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10 जून 2026

82 . भंडारा : आज चलिए मेरे साथ मेरे स्कूल जाने के रस्ते पर


बजरंग चौक भंडारा 
बचपन के वे दिन नन्हे नन्हे पाँवों के ज़मीन से पहचान के दिन थे ৷ स्कूल के सामने का बागीचा, सामने की मज़ार,
ढोला स्कूल के सामने की रोड पर मज़ार 

जेल के पिछवाड़े के खजूर के पेड़, बाँस के झुरमुट,
जेल के पीछे की सड़क 
दुर्गा मंदिर के पीछे छतरियों के खँडहर, हाथीखाने के सामने बनी गलियां , चिचबन मैदान,
चिचबन मैदान स्टेडियम 
खामतालाव के दूसरी ओर  का जंगल, पारस मेटल वर्क्स तक रेल की पटरियों वाला रास्ता ৷ नन्हे पाँव धीरे धीरे इन सबसे परिचय प्राप्त कर रहे थे ৷ था । सुबह घर से निकलकर स्कूल तक का रास्ता तो मैं सीधे ही तय करता था लेकिन लौटते हुए मानो पाँव आज़ाद हो जाते थे और सीधे न लौटकर अलग अलग रास्तों से भटकते हुए मुझे घर ले आते थे  । 

स्कूल के आसपास की चीजों को याद कर लिया चलिए अब घर से निकलते हैं 
वह जो टीन का खुला हुआ दरवाज़ा है वही मेरा घर है 

हमारी गली से निकल कर दाहिनी  ओर जाने वाला रास्ता सीधे स्कूल जाता था । चलिए वहीं मुड़ते हैं ।  पहली वाली तस्वीर पुरानी है उसमे जो टूटा फूटा घर दिख रहा हा वह डाकरे का बाड़ा का कॉर्नर है । अब नीचे का चित्र देखिए उस कॉर्नर वाली जगह एक रूम बना दिखता है हरी जाली लगी है जिस पर । 

दाहिनी ओर गली और सामने का रास्ता 

वैसे आपको बता  दूँ कि  घर से स्कूल तक लगभग डेढ़ किलोमीटर के उस रास्ते में आने वाले प्रत्येक मकान और दुकान को मैं ध्यान से देखा करता और कोशिश करता कि उनके भीतर चल रही ज़िंदगी का जायज़ा ले सकूँ । 

कस्बाई रिहायश में मकान सड़क से ही शुरू हो जाते थे । वे ऐसे मकान नहीं होते थे कि बाहर  का दरवाज़ा बंद तो सबसे संपर्क समाप्त ৷ अधिकतर मकानों में आंगन थे और कोई बाउंड्रीवाल जैसी कोई चीज़ नहीं होती थी ৷ सुबह खुलने वाले घर के दरवाज़े रात के पहले बंद नहीं होते थे इसलिए मेरा यह ताका झाँकी का काम जिसे सभ्य शब्दों में ऑब्जरवेशन कहते हैं भलीभांति संपन्न हो जाता था ৷

आज आप लोगों के साथ, अपने उन्ही नन्हे कदमों से, फिर एक बार बचपन के उसी रास्ते पर चलने का मन कर रहा है जिन रास्तों ने मेरे वज़ूद जो एक पहचान दी ৷ सोच रहा हूँ इस रास्ते पर आने वाले घरों और उन घरों में रहने वाले लोगों से भी आपका परिचय करवाता चलूँ ৷

तो चलिए आगे बढ़ते हैं  

 गली से बाहर निकलते हुए और मुख्य सड़क पर पहुंचते हुए जो दाहिनी ओर जो यह पहला घर आता है वह भागवत जी का है ।   भागवत जी मोटा स चश्मा लगाते  थे , हमेशा सैंडो बनियान  मे दिखते थे ।  वे बच्चों पर बहुत चिल्लाया करते थे इसलिये बच्चों ने उनका नाम ‘ बोम्बल्या भागवत ’ रख दिया था । मराठी में बोम्बलने का अर्थ चिल्लाना होता है । भागवत जी बरसों यहाँ रहे बाद में उन्होंने यह मकान सम्पत्ति सम्बन्धी किसी विवाद के कारण खाली कर दिया था । लेकिन अभी भी शायद इसमे कोई रहता नहीं है । 

2012 मे बोम्बल्या भागवत का घर 

2023 मे बोम्बल्या भागवत का घर 

चलिए अब हम सबसे पहले दाहिनी और रहने वालों से परिचय प्राप्त करते हैं ৷ भागवत के मकान के बाद एक बड़े से आंगन वाला मकान आता है जिसमें  दादा हलमारे के रिश्तेदार रहते थे । वह एक कच्चा झोपड़ीनुमा मकान था और उसमे एक बड़ा सा आंगन था । उसके बाद हलमारे का मकान था । मकान मालिक हलमारे जी जिन्हे सब दादा कहते थे ,शिक्षा विभाग में अधिकारी थे । उनका ड्राइंग रूम सुसज्जित था और मुझे बहुत अच्छा लगता था । उनके घर के सामने बैठने के लिए पत्थर की दो बेंचें बनी थीं ৷ बाबूजी अक्सर हलमारे काका के यहाँ जाते थे और सीमेंट की इन बेंचों पर बैठकर गपियाया करते थे ।  अब तो इस घर मे कोई रहता नहीं , घर भी टूट फूट चुका है और यह बेंच भी अब वहाँ नहीं है अलबत्ता टीन का दरवाज़ा  अवश्य वहाँ है , देखिए 2012 के बाद की 2023 की यह तस्वीर 
2012 मे दादा हलमारे का घर 

2023 मे सीमेंट की बेंचें नहीं रहीं 

आगे बढ़ाने पर उसके बाद एक केश कर्तनालय मिलता है , मेरे बचपन के दिनों मे तो उसका कोई नाम नहीं था , बस नाई की दुकान कहते थे लेकिन अभी देखा मैंने वहाँ "विजय सेलून" ऐसा एक बोर्ड लगा है | 2012 मे जब मैं भंडारा गया था बचपन के मित्रों पड़ोसियों सेलून के मालिक भैया, अशोक तिवारी के साथ एक फ़ोटो खिंचवाया था। 
2012 मे भैया अशोक तिवारी के साथ 

2023 मे विजय सेलून 

इसके बाद एक कच्चा मकान आता है दाहिनी ओर जिसमे गायें बंधी रहती थीं देखिए चित्र मे 
भैया का घर 

भैया जी 

उसके बाद आगे बढ़ने  पर दाहिनी ओर  ‘लोक वाणी ‘ के संपादक पंडितराव का मकान आता था उसमे भी एक चारदीवारी मे टीन का दरवाज़ा था , फिर आँगन , बगीचा और उनका घर जिसके अहाते मे प्रिंटिंग मशीन रखी  थी जिस पर साप्ताहिक अखबार लोकवाणी छपता  था । अब इस मकान का रूप बदल गया है । यहाँ कोई स्मृति सभागृह है । 
2023 लोकवाणी 

पंडित राव के घर के बाद एक पतली सी गली थी जो आगे रवि रेहपाड़े के घर के पास निकलती थी ।  आगे बढ़ने  पर दाहिनी ओर ही बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज या डी  एड  कॉलेज आता था , जिसका बड़ा भारी शायद दस फुट का गेट  था , उसमे एक छोटा दरवाज़ा  भी था । अब यहाँ बेसिक प्राथमिक शाला है , चित्र मे देखिए । 

। फिर आगे बढ़ने पर एक मन्दिर नुमा इमारत आती थी जिसे ‘नागठाना’ कहते थे ,इसकी तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं । 
2023 नागठाना 

नागठाना  के बाद एक झोपड़ी थी आश्चर्य की बात यह कि हमारे बचपन में यह झोपड़ी जैसी थी वैसे ही आज भी है

यह देखिए 2023  की यह तस्वीर

उसके बाद आती थी भाट्या की किराने की दुकान जिसके जिक्र मे मैंने लिखा था कि जहाँ लगभग सभी वस्तुएँ मिल जाया करती थीं । यहाँ देखते हैं आजकल क्या है , चलो भाई गूगल अर्थ का स्ट्रीट व्यू देखते हैं । 

ओह  यहाँ भी एक किराना दुकान थी जो अब कहीं और स्थानांतरित हो गई है । हालांकि इस की एक तस्वीर मेरे पास है उसके बाद उससे लगा हुआ पंडित लक्ष्मण प्रसाद शुक्ला का मकान था जहां अभी दरवाज़ा दिख रहा है वहीं गली के अंदर जो पीछे एक आँगन मे खुलती थी । जहाँ मैं तीज के अवसर पर सीदा पहुँचाने जाया करता था । ‘ सीदा’ अर्थात पंडित को पूजा के एवज में दिया जाने वाला रसोई का सामान । माँ किसी किसी त्यौहार पर मुझे एक सूप में रखकर चावल, गेहूँ का आटा ,दाल , शक्कर और आलू देती थी उसे मैं पहुंचा आता था । पहले साल जब मैं सूप में यह सब लेकर गया तो मुझे बहुत शर्म आई सो अगले साल से माँ ने यह सब सामग्री पुड़िया में बान्धकर थैले में देना शुरू कर दिया । पंडित लछमन प्रसाद शुक्ल बहुत साफ हिन्दी बोलते थे और बहुत रोचक तरीके से सत्यनारायण की कथा सुनाते थे । बाद में नीलू जीजी का विवाह भी उन्होंने ही करवाया था । 

उसके एक दो मकान बाद एक माड़ी वाला मकान था जहाँ हमारे ही स्कूल की एक लड़की रहती थी । वह मुझसे सीनियर थी और उसका नाम सन्ध्या था । उसकी एक छोटी बहन और एक भाई था , बस इतना मुझे याद है । वही मकान जहां अभी विवेक ट्रेडिंग कंपनी का बोर्ड लगा है । 

ठीक इनके सामने अजय पनके  का घर है , अजय भाई 1976 मे बाबूजी के स्टूडेंट थे बी एड कॉलेज मे आजकल रिटायर होकर अपने घर के सामने इस तरह बैठे रहते हैं 


इसके आगे बढ़ते जाते हैं गुर्जर चौक आता था यहाँ पर गुर्जर जी का मकान था जो कि एक पेट्रोल पंप के मालिक थे। उनके घर के भीतर हरसिंगार  का एक पेड़ था मराठी मे जिसे पारिजात कहते हैं । स्कूल जाते हुए मैं देखता था कि उस पेड़ की एक डाल  सड़क पर आ गई है वहाँ से गुजरते हुए रोज सुबह बहुत सारे फूल जमीन पर बिछे हुए मिलते थे । इसी टीन के दरवाजे के बाईं  ओर था हरसिंगार । 

यहीं एक भैंसों का तबेला भी था जिसमे भैंसे बंधी रहती थीं आज यह उजाड़ पड़ा है 

अब आगे बढ़ते हैं यहाँ चित्र मे जो इमारत दिखाई दे रही है वहाँ पर एक मकान था जिसमें बाद  में शंगरपवार वकील आकर रहने लगे थे। 

उसके बाद आगे बढ़ने पर बिल्डिंग के बाद एक पुराना मकान दिखाई देता है यहाँ पर कभी राहांगडाले वकील रहा करते थे यह अब भी वैसा का वैसा ही है
इसके बाद बजरंग चौक जहाँ से लगभग चार रास्ते यह कहें कि गलियां अलग दिशाओं में जाती थीं । एक भारतीय संगीत विद्यालय या सूर्यवंशी टेलर वाले चौक में एक योगेश काले मामा के घर के सामने से होते हुए नानोटी के घर तरफ एक बीच से निकलकर फ़त्तू जी के घर की ओर इस वाली गली  में हांडे  सर रहते थे। 
इसके बाद मुस्लिम आबादी शुरू होती थी आगे मस्जिद और मांझावाले अब्बास  भाई का मकान यहाँ पर किसी पीर की गद्दी भी  थी देखते हैं पहले क्यास्थिति थी और आज क्या स्थिति  है ।  यहाँ पर एक रिक्शेवाले का मकान भी था मुस्लिम रिक्शा वाला था जिसके घर के आँगन मे  रिक्शा खड़ा रहता था

यह सड़क आज ऐसी दिखती है । 


माँझा वाले अब्बास भाई का घर 
मुझे लगता है यह जो खाली जगह दिख रही है यहीं था रिक्शेवाले का मकान 
अब यहाँ से नूरी मस्जिद दिखाई देने लगी 
यहाँ से दो रास्ते हैं लेकिन हमे दाहिनी ओर जाना है 
दाहिनी ओर नईम के अब्बा की लकड़ी टाल थी 
सामने पुरानी टंकी यानी ढोला दिख रहा है उसके सामने थी हमारी ढोला प्राइमेरी स्कूल यहाँ अब नई पानी की टंकी है 
यह इमारत अब नहीं है 
तो इस तरह हम रोज जाते थे स्कूल 

28 अप्रैल 2026

26 . भंडारा : फॉर हूम द बेल टॉल्स

भंडारा शहर की मेन  रोड 
भंडारा शहर उन दिनों इतना छोटा था कि लोग टहलने निकलते थे और कुछ देर बाद पता चलता थे कि लो शहर तो कबका ख़त्म हो चुका है और वे  शहर की सीमा से बाहर आ गए हैं इतने छोटे शहर की ख़बरें अखबार में तो छपती नहीं थीं न यहाँ के स्थानीय समाचार रेडियो पर आते थे फिर भी लोगों का मन तो होता ही था कि जानें शहर में क्या चल रहा है उनके लिए , शहर में  किसने नई दुकान डाली है, किस लोकल नेता ने जनता को क्या झूठा आश्वासन दिया है से लेकर किस के घर में चोरी हुई है, कौन किसकी लड़की को भगा ले गया है और किस की बीबी ने अपने शराबी पति से तंग आकर उसे ‘सोड़चिठ्ठी’ दे दी है, तक सभी ख़बरें महत्वपूर्ण थीं     

गांधी चौक सदा गुलज़ार 
शहर की ताज़ा ख़बरें जानने के लिए गाँधी चौक के किसी टी स्टाल पर हाफ़ चाय पीते हुए खड़े होना ही पर्याप्त था पान की दुकान वाला भी पान के साथ ऐसी चटपटी ख़बरें लपेट कर देता था जिन्हें आप काफी देर तक चुघल सकते थे किसी सेलून में दाढ़ी बनवाते हुए ‘किसी से न कहना’ के अंदाज़ में सभी खबरें आपको मिल जाती थीं इनमे कुछ ऐसी भी ख़बरें होती थीं जिन्हें अख़बार में छपने का सौभाग्य कभी प्राप्त हो ही नहीं सकता था इसके बावजूद जिन्हें देश दुनिया की ख़बरें जानना होता था वे नागपुर से निकलने वाले अख़बार मंगाते थे ख़बरें हर आदमी के पास होती थी अदा ज़ाफरी साहब ने ऐसे ही शहर के लोगों के लिए लिखा होगा ..

हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है

कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

महाल रोड पर एक प्रेस 
लेकिन इन सबके बावजूद शहर में कुछ ऐसे सजग पत्रकार थे जो अपनी कम पूंजी में ही सही साप्ताहिक अख़बार निकालते थे ऐसे ही एक पत्रकार थे हमारे मोहल्ले के अनंत रघुनाथराव पंडितराव पंडितराव जी ने अकबर इलाहाबादी का शेर सुन रखा था “खींचों न कमानों को न तलवार निकालो , जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो ।“ हालाँकि कोई तोप उनके मुकाबिल नहीं थी और रोज़ अख़बार निकलने लायक संसाधन भी उनके पास नहीं थे इसलिए वे सप्ताह में एक बार सोमवार को अख़बार निकालते थे । उनके अख़बार का नाम था ‘लोकवाणी’ और इसकी कीमत थी मात्र दस पैसे ।

पुराने समय की ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन 
पंडित राव जी एक झोला लटकाए साइकिल पर घूमते हुए हफ़्ते भर तक शहर की ख़बरें इकठ्ठा करते थे । उनके यहाँ एक कम्पोज़र था जो अलग अलग अक्षरों के लोहे से बने गुटकों को जिन्हें टाइप कहते थे एक लोहे की फ्रेम के भीतर सेट करता था । फिर पूरा पन्ना तैयार हो जाने के बाद उसे कस देता था ताकि छपाई के समय वे गिरे नहीं । फिर उसे वह ट्रेडल प्रिंटिंग मशीन पर चढ़ाता था और रोलर पर स्याही डालता था । इतवार की शाम से ही धड़ धड़ की आवाज़ के साथ वह मशीन चलने लगती थी और थोड़ी देर में ही सत्रह बाई ग्यारह इंच के टैबलायड  साइज़ के चार पेज छप जाते थे ।  सोमवार की सुबह पंडितराव जी खुद अख़बार बाँटने निकलते थे । दूर मोहल्लों में बांटने के लिए उन्होंने एक हॉकर भी रखा था ।

पुराने समय का डायल वाला टेलीफोन 

पंडित राव जी की पहचान एक बुद्धिजीवी के रूप में तो थी ही लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उनके यहाँ टेलीफोन था
उस समय जिसके घर में टेलीफोन होता था वह बड़ा आदमी कहलाता था । हम लोग इस मायने में खुशनसीब थे कि हमारे मोहल्ले में दो टेलीफोन थे एक पंडितराव के यहाँ और एक एड्वोकेट शंगर्पवार के यहाँ । अनेक लोगों ने उनके घर के टेलीफोन नंबर अपने रिश्तेदारों को दे रखे थे जो अक्सर पंडित राव जी के टेलीफोन की घंटी बजाया करते थे  

हेमिंग्वे का उपन्यास 
अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास “ फॉर हूम द बेल टॉल्स “ के शीर्षक की तरह पंडितराव जी को भी पता नहीं होता था कि घंटी किसके लिए बज रही है इन पी पी नंबरों पर जब किसी का कोई रिश्तेदार फोन करता और पंडित राव जी से कहता “ कृपया फलां फलां को बुला दीजिये” पंडितराव जी जैसे सज्जन व्यक्ति पैदल ही नंगे पाँव उस व्यक्ति को बुलाने दौड़ जाते थे और “तुमचा फोन “ कह कर लौट आते । वे कितने भी व्यस्त हों उन्होंने पड़ोस के लोगों को बुलाने में कभी कोई कोताही नहीं की ।

पास पड़ोस का फोन 
उन दिनों पड़ोस के ऐसे बड़े आदमी का टेलीफोन नंबर पी पी नंबर कहलाता था हम लोग पी पी नंबर  का अर्थ नहीं जानते थे जिससे पूछो वह अलग अलग मतलब बताता था, कोई कहता पी पी यानि पर्सनल फोन तो कोई कहता पर्टिकुलर फोन हम लोगों ने सहूलियत के लिए इसका नाम रखा था ‘पास पड़ोस का फोन’ बाद में ज्ञात हुआ कि इसका वास्तविक अर्थ था पर्टिकुलर पर्सन अर्थात किसी विशिष्ट व्यक्ति के लिए आनेवाला फोन या उसके घर का नंबर

ट्रंक काल टेलीफोन एक्सचेंज में बुक होते थे 
लोग इमरजेंसी में जैसे किसी की मृत्यु आदि की सूचना देने के लिए इन्ही लोगों के घर से ट्रंक काल बुक करते थे और यह लोग इतने अच्छे कि कभी उसके पैसे भी नहीं लेते थे जबकि उन दिनों फोन का बिल बहुत ज़्यादा आता था । पास पड़ोस के फोन का उपयोग करने का यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक शहर में एस टी डी पी सी ओ नहीं खुल गए अथवा लोगों के घरों  में फोन नहीं लग गए । वह समय कब का बीत चुका है । अब तो हर जेब में मोबाइल है और पंडितराव जैसे परोपकारी लोग दुनिया से जा  चुके हैं  

पहले यहाँ हुआ करता था पंडितराव जी का घर 
एक ज़माना बीत गया यह सब घटित हुए तबसे लेकर अब तक जाने कितना पानी भंडारा की वैनगंगा नदी में बह चुका होगा भंडारा की गलियों से लेकर सडकों तक की सूरत बदल गई है पुराने मकान अब भी साँस ले रहे हैं लेकिन उनका वैभव अब ऊँची ऊँची इमारतों के आगे फीका पड़ रहा है लोग भी अब पंडितराव जी और शंगर्पवार जी जैसे कहाँ शेष हैं अब तो लगता है सब आपाधापी में हैं हर कोई दौड़ रहा है, जैसे उन्हें कहीं जाने की कोई जल्दी हो दौड़ सब रहे हैं लेकिन कोई कहीं पहुँच नहीं रहा है वे ऐसे दिन थे जब पड़ोस में रहने वालों को आपके रिश्तेदारों के नाम भी मालूम रहते थे । अब रिश्तेदार तो दूर बगल में कौन रहता है यह भी पता नहीं होता

लोकवाणी चौक 
लेकिन अभी भी समय बीत कर रीत नहीं गया है लोग विकास की अंधी दौड़ में दौड़ अवश्य रहे हैं लेकिन वे अभी चुके नहीं हैं फिर कोई कितना भी होशियार हो,  दौड़ जीतने की जल्दी में हो ,दौड़ते हुए एक न एक बार पीछे मुड़कर देखता ज़रूर है हम आप भी अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में बीते दिनों की धूल पर अपने पिछले कदमों के निशान ज़रूर देखते हैं ताकि हम बेहतर जान सकें कि हमें अगला कदम कौनसा रखना है

अभी भंडारा की इन गलियों में मुझे ऐसे बहुत से निशान दिखाई दे रहे हैं इनमे कुछ निशान तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर आप चौंक जायेंगे ध्यान से देखिये आपको इन गलियों में बाबासाहेब आम्बेडकर के पाँव के निशान भी दिखाई देंगे , उन दिनों के जब उन्होंने भंडारा सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने के दौरान यहाँ डेरा डाला था

अख़बार पर आज बहुत सी बातें हुई  बशीर महताब का एक शेर जो मुझे बहुत अच्छा लगता है वह भी पढ़ लीजिये...

मुझ को अख़बार सी लगती हैं तुम्हारी बातें

हर रोज़ नया फ़ितना बयाँ करती हैं

शरद कोकास