस पर हम लोग जगजीत सिंह की गज़लें सुना करते थे ৷ एक दिन सुरेन्द्र ने बताया कि एक नया रिकॉर्ड आया है जगजीत सिंह का जिसमे उन्होंने पंजाबी के कवि शिवकुमार बटालवी की कविताओं को गाया है ৷ हम लोग सुरेन्द्र के घर पहुँचे और डूब गए जगजीत सिंह की आवाज़ और ‘बिरहा दा सुल्तान शिवकुमार बटालवी’ के गीतों में...
दरअसल सुरेन्द्र से दोस्ती का यह सिलसिला बरसों पहले ढोला स्कूल से प्रारंभ हुआ था ৷ तीसरी क्लास कुछ नए दोस्तों की सौगात लेकर आई जिसमे मीठी ज़ुबान के खूबसूरत से रैपर में लिपटी एक दोस्ती मुझे पसंद आ गई ৷ बड़ा प्यारा सा ख़ूबसूरत और मासूम सा है मेरा यह दोस्त सुरेन्द्र चड्ढा ৷ सुरेन्द्र के पिता मंगलदास जी सन साठ में रोजी रोटी की तलाश में भंडारा आ गए थे ৷ विभाजन के समय पाकिस्तान से भारत आते हुए कई कई दिनों तक पैदल चलने की वज़ह से उनके पांवों में बने ज़ख्म भी अभी नहीं भरे थे ৷ मन के ज़ख्म तो शायद अंतिम साँस तक साथ रहने वाले थे ৷
भंडारा में उन दिनों पीतल के बर्तन निर्माण का व्यवसाय अपने चरम पर था ৷ पंजाब की जगाधरी के बाद दूसरे नंबर की पीतल के मंडी कहलाने का गौरव भंडारा को हासिल हो रहा था ৷ भंडारा आकर मंगलदास जी ने पारस मेटल वर्क्स में मजदूरी करना प्रारंभ किया ৷ दो बिटिया उषा व उर्मिला तथा बेटा सुरेन्द्र, परिवार और जीवन साथ साथ बढ़ने लगे ৷ जैसा कि चलन था सारे गैर मराठी परिवार के बच्चे शहर की एकमात्र प्राइमरी स्कूल में एडमिशन लेते थे सो इन बच्चों ने भी वहाँ पढ़ना शुरू किया ৷
धीरे धीरे और भी परिवार पंजाब से आते रहे ৷ उन्ही में एक परिवार से तिलक था जो फिर छठवीं क्लास से मेरा और सुरेन्द्र का दोस्त बना ৷ वे दिन अभावों के बीच खुशियाँ ढूँढने के दिन थे ৷ स्कूल से घर लौटते हुए हमारी जेबों में पत्थर हुआ करते थे जिनके निशाने पर रास्ते में आनेवाले आम और अमरुद के पेड़ हुआ करते थे ৷ ठंड के दिनों में मैं सुरेन्द्र और तिलक रेल पटरी के पास के रास्ते से घर लौटते और रास्ते में मिलने वाले बेर के पेड़ों से बेर तोड़ते हुए घर आते । स्कूल यूनिफ़ॉर्म की हमारी जेबें खट्टी मीठी बेरियों से भरी होती थीं ৷
सुरेन्द्र व तिलक पारस मेटल फैक्टरी के परिसर में रहा करते थे । उनके घर से लगे जाने कितने बेर के पेड़ थे ৷ इधर बरसात आते ही खेतों में धान की बुआई पूरी हो जाती और कुछ ही दिनों में फसल लहलहाने लगती ৷ सुरेन्द्र के पिता मंगलदास जी इसी पीतल बनाने के कारखाने में काम करते थे । मैं अक्सर उन लोगों के साथ या ऐसे ही कभी उनके घर चले जाया करता था । एक बार मैंने सुरेन्द्र के पिताजी को कारखाने में भठ्ठी के सामने काम करते हुए देखा, वे सफ़ेद कमीज़ और पायजामा पहने हुए थे ৷ ग्यारह सौ डिग्री गर्मी में काम करते हुए पसीने से उनके सारे कपड़े भीगे हुए थे ৷ तब मुझे ज्ञात हुआ कि पीतल के बर्तनों का निर्माण कितनी मेहनत का काम है ।
इधर जब बसन्ती बयारें बहने लगतीं, पटरी के किनारे लगे टेसू के पेड़ केसरिया फूलों से लद जाते ৷ मैं तिलक और सुरेन्द्र घर लौटते हुए ढेर सारे टेसू के फूल अपने बस्तों में इकठ्ठा कर लेते और होली के दिन सुबह से खौलते पानी में उन्हें डालकर उनसे रंग बनाते ৷ स्कूल के दिनों में तो मैं होली खेलने वाले दिन उनके घर कभी नहीं जा पाया लेकिन भंडारा से बाहर जाने के बाद होली के दिनों में मैं विशेष रूप से अपने इन मित्रों के साथ होली मनाने के लिए भंडारा लौटता था ৷
बाद में सन सत्तर के करीब सुरेन्द्र के पिताजी ने कुछ पैसे जोड़कर साझेदारी में भंडारा में पीतल के बर्तनों का अपना व्यवसाय प्रारंभ कर दिया था और वहीं सेटल हो गए ৷ आगे चलकर उनका व्यवसाय सुरेन्द्र और उनके भाइयों दीपक और सुनील ने संभाल लिया ৷ उषा दीदी, उर्मिला व अन्य बहनों का विवाह हो गया और सब अपने अपने परिवार में व्यस्त हो गए ৷
सुरेन्द्र से दोस्ती का सिलसिला कुछ ऐसा जुड़ा कि उसने अपने बेटे का नाम ही शरद रख दिया ৷ मैंने कहा और कोई नाम नहीं मिला तुझे ? तो हँसने लगा .. “ऐसा है कि तेरी पिटाई तो कभी कर नहीं सका अब बेटे की पिटाई कर लेता हूँ और खुश हो जाता हूँ ৷” मेरा हमनाम सुरेन्द्र का यह बेटा अब काफी बड़ा हो गया है तथा स्टील फैक्टरी और रियल एस्टेट के कारोबार में है ৷
सुरेन्द्र मेरे साथ युवावस्था के दिनों में भी अमृता प्रीतम की कविताओं में, शिवकुमार बटालवी के गीतों में और जगजीत सिंह की गाई गज़लों में एक अंतरंग मित्र की तरह उपस्थित रहा ৷ भोपाल और उज्जैन में पढ़ते हुए जब भी मैं छुट्टियों में घर लौटता कई शामें अपने आप को हमारी दोस्ती के रंग में घुला हुआ पातीं ৷ होली के रंग हमारे गालों पर थोड़ा सा प्यार चुपड़ते और उसे मित्रता की स्निग्धता से उन्हें नम रखते ৷ बातचीत के लम्बे लम्बे अंतरालों के बावजूद यह सिलसिला अब तक जारी है ৷ भंडारा की फ़ज़ाओं में बरसों पहले सुनी जगजीत सिंह की गाई वह कविता अब भी गूंजती है
रोग बनके रह गया है प्यार तेरे शहर दा
मैं मसीहा वेखिया बीमार तेरे शहर दा ....

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